pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

बुधवार, 13 अप्रैल 2022

कर्म पर भारी पड़ती, किस्मत

समर ने इस बार लहसुन की अच्छी फसल ली थी सो वही ले कर वह विदेश रवाना हो गया। गंतव्य पर पहुंच कर उसने भी अपना सामान वहां के लोगों को दिखाया। भगवान की कृपा, लहसुन का स्वाद तो उन लोगों को इतना भाया कि वे सब प्याज को भी भूल गए ! इतने दिव्य स्वाद से परिचित करवाने के कारण वे सब अपने को समर का ऋणी मानने लग गए। पर उन लोगों के सामने एक धर्मसंकट आ खड़ा हुआ कि इतनी अच्छी चीज का मोल वे लोग किस कीमती वस्तु से चुकाएं....! उनके लिये सोने का कोई मोल तो था ही नहीं  ! तो क्या करें ? तभी वहां के मुखिया ने सब को सुझाया कि सोने से कीमती चीज तो अभी उनके पास कुछ दिनों पहले ही आई है...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कहानी कुछ पुरानी जरूर है पर है बड़ी दिलचस्प। जो यह बताती है कि कर्म के साथ किस्मत का सांमजस्य होना कितना जरुरी  होता है ! बात उन दिनों की है जब आधुनिक संचार व्यवस्था का नाम भी लोगों ने नहीं सुना था ! लोग आने-जाने वालों, व्यापारियों, घुम्मकड़ों, सैलानियों से ही देश विदेश की खबरें, जानकारियां प्राप्त करते रहते थे। ऐसे ही अपने आस-पास के व्यापारियों की माली हालत अचानक सुधरते देख छोटी-मोटी खेती-बाड़ी करने वाले जमुना दास ने अपने पड़ोसी की मिन्नत चिरौरी कर उसकी खुशहाली का राज जान ही लिया। पड़ोसी ने बताया कि दूर देश के राज में बहुत खुशहाली है। वहां इतना सोना है कि लोग रोज जरूरत की मामूली से मामूली आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भी सोने का उपयोग करते हैं। वहां हर चीज सोने की है। सोना मिट्टी के मोल मिलता है !

ऐसी बातें सुन जमुना दास भी उस देश की जानकारी ले, वहां जाने को उद्यत हो गया। पर उसके पास जमा-पूंजी तो थी नहीं। फिर भी इस बार उसकी प्याज की फसल ठीक-ठाक हुई थी ! भगवान् का नाम ले, उसी की बोरियां जहाज पर लदवा, वह अपने गंतव्य की ओर रवाना हो गया। उसकी तकदीर का चमत्कार कि वहां के लोगों को मसाले वगैरह की जानकारी बिलकुल नहीं थी ! प्याज को चखना तो दूर उन्होंने उसका नाम तक भी नहीं सुना था। जब जमुना दास ने उसका उपयोग बताया तो उसका स्वाद चख कर वे लोग खूशी से पागल हो गए ! पलक झपकते, मिनटों में ही जमुना दास का सारा का सारा प्याज खत्म हो गया। बदले में वहाँ के लोगों ने उसकी बोरियों को सोने से भर दिया। जमुना दास वापस अपने घर लौट आया। उसके तो वारे-न्यारे हो चुके थे। अब वह जमुना दास नहीं सेठ जमुना दास कहलाने लग गया था।
यहाँ देखें तो जमुना दास और समर ने अपनी तरफ से पुरजोर कर्म किए किसी भी तरह की कोताही नहीं बरती ! विदेशियों ने भी अपनी और से बिना भेदभाव के भरपूर सहायता की, पर किस्मत
उसकी जिंदगी और हालात बदलते देख उसके पड़ोसी समर से भी नहीं रहा गया। एक दिन वह भी हाथ जोड़े जमुना दास के पास आया और एक ही यात्रा में मालामाल होने का राज पूछने लगा। उन दिनों लोगों के दिलों में आज की तरह द्वेष-भाव ने जगह नहीं बनाई थी। पड़ोसी, रिश्तेदारों की बढोत्तरी से, किसी की भलाई कर लोग खुश ही हुआ करते थे। जमुना दास ने भी समर को सारी बातें तथा हिदायतें विस्तार से बता-समझा दीं और उसे भी विदेश जाने को  प्रोत्साहित किया। पर यहां भी वही बात थी, समर की जमा-पूँजी भी उसकी खेती ही थी। संयोग से उसने इस बार लहसुन की अच्छी फसल ली थी, सो उसी को ले कर वह भी स्वर्ण देश को रवाना हो गया।

गंतव्य स्थल पहुंच कर उसने भी अपना सामान वहां के लोगों को दिखाया। भगवान की कृपा, लहसुन का स्वाद तो वहाँ के लोगों को इतना भाया कि वे सब प्याज को भी भूल गए ! इतने दिव्य स्वाद से परिचित करवाने के कारण वे सब अपने को समर का ऋणी मानने लग गए ! उसका खूब मान-सम्मान हुआ ! पर उन लोगों के सामने एक धर्मसंकट आ खड़ा हुआ कि इतनी बेहतरीन, लाजवाब वस्तु का मोल वे किस वस्तु से चुकाएं.... ! उनके लिए सोने का कोई मोल नहीं था ! इतनी दिव्य और अच्छी चीज का मोल भी वे लोग किसी बेशकीमती चीज से चुकाना चाहते थे। वे लोग इसी पेशोपेश में थे कि करें तो क्या करें, जिससे इस व्यापारी के एहसान का बदला उचित रूप से चुकाया जा सके ! 

काफी सोच-विचार के बाद वहां के मुखिया को एक उपाय सूझा !  उसने सबको सुझाया कि हमारे पास सोने से भी कीमती चीज तो अभी कुछ दिनों पहले ही आई है। उसी को इस व्यापारी को दे देते हैं। क्योंकि इतनी स्वादिष्ट चीज के बदले किसी अनमोल वस्तु को दे कर ही इस व्यापारी का एहसान चुकाया जा सकता है। सभी को यह सलाह बहुत पसंद आई और उन्होंने समर के थैलों को प्याज से भर अपने आप को ऋण मुक्त कर लिया।  

अब यहाँ देखें तो जमुना दास और समर ने अपनी तरफ से पुरजोर कर्म किए किसी भी तरह की कोताही नहीं बरती ! विदेशियों ने भी अपनी और से बिना भेदभाव के भरपूर सहायता की, पर किस्मत, किस पर, किस तरह मुस्कुराई............!!  
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बेचारा समर !!

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2022

लाखों की फीस लगती है, चोरी की कला सीखने के लिए

यहां इंजीनियरिंग या एम.बी.ए. की तरह भारी-भरकम फीस लेकर बच्चों को चौर्य कला में पारंगत किया जाता है ! ये बच्चे वहां अपहरण या फुसला कर नहीं लाए जाते बल्कि बच्चों के माँ-बाप अपने बच्चों को खुद वहाँ दाखिला दिलवाते हैं, अच्छी-खासी, भारी-भरकम रकम अदा कर के ! यहां छोटी उम्र से ही बच्चों को अपराधों की ट्रेनिंग देनी शुरू कर दी जाती है। इनके भी बाकायदा कोर्स होते हैं ! शुरूआती तरकीबों के लिए दो से तीन लाख और पूरे कोर्स के लिए पांच लाख रुपये तक देने होते हैं ...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

भारतीय गौरवशाली संस्कृति में किसी समय चोरी करना भी एक कला मानी जाती थी। सेंधबाज ऐसी-ऐसी कलाकारी से अपने काम को अंजाम देते थे कि लोग दांतो तले उंगलियां दबा लेते थे। उनका अंदाज, उनके काम करने का तरीका, उनको एक विशेष पहचान प्रदान करवा देता था ! पहुंचे हुए चोरों को अपने ऊपर इतना विश्वास होता था कि वे  भी चोरी करने के बाद अपनी कोई न कोई निशानी छोड़ जाते थे, एक चुनौत्ती की तरह कि लो खोज लो मुझे यदि हो सके तो ! एक तरह से ये उनके "ट्रेड मार्क" भी हुआ करते थे। जाहिर है इतनी निपुणता पाने के लिए कहीं न कहीं से शुरूआती प्रशिक्षण तो लेना ही पड़ता होगा, शुरू में कोई तो उन्हें प्रशिक्षित करता ही होगा ! जिसकी पूर्णता फिर उन्हें अपने अनुभव से प्राप्त होती होगी ! यह सब बीते दिनों की बातें हैं ! वैसे भी चोरी तो चोरी ही होती है ! इसीलिए इसे दुष्कर्मों में गिना जाने लगा और यह दंडात्मक कार्यों में शुमार हो गया !   

परंतु राज व समाज द्वारा लाख जुर्माना, सजा, हिकारत, बदनामी, घृणा मिलने के बावजूद भी इसका खात्मा नहीं किया जा सका ! यह आदत इंसान में बरकरार ही रही। इसीलिए लगता है कि प्राचीन समय में इसे मिलने वाला प्रशिक्षण व संरक्षण दबे-ढके रूप से विद्यमान रहता चला आया है ! इसका प्रमाण तब मिला जब मध्य प्रदेश के कड़िया, हुलखेड़ी और गुलखेड़ी जैसे गांवों का नाम सामने आया ! ये वे गांव हैं जहां इंजीनियरिंग या एम.बी.ए. की तरह भारी भरकम फीस ले कर बच्चों को चौर्य कला में पारंगत किया जाता है ! ये बच्चे वहां अपहरण या फुसला कर नहीं लाए जाते बल्कि बच्चों के माँ-बाप अपने बच्चों को वहाँ दाखिला दिलवाते हैं, अच्छी-खासी, भारी-भरकम रकम अदा कर के ! यहां छोटी उम्र से ही बच्चों को अपराधों की ट्रेनिंग देनी शुरू कर दी जाती है। इनके भी बाकायदा कोर्स होते हैं ! शुरूआती तरकीबों के लिए दो से तीन लाख और पूरे कोर्स के लिए पांच लाख रुपये तक देने होते हैं ! इसमें मुख्य पाठ्यक्रम शादी-ब्याहों  से कीमती सामान पार करने में प्रशिक्षित करता है ! जिसमें आठ-दस साल के बच्चों को प्रमुखता दी जाती है, जिससे यदि पुलिस पकड़ भी ले नाबालीगता का सहारा ले उन्हें छुड़वाने में आसानी रहती है ! काम को अंजाम देने के लिए दो-तीन लोग बड़ा सा उपहार का पैकेट और चार-पांच बच्चों को एक बड़ी सी गाडी में ले कर किसी शादी या भव्य समारोह में पहुँचते हैं ! वहाँ वे उपस्थित लोगों से घुल-मिल जाते हैं और बच्चे आपस में खेलने के बहाने उसी जगह का चक्कर लगाते रहते हैं जहां कीमती सामान रखा होता है और मौका पाते ही सामान को गाड़ी में पहुंचा दिया जाता है ! पकड़े जाने पर उन्हें रोने-धोने, तेजी से भागने, भीड़ की पिटाई से बचने आदि में भी ट्रेंड किया जाता है ! इसके अलावा इन गिरोहों की अपने वकीलों की टीम भी होती है !

इन गांवों में अधिकाँश परिवार जरायम पेशे से जुड़े रह कर देश भर में सक्रिय हैं ! इन गांवों में प्रवेश करना भी आफत को दावत देने के समान है ! बच्चों के अलावा इनके गिरोह में महिलाओं का भी जमावड़ा रहता है जिन्हें आसानी से जमानत मिल जाती है ! वही बच्चे जो पैसा दे कर ''हुनर'' सीखते हैं, जब निपुण हो जाते हैं तो गिरोह के सरगना उनके माँ-बाप को उनके काम के एवज में लाखों का भुगतान करते हैं ! जैसे इंजीनियरिंग या एम बी ए की डिग्री हासिल करने पर प्लेसमेंट होता है !  

इन सब बातों का खुलासा तब हुआ जब हाल ही में राजस्थान में हुई 10 लाख की चोरी के बाद मामले की जांच-पड़ताल की गई ! जहां एक पूर्व सैनिक के दस लाख रुपए चुरा लिए गए ! लेकिन सीसीटीवी फुटेज से मिले सुराग के आधार पर आरोपियों की पहचान हो गई। इसके बाद इनकी गिरफ्तारी भी हो गई। विचित्र है मानव उसकी प्रकृति और हमारा देश................!! 

आभार - श्री एन. रघुरामन जी 

शनिवार, 19 मार्च 2022

उजड़ता बागीचा और घड़ियाली चमड़े के जूते

वे अपने ठाठ-बाट का, बिना किसी अफसोस या शर्मिंदगी के प्रदर्शन करते हुए अपनी नाकामियों को निर्लज्जता से दूसरों की गलतियों से ढकने की अहमकाना हरकतें करते नजर आने लगे ! ऐसी ही एक जगह किसी ने पूछ लिया, भइया जी, बगीची तो पूरी तहस-नहस हो गई ! भैया जी बोले, क्या फर्क पड़ता है, जमीन तो बाकी है ! तभी एक युवक बोला, भइया जी आपके तो ठाठाम-ठाठ हैं, आपके तो जूतों की रखवाली भी बंदूक वाला करता है ! भैया जी खटिया पर और पसरते हुए बोले, अरे बेवकूफ ये घड़ियाल के चमड़े के जूते हैं, बहुत मंहगे होते हैं, तू तो कीमत का अंदाज भी नहीं लगा सकता ! इतना कह एक जोरदार ठहाका लगा दिया............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

एक बहुत सुंदर बागीचा था। उसमें तरह-तरह के देसी-विदेशी पेड़-पौधे, लता-गुल्म, फूल-पत्तियां करीनेवार लगे हुए थे ! इसका कोई दूसरा उदाहरण देश में कहीं और नहीं था ! इसकी साज-संभार के लिए दसियों निपुण लोग तन-मन-धन से लगे रहते थे। दूर-दूर तक इस बागीचे की सुंदरता और रख-रखाव की ख्याति फैली हुई थी ! पता नहीं कहाँ-कहाँ से लोग इसे देखने के लिए आते थे ! उसकी साज-सज्जा, उसमें उत्पन्न विभिन्न किस्में, उनकी उपयोगिता बागीचे को सदा खास बनाए रखती थीं ! एक तरह से उसको देश की धरोहर माना जाने लगा था ! 
उसकी सुरक्षा और देखभाल के लिए वहाँ काम करने वालों में से ही एक माली को बागीचे के मध्य में एक कक्ष बना कर दे दिया गया था। समय बीतता गया, पुराने लोग एक के बाद एक दिवंगत होते चले गए ! जिसे पहरेदारी के लिए कक्ष दिया गया था, वह भी परलोक सिधार गया पर उसके कुनबे के लोगों ने वह जगह हथिया कर घर और बागीचे दोनों का स्वंय को मालिक और पर्याय घोषित कर दिया ! उनकी दबंगई, अहम, अदूरदर्शिता, अज्ञान देख कर्मठ और समर्पित लोग धीरे-धीरे अलग होते चले गए ! उनकी जगह नाकाबिल, चापलूस, चारण व मतलबपरस्त जैसों का जमावड़ा हो गया ! जो बागीचे का भला चाहते थे उनकी कोई पूछ नहीं थी !
काम उन्हीं लोगों को दिया गया जो जमीन के नहीं, जी-हुजूरी में माहिर थे ! सड़क पर गिट्टी डालने वाले को जमीन पर हल चलाने का काम दे दिया गया ! मच्छर मारने की दवा छिड़कने वाले को पौधों की सुरक्षा संभलवा दी गई ! जिनको काली-पीली दाल का भी फर्क मालुम नहीं था, उन्हें बीजों के अंकुरण की जिम्मेदारी सौंप दी गई  ! बड़बोले मौकापरस्तों को बाड़ की सुरक्षा हेतु तैनात कर दिया गया और तो और जिसके खुद की जमीन उसकी अज्ञानता से बंजर हो गई थी उसे ही बागीचे सौंदर्यीकरण का जिम्मा दे दिया गया  
बागीचे की अब किसी को चिंता नहीं थी ! माली की वर्तमान पीढ़ी इस काम से पूरी तरह नावाकिफ व लापरवाह थी ! खुद तो क्या, वहाँ काम करने वालों पर भी कोई ध्यान नहीं दिया जाता था ! सिर्फ नाम और दाम की चाहत रह गई थी ! इसका फायदा उठा कुछ भ्रष्ट कर्मचारी लाभ कमाने और अपना घर भरने की ताक में रहने लगे ! कुछ कारिंदों ने तो बागीचे की जमीन के टुकड़े कर उन पर अपना हक जमा लिया ! ऐसे में जो होना था वही हुआ ! बिना उचित रख-रखाव के बागीचे का सौंदर्य नष्ट होने लगा ! बात फैली तो मालिक परिवार ने खुद को बचाते हुए सारी जिम्मेदारी अपने कारिंदों पर डाल दी ! बताया गया कि खाद-पानी ठीक नहीं मिल रहा पर कुछ ही दिनों में हालत सुधर जाएंगे ! बात आई गई हो गई ! कुछ दिनों बाद भी कुछ सुधार ना होता देख, फिर मीटिंग बुलाई गई, कुटिल कारिंदों ने समझा दिया कि औजार वगैरह पुराने हो गए हैं, नए आते ही सब ठीक हो जाएगा ! पर फिर भी सब जस का तस रहा ! समर्पित लोग इस दुर्दशा से परेशान सिर्फ हाथ मलते रह जाते थे ! पर किसी में हिम्मत नहीं थी कि कहे कि मुझे जिम्मेदारी दे दीजिए मैं सुधार ला दूंगा ! ऐसा इसलिए भी क्योंकि वे जानते थे कि ऐसा कहते ही चरणसेवक व चापलूस यह भ्रम फैला देंगे कि कुछ लोग जिम्मेदारी पा जमीन हड़पना चाहते हैं और कान के कच्चे उनके आका इस बात का विश्वास भी कर लेंगे !  

समय बीतता गया ! बुहाई-चुहाई का मौसम फिर आ गया ! इस बार माली परिवार के एक सदस्य पूरे अहम, दिखावे और ठसक के साथ साज-संभार की जिम्मेदारी ले ली ! सबको बता दिया कि अब मैं ही मुखिया हूँ ! मेरे आते ही आमूलचूल परिवर्तन आ जाएगा ! पर इस भार को संभालने का कारण जमीन की बदहाली की चिंता से ज्यादा उसकी आड़ में अपनी वंश बेल का आधिपत्य बरकरार रखने का भी गुप्त इरादा ही था शायद ! जो भी हो, तन और धन से काम शुरू कर दिया गया ! प्रचार भी खूब किया गया कि इस बार की पैदावार अप्रतिम होगी ! जमीन उर्वरा होते ही सिर्फ स्थानीय लोगों को उसका उपयोग करने दिया जाएगा ! उसकी पैदावार लोगों को मुफ्त दी जाएगी, इत्यादि-इत्यादि ! पर काम उन्हीं लोगों को दिया गया जो जमीन के नहीं, जी-हुजूरी में माहिर थे ! सड़क पर गिट्टी डालने वाले को जमीन पर हल चलाने का काम दे दिया गया ! मच्छर मारने की दवा छिड़कने वाले को पौधों की सुरक्षा संभलवा दी गई ! जिनको काली-पीली दाल का भी फर्क मालुम नहीं था, उन्हें बीजों के अंकुरण की जिम्मेदारी सौंप दी गई ! बड़बोले मौकापरस्तों को बाड़ की सुरक्षा हेतु तैनात कर दिया गया और तो और जिसके खुद की जमीन उसकी अज्ञानता से बंजर हो गई थी उसे ही बागीचे सौंदर्यीकरण का जिम्मा दे दिया गया ! यूं ही नहीं कहा गया कि जिसका काज उसी को साजे और करे तो डंडा बाजे ! सो यहां भी डंडा ही बजता नजर आया......!

कहावत है कि कोई भी काम करते समय नियत भी नेक होनी चाहिए ! आप लोगों को धोखा दे सकते हो पर ईश्वर को नहीं ! और सबसे बड़ी बात, आप जो काम कर रहे हैं उस काम का पूरा इल्म होना चाहिए ! यहां भी यही हुआ ! जुताई-बुताई के दौरान ही एक भयंकर झंझावात आ गया ! अब इन लोगों की अज्ञानता और अदूरदर्शिता के कारण ऐसी परिस्थितियों से निबटने का कोई प्रबंध किया ही नहीं गया था ! लिहाजा बागीचे के दो-तीन पेड़ों को छोड़ बाकी सब कुछ नेस्तनाबूद हो गया ! बिना सोचे-समझे, बिना किसी जानकार के मार्गदर्शन के, बिना परिस्थितियों के आकलन के वही हुआ जो होना था ! सब मटियामेट हो कर रह गया ! 

पर अभी भी किसी ने माली परिवार को गलत नहीं ठहराया ! सारी असफलता का ठीकरा दूसरों के सर फुड़वा दिया गया ! खुद लुटिया डुबोने में अग्रणी रहे गपोड़शखों ने फिर नासमझ आकाओं को आश्वस्त कर दिया कि भविष्य में सब दुरुस्त हो जाएगा ! मालिकों ने भी इस पयाम के साथ बयानवीर सेवकों को गांव-कस्बों की चौपालों पर सैर-सपाटे के लिए भेज दिया ! जहां वे अपने ठाठ-बाट का, बिना किसी अफसोस या शर्मिंदगी के प्रदर्शन करते हुए अपनी नाकामियों को निर्लज्जता से दूसरों की गलतियों से ढकने की अहमकाना हरकतें करते नजर आने लगे ! ऐसी ही एक जगह किसी ने पूछ लिया, भइया जी, बगीची तो पूरी तहस-नहस हो गयी ! भैया जी बोले, क्या फर्क पड़ता है जमीन तो बाकी है ! तभी एक युवक बोला, भइया जी आपके तो ठाठाम-ठाठ हैं, आपके तो जूतों की रखवाली भी बंदूक वाला करता है ! भैया जी खटिया पर और पसरते हुए बोले, अरे बेवकूफ वह घड़ियाल के चमड़े के जूते हैं, बहुत मंहगे होते हैं, तू तो कीमत का अंदाज भी नहीं लगा सकता ! इतना कह जोरदार ठहाका लगा दिया !   

किसी को भी अपनी समझदानी पर ज्यादा जोर डालने की आवश्यकता नहीं है ! शीशे की तरह साफ है कि वे कौन लोग हैं जो अभी भी चाहते हैं कि बागीचे की जिम्मेदारी माली परिवार के पास ही रहे ! घड़ियाली जूते तो सभी को चाहिएं......... और अभी तो बागीचा ही उजड़ा है, जमीन तो बची हुई है ना !    

मंगलवार, 15 मार्च 2022

होली हो ले, उसके पहले सोचना तो बनता है

आज दोपहर बाद घर लौटते समय कालोनी के किसी ऊँचे से मकान से किसी बच्चे के हाथ से छूटी गुब्बारे रूपी मिसाइल मुझे मिस करती हुई सड़क से टकरा कर नष्ट हो गई ! अभी दो दिन बचे हैं त्यौहार के आने में, ऐसा ही कुछ सोच, टारगेट यानी मैंने तुरंत पलट कर देखा पर आशानुरूप ''लॉन्चर'' गायब था ! तभी पता नहीं कैसे विचारों ने पलटा खाया ! अपने बचपन के दिन याद आ गए, जब दसियों दिन पहले से इस आनंदमय उत्सव को मनाने का उत्साह जाग जाता था ! बड़े-छोटे-महिलाएं सब अपने-अपने तरीके से इसका स्वागत करने की तैयारियों में जुट जाते थे........!

#हिन्दी_ब्लागिंग

होली अपने समय पर फिर आ पहुंची है ! गांवों-कस्बों में तो भले ही कुछ जिंदादिली बची भी हो पर शहरों में तो सिर्फ औपचारिकता ही शेष रह गई है ! अब ना ही पहले जैसा उत्साह है, ना ही उमंग है, ना हीं कोई चाव ! ना ढफली ना चंग ना हीं ढोलक ! ना हीं फाग ना हीं संगीत ना हीं मस्ती ! ना घर में बने पकवान, ना ठंडाई, ना बेफिक्री का आलम ! सब तिरोहित होता चला गया समय के साथ-साथ ! उस पर सदा से किसी षड्यंत्र के तहत, तथाकथित बुद्धिजीवी, छद्म इतिहासकार, परजीवी सोशल मीडिया, मौकापरस्त वार्ताकार, अपनी आस्था, संस्कृति, परंपरा, उत्सवों में मीनमेख निकालने वालों की, ऐन मौके पर पानी बचाने की नसीहतें ढहती दिवार पर धक्के का काम करती रहीं !  

हमारे त्योहारों पर ही मंहगाई, बेरोजगारी, जिंसों की कमियों का रोना क्यों रोया जाता है ! क्यों हमारे त्यौहार सिमटते चले जा रहे हैं ! क्यों एक दिवसीय आयातित उत्सव धीरे-धीरे हफ्तों तक मनवाए जाने लगते हैं ! क्यों हमारी पारंपरिक पकवानों-मिठाइयों को दरकिनार करवा कर चॉकलेट-पेस्ट्रियों को प्रमुखता दी जाने लग जाती है ! क्यों दीप जला कर वातावरण को प्रकाशमय बनाने की जगह दीप बुझा कर अंधेरे के आह्वान को उचित बताया जाने लगा है   

अब बच्चों को भी पहले जैसे अवकाश नहीं मिलते ! उल्टे इन्हीं दिनों में परीक्षा का भूत उनके सर पर सवार करवा दिया जाता है ! फिर भी त्योहारों के प्रति उनका बालसुलभ उत्साह खत्म नहीं हुआ है ! सोचा जाए तो वे ही हैं, हमारे ध्वजवाहक, जो किसी भी बहाने सही, अपनी परंपराओं को जिंदा रखे हुए हैं ! इसलिए यदि कहीं से किसी बच्चे का कोई गुब्बारा या पिचकारी की धार आ कर आपके कपड़ों को भिगो भी जाती है तो मुस्कुरा कर उसे देखें, आपकी जरा सी मुसकुराहट उसको खुशी से लबरेज कर देगी ! कपड़ों का क्या है कुछ ही देर में सूख जाएंगे पर सारा वातावरण बच्चे की निश्छल हंसी, उसकी खुशी के रस से सराबोर हो जाएगा ! शायद इतने से उपक्रम से ही हम गायब होती परंपराओं को कुछ हद तक बचाने में कुछ सहयोग कर सकें !  

आज दोपहर बाद घर लौटते समय कालोनी के किसी ऊँचे से मकान से किसी बच्चे के हाथ से छूटी गुब्बारे रूपी मिसाइल मुझे मिस करती हुई सड़क से टकरा कर नष्ट हो गई ! अभी दो दिन बचे हैं त्यौहार के आने में, ऐसा ही कुछ सोच, टारगेट यानी मैंने तुरंत पलट कर देखा पर आशानुरूप ''लॉन्चर'' गायब था ! तभी पता नहीं कैसे विचारों ने पलटा खाया ! अपने बचपन के दिन याद आ गए, जब दसियों दिन पहले से इस आनंदमय उत्सव को मनाने का उत्साह जाग जाता था ! बड़े-छोटे-महिलाएं सब अपने-अपने तरीके से इसका स्वागत करने की तैयारियों में जुट जाते थे !

उन दिनों पिताजी उस समय के कलकत्ता के पास एक जूट मील में अधिकारी थे ! मिल का पूरा स्टाफ एक परिवार की तरह था ! हर त्यौहार मिल-जुल कर ही मनाया जाता था, पर होली की बात सबसे निराली थी ! यह सबका सबसे प्रिय उत्सव हुआ करता था ! नई चंग या डफ लाई जाती थी ! उसका तरह-तरह से परिक्षण कर तैयार किया जाता था। इतने सारे परिवारों के लिए ठंडाई, गुझिया, मिठाई, नमकीन इत्यादि का पर्याप्त मात्रा में इंतजाम किया जाता था। रंग तो फैक्ट्री में उपलब्ध होते थे पर व्यक्तिगत पिचकारियों की खरीद उनका रख-रखाव एक अलग काम हुआ करता था। उन दिनों प्लास्टिक का चलन नहीं था। पिचकारियां लोहे या पीतल की, तीन आकारों में छोटी, मध्यम और बड़ी, हुआ करती थीं। उनमें दो तरह के "अड्जस्टमेंट" होते थे, एक फौव्वारे की तरह रंग फेंकता था, जिसकी दूरी के हिसाब से क्षमता कम होती थी, दूसरा एक धार वाला, जो कम से कम दस-बारह फुट तक पानी फेंक किसी को भिगो सकता था। सिर्फ रंग-गुलाल ! ना कीचड़ ना ग्रीस, ना कपड़ा फाडू हुड़दंग !

हफ्ते-दस दिन पहले से रात को डफ पर थपकियां पड़नी शुरू हो जाती थीं। "सर्रा-रा-रा"  की गूंज देर रात तक मस्ती बरसाती रहती थी। होली वाले दिन स्टाफ के युवा टोली बना मील-परिसर में चक्कर लगाना शुरू करते थे। आगे-आगे डफ वादक अपनी मीठी तान में फाग गाते हुए चला करता था, पीछे पूरी टोली सुर में सुर मिलाती  चलती थी। घर-घर जा यथायोग्य अभिवादन कर, रंग लगा, लगवा, अपने पूरे रंग में आ कर मैदान में  एकत्रित हो जाते थे। एक शालीनता तारी रहती थी पूरे माहौल में। बड़े-छोटे का लिहाज, बड़ों के प्रति आदर-सम्मान तथा अनुशासन ! हाँ, बच्चे जरूर अपने-अपने ''हथियारों'' के साथ लैस हो अनवरत उन पर रंगों की बरसात बदस्तूर जारी किए रहते थे !

घंटों चलने वाले इन सब कार्यक्रमों के बाद संध्या समय होता था, प्रीतिभोज का। खाना-पीना मौज -मस्ती, गाना-बजाना या फिर मैदान में पर्दा लगा प्रोजेक्टर के माध्यम से किसी फिल्म का शो। पर उस शाम का मुख्य आकर्षण होती थी ठंडाई जो वहीं उचित देख-रेख में तैयार की जाती थी। जिसका स्वाद आज तक नहीं भुलाया जा सका है।  उसके भी दो वर्ग हुआ करते थे, बच्चों और महिलाओं के लिए सादी और पुरुषों के लिए "बूटी" वाली। उधर युवा भी अपने से बड़ों का लिहाज कर ही उसका सेवन करते थे। जिस पर शिव जी की कृपा कुछ ज्यादा होने लगती वह चुपचाप वहां से खिसक लेता था। ना कभी हुड़दंग देखा- सुना गया ना हीं कभी किसी गलत हरकत को उभरते देखा गया ! कैसा समय था ! कैसे थे वे दिन और कैसे थे वे लोग !

क्या आज हमारी जिम्मेदारी नहीं बनती कि हम अपने गुम होते या सुनियोजित तरीके से गायब करवा दिए जा रहे त्योहारों, उत्सवों, परंपराओं को बचाने का उपक्रम करें ! सोचें कि हमारे त्योहारों पर ही मंहगाई, बेरोजगारी, जिंसों की कमियों का रोना क्यों रोया जाता है ! क्यों हमारे त्यौहार सिमटते चले जा रहे हैं ! क्यों एक दिवसीय आयातित उत्सव धीरे-धीरे हफ्तों तक मनवाए जाने लगे हैं ! क्यों हमारे ऋषि-मुनियों को भुलवा कर इम्पोर्टेड महापुरुषों को हम पर थोपा जाने लगा है ! क्यों हमारे पारंपरिक पकवानों, मिठाइयों को दरकिनार करवा कर चॉकलेट-पेस्ट्रियों को प्रमुखता दी जाने लगी है ! क्यों दीप जला कर वातावरण को प्रकाशमय बनाने की जगह दीप बुझा कर अंधेरे के आह्वान को उचित बताया जाने लगा है !ऐसे बहुत सारे क्यों हैं, जिन पर जरा सा थम कर विचार करने की जरुरत है ! 

क्या आप थमेंगे, जरा सा.........!!

बुधवार, 2 मार्च 2022

चमत्कार का यही चमत्कार है कि चमत्कार का एहसास ही नहीं हो पाता

तकलीफ बहुत बढ़ने पर कई बार गुहार की थी, ''क्या प्रभु ! यह जरा सा रोग नहीं दूर हो पा रहा !'' ऐसे में ही पता नहीं, पिछले दिनों कब और कैसे रात सोते वक्त नाक पर हाथ रख, मन ही मन ''नासै रोग हरे सब पीरा , जपत निरंतर हनुमत बीरा'' का तीन बार जप करना शुरू कर दिया था ! मेरा डॉक्टर और दवाइयों से यथाशक्ति परहेज ही रहता आया है ! तो क्या खांसी इसलिए शुरू हुई कि उसके बहाने मुझे अस्पताल जाना पड़े ! क्योंकि इसके पहले कभी भी इतने लंबे समय तक इसका प्रकोप नहीं हुआ था ! वहां जाने पर खांसी के चलते नाक की दवा भी मिली और वर्षों से चली आ  रही ''एक्यूट'' तकलीफ से छुटकारा मिला ! अब यह क्या था........! 

#हिन्दी_ब्लागिंग            

भगवान सर्वव्यापी है ! रक्षक है ! तारणहार है ! सबकी सुनता है ! हरेक की सहायता करता है ! पर कभी अहसास नहीं होने देता ! खुद परोक्ष में रह, यश किसी और को दिलवा देता है ! चमत्कार होते हैं, पर इस तरह सरलता के साथ कि इंसान की क्षुद्र बुद्धि समझ ही नहीं पाती ! प्रभु चाहते हैं कि इंसान स्वाबलंबी बने, कर्म करे, उनके सहारे ना बैठा रहे ! इसीलिए वह ख्याल तो रखते हैं ! सहायता भी करते हैं ! पर किसी को एहसास नहीं होने देते ! होता क्या है कि मुसीबत में आदमी हाथ-पैर मारता ही है ! तरह-तरह के उपाय करता है ! इधर दौड़, उधर दौड़, यह आजमा, वह आजमा ! फिर जब ठीक हो जाता है तो अहसान भी उसी माध्यम का मानता है जो अंत में सहायक हुआ था ! तब तक वह भूल जाता है कि उसने परम पिता से भी सहायता मांगी थी और वह तो किसी को भी निराश नहीं करता ! यह भी भूल जाता है कि वह खुद भी उसी ईश्वर की रचना है उसकी बनाई प्रकृति, व्यवस्था का ही एक हिस्सा है, अपनी रचना की वह कभी उपेक्षा नहीं करता ! 

कभी-कभी मेरा अपने अतीत पर ध्यान जाता है तो ऐसे पचीसों हादसे याद आते हैं जब कुछ भी हो सकता था पर बचाव हुआ ! चाहे तालाब या कुएं में डूबने से बचा लिया गया होऊँ ! या सुनसान सड़क पर से तीन-चार साल की उम्र में भटक जाने पर कोई "अवतरित" हो सुरक्षित ले आया हो ! आग से बचाव, बिजली से बचाव, नौकरी के दौरान मशीनों से बचाव, ट्रेन से बचाव, सुनसान सड़क पर शहर से दूर निरुपाय हालत में किसी भी हादसे से बचाव ! खेल की चोट से बचाव, बिमारी से बचाव......! जितना याद आता जाता है, घटनाएं उतनी ही बढ़ती चली जाती हैं !    

वह सिर्फ धन्यवाद लेता है ! यश किसी और को दिलवा देता है ! मैं आस्तिक जरूर हूँ ! आस्था भी है ! पर अंध विश्वास नहीं है ! नियमित पूजा-पाठ या मंदिर गमन भी नहीं हो पाता ! 15-20 मिनट ध्यान लगाने की कोशिश करता भी हूँ तो अपने सुविधानुसार ! जब कुछ विपरीत, निराशाजनक या तनाव दायक होता है, लगता है कि अन्याय हो रहा है, अति होती है तो शिकायत भी उसी से करता हूँ ! मुझे लगता है कि वह मुझे सुन रहा है ! लगता है कि उसे जब भी फुर्सत होगी मुझ अकिंचन की तरफ भी जरूर ध्यान देगा ! फिर इंसान उसे नहीं पुकारेगा तो और किसके पास जाएगा अपना दुखड़ा ले कर ! 

अभी क्या हुआ कि वर्षों से चली आ रही मेरे बंद नाक की समस्या अचानक दूर हो गई ! मुझे लगता है कि किलो से भी ज्यादा होम्योपैथी की गोलियां, उस पैथी की और दवाओं के साथ निगल चुका होऊंगा ! महीनों आयुर्वेद की औषधियों का भी सेवन किया ! एक्यूप्रेशर सिर्फ दिलो-दिमाग पर प्रेशर डाल कर रह गया !एलोपैथी वाले सिर्फ ऑपरेशन ही एकमात्र इलाज बतलाते थे, दोबारा फिर व्याधि के उभर आने के खतरे के साथ ! सो चल रहा था जैसे-तैसे, मुंह से सांस लेते, दसियों अड़चनों के साथ ! 

ऐसे में पिछले दिनों कुछ खांसी-कफ की शिकायत हुई ! पांच-सात दिन तो, अपने-आप ठीक हो जाएगी, की आश्वस्तता के साथ निकल जाने के बावजूद प्रकोप कम ना हुआ तो आजकल के दिन-काल की गंभीरता को देख डॉक्टर की शरण में जाना पड़ा ! खांसी के साथ ही उनसे लगे हाथ नाक के पॉलिप का जिक्र भी कर दिया ! उन्होंने दस दिन की दवा दी और बोले, चिंता ना करें ठीक हो जाएगा ! मैंने पूछा भी कि क्या ऑपरेशन जरुरी है ? तो बोले ऐसा कुछ जरुरी नहीं है, दवा से ही राहत मिल जाएगी ! और फिर चमत्कार ही हो गया, खांसी तो तीन दिन में ही ठीक हो गई और वर्षों-वर्ष से चौबीसों घंटे बुरी तरह ''चोक'' रहने वाले नाक के द्वार भी खुल गए ! कितने सालों बाद मिली इस राहत की ख़ुशी को ब्यान करना मेरे लिए मुश्किल लग रहा है !

जिस एलोपैथी के तीन-तीन डाक्टरों ने सिर्फ ऑपरेशन को ही अंतिम उपाय बताया था ! उसी की दवाओं से बिना शरीर पर चाक़ू चले रोग ठीक हो गया ! यह कैसे संभव हुआ.....! याद आता है कि तकलीफ बहुत बढ़ने पर कई बार गुहार की थी, ''क्या प्रभु ! यह जरा सा रोग नहीं दूर हो पा रहा !'' ऐसे ही पता नहीं, पिछले दिनों कब और कैसे रात सोते वक्त नाक पर हाथ रख, मन ही मन ''नासै रोग हरे सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा'' का तीन बार जप करना शुरू हो गया था ! मेरा डॉक्टर और दवाइयों से यथाशक्ति परहेज ही रहता आया है ! तो क्या खांसी इसलिए शुरू हुई कि उसके बहाने मुझे अस्पताल जाना पड़े ! क्योंकि इसके पहले कभी भी इतने लंबे समय तक इसका प्रकोप नहीं हुआ था ! वहां जाने पर खांसी के चलते नाक की दवा भी मिली और वर्षों से चली आ  रही ''एक्यूट'' तकलीफ से छुटकारा मिला ! अब यह क्या था........! 

अपने हर दुःख, दर्द, तकलीफ की अति में हमें एक ही सहारा नजर आता है, भगवान ! अपने साथ कुछ गलत होते ही हम अनायास ही उसको याद करने लगते हैं ! कष्टों से मुक्ति, मुसीबतों से छुटकारा, कठिन परिस्थितियों से निजात दिलाने के लिए गुहार लगाते हैं ! हमें आशा रहती है, किसी चमत्कार की कि इधर हम बोले, उधर उसने मदद भेजी ! गोया कि वह बेल्ला बैठा, हमारी पुकार का इंतजार ही कर रहा हो ! उस पर यदि कुछ समय यूँ ही गुजर जाता है और अपनी स्थिति में कुछ सुधार होता नहीं दिखता तो लग जाते हैं, उसी को भला-बुरा कहने ! कई तो उसके अस्तित्व को ही नकारने लगते हैं ! जबकि बचपन से ही यह सुनते आए हैं कि उसके दरबार में देर भले ही हो सकती है, लेकिन अंधेर कभी नहीं ! पर बुरे समय में हमारी बुद्धि भी घास चरने चली जाती है ! विश्वास डगमगाने लग जाता है ! पर वह किसी को भी, कभी भी मंझधार में नहीं छोड़ता !  

गुरुवार, 24 फ़रवरी 2022

कहां पगड़ी और कहां हिजाब

अक्ल के अंधे और गाँठ के पूरे, अपने को देश वासियों से अलग और ऊपर मानने वाले कुछ फिल्मी लोग भी अपनी समझदानी की डिबिया खोल ज्ञान बघारने लगे ! तुलना करने वालों को मुंह खोलते शर्म भी नहीं आई ! कहां पगड़ी और कहां हिजाब ! यह पगड़ी यानी दस्तार सिर्फ कपडे का टुकड़ा नहीं है ! सिक्ख धर्म का अनिवार्य हिस्सा है यह उस बहादुर कौम के शरीर का ही एक अंग है ! यह सबसे बड़ी पहचान है, सिक्खों की, जिसे वर्षों तक अत्याचारों, अन्यायों, शोषणों व ज्यादितियों के विरुद्ध असंख्य कुर्बानियों, शहादतों व त्यागों के बाद हासिल किया गया है ! गुरु आज्ञा से धारण किया जाने वाला दस्तार सिखों की मान-मर्यादा-सम्मान और गौरव का प्रतीक है.............. ! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

देश के टुकड़े हो गए ! अंग्रेज स्थूल रूप से चले गए, पर जिन्होंने राज हथियाया, उन पर उनका प्रतीयमान सदा हावी रहा ! ''फूट डालो और राज करो'' को गुरु मंत्र की तरह अंगीकार कर लिया गया ! राज करने वालों की सिर्फ चमड़ी का रंग बदला, कार्य प्रणाली वही रही ! आजादी पाने की ख़ुशी में सब कुछ भूले अवाम को इस कदर अपने आभा मंडल से सम्मोहित कर दिया गया कि उसे "हर तरफ तू ही तू" नजर आने लगा ! धीरे-धीरे धर्म-जाति-भाषा रूपी अफीम चटाई जाने लगी ! लिहाजा वो अवाम जो कभी देश के लिए एक आवाज पर एकजुट हो कंधे से कंधा मिला खड़ा हो जाता था, अब बड़े से बड़े घटनाक्रम पर भी आँख मीचे अपने खोल में दुबका रहने लगा है ! सत्ता-पिपासु जो चाहते थे, वही हुआ ! 

अब चुनाव लियाकत की बजाय भीड़ की बदौलत जीते जाने लगे हैं ! उस भीड़ को बरगलाने के लिए तरह-तरह की शोशेबाजियों का सहारा लिया जाने लगा है ! कोई भी चुनाव आते ही तरह-तरह जुमले उछलने लगते हैं ! साधारण सी स्थानीय बात को कुछ लोगों की अज्ञानता का लाभ उठा, उनकी भावनाओं को भड़का, पैसे के बल पर राष्ट्रीय मुद्दा बना देश में अराजकता फैलाने का कुत्सित प्रयास शुरू हो जाता है ! हाल के पांच राज्यों के चुनाव में यह खेल फिर नजर आया है ! इस बार हिजाब का सहारा ले लोगों को भड़काने का कुचक्र रचा गया है ! मूर्खता की अति तो तब हो गई, जब इसकी तुलना सिक्खों की पगड़ी से कर दी गई ! जबकि दोनों कि कोई तुलना हो ही नहीं सकती ! क्योंकि एक है जो देश-दुनिया में शान से अपनी पहचान उजागर करवाती है तो दूसरी ओर वह है जो पहचान को छुपाने का काम करता है !

तुलना करने वाली इस जमात में तथाकथित बुद्धिजीवी, सदा से देश के खिलाफ रहे साम्यवादी, मौकापरस्त राजनीतिज्ञ, पैसे के गुलाम न्याय-भक्षक या देश विरोधी ताकतें तो शामिल थी हीं, साथ ही अक्ल के अंधे और गाँठ के पूरे, अपने को देश वासियों से अलग और ऊपर मानने वाले कुछ फिल्मी लोग भी अपनी समझदानी की डिबिया खोल ज्ञान बघारने लगे ! तुलना करने वालों को मुंह खोलते शर्म भी नहीं आई ! कहां पगड़ी और कहां हिजाब ! यह पगड़ी यानी दस्तार सिर्फ कपडे का टुकड़ा नहीं है ! सिक्ख धर्म का अनिवार्य हिस्सा है !  यह सबसे बड़ी पहचान है सिक्खों की, जिसे वर्षों तक अत्याचारों, अन्यायों, शोषणों व ज्यादितियों के खिलाफ असंख्य कुर्बानियों, शहादतों व त्यागों के बाद हासिल किया गया है ! यह उस बहादुर कौम के शरीर का ही एक अंग है ! गुरु आज्ञा से धारण किया जाने वाला दस्तार सिखों की मान-मर्यादा-सम्मान और गौरव का प्रतीक है !

दूसरी तरफ हिजाब महिलाओं द्वारा लोगों से बात करते समय ओट के लिए काम आने वाला एक पर्दा है ! ठीक है, कई तरह के लोगों से महिलाओं का वास्ता पड़ता है, इससे अवांछित लोगों से आड़ बनी रहती है ! इससे आज तक किसी को कोई परेशानी भी नहीं थी ! पर अब इसी की आड़ में असमाजिक तत्वों द्वारा अपनी पहचान छुपा देश-समाज में अराजकता फैलाने की कोशिश हो रही है ! इसीलिए यह अब विवाद का विषय बन गया है ! वैसे इसे किसी के निजी जीवन से हटाने की किसी की मंशा नहीं है पर विद्यालय-महाविद्यालय जैसी जगहों में जहां अनुशासन प्राथमिकता है वहां के लिए जिद करना बेमानी है ! यदि इसके पक्ष में खुद के परिधान पहनने की मौलिक अधिकार की दुहाई दी जा रही है, तो "एमयू" के द्वारा जारी ड्रेस-कोड को क्या कहा जाएगा, जिसमें वहां की छात्राओं को सिर्फ सलवार-कमीज और दुपट्टा ही पहनना अनिवार्य है ! इसे क्या कहेंगे ! वहां क्यों नहीं विरोध होता ? दोहरी मानसिकता तो कबूल नहीं की जा सकती !

जिनका है वे तो हिजाब के पक्ष में खड़े होंगे ही, शुरू से ही उन्हें इसकी आदत है ! पर सिर्फ अपने मतलब के लिए इस विवाद को हवा दे, उनका साथ देने वाले विघ्नसंतोषी, मौकापरस्त ! क्या उन्हें अपना इतिहास नहीं मालुम ? क्या उन्हें सिक्ख धर्म की स्थापना क्यों और कैसे हुई, इसका ज्ञान नहीं ? क्या भूल गए ये लोग गुरुओं की परपरा को, उनकी वाणी को, उनके त्याग को, उनकी कुर्बानियों को ? क्या इन कुटिलों को पगड़ी की महत्ता का एहसास नहीं है ? क्या उन्हें नहीं मालुम की एक सिक्ख जान दे सकता है पर अपनी पगड़ी अपने दस्तार पर आंच नहीं आने दे सकता ! एक बार मुंह खोलते समय तनिक भी हिचकिचाहट नहीं हुई इन लोगों को तुलना करते हुए कि मैं क्या बोलने जा रहा हूँ ! क्रोध नहीं, घिन्न आती है ऐसे लोगों पर !

सही बात तो यह है कि अब आम देशवासी भी सब देखने समझने लग गया है ! उसे पहले की तरह भरमा या बेवकूफ बना कर नहीं रखा जा सकता ! इस खेल को भी सब समझ रहे हैं कि कौन-कैसे अपनी ओछी मानसिकता और लिप्सा के कारण क्यों और क्या कर रहा है ! किसको देश-समाज-सर्वहारा की चिंता है और किसे सिर्फ और सिर्फ अपनी ! आशा है हाशिए पर सरका दिए जाने के बावजूद अपने गुमान के नशे में खोए लोग जल्द असलियत की धरती पर उतर उसकी कठोरता का आभास पा सकेंगे !

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2022

एक दल अर्श से फर्श के भी नीचे

पंजाबी कौम बहुत ही मेहनती है ! किसी भी काम को करने में गुरेज नहीं करती ! अपने इसी गुण के कारण देश-विदेश सभी जगह सफल, सम्माननीय व प्रतिष्ठित है ! इनकी मेहनत ने ही पंजाब को दशकों तक अन्न प्रदान करने वाले राज्यों में प्रमुख बनाए रखा था ! पर इसके साथ ही यह भी सत्य है कि यूपी-बिहार के सहायकों के अनवरत बहे पसीने और मिटटी के संयोग से ही यह संभव हो पाया था ! अब यदि उन्हीं को इस राज्य से दूर रखने की बात हो और वे यदि यहां ना आएं तो खेती करना दुर्भर हो जाएगा ! यह बात पंजाब का हर छोटा-बड़ा जमींदार जानता और मानता है ! क्या वोट देने के पहले वे कुछ सोचेंगे या नहीं........!!   

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आज कल देश की सबसे पुरानी पार्टी की कार्य शैली को देख पक्ष-विपक्ष-अवाम सभी अचंभित हैं ! क्या कोई इतना बुद्धिहीन, लापरवाह या अहमी हो सकता है कि उसको देश-काल-परिस्थिति किसी का कुछ भी भान  ना हो ! आत्मविश्वास जितना अच्छा गुण है, अति आत्मविश्वास उतना ही खतरनाक ! लगता ही नहीं कि इस दल के सर्वेसर्वा कहीं से भी गंभीर हैं, लगता है जैसे किसी नौटंकी का मंचन देख या कर रहे हैं ! इनकी कथनी-करनी देख कतार में सबसे पीछे खड़े इंसान को भी लगने लगा है कि जो अपनी पार्टी ही नहीं संभाल पा रहे, उनके हाथ में देश की बागडोर सौंपने की बात सोची भी कैसे जा सकती है !   

एक-एक कर जो थोड़े बहुत समझदार थे वे किनारा करते जा रहे हैं ! सच्चे हिमायती भी कुछ ना कर पाने की हालत में निराश हो दामन छोड़ रहे हैं ! चारण, चरणचुंबी, मौकापरस्त, मतलबी लोग, जिनका कहीं कोई आधार नहीं है, जिन्हें घर छोड़ बाहर शायद ही कोई पहचानता हो, जैसे ही बचे रह गए हैं ! पर दल की कमान संभालने वाली त्रयी अभी भी हवा में उड़ रही है ! अवाम को अपनी रियाया समझ वैसा ही व्यवहार किया जा रहा है !

अब रही पंजाब की बात ! पंजाबी कौम बहुत ही मेहनती है ! किसी भी काम को करने में गुरेज नहीं करती ! अपने इसी गुण के कारण देश-विदेश सभी जगह सफल, सम्माननीय व प्रतिष्ठित है ! इनकी मेहनत ने ही पंजाब को दशकों तक अन्न प्रदान करने वाले राज्यों में प्रमुख बनाए रखा था ! पर इसके साथ ही यह भी सत्य है कि यूपी-बिहार के सहायकों के अनवरत बहे पसीने और मिटटी के संयोग से ही यह संभव हो पाया था !  अब यदि उन्हीं को इस राज्य से दूर रखने की बात हो और वे यदि यहां ना आएं तो खेती करना दुर्भर हो जाएगा ! यह बात पंजाब का हर छोटा-बड़ा जमींदार जानता और मानता है ! पर एक-दो दिन पहले एक चुनाव रैली के दौरान पानी के बुलबुले रूपी कारिंदे ने यूपी-बिहार के लोगों के विरोध में भाषण दे डाला और मलकिन खड़ी मुस्कुराती रही ! क्या पंजाब के किसान वोट देने के पहले कुछ सोचेंगे नहीं !

जब देश ने धीरे से भाई के हाथ से कमान ले बहन को आगे आते देखा तो लगा कि शायद अब कुछ समझदारी भरी बातें होंगी ! पर ये तो उस पर भी सवा सेर पड़ीं ! अब तो पंजाब के लोगों को सोचना ही होगा कि जो अपने हारने पर आग लगने की बात करते हैं ! जन्मजात बैरी पडोसी के यहां जा खुद को सत्ता में लाने की सहायता की गुजारिश करते हैं ! वहां के हुक्मरानों की चापलूसी कर गलबहियां डालते हैं ! बच्चियों के बिकनी पहनने पर आजादी की अभिव्यक्ति समझते हैं या देश के दूसरे हिस्सों से काम-काज की खोज में आने वालों पर रोक लगाने की बात करते हैं, वे क्या इस राज्य और यहां के वाशिंदो के हितैषी हो सकते है ?

उनकी अदूरदर्शिता, अज्ञानता, आत्ममोह, सत्ता लोलुपता, बेलगाम जुबान, अहम और चारणों की फौज राज्य क्या देश की अस्मिता के लिए भी खतरा बनते जा रहे हैं ! उनको तो यह भी समझ-नज़र नहीं आ रहा कि उनकी नादानियों, बेवकूफियों की वजह से दूसरे "दीमकी छुटपट'' दल इनकी जगह लेने को आतुर हो लार टपका रहे हैं ! पर शायद अब समय नहीं बचा है कि कुछ भी किया जा सके, संभला जा सके.........!   

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किले का दरवाजा अंदर से ही खुलता है

वैसे तो सच की फितरत है कि वह सामने आता जरूर है ! चाहे जैसे भी हो ! इसके लिए उसकी सहायता करते हैं कुछ ऐसे लोग जो इतिहास की असलियत जग-जाहिर कर...