pub-3648900737756323 कुछ अलग सा: चोरी
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सोमवार, 23 अक्टूबर 2023

रेल वाली चादर

सदा  वाचाल रहने वाली श्रीमती शर्मा चुपचाप बैठीं सारी बातें निर्विकार रूप से सुन रही थीं ! शर्मा जी सोच में डूब गए थे ! कैसे हैं लोग ! रेल की कमियां गिना-गिना कर ना थकने वाले, ऐसी गिरी हुई हरकत करते समय कभी खुद का आंकलन क्यों नहीं करते ! कभी अपने आप पर ग्लानि नहीं होती ! कभी उनके  दिमाग में यह बात क्यों नहीं आती  कि किसी सिमित तनख्वाह पाने वाले गरीब पर उनके इन कारनामों का क्या असर पड़ेगा ! क्या कभी घर आए किसी मेहमान के सामने ऐसा सामान सामने आ जाने से उन्हें शर्म नहीं आएगी ?............पर दूसरे ही दिन शर्मा जी झटका खा गए ..........😦

#हिन्दी_ब्लागिंग 

"अरे भाई सुनना...!" पास से गुजरते हुए कोच सहायक को शर्मा जी ने टोका !

"जी ! बोलिए....!

"क्या नाम है आपका ?

"राजेंद्र....!   

"अरे भाई राजेंद्र, देखो यह बेड शीट कुछ ठीक नहीं है, सीलि सी है .......!

"कोई बात नहीं, अभी बदल देता हूँ !

दिल्ली-मुंबई राजधानी का 3rd AC कोच ! शर्मा जी सपत्नीक, एक समारोह में उपस्थिति दर्ज करवा वापस मुंबई अपने घर लौट रहे थे ! गाड़ी को दिल्ली से रवाना हुए 15-20 मिनट हो चुके थे ! कोच सहायक द्वारा पानी, बेडिंग जैसी जरुरत की चीजें उपलब्ध करवाई जा रही थीं ! तभी यह वार्तालाप हुआ !  

सुबह बोरिवली में कोच तकरीबन खाली हो चुका था ! राजेंद्र चादर-कंबल इत्यादि संभाल रहा था ! काम करते-करते पास आ गया था, तभी शर्मा जी ने पूछा "कभी हैंड टॉवल वगैरह कम तो नहीं पड़ जाते ?

एक क्षण को जैसे उसकी दुखती रग को छू दिया गया हो ! चेहरे पर बेबसी सी छा गयी ! फिर बेहद शांत स्वर में राजेंद्र का दुःख सामने आ गया ! बोला, "अब क्या बताएं साहब .... ! यह तो रोज का किस्सा हो गया है ! आप छोटे टॉवल की बात करते हैं, चादर की छोड़िए, यहां तो लोग कंबल तक उठा कर ले जाते हैं !

"कंबल ........?? शर्मा जी चौंके ! "इतनी बड़ी चीज कैसे.....? पता नहीं चलता किसी को ? यह तो सरासर चोरी है !

"अब आप खुद ही देख लीजिए ! सारे कोच में चादरें कंबल बिखरे पड़े हैं ! जाते वक्त कोई तहियाना तो दूर, समेट कर भी नहीं जाता ! अब ऐसे ढेर में कहां क्या कम है, कैसे पता चल सकता है ! फिर भी कभी अंदाजा लग भी जाता है, पर किसी पर इल्जाम नहीं लगा सकते ! सारे यात्री हमारे लिए सम्माननीय होते हैं ! किसी का सामान तो खोल कर नहीं देख सकते ना ! उस पर यदि हमारा शक गलत हो जाए तो हमारी तो नौकरी ही चली जाएगी, सो चुपचाप जो भी होता है, दंड भरते रहते हैं ! 

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एक चुप्पी सी पसर गई थी डिब्बे में ! सिर्फ पटरियों की धीमी खटर-पटर की ध्वनि महसूस हो रही थी ! सदा वाचाल रहने वाली श्रीमती शर्मा चुपचाप बैठीं सारी बातें निर्विकार रूप से सुन रही थीं ! शर्मा जी सोच में डूब गए थे ! कैसे हैं लोग ! रेल की कमियां गिना-गिना कर ना थकने वाले, ऐसी गिरी हुई हरकत करते समय कभी खुद का आंकलन क्यों नहीं करते ! कभी अपने आप पर ग्लानि नहीं होती ! कभी उनके  दिमाग में यह बात क्यों नहीं आती कि किसी सिमित तनख्वाह पाने वाले गरीब पर उनके इन कारनामों का क्या असर पड़ेगा ! क्या कभी घर आए किसी मेहमान के सामने ऐसा सामान सामने आ जाने से उन्हें शर्म नहीं आएगी ? 

शर्मा जी को लगा कि हमारे जींस में ही, बिना छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, आम-खास का भेद किए मुफ्तखोरी पैबस्त हो चुकी है ! नहीं तो क्यों आदरणीयों की सेवानिवृति के बाद उनके घर से सरकारी सामान वापस लाना पड़ता है ! क्यों माननीयों लोगों के सरकारी निवास छोड़ने पर उनके घरों की टाइलें-टोंटियां नदारद हो जाती हैं ! क्यों सड़कों-पार्कों-चौराहों से सजावटी सामान गायब हो जाता है........! 

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शर्मा जी की सोच शायद थमती नहीं यदि गाड़ी के थमने के संकेत नहीं मिलने लगते ! स्टेशन आने वाला था ! शर्मा दंपति ने सामान समेटा, उतरने की तैयारी होने लगी !  

दूसरे दिन घर पर यात्रा के दौरान काम आए कपड़े धुल कर सूख रहे थे ! तभी शर्मा जी झटका खा गए ! उन्हीं कपड़ों में भारतीय रेल की एक चादर और दो हैंड टॉवल भी लटके हुए अपनी सीलन दूर करने में लगे हुए थे ! 

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2022

लाखों की फीस लगती है, चोरी की कला सीखने के लिए

यहां इंजीनियरिंग या एम.बी.ए. की तरह भारी-भरकम फीस लेकर बच्चों को चौर्य कला में पारंगत किया जाता है ! ये बच्चे वहां अपहरण या फुसला कर नहीं लाए जाते बल्कि बच्चों के माँ-बाप अपने बच्चों को खुद वहाँ दाखिला दिलवाते हैं, अच्छी-खासी, भारी-भरकम रकम अदा कर के ! यहां छोटी उम्र से ही बच्चों को अपराधों की ट्रेनिंग देनी शुरू कर दी जाती है। इनके भी बाकायदा कोर्स होते हैं ! शुरूआती तरकीबों के लिए दो से तीन लाख और पूरे कोर्स के लिए पांच लाख रुपये तक देने होते हैं ...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

भारतीय गौरवशाली संस्कृति में किसी समय चोरी करना भी एक कला मानी जाती थी। सेंधबाज ऐसी-ऐसी कलाकारी से अपने काम को अंजाम देते थे कि लोग दांतो तले उंगलियां दबा लेते थे। उनका अंदाज, उनके काम करने का तरीका, उनको एक विशेष पहचान प्रदान करवा देता था ! पहुंचे हुए चोरों को अपने ऊपर इतना विश्वास होता था कि वे  भी चोरी करने के बाद अपनी कोई न कोई निशानी छोड़ जाते थे, एक चुनौत्ती की तरह कि लो खोज लो मुझे यदि हो सके तो ! एक तरह से ये उनके "ट्रेड मार्क" भी हुआ करते थे। जाहिर है इतनी निपुणता पाने के लिए कहीं न कहीं से शुरूआती प्रशिक्षण तो लेना ही पड़ता होगा, शुरू में कोई तो उन्हें प्रशिक्षित करता ही होगा ! जिसकी पूर्णता फिर उन्हें अपने अनुभव से प्राप्त होती होगी ! यह सब बीते दिनों की बातें हैं ! वैसे भी चोरी तो चोरी ही होती है ! इसीलिए इसे दुष्कर्मों में गिना जाने लगा और यह दंडात्मक कार्यों में शुमार हो गया !   

परंतु राज व समाज द्वारा लाख जुर्माना, सजा, हिकारत, बदनामी, घृणा मिलने के बावजूद भी इसका खात्मा नहीं किया जा सका ! यह आदत इंसान में बरकरार ही रही। इसीलिए लगता है कि प्राचीन समय में इसे मिलने वाला प्रशिक्षण व संरक्षण दबे-ढके रूप से विद्यमान रहता चला आया है ! इसका प्रमाण तब मिला जब मध्य प्रदेश के कड़िया, हुलखेड़ी और गुलखेड़ी जैसे गांवों का नाम सामने आया ! ये वे गांव हैं जहां इंजीनियरिंग या एम.बी.ए. की तरह भारी भरकम फीस ले कर बच्चों को चौर्य कला में पारंगत किया जाता है ! ये बच्चे वहां अपहरण या फुसला कर नहीं लाए जाते बल्कि बच्चों के माँ-बाप अपने बच्चों को वहाँ दाखिला दिलवाते हैं, अच्छी-खासी, भारी-भरकम रकम अदा कर के ! यहां छोटी उम्र से ही बच्चों को अपराधों की ट्रेनिंग देनी शुरू कर दी जाती है। इनके भी बाकायदा कोर्स होते हैं ! शुरूआती तरकीबों के लिए दो से तीन लाख और पूरे कोर्स के लिए पांच लाख रुपये तक देने होते हैं ! इसमें मुख्य पाठ्यक्रम शादी-ब्याहों  से कीमती सामान पार करने में प्रशिक्षित करता है ! जिसमें आठ-दस साल के बच्चों को प्रमुखता दी जाती है, जिससे यदि पुलिस पकड़ भी ले नाबालीगता का सहारा ले उन्हें छुड़वाने में आसानी रहती है ! काम को अंजाम देने के लिए दो-तीन लोग बड़ा सा उपहार का पैकेट और चार-पांच बच्चों को एक बड़ी सी गाडी में ले कर किसी शादी या भव्य समारोह में पहुँचते हैं ! वहाँ वे उपस्थित लोगों से घुल-मिल जाते हैं और बच्चे आपस में खेलने के बहाने उसी जगह का चक्कर लगाते रहते हैं जहां कीमती सामान रखा होता है और मौका पाते ही सामान को गाड़ी में पहुंचा दिया जाता है ! पकड़े जाने पर उन्हें रोने-धोने, तेजी से भागने, भीड़ की पिटाई से बचने आदि में भी ट्रेंड किया जाता है ! इसके अलावा इन गिरोहों की अपने वकीलों की टीम भी होती है !

इन गांवों में अधिकाँश परिवार जरायम पेशे से जुड़े रह कर देश भर में सक्रिय हैं ! इन गांवों में प्रवेश करना भी आफत को दावत देने के समान है ! बच्चों के अलावा इनके गिरोह में महिलाओं का भी जमावड़ा रहता है जिन्हें आसानी से जमानत मिल जाती है ! वही बच्चे जो पैसा दे कर ''हुनर'' सीखते हैं, जब निपुण हो जाते हैं तो गिरोह के सरगना उनके माँ-बाप को उनके काम के एवज में लाखों का भुगतान करते हैं ! जैसे इंजीनियरिंग या एम बी ए की डिग्री हासिल करने पर प्लेसमेंट होता है !  

इन सब बातों का खुलासा तब हुआ जब हाल ही में राजस्थान में हुई 10 लाख की चोरी के बाद मामले की जांच-पड़ताल की गई ! जहां एक पूर्व सैनिक के दस लाख रुपए चुरा लिए गए ! लेकिन सीसीटीवी फुटेज से मिले सुराग के आधार पर आरोपियों की पहचान हो गई। इसके बाद इनकी गिरफ्तारी भी हो गई। विचित्र है मानव उसकी प्रकृति और हमारा देश................!! 

आभार - श्री एन. रघुरामन जी 

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