pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शनिवार, 10 फ़रवरी 2024

रामायण का सबसे तिरस्कृत पात्र, मंथरा

कैकेई का अपनी इस चचेरी बहन के साथ बहुत लगाव तथा प्रेम था ! दोनों बचपन की सहलियां भी थीं ! एक-दूसरे के बिना उनका समय नहीं बीतता था ! इसीलिए मंथरा की ऐसी हालत देख, उसके भविष्य को ले कर कैकेई भी चिंतित व दुखी रहा करती थी ! इसीलिए अपने विवाह के पश्चात उसको अपने साथ अयोध्या ले आई थी ! परंतु उसके रंग-रूप को देख अयोध्यावासी उसे कैकई की बहन नहीं बल्कि मुंहलगी दासी ही समझते थे.......!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

महाग्रंथ रामायण में मंथरा का विवरण एक ऐसी महिला का है, जिसने श्री राम को वनवास दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी ! इस संदर्भ में कई तरह की मान्यताएं प्रचलन में हैं ! कहीं उसका दुंदुभी नाम की गंधर्वी के रूप में उल्लेख है जो देवताओं की सहायक बन कैकई को उकसा कर श्री राम को वन भेजने का उपक्रम करती है, जिससे राक्षसों का नाश हो सके ! तो कहीं उसका भक्त प्रह्लाद के पुत्र विरोचन की पुत्री के रूप में उल्लेख है जो अपनी तथा राक्षस जाति की बदतर हालत का जिम्मेवार भगवान विष्णु को मान उनसे बदला लेने की ठान लेती है और त्रेता युग में पुनर्जन्म ले विष्णु जी के अवतार भगवान राम के जीवन को तहस-नहस कर अपनी प्रतिज्ञा पूरी करती है ! 

श्रीराम 
इसी संदर्भ में एक और कथा भी उल्लेखनीय है ! जिसके अनुसार कैकेई के पिता कैकेयराज अश्वपति का एक भाई था, जिसका नाम वृहदश्व था। उसकी एक बेहद खूबसूरत, विशाल नेत्रों वाली, बुद्धिमान, गुणवती बेटी थी, जिसका नाम रेखा था ! परंतु उसकी कुछ कमजोरियां भी थीं ! वह आत्ममुग्धता से बुरी तरह ग्रसित थी ! अपने आप से बेहद प्रेम करती थी ! अपने सौंदर्य पर उसे घमंड भी था ! उसकी चाहत थी कि उसका रूप-लावण्य कभी भी मलिन ना हो ! इसके लिए वह तरह-तरह उपचार व औषधियों का सेवन करती रहती थी ! इसी तरह के एक प्रयोग का उस पर विपरीत असर हो गया और उसके अंगों ने काम करना बंद कर दिया ! चिकित्सकों के अथक प्रयासों के बाद वह ठीक तो हो गई पर उसके शरीर की कांति जाती रही ! रूप-लावण्य तिरोहित हो गया ! चेहरा-मोहरा कुरूप हो कर रह गया तथा उसकी रीढ़ की हड्डी में स्थाई विकार आ गया, इसी कारण उसका नाम भी मंथरा पड़ गया ! इसी दोष के कारण उसका कभी विवाह भी नहीं हो सका ! इस सदमे से वह गहरे अवसाद में डूबती चली गई ! धीरे-धीरे नकारात्मकता उस पर बुरी तरह हावी हो गई ! बुद्धि-विवेक साथ छोड़ते चले गए ! 

रेखा/मंथरा 
कैकेई का अपनी इस चचेरी बहन के साथ बहुत लगाव तथा प्रेम था ! दोनों बचपन की सहलियां भी थीं ! एक-दूसरे के बिना उनका समय नहीं बीतता था ! इसीलिए मंथरा की ऐसी हालत देख, उसके भविष्य को ले कर कैकेई भी चिंतित व दुखी रहा करती थी ! इसीलिए अपने विवाह के पश्चात उसको अपने साथ अयोध्या ले आई थी ! परंतु उसके रंग-रूप को देख अयोध्यावासी उसे कैकई की बहन नहीं बल्कि मुंहलगी दासी ही समझते थे ! पर दशरथ की प्रिय रानी की सहचरी होने के कारण उसका सम्मान भी किया करते थे !  

षड्यंत्र 
समय के साथ जब मंथरा को श्री राम के राजतिलक के समाचार पता चला तो वह सोच में पड़ गई कि यदि महारानी कौशल्या का पुत्र राजा बनेगा तो कौशल्या राजमाता कहलाएगी और उनका स्थान अन्य रानियों से श्रेष्ठ हो जाएगा ! उनकी दासियां भी अपने आपको मुझसे श्रेष्ठ समझने लगेंगीं। इस समय कैकेयी राजा की सर्वाधिक प्रिय रानी है। राजमहल पर एक प्रकार से उसका शासन चलता है। इसीलिये राजप्रासाद की सब दासियां मेरा सम्मान करती हैं। किन्तु कौशल्या के राजमाता बनने पर वे मुझे हेय दृष्टि से देखने लगेंगीं। उनकी उस दृष्टि को मैं कैसे सहन कर सकूंगी ! मेरा जीवन तो और भी दूभर हो जाएगा ! इस विकृत सोच ने उसके कुटिल मष्तिष्क में एक षड्यंत्र की रुपरेखा तैयार कर दी ! 

दो वर 
अपनी साजिश को मूर्तरूप देने के चलते मंथरा ने कैकेई के कान भरे ! उसे कौशल्या के राजमाता बनने के पश्चात राजा दशरथ से दूर होने का डर दिखाया ! राम के राजा बनने के बाद उसके तथा भरत के अंधकारमय भविष्य का काल्पनिक भय दिखा उसे उकसाया ! इसके बाद जो हुआ उसे तो संसार ने भी देखा ! जो भी हो मंथरा के बिना तो राम कथा की कल्पना भी नहीं की जा सकती ! कहते हैं कि यह सब होने के पश्चात उसे अपने किए पर ग्लानि और पश्चाताप भी हुआ और वह राम के अयोध्या लौटने तक मुंह छुपा कर एकांत में पड़ी रही ! श्री राम ने वनवास से वापस आते ही उसके बारे में पूछा और उसके पास जा उसे स्नेहवश गले लगा उसके सारे अपराध क्षमा कर दिए !

नेत्र चिकित्सा का विश्वसनीय केंद्र 
वैसे हमारे प्राचीन ग्रंथों की कथाओं के साथ इतनी किंवदंतियां इस तरह जुड़ी हुई हैं कि भेद करना मुश्किल हो जाता है कि वास्तविकता क्या थी और कल्पना क्या है..........!

बुधवार, 31 जनवरी 2024

सर्दी पर भारी पड़ती, पाव भर की रजाई

पहाड़ी इलाकों में तो चार-चार किलो की या उससे भी भारी रजाईयां होना आम बात है। ज्यादा सर्दी या बर्फ पड़ने पर तो बजुर्गों या अशक्त लोगों को दो-दो रजाईयां भी लेनी पड़ती हैं। जिनके भार से बिस्तर पर हिलना ड़ुलना भी बेहाल हो जाता है। ऐसे में कोई पाव भर, भार वाली रजाई से ठंड दूर करने की बात करे तो आश्चर्य ही होगा ...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

इस बार सर्दी कुछ ज्यादा ही खिंच गई ! खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही ! सोशल मीडिया पर रजाई का आविष्कार करने वाले व्यक्ति को याद कर उसके प्रति आभार व्यक्त करने वालों की तादाद बढ़ती ही जा रही है ! यदि उसकी खोज और रजाई के इतिहास की बात करेंगे तो एक ग्रंथ ही बन जाएगा ! हाँ, योरोप में इसकी ईजाद तब हुई, जब वहां के लोगों ने तुर्कों को सुरक्षा और ठंड से बचाव हेतु अपने कवच के नीचे कपड़े की परतों को लपेटे देखा ! अपने देश में भी रजाई का उपयोग सैंकड़ों वर्षों से होता आया है ! पर आज बात करते हैं जयपुरी रजाई की जिसकी शुरुआत तकरीबन तीन सौ साल पहले हुई थी, राजस्थान के जयपुर शहर से ! 

सर्दी की दस्तक पड़ते ही  गर्म कपड़े, कंबल और रजाईयां भी आल्मारियों से बाहर आने को आतुर हो जाते हैं ! कड़ाके की ठंड में रजाई ही है जो इंसान का सर्दी से बचाव का जरिया बनती है ! रजाई का नाम सुनते ही रूई से भरे एक भारी-भरकम ओढ़ने के काम आने वाले लिहाफ का ख्याल आ जाता है, जो जाड़ों में ठंड रोकने का आम जरिया होता है। पहाड़ी इलाकों में तो चार-चार किलो की या उससे भी भारी रजाईयां होना आम बात है। ज्यादा सर्दी या बर्फ पड़ने पर तो बजुर्गों या अशक्त लोगों को दो-दो रजाईयां भी लेनी पड़ती हैं। जिनके भार से बिस्तर पर हिलना ड़ुलना भी बेहाल हो जाता है। ऐसे में कोई पाव भर, भार वाली रजाई से ठंड दूर करने की बात करे तो आश्चर्य ही होगा !  
वैसे भी कभी-कभी एक बात सोचने को मजबूर करती है कि पुराने समय में रानी-महारानियाँ और उनके परिवार के सदस्य ठंड से कैसे बचाव करते होंगे। ठीक है सर्दी दूर करने के और भी उपाय हैं या थे, पर सर्दी से बचाव के लिए ओढ़ने को कभी न कभी, कुछ-न कुछ तो चाहिये ही होता होगा। उस पर अवध के नवाबों की नजाकत और नफासत तो जमाने भर में मशहूर रही है। वे क्यूंकर इतना भार सहते होंगे ! 

तभी सामने आती हैं जयपुरी रजाइयां ! जो अपने हल्केपन और तेज ठंड में भी गर्माहट देने के लिए विश्वप्रसिद्ध हैं ! एक तरह से उनकी ईजाद राजा-महाराजाओं को मद्दे नजर रख कर ही की गई थी ! ये खास तरह की रजाईयां, खास तरीकों से, खास कारीगरों द्वारा सिर्फ खास लोगों के लिये बनाई जाती थीं।  जिनका वजन होता था, सिर्फ एक पाव या उससे भी कम ! जी हां, एक पाव की रजाई, पर कारगर इतनी कि ठंड छू भी ना जाए ! धीरे-धीरे इसके फनकारों को जयपुर में आश्रय मिला और आज राजस्थान की ये जयपुरी रजाईयां दुनिया भर में मशहूर हैं।

आपकी आँखें हमारे लिए अनमोल हैं 
कहते हैं कि राजा सवाई जयसिंह ने जयपुर को बसाने के बाद विभिन्न कला के शिल्पियों को भी यहां आश्रय प्रदान किया था। उन्हीं शिल्पियों में एक थे, इलाही बक्श। जिनके वंशजों ने राजघराने के सदस्यों के लिए रजाइयां बनाने का काम शुरू किया था। जयपुर की इन रजाईयों का इतिहास करीब 300 साल पुराना है। ऐसी रजाई पहली बार कादर बक्श नमक शिल्पी ने 1723 में बनाई थी। जिसके बाद जयपुर की इस रजाई की गर्माहट को देश-विदेश के अनेकों गणमान्य लोगों ने महसूस किया ! आज भी इनके वंशज जयपुर के हवामहल मार्ग पर स्थित हाट में अपना शिल्प कौशल लिए उपलब्ध हैं ! 
इन हल्की रजाईयों को पहले हाथों से बनाया जाता था। जिसमें बहुत ज्यादा मेहनत, समय और लागत आती थी। समय के साथ-साथ बदलाव भी आया। अब इसको बनाने में मशीनों की सहायता ली जाती है। सबसे पहले रुई को बहुत बारीकी से अच्छी तरह साफ किया जाता है। फिर एक खास अंदाज से उसकी धुनाई की जाती है, जिससे रूई का एक-एक रेशा अलग हो जाता है। इसके बाद उन रेशों को व्यवस्थित किया जाता है फिर उसको बराबर बिछा कर कपड़े में इस तरह भरा जाता है कि उसमें से हवा बिल्कुल भी ना गुजर सके। फिर उसकी सधे हुए हाथों से सिलाई कर दी जाती है। सारा कमाल रूई के रेशों को व्यवस्थित करने और कपड़े में भराई का है जो कुशल कारीगरों के ही बस की बात है। रूई जितनी कम होगी रजाई बनाने में उतनी ही मेहनत, समय और लागत बढ़ जाती है। क्योंकि रूई के रेशों को जमाने में उतना ही वक्त बढता चला जाता है। 
 
जयपुरी रजाई बनने के दौर में 
छपाई वाले सूती कपड़े की रजाई सबसे गर्म होती है क्योंकि मलमल के सूती कपड़े से रूई बिल्कुल चिपक जाती है। सिल्क वगैरह की रजाईयां देखने में सुंदर जरूर होती हैं पर उनमें उतनी गर्माहट नही होती। वैसे भी ये कपड़े थोड़े भारी होते हैं जिससे रजाई का भार बढ जाता है। तो अब जब भी राजस्थान जाना हो तो पाव भर की रजाई की खोज-खबर जरूर लिजिएगा। 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

बुधवार, 24 जनवरी 2024

समय चक्र पर लगती छाप

कुछ लोग अपने लोगों को दरकिनार कर कुछ लोगों को उनका हितैषी बता अपना पीढ़िया तार लिया ! कभी एक ठो कमरा में रहने वाले पूरे परिवार के कुकुर के लिए आज अलग कमरा है ! उन्हीं लोग के बलबूते कई लोग राजा बन बैईठे हैं ! जिनके पास बाइसिकिल भी नहीं था आज वो हव्वाइए जहाज में घूमता है ! और इधर ये लोग टुकुर-टुकुर ताकते हुए उन्हीं लोगों का पक्ष लिए जा रहा है ! ई मनई लोग समझता क्यूँ नहीं है कि जो लोग अपना सवारथ के लिए अपना लोगों का नहीं हुआ वो सब, इनका कैसे होगा ?''

#हिन्दी_ब्लागिंग 

भइया जी, नमस्ते !''    

अरे ! आओ बिनोद ! का हाल है ''

ठीक हूँ, आप की किरपा है''

चाय पीओगे ?''

पी लूंगा भइया जी !''

मैंने अंदर चाय का कहलवा, पूछा और बताओ कैसा चल रहा है ?''

हम तो ठिक्के हैं पर कभी-कभी माथा सटिकिया जाता है !''

मैं समझ गया फिर कोई गुलगपाड़ा इसको परेशान किए है। 
पूछा, का हुआ कुछ बताओगे ?''

नहीं, का है कि हम सोच रहे थे कि कुछ लोग एकदम्मे बुड़बक होता है का ? ऊ लोग को सुझाई नहीं देता है कि कोई तुम को बोका बनाए जा रहा है वर्षों से, अऊर तुम बने जा रहे हो !''

मैं समझ गया कि इसे फिर कीड़ा काटा है ! बोला नहीं, सिर्फ उसे देखता रहा ! वह कुछ ज्यादा ही गमगीन लग रहा था ! जैसे उसीको कोई धोखा दिए जा रहा हो !

भईया जी, आप भी तो देख रहे हो, कुछ लोग अपने लोगों को दरकिनार कर कुछ लोगों को उनका हितैषी बता अपना पीढ़िया तार लिया ! कभी एक ठो कमरा में रहने वाले पूरे परिवार के कुकुर के लिए आज अलग कमरा है ! उन्हीं लोग के बलबूते कई लोग राजा बन बैईठे हैं ! जिनके पास बाइसिकिल भी नहीं था आज वो हव्वाइए जहाज में घूमता है ! और इधर ये लोग टुकुर-टुकुर ताकते हुए उन्हीं लोगों का पक्ष लिए जा रहा है ! ई मनई लोग समझता क्यूँ नहीं है कि जो लोग अपना सवारथ के लिए अपना लोगों का नहीं हुआ वो सब, इनका कैसे होगा ?''

मैं भौच्चक बिनोद का मुंह देख रहा था ! पर जवाब तो देना था ही ! मैंने कहा, ऐसा नहीं है कि उनको समझ नहीं है ! उनमें भी समझदार, पढ़े-लिखे, अक्लमंद लोगों की कोई कमी नहीं है ! वे भी ऐसे लोगों की नस-नस पहचानते हैं ! वे भी जानते हैं कि उनका सिर्फ उपयोग हो रहा है ! पर पचासों साल के आश्वासन, वादे, दिलासे दिलो-दिमाग में गहरे पैठे हुए हैं ! वर्ष दर वर्ष की निराशा के बावजूद एक झिझक बनी हुई है ! एक अनदेखा, अनजाना डर समाया रहता है कि पता नहीं हमारे साथ क्या हो जाए ! पर अपने-पराए-गैरों सभी की असलियत से वाकिफ हो आज का युवा बैरियर तोड़ने को तैयार है ! अब वह थोथे जुमलों से नहीं बहलता ! वह सच्चाई देख रहा है कि देश-समाज में होने वाले बदलाव में उससे कोई भेद-भाव नहीं हो रहा ! यदि लियाकत है तो उसके लिए भी मौकों के दरवाजे खुले हैं ! वह भी समय के चक्र पर अपनी छाप छोड़ सकता है ! इस मानसिक बदलाव के असर का आभास होने भी लगा है, जल्द ही देश-समाज-दुनिया को दिखने भी लगेगा !
तुम चिंता छोड़ो, आने वाला समय निश्चित रूप से सभी के लिए मंगलमय होगा ! तुम चाय लो, मेथी के पकौड़े भी तुम्हारा ही इंतजार कर रहे हैं !    

बिनोद कुछ रिलैक्स लग रहा था...........!   

रविवार, 21 जनवरी 2024

गांव की हवा फुसफुसाती है

हालांकि दीवारों के भी कान होते हैं ! पर वे बोल नहीं सकतीं ! पर उन कानों से हो कर गुजरने वाली  हवाओं की फुसफुसाहट सब कुछ बयान कर देती हैं ! गांव के एक छोर से दूसरे छोर तक ने बिना कहे हरिया की जिम्मेवारी संभाल ली थी और इधर महानगर में, देश की राजधानी में, मेरे एक ही मकान के चार फ्लोरों की सीमित सी जगह में तीन परिवारों को पता नहीं है कि चौथी मंजिल पर मैं हफ्ते भर से बाहर नहीं निकला हूँ, बीमार हूँ ..........! 

#हिंदी_ब्लागिंग 

अंधेरा गहराने लगा था ! शाम का पल्लू थामे रात धीरे-धीरे अपने कदम बढ़ाते आ रही थी ! हरिया की तबियत पिछले कुछ दिनों से ठीक नहीं चल रही थी ! पर उठना तो था ही ! गांव-देहात में अभी भी संध्या समय बिस्तर पर पड़े रहना अच्छा नहीं समझा जाता ! वैसे भी घर में दीया-बाती भी तो करनी थी ! परबतिया को आज ही ना चाहते हुए भी हरिया को इस हालत में छोड़ जरुरी काम से मायके जाना पड़ गया था ! दो ही जनों का तो परिवार था !  

हरिया पूजास्थल पर दीपक जला कर मुड़ा ही था कि खिड़की से उसे दूर से तपन माली आता दिखाई पड़ा ! गांव में इस समय ऐसे दिनों में बाहर निकलना अजूबा ही होता है ! हरिया खिड़की पर खड़ा हो उसे तकने लगा ! तपन के कुछ और नजदीक आने पर दिखा कि वह कंधे पर कंबल और हाथों में एक थैला और लालटेन भी लिए है ! गांव में बिजली थी पर कब चली जाए ठिकाना नहीं था ! कहीं जा रहा होगा जरुरी काम से, यह सोच हरिया वापस अपनी खाट पर आ बैठा ! वैसे भी इन दोनों परिवारों का कोई खास मेल-जोल नहीं था !

हरिया का घर  गांव के पूर्वी छोर पर है और तपन का ठीक दूसरे पश्चिमी छोर पर ! गांव को मुख्य सड़क से तीन पगडंडिया जोड़ती हैं ! इसे सड़क तक जाना था तो बाजार के बीच से नजदीक पड़ता ! ठंड के दिनों में इस वक्त बिना काम कोई अपने घर से बाहर नहीं निकलता ! कंबल और लालटेन भी लिए है, कहीं दूर ही जा रहा होगा ! हरिया कमरे में आ तो गया था पर दिमाग उसका तपन में ही उलझा हुआ था !  इसी पेशोपेश में उसके घर के दरवाजे पर दस्तक हुई !

हरिया ने दरवाजा खोला ! सामने तपन खड़ा था ! उसने अभिवादन किया ! हरिया ने उसे अंदर आने को कहा ! हरिया के चेहरे की प्रश्नवाचक मुद्रा को देख तपन ने ही कहना शुरू किया ! काका, आपके लिए खाना लाया हूँ ! आपकी बहू कह रही थी कि पारबती काकी बाहर गईं हैं काका अकेले हैं उनकी तबियत भी ठीक नहीं है, सो रात को उनके पास ही रुक जाना ! सुबह ही उसने पता कर लिया था कि दोपहर का खाना और शाम की चाय रतनी बुआ पहुंचा गईं हैं ! इसीलिए मेरा अब आना हुआ ! हरिया अभिभूत था, उसने तपन और उसकी पत्नी को आशीर्वाद दिया और उसके आराम की व्यवस्था कर सोचने लगा प्रभु किसी को भी बेसहारा नहीं छोड़ते !

हालांकि दीवारों के भी कान होते हैं ! पर वे बोल नहीं सकतीं ! पर उन कानों से हो कर गुजरने वाली  हवाओं की फुसफुसाहट सब कुछ बयान कर देती हैं ! नहीं तो सुबह जाते समय पारबती ने किसी को कुछ बताया थोड़े ही था, पर उसे विश्वास था कि हरिया अकेला नहीं रहेगा ! वह भी तो ऐसे मौकों पर दूसरों के लिए सदा खड़ी रहती है ! सारा गांव एक परिवार ही तो है ! गांव के एक छोर से दूसरे छोर तक ने बिना कहे हरिया की जिम्मेवारी संभाल ली थी, बिना कोई एहसान जताए ! और इधर महानगर में, देश की राजधानी में, मेरे एक ही मकान के चार फ्लोरों की सीमित सी जगह में तीन परिवारों को पता नहीं है कि चौथी मंजिल पर मैं हफ्ते भर से बाहर नहीं निकला हूँ, बीमार हूँ ..........! 

शुक्रवार, 19 जनवरी 2024

वही हो रहा है जो राम जी चाह रहे हैं

जिसने सारी कायनात बनाई है ! समय-काल बनाया है ! धर्म-ज्ञान बनाया है ! जिसके चाहे बिना पत्ता तक नहीं हिल पाता ! सूर्य-शनि जैसे ग्रह जिसके इशारे पर संचरण करते हैं ! जिसका नाम ही भवसागर पार करवा सकता है ! जो खुद अमंगलहारी हैं ! जिनके पिता के नाम का स्मरण ही दुःख दूर करने के लिए पर्याप्त है ! तुम उसके लिए मुहूर्त और इमारत में खामियां दिखलवा कर भ्रमित करना चाहते हो लोगों को ? वह भी अपनी तुच्छ कामनाओं के लिए ? तुम हो क्या ? तुम्हारा वजूद क्या है ? औकात क्या है तुम्हारी ! तुम.... तुम मुहूर्त बनाओगे उसके लिए जो खुद मुहूर्त बनाता है ! जो इतना शुभ है कि शुभ उसके चरणों में अपना शीश झुकाता है 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

अयोध्या जाने से इंकार करने वालों की फोटो, उनके ब्यान मीडिया रोज ऐसे दिखा-बता रहा है जैसे कोई बहुत बड़ी घटना हो गई हो, यह बात तो देश की गलियों के कुत्ते-बिल्लियों को भी पता थी कि ये लोग मंदिर नहीं जाएंगे ! सारा देश जानता है कि ऐसे लोगों का ना कोई धर्म है, ना ईमान, ना नैतिकता है ना कोई विवेक ! इनका एक ही ध्येय है कुर्सी ! है तो बचाए रखो नहीं है तो उसको पाने के लिए देश तक की परवाह ना करो ! 

इनको अपने दंभ में पता ही नहीं चला कि यह कब एक इंसान से बैर के चक्कर में कैसे समाज, धर्म, देश और अब तो राम विरोधी भी बनते चले गए ! पर प्रभु की बेआवाज लाठी की चोट पर बिलबिलाते हुए आँख खुली तो एक एक तरफ तो खाई थी ही दूसरी तरफ और भी गहरी घाटी ! आसन्न संकट देख लगे चिल्लाने हम जाएंगे...हम जाएंगे..... ! पर 22 जनवरी के बाद ! क्यों भई ! तब क्या राम बदल जाएंगे ? स्थान बदल जाएगा ? मंदिर बदल जाएगा ? पूजा-अर्चना बदल जाएगी ? या जिन्होंने स्थापना करवाई उनके नाम बदल जाएंगे ?

एक और तरह के दादुर हैं जिन्होंने कुंठित मठाधीशों को भी बरगला दिया है ! वे मुहूर्त तथा मंदिर पर सवाल उठा रहे हैं ! कल एक चैनल पर एक ऐसे ही परपोषित मौलाना को भी लपेट लाए जिनका सनातन से कोई वास्ता नहीं है, वे भी मुहूर्त, आस्था, वास्तु पर अपना ज्ञान उगले जा रहे थे !

जिसने सारी कायनात बनाई है ! समय-काल बनाया है ! धर्म-ज्ञान बनाया है ! जिसके चाहे बिना पत्ता तक नहीं हिल पाता ! सूर्य-शनि जैसे ग्रह जिसके इशारे पर संचरण करते हैं ! जिसका नाम ही भवसागर पार करवा सकता है ! जो खुद अमंगलहारी हैं ! जिनके पिता के नाम का स्मरण ही दुःख दूर करने के लिए पर्याप्त है ! तुम उसके लिए मुहूर्त और इमारत में खामियां दिखलवा कर भ्रमित करना चाहते हो लोगों को ? वह भी अपनी तुच्छ कामनाओं के लिए ? तुम हो क्या ? तुम्हारा वजूद क्या है ? औकात क्या है तुम्हारी ! तुम.... तुम मुहूर्त बनाओगे उसके लिए जो खुद मुहूर्त बनाता है ! जो इतना शुभ है कि शुभ उसके चरणों में अपना शीश झुकाता है ! तुमने या तुम्हारे खानदान में भी किसी ने गीता पढ़ी है, जिसमें उसने ने खुद कहा है कि मैं इस सम्पूर्ण जगत का धारण-पोषण करने वाला हूं। पिता, माता, पितामह मैं ही हूं। देवताओं का गुरू भी मैं ही हूं। सबका स्वामी भी मैं ही हूं और तुम चले हो उसके लिए शुभ मुहूर्त की गणना करने .....! 

अविवेक, अहम्, घमंड, सत्तामद जब सर पर सवार होते हैं, तो मनुष्य अधमावस्था को प्राप्त हो जाता है ! मदांधता में  पतन अवश्यंभावी है चाहे वह कोई सम्राट हो, ऋषि हो, ज्ञानी हो, रावण हो या फिर शंकराचार्य ही क्यों ना हो ! आदि शंकराचार्य जी को यह कल्पना जरूर रही होगी कि भविष्य में मेरी धरोहर अयोग्य हाथों में भी जा सकती है पर उस वक्त पीठों का निर्माण भी अति आवश्यक था ! 

आज कल के विवाद में पामर लोगों द्वारा जिन प्रतिष्ठित नामों को भी घसीट लिया गया है उन आदरणीयों को भी तो एक बार जांच लेनी चाहिए थी कि हमारे नाम का कौन, कैसा, किस नियति से प्रयोग कर रहा है ? धर्म के बारे में उनका इतिहास क्या रहा है ? इतिहास ना खंगाल पाते तो सिर्फ तीन -चार महीनों का ही लेखा-जोखा देख लेते ! वर्षों की कमाई इज्जत, नाम, मर्यादा, प्रतिष्ठा दो दिनों में भू-लुंठित हो गई ! आज तो आम जनता यही समझ रही है कि पांच सौ सालों से भी ज्यादा समय तक महाराज ने प्रभु की सुध नहीं ली ! ठंड-गर्मी-आंधी-तूफान में एक टेंट में पड़े राम का ख्याल ना आया ! जबकि उसी राम की बदौलत खुद सोने के सिंहासनों पर विराजमान हो दुनिया भर की सुविधाओं का लाभ लेते रहे ! आज उन्हें निमत्रंण पर मान-अपमान नजर आ रहा है ! दुनिया को ज्ञान बांटने वाले खुद कैसे ऐसे अज्ञानी हो गए ! जब सारा देश राममय हुआ पड़ा है ! जड़-चेतन कोई भी विरोध का कोई स्वर सुनना नहीं चाहता तब ऐसा रवैया......! सब प्रभु की इच्छा है, वे यही चाहते होंगें !

जय श्री राम, जय-जय राम 

शनिवार, 30 दिसंबर 2023

निमंत्रण

अपने रसूख के कारण जिन्होंने एक बार हमारे पुश्तैनी मकान को राजमार्ग का हिस्सा बता गिरवाने की साजिश तक कर दी थी, वो हमारे रिश्ते के ताऊ जी, जिन्होंने बाकायदा ऐलान कर दिया था कि इनके परिवार में संतान की कल्पना भी नहीं की जा सकती, आज उनके मुंह में दही जम गया है ...........! 

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मेरे बेटे का पहला जन्मदिन आने वाला है ! परिवार के सभी सदस्यों, सगे-संबंधियों में अपार उत्साह है ! हर तरह के रीति-रिवाज पूरे विधि-विधान से संपन्न किए जा रहे हैं ! हों भी क्यों ना! वर्षों के बाद ऐसी ख़ुशी प्रभु ने हमें बक्शी है ! हमारे समाजसेवी परिवार की समाज में प्रतिष्ठा है ! लोगों से काफी मेल-जोल है ! इसीलिए शिशु के अन्नप्राशन पर किस-किस को निमंत्रण देना है, इस बात पर जब चर्चा शुरू हुई तो माँ का कहना था कि वर्षों बाद ऐसा शुभ अवसर आया है, सभी जान-पहचान वालों और रिश्तेदारों को न्योता भेजना चाहिए ! हमारे बाबूजी कुछ असमंजस में हैं ! उनको अतीत की घटनाएं और उनसे उपजी वैमनस्यता के कारण लग रहा है कि कुछ लोग नहीं आएंगे ! 

काफी सालों से हमारी बिरादरी में कुछ लोगों के बीच आपसी अनबन चल रही है ! रिश्तेदारी होते हुए भी एक दूसरे की उन्नति देख लोगों को जलन होने लगती है ! जरा-जरा सी बात पर कोर्ट-कचहरी की नौबत आ जाती है !  

मेरी शादी के बाद काफी दिनों तक घर में बच्चे की किलकारी नहीं गूंजने को लेकर तरह-तरह की अफवाहें फैलाई गईं ! पहले तो हमारे कहीं संबंध ही ना हों इसके षड्यंत्र रचे गए, जो बुरी तरह असफल रहे ! फिर हमारे परिवार को लेकर झूठी कहानियां गढ़ी गईं, अफवाहें फैलाई गईं, जिन्हें समझदार लोगों ने सिरे से नकार दिया ! एक लंबे अरसे के बाद पंच परमेश्वर की तरफ से भी हमें न्याय मिला, झूठे मामले-मुकदमें खारिज हो गए और प्रभु की दया से हमारा घर-परिवार खुशहाल होता चला गया ! 

कुछ समय पश्चात ईश्वर का एक अंश हमारे यहां भी अवतरित हुआ ! बस, फिर क्या था ! इस खबर से हमारे बैरी रिश्तेदारों को तो जैसे सांप सूंघ गया ! हमारी निपूती बुआ तो उसके बारे में सुनते ही पागलों की तरह बिदकने लगी ! अंटसंट कहना उनकी आदत में शुमार हो गया ! बच्चे का कोई जिक्र भी कर दे तो काटने को तैयार ! अपने रसूख के कारण जिन्होंने एक बार हमारे पुश्तैनी मकान को राजमार्ग का हिस्सा बता गिरवाने की साजिश कर दी थी, वो हमारे रिश्ते के ताऊ जी, जिन्होंने बाकायदा ऐलान कर दिया था कि इनके परिवार में संतान की कल्पना भी नहीं की जा सकती, वे आज मुंह में दही जमाए बैठे हैं ! कई और ऐसे हैं, जो रिश्तेदार हमारे हैं पर अपने दोस्तों, जिनसे हमारी नहीं पटती पर उनकी रोजी-रोटी का जरिया हैं, उनको खुश करने की खातिर असमंजस में हैं कि बबुआ के यहां जाएं कि नहीं ! कुछ इस ताक में हैं कि देखें बुलाते भी हैं कि नहीं ! एक हमारा नजदीकी परिवार, बाप कह रहा है कि नहीं जाना है, बेटा कह रहा है मैं तो जाऊंगा ! दो-एक इस परिस्थिति से बचने के लिए काम का बहाना कर शहर ही छोड़ गए ! कुछ अपनी करनियों को याद कर पेशोपेश में हैं कि अब किस मुंह को ले कर जाएं, उन्हें वे तमाम बातें याद आ रही हैं जो हमारे परेशानी भरे दिनों में उन्होंने उगल दी थीं ! तो कुल मिला कर एक बड़ी ही पेचीदा परिस्थिति आन पड़ी है, हमारी बिरादरी के सामने !

पर जो भी हो हम, हमारा परिवार, हमारे हितैषी, हमारे शुभचिंतक परमानंद में हैं ! उधर हमारी माँ घोर आशावादी और क्षमाशील हैं ! उन्होंने कह दिया है, ऐसे शुभ अवसर का निमंत्रण तो सबको जाएगा, जिसे आना हो आएगा, जिसे नहीं आना उसकी इच्छा ! हम अपनी तरफ से कोई शिकायत का मौका नहीं देंगे ! बाकि भगवान सबको सद्बुद्धि दे !  

सोमवार, 25 दिसंबर 2023

शनि महाराज, सवालों के घेरे में

सवाल शनि देव पर भी उठता कि क्यों महाराज, आप तो खुद को न्याय का देवता कहलवाते हो ! फिर क्यों इतनी देर लग जाती है दोषियों को दंड मिलने में ? क्यों भ्रष्टाचारियों के दिल नहीं दहलते आपके डर से ? या फिर यह डर, कानून, नियम सब भोले-भाले आम लोगों के लिए ही होते हैं ? उस पर न्याय में विलंब आपके अस्तित्व पर भी तो सवाल उठा देता है ! अच्छा, क्या आपको कुछ अजीब नहीं लगता जब उसी अजीबोगरीब तरीके से आए पैसे से आपकी पूजा-अर्चना होती है, भोग लगता है ? क्या प्रभु आप भी............!!   

#हिन्दी_ब्लागिंग 

शनि देव को न्याय का देवता कहा गया है जो मनुष्यों को उनके कर्मों के अनुसार फल प्रदान करते हैं ! शायद ये अकेले ऐसे देवता हैं जिनकी पूजा लोग श्रद्धा से कम, डर से ज्यादा करते हैं ! उन्हीं के जन्म स्थान के रूप में प्रसिद्ध है, शिंगणापुर ! जहां की मान्यता है कि इस देव स्थान में यदि कोई चोरी करता है तो वह गांव के बाहर नहीं जा पाता या तो अपनी दृष्टि खो बैठता है या फिर घोर कष्टों में पड़ जाता है ! कहते हैं इसीलिए यहां घरों-दुकानों में दरवाजे नहीं लगाए जाते ! इस देव स्थान का प्रबंधन सुचारु रूप से करने के लिए एक न्यासी बोर्ड का गठन किया गया है जिसका काम यहां के वित्त को व्यवस्थित करने, हितधारकों के हितों को बनाए रखने, परिचालन करने और दिशा-निर्देश में मदद करना है !  

शनि जन्मभूमि, शिंगणापुर 
अब इसी न्यासी बोर्ड के कई ऐसे कारनामे उजागर हुए हैं, जिन्हें इस बोर्ड के सदस्यों ने बिना गांव के बाहर गए, खुले खिड़की दरवाजों के सामने, बिना किसी डर-भय के ''वित्त को व्यवस्थित करते हुए सिर्फ बोर्ड के हितधारकों के हितों को को ध्यान में रख'' अंजाम दिया ! खबर के सामने आने से पता चला है कि न्यासी बोर्ड ने बासठ श्रमिकों की जगह 1800 लोगों को अनौपचारिक रूप से भर्ती कर वेतन में हेरा-फेरी की ! दर्शन की रसीदों में घपला कर करोड़ों का गबन किया ! मंदिर को मिलने वाले दान को एक निजी शिक्षण संस्थान को दिया जाता रहा ! बिजली आपूर्ति पर प्रति माह 40 लाख के डीजल का खर्च दिखाया जाता रहा ! मंदिर के सौंदर्यीकरण पर 50 करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद 50 फीसदी ही काम हो पाया है और यह सब लंबे समय से होता आ रहा है ! और वे सब फलते-फूलते रहे न्याय के दरबार में, ठीक न्यायाधीश की नाक के नीचे ! 

अब सवाल शनि देव पर ही उठता कि क्यों महाराज, आप तो खुद को न्याय का देवता कहलवाते हो ! फिर क्यों इतनी देर लग जाती है दोषियों को दंड मिलने में ? क्यों भ्रष्टाचारियों के दिल नहीं दहलते आपके डर से ? कैसे हिम्मत होती है आपके सामने कुकृत्य करने की ? या फिर यह डर, कानून, नियम सब भोले-भाले आम लोगों के लिए ही होते हैं ? खासमखास इससे परे होते हैं ! उस पर न्याय में विलंब आपके अस्तित्व पर भी तो सवाल उठा देता है ! अच्छा, क्या आपको कुछ अजीब नहीं लगता जब उसी अजीबोगरीब तरीके से आए पैसे से आपकी पूजा-अर्चना होती है, भोग लगता है ? 

क्या प्रभु आप भी............!! 

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