pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

गुरुवार, 19 अक्टूबर 2023

आँखों पर पट्टी बांधे बैठी कुर्सियां

सच तो यही है कि आँखों पर पट्टी बंधी होने से कभी भी न्याय नहीं हो पाता है ! हमारे हजारों साल पुराने ग्रंथ भी इस बात के गवाह हैं, उनमें भी इस बात की पुष्टि हुई है कि यदि आँखों पर पट्टी ना होती तो संसार का सबसे बड़ा विनाशकारी युद्ध भी शायद ना होता ! कहावत है कि कानों सुनी पर विश्वास नहीं करना चाहिए ! आज भी सत्य के पक्ष में खड़े युधिष्ठिर, अपनी बात ठीक से न रख पाने, सच्चाई को ठीक से उजागर ना कर पाने के कारण, अपना पक्ष कमजोर कर लेते हैं ! दूसरी ओर शकुनि जैसे लोग अपने वाक्चातुर्य से असत्य को सत्य का जामा पहना बंद आखों को धोखा देने में सफल हो जाते हैं.................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

स्कूल में, चाहे वह विज्ञान हो, भूगोल हो, गणित हो, पढ़ाए गए विषयों की सत्यता सदा एक सी बनी रहती है ! यह नहीं होता कि स्कूल में पढ़ाया गया हो कि पृथ्वी गोल है और कॉलेज में आ कर वह चपटी हो जाए ! यदि स्कूल में बताया गया है कि पानी, ऑक्सीजन और हाइड्रोजन के संयोग से बनता है तो यह सच्चाई सदा ही बनी रहती है ! दो और दो चार ही होता है ! मनुष्य सामाजिक प्राणी ही बना रहता है, जैसा बताया गया था ! गुरु जी की कुर्सी पर बैठा इंसान विद्वान होता है ! कोई ऐरा-गैरा आ कर उसकी परीक्षा नहीं ले सकता ! ऐसा भी नहीं कि वह कुछ बोले और हेड मास्टर उसकी बात काट दे और उधर प्रिंसिपल हेडमास्टर को गलत करार कर उसकी बात बार-बार पलटता  रहे !

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पर एक विधा ऐसी भी है जिसमें कुछ भी स्थाई नहीं है ! एक कुछ कहता है तो दूसरा उसको गलत सिद्ध कर जाता है तो तीसरा आ कर दूसरे की बात पलट जाता है ! निचले स्थान की कुर्सी को उच्चासीन हेय सिद्ध कर देता है तो इस उच्च को सर्वोच्च सत्ता वाला धरातल पर ला पटकता है ! पता नहीं....! किताबें तो सबने एक जैसी ही पढ़ी होती हैं ! पर हर कोई उनको अपनी मर्जी के अनुसार परभाषित करने लगता है ! यदि उसमें लिखा इतना जटिल है कि अधिकांश को वह समझ ही नहीं आता तो उसे सरल क्यों नहीं बनाया जाता ?  क्यों नहीं उसके ''लूप होल्स'' को सील कर दिया जाता ? उस जटिलता का खामियाजा भुगतना पड़ता है आम, मजलूम जनता को ! आज हालत ऐसे हैं कि बोलने वाला सुनने वाले पर हावी हो गया है ! यह ''सुना'' जाता है कि ''कौन'' बोल रहा है ना कि क्या बोला जा रहा है ! होता भी तो ऐसा ही आया है, जनता ने देखा भी है, दसियों ऐसे उदाहरण हैं जब भारी-भरकम लोग अपनी बात मनवा कर चल देते हैं ! अब तो तराजू वाली प्रतिमा को खुद ही अपनी आँखों पर बंधी पट्टी उतार फेंकनी होगी !

इस विधा के प्रतीक को रोमन देवी जस्टीशिया के रूप में जाना जाता है। जिसकी आंखों पर पट्टी बंधी हुई है और एक हाथ में तराजू और दूसरे में तलवार है। कहते हैं पहले मूर्ति की आँखों पर पट्टी नहीं होती थी पर 16वीं शताब्दी में उसके सामने होने वाले अन्याय के प्रति उसे अंधा दिखाने के उद्देश्य के तहत, कुछ लोगों ने मूर्ति की आँखों पर पट्टी बाँध दी थी ! पर फिर न्यायालय की गरिमा को ध्यान में रखते हुए इसे न्याय की निष्पक्षता के प्रतीक के रूप में प्रचारित कर दिया गया ! पर सच तो यही है कि आँखों पर पट्टी बांध कभी भी कोई न्याय नहीं कर पाया है ! हमारे हजारों साल पुराने ग्रंथ भी इस बात के गवाह हैं, उनमें भी इस बात की पुष्टि की हुई है कि यदि आँखों पर पट्टी ना होती तो संसार का सबसे बड़ा विनाशकारी युद्ध भी ना होता ! कहावत है कि कानों सुनी पर विश्वास नहीं करना चाहिए ! सत्य के पक्ष में खड़े युधिष्ठिर, अपनी बात ठीक से न रख पाने, सच्चाई को ठीक से उजागर ना कर पाने के कारण, अपना पक्ष कमजोर कर लेते हैं ! दूसरी ओर शकुनि जैसे लोग अपने वाक्चातुर्य से असत्य को सत्य का जामा पहना बंद आखों को धोखा देने में सफल हो जाते हैं !

चलिए इन गुमानी कुर्सियों की तो आँखें बंद हैं पर हमारे पथ प्रदर्शक, हमारे धर्मगुरु, हमारा समाज यह सब क्यों चुप है ? कहाँ हैं वे लोग जो कहते हैं कि हम इंसान गढ़ते हैं ? उनकी आँखें तो खुली हैं, तो फिर क्या उन्हें दिखाई नहीं पड़ रहा है कि आज कैसे इंसान घड़े जा रहे हैं ? क्यों है यह चुप्पी ? क्यों है यह उदासीनता ? हमें खुद भी सोचना होगा, क्यों निर्लिप्त हैं हम सब ?

इस विधा के मूल मंत्र को प्रचारित करते समय बार-बार कहा जाता है कि भले ही सौ दोषी छूट जाएं पर निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए ! पर विडंबना यह है कि अधिकांश मामलों में इसका उलट होता है ! पीड़ित अपनी आत्मा पर बोझ लिए मर-मर कर जीता है और अपराधी अपने रसूख, अपने धनबल, अपने बाहुबल और इस विधा की संकरी गलियों का सहारा ले, दुःखित को और दुखी करता, उसकी छाती पर मूंग दलता हुआ स्वच्छंद मंडराता रहता है ! लचर कानून और न्याय व्यवस्था हमेशा से ही आम नागरिक की परेशानी का सबब रही है ! आज भी सीधा-साधा गरब-गुरबा डरता है न्याय की गुहार लगाने को ! जब्त कर जाता है अपने ऊपर हुए अन्याय को ! यदि कोई हिम्मत करता है तो उसकी हालत "रागदरबारी के लंगड़" जैसी हो कर रह जाती है ! ज्यादातर आम नागरिकों को  काले कोट उन काली शक्तियों की तरह भयभीत करते हैं, जिनके चंगुल में एक बार फंस गए तो मौत ही मुक्ति दिला पाती है ! दूसरी तरफ इन्हीं खामियों का फायदा उठा अपराधी अक्सर कानून के शिकंजे से बच निकलते हैं ! 

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यदि कुर्सी की आँखें खुली हों यानी वह कभी-कभी खुद भी संज्ञान लेने की जहमत उठा ले, तो सामने वाले की भाव-भंगिमा, चाल-ढाल, उसकी कुटिलता का आभास पा वस्तुस्थिति समझने में आसानी हो सकती है ! तब देखा तो जा सकेगा कि कोई बिमारी का बहाना बना जेल से छूट, घर पर तीमारदारी करवाने के बजाए पर्यटन पर कैसे निकल जाता है ! बीमार है पर खेल-कूद में सक्रीय भाग लेने लगता है ! देखा तो जा सकेगा कि करोड़ों के हेर-फेर में किसी के पास कुछ नहीं मिलता पर उसके बगल की खेती कैसे लहलहाने लगी है ! कानों को साक्ष्य ना भी सूझें पर आँखें तो देख पाएंगी कि कैसे डेढ़-डेढ़ दर्जन बच्चों की लाशें नालों में सड़ती हुई मिल रही हैं ! वे खुद तो जा कर मिटटी में दफ़न या नाले में नहीं कूदी होंगी ! कोई तो होगा जिसने ऐसी हैवानियत की होगी और वह ''कोई'' सिर्फ सुनी-सुनाई पर कैसे रिहा हो गया......! 

यह भी बिलकुल सच है कि आँखों पर पट्टी होने के बावजूद कई कुर्सियां बिना किसी दवाब में आए, अपनी जान तक की परवाह किए बगैर अपने कर्तव्य को अंजाम देती रहती हैं और उन्हीं के कारण आज भी इस व्यवस्था की साख कायम है ! यह भी सही है कि इस विधा में सिर्फ आँख की पट्टी का ही दोष नहीं है ! इसमें कुछ कुर्सियों पर उनका अहम, विचारधारा, परवरिश, दृष्टिकोण यह सब हावी हो जाता है जिससे अपने को श्रेष्ठ समझ एक अलग सोच बना ली जाती है ! पश्चिम की उच्श्रृखंलता, कुत्सित विचार, उनके मानदंड उन्हें सही लगने लगते हैं ! ऐसी कुर्सियां भूल जाती हैं कि हमारी सामाजिक व्यवस्था अलग है ! हमारे समाज की रीढ़ हमारे परिवार हैं ! परिवारों की एकजुटता हमारे संस्कार हैं, जिनमे विवाह का एक विशेष स्थान है ! माँ-बाप की अहमियत है बच्चों के लिए, उनकी परवरिश के लिए ! सिर्फ सुविधाएं जुटा देने से ही कर्तव्य की इति नहीं हो जाती ! खून के रिश्ते परिवारों को एक मजबूती देते हैं ! संस्कार हैं तो परिवार हैं, परिवार हैं तो समाज है और समाज है तभी देश भी है ! 

आजकल कुछ ऐसी ही बंद आँखों वाली कुर्सियां अप्राकृतिक संबंधों की पैरोकार बन जिस तरह वैवाहिक संस्कारों पर चोट करने की कोशिश में हैं उससे वे भविष्य के समाज के कैसे विनाश का आह्वान कर रही हैं, इसका शायद उन्हें गुमान भी नहीं है ! चलिए इन गुमानी कुर्सियों की तो आँखें बंद हैं पर हमारे पथ प्रदर्शक, हमारे धर्मगुरु, हमारा समाज यह सब क्यों चुप है ? कहाँ हैं वे लोग जो कहते हैं कि हम इंसान गढ़ते हैं ? उनकी आँखें तो खुली हैं, तो फिर क्या उन्हें दिखाई नहीं पड़ रहा है कि आज कैसे इंसान घड़े जा रहे हैं ? क्यों है यह चुप्पी ? क्यों है यह उदासीनता ? हमें खुद भी सोचना होगा, क्यों निर्लिप्त हैं हम सब ?   

सोमवार, 9 अक्टूबर 2023

अथ रसगुल्ला कथा

रसगुल्ले की प्रसिद्धि का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस मिठाई पर अपना हक़ जताने के लिए दो प्रांतों, बंगाल और ओडिसा में सालों कानूनी जंग चलती रही। ओड़िसा का कहना था कि इसकी पैदाइश उनके यहां हुई थी और वर्षों से उसका भोग जगन्नाथ जी को लगता आ रहा है। 2017 में सरकार द्वारा बनाई गई कमिटी ने ''बांग्लार रोशोगोल्ले'' को Geographical Indications (GI) Tag  प्रदान कर दिया है। उस दिन बंगाल में ऐसी ख़ुशी मनाई गयी जैसे कोई बहुत बड़ी जंग जीत ली हो। इस मिठाई की प्रसिद्धि का यह आलम था कि इसके आविष्कारक नविनचंद्र दास की जीवनी पर एक फिल्म भी बन चुकी है..........!


#हिन्दी_ब्लागिंग  

"नोवीन दा !  किछू नोतून कोरो, डेली एकई धरनेर मिष्टी आर भालो लागे ना."    

"हें, चेष्टा कोच्छि (कोरछि), दैखो की होय."   
 
1866, कलकत्ता के बाग बाजार इलाके की एक मिठाई की दुकान। शाम का समय, रोज की तरह ही दुकान पर युवकों की अड्डेबाजी जमी हुई थी। मिठाईयों के दोनो के साथ तरह-तरह की चर्चाएं, विचार-विमर्श चल रहा था। तभी किसी युवक ने दुकान के मालिक से यह फर्माइश कर डाली कि नवीन दा, कोई नयी चीज बनाओ। (नोवीन दा ! किछू नोतून कोरो)।  नवीन बोले, कोशिश कर रहा हूं। और सच में वे कोशिश कर भी रहे थे कुछ नया बनाने की जिसमें उनका भरसक साथ दे रही थीं उनकी पत्नी, खिरोदमोनी । उसी कुछ नया के बनाने के चक्कर में एक दिन उनके हाथ से छेने का एक टुकड़ा चीनी की गरम चाशनी में गिर पड़ा। उसे निकाल कर जब नवीन ने चखा तो उछल पड़े, यह तो एक नरम और स्वादिष्ट मिठाई बन गयी थी। उन्होंने इसे और नरम बनाने के लिए छेने में "कुछ" मिलाया, अब जो चीज सामने आई, उसका स्वाद अद्भुत था ! खुशी के मारे नवीन को इस मिठाई का कोई नाम नहीं सूझ रहा था तो उन्होंने इसे रशोगोल्ला यानि रस का गोला कहना शुरु कर दिया। इस तरह रसगुल्ला जग में अवतरित हुआ।
नवीन चंद्र दास 
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जहां अपनी आँखों से ज्यादा आपकी आँखों का ख्याल रखा जाता है 
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कलकत्ता वासियों ने जब इस नयी चीज का स्वाद चखा तो जैसे सारा शहर ही पगला उठा। बेहिसाब रसगुल्लों की खपत रोज होने लग गई। इसकी लोकप्रियता ने सारी मिठाईयों की बोलती बंद करवा दी। हर मिठाई की दुकान में रसगुल्लों का होना अनिवार्य हो गया। जगह-जगह नयी-नयी दुकानें खुल गयीं। पर जो खूबी नवीन के रसगुल्लों में थी वह दुसरों के बनाये रस के गोलों में ना थी। इस खूबी की वजह थी वह  "चीज"  जो छेने में मिलाने पर उसको और नरम बना देती थी। जिसका राज नवीन को छोड़ उनके कारिगरों को भी नहीं था।
रस के गोले 
नवीन और उनके बाद उनके वंशजों ने उस राज को अपने परिवार से बाहर नहीं जाने दिया। आज उनका परिवार कोलकाता के ध्नाढ्य परिवारों में से एक है, पर कहते हैं कि रसगुल्लों के बनने से पहले परिवार का एक सदस्य आज भी अंतिम "टच" देने दुकान जरूर आता है। इस गला काट स्पर्द्धा के दिनों में भी इस परिवार ने अपनी मिठाई के स्तर को कभी भी गिरने नहीं दिया है।  

खीरमोहन 
बंगाल के रसगुल्ले जैसा बनाने के लिये देश में हर जगह कोशिशें हुईं, पर उस स्तर तक नहीं पहुंचा जा सका। हार कर अब कुछ शहरों में बंगाली कारिगरों को बुलवा कर बंगाली मिठाईयां बनवाना शुरु हो चुका है। पर अभी भी बंगाल के रसगुल्ले का और वह भी नवीन चंद्र की दुकान के "रोशोगोल्ले" का जवाब नहीं। इसकी प्रसिद्धि का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस मिठाई पर अपना हक़ जताने के लिए दो प्रांतों बंगाल और ओडिसा में सालों कानूनी जंग चलती रही। ओडिसा का कहना था कि इसकी पैदाइश उनके यहां हुई थी और वर्षों से उसका भोग जगन्नाथ जी को लगता आ रहा है। पर वहां के ''रसगोले'' का रंग भूरापन लिए होता है और उसे खीरमोहन नाम से जाना जाता रहा है। जो थोड़ा सा कड़ापन लिए होता है। जबकि बंगाल का ''रोशोगुल्ला'' मुलायम, स्पॉन्जी और दूडिया सफ़ेद रंग का होता है। वैसे भी दोनों मिठाइयों के रंग के अलावा उनके स्वाद, चाशनी, प्रकृति और बुनावट में भी काफी फर्क होता है। 
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जो भी हो रसगुल्ले का जन्म तब के ईस्ट इंडिया का ही माना जाता है, जिसे आज बंगाल और ओड़िसा के नाम से जानते हैं। वैसे 2017 में सरकार द्वारा बनाई गई कमिटी ने ''बांग्लार रोशोगोल्ले'' को Geographical Indications (GI) Tag  प्रदान कर दिया है। उस दिन बंगाल में ऐसी ख़ुशी मनाई गयी जैसे कोई बहुत बड़ी जंग जीत ली हो। इस मिठाई की प्रसिद्धि का यह आलम था कि इसके आविष्कारक नविनचंद्र दास की जीवनी पर एक फिल्म भी बन चुकी है !  
रसगोल्ला फिल्म का पोस्टर 
उजान गांगुली, जिन्होंने नवीन चंद्र का किरदार निभाया 
यह है इस मिठाई का ''क्रेज़''। हालांकि आजकल बदलते समय के साथ कई लोग इसके नाम का सहारा ले उल्टी-सीधी मिठाइयां, जैसे पान रसगुल्ला, मिर्ची रसगुल्ला, गुलाब रसगुल्ला, चॉकलेट रसगुल्ला जैसे सौ स्वादों वाले रसगुल्ले बनाने का दावा कर नाम और दाम कमाने से नहीं हिचकिचा रहे। यह सही है कि किसी को कुछ बनाने की रोक नहीं है पर किसी की ख्याति को भुनाना भी उचित नहीं होता। देखना है कि बंगाल का, अपनी परंपराओं से लगाव रखने वाला, भद्रलोक किसे सर-माथे पर बिठाए रखता है।   
तो यदि कभी कोलकाता जाना हो तो बड़े नामों के विज्ञापनों के चक्कर में बिना पड़े, बाग बाजार के नवीन बाबू की दुकान का पता कर, इस आलौकिक मिठाई का आनंद जरूर लें।

@लेख के सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से  

बुधवार, 20 सितंबर 2023

घुटने में अभी भी हेड़ेक है

अब जो होना था, वह हुआ और अच्छा ही हुआ ! क्योंकि इससे एक सच्चाई तो सामने आ गई, कि जो बहुत दिनों से, बहुत बार, बहुतों से बहुतों के बारे में सुनते आ रहे थे कि फलाने का दिमाग घुटने में है और इसको हलके-फुलके अंदाज में ही लिया जाता था, तो अब  पूरा विश्वास हो गया है कि यह मुहावरा यूं ही नहीं बना था इसमें पूरी सच्चाई निहित थी........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

बात कुछ दिनों पहले की है ! दोपहर करीब दो बजे का समय था ! रिमझिम फुहारें पड़ रही थीं ! सो उनका आनंद लेने के लिए पैदल ही ऑफिस से घर की ओर निकल पड़ा ! यही बात इंद्रदेव को पसंद नहीं आई कि एक अदना सा इंसान उनसे डरने की बजाय खुश हो रहा है ! बस, फिर क्या था ! उन्होंने उसी समय अपने सारे शॉवरों का मुंह एक साथ पूरी तरह खोल दिया। अचानक आए इस बदलाव ने मुझे अपनी औकात भुलवा मुझसे सौ मीटर की दौड़ लगवा दी ! उस समय तो कुछ महसूस नहीं हुआ, पर रात गहराते ही घुटने में दर्द ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवा दी !  जिसने मेरे नजरंदाजी रवैये के कारण अगले कुछ दिनों का अवकाश लेने पर मजबूर कर दिया ! पर इलाज करने और मर्ज बढ़ने के मुहावरे को मद्दे नजर रख, मैंने किसी ''डागदर बाबू'' को अपनी जेब की तलाशी नहीं लेने दी ! जुम्मा-जुम्मा करते 12-13 दिन हो गये पर दर्द महाशय घुटने के पेचो-ख़म में ऐसे उलझे कि निकलने का नाम ही नहीं ले रहे थे ! 
अब जैसा कि रिवाज है, तरह-तरह की नसीहतें, हिदायतें तथा उपचार मुफ्त में मिलने शुरू हो गए ! अधिकाँश सलाहें तो दोनों कानों में आवागमन की सुविधा पा हवा से जा मिले, पर कुछ अपने-आप को सिद्ध करने के लिए, दिमाग के आस-पास तंबू लगा बैठ गए ! सर्व-सुलभ उपायों को आजमाया भी गया ! ''फिलिप्स'' की लाल बत्ती का सेक भी दिया गया ! अपने नामों से मशहूर मलहमें भी खूब पोती गईं ! सेंधा नमक की सूखी-गीली गरमाहट को भी आजमाया गया,पर हासिल शून्य बटे सन्नाटा ही रहा ! फिर आए बाबा रामदेव अपनी ''पीड़ांतक" ले कर, उससे कुछ राहत भी मिली, हो सकता है कि शायद अब तक दर्द भी एक जगह बैठे-बैठे ऊब गया हो ! वैसे उसे और भी घुटने-कोहनियां देखनी होती हैं ! खाली-पीली मेरे यहां जमे रह कर उसकी दाल-रोटी भी तो नहीं चलने वाली, सो अब पूर्णतया तो नहीं पर काफी कुछ आराम है। 
अब जो होना था, वह हुआ और अच्छा ही हुआ ! क्योंकि इससे एक सच्चाई तो सामने आ गई कि जो बहुत दिनों से, बहुत बार, बहुतों से बहुतों के बारे में सुनते आ रहे थे कि फलाने का दिमाग घुटने में है और इसको हलके-फुलके अंदाज में ही लिया जाता था तो अब  पूरा विश्वास हो गया है कि यह मुहावरा यूं ही नहीं बना था, इसके पीछे पूरी सच्चाई निहित थी !सवाल उठता है, कैसे ? तो जनाब, इन 12-13 दिनों में बहुत कोशिश की ! बहुतेरा ध्यान लगाया ! हर संभव-असंभव उपाय कर देख लिया पर एक अक्षर भी लिखा ना जा सका। जिसका साफ़ मतलब था कि यह सब करने का जिसका जिम्मा है वह तो हालते-नासाज को लिए घुटने में बैठा था  १ इस हालत में वह अपनी चोट संभालता कि मेरे अक्षरों पर ध्यान देता ! तो लुब्ब-ए-लुबाब यह रहा कि कभी, किसी के घुटने में दिमाग का जिक्र आए तो उसे हलके में मत लें ! 

@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

बुधवार, 13 सितंबर 2023

बेगुनकोदर, एक भूतिया रेलवे स्टेशन

सच्चाई क्या है यह तो पता नहीं ! पर लगभग 42 सालों तक भूतिया डर के चलते बेगुनकोदर रेलवे स्टेशन बंद पड़ा रहा। यहाँ कोई भी नहीं आता था। पर फिर समय कुछ बदला ! लोगों की परेशानियों को देखते हुए 2009 में तत्कालीन रेल मंत्री ममता बनर्जी ने अफवाहों के शिकार इस बदनसीब रेलवे स्टेशन को दुबारा से हरी झंडी दिखा दी। लेकिन आज भी सूरज ढलने के बाद वहाँ शायद ही कोई व्यक्ति दिखाई पड़ता हो........!     

#हिन्दी_ब्लागिंग 

भूत, इनके बारे में दावे तो बड़े-बड़े किए जाते हैं, पर ठीक या अच्छी तरह से देखा शायद ही किसी ने हो ! हमारे गांवों में ऐसे कुछ लोग जरूर मिल जाएंगे, जिन्होंने भूतों से कुश्ती लड़ी हो या उनसे भूत ने बीड़ी मांगी हो ! पर वे लोग यह नहीं बता पाते कि उस अशरीरी ने बीड़ी कैसे पी या कुश्ती में कौन सा दांव लगाया ! पर इसके साथ ही भूतों पर एक सर्वेक्षण से यह भी पता चला है कि दुनिया में करीब 45% लोग इन पर विश्वास करते हैं ! इसका कारण भी है, इस विस्मय भरे संसार में हजारों चीजें, बातें, घटनाएं, वारदातें ऐसी हैं या होती रहती हैं, जिनका कोई तर्कसम्मत जवाब या हल नहीं मिल पाता ! जिन्हें महसूस तो किया जाता है पर परिभाषित नहीं किया जा सकता ! विदेशों की बात नाहीं करें, अपने देश में ऐसी दसियों जगहें हैं जो भूतिया नाम से विख्यात हैं ! उन्हीं में से एक है पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले में बेगुनकोदर नाम का एक रेलवे स्टेशन !  


पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से करीब 260 किमी दूर, पुरुलिया जिले में 1960 में भारतीय रेलवे ने एक सुनसान व वीरान सी जगह में अपना एक स्टेशन बनाया जिसका नाम रखा गया बेगुनको
दर रेलवे स्टेशन ! हालांकि यह पैसेंजर हॉल्ट था, इसलिए यहां टिकट घर तथा प्रतीक्षालय तो था पर प्लेटफॉर्म नहीं था ! पर पहले स्थानीय लोगों को शहर जाने के लिए तक़रीबन पचास किमी चल कर ट्रेन पकड़नी पड़ती थी, इसके बनने पर इस मुसीबत से उन्हें छुटकारा मिला और समय की बचत भी हुई ! कुछ सालों तक सब ठीक-ठाक चलता रहा पर इसके बनने के करीब सात साल के बाद 1967 में वहाँ तरह-तरह की अफवाहें फैलने लगीं ! दरअसल एक रेलवे कर्मचारी के वहां एक महिला भूत होने के दावे पर लोगों ने विश्वास नहीं किया ! कुछ दिनों बाद ही उस कर्मचारी की मौत हो गई ! लोगों ने उसका संबंध उस भूत से जोड़ दिया ! जिसके बाद कहा जाने लगा कि शाम ढलने के बाद मुसाफिरों को यहां सफ़ेद साड़ी पहने एक महिला नजर आती है, जो ट्रैन के साथ दौड़ लगाती है ! कभी-कभी तो वह गाड़ी से भी तेज दौड़ कर आगे निकल जाती है ! कुछ लोगों ने ट्रैन के सामने पटरी पर भी उसे चलते देखने का दावा किया ! हालांकि किसी भी बात की कभी भी कोई पुष्टि नहीं हुई !

इन सब बातों से डर इतना फैल गया कि लोग शाम होते ही स्टेशन और उसके पास के इलाके से ही दूर चले जाते थे ! सुरज ढलने के बाद यहां कोई रुकना नहीं चाहता था ! शाम पांच-छह बजे के बाद वहां कोई भी इंसान नजर नहीं आता था ! बेगुनकोद रेलवे स्टेशन पर भूत का खौफ धीरे-धीरे इतना बढ़ गया कि कोई भी व्यक्ति सूरज ढलने के बाद वहाँ नहीं उतरता था, चढ़ने की तो बात ही दूर ! गाड़ियां वहाँ से जरूर गुजरती थीं पर उनकी रफ़्तार बढ़ा दी जाती थी ! स्टेशन आने के पहले यात्री ट्रेन की खिड़कियाँ बंद कर लिया करते थे, उनका मानना था कि इस स्टेशन को देखना भी खतरे से खाली नहीं है ! वहाँ काम करने वाले कर्मचारी भी विभाग में अपना ट्रांसफर करने की अर्जी देने लग गए। कोई भी कर्मचारी बेगुनकोदर रेलवे स्टेशन पर काम करने को तैयार नहीं था। जो भी नए कर्मचारी यहाँ आते वो भी जल्दी ही वापस लौट जाते थे । कर्मचारियों के बिना किसी भी रेलवे स्टेशन को चलाना कैसे संभव हो पाता सो इन सबके चलते स्टेशन को ही बंद कर दिया गया ! बेगुनकोदर भूतिया रेलवे स्टेशन के रूप में कुख्यात हो चुका था ! 



ऐसे
ही लगभग 42 सालों तक अफवाहों के चलते बेगुनकोद
 रेलवे स्टेशन बंद पड़ा रहा। यहाँ कोई भी नहीं आता था। पर फिर समय कुछ बदला ! लोगों की परेशानियों को देखते हुए 2009 में तत्कालीन रेल मंत्री ममता बनर्जी ने अफवाहों के शिकार इस बदनसीब रेलवे स्टेशन को दुबारा से हरी झंडी दिखा दी। लेकिन आज भी सूरज ढलने के बाद वहाँ शायद ही कोई व्यक्ति दिखाई पड़ता हो ! 

@सौजन्य अंतर्जाल 

गुरुवार, 7 सितंबर 2023

एक था भाई, नाम था, शकुनि

शकुनी ने जो कुछ भी किया, वह सब खुद के लिए नहीं किया बल्कि सारे बुरे कर्म, षड्यंत्र, छल, कपट अपनी बहन के साथ हुए अन्याय और अपने परिवार के अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए किया ! पर विडंबना यह रही कि जिस बहन के लिए उसने जमाने से, युगों-युगों की बदनामी, नफ़रत, कुत्सा, घृणा मोल ली, उसी बहन ने युद्धोपरांत अपने पुत्रों की मृत्यु का जिम्मेदार ठहराते हुए उसे श्राप दे डाला, वह भी ऐसा श्राप जो आज भी फलीभूत है............!

#हिन्दी_ब्लागिंग

आज तक देवता हो या इंसान, समय से ना हीं कोई पार पा सका, ना हीं उसे कोई समझ पाया ! इसके चक्र में कभी-कभी परिस्थितियां ऐसी करवट ले लेती हैं कि अच्छा-भला इंसान भी हैवान निरूपित कर दिया जाता है ! जिससे कभी देश-समाज की रक्षा की अपेक्षा होती है, वही अपने लोगों की मृत्यु का सबब बन जाता है ! हजारों साल पहले शायद ऐसा ही हुआ गांधार के राजकुमार शकुनि के साथ ! जिसे द्वापर में हुए महाभारत युद्ध के भीषण नरसंहार का मुख्य कारण मान, हजारों वर्षों बाद, आज भी द्वापर के सबसे बड़े खलनायक के रूप में जाना जाता है !  

शकुनि 
उन दिनों गांधार, आज के अफगानिस्तान का कंधार क्षेत्र, के राजा थे सुबल और उनकी पत्नी का नाम सुदर्मा था ! उनके सौ बेटे और एक बेटी गांधारी थी ! शकुनि उन सब में सबसे छोटे थे, सौवां पुत्र होने के कारण उनका नामकरण सौबाला के रूप में किया गया था ! बचपन से ही उनकी भगवान शिव में गहरी आस्था थी ! वे बहुत ही कुशाग्र, बुद्धिमान और मेधावी थे ! इसी कारण वे अपने पिता को सर्वाधिक प्रिय थे ! मान्यता है कि शकुनि के पासे उनके पिता की रीढ़ की हड्डी से बने थे ! पिता के स्नेह के कारण सदा शकुनि के मनोरूप ही परिणाम आता था ! उनके एक और नाम शकुनि का अर्थ भले ही षड्यंत्रकारी के रूप में लिया जाता हो, पर इसका एक अर्थ नभचर भी होता है, पर समय की गति, शकुनि कुटिलता का पर्याय बन कर रह गया ! पर शुरू में शकुनि बुरे ख्यालों या कुटिल नीतियों वाले व्यक्ति नहीं थे ! वे अपने परिवार और खास कर अपनी बहन गांधारी से अत्यधिक स्नेह रखते थे ! 

धृतराष्ट्र-गांधारी 
सब ठीक-ठाक ही चल रहा था ! पर समय कहां और कब एक सा रहा है ! गांधारी सुंदर, सुशील, कार्यनिपुण, विदुषी व आज्ञाकारी महिला थीं ! इसके अलावा उन्हें सौ पुत्रों का वरदान प्राप्त था ! इन्हीं गुणों के कारण भीष्म पितामह ने सोचा कि वह धृतराष्ट्र की अच्छी तरह से देखभाल करते हुए जीवन भर उसका साथ देगी, और उनके सौ पुत्र धृतराष्ट्र का संबल बनेंगे, इसीलिए उन्होंने एक तरह से जबरन यह विवाह करवाया ! जब भीष्म पितामह गांधारी का विवाह धृतराष्ट्र से करने का प्रस्ताव लेकर गांधार आए तो शकुनि नहीं चाहते थे कि उनकी बहन की शादी नेत्रहीन धृतराष्ट्र से हो और वे एक अंधे युग में धकेल दी जाएं ! लेकिन भीष्म के विरोध की क्षमता गांधार में नहीं थी, सो मजबूरीवश शकुनि को धृतराष्ट्र से अपनी बहन का विवाह करवाना पड़ा ! पर दवाब और मजबूरी के चलते इस बेमेल विवाह को वे जन्म भर स्वीकार नहीं कर पाए ! कुरु वंश के प्रति उनके मन में नफ़रत और विद्वेष ने गहरी जगह बना ली थी ! विवाहोपरांत ही शकुनि ने इस अपमान का बदला लेने के लिए कुरु वंश के समूल नाश का प्रण ले लिया था ! !उनका एकमात्र उद्देश्य भीष्म पितामह के पूरे परिवार को नष्ट करना था। उसी क्षण से उन्होंने कुरुवंश की जड़ को खोदना शुरू कर दिया और उसे कुरुक्षेत्र के महारण में उतार दिया !  

शकुनि के पासे 
पौराणिक कथा के अनुसार ज्योतिषियों और विद्वानों का मत था कि गांधारी का पहला विवाह बेहद अशुभ परिणाम लाएगा ! इसीलिए उनका पहला विवाह एक बकरे के साथ कर दिया गया था, जिसकी बाद में बलि दे दी गई ! जिससे बाद में उनका जीवन सुरक्षित और निरापद रहे ! धृतराष्ट्र को इस घटना के बारे में उनकी शादी के बहुत बाद पता चला और अपने को गांधारी का दूसरा पति मान वे अत्यंत क्रोधित हो गए और सजा के रूप में, उन्होंने राजा सुबल को परिवार सहित कारागार में डाल दिया ! इतना ही नहीं उनमें से प्रत्येक को प्रतिदिन खाने के लिए सिर्फ एक मुट्ठी चावल दिया जाता था, जिससे भूख के कारण उन सब की मृत्यु हो जाए ! अंत को सामने देख राजा सुबल और उनका समस्त परिवार अपना सारा भोजन सबसे छोटे शकुनि को देने लगे, जिससे वह उनकी मौत का बदला लेने के लिए जीवित रह सके ! यह सुनिश्चित करने के लिए कि वह बदला लेना हमेशा याद रखेगा, उनके पिता ने उनका एक पैर तोड़ उसे स्थायी रूप से लंगड़ा बना दिया ! अंतिम सांस लेने से पहले सुबल ने धृतराष्ट्र से शकुनि को मुक्त करने की विनती की तथा वादा किया कि उनका बेटा, बदले में, हमेशा धृतराष्ट्र के बेटों की देखभाल और रक्षा करेगा। उस समय तक धृतराष्ट्र सौ पुत्र और एक पुत्री के पिता बन चुके थे ! उन्हें अपने श्वसुर पर दया आ गई और उन्होंने  शकुनि को रिहा कर अपने पास ही नहीं रखा बल्कि उनकी बुद्धिमत्ता देख अपना सलाहकार भी बना लिया ! धीरे-धीरे शकुनि ने  दुर्योधन को वश में कर पूरे हस्तिनापुर को अपने कब्जे में ले लिया ! उनका प्रभाव इतना ज्यादा था कि विदुषी गांधारी सब समझते हुए भी विवश हो कर रह गई थी ! शायद समय की भी यही मंशा थी ! 

फिर जो हुआ उसे तो सारा संसार जानता है ! पर शकुनी ने जो कुछ भी किया, वह सब खुद के लिए नहीं किया, बल्कि सारे बुरे कर्म, षड्यंत्र, छल, कपट अपनी बहन के साथ हुए अन्याय और अपने परिवार के अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए किया ! पर समय ने फिर भी उसके साथ न्याय नहीं किया ! यह विडंबना ही रही कि जिस बहन के लिए उसने जमाने से युगों-युगों की बदनामी, नफ़रत, कुत्सा, घृणा मोल ली, उसी बहन ने युद्धोपरांत अपने कुल के नाश का जिम्मेदार ठहराते हुए उसे श्राप दे डाला कि मेरे 100 पुत्रों को मरवाने वाले गांधार नरेश तुम्‍हारे राज्‍य में भी कभी शांति नहीं रहेगी ! वह हमेशा युद्धों में ही उलझा रहेगा ! तुम्हारी प्रजा कभी चैन की सांस नहीं ले पाएगी ! लोगों को मानना है कि गांधारी के उसी श्राप के चलते आज भी अफगानिस्तान में शान्ति स्थापित नहीं हो पा रही है !

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

शुक्रवार, 1 सितंबर 2023

पटनीटॉप, रमणीयता का पर्याय

पटनी टॉप के नामकरण बारे में कुछ ऐसी जानकारी मिलती है कि इसका प्राचीन नाम ''पाटन दा तालाब'' हुआ करता था, जिसका अर्थ है ''राजकुमारी का तालाब'' ! इसे राजकुमारी का तालाब इसलिए कहा जाता था, क्योंकि यह स्थानीय राजा की राजकुमारी की नहाने की पसंदीदा जगह थी ! अंग्रेजों के समय में उच्चारण की दुविधा के कारण ''पाटन दा तालाब'' धीरे-धीरे पटनीटॉप के रूप में परिवर्तित होता चला गया...........!   

#हिन्दी_ब्लागिंग

पटनी टॉप, जम्मू और कश्मीर की पीर पंजाल पर्वत श्रृंखला में स्थित एक रमणीय पर्यटक स्थल है, जो श्रीनगर की तरफ जाते हुए उधमपुर के बाद आता है। यह जम्मू से लगभग 112 किमी तथा 6,640 फ़ुट की ऊँचाई पर चेनाब नदी के समीप स्थित है ! यह अपने शांत परिवेश, ऊंचे चीड़ के वृक्षों, जंगलों से ढके पहाड़ों तथा चारों ओर से घिरे हरे-भरे खेतों की वजह से दिन प्रति दिन पर्यटकों की पसंदीदा जगह बनता जा रहा है ! यहां कैंपिंग, ट्रैकिंग और हाइकिंग जैसी साहसिक गतिविधियों का आनंद भी लिया जा सकता है ! सर्दियों में यह बर्फ की चादर ओढ़ लेता है ! अलबत्ता यहां किसी भी प्रकार की खरीदारी की गुंजायश नगण्य सी है, उसके लिए कुछ दूर कुद तक जाना पड़ सकता है ! 

पटनीटॉप 

होटल 
सत्रहवीं शताब्दी में यहां डोगरा राजा ध्रुव का शासन हुआ करता था ! जिन्होंने अपने क्षेत्र में सांस्कृतिक विरासत को बहुत बढ़ावा दिया था ! जिसका अभी भी एक प्रमाण यहां का 600 साल पुराना नाग मंदिर है ! पटनी टॉप के नामकरण बारे में कुछ ऐसी जानकारी मिलती है कि इसका प्राचीन नाम ''पाटन दा तालाब'' हुआ करता था, जिसका अर्थ है ''राजकुमारी का तालाब'' ! इसे राजकुमारी का तालाब इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह स्थानीय राजा की राजकुमारी की नहाने की पसंदीदा जगह थी ! अंग्रेजों के समय में उच्चारण की सुविधा के कारण ''पाटन दा तालाब'' धीरे-धीरे पटनीटॉप के रूप में परिवर्तित होता चला गया ! 
प्रकृति 

पिछले दिनों अपने अभिन्न मित्रों के साथ ऐसे ही अनुभवों को संजोने का अविस्मरणीय अनुभव प्राप्त हुआ ! वहां हमारा दो दिनी निवास पटनीटॉप हाइट्स होटल में था ! जिसका अपना परिवेश भी मनमोहक था ! पटनीटॉप के आस-पास कई दर्शनीय अछूते से स्थल हैं, जहां पहुँचने पर पर्यटक विभिन्न ऐतिहासिक, प्राकृतिक, आधुनिक व वैज्ञानिक अनुभवों को संजो सकते हैं ! 

गोंडोला 
गोंडोला स्टेशन 

गोंडोला राइड, नवीनतम तकनीक से निर्मित, स्काईव्यू गोंडोला एशिया में सबसे ऊंचे गोंडोला में से एक है, जो पूरे वर्ष भर हर मौसम में अपनी सेवाएं प्रस्तुत कर सकता है ! पटनीटॉप से संगीत घाटी की 2.8 किमी की रोमांचक दूरी करीब 12 मिनट में करवाने वाली विज्ञान की यह अद्भुत तकनीक है ! इसका निर्माण इस क्षेत्र की फ्रांस की अग्रणी कंपनी POMA के साथ मिल कर किया गया है ! 65 मीटर से अधिक ग्राउंड क्लीयरेंस और 2 टावरों के बीच 849 मीटर की सबसे लंबी दूरी वाला भारत में एकमात्र गोंडोला है ! चारों ओर पारदर्शी होने के कारण, पहली बार इसमें यात्रा करने वाले की हालत कुछ देर के लिए तो देखने लायक हो जाती है ! अपने स्टेशन पर पर्यटकों के चढने और उतरते समय इनकी गति बेहद धीमी हो जाती है पर ये रुकते नहीं हैं लगातार चलायमान रहते हैं ! इसकी सवारी आकर्षक परिदृश्य और मनमोहक विहंगम दृश्य और अपनी अनूठी तकनीक से लोगों को आश्चर्यचकित के साथ-साथ गौरवान्वित होने का एहसास भी कराती है ! 

सनासार झील 


सनासार, पटनीटॉप से करीब 20 किमी की दूरी पर, भारत के सबसे दूरस्थ जगहों में से एक, मिनी गुलमर्ग के नाम से प्रसिद्ध, शांता रिज नामक पर्वत की तलहटी में बसा, एक क़स्बा है, जो सना और सार नामक दो गांवों के मेल से बना है ! यह अपनी झील के लिए विख्यात है ! इस दो-अढ़ाई किमी के इलाके का भ्रमण घोड़ों की सवारी कर किया जा सकता है ! यहां पहुँचाने के लिए नाथाटॉप हो कर गुजरना पड़ता है, जो इस इलाके की सबसे ऊंचाई वाला क्षेत्र है ! यहीं भारतीय वायुसेना का सबसे ऊंचाई पर स्थित वायुसेना बेस है ! हमारे उधर से गुजरते वक्त सारा इलाका घने बादलों से आच्छादित था ! 

मेघाच्छादित 

नाग मंदिर, पटनीटॉप के प्राचीन मंदिरों में से एक यह मंदिर करीब 600 साल पुराना बताया जाता है ! यह मंतलाई में एक पहाड़ की चोटी पर स्थित है। यह मंदिर नाग देवता को समर्पित है। लोग यहां सांपों की पूजा, प्रार्थना और अपनी मन्नतें पूरी करवाने आते हैं ! नाग पंचमी के दौरान हजारों तीर्थयात्री इस मंदिर में पहुंचते हैं। उस समय यहां सांपों की पारंपरिक रूप से पूजा की जाती है।इसमें नाग देवता और नाग देवी की प्रतिमाएं हैं ! इसका संबंध माँ पार्वती और देवाधिदेव शिवशंकर भोलेनाथ जी से भी जोड़ा जाता है !

नाग मंदिर 

चेनानी नाशरी सुरंग या  पटनीटॉप सुरंग, यह देश की सबसे लंबी सुरंगों में से एक है ! मुख्य सुरंग का व्यास 13 मीटर है, जबकि सामांतर निकासी सुरंग का व्यास 6 मीटर है। दोनों सुरंगों में 29 जगहों पर मार्ग बनाए गए हैं, जो हर 300 मीटर की दूरी पर स्थित  हैं। खास बात है सुरंग के भीतर लगे कैमरों में। इन कैमरों की मदद से 360 डिग्री तक फोटो लिए जा  सकते हैं। इस सुरंग के बनने के बाद जम्मू और श्रीनगर की दूरी मात्र 30.11 किमी रह गई है ! 

पटनीटॉप सुरंग 

इनके अलावा पटनीटॉप के आस-पास कई और भी दर्शनीय स्थल हैं जैसे, बुद्ध अमरनाथ मंदिर ! बिल्लो की पावरी, माधोटाप इत्यादि ! यदि काश्मीर जाने का सुयोग बने और समय हो, तो कुछ वक्त यहां जरूर गुजारा जा सकता है !

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