pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

गुरुवार, 6 अगस्त 2020

मैं और मेरे चश्मे

चश्मा लगने के साथ ही शुरू हो गयी उनकी बेहाली की कहानी भी ! उनका टूटना थमता ही ना था। एक बार चश्मा दिलाने मेरे वेद चाचाजी मुझे कलकत्ते के बहूबाजार, जो चश्मों का गढ़ होता था, ले गए और ऐसे ही मुझसे पूछ लिया कि कौन सा फ्रेम अच्छा लगता है ! तो मैंने जिस ओर इशारा किया उसे देख वे हस पड़े और बोले ''धुत्त पगला'' ! और फिर उन्होंने मेरे इतिहास और चश्मे के भविष्य की परवाह ना कर मुझे एक अच्छा-खासा फ्रेम दिलवा दिया। दूकान से बाहर आ उन्होंने मुझसे पूछा की मैंने वह फ्रेम क्यों चुना था ? मैंने बताया कि मुझे लगा कि वह कानों को अच्छी तरह पकडेगा, जिससे झटके से गिरेगा नहीं, इसलिए ! बाद में गांधीजी वाले उस फ्रेम की बात सोच अक्सर हंसी आ जाती रही...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
मेरा और चश्मे का संबंध बहुत ही पुराना है। बालपन में ही इसने मेरे कानों का सहारा ले मेरी नाक पर कब्जा जमा लिया था। शुरुआत में तो हमारी आपस में काफी तनातनी रही ! तूफानी धमाचौकड़ी वाला मिजाज होने के कारण कोई भी चश्मा नाक पर ज्यादा देर कब्जा जमाए नहीं रख पाता था ! एक-दो पखवाड़े में एक चश्में का शहीद होना निश्चित था। शाम के समय खेलने-कूदने जाओ और जब तक मुझे कुछ समझ आए, तब तक ये भू-लुंठित हो जाते थे ! घर पहुंचते ही ''आदर-सत्कार'' जैसे मेरा इंतजार ही कर रहा होता था। ये टूटना इतना आम हो गया था कि हर बार घर से निकलते समय माँ की हिदायत होती थी कि ''चश्मा मत तुड़वा कर आना !'' मैं कोई जान बूझ कर थोड़े ही तोड़ता था......टूट जाता था !

मेरा बचपन करीब चार साल तक पंजाब में अपने दादा-दादी जी के साथ ही बीता था। सुना है कि उन्हीं दिनों मेरी आँखों में कोई बड़ा इंफेक्शन हो गया था ! उन दिनों चिकित्सा व्यवस्था इतनी व्यापक और उत्कृष्ट नहीं थी ! खैर जैसा भी था रोग पर काबू पा लिया गया। पर उसका दुष्परिणाम नजरंदाज हो गया या उसका पता ही नहीं चल पाया होगा ! फिर मेरा ''ट्रांस्फर'' कलकत्ता हो गया। उन दिनों पढ़ाई और स्कूलों की इतनी मारा-मारी नहीं थी। स्कूल भी कम और दूर-दूर हुआ करते थे। तब हम बंगाल के कोन्नगर में रहा करते थे। जब बाबूजी के कार्यस्थल से पांच-छह बच्चों का जत्था स्कूल जाने लायक हो गया तो हम सब एक-एक रिक्से में दो-दो जने लद रिसरा विद्यापीठ में जाने लगे। जो घर नौ-दस किलोमीटर दूर था। मेरा स्कूल में दाखिला चौथी कक्षा में हुआ था। उसके पहले की पढ़ाई घर पर ही हुई थी। इसलिए आँखों की खामी सामने नहीं आ पाई। 

रोज रात को सोने के पहले बाबूजी तरह-तरह से मुझे कुछ न कुछ सिखाया करते थे। उसमें एक कैलेण्डर की भी अहम भूमिका होती थी जो बेड के सिरहाने टंगा होता था। एक दिन उन्होंने मुझसे कैलेण्डर से संबंधित कुछ पूछा, तो मैं उठ कर उसके नजदीक जा देखने लगा ! इस पर उन्होंने इतना पास जा कर देखने का कारण पूछा तो मैंने बताया कि मुझे दूर से अक्षर साफ़ नजर नहीं आते ! बाबूजी को शंका हुई, आँखों का परिक्षण हुआ और उन्हें कमजोर पाया गया। जब मुझसे पूछा गया तो मैंने कहा कि मुझे लगता था कि सबको ऐसा ही दिखता होगा ! 
चश्मा तो लग गया साथ ही शुरू हो गयी उनकी बेहाली की कहानी भी ! उनका टूटना थमता ही ना था। ऐसे ही एक हादसे के बाद, एक बार चश्मा दिलाने मेरे वेद चाचाजी मुझे कलकत्ते के बहूबाजार, जो चश्मों का गढ़ होता था, ले गए और दूकान के शोकेस में सजे चश्मों को देख यूँही मुझसे पूछ लिया कि कौन सा फ्रेम अच्छा लगता है ! तो मैंने जिस ओर इशारा किया उसे देख वे हस पड़े और बोले ''धुत्त पगला'' ! और फिर उन्होंने मेरे इतिहास और चश्मे के भविष्य की परवाह ना कर मुझे एक अच्छा-खासा फ्रेम दिलवा दिया। दूकान से बाहर आ उन्होंने मुझसे पूछा की मैंने वह फ्रेम क्यों चुना था ? मैंने बताया कि मुझे लगा कि वह कानों को अच्छी तरह पकडेगा, जिससे झटके से गिरेगा नहीं, इसलिए ! बाद में गांधीजी वाले उस फ्रेम की बात सोच अक्सर हंसी आ जाती रही। 

आज चश्मा बहुत आम बात हो गई है। हर छोटे से छोटे बच्चे को भी लगा दिखता है। पर उन दिनों चश्मा लगना, कौतुहल और कमजोरी की निशानी माना जाता था। बड़े शहरों में तो उतना नहीं, पर छोटे शहरों-कस्बों में इसे पहनने वाला और वह भी बच्चा, अजूबा ही बन जाता था। मुझे भी इसके कारण कई बार बड़ी विचित्र स्थितियों का सामना करना पड़ा है। 

पंजाब तब सेहत का गढ़ माना जाता था। माँ के साथ एक-दो साल के अंतराल में जब भी वहां का चक्कर लगता तो ननिहाल में मेरा घर से निकलना दूभर हो जाता था। पहले दिन मुझ चश्माधारी को देख, आस-पड़ोस के बच्चे पता नहीं क्या मुनादी फिराते थे कि दूसरे दिन पता नहीं कहां कहां से ढेर सारे बच्चे हमारे घर के पास ऐसे इकठ्ठा हो जाते जैसे सर्कस में किसी नए जानवर को देखने आए हों ! मुझे देखते ही खुसुर-पुसुर शुरू हो जाती ''ओए ! निक्के जए मुण्डे नू ऐनक लग्गी ऐ !'' हंसी-ठिठोली-फब्तियां कसी जातीं ! मैं रुंआसा हो अंदर जाता तो मामा लोग आ कर उन्हें खदेड़ते।  बच्चे तो बच्चे, वहां बड़े भी मेरे चश्मे को लेकर माँ से ऐसे बात करते जैसे मुझे कोई बिमारी लग गई हो। 

आजआज ज़माना कितना बदल गया है ! चश्मे कहां से कहां पहुँच गए हैं ! व्यक्तित्व और सम्पन्नता की निशानी बन गए हैं ! विज्ञान ने इनमें तरह-तरह की विशेषताएं जोड़ दी हैं। गुणवत्ता ऊँचे दर्जे की हो गई है। अब ये टूटते नहीं, वैसे ही बदलने पड़ते हैं। ये जिंदगी का एक अभिन्न अंग ही बन गए हैं। बुद्धीजीवी होने का प्रमाण बन गए हैं। पर कहां भूलते है वह पुराने दिन ! वह टूटे चश्में, वह गांधी जी का फ्रेम, वह बच्चों की ठिठोली, ढीली निक्कर और भारी चश्मे को संभालने की कवायद, चश्मे के साथ आ जुडी उपमाऐं ! नहीं भूलती और ना भूलेंगी ताउम्र !! 

शनिवार, 1 अगस्त 2020

ये दर्द कब हद से गुजरेगा, कब दवा बनेगा

विडंबना हर बार की तरह यही है कि इस अभूतपूर्व संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाला, इस बार भी वही मध्यम वर्ग है, जो सदैव सारे देश को पालता, उसकी जरूरतें पूरी करता, हारी-बिमारी-मुसीबत में हर बार, हर तरह से उसके काम तो आता है. पर जिसकी कहीं, कभी कोई सुनवाई नहीं होती ! उसे बस निचोड़ा जाता है, सिर्फ निचोड़ा..........................!!






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मार्च 19 गुरुवार, अवाम को सम्बोधित करते हुए मोदी जी ने आने वाले 22 मार्च के रविवार को, प्रयोग के तौर पर आजमाए जाने वाले जनता कर्फ्यू में सहयोग करने को कहा ! आसन्न संकट की गंभीरता से अनजान लोगों ने इसे तफरीह के तौर पर ले बड़ी सहजता से सफल बना दिया। नब्ज समझते ही एक दिन बाद मंगलवार को उन्होंने फिर देश को संबोधित कर कोरोना वायरस के अभूतपूर्व संकट, उसकी कोई दवा न होने और सिर्फ संकल्प और संयम से खुद की सुरक्षा ही एकमात्र इलाज होने की बात बता, उसी मध्य रात्रि से यानी 24 मार्च से 21 दिनों के लॉकडाउन की घोषणा कर दी।









देश में ऐसे अवकाश का अनुभव लोगों को पहली बार हुआ था। बिना भविष्य की चिंता करे लोगों ने इसे हल्के तौर पर लिया ! कालोनियों, मोहल्लों, गलियों में अपने-अपने घरों की बालकनियों, छतों, खिड़कियों से लोगों ने एक-दूसरे के साथ संवाद और मनोरंजन के लिए तरह-तरह के उपाय ढूँढ निकाले ! रोज शाम को रौनक लगने लगी। इसी बीच दूसरे लॉकडाउन की घोषणा हो गई ! इंसान की फितरत है कि वह जबरदस्ती बंध के नहीं रह सकता। उसे खुलापन व आजादी चाहिए होती है। इस लंबी घर-बंदी से लोग अब ऊबने लगे ! शुरूआती उत्साह ठंडा पड़ने लगा ! जैसे-जैसे निष्क्रिय दिन-हफ्ते-महीने बढ़ते गए, वैसे-वैसे लोगों में बेचैनी, ऊब, हताशा, निराशा घर करने लगी। कई तो डिप्रेशन के शिकार भी हो गए !



   




  


 

बात सिर्फ निष्क्रियता से उपजी ऊब की नहीं थी ! धीरे-धीरे इस ''बंद'' का भयावह व डरावना रूप सामने आने लगा ! ठप्प व्यवसाय, नौकरी से छंटनी ! कुछ अपवादों को छोड़, हर तरफ से आमदनी की आवक अवरुद्ध होते ही अधिकांश घरों में चिंता का सन्नाटा पसरने लगा ! जमा-पूंजी हाथ की रेत के जैसे तेजी से फिसलती जा रही थी ! वैसे भी आज के हालात में मध्यम वर्ग की बचत होती ही कितनी है ! उसे रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने में दांतों पसीना आने लगा ! ऊँची दर के ब्याज पर या फिर जेवर गिरवी रख पैसे का जुगाड़ करने की नौबत आ चुकी थी ! फिर इस मुसीबत के ख़त्म होने का कोई निश्चित समय भी तो नहीं था कि इतने सप्ताह या महीनों के बाद इससे राहत मिल जाएगी ! कितना भी कोई आशावादी था इस संकट ने उसे बुरी तरह तोड़ कर रख दिया ! ऊपर से देख भले ही अंदाज ना लगता हो, पर अंदर ही अंदर हर इंसान चिंता-भय-आशंका से ग्रसित हो जल बिन मछली की तरह तड़प रहा है।

   


 



 





 

 

अब तक मार चौतरफा हो चुकी है ! बुरी तरह घिरे आम इंसान को बाहर बिमारी और भीतर बेरोजगारी पीसे जा रही है ! बिमारी तो एक तरफ उस पर होने वाले खर्च से वह और भी ज्यादा भयभीत व आतंकित है ! घर से ना निकलने पर उसके सामने भुखमरी का संकट मुंह बाए आ खड़ा हुआ है ! पर घर से निकलते ही कोई रोजगार मिल जाएगा, इसकी भी कहां कोई गारंटी है ! विडंबना हर बार की तरह यही है कि इस अभूतपूर्व संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाला, इस बार भी वही मध्यम वर्ग है, जो सदैव सारे देश को पालता, उसकी जरूरतें पूरी करता, हारी-बिमारी-मुसीबत में हर बार, हर तरह से उसके काम तो आता है. पर जिसकी कहीं, कभी कोई सुनवाई नहीं होती ! उसे बस निचोड़ा जाता है, सिर्फ निचोड़ा !!  




 


   




कहते हैं ना कि दर्द यदि हद से गुजर जाए तो फिर कोई दवा काम नहीं करती, दर्द खुद ही दवा बन जाता है। इसलिए यह बात तो साफ़ है कि इस बहादुर वर्ग को भी डर तभी तक सताएगा जब तक इसकी जेब और रसोई साथ देगी। जिस दिन दोनों रीत गए फिर इसे किसी हारी-बिमारी-कोरोना का डर नहीं रहेगा, चिंता रहेगी तो अपने परिवार की ! क्योंकि है तो वो एक पारिवारिक प्राणी ही !




 

 


गुरुवार, 30 जुलाई 2020

तब मैं भी उतने में बेचता हूँ

शीत युग की आहट से आशंकित गांव के सरपंच ने पूरे गांव की सुरक्षा के लिए फर्रुखाबाद का जरदोजी रफ़ल (शॉल) लेने की सोची। एक विश्वसनीय दूकान से 1670/- की दर से उसने अपनी जरुरत के हिसाब से खरीदी कर ली, जिसमें अतिरिक्त कलाकारी, कीटों से सुरक्षा तथा घर-पहुंच सेवा जैसी कई सुविधाएं भी सम्मिलित थीं..............!

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एक समय कहीं एक सुखी, समृद्ध व खुशहाल गांव हुआ करता था। पर वक्त की मार और अपनों की रार ने उसे बदहाली के रास्ते पर धकेल दिया। फिर समय ने करवट ली ! लोगों में जागरूकता आई ! अपने पैरों पर खड़े होने की ठानी गई ! परिवेश सुधरने लगा ही था कि प्राकृतिक व ईर्ष्यालु और द्वेषी पड़ोसियों जनित संकट सर पर आ खड़े हुए ! ऐसी घडी में भी कुछ बार-बार मुंहकी खाए, समाज से नकार दिए गए कुंठित लोग, अपनी धरती और अपने लोगों की सहायता करने की बजाए अपनी नाजायज हरकतों से बाज नहीं आ रहे थे। उन्हीं की एक आत्मघाती हरकत की बानगी !

''शीत युग'' की आहट से आशंकित गांव के सरपंच ने पूरे गांव की सुरक्षा के लिए फर्रुखाबाद का जरदोजी रफ़ल (शॉल) लेने की सोची। एक विश्वसनीय दूकान से 1670/- की दर से उसने अपनी जरुरत के हिसाब से खरीदी कर ली, जिसमें अतिरिक्त कलाकारी, कीटों से सुरक्षा तथा घर-पहुंच सेवा जैसी कई सुविधाएं भी सम्मिलित थीं। पर वर्षों से उसके एक दिग्भ्रमित विरोधी को, अपनी आदतानुसार इस सौदे में भी ठगाई और मूर्खता की बू आने लगी ! उसने हो-हल्ला मचाया कि रफ़ल की कीमत सिर्फ 526/- होनी चाहिए थी। सरपंच गड़बड़ कर रहा है ! अपनी बात सिद्ध करने वह उस दुकानदार के पास गया और पूछा कि कुछ दिनों पहले तुम्हारे बगल वाला विक्रेता इसे 526/- में बेच रहा था तुम तिगुनी कीमत ले रहे हो ! विक्रेता ने पलट कर पूछा, तो आपने उसी समय उससे क्यों नहीं ले लिया था ? वह बोला, उस समय उसके पास माल नहीं था ! दुकानदार ने हस कर कहा, ''सर जी ! जब मेरे पास भी माल नहीं होता तो मैं भी 526/- में ही बेचता हूँ !'' बार-बार लज्जित होने और हास्य का पात्र बनने के बावजूद ऐसे लोग अपनी कुंठा और पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं हो पाते ! द्वेषवश, अपने मान-सम्मान की चिंता छोड़ दूसरे को बदनाम करने के लिए कोई नया शगूफा तलाशने लगते हैं।  काश, ये अपनी बुद्धि, कौशल और अनुभवों को जनहित के लिए उपयोग में ला अपने गुम होते नाम, सम्मान और स्थान को फिर से पाने में अपने समय का सदुपयोग कर पाते !!  

सोमवार, 27 जुलाई 2020

शिव जी और उनका बाघम्बर

भगवान शिव का रूप-स्वरूप जितना आकर्षक है उतना ही रहस्यमय और विचित्र भी है। वे चाहे किसी भी रूप में रहें कुछ चीजें वे सदा धारण किए रहते हैं; जैसे, जटा, भस्म, चंद्र, सर्पमाल, डमरू, त्रिशूल, रुद्राक्ष, तथा  बाघम्बर ! उनका कुछ भी अकारण नहीं है। इन सब वस्तुओं की अपनी-अपनी खासियत और महत्व है। इनमें से बाघम्बर को छोड़ सभी की विशेषताएं तकरीबन सर्वज्ञात हैं ! पर यह व्याघ्रचर्म किसका है और कैसे प्राप्त हुआ यह कुछ अल्पज्ञात है, पर इसका उल्लेख पौराणिक कथाओं में उपलब्ध है..........!  

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सावन, भोलेनाथ का प्रिय समय ! इसी समय आकाश से अमृत और कैलाश से कृपा बरसती है ! देश-परिवेश, चहूँ ओर भक्ति से सराबोर हरियाली, खुशहाली, उल्लास का वातावरण ! प्रभु की कृपा पर जन-मानस भाव-विभोर हो उनकी वंदना-पूजा-अर्चना कर अपनी कृतज्ञता प्रदान करता है। सारा देश शिवमय हो उठता है ! उन्हीं की गाथा, उन्हीं की पूजा, उन्हीं का महिमा गान, उन्हीं की स्तुति ! भोले इतने कि ज़रा सी भक्ति पर खुश हो सबको कृतार्थ कर दें ! वरदान देते समय सुर-असुर-मानव-अमानव का भेद नहीं करते ! वे सभी देवी-देवताओं से हट कर हैं। उनका सौम्य और रौद्र, दोनों रूप सुप्रसिद्ध और पूजनीय हैं। ग्रंथों में उनका विस्तार पूर्वक वर्णन उपलब्ध है। 
भगवान शिव का रूप-स्वरूप जितना आकर्षक है उतना ही रहस्यमय और विचित्र भी है। वे चाहे किसी भी रूप में रहें, कुछ चीजें वे सदा धारण किए रहते हैं; जैसे, जटा, भस्म, चंद्र, सर्पमाल, डमरू, त्रिशूल, रुद्राक्ष, तथा बाघम्बर ! उनका कुछ भी अकारण नहीं है। इन सब वस्तुओं की अपनी-अपनी खासियत और महत्व है। इनमें से बाघम्बर को छोड़ सभी की विशेषताएं तकरीबन सर्वज्ञात हैं ! पर यह व्याघ्रचर्म किसका है और कैसे प्राप्त हुआ यह कुछ अल्पज्ञात है पर इसका उल्लेख पौराणिक कथाओं में उपलब्ध है। 

अति प्राचीन समय में जब अभी पृथ्वी के विकास का काम प्रगति पर था, तब शिव जी निरक्षण के लिए अक्सर भ्रमण पर निकला करते थे। वे ठहरे फक्कड़, भोले, तपस्वी, निर्लिप्त, निरपेक्ष ! तो वे दिगंबरावस्था में ही घूमते रहते थे। उनका वसन तो शुभ्र आकाश था। ऐसे ही में एक बार वे दारूकावन जा पहुंचे। जहां कुछ कर्म-कांडी लोग अपने परिवारों सहित वास करते थे। उनकी कर्त्वयपरायण पत्नियां उनकी दिनचर्या और उनके कर्मकांडों को पूरा करने में पूरी तरह समर्पित थीं। एक दिन उन स्त्रियों ने जंगल में ध्यानरत शिव जी को देख लिया ! उनके मोहक, बलिष्ठ, तेजोमय, दिव्य रूप को देख वे सब मोहग्रस्त हो गईं। आठों पहर वे शिव जी का ही ध्यान करने लगीं। उनके पास जाने और उन्हें देखने के लोभ में घर-द्वार सब भूल गईं। शिव जी इन सब बातों से पूरी तरह अनभिज्ञ थे ! वैसे भी उन्हें इन सब से कोई लेना-देना नहीं था। उधर जब घर के पुरुषों को अपनी स्त्रियों में आए बदलाव का कारण जंगल में निवस्त्र घूमते युवक के रूप में मिला तो वे सब आपे से बाहर हो गए। बिना सोचे-विचारे और जाने  कि वह युवक कौन है, क्रोध में मतिभ्रष्ट हो, उसे मारने के लिए उन्होंने जंगल की पगडंडी में एक गहरा गड्ढा खोद डाला और अपनी मंत्र शक्ति से एक विकराल शेर को उत्पन्न कर उसमें छोड़ दिया। पर शिव जी को उस शेर को मारने में पल भर का भी समय नहीं लगा। मरते हुए शेर ने, जो पूर्व जन्म में यक्ष था, शिव जी से सदा उनके पास रहने की याचना की ! शिव जी ठहरे औघड़ दानी ! उन्होंने उसे शिवलोक भेज उसके चर्म को अपना वसन बना लिया। तभी से वह व्याघ्रचर्म, बाघम्बर बन वसन और आसन के रूप में शिव जी द्वारा अपना लिया गया। 

इस घटना के बाद दारुका वनवासियों को शिव जी की असलियत का पता चला। उन सब ने उनकी शरण में जा अपनी गलतियों की क्षमा मांगी। भोले भंडारी ने सब को क्षमा कर भय मुक्त किया और अगली योनि में श्रेष्ठ मुनि-कुल में जन्म लेने का आशीर्वाद दे कैलाश की ओर प्रस्थान किया।   

शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

आदमी तो पहले से ही कन्फ्युजियाया हुआ है

पुराने मुहावरों लोकोक्तियों या उद्धरणों को, जो अलग-अलग समय में अलग-अलग विद्वानों द्वारा अलग-अलग समय और परिस्थितियों में दिए गए थे, यदि अब एक साथ पढ़ा जाए, तो कई बार विरोधाभास तो हो ही जाता है साथ ही कुछ हल्के-फुल्के मनोरंजन के पल भी उपलब्ध हो जाते हैं। ऐसे ही कुछ उद्धरण, बिना किसी पूर्वाग्रह या कुंठा के, उन आदरणीय व सम्मानित महापुरुषों से क्षमा चाहते हुए पेश हैं ! आशा है सभी इसे निर्मल हास्य के रूप में ही लेंगे ...........................!

#हिन्दी_ब्लॉगिंग     
''तूने रात बिताई सोय कर, दिवस बितायो खाय,......जन्म अमोल था कौड़ी बदले जाए !''   
* डॉक्टर कहते हैं कि स्वस्थ रहने के लिए सोना बहुत जरुरी है ?
:
"साईं इतनी दीजिए, जा में कुटुंब समाए, मैं भी भूखा न रहूं, साधू न भूखा जाए।"
वसुधैव कुटुम्बकम् ! तो कितने में कुटुंब समाएगा ? 
:
''करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान, रसरी आवत जात ते, सिल पर पड़त निसान।''
* पता नहीं कौन सुजान हुआ, सिल या रस्सी ?   
:
''काल करे सो आज कर, आज करे सो अब, पल में परलय होएगी, बहुरी करोगे कब।"
* जल्दी का काम तो शैतान का कहलाता है ?
:
"धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब-कुछ होए, माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होए।"
* फिर बहुरी कब होगी ?
:
"जो। ...उत्तम प्रकृति, का करी सकत कुसंग. चन्दन विष व्यापे नहीं, लिपटे रहत भुजंग।''
* जैसी संगति वैसा ही फल ! ओछे का संग तो अंगार जैसा होता है जो जलाता भी है और दाग भी छोड़ जाता है ? 
:
''बूढे तोते भी कहीं पढ़ते हैं।''
* सीखने की कोई उम्र नहीं होती ?
:
''भूखे भजन न होय गोपाला।''
* भगवान भी पेट भरा होने पर सूझता है ?
:
"बूँद-बूँद से घड़ा भरता है।''
* समय कहां है, इंसान का जीवन तो बुलबुले के समान है ?
:
''You are what you eat.''
* आलू, प्याज, पालक, पनीर ?
:
''It takes two to make a quarrel.'' 
* एक से दो भले ?
:
''A honey tongue, a heart of gall.''
* मीठी बानी बोलिए ?
:
''Cut your coat according to your cloth."
* बे-माप, पहना कैसे जाएगा ?
:
''Silence is the best.''
* बिना रोए तो माँ भी दूध नहीं पिलाती ?
:
''A Little Knowledge Is a Dangerous thing."
* ढाई अक्षर प्रेम का पढ़े सो पंडित होए ?

बुधवार, 22 जुलाई 2020

व्यवसाय, डर व भय का

अलग-अलग समय या आयु में डर भी तरह-तरह का होता है। बचपन में शरारत, हठ या कहना ना मानने पर ''आने दो पापा को'' कह कर अनजाने में पहली बार रोपित किया गया ! किशोरावस्था में कुछ खो जाने, पिछड़ जाने, माँ-बाप से बिछुड़ने का या अवचेतन में दफ़न किसी बात का ! युवावस्था में अनिश्चितता का, रोज़गार का, परिवार की खुशहाली का, माँ-बाप की सेहत का, अंधविश्वासों का ! और फिर प्रौढ़ा या वृद्धावस्था में तो जैसे भय, खौफ, आशंकाओं की बाढ़ सी ही आ जाती है, जिसमें मृत्यु की अवधारणा सबसे बड़ा डर होता  है  ..................! 
 
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डर ! एक भावना है। किसी संभावित खतरे की उपस्थिति या आभास की वजह से दिलो-दिमाग व शरीर पर भी असर डालने वाले ख्यालों या विचारों की श्रृंखला को डर कहा जा सकता है। जो अन्य भावनाओं की तरह जन्म के साथ प्राणियों को नहीं मिलती, उसका रोपण समय के साथ-साथ होता या करवाया जाता है ! जो जन्म भर किसी संभावित खतरे की आशंका के रूप में सभी प्राणियों में स्थाई रूप से दिलो-दिमाग में स्थापित हो जाता है और अधिकतर जीवन इस पर पार पाने में ही गुजर जाता है। इंसान डरता ही रहता है कभी अनहोनी से, कभी परिवार के अनिष्ट से, कभी आर्थिक संकट से पर मृत्यु की अवधारणा उसका सबसे बड़ा डर होता है।

इंसान को जब किसी चीज से जोखिम महसूस होता है तो डर की भावना बढ़ जाती है ! जोखिम की आशंका किसी भी रूप में हो सकती है, चाहे वह स्वास्थ्य हो, धन हो या अपनी या परिवार की सुरक्षा हो ! वैसे अलग-अलग समय या आयु में डर भी तरह-तरह का होता है। बचपन में शरारत, हठ या कहना ना मानने पर ''आने दो पापा को'' कह कर अनजाने में पहली बार रोपित किया गया ! किशोरावस्था में कुछ खो जाने, पिछड़ जाने, माँ-बाप से बिछुड़ने का या अवचेतन में दफ़न किसी बात का ! युवावस्था में अनिश्चितता का, रोज़गार का, परिवार की खुशहाली का, माँ-बाप की सेहत का, अंधविश्वासों का ! और फिर प्रौढ़ा या वृद्धावस्था में तो जैसे भय, खौफ, आशंकाओं की बाढ़ सी ही आ जाती है ! 

दुनिया में शायद ही कोई ऐसा शूरवीर हो जो किसी भी चीज से ना डरता हो। पर ऐसे लोग बेशुमार हैं जो अपने डर को दरकिनार कर दूसरों की इस कमजोरी का भरपूर लाभ उठाते हैं। आज के समय में समाज के हर तबके में भोले-भाले लोगों को बेवकूफ बना ऐसे लोग अपना उल्लू सीधा करने में जुटे हुए हैं। बच्चों को फेल होने का भय दिखला, कोचिंग जैसे व्यापार में लगे ''गुरु'' ! मौत का डर दिखा अपनी जिंदगी संवारते ''डॉक्टर'' ! भगवान का, काल्पनिक सुख का या यंत्रणाओं का खौफ दिखा भोले-भाले लोगों को बरगलाते, धार्मिकता का चोला पहने, अपने को ऊपरवाले का प्रतिनिधि बताते ''ढोंगी'' ! मानव की कमजोरियों का फ़ायदा उठा उल्टे-सीधे-गैर जरुरी उत्पाद बेचते मौकापरस्त-अवसरवादी व्यापारी ! सभी तो लगे हुए हैं डरे हुओं को और डराने में ! मनुष्य की एक छोटी सी कमजोरी ''डर'' दुनिया में अरबों-खरबों का व्यवसाय बन चुकी है ! आम इंसान डर-डर के इतना डर गया है कि अपने को लूटने वालों की असलियत जानने में भी डरने लगा है ! उसके डर को भुना चंट लोग उसे ही डराने में लगे हुए हैं। डरना एक आम इंसान की फितरत बन चुकी है ! अभी तो राजनीती और न्याय व्यवस्था वाला डर अलग ही खड़ा हुआ है, उसकी तो बात ही नहीं की गई !

ज्यादातर किसी भय का कारण बीते समय में हुई किसी अप्रिय घटना का ही परिणाम होता है, इसी लिए बच्चों में इसका अभाव रहता है। पर डर सिर्फ अप्रिय या नकारात्मक भावना ही नहीं है। इसकी अच्छाई भी है। इसी के कारण व्यक्ति या अन्य प्राणी समय-समय पर अपनी रक्षा भी कर पाते हैं।इसीलिए जीवन के बहुमुखी विकास के लिए व्यक्तित्व में आटे में नमक बराबर डर का होना भी जरूरी है। पर समस्या तब शुरू हो जाती है जब इंसान बिना किसी वजह के डरने लगता है। तब उसकी इस कमजोरी से उसका सारा परिवेश ही प्रभावित हो जाता है। अति तो हर चीज की खराब ही होती है ! फिर चाहे वह आक्सीजन ही क्यूँ ना हो !

डर से छुटकारा पाने या बचने के उपाय तो अनुभवी चिकित्सक, योगगुरु या चिंतक बताते ही रहते हैं। उन्हीं में से किसी एक की सलाह मान अपने ''अतिरिक्त भय'' से छुटकारा पाया जा सकता है। पर सबसे अच्छा उपाय इससे भागना नहीं बल्कि सामना करना ही है। क्योंकि अधिकतर डर बेबुनियाद ही होते हैं। 

बुधवार, 15 जुलाई 2020

जहां ना-लायक भी लायक सिद्ध हो जाते हैं

राजनीति हमारे देश में एक ऐसा व्यवसाय बन गई है, जहां ना-लायक को भी लायक सिद्ध कर उसका जीवन सुरक्षित और संवारा जा सकता है ! नैतिकता, मर्यादा, विवेकता, सहिष्णुता, गरिमा, आदर-भाव सब सिर्फ संविधान की पुस्तक के लिए छोड़ दिए गए हैं, ऐसे अनेकों उदहारण हैं ! इन सब से अवाम ने झटका तो खाया, पर दिलो-दिमाग पर वर्षों से काबिज सम्मोहन का कोहरा फिर भी पूरी तरह छंट नहीं पाया ! इसीलिए वह परिवारों के झूठे-सच्चे इतिहास, कुर्बानियों की कपोल कल्पित कथाओं, नेताओं के थोथे वादों और उनके छद्म प्रभामंडलों के आलोक में अपना भविष्य टटोलने में लगा ही रहा ! पर फिर साक्षरता से कुछ समझ, समझ से कुछ जागरूकता आई ! धर्म, जाति, भाषा, इतिहास के नाम पर बिछाए गए इंद्रजाल छिन्न-भिन्न हुए ! सच्चाई का सूरज तपा तो कुछ जर्जर छत्रप भी ढहे ! लोगों को भी समझ आया कि देश है तभी हम हैं, देश नहीं तो कुछ भी नहीं....................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
एक वह भी समय था, जब अदना सा कार्यकर्ता भी अपनी पार्टी के प्रति पूरी तरह समर्पित और अपने नेता के लिए निष्ठावान हुआ करता था। यह स्वस्फूर्त भावना होती थी। जो अपने नेता के त्याग, समर्पण, निस्वार्थ और सच्चरित्रता जैसे गुणों को देख स्वत: उत्पन्न होती थी। दल बदलने का तो सपने में भी ख्याल नहीं आ पाता था। आम जन को जब लगता था कि अमुक इंसान देश और समाज की भलाई के लिए कुछ भी कर सकता है तो वह उसका मुरीद हो जाता था। उसकी गलतियों, उसकी कमियों को नजरंदाज कर दिया जाता था। सारी जिम्मेवारी उसे सौंप निश्चिन्त हो लिया जाता था। पर कोई भी चीज स्थाई कहां होती है ! समय भी बदला, लोग भी बदले, तो सोच बदलनी ही थी !  

राजनीति हमारे देश में एक ऐसा व्यवसाय बन गया है, जहां ना-लायक को भी लायक बना उसका जीवन सुरक्षित और संवारा जा सकता है ! इसलिए सत्ता देश की भलाई के बदले परिवारों के उसरने का, पीढ़ियों को तारने का जरिया बन गई ! येन-केन-प्रकारेण उसे हथियाया जाने लगा। तरह-तरह के लोग नेता बन गए ! नैतिकता, मर्यादा, विवेकता, सहिष्णुता, गरिमा, आदर-भाव सब संविधान की पुस्तक के पन्नों में जा दुबके ! अवाम को झटका तो लगा पर वर्षों से दिलो दिमाग पर काबिज सम्मोहन पूरी तरह छंट नहीं पाया ! बार-बार हताशा, निराशा, धोखा पाने के बावजूद वह, परिवारों के झूठे-सच्चे इतिहास, कुर्बानियों की कपोल कल्पित कथाओं, नेताओं के थोथे वादों और उनके छद्म प्रभामंडलों के आलोक में अपना भविष्य टटोलने में लगी रही ! पर कब तक !     

समय के साथ पीढ़ीयां बदलीं। साक्षरता से समझ, समझ से जागरूकता आई ! लोगों को अपने भले-बुरे का ज्ञान होने लगा ! धर्म, जाति, भाषा, इतिहास के नाम पर रोटियां सेकने वालों के ढाबे बंद होने लगे ! कई-कई इंद्रजाल छिन्न-भिन्न हो गए ! अच्छाई का सूरज तपा तो जर्जर छत्रप ढहने शुरू हो गए ! लोगों को भी समझ आ गया कि देश है तो हम हैं, देश नहीं तो कुछ भी नहीं ! 

पर अभी भी सपूर्ण क्रान्ति नहीं हुई थी ! कुछ जरासीम समूल नष्ट नहीं हुए थे ! उनके थके-हारे, लुटे-पिटे, हाशिए पर धकेल दिए गए मठाधीश पूरा जोर लगा रहे हैं, अवाम को बरगलाने के लिए ! उधर वर्षों की राजशाही का खुमार उतारे नहीं उतर रहा ! अभी भी अवाम और अपने कार्यकर्ताओं को निजी सम्पत्ति ही माना जा रहा है। किसी का ज़रा सा भी विरोध या महत्वाकांक्षा उसको नेस्तनाबूद करवाने का जरिया बन गया है। धीरे-धीरे हर अच्छे-बुरे कर्मों के राजदार, खुर्राट, मौकापरस्त, मतलबी, अवसरवादी, उम्रदराज दरबारी हावी होते चले जा रहे हैं ! कर्मठ, समर्पित, निष्ठावान लोगों को अपमानित-प्रताड़ित कर बाहर का रास्ता दिखाया जाने लगा है ! क्योंकि ऐसे कर्मशील लोग ही आगे जा कर इन लोगों की असलियत का पर्दा फाश कर जनता के प्रिय बन सकते थे। इनके सरपरस्त भी इन जैसे खुदगर्जों, चारणों, पिछलग्गुओं की चारदीवारी में खुद को घिरवा अपने को सुरक्षित, पाक-साफ़ मान बैठे हैं ! हकीकत से दूर घेरे के अंदर वे वही देखते-सुनते हैं जो दिखलाया, सुनाया, समझाया जा रहा है ! जो कर्णप्रिय हो, सुहाता हो, मन लायक हो ! इतिहास गवाह है कि यह स्थिति सदा विनाश करवा कर ही हटी है।  

समय को अपना गुलाम समझ ऐसा करने वाले इस तरह के खुर्राट लोग यह भी जानते हैं कि यह सब ज्यादा दिन चलने वाला नहीं है, सो अपनी आने वाली नसलों के लिए जितना लाभ उठाया जा सकता है उठाए जा रहे हैं ! पर यह भूल जाते हैं इनके पहले भी जब ऊपर वाले की लाठी पड़ी थी तो उसमें भी आवाज नहीं आई थी ! पर यदि कोई सबक लेना ही ना चाहे तो..............!! 

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