pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

सोमवार, 12 अगस्त 2019

शिव मंदिर, जटोली का

हिमाचल के सोलन जिले के जटोली इलाके में स्थित है,भगवान शिव का एक अनूठा मंदिर ! यह मान्यता  चली आ रही है कि पौराणिक समय में भगवान शिव यहां आए थे और कुछ समय यहां रह कर उन्होंने विश्राम किया था। उस समय उन्होंने अपनी जटाएं भी खोल रखी थीं जो उन्मुक्त हो लहराती रहती थीं। इसीलिए उन जटाओं पर इस जगह का नाम जटोली के रूप में विख्यात हुआ .............! 
सावन के पावन समय पर विशेष !

#हिन्दी_ब्लागिंग 
हिमालय को सदा देवभूमि माना जाता रहा है। ऐसा अटूट विश्वास है कि यहां कण-कण में भोले भंडारी का वास है। इसीलिए इस क्षेत्र में विश्व विख्यात शिव धाम तो हैं ही उनके साथ-साथ और भी, लोगों की आस्था के प्रतीक, हजारों शिव मंदिर विद्यमान हैं। इनमें से कुछ ऐसे भी हैं, जो अपने आप में विशेष होते हुए भी अभी देश के दूसरे हिस्सों में उतना प्रख्यात नहीं हो पाए हैं ! ऐसा ही एक मंदिर है, हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले में स्थित जटोली का दक्षिण-द्रविड़ शैली में निर्मित शिव मंदिर। इसके 111 फीट ऊँचे गुंबद पर अभी हाल ही में 11 फुट लंबा स्वर्ण कलश चढ़ाया गया है। इससे मंदिर की ऊंचाई करीब 122 फुट तक हो गयी है। इसी कारण इसे एशिया का सबसे ऊंचा मंदिर माना जाता है। शिल्प-कला के इस बेजोड़ भवन को बनाने में करीब 39 साल का समय लगा है। अभी भी कुछ ना कुछ निर्माण चल ही रहा है। जल्द ही यहां17 लाख रुपए की लागत के स्फटिक शिवलिंग की स्थापना और प्राण प्रतिष्ठा की जाने की योजना है।

सोलन-राजगढ़ मार्ग पर सोलन शहर से 7 किलोमीटर की दूरी पर एक स्थान पड़ता है, जटोली ! वहीं से मंदिर तक छोटे वाहनों के आवागमन के लिए सड़क बनी हुई है, जो तक़रीबन समुद्रतल से 1320 मीटर की ऊंचाई पर बने इस शिव मंदिर तक पहुंचाती है। वहां से सौ सीढ़ियां चढ़, मंदिर के मंडप से मुख्यद्वार तक जा, भीतर गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग के दर्शन किये जाते हैं। भीतर स्फटिक मणि शिवलिंग के साथ शिव और पार्वती जी की मूर्तियाँ भी स्थापित की गई है | मंदिर के शिखर पर चार किलो सोने का 11 फुट लम्बा कलश मंदिर के सौदर्य में चार चाँद लगाता  हुआ दिखता है। मंदिर के प्रवेश द्वार के ऊपर गणेश जी तथा शेष नाग की प्रतिमाएं बनी हुई हैं, जिन्हें पीले और हरे रंग के कलशों से सुशोभित किया गया है। मंदिर के प्राँगण में जगह-जगह अन्य देवी-देवताओं की कलात्मक प्रतिमाओं के साथ-साथ कई त्रिशूल भी लगे मिलते हैं। मंदिर के पीछे का भाग अन्य भागों से ऊँचा है। मंदिर के उतरी छोर पर प्राकृतिक जलस्त्रोत है जिसके जल को औषधीय तत्वों से पूर्ण अति निर्मल और पवित्र माना जाता है। इसके बारे में कहा जाता है कि बहुत पहले कहीं से घूमते-घामते एक साधू महाराज यहां आ कर गुफा में रहने लगे। स्थानीय लोग एक बार उनकी परीक्षा लेने के लिए  लिए गुफा के आसपास छिप गये लेकिन थोड़ी देर बाद उन्हें गुफा से एक अजगर कि हुंकार सुनाई दी जिसके कारण वे डर गये और अपनी रक्षा हेतु उनसे अपनी  भूल के लिए क्षमा याचना की।  उस साधू ने कई सालो तक यहाँ तप किया। उस समय जटोली में पानी की बहुत तंगी थी ! कहते हैं उसी साधू ने अपने चिमटे को धरती पर मारकर पानी की यही निर्मल धारा निकाली थी जो कभी सूखती नहीं है। 

 यह मान्यता चली आ रही है कि पौराणिक समय में भगवान शिव यहां आए थे और कुछ समय यहां रह कर उन्होंने विश्राम किया था। उस समय उन्होंने अपनी जटाएं भी खोल रखी थीं जो उन्मुक्त हो लहराती रहती थी। इसीलिए उन जटाओं पर इस जगह का नाम जटोली के रूप में विख्यात हुआ। इस मंदिर के निर्माण और परिकल्पना के पीछे स्वामी कृष्णानंद परमहंस जी का उद्यम है। उनके मार्गदर्शन और दिशा-निर्देश पर ही जटोली शिव मंदिर का निर्माण शुरू हुआ। जिन्होंने इसका शिलान्यास वर्ष 1974 में किया था, पर जिसका निर्माण कार्य वर्ष 1983 में जाकर आरम्भ हो पाया। जो 39 वर्षो कि लम्बी अवधि के पश्चात 24  जनवरी, 2013 को स्फटिक शिवलिंग स्थापित होने पर पूर्ण हुआ।  मन्दिर निर्माण पर करोडो रूपए व्यय हुए जिनका इंतजाम प्रभु भगतों और आस्थावानों के सहयोग से ही संभव हो सका। मंदिर में, 1983 में ब्रह्मलीन हुए स्वामी कृष्णानंद की गुफा भी स्थित है, जहां बैठ कर वे शिव आराधना किया करते थे।
महाशिव रात्रि के पावन पर्व पर यहां मंदिर कमिटी की ओर से भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है, जो सारी-सारी रात चलता है। इसके साथ ही विशाल भंडारा भी होता है। दूर-दूर से श्रद्धालुगण यहां आ पूजा-अर्चना कर अपनी मनोकामना की पूर्ती की प्रार्थना करते हैं। देश के किसी भी कोने से यहां दिल्ली या चंडीगढ़ होते हुए आराम से पहुंचा जा सकता है। 

गुरुवार, 8 अगस्त 2019

एक बोध कथा का एक्सटेंशन


क्या किया जाए कुछ समझ नहीं आ रहा था। रास्ते से गुजरने वाले वाहनों से गाडी को ''टो'' करने की गुजारिश की गयी पर एक तो बैल गाडी, ऊपर से पुरानी, कोई भी साथ ले चलने को राजी नहीं हुआ ! इनको नकारा देख, साथ के संगी-साथी भी एक-एक कर, जिसको जहां, जैसे, जो सुविधा मिली उसे ले, इनको छोड़ आगे बढ़ गए। अब काफिले में वो ही मजबूर लोग रह गए जिनका व्यापारी को छोड़ और कोई ठौर-ठिकाना या उपार्जन का अन्य साधन नहीं था। सूरते हाल यह था कि मालिक खड़े हो, आँखों पर हाथ रखे दूर-दूर तक नजर दौड़ा रहा था कि कोई घोड़ा-गदहा-टट्टू दिख जाए जिससे गाडी आगे रेंग सके..................!

#हिन्दी_ब्लागिंग
एक बार कारोबार में अत्यंत नुक्सान होने की वजह से अपना सब कुछ गंवा बैठे एक बड़े व्यापारी ने, मजबूरी में दूसरे ठाँव, अपने जान-पहचान के लोगों के पास जा कर भाग्य आजमाने निश्चय किया। प्रस्थान वाले दिन अपना बचा-खुचा सामान एक बैल गाडी पर लाद, अपने परिवार, सेवकों और अपने पर आश्रित कुछ लोगों के साथ उसने अपनी यात्रा शुरू की। इनके साथ इनके दो-तीन पालतु कुत्ते भी थे।

रुकते-चलते जब दोपहर सर पर चढ़ आई तो मालिक ने कुत्तों को धूप से बचाने के लिए उन्हें बैल गाडी के नीचे छाया में कर दिया। ा नीचे छाया में चलते हुए कुत्तों को यह लगा कि मालिक ने गाडी की सारी जिम्मेदारी उन्हें सौंप दी है और अब वे ही गाडी को चला रहे हैं। ऐसा ख्याल आते ही वे फूल कर कुप्पा हो गए ! अचानक मिले इस तथाकथित सम्मान से गर्वित हो उनका सारा शरीर तन गया और वे ऐंठ कर गाडी के नीचे चलने लगे।

शाम के बाद जब अंधियारा घिरने लगा तो काफिले को रोक दिया गया। सब अपनी थकान दूर करने और भोजन=पानी का इंतजाम करने में जुट गए। बैलों को भी गाडी से खोल कुछ दूर बांध, चारा-पानी दे दिया गया। इसी बीच अंगड़ाइयां लेते कुत्ते भी गाडी के नीचे से बाहर आ इधर-उधर घूमने लगे। अचानक उन्होंने कुछ दूरी पर बैलों को चारा-पानी खाते देखा तो इनका पारा चढ़ गया कि सारे रास्ते गाडी हम ढ़ोते आए और मजा ये कर रहे हैं। बस फिर क्या था ! दोनों-तीनों लपक कर बैलों के पास पहुंचे और लगे भौंक-भौंक कर अपना गुस्सा जताने ! पहले तो कुछ देर बैल शांत रहे पर आखिर उनको भी तैश आ गया और उन्होंने फुंफकार कर जोर से अपना सर इनकी तरफ घुमाया, कुत्ते तो खैर बच लिए पर बैलों के जोर के झटके से उनका पगहा टूट गया ! बंधन से आजाद होते ही दोनों बैल ये गए वो गए ! और हमारे वीर श्वान पुत्र अपनी जीत के घमंड में इतराते वापस आ गए।

सुबह हुई। जब नित्य-कर्मों से फारिग हो चलने का समय आया, तो बैल गायब ! सब परेशान ! चारों ओर तलाशा गया पर कहीं कोई सुराग नहीं ! खोज-खाज कर सब जने हार-थक कर बैठ गए ! क्या किया जाए कुछ समझ नहीं आ रहा था। रास्ते से गुजरने वाले वाहनों से गाडी को ''टो'' करने की गुजारिश की गयी पर एक तो बैल गाडी, ऊपर से पुरानी, कोई भी साथ ले चलने को राजी नहीं हुआ। कुत्तों को समझ नहीं आ रहा था कि परेशानी क्या है वे गाडी के नीचे खड़े थे उसे ले चलने के लिए ! मालिक ने जब उन्हें नीचे छिपते देखा तो उसे उनका रात का भौंकना भी याद आ गया ! वह समझ गया कि बैल इनके परेशान करने की वजह से ही भागे हैं ! उसने इनको पकड़ा और उसी चाबुक से, जिससे बैलों को हांका जाता था, वो छितरैल की, वह छितरैल की, कि तीनों की भौं-भौं, क्याऊं-क्याऊं में बदल गयी और तो और अब वे बैठने के लायक भी नहीं रहे !

इधर चलने की कोई सूरत नजर ना आने पर, इनको नकारा देख, साथ के संगी-साथी भी एक-एक कर, जिसको जहां, जैसे, जो सुविधा मिली उसे ले, इनको छोड़ आगे बढ़ गए। अब काफिले में वो ही मजबूर लोग रह गए जिनका व्यापारी को छोड़ और कोई ठौर-ठिकाना या उपार्जन का अन्य साधन नहीं था। सूरते हाल यह था कि मालिक खड़े हो, आँखों पर हाथ रखे दूर-दूर तक नजर दौड़ा रहा था कि कोई घोड़ा-गदहा-टट्टू दिख जाए जिससे गाडी आगे रेंग सके ! साथ के लोग इसलिए खड़े थे क्योंकि मालिक खड़ा था और कुत्ते इसलिए क्योंकि वे तो बैठने से ही मजबूर थे !

शनिवार, 3 अगस्त 2019

मिलना ''मैं गाय जैसे'' (मैग्सेसे) पुरस्कार का

''भैया; बताइये ना ! भले ही उतना समझ ना पाएं पर गर्व से अपना छाती तो फुल्लइये सकते हैं  ! ई तो हमरे देशो के लिए गर्व का बात जो है।'' 
चैतू मुंह बाए सब सुनता रहा ! कुछ देर बाद उसने पूछा , ''तो भैया ! जो आज सब नाच रहा है, ई लोग भी तो इसी देश का आदमी है ! तो ई लोग तब काहे नहीं खुस हुआ ?

#हिन्दी_ब्लागिंग  
सुबह -सुबह चाय वगैरह से निपटा ही था कि ठाकुर जी की रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं की दूकान से घर-पहुँच सेवा के तहत उनका सहायक चैतू कुछ सामान पहुंचाने आ गया। सामान रखने के बाद जाते समय मेरे पास आ खड़ा हुआ। मैंने उसे देखा और पूछा ''क्यों चैतू कैसे हो ?''

''ठीक हूँ भईया ! आपसे एकठो बात पूछना था !''

''बोलो ! क्या बात है ?''
   
''भैया, ये ''मैं गाय जैसे'' पुरस्कार क्या होता है ?

मेरा एक बार तो चौंकना स्वाभाविक था, पर इतने दिनों से चैतू को जानने, उससे बतियाते रहने के कारण जल्दी ही समझ में आ गया उसका प्रश्न !

फिर भी पूछ लिया "कहां देखा यह सब ?"

"फेसबुक पर। बहुते लोग एकर बारे में बतिया रहा है।"

''अरे बुड़बक ! वो मैग्सेसे पुरस्कार है ! जो हमारे एक पत्रकार को मिला है। फिलीपींस देश का नाम सुने हो ? वहीं से इसका विजेता चुना जाता है।''

''अरे वाह भईया जी ! बहार का देश हमरे आदमी को समानित किया ! ई तो बहुते अच्छा बात है। ई का बहुत बड़ा इनाम होता है ?''

"हाँ, भाई ! एशिया के लोगों और वहां की संस्थाओं को बढ़िया और उल्लेखनीय काम करने पर उन्हें  इस इनाम के लिए चुना जाता है। दुनिया का सबसे प्रसिद्ध नोबेल पुरुस्कार सुने हो ? समझो, यह एशिया का नोबेल पुरस्कार की तरह है। इसका मिलना हम सबके लिए बड़े गर्व की बात है।''

''तभिएं !! हरदम दुखी और गरियाने वाला लोग भी आज बहुते खुस नज़र आ रहा है। बद्धियो दे रहा है सबको। अच्छा भैया; का पहले भी ऐसा पुरूस्कार हम लोगन को मिला है ?''

''अरे, बहुत बार। हमारे देश में गुणी, ज्ञानी, प्रतिभाशाली लोगों की कोई कमी नहीं है। हमें दुनिया भर के तरह-तरह के सम्मान मिलते रहे हैं। अभी तो हमारे एक ही माननीय को दसियों देश अपना सबसे बड़ा पुरूस्कार दे चुके हैं।'' 

''दसियों ? कऊन-कऊन सा ?"

''अरे, तुम अपना नाम तो बोल नहीं पाते ! वह सब कहां समझोगे !''

''नहीं भैया; बताइये ना ! भले ही बोल ना पाएं पर छाती तो फुल्लइये सकते हैं ! ई तो हमरे देशो के लिए गर्व का बात जो है।''

मजबूरन उसे बताना पड़ा कि बहुत कम समय में हमारे देश के एक ही आदमी को दुनिया के अलग-अलग देशों ने अपने-अपने सर्वोच्च पुरुस्कारों, जैसे, *जायेद मैडल पुरुस्कार, *फिलिप कोटलर पुरूस्कार, *सियोल शांति पुरूस्कार, *चैंपियंस ऑफ द अर्थ पुरुस्कार, *सेंट एंड्रूयज़ पुरूस्कार, *फिलिस्तीन ग्रैंड कॉलर पुरूस्कार, *आमिर अमानुल्लाह खान पुरूस्कार, *किंग अब्दुल सैश पुरूस्कार इत्यादि इत्यादि, से नवाजा है ! कई पुरूस्कार तो पहली बार किसी भारतीय को मिले हैं।  यह भी एक रेकॉर्ड ही है !'' 

चैतू मुंह बाए यह सब सुन रहा था ! कुछ देर बाद उसने पूछा ''तो भैया ! जो आज सब नाच रहा है, ई लोग भी तो इसी देश का आदमी है ! तो ई लोग तब काहे नहीं खुस हुआ ?''

अब मेरी बारी थी चैतू का मुंह तकने की !     

शुक्रवार, 26 जुलाई 2019

आज भी चल रही है 'एक 'घोड़ा ट्रेन''

यह गाडी इतनी सुविधाजनक और लोकप्रिय हो गयी कि हर कोई इसकी सवारी करने लगा। इसलिए एक की बजाए दो गाड़ियां चलने लगीं। आमने-सामने आ जाने पर पड़ने वाली मुश्किल का आसान सा हल निकाल लिया गया। जब बीच रास्ते में दो गाड़ियां मिलतीं तो ''मुसाफिर'' ट्रालियों को बदल लेते ! गाड़ीवान भी अपने-अपने घोड़ों का रुख दूसरी तरफ कर विपरीत दिशा में अग्रसर हो जाते ...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग
वर्तमान समय में घोड़े द्वारा खींचे जाने वाले वाहन "इक्का, तांगा या बग्गी" बीते दिनों की बात हो चुके हैं। यदि गाहे-बगाहे कहीं दीखते भी हैं तो मनोरंजन, तफरीह या शादी-ब्याह में ! लेकिन यह जान कर आश्चर्य होगा कि हमारे पड़ोसी मुल्क यानी पाकिस्तान में अभी भी लाहौर से करीब सौ की.मी. दूर, घोड़े की सहायता से एक परिवहन सेवा चलाई जा रही है। इस ''सुविधा'' को हॉर्स ट्रेन या घोडा रेल के नाम से जाना जाता है। जो रेल की तर्ज पर पटरियों पर तकरीबन तीन की.मी. तक चल, लोगों को अपने गंतव्य तक पहुंचाती है। इस घोडा-रेल की शुरुआत करीब 100 साल पहले जाने-माने व्यवसायी सर गंगाराम ने की थी | आजकल इसका वीडियो सोशल मीडिया पर काफी देखा और पसंद किया जा रहा है। इसका प्रसारण पाकिस्तान टी.वी. पर अनेकों बार हो चुका है, जिसके फलस्वरूप बाहर से इसे देखने आने वालों का तांता गंगापुर में लगा ही रहता है।
https://youtu.be/9uMhbzNUdlU


राय बहादुर सर गंगाराम  एक प्रसिद्ध इंजिनियर उद्यमी, और साहित्यकार थे।  अपने कपडे के व्यवसाय से लाहौर शहर को हर क्षेत्र में व्यापक सहयोग देने, उसे संवारने, उसे समृद्ध बनाने के अपने उपक्रम के कारण उन्हें ''आधुनिक लाहौर के पिता'' का उपनाम दिया गया था।  दिल्ली में भी अस्पतालों की कमी को देखते हुए 1951 में उनकी याद में एक सर्व-सुविधा युक्त अस्पताल बनाया गया, जिसे गंगाराम हॉस्पिटल के नाम से जाना जाता है। 
  
वे एक बेहतरीन इंजिनियर तो थे ही ! जब उन्होंने अपने क्षेत्र में लोगों को आवागमन की असुविधाओं से जूझते देखा तो उनके दिमाग में एक अनोखी और अद्वितीय परिवहन योजना ने जन्म लिया। वह थी, आज भी चल रही अनोखी घोड़ा ट्रेन सुविधा ! जिला लीलपुर (अब फैसलाबाद) की तहसील जारनवाला में, अपने गांव गंगापुर से बुकियाना रेलवे स्टेशन (लाहौर-जारनवाला रेलवे लाइन पर) तक उन्होंने दो फिट चौड़े रास्ते पर लकड़ी के तख्ते बिछवा कर उस पटरियां लगवा दीं। फिर एक ठेले जैसी ट्रॉली में, पटरी पर चल सकने लायक चक्के फिट कर उसे ट्रैक पर रखवा दिया ! इंजिन की जगह घोड़े का इस्तेमाल किया गया और इस तरह शुरू हो गयी दुनिया की अजीबोगरीब, इकलौती घोडा रेल। पटरियों पर चलने के कारण घोड़े को कम जोर लगाना पड़ता था और सड़क के तांगे वगैरह की बनिस्पत इस ठेले पर एक बार में ज्यादा लोग सफर कर सकते थे। घोड़े को ठोकर इत्यादि से बचाने के लिए तख्तों पर मिटटी डाल उसे अच्छी तरह समतल कर दिया गया था। फिर एक सोसायटी बना इसकी सारी जिम्मेदारी उसे सौंप दी गयी, जो नाम मात्र का शुल्क ले इसकी सेवा लोगों को उपलब्ध करवाने लगी। स्थानीय लोगों में यह अनोखी सवारी के नाम से मशहूर हो गयी।  

यह गाडी इतनी सुविधाजनक और लोकप्रिय हो गयी कि हर कोई इसकी सवारी करने लगा। इसलिए एक की बजाए दो गाड़ियां चलने लगीं। आमने-सामने आ जाने पर पड़ने वाली मुश्किल का आसान सा हल निकाल लिया गया। जब बीच रास्ते में दो गाड़ियां मिलतीं तो ''मुसाफिर'' ट्रालियों को बदल लेते। चालक भी अपने-अपने घोड़ों का रुख दूसरी तरफ कर विपरीत दिशा में अग्रसर हो जाते। आजादी के बाद भी सालों इसका चलना बदस्तूर जारी रहा। पर 1980 के दशक में कुछ कारणों से इसे बंद करना पड़ गया था ! पर चूंकि यह अपनी तरह का एक अनोखा अजूबा था इसलिए 2010 में फैसलाबाद जिला प्राधिकरणों ने सांस्कृतिक विरासत का रूप दे कर इसे फिर से शुरू करवा दिया। भले ही इसके बारे में ज्यादा लोग ना जानते हों पर यह आधुनिक युग का एक अजूबा तो जरूर ही है ! 

बुधवार, 24 जुलाई 2019

नदी का ख्वाब

हमारे यहां तो आस्था, प्रेम, विश्वास की पराकाष्ठा रही है ! प्रेम इतना कि हर जीव-जंतु से अपनत्व बना लिया ! आदर इतना कि पत्थर को भी पूजनीय बना दिया ! ममता इतनी कि नदियों को माँ मान लिया ! जल, वायु, ऋतुओं यहां तक कि राग-रागिनियों तक को एक इंसानी रूप दे दिया गया ! शायद इसलिए कि एक आम आदमी को भी सहूलियत रहे, समझने में, ध्यान लगाने और मन को एकाग्र करने में। उसी आकार वाली बात को लेकर एक कल्पना जगी कि जब इन सब को इंसान का रूप मिला है  तो शायद उसके गुण भी प्राप्त हुए होंगे ! इसी सोच का नतीजा है, नदी का ख्वाब ! 

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अभी रात का धुंधलका पूरी तरह छंटा नहीं था ! वैसे में ही सूखी नदी के प्रवाह क्षेत्र के किनारे खड़े बूढ़े बरगद ने देखा कि रोज एक परित्यक्ता, बीमार, मरियल सी घिसटती, रेंगती, ठिठकती धार जो कभी रास्ते के पत्थरों के अवरोध से रूकती-चलती मजबूरन सी आगे बढ़ती थी, आज जैसे बाधा रहित, उमंग भरी, प्रफुल्लित सी हो, किसी नागिन की तरह तेजी से सरसराती हुई दौड़ी जा रही है ! बरगद से रहा नहीं गया, उसने जोर से पूछा, ''क्यों बहिनी, आज तो बड़ी खुश नज़र आ रही हो !''

''हाँ, दद्दा ! सुबह भोर के तारे के जाने के पहले, मैंने स्वप्न देखा कि मैं पानी से लबालब भरी हुई हूँ ! इस छोर से उस छोर तक सिर्फ मैं ही मैं हूँ ! फिर से जीवन दायिनी नदी बन गयी हूँ ! सारे अवरोध ख़त्म हो चुके हैं और मैं दोनों तटों का हाथ थामे दौड़ी जा रही हूँ, दौड़ी जा रही हूँ ! उसके बाद से ही सब कुछ अच्छा और बदला-बदला सा लग रहा है !

बरगद मुस्कुरा उठा ! उसने अपनी फुनगी ऊपर उठा हवा को सूँघा और समझ गया सावन जो आ गया है !

सोमवार, 22 जुलाई 2019

"जो सुख छज्जू दे चौबारे, वो बल्ख ना बुखारे".......... कौन था यह छज्जू !


''जो सुख छज्जू दे चौबारे, वो बल्ख ना बुखारे।'' यह छज्जू कौन है जिसके चौबारे का जिक्र इस कहावत में किया गया है ! ऐसा ही समझा जाता रहा है कि बात को समझाने के लिए एक काल्पनिक नाम जोड़ दिया गया होगा। जबकि यह कोई काल्पनिक नाम नहीं है ! तक़रीबन साढ़े चार सौ साल पहले लाहौर में एक सज्जन रहा करते थे जिनका नाम छज्जू भगत था। कहीं-कहीं उनका नाम छज्जू भाटिया भी मिलता है। वे सर्राफे के एक नेक, सहृदय, दानशील व परोपकारी व्यापारी थे। उन्होंने ही लाहौर के अनारकली बाज़ार के इलाके में एक खूबसूरत व भव्य चौबारा बनवाया था। जहाँ दिन भर लोगों की महफ़िल जमी रहती थी ! एक दूसरे का दुःख-सुख बंटता था............!


#हिन्दी_ब्लागिंग
कोई भी कहावत, मुहावरा या लोकोक्ति यूं ही नहीं बन जाती या लोकप्रिय हो जाती, उसके पीछे जन-साधारण के अनुभव, अनुभूतियों और तजुर्बों या फिर जगह विशेष का पूरा हाथ होता है। कुछ लोग, वस्तुएं, घटनाएं अपने आप में इतने असाधारण होते हैं कि वे खुद एक मिसाल बन किंदवंती बन जाते हैं ! समय के साथ-साथ मूल बातें या चीजें तो काल के गर्त में समा जाती हैं, रह जाती हैं उक्तियां ! पर जब कभी ऐसी ही कहावत का स्रोत सामने आ जाता है या उसकी सच्चाई पता चलती है तो चौंकना, स्वाभाविक रूप से हो जाता है ! आज ऐसी ही एक कहावत की बात ''जो सुख छज्जू दे चौबारे, वो बल्ख ना बुखारे'' !

आज की पीढ़ी को तो शायद चौबारे का अर्थ भी मालुम ना हो, क्योंकि अब चौबारे नहीं होते। फ्लैट होते हैं उनकी बालकनी होती है। कभी-कभार किसी फिल्म में भले ही यह नाम सुनने को मिल जाए पर सच्चाई यही है कि चौबारा अब बीते युग की बात हो गया है ! जो कि कभी घर के एक विशेष स्थान का नाम होता था जो प्रायः घर के मुख्य द्वार या दहलीज़ के ऊपर पहली मंजिल पर बने एक छोटे कमरे को कहा जाता था। इस के एक दरवाज़े अथवा खिड़की का रुख सड़क की तरफ होता था। इस का उपयोग खासकर मनोरंजन इत्यादि के लिए किया जाता था। आज भी छज्जू का चौबारा कुछ-कुछ अच्छी हालत में अपनी कहानी कहता लाहौर में खड़ा है, पर कब तक ! क्योंकि उस पर भी रसूखदारों की गिद्ध दृष्टि पड़ चुकी है ! ये अलग बात है कि अब वैसा सुख या चैन भी वहां मयस्सर नहीं है।

अपने यहां, ख़ास कर उत्तर भारत में एक कहावत पुराने समय से अत्यंत प्रचलित रही है, ''जो सुख छज्जू दे चौबारे, वो बल्ख ना बुखारे।'' जिसका मूल अर्थ यह है कि परदेस में भले ही कितना ऐशो-आराम हो, सुविधाएं हों पर जो सुख -चैन अपने घर में मिलता है वह अन्यत्र नहीं ! कहावत में बल्ख और बुखारे के उल्लेख से ऐसा लगता है जैसे कि ये दो शहर आस-पास ही स्थित हों और युग्म शब्द बन गए हों ! हमारे कोटा-बूंदी, कुल्लू-मनाली, लुधियाना-जालंधर, दमन-दीव की तरह ! पर अपनी पूरी भव्यता और संपन्नता के साथ एक ही सिल्क रूट पर स्थित होने के बावजूद, जहां बल्ख अफगानिस्तान के उत्तरी प्रांत का एक शहर है वहीं बुखारा उज्बेकिस्तान का एक शहर ! अलग-अलग देशों में, एक-दूसरे से सैंकड़ों की.मी. दूर। फिर यह छज्जू कौन है ! जिसके चौबारे का जिक्र कहावत में किया गया है ! क्या सम्बंध है इनका आपस में ! तो ऐसा समझा जाता रहा, कि बात को समझाने के लिए एक काल्पनिक नाम जोड़ लिया गया होगा। जबकि यह कोई काल्पनिक नाम नहीं है।
तक़रीबन साढ़े चार सौ साल पहले लाहौर में एक सज्जन रहा करते थे जिनका नाम छज्जू भगत था। कहीं-कहीं उनका नाम छज्जू भाटिया या छज्जू मल भाटिया भी मिलता है। वे एक नेक, सहृदय, दानशील व परोपकारी सर्राफा व्यापारी थे। जो लोगों की सेवा और प्रभु भक्ति में लीन रहा करते थे। उन्होंने ही लाहौर के अनारकली बाज़ार के इलाके में एक खूबसूरत व भव्य चौबारा बनवाया था। जहां दिन भर लोगों की महफ़िल जमी रहती थी, एक दूसरे का दुःख-सुख बंटता था ! हंसी-ठठा होता था। खाने-पीने की कोई चिंता नहीं होती थी, हर चीज का इंतजाम छज्जू भगत की ओर से किया जाता था। वहीं बैठ कर वह स्थानीय लोगों की भरसक-यथासंभव मदद किया करते थे। सारे लोग जैसे किसी अदृश्य प्रेम धागे से बंध गए थे।
उन दिनों बल्ख और बुखारे की ख्याति अपनी खूबसूरती और भव्यता के कारण दुनिया में दूर-दूर तक फैली हुई थी। इसी के चलते छज्जू मल जी के एक मित्र सूरज मल नामक सज्जन का मन वहां घूमने जाने का हुआ। वे एक महीने का कह कर गए भी ! पर लोगों को बहुत आश्चर्य हुआ जब वे सप्ताह भर में ही लौट आए ! लोगों ने जब इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि, कहीं मन ना लगने के कारण वे बुखारा गए ही नहीं: बल्ख से ही वापस लौट आए ! क्योंकि यहां जैसा, प्यार, अपनत्व, भाईचारा कहीं दिखा ही नहीं ! उन का मन उचाट हो गया और वे बीच में ही यात्रा ख़त्म कर लौट आए। तब उन्होंने यह पंक्ति कही कि ‘वो बल्ख ना बुखारे – जो बात छज्जू के चौबारे’ और तब से यह बात कहावत के रूप में प्रसिद्ध हो गयी।
इन सब बातों की कोई पुष्टि तो नहीं हो पाती पर जो कुछ इधर-उधर पढ़ने को मिलता है उसके अनुसार छज्जू भगत का असली नाम छज्जू भाटिया या छज्जू मल भाटिया था। वे लाहौर के रहने वाले थे। मुगल बादशाह जहांगीर के समय वे सोने का व्यापार किया करते थे। 1640 में उनके निधन के बाद उनके अनुयायियों ने लाहौर के पुरानी अनारकली स्थित डेरे में उनकी समाधि बना दी।


*संदर्भ - दैनिक भास्कर व अंतरजाल

शुक्रवार, 19 जुलाई 2019

लाखामंडल का शिव मंदिर

यह एक दिलचस्प बात है कि यहां के एयर पोर्ट ''जॉली ग्रांट'' का नाम किसी आदमी का नहीं है ! यह उस जगह का नाम है जिस पर एयर पोर्ट बना हुआ है। कभी नेपाली राजाओं का राज गढवाल तक होता था। उसी समय नेपाल के किसी शाह ने ब्रिटिश साम्राज्य को यह जगह जागीर के रूप में उपहार में दे दी थी, तभी से उस ग्रांट के कारण इसका नाम जॉली ग्रांट पड़ा हुआ है ! हालांकि अब इसका नाम अटल जी के नाम पर रख दिया गया है ............!

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सावन का पुनीत महीना ! शिवजी को समर्पित समय ! आज उन्हीं के एक पावन स्थान लाखामंडल की जानकारी। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से करीब 128 की.मी. दूर बाबर-जौंसार इलाके में तक़रीबन सवा सात हजार फिट की ऊंचाई पर टोंस और यमुना नदियों के बीच स्थित है, लाखामंडल गांव जहां शिवजी को समर्पित प्राचीन मंदिरों का समूह है। इस मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण ग्रेफाइट पत्थर का बना शिवलिंग है, जिस पर जल चढाने पर एक अद्भुत चमक चहूँ ओर बिखर जाती है इसके साथ ही उसमें जल अर्पण करने वाले व्यक्ति की छवि भी साफ नजर आने लगती है। मंदिर के मुख्य द्वार पर दो द्वारपालों की मूर्तियां उकेरी गयी हैं, जिन्हें दानव और मानव के नाम से जाना जाता है। ये ठीक वैसी ही हैं जैसे विष्णु जी के मंदिरों पर जय-विजय की प्रतिमाएं बनी होती हैं। कुछ लोग इन्हें अर्जुन और भीम की मूर्ती भी मानते हैं। लाखामंडल का शिव मंदिर दुनिया का एक ऐसा मंदिर है जिसमें सवा लाख लिंगों की स्थापना की गयी थी। इस क्षेत्र में की गई खुदाई भी इस बात को प्रमाणित करती है, जिसमें विभिन्न आकार और प्रचीन समय के कई शिवलिंग मिले हैं। क्षेत्र में प्रचलित मान्यता के अनुसार शिवलिंग की स्थापना अज्ञातवास के समय धर्मराज युधिष्ठिर ने की थी।

लाखामंडल दो शब्दों के मेल से बना है। लाखा यानी लाख या कई ! मंडल यानी मंदिर या लिंग। यह शक्ति पंथ के प्रमुख पूजास्थलों में से एक है। अद्भुत कलाकारी से सज्जित इस मंदिर के बारे में दृढ मान्यता है कि यहां आने भर से इंसान की सारी मुसीबतें दूर हो उसकी सारी इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं। कहते हैं कि पांडवों के अज्ञातवास काल में युधिष्ठिर ने लाखामंडल स्थित लाक्षेश्वर मंदिर के प्रांगण में जिस शिवलिंग की स्थापना की थी, वह आज भी विद्यमान है। इसी लिंग के सामने दो द्वारपालों की मूर्तियां हैं, जो पश्चिम की ओर मुंह करके खड़े हैं। इनमें से एक का हाथ कटा हुआ है। मंदिर के अंदर एक चट्टान पर पैरों के निशान मौजूद हैं, जिन्हें देवी पार्वती के पैरों के चिन्ह माना जाता है। मंदिर के अंदर भगवान कार्तिकेय, भगवान गणेश, भगवान विष्णु और हनुमान जी की मूर्तियां भी स्थापित हैं।     
पौराणिक साक्ष्यों के अनुसार यह वही जगह है जहां महाभारत काल में दुर्योधन ने लाख के महल में पांडवों को मारने का दुष्कर्म रचा गया था। मंदिर के पास ही एक गुफा भी है जो स्थानीय भाषा में ''धुंधी ओढारी'' यानी धुंधली गुफा के नाम से प्रसिद्ध है ! कहते हैं दुर्योधन से बचने के लिए पांडवों ने इसी में से निकल कर अपनी जान बचाई थी। यहां से निकलने के बाद उन्होंने चक्रनगरी में एक माह तक निवास किया था जिसे आज चकराता नाम से जाना जाता है।
लाखामंडल में छोटे-छोटे मंदिरों के समूह हैं। जो समय-समय पर बनते रहे होंगे। एक शोध के अनुसार, जिसका शिलालेख भी उपलब्ध है, सिंहपुर के राजपरिवार की राजकुमारी ईश्वरा ने अपने दिवंगत पति जालंधर नरेश चन्द्रगुप्त के मोक्ष के लिए लाक्षेश्वर मंदिर का निर्माण कराया। जो समय के साथ बदल कर लाखेश्वर हो गया। जो भी हो उत्तराखंड का आदिकालीन सभ्यताओं से सदा से गहरा नाता रहा है। इसीलिए यहां यत्र-तत्र-सर्वत्र एतिहासिक एवं पौराणिक काल के अवशेष बिखरे पड़े मिलते रहे हैं। यह दर्शनीय शिव मंदिर भी एक ऐसा ही धार्मिक पूजास्थल है जहां जैसे भी हो, मौका बना कर जरूर जाना चाहिए।

चकराता से बस या टैक्सी द्वारा यहां आसानी से जाया जा सकता है। यह मसूरी रोड पर चकराता से करीब 100 की.मी. की दूरी पर स्थित है। सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन देहरादून और प्लेन की सुविधा के लिए जॉली ग्रांट एयर पोर्ट है। लगे हाथ यह बात भी जानना उचित होगा कि ''जॉली ग्रांट'' किसी आदमी का नाम नहीं है।  यह उस जगह का नाम है जहां उत्तराखंड का एयरपोर्ट स्थित है। कभी नेपाली राजाओं का राज गढवाल तक होता था। उसी समय नेपाल के किसी शाह ने ब्रिटिश साम्राज्य को यह जगह जागीर के रूप में उपहार में दे दी थी। तभी से इसका नाम जॉली ग्रांट पड़ा हुआ है। हालांकि यहां जॉली शब्द के होने की वजह मालूम नहीं पड़ रही है। हो सकता है जिसने यह प्रमाण पत्र हासिल किया हो उस अंग्रेज का नाम जॉली हो या फिर ख़ुशी-ख़ुशी प्रदान की गयी जागीर को जॉली भेंट का नाम दे दिया गया हो ! अब तो इसका नाम बदल कर अटल जी के नाम पर कर दिया गया है।    

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