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शुक्रवार, 19 जुलाई 2019

लाखामंडल का शिव मंदिर

यह एक दिलचस्प बात है कि यहां के एयर पोर्ट ''जॉली ग्रांट'' का नाम किसी आदमी का नहीं है ! यह उस जगह का नाम है जिस पर एयर पोर्ट बना हुआ है। कभी नेपाली राजाओं का राज गढवाल तक होता था। उसी समय नेपाल के किसी शाह ने ब्रिटिश साम्राज्य को यह जगह जागीर के रूप में उपहार में दे दी थी, तभी से उस ग्रांट के कारण इसका नाम जॉली ग्रांट पड़ा हुआ है ! हालांकि अब इसका नाम अटल जी के नाम पर रख दिया गया है ............!

#हिन्दी_ब्लागिंग  
सावन का पुनीत महीना ! शिवजी को समर्पित समय ! आज उन्हीं के एक पावन स्थान लाखामंडल की जानकारी। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से करीब 128 की.मी. दूर बाबर-जौंसार इलाके में तक़रीबन सवा सात हजार फिट की ऊंचाई पर टोंस और यमुना नदियों के बीच स्थित है, लाखामंडल गांव जहां शिवजी को समर्पित प्राचीन मंदिरों का समूह है। इस मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण ग्रेफाइट पत्थर का बना शिवलिंग है, जिस पर जल चढाने पर एक अद्भुत चमक चहूँ ओर बिखर जाती है इसके साथ ही उसमें जल अर्पण करने वाले व्यक्ति की छवि भी साफ नजर आने लगती है। मंदिर के मुख्य द्वार पर दो द्वारपालों की मूर्तियां उकेरी गयी हैं, जिन्हें दानव और मानव के नाम से जाना जाता है। ये ठीक वैसी ही हैं जैसे विष्णु जी के मंदिरों पर जय-विजय की प्रतिमाएं बनी होती हैं। कुछ लोग इन्हें अर्जुन और भीम की मूर्ती भी मानते हैं। लाखामंडल का शिव मंदिर दुनिया का एक ऐसा मंदिर है जिसमें सवा लाख लिंगों की स्थापना की गयी थी। इस क्षेत्र में की गई खुदाई भी इस बात को प्रमाणित करती है, जिसमें विभिन्न आकार और प्रचीन समय के कई शिवलिंग मिले हैं। क्षेत्र में प्रचलित मान्यता के अनुसार शिवलिंग की स्थापना अज्ञातवास के समय धर्मराज युधिष्ठिर ने की थी।

लाखामंडल दो शब्दों के मेल से बना है। लाखा यानी लाख या कई ! मंडल यानी मंदिर या लिंग। यह शक्ति पंथ के प्रमुख पूजास्थलों में से एक है। अद्भुत कलाकारी से सज्जित इस मंदिर के बारे में दृढ मान्यता है कि यहां आने भर से इंसान की सारी मुसीबतें दूर हो उसकी सारी इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं। कहते हैं कि पांडवों के अज्ञातवास काल में युधिष्ठिर ने लाखामंडल स्थित लाक्षेश्वर मंदिर के प्रांगण में जिस शिवलिंग की स्थापना की थी, वह आज भी विद्यमान है। इसी लिंग के सामने दो द्वारपालों की मूर्तियां हैं, जो पश्चिम की ओर मुंह करके खड़े हैं। इनमें से एक का हाथ कटा हुआ है। मंदिर के अंदर एक चट्टान पर पैरों के निशान मौजूद हैं, जिन्हें देवी पार्वती के पैरों के चिन्ह माना जाता है। मंदिर के अंदर भगवान कार्तिकेय, भगवान गणेश, भगवान विष्णु और हनुमान जी की मूर्तियां भी स्थापित हैं।     
पौराणिक साक्ष्यों के अनुसार यह वही जगह है जहां महाभारत काल में दुर्योधन ने लाख के महल में पांडवों को मारने का दुष्कर्म रचा गया था। मंदिर के पास ही एक गुफा भी है जो स्थानीय भाषा में ''धुंधी ओढारी'' यानी धुंधली गुफा के नाम से प्रसिद्ध है ! कहते हैं दुर्योधन से बचने के लिए पांडवों ने इसी में से निकल कर अपनी जान बचाई थी। यहां से निकलने के बाद उन्होंने चक्रनगरी में एक माह तक निवास किया था जिसे आज चकराता नाम से जाना जाता है।
लाखामंडल में छोटे-छोटे मंदिरों के समूह हैं। जो समय-समय पर बनते रहे होंगे। एक शोध के अनुसार, जिसका शिलालेख भी उपलब्ध है, सिंहपुर के राजपरिवार की राजकुमारी ईश्वरा ने अपने दिवंगत पति जालंधर नरेश चन्द्रगुप्त के मोक्ष के लिए लाक्षेश्वर मंदिर का निर्माण कराया। जो समय के साथ बदल कर लाखेश्वर हो गया। जो भी हो उत्तराखंड का आदिकालीन सभ्यताओं से सदा से गहरा नाता रहा है। इसीलिए यहां यत्र-तत्र-सर्वत्र एतिहासिक एवं पौराणिक काल के अवशेष बिखरे पड़े मिलते रहे हैं। यह दर्शनीय शिव मंदिर भी एक ऐसा ही धार्मिक पूजास्थल है जहां जैसे भी हो, मौका बना कर जरूर जाना चाहिए।

चकराता से बस या टैक्सी द्वारा यहां आसानी से जाया जा सकता है। यह मसूरी रोड पर चकराता से करीब 100 की.मी. की दूरी पर स्थित है। सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन देहरादून और प्लेन की सुविधा के लिए जॉली ग्रांट एयर पोर्ट है। लगे हाथ यह बात भी जानना उचित होगा कि ''जॉली ग्रांट'' किसी आदमी का नाम नहीं है।  यह उस जगह का नाम है जहां उत्तराखंड का एयरपोर्ट स्थित है। कभी नेपाली राजाओं का राज गढवाल तक होता था। उसी समय नेपाल के किसी शाह ने ब्रिटिश साम्राज्य को यह जगह जागीर के रूप में उपहार में दे दी थी। तभी से इसका नाम जॉली ग्रांट पड़ा हुआ है। हालांकि यहां जॉली शब्द के होने की वजह मालूम नहीं पड़ रही है। हो सकता है जिसने यह प्रमाण पत्र हासिल किया हो उस अंग्रेज का नाम जॉली हो या फिर ख़ुशी-ख़ुशी प्रदान की गयी जागीर को जॉली भेंट का नाम दे दिया गया हो ! अब तो इसका नाम बदल कर अटल जी के नाम पर कर दिया गया है।    

गुरुवार, 18 अप्रैल 2019

ग़ालिब की हवेली और गली कासिम जान

ग़ालिब की हवेली के साथ जुड़े दो नाम और सामने आते हैं; पहला गली बल्लीमारान तथा दूसरा गली कासिम जान ! बल्लीमारान के बारे में तो ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी और पता चल गया कि शाही किश्तियों के खेवनहार को बल्लीमार कहते थे इसीलिए उनकी रहने की जगह बल्लीमारान के रूप में जानी जाने लगी। पर गली कासिम जान के बारे में पता नहीं चल पा रहा था कि वह कौन था जिसके नाम से इस गली का नामकरण हुआ ! नाम से भी साफ़ जाहिर नहीं हो पा रहा था कि यह पुरुष का नाम है या किसी महिला का.........!

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मिर्ज़ा असद-उल्लाह बेग ख़ां उर्फ “ग़ालिब ! अब इस नाम से कौन वाकिफ़ नहीं है ! इसलिए आज बात करते हैं, इनकी यादों से जुडी उस हवेली की जो आज भी पुरानी दिल्ली के चांदनी चौक बाज़ार की एक गली बल्लीमारान की एक उप-गली कासिम जान में खड़ी है, जहां इस महान शख्सियत का 1865 से 1869 तक का अंतिम समय गुजरा था। गली बल्लीमारान में दो सौ मीटर जाकर दायें हाथ को आती है गली कासिम जान, इसमें मुड़ते ही तीसरा या चौथा मकान है---ग़ालिब की हवेली । हालाँकि ग़ालिब यहाँ किराये पर ही रहते थे, लेकिन इस मकान का एक हिस्सा सरकार ने लेकर एक संग्राहलय बना दिया है।   



जब किसी ख़ास स्मारक इत्यादि की बात होती है तो अनायास ही उससे जुड़े स्थानों या जगहों के बारे में जानने की जिज्ञासा भी उत्पन्न हो ही जाती है। अब चाँदनी चौक जैसी मशहूर जगह को छोड़ दें तो इस इमारत से जुड़े दो नाम सामने आते हैं; पहला बल्लीमारान तथा दूसरा कासिम जान। बल्लीमारान के बारे में तो ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी और पता चल गया कि शाही किश्तियों के खेवनहार को बल्लीमार कहते थे इसीलिए उनकी रहने की जगह बल्लीमारान के रूप में जानी जाने लगी। पर कासिम जान के बारे में पता नहीं चल पा रहा था कि वह कौन था जिसके नाम से इस गली का नामकरण हुआ ! नाम से भी साफ़ जाहिर नहीं हो पा रहा था कि यह पुरुष का नाम है या किसी महिला का ! काफी खोजबीन के बाद यह जानकारी हासिल हुई कि ये जनाब 1750 के दौरान लाहौर के गवर्नर मोईन-उल-मुल्क की कचहरी के एक मुलाजिम थे, जो 1750 में दिल्ली आ कर शाह आलम द्वितीय की कचहरी में काम करने लगा। जल्दी ही उसके काम से खुश को उसे नवाब की पदवी तथा रहने को लाल किले के पास बल्लीमारान में जगह दे दी गयी। उसी के नाम से उस गली का नाम गली कासिम जान पड गया। उसने वहां एक मस्जिद का निर्माण भी करवाया जिसे ''कासिम खानी मस्जिद'' के नाम से जाना जाता है। इन्हीं कासिम जान के एक भाई आरिफ जान के लड़के इलाही बख्श जान की लड़की उमराव बेगम के साथ ग़ालिब का निकाह हुआ था। 







ग़ालिब के अंतिम दिनों की गवाह यह हवेली वर्षों तक गुमनामी में रही, लोगों ने उसे हथिया कर घर-दुकानें बना लीं। फिर गुलज़ार जी जैसे कुछ लोगों के प्रयास और सरकार की कोशिश से लोगों को हटाया गया और इसे ग़ालिब संग्रहालय का रूप दे, ग़ालिब के जन्म दिन 27 दिसंबर 2000 पर अवाम को समर्पित कर दिया गया। कोशिश यही रही कि संग्रहालय का रूप-रंग-माहौल अपने वास्तविक रूप में ही नज़र आए। हालांकि अभी हवेली का एक ही हिस्सा अवाम के लिए उपलब्ध है पर उसके रख-रखाव पर कोई कोताही नहीं बरती जाती है, दर्शक अभी भी लखौरी ईटों, बलुए पत्थर के फर्श, लकड़ी के दरवाजे-छज्जों को देख, अपने आप को उस बीते समय से जुड़ा पाता है। 



शायर से जुडी वस्तुएं, उनके हस्तलिखित पत्र, दीवान, उनके फोटो, किताबें यहां सुरक्षित रख प्रदर्शित की गयी हैं। इसी के साथ उनकी एक प्रतिकृति भी देखने को मिलती है जिसमें वे हाथ में हुक्का थामे बैठे हुए दिखते हैं। उसी के साथ ही उनके रोजमर्रा के काम आने वाले बर्तन भी प्रदर्शित हैं। दीवारों पर भी उनके विशाल चित्रों के साथ उनकी शायरी उकेरी गयी है। वातावरण पूर्णतया शांत है। सुरक्षा हेतु एक सुरक्षा कर्मी भी तैनात है जो आप अकेले हों तो आपकी फोटो लेने में भी सहायता करता है। 







कई बार जानकारी होने के बावजूद विभिन्न कारणों से हम ऐसी जगहों पर जा नहीं पाते पर कोशिश होनी चाहिए कि ऐसी धरोहरों को हम तो देखें ही आज की पीढ़ी को भी इनसे अवगत कराएं। 

मंगलवार, 9 अप्रैल 2019

चांदनी चौक का गौरी शंकर मंदिर

संगमरमर की सीढ़ियों और खूबसूरती से उकेरे गए खंभों को पार कर जैसे ही मंदिर में प्रवेश करते हैं तो सामने ही भगत स्वरुप ब्रह्मचारी जी का आसन नज़र आता है जिन्होंने अपने जीवन के पचास साल इस मंदिर की सेवा करते हुए गुजारे थे। उनकी फोटो और चरण पादुकाएं अभी भी लोगों के दर्शनों के लिए रखी गयी हैं।अंदर गर्भगृह में शिवलिंग के पीछे चांदी के छतर के नीचे  शिव-पार्वती जी की स्वर्णाभूषणों से सज्जित मूर्तियां हैं। जिनके साथ ही कार्तिकेय और गणेश जी भी स्थापित हैं। सब कुछ इतना भव्य और सुंदर है कि दर्शनार्थी विमुग्ध हो कर रह जाता है..........!

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दिल्ली का चांदनी चौक, जो देश के प्रमुख और पुराने बाजारों में से एक तो है ही, वहां की इमारतों, भवनों व पूजा स्थलों का भी अपना समृद्ध इतिहास है। ऐसा ही एक शिव मंदिर, जो गौरी-शंकर मंदिर के नाम से प्रसिद्द है, लाल किले के सामने बाजार की शुरुआत पर दिगंबर जैन लाल मंदिर और गुरुद्वारा शीशगंज के बीच जैन मंदिर से लगा हुआ, स्थित है। माना जाता है कि तकरीबन 800 साल पुराना यह मंदिर शैव सम्प्रदाय के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है।  इस मंदिर को ''कॉस्मिक पिलर'' या पूरे ब्रह्मांड का केंद्र माना जाता है। इसका निर्माण शिव  जी के परम भक्त  एक मराठा सैनिक आपा गंगाधर द्वारा करवाया गया था। कहते हैं कि एक युद्ध में उनके प्राणों पर बन आने पर उन्होंने भगवान शिव से अपने प्राणों की रक्षा की विनती की थी। प्रभू की कृपा से जब उनकी जान बच गयी तो पूर्णतया स्वस्थ होने पर उन्होंने 1761 में इस मंदिर का निर्माण करवाया। मंदिर के गर्भ गृह में रजत कलश के नीचे भूरे रंग के शिवलिंग के पीछे कुछ ऊपर चबूतरे पर स्वर्णाभूषणों से सज्जित पूरा शिव परिवार भी स्थापित है। यह देवस्थल शिवजी के अर्द्धनारीश्वर स्वरुप को समर्पित है। 



सफ़ेद संगेमरमर से निर्मित इस मंदिर की छत को पिरामिड जैसा रूप देते हुए कोणीय आकार में बनाया गया है। 1959 में सेठ जयपुरा द्वारा इसका पूर्णोद्धार करवाया गया। इसकी बाहरी परत को चमकीले सफ़ेद रंग से रंगा गया है जिससे यह दूर से ही अवलोकित होने लगता है। वर्षों पहले जब यहां बियाबान था तब पांच पीपल के वृक्षों के बीच इस स्वयंभू शिवलिंग को देखा गया था। पास ही यमुना जी बहती थीं उसी से इनका अभिषेक हुआ करता था। ऐसी धारणा चली आ रही है कि यहां जो कोई भी पारिवारिक सुख-शान्ति, स्वास्थ्य या संतान प्राप्ति के लिए प्रभू की शरण में आ सच्चे मन से प्रार्थना करता है उसकी मनोकामना गौरी शंकर वैसे ही पूरी करते हैं जैसे उन्होंने अपने भक्त आपा गंगाधर की करी थी। 


मंदिर जमीं से कुछ ऊंचाई पर बना हुआ है शायद वहाँ कोई टिला हुआ करता होगा। संगेमरमर की सीढ़ियों और नक्काशीदार खंभों को पार कर जैसे ही मंदिर में प्रवेश करते हैं तो सामने ही चांदी की छरी के नीचे रजत पात्र से लिपटे भूरे रंग के शिवलिंग के दर्शन होते हैं। उसके पीछे कुछ ऊंचाई पर चबूतरे नुमा जगह पर चांदी के छतर के नीचे शिव-पार्वती जी की स्वर्णाभूषणों से सज्जित मूर्तियां हैं। जिनके साथ ही कार्तिकेय और गणेश जी भी स्थापित हैं। सब कुछ इतना भव्य और सुंदर है कि दर्शनार्थी विमुग्ध हो कर रह जाता है। मंदिर के पीछे बड़े हॉल में ''भगत स्वरुप ब्रह्मचारी जी'' का आसन नज़र आता है, जिन्होंने अपने जीवन के पचास साल इस मंदिर की सेवा करते हुए गुजारे थे। उनकी फोटो और चरण पादुकाएं अभी भी लोगों के दर्शनों के लिए रखी हुयी हैं। उसी के पीछे कांच के बने एक कक्ष में शिव जी की आदमकद प्रतिमा रखी हुई है जिसके बाहर पीतल के बने नंदी विराजमान है। जैसा कि बताया जाता है कि स्वयंभू शिवलिंग पांच पीपल के पेड़ों के बीच मिला था तो वे पांचों पेड़ अभी भी परिसर में खड़े हैं। गौरी शंकर जी की प्रतिमाओं के अलावा प्रमुख देवी-देवताओं के पूजास्थल भी बने हुए हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि बाहर से अंदाज नहीं होता पर अंदर विशाल खुले-ख़ुले माहौल में बहुत कुछ देखने के लिए उपलब्ध है।



हालांकि दिल्ली वासियों के लिए चांदनी चौक का बाज़ार एक अपरिहार्य जरुरत है पर अधिकांश लोग इस मंदिर और इसके इतिहास के बारे में अनभिज्ञ ही हैं। तो यदि आप अभी तक दिल्ली में रहते हुए भी यहां नहीं गए हैं तो अगली बार जब भी चांदनी चौक जाना हो तो कुछ समय निकाल  भगवान गौरी शंकर के इस मंदिर में दर्शन लाभ का आनंद जरूर लें।  

शनिवार, 6 अप्रैल 2019

दिल्ली की गली बल्लीमारान, जहां बल्लीमार रहा करते थे

उस समय कश्तियाँ चप्पू के बजाय बल्लियों की सहायता से खेयी जाती थीं। आज भी बंगाल-असम जैसे इलाकों में नावों को दिशा देने के लिए बल्लियों का सहारा लिया जाता है। बल्ली को कुशलता पूर्वक उपयोग करने वाले को बल्ली मार कहा जाता था। चूँकि वे लोग शाही परिवारों और उच्च वर्ग की नाव खेते थे इसलिए उनका उस जमाने में अच्छा रसूख हुआ करता था। इसी कारण उन्हें उस जमाने के ''पॉश'' इलाके में रहने की जगह प्रदान की गयी थी। उन्हीं के काम के नाम पर उस जगह का नाम बल्ली मारान पड़ गया यानी बल्ली मारने वालों की जगह.......! 

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जैसे हमारा देश विचित्रताओं से भरा पड़ा है वैसे ही हमारे शहरों, कस्बों, जिलों, गली-खेड़ों के नाम भी विचित्र संज्ञाओं से विभूषित हैं। वहां रहने वाले तो उस नाम के आदी हो चुके होते हैं पर नवांगतुक उन्हें पहली बार सुन कर एक बार तो सोच में पड़ ही जाता है कि यह क्या नाम हुआ ! जैसे दिल्ली को ही लें ! पुरानी दिल्ली जो कभी राजसी शानो-शौकत का प्रतीक थी आज बेतरतीब बसाहट की वजह से गलियों का मकड़जाल बन कर रह गयी है। इसकी अंतहीन गलियां, गलियों के अंदर गलियां, गलियों के अंदर की गलियों से निकलती गलियां। इन गलियों के कूचे-कटरों की भूल-भुलैया में घूमते हुए उनके ऐसे-ऐसे नाम सुनने को मिलते हैं कि दिमाग चकरघिन्नी बन जाता है। सूई वालान, नाई वालान, बल्ली मारान, चूड़ीवालान, दरीबा कलां, कूंचा सेठ, गली पीपल वाली, माता गली, गली कासिमजान, जोगीवाड़ा, मालीवाड़ा, गली गुलियांन, कटरा नील, खारी बावली, गली परांठे वाली, छत्ता शाहजी आदि,  आदि, आदि ! यदि ऐसी जगहों और उनके नामों पर शोध किया जाए तो एक भारी-भरकम ग्रंथ ही बन जाएगा ! आज ऐसी ही एक जगह की चर्चा जिसका नाम सुन कर तो ऐसा लगता है जैसे कोई लठ्ठ मारने  को तैयार बैठा हो ! बल्लीमारान !

देश का सबसे मशहूर बाजार, चाँदनी चौक ! यहीं फतेहपुरी से कुछ पहले बायीं ओर एक चौड़ी सी गली पड़ती है जिसका नाम है बल्लीमारान ! आज अपने चश्मों और मोजडियों के कारण विख्यात इस इलाके का वास्ता कभी देश की मशहूर शख्सियतों के साथ रहा था। जिनमें सबसे प्रमुख तो चचा ग़ालिब हैं। जिनकी हवेली आज भी इसकी एक उप-गली कासिमजान में देश-विदेश के शेरो-शायरी की समझ रखने वाले कद्रदानों के आकर्षण का केंद्र है। इसके साथ ही अपने-अपने इतिहास को समोए-संजोए खड़ी हैं, खजांची, चुन्नामल, मिर्जा ग़ालिब, जीनत महल जैसी हस्तियों की ऐतिहासिक हवेलियां। इनके अलावा हाकिम अजमल ख़ाँ, मोहम्मद अल्ताफ हुसैन "हाली", ग़ुलज़ार साहब तथा एक तरह से मशहूर फ़िल्म पटकथा लेखक, निर्देशक ख्वाजा अहमद अब्बास का नाता भी यहां से जुड़ता है क्योंकि वे मो. अल्ताफ हुसैन जी के पोते थे। इसकी आज की हालात को देख कौन कह सकता है कि कभी यह जगह अदब का एक प्रमुख केंद्र हुआ करता था !



अब इसके नामकरण की बात ! जब सतरहवीं शताब्दी में मुग़ल सम्राट शाहजहां ने चाँदनी चौक बनवाया तो उसके बीचो-बीच लाल किले के लाहौरी गेट से लेकर फतेहपुरी मस्जिद तक एक बड़ी सी नहर का निर्माण भी करवाया। जिसका का पानी रात के समय चाँद की रौशनी से शीशे की तरह जगमगा कर एक अलग ही लोक का नजारा पेश किया करता था। उसी स्वप्न लोक का आनंद लेने के लिए शाम के वक्त शाही परिवार और अमीर-उमरा अपनी-अपनी कश्तियों में वहां सैर कर वक्त गुजारते थे। जिसके लिए देश के बेहतरीन नाविकों को यहां काम मिलता था। उस समय कश्तियाँ चप्पू के बजाय बल्लियों की सहायता से खेयी जाती थीं। आज भी बंगाल-असम जैसे इलाकों में नावों को दिशा देने के लिए बल्लियों का सहारा लिया जाता है। बल्ली को कुशलता पूर्वक उपयोग करने वाले को बल्ली मार कहा जाता था। चूँकि वे लोग शाही परिवारों और उच्च वर्ग की नाव खेते थे इसलिए उनका उस जमाने में अच्छा रसूख हुआ करता था। इसी कारण उन्हें उस जमाने के ''पॉश'' इलाके में रहने की जगह प्रदान की गयी थी। उन्हीं के काम के नाम पर उस जगह का नाम बल्ली मारान पड़ गया यानी बल्ली मारने वालों की जगह। अब ना तो कोई नहर है, ना कश्ती और नाहीं बल्लीमार वक्त की आंधी ने सब कुछ बदल कर रख दिया है आज उस तंग सी जगह में सायकिल, रिक्शा, ठेला, स्कूटर, मोटर सायकिल सब ठूंसे पड़े हैं पर अपने-अपने इत्मीनान में ! कुछ तो है यहां, इसका सम्मोहन, इसका अपनापन, इसकी आत्मीयता, इसकी ऐतिहासिकता, जो लाख अड़चनों, कमियों, मुश्किलों के बावजूद लोगों को अपने से जुदा नहीं होने देता ! इसी कारण अभी भी दिल्ली की गलियों में कूचा, कटरा जैसे जगहों के नाम जीवित हैं।   

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