बुधवार, 12 दिसंबर 2018

''अहम् ब्रह्मास्मि'' होने का वहम

आम इंसान को तो वे अहमकाना नीतियां भी समझ नहीं आतीं जिनमें एक तरफ तो पर्यावरण के नाम पर निजी वाहनों के उपयोग को निरुत्साहित किया जाता है और दूसरी तरफ मेट्रो और बसों के किराए बढ़ा दिए जाते हैं। तो जब इस हार का विश्लेषण हो तो उन अर्थशास्त्रियों, सलाहकारों, विशेषज्ञों को भी जरूर तलब किया जाना चाहिए जो अपने वातानुकूलित कक्ष में बैठ बिना किसी की परेशानी को समझ सिर्फ अपने आकाओं को खुश करने की खातिर किसी भी कीमत पर पेट्रोल-गैस के दाम कम करने के खिलाफ थे। तख्तनशीं लोगों को भी समझ लेना चाहिए कि चुनाव में तेल कंपनियों को खुश करने की बजाय जनता का साथ ज्यादा जरुरी होता है। यदि समय रहते 10-15 रुपये की राहत दे दी गयी होती तो शायद..............!

#हिन्दी_ब्लागिंग  
पांच राज्यों में हुए चुनावों के परिणाम कइयों को अर्श से फर्श और फर्श से अर्श की तरफ ले आए। तरह-तरह के आकलन शुरू हो गए। अपनी कमजोरी को नजरंदाज कर दूसरों पर दोष मढ़े जाने लगे ! जीत पर अपनी ही पीठ थपथपाई जाने लगी ! और उधर हार के कारण गिनाए जाने लगे हैं। पर जरुरत है वास्विकता को समझने की। बातें हो रही हैं पदस्तता के विरुद्ध जनमत की ! सत्ता विरोधी लहर की ! थोपी गयी नीतियों की ! पूरे न किए गए वादों की ! अति आत्मविश्वास की ! सत्ता के गरूर की ! किसानों की अनदेखी की ! मौकापरस्तों की कलाबाजियों की ! पर इनमें ऐसी कौन सी बात है जो पहले कभी नहीं हुई ? किस सत्तारूढ़ दल को यह सब नहीं झेलना पड़ा ? फिर क्यों नहीं सबक लिया गया ? क्यों नहीं समय रहते चिड़ियों से खेत बचाया गया ? क्यों हवा के घोड़े पर सवार नेताओं को रोते-बिलखते-हैरान-निरीह लोग और उनकी परेशानियों, उनकी जद्दो-जहद नजर आनी बंद हो गयी ? जवाब वही पुराना है, सत्ता का नशा ! जिसमें आदमी अपने को ''अहम् ब्रह्मास्मि'' समझने लगता है ! इस हार का भी यही कारण रहा ! 

सच्ची बात तो यह है कि आम आदमी को फौरी तौर पर इससे कोई मतलब नहीं है कि पकिस्तान की करेंसी क्यों रसातल में चली गयी या जापान हमारे करीब क्यों आ गया या अमेरिका हमें क्यों गलबहियां डालने लगा है ! उसे मतलब होता है अपने रोजमर्रा के बढ़ते अनाप-शनाप खर्च से ! जब घर में रसोई गैस ख़त्म हो जाने पर चार सौ के बदले हजार रुपये का इंतजाम करना पड़ता है ! रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं को लेने के फेर में महीने के अंतिम दिन गुजारने मुश्किल हो जाते हैं ! घर के बुजुर्गों-बच्चों की जरूरतों को टालना पड़ता रहता है ! सुबह काम पर निकलते ही गाडी में पेट्रोल डलवाते समय हर बार कुछ ना कुछ ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ते हैं और कीमतें ना घटा पाने के बिना सिर-पैर के बहाने सुनने को मिलते हैं ! उसे तो वे अहमकाना नीतियां भी समझ नहीं आतीं जिनमें एक तरफ तो पर्यावरण के नाम पर निजी वाहनों के उपयोग को निरुत्साहित किया जाता है और दूसरी तरफ मेट्रो और बसों के किराए बढ़ा दिए जाते हैं। तो जब इस हार का विश्लेषण हो तो उन अर्थशास्त्रियों, सलाहकारों, विशेषज्ञों को भी जरूर तलब किया जाना चाहिए जो अपने वातानुकूलित कक्ष में बैठ बिना किसी की परेशानी को समझ सिर्फ अपने आकाओं को खुश करने की खातिर किसी भी कीमत पर पेट्रोल-गैस के दाम कम करने के खिलाफ थे। तख्तनशीं लोगों को भी समझ लेना चाहिए कि चुनाव में तेल कंपनियों को खुश करने की बजाय जनता का साथ ज्यादा जरुरी होता है। यदि समय रहते 10-15 रुपये की राहत दे दी गयी होती तो शायद जनता का आक्रोष कुछ कम किया जा सकता था ! पर उस समय सत्तामद में सिर्फ खजाना ही नजर आ रहा था !

कहते हैं ना कि जैसा राजा वैसी प्रजा, तो आज प्रजा का एक ख़ास तबका भी चुस्त-चालाक हो गया है ! वर्षों के अनुभव से वह भी समझ गया है कि जो सुविधा एक बार उपलब्ध होने लग जाए उसे फिर कोई रोक नहीं सकता, हाँ उससे ज्यादा मिलने की गुंजाइश जरूर हो जाती है। इसीलिए वह सत्ताविहीन दल द्वारा मुफ्त में मिलने वाले  लुभावने प्रस्तावों को लपकने के लिए सदा पाला बदलने के लिए तैयार रहने लगा है ! अब इसे भले ही पदस्तता के विरुद्ध यानी एंटी कम्बंसेंसी का नाम दे दिया जाए। ऐसी खैरातें बांटने में कोई भी दल पीछे नहीं रहता ! पर उसे उस एक बड़े तबके के रोष की खबर नहीं रहती जिसे आम भाषा में मध्यम वर्ग के नाम से जाना जाता है। इस तबके को सदा ही हाशिए पर रखा गया है, ना कभी इसकी जरूरतों पर ध्यान दिया जाता है ना ही उसकी मूलभूत सुविधाओं पर और ना ही उसकी परेशानियों पर ! जबकि यही लोग सरकार के खजाने को भरने में अपना सबसे ज्यादा योगदान देते है ! सरकारों द्वारा दी गयी हर खैरात पर इनकी जेब पर ही सबसे ज्यादा भार बढ़ता है। ना इनका कोई रहनुमा है ना कोई सुनने वाला ! क्योंकि अपनी विशाल आबादी के बावजूद यह आपस में ही बंटा-कटा हुआ है ! 

एक ख़ास बात, मुझ जैसा साधारण सा अराजनैतिक इंसान जिसका किसी भी पार्टी से कोई लेना-देना नहीं है जब उसे कुछ अटपटा लग सकता है तो जानकार-विद्वान लोगों को यह क्यों नहीं समझ आता कि खैरात बाँट कर या मुफ्त में वस्तुएं वितरित कर किसी का भी लम्बे समय तक भला नहीं होता ! ना जनता का और नहीं बांटने वाले का ! दसियों उदहारण हैं इसके। वादा-खिलाफी अविश्वसनीय का लेबल चिपकवा देती है ! कड़वी-अभद्र-बेलगाम जुबान को लोग सिरे से नापसंद करते हैं ! अपनी कमियों-नाकामियों को दूर करने के बजाय दूसरों के अवगुणों को गिनाना जनता को रास नहीं आता। इससे तात्कालिक तौर पर भले ही तालियां बज जाएं पर दूरगामी परिणाम खोटे ही निकलते हैं। धर्म-जाति-भाषा के बिना राजनीती नहीं हो सकती पर इसको माध्यम बना किसी को नीचे दिखाना बहुत मंहगा साबित हो सकता है। आत्मविश्वास एक गुण है पर अति-आत्मविश्वास आत्मघाती ही सिद्ध होता है। 

अब यह सब तो एक आम आदमी का नजरिया है ! माननीय लोग कब समझेंगे क्या पता ? प्रभू सबको सद्बुद्धि प्रदान करें, आमीन  

शनिवार, 8 दिसंबर 2018

एक मंदिर जहां वहीं के राजा का प्रवेश वर्जित है

धीरे-धीरे राजा प्रतापमल्ल को रोज-रोज इतनी दूर मंदिर में आना-जाना अखरने लगा तो उन्होंने नीलकंठ भगवान की एक मूर्ति राजमहल में ही स्थापित करवा ली। इससे भगवान नाराज हो गये और उन्होंने स्वप्न में आ राजा को श्राप दिया कि अब से तुम या तुम्हारा कोई भी उत्तराधिकारी यदि बूढा नीलकंठ हमारे दर्शन करने आएगा तो वह मृत्यु को प्राप्त होगा ! तब से सैकड़ों सालों के बाद आज भी  राजपरिवार का कोई भी सदस्य वहां जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया है.......!

#हिन्दी-ब्लागिंग 

पिछले दिनों हमारे यहां मंदिर  प्रवेश को लेकर काफी गुल-गपाड़ा मचा रहा। जिसमें इसकी-उसके अधिकार की बातें, कोर्ट-कचहरी, धर्म-अधर्म, राजनीती-सियासत सब तरह के रंग सामने आते रहे। ऐसे में एक ऐसे मंदिर की भी बात सामने आई, जहां खुद वहाँ के राजा का भी प्रवेश निषेद्ध है ! जी हाँ ! नेपाल में विष्णु भगवान का एक ऐसा मंदिर है जिसमें वहां के राजा को भी प्रवेश की मनाही है। जिसका कारण राजा खुद ही था !




राजधानी काठमांड़ू से नौ-दस की.मी. की दूरी पर शिवपुरी पहाड़ी के पास बूढ़ा नीलकंठ मंदिर स्थित है। प्रवेश-द्वार के सामने ही विशाल जलकुंड बना  हुआ है। जिसमें शेषनाग के ग्यारह फणों के छत्र वाली शेष शैय्या पर शयन कर रहे भगवान विष्णु की चर्तुभुजी प्रतिमा स्थापित है। प्रतिमा का निर्माण काले पत्थर की एक ही शिला से हुआ है।प्रतिमा की लम्बाई 5 मीटर है एवं जलकुंड की लम्बाई करीब 13 मीटर की है। जिसे बूढा नीलकंठ के नाम से जाना जाता है। मंदिर का नाम नीलकंठ है जो भगवान शिव का एक नाम है। द्वार पर भी श्री कार्तिकेय और गणेश जी की प्रतिमाएं लगी पर यहां मूर्ति भगवान विष्णु जी की है ! तब इसका नाम बूढ़ा नीलकंठ कैसे हो गया ? इसके पीछे जनश्रुति है कि समुद्र-मंथन के समय विषपान करने के पश्चात जब भगवान शिव का कंठ जलने लगा तब उन्होंने विष के प्रभाव शांत करने के लिए जल की आवश्यकता की पूर्ति के लिए एक स्थान पर आकर त्रिशूल का प्रहार किया जिससे एक झील का निर्माण हुआ। मान्यता है कि बूढा नीलकंठ में वहीं से जल आता है, जिसको गोसाईंकुंड के नाम से जाना जाता है। ऐसी मान्यता है कि सावन के महीने में विष्णु प्रतिमा के साथ भगवान शिव के विग्रह का प्रतिबिंब भी जल में दिखाई देता है। 

इसकी स्थापना की किंवदन्ती के अनुसार एक किसान खेत की जुताई कर रहा था तभी उसका हल एक पत्थर से टकराया तो वहां से रक्त निकलने लगा। जब उस भूमि को खोदा गया तो बूढ़ा नीलकंठ की यह प्रतिमा प्राप्त हुई, जिसके पश्चात उसे यथास्थान पर स्थापित कर दिया गया। तभी से नेपाल के निवासी बूढ़ा नीलकंठ का अर्चन-पूजन करते आ रहे हैं। पर एक विचित्र बात जो यहां से जुडी हुई है कि राजा, जो खुद भगवान का प्रतिनिधि होता है, उसी का यहां प्रवेश निषेद्ध है ! वैसे इसका जिम्मेवार राजा खुद ही था। 

बात तक़रीबन 17वीं शताब्दी की है। जब नेपाल के तत्कालीन नरेश राजा प्रतापमल्ल रोज भगवान के दर्शन करने हनुमान ढोका स्थित अपने महल से यहां आया करते थे। पर मतिभ्रम के चलते उन्होंने खुद को ही विष्णु का अवतार घोषित कर दिया। धीरे-धीरे उन्हें रोज इतनी दूर आना-जाना अखरने लगा तो उन्होंने नीलकंठ भगवान की एक मूर्ति राजमहल में ही स्थापित करवा ली। इससे भगवान नाराज हो गये और उन्होंने स्वप्न में आ राजा को श्राप दिया कि अब से तुम या तुम्हारा कोई भी उत्तराधिकारी यदि बूढा नीलकंठ हमारे दर्शन करने आएगा तो वह मृत्यु को प्राप्त होगा। तब से आज तक राजपरिवार का कोई भी सदस्य वहां जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया है।

वैसे भगवान विष्णु के इसी स्वरूप की एक और मूर्ती राजधानी के निकट बालाजू उद्यान में भी स्थित है जो असली मूर्ति से कुछ छोटी है। राजपरिवार के सदस्य यहीं प्रभू के दर्शन करने जाते हैं। नवम्बर माह में मुख्य मंदिर के साथ ही देव उठनी एकादशी को यहां भी बड़ा भारी मेला लगता है, दूर-दूर से लोग अपनी मनौतियां ले कर आते हैं। इस मंदिर की भी काफी मान्यता है।

मंगलवार, 4 दिसंबर 2018

वायु प्रदुषण से बचाव के कुछ उपाय

 विशेषज्ञों का कहना है, वायु प्रदुषण से बचाव के लिए घर के अंदर कुछ पौधे अवश्य लगाएं। मच्छरों से बचाव के लिए आने वाले क्वॉयल या केमिकल का प्रयोग ना ही करें। इन दिनों हो सके तो अगरबत्ती या धूप भी ना जलाएं। पानी में एक चम्मच हल्दी डाल भाप लें। नियमित कसरत करें। कफ-कारक खाद्य लेने से बचें। तुलसी, काली मिर्च,  छोटी पिपली, इलायची, इत्यादि का सेवन जरूर करें। खाने के बाद करीब एक तोला गुड़ जरूर खाएं, इसमें एंटीऑक्सीडेंट्स और मिनरल भी प्रचुर मात्रा में होते हैं। नाक की नली को साफ़ रखने के लिए रात सोते समय दो-दो बूँद गाय का घी दोनों नथुनों में डालें जिससे वहां प्रदूषक तत्वों का जमावडा न हो सके..........!

#हिन्दी_ब्लागिंग
काफी दिनों से, दिनों से क्या सालों से अक्तूबर के बाद से ही दिल्ली की हवा यहां के रहवासियों की हवा खराब करने से बाज नहीं आ रही। लाख हल्ला मचे, गुल-गपाड़ा हो, एक दूसरे पर तोहमत थोपी जाए, पर जिम्मेवार लोग कभी इस मुद्दे पर गंभीर होते नहीं दिखते। नाही लगता है कि उनको किसी की चिंता या फ़िक्र है। इधर हमने भी जैसे खाद्यपदार्थों व पानी की मिलावट और अशुद्धता पर जान के जोखिम के बावजूद समझौता सा कर लिया है ! पर प्राणवायु  का क्या किया जाए ! जिसके बिना एक मिनट भी ज़िंदा रहना असंभव होता है ! अपने घर पर कोई कितना भी वायु शुद्धिकरण के उपाय कर ले, पर बाहर तो निकलना ही पड़ता है ! और ऐसा भी नहीं है कि इसके बिना कुछ घंटे रह लिया जा सके ! तो फिर उपाय क्या है ? इसका एक ही जवाब मिल पाया कि अपने शरीर को ही कुछ मजबूती और सुरक्षा प्रदान कर दी जाए !
ऐसा जहर जब अंदर जाएगा तो शरीर क्या करेगा ?
इस बार अपने पंजाब प्रवास के दौरान वहां वैद्य श्री विनोद शर्मा जी के पड़ोस में रहने का संयोग मिला तो उनसे इस विषय में सलाह लेने का मौका भी मिल गया। उन्होंने बताया, पहले वातावरण में कोहरा छाता था जो ठंड में हवा में स्थित वाष्पकणों पर धूल-मिट्टी इत्यादि के जमने से बनता था, सूर्य की तपिश पाते ही हवा की नमी के साथ-साथ यह भी गायब हो जाता था। पर अब धूल के अति बारीक कण और धुएं ने उसका स्थान ले लिया है। जो गर्मी पा कर भी गायब नहीं हो पाते ! यह समस्या मैदानी इलाकों में तकरीबन सभी जगह पैर पसार रही है। पर सांस तो लेनी ही है, उसके बिना गुजारा भी नहीं है। श्वास की बीमारियों वाले या बुजुर्गों को ज्यादा सतर्क रहने की जरुरत है। बाहर तो बदलना आसान नहीं है ! इसके लिए अपने शरीर को ही तैयार करना पडेगा। जिसके लिए कुछ सावधानियों के साथ-साथ अपने खान-पान में भी कुछ चीजों का समावेश जरुरी है।
कुछ हद तक वायु को साफ़ कर ही देते हैं 
वायु प्रदूषण से बचाव के लिए घर के अंदर कुछ पौधे अवश्य लगाएं। जैसे सर्प पौधा, नागबेल या मनीप्लांट इत्यादि। मच्छरों से बचाव के लिए आने वाले क्वॉयल या केमिकल का प्रयोग ना करें। इन दिनों हो सके तो अगरबत्ती या धूप भी ना जलाएं। एक दिन के अंतराल पर पानी में एक चम्मच हल्दी डाल भाप लें। नियमित कसरत करें। कफ-कारक खाद्य लेने से बचें। तुलसी, काली मिर्च, छोटी पिपली, इलायची, जीरे, हल्दी इत्यादि का सेवन जरूर करें। खाने के बाद करीब एक तोला गुड़ जरूर खाएं, यह भोजन तो हजम करता ही है श्वास के रोगियों की ठंड में आतंरिक गर्मी की जरुरत भी पूरी करता है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट्स और मिनरल भी प्रचुर मात्रा में होते हैं। नाक की नाली को साफ़ रखने के लिए रात सोते समय दो-दो बूँद गाय का घी नाक में डालें जिससे वहां प्रदूषक तत्वों का जमावडा न हो सके। रात को सोते समय गुनगुने पानी के साथ एक-दो दिन के अंतराल में त्रिफला चूर्ण लेते रहें। वातावरण बहुत ज्यादा ही खराब हो तो नाक पर कपड़ा लपेट कर निकलें, खासकर बाइक इत्यादि चलाते समय तो यह सावधानी जरूर बरतें।      

बुधवार, 28 नवंबर 2018

पंजाब फिर बनेगा सिरमौर

पंजाब के दो दिन के प्रवास में जो भी देखा-पाया, वह प्रदेश के बारे में फैले या फैलाए गए दुष्प्रचार के बिल्कुल विपरीत था। हालांकि यह आकलन सिमित समय और दायरे का ही था पर हांडी में पक रहे चावलों का अंदाज उसके एक कण से ही लग जाता है। पर इसका अर्थ यह भी नहीं है कि वहां सब कुछ चाक-चौबंद या दुरुस्त है पर वैसा भी नहीं है जैसा पूरे देश को बताया जा  रहा था। पर ऐसा हुआ क्यों ? लोगों का मानना है कि  पहले आपसी सहयोग से ही खेती-खलिहानी होती थी। फिर जैसे प्रकृति में किसी जगह हवा गर्म हो ऊपर उठती है तो तत्काल आस-पास की वायु उस रिक्त स्थान की पूर्ति करने पहुंच जाती है, वैसे ही जब पंजाब के हर घर से लोग विदेश जाने लगे तो उसकी खानापूर्ति के लिए यू.पी., बिहार, यहां तक कि बांग्लादेशी भी अपनी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ रोजगार के सिलसिले में यहां आ बसे। शायद तभी से कुछ गलत आदतें यहां पनपी ! फिर भी पहले से हालात में बहुत सुधार हुआ है।  अच्छा लगा मोबाइल थामने की जगह बच्चों को दौड़ते-भागते-खेलते देख कर ................!

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वर्षों बाद पिछले हफ्ते पंजाब जाना हुआ। साथ थीं, तरह-तरह की आशंकाऐं, भ्रांतियां, गैर-जिम्मेदराना मिडिया द्वारा प्रदत्त, नशे और पंजाब को एक दूसरे का पर्याय बताने वाली उल्टी-सीधी जानकारियां,  पर वहां के दो दिन के प्रवास में जो भी देखा-पाया वह प्रदेश के बारे में फैले या फैलाए गए दुष्प्रचार के बिल्कुल विपरीत था। हालांकि यह आकलन सिमित समय और दायरे का ही था पर हांडी में पक रहे चावलों का अंदाज उसके एक कण से ही लग जाता है। पर इसका अर्थ यह भी नहीं है कि वहां सब कुछ चाक-चौबंद या दुरुस्त है पर वैसा भी नहीं है जैसा पूरे देश को बताया जा  रहा था। 

यात्रा के दौरान मुझे तीन गांवों में जाने का अवसर मिला। पहला अपने ननिहाल हदियाबाद, जो फगवाड़ा शहर से ड़ेढेक की. मी. की दूरी पर फगवाड़ा-नूरमहल रोड पर स्थित है, पर अब शहर का ही हिस्सा बन गया है। वहां जाने के लिए फगवाड़ा बस-अड्डे से कुछ आगे शुगर मिल से बाएं मुड़ते ही वह रामगढ़िया कालेज है, जहां फिल्म स्टार धर्मेंद्र ने अपनी शुरुआती पढ़ाई की थी, संयोगवश मेरे चाचाजी भी वहीं पढ़े थे। वहाँ मेरे बड़े मामाजी के दोस्त दो शिक्षक हैं, घर के कार्यक्रम में उनसे मिलना हुआ, कुछ देर बात की। गांव में भी पूरा दिन गुजरा, पर कहीं भी कुछ अस्वाभाविक जैसा नहीं लगा। उल्टे आत्मीयता, प्रेम, भाईचारे का ही माहौल मिला। वहाँ की तक़रीबन सौ साल पुरानी पाठशाला और सरकारी स्कूल के गुरुजनों से भी युवाओं के बारे में, पंजाब के हालात के बारे में बात हुई। पर किसी ने भी परिस्थिति को चिंताजनक नहीं बताया।

दूसरा पड़ाव था, जालंधर शहर के जमशेर कस्बे के पास का गांव, चननपुरा। यहां मेरे मौसाजी का पुश्तैनी घर है। भाई जीवन के साथ रात में वहीं बसेरा था। वहां का नजारा ही कुछ और था ! बढती ठंड के बावजूद रात के आठ-साढ़े आठ बजे गांव के बच्चे फ्लड लाइट में फ़ुटबाल खेल रहे थे। यहां अक्सर इस खेल की प्रतियोगिताएं होती रहती हैं। दूसरा दिन छुट्टी का था। अल-सुबह भी बच्चे खेल-कूद में व्यस्त दिखे ना कि मोबाइल में ! वहीं भाई के पडोसी स्थानीय वैद्य श्री विनोद जी ने प्रदेश में नशे इत्यादि के चलन को सिरे से तो नहीं नकारा, पर इस गांव में किसी के भी लती होने की या उनसे ऐसे किसी व्यक्ति के इलाज करवाने की किसी भी बात से इंकार किया। लत तो यहां मोबाईल की भी नहीं दिखी किसी में भी !

तीसरा पड़ाव था होशियारपुर के पास का एक और छोटा सा गांव रिहाणा-जट्टा, कभी देहात हुआ करता यह गांव आज सीवर युक्त पक्के मार्ग, अच्छे-खासे घरों, दुकानों, बिजली-पानी जैसी जरूरतों से युक्त साफ़-सुथरी जगह है। हमारे वहां पहुंचने पर घर का युवक, घर में बाइक होने के बावजूद सायकिल ले कर कुछ लाने निकला। जीतनी देर भी हम वहां रहे, किसी ने भी मोबाइल को हाथ नहीं लगाया। बाद में ध्यान दिया तो वहां अधिकांश लोग सायकिल का उपयोग करते दिखे। सुविधा व सम्पन्नता होने के बावजूद ! अच्छा लगा यह देख कर।

कार्यक्रम के दौरान एक सज्जन से भेंट हुई जो ''लवली यूनिवर्सिटी'' में प्रोफ़ेसर हैं। बातचीत के दौरान इशारों में ही वहां के युवा और नशे की बात छेड़ी तो उन्होंने बे-बाक हो कहा कि पहले आपसी सहयोग से ही खेती-खलिहानी होती थी। फिर लोगों में विदेश जाने का मोह बहुत बढ़ गया। फिर जैसे प्रकृति में किसी जगह हवा गर्म हो ऊपर उठती है तो तत्काल आस-पास की वायु उस रिक्त स्थान की पूर्ति करने पहुंच जाती है। वैसे ही जब पंजाब के हर घर से लोग विदेश जाने लगे तो उसकी खानापूर्ति के लिए यू.पी., बिहार, यहां तक कि बांग्लादेशी भी अपनी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ रोजगार के सिलसिले में यहां आ बसे। शायद तभी से कुछ गलत आदतें यहां पनपीं ! फिर भी पहले से हालात में बहुत सुधार हुआ है। यहां के मुख्य मंत्री #कैप्टन_अमरिंदर_सिंह इस बारे में बहुत गंभीर हैं और पूरी तरह प्रदेश को नशे की गिरफ्त से छुटकारा दिलाने को प्रतिबद्ध हैं। कानून-व्यवस्था भी काफी सुधरी है। आशा है पंजाब फिर अपना खोया गौरव प्राप्त कर लेगा, जल्दी।

अपनी इस संक्षिप्त यात्रा में एक बात जो सबसे अच्छी लगी वह यह कि छोटे से छोटे गांवों में भी खेलने के लिए अच्छे-खासे मैदान उपलब्ध कराए गए हैं, बिजली की सुविधा के साथ। वहाँ के बच्चे-युवा-युवतियां भी खेलों में रूचि रखते हैं जो एक सकारात्मक निशानी है, लोगों के जागरूक होने की। तसल्ली यह भी हुई कि पंजाब के हालात सुधार की ओर हैं। वैसे नशाखोरी कहां नहीं होती हमारे देश में ! कुछ प्रदेशों में तो शराब वितरण भी वहाँ की सरकारें ही करती हैं। और तो और देश की राजधानी की हालत भी बहुत अच्छी तो नहीं ही कही जा सकती ! इसलिए इस जहर से अपनी नस्लों-पीढ़ियों को बचाने की मुहीम आम जनता को ही छेड़नी पड़ेगी, बिना सरकार का मुंह जोहे !  

सोमवार, 26 नवंबर 2018

'तूँ प्रकाशो दा मुंडा वें ?''.......मेरे पंजाब की बात ही कुछ और है

''काका; सुणीं !'' मैंने मुड कर देखा, एक घर के दरवाजे में बैठीं,  एक बुजुर्ग-वृद्ध महिला मेरी ओर मुखातिब थीं ! मैं उनके पास गया पंजाबी तहजीब के अनुसार उनके चरण स्पर्श किए, उन्होंने ढेरों आशीर्वाद देने के बाद पूछा ''तूँ प्रकाशो दा मुंडा हैं ना; गोगी ?''  प्रकाशवती मेरी माताजी का नाम है और वहां मेरे बचपन का नाम गोगी ही था। माँ का स्वर्गवास हुए दो साल हो चुके हैं। वे भी मेरे साथ ही वर्षों पहले वहां गयीं थीं। मेरा चौंकना स्वाभाविक था, एक तो इतने लंबे अंतराल के बाद मेरा वहां जाना हुआ था, दूसरे वृद्धावस्था में ऐसे ही यादाश्त कमजोर हो जाती है, तीसरा समय के साथ-साथ चेहरे-मोहरे में अनेकों परिवर्तन हो जाते हैं ! चौथा वे हमारे परिवार की सदस्य नहीं थीं, चार-पांच घर छोड़, पडोसी थीं; फिर भी मुझे पहचान रही थीं ...............!

#हिन्दी_ब्लागिंग     
पिछले हफ्ते, करीब सोलह-सत्रह साल बाद अपने ननिहाल हदियाबाद जाने का मौका मिला। इतने सालों में पंजाब तो दो बार गया था, पर यहां नहीं जा पाया था। इस यात्रा के दौरान मुझे दो-तीन जगह सुदूर गावों में जाने का अवसर प्राप्त हुआ। पहला तो अपने ननिहाल हदियाबाद, जो फगवाड़ा शहर से ड़ेढेक की. मी. की दूरी पर फगवाड़ा-नूरमहल रोड पर स्थित है, पर अब शहर का ही हिस्सा बन गया है। वहीं मेरे बड़े और छोटे मामाजी के विदेश गए सदस्यों में बचे हुए सदस्य रहते हैं। दोनों घरों में कुछ ही मीटर का फैसला है। पंजाब के बाहर रहते हुए इन दिनों तरह-तरह की फैली या फैलाई जा रही अफवाहें, खबरें, भ्रामक जानकारियां मिलने-जानने-सुनने की वजह से मन कुछ आशंकित सा था। पर वहां पहुंच कर जो माहौल मिला वह सिर्फ आत्मीयता, प्रेम, वात्सल्य का ही था। वहां के एक नहीं दो-दो वाकयों ने मेरी आँखें नम कर दीं। जिन्हें शायद ही कभी भूल पाऊं ! 

हुआ कुछ यूं कि हदियाबाद के कार्यक्रम के दौरान मैं एक घर से दूसरे घर जा रहा था कि पीछे से आवाज आई ''काका; सुणीं !'' मैंने मुड कर देखा, एक घर के दरवाजे में बैठीं,  एक बुजुर्ग-वृद्ध महिला मेरी ओर मुखातिब थीं ! मैं उनके पास गया पंजाबी तहजीब के अनुसार उनके चरण स्पर्श किए, उन्होंने ढेरों आशीर्वाद देने के बाद पूछा ''तूँ प्रकाशो दा मुंडा हैं ना; गोगी ?''  प्रकाशवती मेरी माताजी का नाम है और वहां मेरे बचपन का नाम गोगी ही था। माँ का स्वर्गवास हुए दो साल हो चुके हैं। वे भी मेरे साथ ही वर्षों पहले वहां गयीं थीं। मेरा चौंकना स्वाभाविक था, एक तो इतने लंबे अंतराल के बाद मेरा वहां जाना हुआ था, दूसरे वृद्धावस्था में ऐसे ही यादाश्त कमजोर हो जाती है, तीसरा समय के साथ-साथ चेहरे-मोहरे में अनेकों परिवर्तन हो जाते हैं ! चौथा वे हमारे परिवार की सदस्य नहीं थीं, चार-पांच घर छोड़, पडोसी थीं; फिर भी मुझे पहचान रही थीं ! भावुक मन और नम आँखें लिए कुछ देर उनके पास बैठा, उतनी ही देर में पचास-साठ सालों का इतिहास ताजा हो गया। फिर इजाजत ले उठ तो गया, पर अभी भी मन में यह बात घुमड़ रही है कि शहरों में बीसियों साल रहने के बाद भी जहां आपकी ज्यादातर पहचान आपके सरनेम या आपके मकान नंबर से ही होती है वहीं सुदूर गांव की एक पड़ोसी महिला को भी पचास-साठ साल बाद भी आपकी माँ और आपका नाम चेहरे समेत याद रहता है ! 

दूसरा वाकया भी ऐसा ही हैरतंगेज था। दूसरे दिन मेरा अपने मौसा जी के बड़े बेटे जीवन तथा उनकी पत्नी सुषमा  जी के साथ उनकी बुआजी के घर जाना हुआ। वे होशियारपुर के पास एक गांव में रहती हैं, मुझे नहीं याद कि मैं उनसे कब मिला था ! शायद चालीस साल पहले इन्हीं भाई की शादी में ! पर उन्हें नब्बे से ज्यादा की उम्र में भी मेरी पहचान थी, सिर्फ एक बार याद दिलाना पड़ा था कि कलकत्ते वाली मासीजी के बेटे हैं ! बस; सब कुछ याद आ गया था ! मेरा नाम तक ! अब वहां से आना मुश्किल ! रात रहने की जिद ! वर्षों बाद मिलने की दुहाई ! 

सोचता हूँ क्या है यह ? कौन सा अपनत्व है ? कौन सा लगाव है ? कौन सी ममता है ? कौन सा रिश्ता है जो वर्षों बाद मिले दूर-दराज के रिश्ते के लोगों को भी गले लगा, अपना वात्सल्य उड़ेलने को तत्पर रहता है ? आज जहां सगे भाई-बहन अपना फर्ज भूलाए बैठे हों वहाँ यह पीढ़ी जग को अपना बनाने से परहेज नहीं करती। आधुनिकता और कमाई की होड़ में जहां आज माँ-बाप से बात तक करने की फुर्सत नहीं मिलती वहीं कुछ लोगों को अपने पराये का भेद ही मालुम नहीं हैं ! यही फर्क है आजकी और पुरानी पीढ़ी का  ! यही फर्क है शहर और गांव का ! यही फर्क है आधुनिकता और पुरातनता का ! यही फर्क है दिल और दिमाग का ! 

शुक्रवार, 23 नवंबर 2018

ब्लैक फ्राइडे, अजीब से नाम वाला एक खरीददारी दिवस

इस दिन से ही अमेरिका और कुछ यूरोपीय देशों में क्रिसमस की खरीददारी की शुरुआत होती है। इस दिन बडी-बडी कंपनियां तरह-तरह के ऑफर तो देती ही हैं, बाजार के छोटे तथा खुदरा व्यापारी भी ग्राहकों को लुभाने और खरीदने को प्रेरित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। पिछले कई सालों से यह दिन खरीददारी का सबसे व्यस्त, बड़ा और लाभप्रद दिन माना जाता है। इसकी कुछ-कुछ तुलना हम अपने यहां के ''धन तेरस'' या चीन के "सिंगल या बैचलर डे''  से कर सकते हैं पर बिक्री के लिहाज से इसकी कोई बराबरी नहीं है.........!

#हिन्दी_ब्लागिंग     
पश्चिमी देशों में बाइबल से जुड़े होने के कारण शुक्रवार का एक अलग महत्व तो है ही उसके अलावा सप्ताहंत दिवस होने के कारण भी यह महत्वपूर्ण हो जाता है, और यदि वह किसी उत्सव से जुड़ जाए तो ? ऐसा ही एक शुक्रवार है ''ब्लैक फ्राइडे'' यानी काला शुक्रवार ! नाम जरूर अजीब है पर इस दिन से ही वहां क्रिसमस की खरीदारी की शुरुआत होती है। इस दिन बडी बडी कंपनियां तरह-तरह के ऑफर तो देती ही हैं, बाजार के छोटे तथा खुदरा व्यापारी भी ग्राहकों को लुभाने और खरीदने को प्रेरित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। पिछले कई सालों से यह दिन खरीददारी का सबसे व्यस्त, बड़ा और लाभप्रद दिन माना जाता है। इसकी कुछ-कुछ तुलना हम अपने यहां के ''धन तेरस'' या चीन के "सिंगल या बैचलर डे''  से कर सकते हैं पर बिक्री के लिहाज से इसकी कोई बराबरी नहीं है।


अमेरिका का एक दिन है थैंक्स-गिविंग डे यानि धन्यवाद दिवस ! जो नवंबर के चौथे गुरुवार को मनाया जाता है। यह हमारे यहां मनाए जाने वाले फसल पर्व की तरह ही है। वहां नवंबर तक फसलों की कटाई हो जाती है, इस काम में आपसी सहयोग के लिए, एक-दूसरे का आभार जताने के लिए इसे मनाते हैं। यह वहां का राष्ट्रीय पर्व है।  इसीके अगले दिन को ब्लैक फ्राइडे कहते हैं, जो तक़रीबन 23 और 29 नवम्बर के बीच आता है। इसी दिन से पारंपरिक तौर पर क्रिसमस की खरीदारी की शुरुआत होती है। इस मोके पर कई विक्रेता अपनी दुकानें बहुत जल्दी, अक्सर 4.00 बजे सबेरे या उससे भी पहले खोल लेते हैं और बिक्री बढ़ाने और ग्राहकों को लुभाने के लिए तरह-तरह के प्रलोभन यथा, ब्‍लैक फ्राइडे डील, स्‍पेशल सेल, क्रिसमस छूट जैसे ऑफर मार्केट में पेश करते हैं। कुछ खुदरा विक्रेता तो इस तिमाही में इतना कमा लेते हैं कि उन्हें वर्ष भर का मुनाफ़ा मिल जाता है। ब्लैक फ्राइडे अमेरिका में एक उत्‍सव की तरह मनाया जाता है। वैसे यह छुट्टी का दिन नहीं होता लेकिन बहुत से नियोक्ता अपने कर्मचारियों को इस दिन छुट्टी दे देते हैं जिससे बाजार में ग्राहकों की संख्या में कई गुना इजाफा हो जाता है।




अब सवाल यह है कि जब यह ग्राहकों के लिए खरीदारी, मौज-मस्ती वाला दिन है, अगर यह दिन खुदरा विक्रेताओं के लिए वर्ष की बिक्री का सबसे बड़ा दिन है तो इसे ब्लैक फ्राइडे क्यों कहा जाता है ? देखा जाए तो यह नाम उन लोगों द्वारा पड़ा, जिनकी मुसीबत इस दिन बढ़ जाती है ! चूँकि यह दिन वर्ष का सबसे व्यस्त खरीदारी का दिन होता है और लगता है, जैसे देश का हर वाशिंदा कुछ न कुछ खरीदने को बाजार में आ निकला है ! लोग जमकर खरीदारी का आनंद लेते हैं, जैसे आज नहीं तो फिर नहीं। इसी कारण वहां गलियों, सड़कों, दुकानों, बाजार-हाट में इतनी भीड़ बढ़ जाती है कि व्यवस्था बनाए रखना और उसे संभालना, यातायात को सुचारु बनाए रखना पुलिस के लिए दूभर हो जाता है। सार्वजनिक वाहनों का चलना-चलाना कष्टसाध्य हो जाता है। दुकानों के रास्ते जाम हो जाते हैं, स्वचालित सीढ़ियों पर लोगों का अंबार लग जाता है, बेकाबू भीड़ का कोई ओर-छोर नहीं होता ! इसी वजह से कई असामान्य व प्रतिकूल परिस्थितियां भी बन जाती हैं, जिनकी वजह से  पुलिस की मुसीबतें-परेशानियां और दिनों की अपेक्षा ज्यादा बढ़ जाती हैं। टैक्सी और बस चालक घंटों जाम में फसे रहने के कारण इस दिन को मुसीबत भरा, सिर दर्द व तनाव बढ़ाने वाला मानते हैं ! उनके अलावा इस दिन परेशान होने वाले वे लोग भी हैं जो दुकानों इत्यादि में काम करते हैं, इस दिन उन्हें अतिरिक्त मेहनत से बिना थके काम करना पड़ता है ! यह कर्मचारियों के लिए कड़ी मेहनत का एक लंबा दिन होता है। इन्हीं सब के चलते इस दिन को ये सब लोग 'ब्लैक फ्राइडे' कहने लग गए जो धीरे-धीरे इस दिन का पर्याय ही बन गया।


विदेशी वस्तुओं, फैशन, रहन-सहन और आयातित त्योहारों की तरह भले ही हम इसे भी अपने यहां मनाने लग जाएं पर दुनिया के कई देश इस दिन को फिजूल और बिना जरुरत की खरीददारी से जोड कर देखते हुए इसे  ''बाय नथिंग डे'' के रूप में मनाते हैं। इस दिन ख़ासकर खरीददारी का विरोध किया जाता है। लोग अपने क्रेडिट कार्ड्स तक को जला देते है और खरीददारी न करने का भी मैसेज प्रचारित-प्रसारित करते हैं ! दुनिया के करीब 65 देश इस दिन को नकारात्मक दिवस के रूप में मनाते है। जिनमें जापान, नीदरलैंड, नार्वे, फ्रांस और युनाइटेड किंगडम जैसे देश शामिल हैं। काश ! हम ''उनसे'' नहीं ''इनसे'' कुछ सीखें ! 

मंगलवार, 20 नवंबर 2018

जयंति, पुण्यतिथि वही, जिससे राजनितिक लाभ मिल सके !

किसी को सरोजिनी नायडू, अरुणा आसफ अली, भीकाजी कामा, कमला देवी चट्टोपाध्याय जैसी अनेकानेक महिलाओं के बारे में भी कुछ जानकारी है ? क्या इन आदरणीय महिलाओं का देश की स्वतंत्रता की लड़ाई में दिया गया योगदान किसी को भी याद नहीं ! या फिर इनकी जंयती या पुण्यतिथि कोई राजनितिक लाभ नहीं दे सकती इसलिए इन्हें याद ही नहीं किया जाता ! इस ओर तो कभी महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिलवाने का शोर मचाने वाले, महिलाओं की हालत पर ग्लिसरिनी आंसू बहाने वाले, तथाकथित लेखक-लेखिकाओं, बुद्धिजीवियों, नाट्य-कर्मियों की तरफ से कोई बयान पढ़ा-सुना नहीं ! ऐसा क्यूँ ? क्या सिर्फ इसलिए क्यूंकि उससे नाहीं दाम मिलता है ना हीं नाम ! नाहीं कोई ''फ़ायदा''..................!

#हिन्दी_ब्लागिंग   
होता होगा किसी जमाने में राजनीती का मतलब देश की सेवा और देशवासियों का उत्थान ! पहले भी मताविरोध होता था, सबका अलग-अलग नजरिया था, अलग-अलग सोच भी थी, पर पक्ष-विपक्ष का ध्येय एक ही होता था, देश की तरक्की और देशवासियों को खुशहाली। पर आज यह अधिकाँश के लिए सिर्फ अपना और अपने कुटुंब को तारने का जरिया हो गया है। हर तरफ झूठ, फरेब, धोखा, छल का बोलबाला नजर आता है। ना कोई आस्था बची है ना हीं कोई निष्ठा ! ना किसी का लिहाज नाहीं किसी का सम्मान ! हरेक को सिर्फ सत्ता चाहिए ! वह भले ही कहीं से, किसी भी तरह, किसी के द्वारा भी मिले ! हालात ऐसे हो गए हैं कि कोई सच भी बोलता है तो लोग शक करने लगते हैं। कोई ईमानदारी से काम करना चाहता है तो उसमें भी खोट खोजा जाने लगा है। 

आज लोगों का विश्वास पूरी तरह से नेता बिरादरी से उठ गया है। ज्यादातर लोग उनकी चालों को समझने लगे हैं। उनके कहने को कोई गंभीरता से नहीं लेता ! ये बात महानुभाव लोग भी समझ गए हैं इसीलिए इन दिनों एक नया चलन सामने आया है ! वह यह कि चुनाव इत्यादि के समय, साफ़-सुथरी छवि वाले, किसी नामी खानदान से जुड़े, अराजनीतिक लोगों से कोई ऐसी बात कहलवाना जिससे उकसाने वाले की मंशा पूरी हो जाए ! इससे अजीब सा माहौल हो गया है ! कोई भी उठ कर कुछ भी कहने लगता है ! जैसे, नीयत कुछ भी हो, अभी भाजपा ने ग्वालियर की राजमाता सिंधिया की जन्मशती मनाई। ग्वालियर कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा की सीट है। उसे लगा होगा कि कहीं चुनावी ऊंट करवट ना बदल दे ! पर इस आयोजन का विरोध भी नहीं किया जा सकता। पर कुछ तो होना ही चाहिए था, शायद इसी लिए  अब एक व्यक्तव्य तारा भट्टाचार्य, की तरफ से आया या दिलवाया गया है कि ''मोदी सरकार राजमाता सिंधिया की जन्मशती मना रही है लेकिन ''कस्तूरबा गांधी जी'' की 150वीं जयंती मनाने के लिए कोई राष्ट्रीय समिति नहीं बनी !''

अभी सरदार पटेल की मूर्ति का विवाद थमा नहीं है, जिसमें बार-बार भाजपा पर आरोप लगता है कि उसने कांग्रेस के नेता को अपना बनाने की कोशिश की है। तो यदि इधर से कस्तूरबा जी की 150 जयंती का आयोजन भी कर दिया जाए तो विघ्नसंतोषी क्या गांधी जी का भी भगवाकरण करने का आरोप नहीं लगाएंगे ? क्योंकि गंदी राजनीती ने देश तो देश, नेताओं को भी बाँट कर रख दिया है। अब उनके कर्मों, उनके देश के लिए किए गए बलिदान, उनके त्याग की बात नहीं देखी जाती, सिर्फ उनके समय उनकी पार्टी को देख-दिखा कर उनका दर्जा तय किया जाता है। इसके साथ ही सवाल यह भी उठता है कि क्या इसके पहले ''बा'' की 50वीं या 100वीं जयंती मनाई गयी थी ? जो इसी बार अनदेखा होने की बात की जा रही है ! क्या इस बारे में कोई प्रस्ताव भेजा गया था या सिर्फ मौके को ताड़ कर आलोचना शुरू कर दी गयी है ! ज्यादा संभावना तो इसी बात की है कि चुनाव के कारण राजमाता के कार्यक्रम का विरोध भारी पड़ जाएगा इसलिए  इस बात को कहलवाया गया है ! जिसने भी यह बात उठवाई है क्या उसे सरोजिनी नायडू, अरुणा आसफ अली, भीकाजी कामा, कमला देवी चट्टोपाध्याय जैसी महिलाओं के बारे में भी कुछ जानकारी है ? ये तो कुछ नाम हैं, ऐसी अनगिनत महिलाओं ने अपनी जान, घर, परिवार की चिंता किए बगैर अपने आप को स्वतंत्रता के लिए होम कर दिया ! इसके बदले में उनके परिवार ने भी कभी देश से कुछ नहीं चाहा ! शायद इसी कारण उन्हें भुला भी दिया गया ! पर जिनके नाम याद भी हैं, उन आदरणीय महिलाओं की किसी को भी याद नहीं आती ? या फिर इनकी जंयती या पुण्यतिथि कोई राजनितिक लाभ नहीं दे सकती इसलिए इन्हें याद ही नहीं किया जाता ! इस ओर तो कभी महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिलवाने का शोर मचाने वाले, महिलाओं की हालत पर ग्लिसरिनी आंसू बहाने वाले, तथाकथित लेखक लेखिकाओं, बुद्धिजीवियों, नाट्य-कर्मियों की तरफ से कोई बयान पढ़ा-सुना नहीं ! ऐसा क्यूँ ? क्या सिर्फ इसलिए क्यूंकि उससे नाहीं दाम मिलता है ना हीं नाम ! नाहीं कोई ''फ़ायदा'' !
इस पर भी कभी कोई सोचेगा, बात उठाएगा, धरना देगा ! शायद नहीं !!  

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