pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

गुरुवार, 2 जुलाई 2020

हमारी दादी ! ऐसे होते थे स्वतंत्रता सेनानी

यदि दादी से किसी ने मजाक में ही कह दिया कि माताजी, चाचे से (नेहरू जी से) किसी घर-वर की बात कर लो: तो हत्थे से उखड जातीं ! खूब डांट-डपट-लानत-मलानत होती ! फिर शांत होने पर समझातीं कि देश को बनाना है, संवारना है, दुनिया में उसका नाम रौशन करना है। हर तरह से, तन-मन से उसकी सहायता करनी है, ना कि उससे ले-ले कर उसे कमजोर बनाना है ! आज समय बहुत बदल गया है ! कुछ लोग सिर्फ अपने पुरखों के नाम और कर्मों की बदौलत हितग्राही बन, वह भी अनधिकृत रूप से, सुख-सुविधा भोगते और उसका दुरुपयोग करते दिखते हैं ! ऐसा होते देख मन में कई सवाल तो जरूर उठते हैं, पर कभी भी अपनी दादी माँ की भावना और उनके द्वारा लिया गया निर्णय गलत नहीं लगता ..........!

#हिन्दी_ब्लॉगिंग    
देश को आजाद करवाने के लिए सालों लड़ाइयां लड़ी गईं। जुल्म सहे गए ! कुर्बानियां दी गईं ! उस समय एक ही लक्ष्य, एक ही उद्देश्य, एक ही जज्बा था, किसी भी तरह गुलामी से मुक्ति ! धीरे-धीरे समय आगे बढ़ता रहा। देश-विदेश की परिस्थितियां बदलती रहीं। फिर एक समय ऐसा आ गया कि आजादी सामने दिखने लगी। ऐसे में कई चतुर लोग मौका भांप, जान-माल के खतरे की नगण्यता को सूँघ इस अभियान में शामिल हो स्वतंत्रता सेनानी का ओहदा पा गए। ऐसे लोगों को देश की हालत से कोइ मतलब ना था ! ये अपनी तिकड़मों के चलते परतंत्रता में भी संपन्न और खुशहाल थे। पर इनकी पारखी आँखों ने आजादी के बाद की लूट-खसोट का जायजा ले लिया था। इनकी ''कुर्बानियां'' गजब का रंग लाईं और आने वाले समय का भाग्य-विधाता बना गईं। 

हमारी दादी, पूरा परिवार उन्हें माताजी के नाम से संबोधित करता था। प्रेमिल भी बहुत थीं पर परिवार पर रुआब भी था। कलकत्ते के आर्यसमाज की अग्रणी कार्यकर्ता ! अंग्रेजों के विरोध में दसियों बार जेल गईं ! आजादी के कुछ महीनों पहले, अलीपुर जेल में आभा मायती जी, जो आजादी के बाद में बंगाल में मंत्री बनी, के साथ तिरंगा चढ़ाने की सजा के रूप में दी गई प्रतारणा स्वरुप अपनी आँखों की रौशनी भी गंवा दी ! उन दिनों भले ही घर की माली हालत अच्छी नहीं थी ! फिर भी आजादी के बाद सरकार से कभी किसी भी तरह की अपेक्षा या लाभ का सोचा भी नहीं ! वैसी इच्छा को कभी पनपने ही नहीं दिया ! एक ही मूल मंत्र ''देश से कुछ पाने के लिए हमने लड़ाइयां नहीं लड़ीं,'' ऐसा कहते हुए चुपचाप गुमनामी की चादर ओढ़ जिंदगी गुजार दी ! 
हमारी दादी माँ 
उम्र कम होने के कारण उस समय हमें क्या पता था कि आजादी क्या होती है और गुलामी क्या ! पर वे तकरीबन रोज महापुरुषों की गाथाएं सुनाया करती थीं। जेहन में गहराई तक पैबस्त एक-दो वाकये कभी नहीं भूलते। जैसे अबुल कलाम आजाद जी के देहावसान के दिन घर में खाना नहीं बना था ! शोक ग्रस्त रहीं थीं दिन भर। पंद्रह अगस्त के दिन काफी खुश रहती थीं। सुबह से नहा-धो कर खादी की साड़ी पहन, हारमोनियम पर भजन-तराने गाया-सुनाया करती थीं। जब हम कुछ बड़े हुए तो यदि मजाक में ही कह दिया कि माताजी, चाचे से (नेहरू जी से) किसी घर-वर की बात कर लो: तो घर में तूफान का उठना लाजिमी था ! हत्थे से उखड जातीं ! खूब डांट-डपट-लानत-मलानत होती ! प्यार बहुत करती थीं, इसलिए कभी उनसे ठुकाई नहीं मिली ! फिर शांत होने पर समझातीं कि देश को बनाना है, संवारना है, दुनिया में उसका नाम रौशन करना है। हर तरह से, तन-मन से उसकी सहायता करनी है, ना कि उससे ले-ले कर उसे कमजोर बनाना है ! 
 
कभी-कभी साक्षात अपने साथ हो चुकी उन सब बातों पर आश्चर्य भी होता है, कि क्या सचमुच ऐसे लोग हुए थे ! पर हुए थे तब ही तो देश आजादी पा सका ! आज समय बहुत बदल गया है ! उस समय के लोग बहुत कम बचे हैं ! जो बचे भी हैं वे अप्रासंगिक हो चुके हैं। मान्यताएं बदल गयी हैं ! देश हाशिए पर सिमट गया है ! मैं और मेरा परिवार प्रमुख हो गए हैं ! ज्यादातर सत्ता उन लोगों के हाथ में चली गई है जिनकी पिछली पीढ़ी ने भी स्वतंत्रता की लड़ाई के बारे में किताबों में ही पढ़ा होगा ! बहुतों ने तो पढ़ने की जहमत भी नहीं उठाई होगी ! इसीलिए आज जब कुछ लोग सिर्फ अपने पुरखों के नाम और कर्मों की बदौलत हितग्राही बन, वह भी अनधिकृत रूप से, सुख-सुविधा भोगते और उसका दुरुपयोग करते दिखते हैं, तो मन में कई सवाल तो जरूर उठते हैं, पर कभी भी अपनी दादी माँ की भावना और उनके द्वारा लिया गया निर्णय गलत नहीं लगता ! हाँ, उनके बारे में सोचते हुए या उनकी याद आने पर आँखें जरूर नम हो जाती हैं ! 

बुधवार, 1 जुलाई 2020

कुछ तो विवेक होना ही चाहिए

समय बदलेगा तो हर जगह शुचिता आएगी ! तब शायद शासक को सही दिशा दिखाने के लिए ही विरोध हो ! देश के अवरोध के लिए नहीं ! विरोध हो गलत नीतियों का ! गलत फैसलों का ! गलत व्यक्ति का ! तब शायद सम्मानीय पद की प्रतिष्ठा बनी रहे ! देश की मर्यादा, उसकी गरिमा, उसकी अखंडता अक्षुण्ण रहे ! उस पर आक्षेप करने वाला दस बार सोच कर भी हिम्मत ना जुटा पाए कुछ अनर्गल बोलने की ! निरपेक्ष संस्थाओं को आदर मिले ! जवानों को भारत रत्न माना जाए ! शायद वह सुबह आ ही जाए.........!

#हिन्दी_ ब्लागिंग  
यदि मुझे जीवन में सफल होना है, अपना लक्ष्य प्राप्त करना है, अपने आप को साबित करना है, परंतु इसके साथ ही मुझे अपने पुराने कारनामे, हरकतें, करतूतों का कच्चा चिठ्ठा भी याद और मालूम हो; तो मैं यही कोशिश करूंगा कि वह मेरी और लोगों की यादों में ही दफ़न रहे। बचूंगा ऐसे कारगुजारियों से जिनसे मेरा विगत फिर लोगों के जेहन में सर उठा, मेरी परेशानी का सबब बने। पहचानूंगा और दूरी बना कर रखूंगा ऐसे लोगों से जो मेरे कंधों का इस्तेमाल कर अपना हित साधना चाहते हों ! नाहक दूसरों की बखिया उधेड़ने से पहले अपने खटिए के नीचे सोटी जरूर घुमा लूंगा। पर यह सब तो तभी संभव है जब प्रकृति-प्रदत मेरी समझदानी खाली ना हो ! मेरा विवेक मेरे साथ हो ! मुझे अच्छे-बुरे की पहचान हो ! मेरा मन द्वेष, ईर्ष्या, अहम, लालसा, कुंठा, पूर्वाग्रहों आदि व्याधियों से मुक्त हो !   
 
आज हो ठीक इसका उल्टा रहा है। लोगों ने अपने चारों ओर खुदगर्जों, चारणों, पिछलग्गुओं  की चारदीवारी घिरवा खुद को सुरक्षित, पाक-साफ़ मान लिया है। हकीकत से दूर घेरे के अंदर वे वही देखते-सुनते हैं जो दिखलाया, सुनाया, समझाया जा रहा है ! जो कर्णप्रिय हो, सुहाता हो, मन लायक हो ! उसी के अनुसार बिना परिणाम जाने ये लोग आकाश की तरफ मुंह उठा थूके जा रहे हैं ! कीचड़ में पत्थर मारे जा रहे हैं ! लियाकत नहीं, चेहरे-मोहरे, पहरावे, चाल-ढाल की बदौलत खुद को अपने पूर्वजों के समकक्ष लाने की व्यर्थ कोशिश कर मजाक के पात्र बने जा रहे हैं। पूर्वजों की उपलब्धियों को गिना कर खुद को महान कहलवाने की जुगत हो रही है। उपलब्धियां भी कैसी जो समय के साथ अब ''ब्लंडर्स'' सिद्ध होने लगी हैं। 

अब सीधी व सच्ची बात ! देश के तीन सर्वोच्च नेताओं की अकाल मृत्यु को सदा देश के लिए दी गई कुर्बानी के तौर पर प्रचारित कर भुनाया गया ! हालांकि हम सब उनकी बहुत इज्जत करते हैं। देश के लिए उनके योगदान को किसी भी तरह नकारा नहीं जा सकता। पर ऐसा लगता है कि तीनों मौतें, अदूरदर्शिता, अति-आत्मविश्वास और दूसरों के आकलन में हुई भयंकर भूलों का परिणाम थीं। पर आखिर थे तो वे भी इंसान और इंसान से भूल होती ही है ! पर उसको अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए अस्त्र बनाना कतई उचित नहीं है। हमारी प्रथा है कि दिवंगतों का सदा आदर ही किया जाता है ! उन के लिए ऐसा लिखना बिलकुल अच्छी बात नहीं है ! पर जब संबंधित जिम्मेदार लोग ही रोज खुद अपना ही तमाशा बनवाने पर उतारू हों तो ना चाहते हुए भी...............!    

पहला देहावसान, खुद को जगत्प्रिय, शांतिदूत, महान समझने की गलतफहमी और आत्मसम्मोहन का दुखद परिणाम था ! जो पड़ोसी की कुटिलता, उसकी दगाबाजी के सदमे और युद्ध में करारी हार के कारण आवाम के बीच अपनी छवि बुरी तरह ध्वस्त होने के कारण हुआ था ! दूसरा हादसा, व्याघ्र को पाल-पोस कर पनपाने और फिर उसको पालतू और वफादार समझने की भयंकर भूल का परिणाम रहा ! सारा देश पहली ऐसी घटना का साक्ष्य बन स्तब्ध रह शोकसागर में डूब गया था ! चेतावनी के बावजूद यहां भी अति-आत्मविश्वास जिंदगी के आड़े आ गया था। जिसकी प्रतिक्रिया को भुलाने में समय को भी समय लग जाएगा ! तीसरी बार खुद के प्रवासी देशवासियों की मुसीबतों को नजरंदाज कर पड़ोसी के घाव पर मरहम लगाने का प्रयास, वह भी विशेषज्ञों की सलाह के बगैर, जानलेवा सिद्ध हुआ।  

उस समय तक आपस में इतनी वितृष्णा नहीं हुआ करती थी ! हालांकि तीनों बार देश संकटग्रस्त हुआ, उस पर विपदा के बादल छाए और प्रगति थम सी गई। आम इंसान सच में दुखी हुआ ! सभी को लगा जैसे गमी उसके घर में ही हुई हो ! पर इसको भी सदा के लिए ब्रह्मास्त्र बना के रख लिया गया। दल के ''रामु काकाओं' ने आवाम को भरमा, इन हादसों को गर्व का विषय बनाने में कोई कसर ना छोड़ रखी। कसर तो तब भी नहीं छूटी थी, जब इस दल की नेता ने, दस पार्टियों की सहायता से बन रही सरकार को ना संभाल पाने का ख़तरा भांप, सर्वोच्च पद स्वीकार नहीं किया था और उसे चमचों ने त्याग का चोला पहना एक अलग छवि गढ़ने की नाकाम कोशिश कर दी थी ! 

आजादी  के बाद से अब तक दुनियावी मंच पर नौ रसों, चारों विधियों, सोलह कलाओं सहित ऐसा और कोई भी क्षेत्र नहीं है, जिसमें इन्हें विशेषता हासिल ना हो ! तब से आज तक ऐसा कुछ भी नहीं घट पाया, जिसमें अपना मतलब ना सिद्ध कर लिया गया हो ! देश में घटी हर आडी-टेढ़ी बात में इनकी मौजूदगी दर्ज है। पर वह सब भूल, यह समझने की गलतफहमी पाल, कि किसी को सच्चाई का क्या पता ! अपने आप को अभी भी सामयिक या देश की जरुरत बताने के लिए, बिना किसी संकोच के, कुछ भी बोल दिया जाता है चाहे वह निरा झूठ ही क्यों ना हो ! आज बढ़ते वैमनस्य, घटती सहिष्णुता और व्यक्ति पूजन के कारण छुटभैय्यों तक को बोलने की खुली छूट दे दी गई है ! आज चुप रहना अपनी हेठी और बोलना शेखी समझा जाने लगा है ! अब विषय, समय या स्थान नहीं देखा जाता ! अब बोलना मुख्य उद्देश्य हो गया है ! कभी भी, कहीं भी, कुछ भी बोलो ! झूठ बोलो ! बार-बार बोलो ! पर दृढ़ता के साथ बोलो ! विश्वास करने वाले हजारों मिल जाएंगे ! क्योंकि आवाम यह नहीं देखती कि क्या बोला जा रहा है, वह यह देखती है कि कौन बोल रहा है !    

आज हालांकि व्यक्तिगत हित, अपने स्वार्थ, अपनी महत्वकांक्षाओं के सामने सब कुछ....सब कुछ गौण  हो गया है, पर कहते हैं ना, कि कोई भी चीज स्थाई नहीं होती ! हर चीज का अंत होता है ! इतिहास अपने को दोहराता है ! अच्छा परिवेश, माहौल नहीं रहा, तो बुरा भी नहीं रहेगा ! समय बदलेगा तो हर जगह शुचिता आएगी ! तब शायद शासक को सही दिशा दिखाने के लिए ही विरोध हो ! देश के अवरोध के लिए नहीं ! विरोध हो गलत नीतियों का ! गलत फैसलों का ! गलत व्यक्ति का ! तब शायद सम्मानीय पद की प्रतिष्ठा बनी रहे ! देश की मर्यादा, उसकी गरिमा, उसकी अखंडता अक्षुण्ण रहे ! उस पर आक्षेप करने वाला दस बार सोच कर भी हिम्मत ना जुटा पाए कुछ अनर्गल बोलने की ! निरपेक्ष संस्थाओं को आदर मिले ! जवानों को सर्वोपरि व भारत रत्न माना जाए ! शायद वह सुबह आ ही जाए !

सोमवार, 29 जून 2020

एक था धीरेंद्र ब्रह्मचारी

आज जब जीवन के नवरसों में आकंठ डूबे, पारांगत, निष्णात, मर्मज्ञ लोगों द्वारा कुछ आध्‍यात्मिक गुरुओं के दवा निर्माण या उनके कारोबार की आलोचना होते देखा-सुना है तो पूर्व नेताओं द्वारा पालित-पोषित ऐसे बाहुबली बाबाओं का इतिहास बरबस सामने आ खड़ा होता है, जिन्होंने अपने स्वार्थ और महत्वाकांक्षा के चलते देश की राजनीती की दिशा और दशा बदलने में कोई कसर छोड़ नहीं रखी थी। उन जैसे स्नातकों के सामने तो आज के बाबा पहली क्लास के शिशु नजर आते हैं...........................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
हमारे नेता या राजनितिक पार्टियां चाहे कितना भी अपने को धर्मनिरपेक्ष कह लें या दिखाने की कोशिश करें पर सच्चाई यह है कि यह सब कहने को ही होता है। धर्म और धार्मिक बाबाओं का राजनेताओं से सदा ही चोली-दामन का साथ रहा है। हमारे यहां ऐसे बाबाओं की लम्बी फेहरिस्त रही है। ये लोग अपने अनुयायियों की विशाल संख्या और आम जनता पर अपने प्रभाव का उपयोग या दुरुपयोग सत्ता में बैठे लोगों के हितों के लिए कर बदले में जमीन, रसूख, अनुदान, विदेश में पैठ आदि अनेकानेक सहूलियतें हासिल करते रहे हैं ! एक तरह से ये एक दूसरे के पूरक कहे जा सकते हैं।इस भाईचारे की शुरुआत सही मायने में सत्तर के दशक में इंदिरा गांधी के शासन काल में हुई। जब एक विवादित योग गुरु ने पूरे गांधी परिवार को अपने प्रभाव में ले भारतीय राजनीती तक को प्रभावित कर डाला था। 

दिल्ली की फ्रेंड्स कालोनी ! राजधानी के पॉश इलाकों में से एक ! उस समय जब ज्यादातर दिल्ली सायकिलों पर चलती थी तब भी इस कॉलोनी में एक से बढ़कर एक विदेशी लग्‍जरी कारें खड़ी नजर आती थीं। उसी कालोनी की ए-50 नंबर की कोठी में नेताओं, अभिनेताओं, उद्योगपतियों का दिनभर आना-जाना लगा रहता था। यह निवास था एक योग गुरु धीरेंद्र ब्रह्मचारी का ! उससे ज़रा सी भेंट ही लोगों को उपकृत व धन्य महसूस करवा देती थी। इस आदमी का सितारा बुलंदी पर था ! पूरी दिल्ली में उसके जलवे थे। कारण उसने अपनी तिकड़मों से नेहरू जी को प्रभावित कर इंदिरा का योग गुरु होने का सम्मान प्राप्त कर लिया था। पर धीरे-धीरे इंदिरा पर ऐसा प्रभाव डाल दिया कि कहते हैं इसके कारण बाप-बेटी में भी झड़प हो जाती थी। जब वे प्रधान मंत्री बनीं तब तो उसका तकरीबन रोज ही प्रधानमंत्री आवास, 1 सफदरजंग रोड, में आना-जाना होने ला गया था। 1975 के आपादकाल में इनके रिश्तो को लेकर कुछ अटकलों का बाज़ार भी गर्म हुआ था। इमरजेंसी के दिनों में इसकी ताकत इतनी बढ़ गई थी कि मंत्रियों को अपने पोजीशन को बचाने के लिए ब्रह्मचारी की जी हुजूरी करनी पड़ती थी। इसका जीता-जागता उदाहरण आई. के. गुजराल का था. जो इसकी ताकत का अंदाजा ना लगा पा कर अपनी कुर्सी गंवा बैठे थे। उन्हीं दिनों कुछ पत्रकारों ने बाबा को ‘भारतीय रास्पुतिन'' का नाम दे दिया था।
इस आदमी ने कभी अपने जन्म और जन्मस्थान का खुलासा नहीं किया। लोगों के लाख पूछने पर भी कभी अपने परिवार की बात नहीं की ! बस यही कहता रहा कि योगी की कोई उम्र नहीं होती, मैंने 13-14 साल की उम्र से ही योग अपना लिया है। पर अटकलें यही थीं कि बिहार के गांव चानपुरा के इस इंसान का असली नाम धीरचन्द्र चौधरी था जो समय के बलवान होते ही स्वामी धीरेन्द्र ब्रह्मचारी बन गया और उसके शिष्यों में प्रधानमंत्री से लेकर छोटे बड़े बहुत से सामर्थ्यवान लोग और नेता शामिल होते चले गए ! उसका रहन-सहन उस दौर के बड़े-बड़े सेलिब्रिटीज से भी इक्कीस हुआ करता था ! उस समय जब देश के गिने-चुने लोग ही हवाई सफर कर पाते थे उस समय इसके पास अपना लग्जरी जेट विमान था। जो आज भी गुड़गांव के एक हैंगर में पड़ा जंग खा रहा है। 

यह ठीक है कि योग का प्रचार करने में उसकी अहम् भूमिका रही। दूरदर्शन पर योग की क्रियाएं दिखाने की शुरुआत भी उसी ने की थी, भले ही उसके शिष्यों के वस्त्रों या कैमरे के कोणों से वे आलोचित भी रहीं। इसके साथ ही यह योग गुरु रहस्यमय ढंग से विवादित और चर्चित भी रहा। धीरे-धीरे वह इंदिरा गांधी का सलाहकार और राजदार भी बन गया। आपातकाल में तो उसके जलवे देखने लायक थे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इंदिरा गांधी के लगभग सभी बड़े फैसलों में उसकी अहम् भूमिका रहती थी ! कहा तो यहां तक जाने लगा था कि इंदिरा गांधी संजय गांधी के बाद सबसे ज्यादा भरोसा इसी पर किया करती थीं। यह विश्वास इतना बढ़ गया था कि कैबिनेट के फैसलों में भी इस ब्रह्मचारी की भूमिका रहने लगी थी ! मंत्रियों का बनना, हटना भी इसके इशारे पर होने लगा था। संजय की मृत्योपरांत तो इंदिरा जी की निर्भरता उस पर और भी बढ़ गई थी। 
रास्पुतिन
अब सत्ता के पावर के साथ जो ''गुण'' आते है, वे आए और धीरे-धीरे इस स्वामी की असलियत लोगों के सामने आने लगी। उस पर जमीन हड़पने से लेकर अवैध हथियार रखने जैसे कई आपराधिक आरोप लगने लगे ! इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने अपनी किताब ''इंडिया ऑफ्टर नेहरू'' में उसे बड़ा बिजनेसमैन निरूपित किया है। जिसके अनुसार जम्‍मू के गांधी नगर इंडस्ट्रियल एस्‍टेट में शिव गन नाम से इसकी फैक्‍ट्री हुआ करती थी। जिसका टर्नओवर उस समय लाखों में था ! यह योग गुरु उस दौर का सबसे बड़ा आर्म डीलर माना जाने लगा था। गुहा के मुताबिक, उस दौर के लगभग सभी बड़े रक्षा सौदों में उसकी भूमिका अहम होती थी. उस दौर में स्वीडन की कई कंपनियों से उसके संबंध भी थे। 1990 के दौर में धीरेंद्र ब्रह्मचारी के ऊपर अपनी गन फैक्ट्री में अवैध विदेशी हथियार रखने के आरोप लगे। पुलिस ने ब्रह्मचारी समेत उनके कई करीबियों पर मुकदमा दर्ज किया पर रसूख के कारण उसे अदालत से जमानत पर रिहाई मिल गई। हालांकि जैसा चलन है ब्रह्मचारी इसे खुद को बदनाम करने की साजिश करार देता रहा। यही नहीं गैर कानूनी कार्यों के चलते उसके जम्मू स्थित अपर्णा आश्रम के साथ-साथ और अनेकों सम्पत्तियों को भी सन 2000 में हाईकोर्ट के आदेश के बाद सीज कर दिया गया था। उससे जुड़े कुछ राज अभी भी राज ही बने हुए हैं। 

इंदिरा गांधी की ह्त्या, दैवयोग से जिसका कारण भी एक विवादास्पद बाबा ही था, के बाद धीरेन्द्र ब्रह्मचारी के सितारे भी गर्दिश में आ गए ! कानून का शिकंजा भी कसता जा रहा था ! धीरे-धीरे सब कुछ मिटने लगा। और फिर 9 जून 1994 कोअपने कस्बे मानतलाई को सिंगापुर बनाने का अधूरा सपना लिए इस बाहुबली, विवादास्पद बाबा की मृत्यु भी संजय गांधी की दुर्घटना की तरह ही हो गई, जब उसका प्राइवेट प्लेन उसके मानतलाई आश्रम की हवाई पट्टी पर उतरने के दौरान पेड़ों से टकरा गया ! इस दुर्घटना में उसके साथ उसका पायलेट भी मारा गया था ! विडंबना रही कि अपने और संजय के दोनों विमानों को इसी के द्वारा ऐशो-आराम के लिए बाहर से आयात किया गया था।  

आज जब जीवन के नवरसों में आकंठ डूबे पारांगत, निष्णात, मर्मज्ञ लोगों द्वारा कुछ आध्‍यात्मिक गुरुओं के दवा निर्माण या उनके कारोबार की आलोचना होते देखा-सुना जाता है तो पूर्व नेताओं द्वारा पालित-पोषित ऐसे बाहुबली बाबाओं का इतिहास बरबस सामने आ खड़ा होता है, जिन्होंने अपने स्वार्थ और महत्वाकांक्षा के चलते देश की राजनीती की दिशा और दशा बदलने में कोई कसर छोड़ नहीं रखी थी। उन जैसे स्नातकों के सामने तो ये लोग पहली क्लास के शिशुओं की तरह हैं। आजके बाबाओं का व्यापार विदेशी कंपनियों को खुली चुन्नौती दे रहा है, जो उनके दलालों के गले की हड्डी बन गई है। शायद इसीलिए बिना जांचे-परखे सिर्फ विरोध के लिए विरोध किया जा रहा है।  
@संदर्भ अंतरजाल   

सोमवार, 22 जून 2020

दुर्वासा ऋषि का क्रोध बना था समुद्र मंथन का कारण

यह अपने समय का, या यूं कहें कि सर्वकालीन एक अकल्पनीय व अभूतपूर्व उपक्रम था ! कोई सोच सकता था भला कि दुर्वासा के एक श्राप से सारे जगत में कैसी उथल-पुथल मच जाएगी। शिव को विष पान करना पड़ जाएगा ! देवता अमर हो जाएंगे ! सूर्य-चंद्र ग्रहण होने लगेंगे ! अयप्पा का जन्म होगा ! राक्षसी महिषि का असंभव सा वध भी संभव हो पाएगा ! धरा तरह-तरह की नेमतों से अलंकृत हो जाएगी ! कुंभ जैसे वृहद एवं चिरस्थाई उत्सवों का आयोजन होने लगेगा ! इत्यादि....इत्यादि....इत्यादि....!
   
#हिन्दी_ब्लागिंग 
संसार में घटने वाली बड़ी घटनाओं या वाकयात के पीछे महीनों पहले निर्मित हुई परिस्थितियों या कारणों का हाथ जरूर होता है। कभी-कभी तो ये इतने मामूली होते हैं कि कोई सोच भी नहीं सकता कि इनके कारण भविष्य में सारे जगत को प्रभावित करने वाली कोई घटना भी घट सकती है। फिर चाहे दुर्वासा का क्रोध हो जो देवासुर संग्राम का जरिया बन गया ! चाहे मंथरा की जिद जिसने राम-रावण युद्ध की भूमिका रच डाली ! द्रौपदी की एक हंसी ने सारे आर्यावर्त को रुदन के सागर में डुबो दिया ! आर्चड्यूक फ़र्डिनेंड की हत्या प्रथम विश्वयुद्ध का कारण बन गई या फिर विश्व की 1929-30 की आर्थिक मंदी ने द्वितीय महायुद्ध का आह्वान कर डाला हो ! कौन सोच सकता था कि ऐसी बातों से भी सारा संसार आपस में एक-दूसरे के खून का प्यासा हो जाएगा ! पौराणिक काल में भी एक ऐसी ही छोटी सी बात आज तक की सबसे विस्मयकारी, अद्भुत, अकल्पनीय घटना, समुद्र मंथन का कारण बन गई थी।  
यह उस समय की बात है जब अभी पृथ्वी का विकास और निर्माण पूरा नहीं हुआ था। सिर्फ सुमेरु पर्वत के आस-पास का इलाका ही रहने योग्य हो सका था बाकी चारों ओर सब जगह पानी ही पानी था। उसको रहने लायक और मानव योग्य बनाने का उपक्रम चल रहा था। इसलिए अभी देवता, अपने दायाद बंधु, असुरों के साथ ही धरती पर रहते थे। परन्तु यह काम उनके अकेले के वश का नहीं था। इस विशाल, महान, श्रमसाध्य कार्य के लिए कई दैवीय शक्तियों और उपकरणों की आवश्यकता थी। दैवीय उपकरण सागर मंथन से ही उपलब्ध हो सकते थे और इसके लिए यह जरुरी था कि दैत्य-दानव जैसी आसुरी शक्तियों का भी सहयोग लिया जाए। पर सुर और असुर एक दूसरे के जानी दुश्मन थे ! इस समस्या को सुलझाने के लिए त्रिदेवों ने काफी सोच विचार कर एक योजना बनाई और असुरों को साथ लाने का कारण गढ़ा गया। 
एक बार दुर्वासा ऋषि को, विश्राम के दौरान, उनके आश्रम में कुछ विद्याधरों ने दिव्य संतानक पुष्पों की माला अर्पित की। माला की सुगंध दूर-दूर तक फैल रही थी। उसी समय उधर से गुजरते हुए, अपने हाथी पर आरूढ़ इंद्र ने ऋषि को प्रणाम किया। दुर्वासा ने खुश हो कर वह माला इंद्र को दे दी। पर इंद्र ने उपेक्षा पूर्वक उसे हाथी के गले में डाल दिया। पुष्पों की तेज गंध से गजराज ने परेशान माला को तोड़ अपने पैरों से कुचल डाला। अपने उपहार का तिरस्कार होता देख दुर्वासा अत्यंत क्रोधित हो उठे और उन्होंने इंद्र को श्राप देते हुए कहा कि, ''हे इंद्र ! जिस वैभव का तुम्हें इतना अभिमान है वह ख़त्म हो जाएगा और उसके साथ ही तुम भी श्री हीन हो जाओगे !'' इंद्र की किसी भी अनुनय-विनय का ऋषि पर कोई असर नहीं हुआ। श्राप के कारण इंद्र निस्तेज हो गया ! उसके साथ ही अमरावती और देवों की शक्तियों का भी ह्रास हो गया। इस बात की खबर मिलते ही असुरों ने अपने शक्तिशाली राजा बलि के नेतृत्व में स्वर्ग लोक पर आक्रमण कर उसे वहां से निष्काषित कर दिया। इंद्र सहित सारे देवता विष्णु जी के पास गए और उनसे अपनी विपदा कही। तब विष्णु ने उन्हें दानवों की मदद से समुद्र मंथन करने की सलाह दी। दानवों को मनाने के लिए उन्हें अमृत का लालच देने की सलाह भी दी। अमरत्व की लालसा में असुर राजी हो गए।
क्षीरसागर, जो आज हिंद महासागर कहलाता है, को मंथन के लिए चुना गया ! मदरांचल पर्वत को, जो आज के बिहार के बांका जिले में स्थित है, मथानी  का रूप तो दे दिया गया पर अथाह सागर में उसको टिकाना सबसे बड़ी समस्या बन गई ! तब फिर विष्णु जी ने देवताओं की सहायता के खातिर कच्छप का रूप ले सागर के बीचोबीच अपने को स्थिर कर मदरांचल को अपनी पीठ पर टिका लिया। नेती के रूप में वासुकि नाग की सहायता ली गई। उसके घोर कष्ट को देखते हुए उसे गहन निद्रा का वरदान दिया गया। फिर भी विष्णु जानते थे कि मंथन के दौरान रगड़ से वासुकि को अपार कष्ट होगा जिससे उसकी जहरीली फुफकार निकलेगी उससे देवताओं की रक्षा जरुरी होगी। इसलिए उन्होंने इंद्र से कहा कि मंथन के पहले तुम सब आगे बढ़ कर वासुकि के मुंह को थाम लेना और असुरों से कहना कि हम तुमसे श्रेष्ठ हैं, इसलिए हम मुंह की ओर रहेंगे। इंद्र ने जब ऐसा किया तो असुर भड़क गए और बोले, अरे इंद्र ! तुझे अभी भी लाज नहीं आती जो हमसे हारने के बाद भी अपने आप को श्रेष्ठ समझता है ! तुम सब अधम हो और अधम ही रहोगे। इसलिए पूंछ वाला हिस्सा ही तुम्हारा उचित स्थान है। देवता तो चाहते ही यही  थे, वे बिना ना-नुकुर किए दूसरी तरफ चले गए। जैसा कि विष्णु जी ने सोचा था वैसा ही हुआ कुछ ही देर में वासुकि की फुफकार से असुरों पर कहर टूट पड़ा। फिर जैसे-तैसे मंथन पूरा हुआ। देवताओं की कुटिलता से असुर फिर मात खा गए ! फिर जो कुछ भी हुआ वह जग तो जाहिर है ही। 

यह अपने समय का एक अकल्पनीय उपक्रम था ! कोई सोच सकता था भला कि दुर्वासा के एक श्राप से सारे जगत में कैसी उथल-पुथल मच जाएगी। शिव को विष पान करना पड़ जाएगा ! देवता अमर हो जाएंगे ! सूर्य-चंद्र ग्रहण होने लगेंगे ! अयप्पा का जन्म होगा ! राक्षसी महिषि का वध संभव हो पाएगा ! इत्यादी...इत्यादी...इत्यादि.......!

@चित्र अंतर्जाल से, साभार 

शुक्रवार, 19 जून 2020

संकट काल में तो देश की सोच लो, अपने हित साधने के मौके तो आते रहेंगे

अपनी समझ से तो ये सरकार की नाकामी को उजागर कर अपनी उपयोगिता और प्रसांगिकता सिद्ध करना चाहते थे, पर इनको और इनके मूढ़मति सलाहकारों को इस बात का कतई इल्म नहीं रहा कि युद्ध के मंडराते खतरे में अवाम सदा सरकार का साथ देता है, फिर चाहे उसकी आस्था किसी भी पार्टी या नेता में भले ही क्यूँ ना हो ! ऐसा हर बार के युद्ध काल में हुआ है...................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
पहले लाल ने फिर उसकी लाली देख लाल हुई मां ने जब अपने उद्गार उगले तो देश उनके इस अपरिपक्व, अव्यवहारिक, राजनितिक अदूरदर्शिता और बचकानेपन से तो लाल हुआ ही, पार्टी की गिरती-ढहती छवि को भी एक और धचका लग गया ! अपनी समझ से तो ये सरकार की नाकामी को उजागर कर अपनी उपयोगिता और प्रसांगिकता सिद्ध करना चाहते थे, पर इनको और इनके मूढ़मति सलाहकारों को इस बात का कतई इल्म नहीं रहा कि युद्ध के मंडराते खतरे में अवाम सदा सरकार का साथ देता है, फिर चाहे उसकी आस्था किसी भी पार्टी या नेता में भले ही क्यूँ ना हो ! ऐसा हर बार के युद्ध काल में हुआ है। 

आजादी के इतने सालों में हमने कभी ऐसा चौतरफे संकट का सामना नहीं किया ! एक बार में एक,अलग-अलग पड़ोसी से झड़प जरूर हुई पर ऐसा सम्मिलित षड्यंत्र कभी सामने नहीं आया। पाक तो खैर हमारा जन्मजात विरोधी रहा है पर इधर चीनी हथकंडों से ग्रसित और उसके ''एहसानों'' से मजबूर नेपाल भी हमारे आपसी रिश्तों, भाईचारे और सहारे को भूल कुछ अकड़ने लगा है ! उस पर महामारी का कहर ! चारों तरफ से विपदा से घिरे देश को इस समय एकजुटता की जरुरत है ना कि ओछी राजनीति की, इतनी समझ तो आत्मश्लाघि दलों को होनी ही चाहिए ! पर यहां देश की नहीं सत्ता की ज्यादा चिंता महसूसी जा रही है। 

यह समय गहरे चिंतन और सावधानी का है। एक भी गलत या भावावेश में उठाया गया कदम देश और उसके करोड़ों देशवासियों के लिए हादसा सिद्ध हो सकता है। ऐसे में किन्हीं नेता-दव्यों द्वारा बार-बार कोंचा लगा कुछ बोलने और जमीन की जानकारी मांगनेको मजबूर करना, अपरिपक्वता ही कहलाएगी। यहां पुरानी बातों को दोहराना कुछ हल्कापन लग सकता है पर उनकी प्रासांगिकता जरुरी है, यह याद दिलाने को कि बासठ की लड़ाई में इसी चीन ने हमारी करीब पंद्रह हजार वर्ग की.मी. जमीन दखल कर ली थी तो हमारे सर्वकालीन महान नेता ने बड़ी उपेक्षा और लापरवाही से कह दिया था कि उस जमीन की कोई कीमत नहीं है उस पर घास का तिनका तक नहीं उगता ! इस पर काफी लानत-मलानत भी हुई थी उनकी ! हो सकता है कि इन सब बातों का काफी बाद में बाहर से आई महिला को ज्ञान ना हो और शाही रख-रखाव में पले उनके पुत्र को भी शायद वही पता हो जो उन्हें राजमहल में बताया, सिखाया गया था ! 

संकट काल में यह जरुरी है कि सरकार हर बात को सार्वजनिक ना करे ! साथ ही विपक्ष को भी अपनी जिम्मेदारी समझते हुए, सिर्फ विरोध के लिए सरकार की हर बात का विरोध ना कर सावधानी पूर्वक अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करनी चाहिए ! समय फिरते ही अपनी भड़ास निकालने का अवसर तो मिल ही जाएगा। फिर क्यूँ फिजूल में अभी जनता के आक्रोष और मजाक का वॉयस बनना, जिससे खुद का ही नुक्सान होता हो ! पर देखा गया है यह बात किसी के समझ में नहीं आती या हो सकता है चापलूस या अवसरवादी छुटभईए अपना हित साधने के लिए आने ही नहीं देना चाहते हों ! जो भी हो ऐसी बातें हैं तो आत्मघाती ही !! 

गुरुवार, 18 जून 2020

कुनबा-परस्ती, स्वजन पक्षपात, भाई-भतीजावाद के गह्वर में सुशांत सिंह

रही बात नेपोटिस्म की ! तो यह बुराई है तो जरूर, पर किसी के संरक्षण से कोई बुलंदियां नहीं छू पाता ! फिल्म हो, खेल हो, व्यवसाय हो या राजनीति ! इनमें किसी की सहायता से ''इंट्री'' भले ही मिल जाए, टिकाव और सफलता तो अपनी लियाकत से ही मिल पाती है। यदि ऐसा ना होता तो एकता कपूर के भाई तुषार के पास आज काम की वजह से दम लेने तक की फुरसत न होती। अभिषेक बच्चन से ज्यादा पॉवर-फुल और कौन होता ! दो साल से इंडस्ट्री पर राज करने वाला शाहरुख, जिसके बारे में यही जौहर कहा करता था कि उसके बिना वह फिल्म ही नहीं बनाएगा, आज घर बैठा हुआ है। गोविंदा, जिसके पीछे लोग चिरौरियां करते घूमते थे, उसे आज कोई पूछ नहीं रहा ! बहुत से ऐसे कलाकार हुए हैं जिनके पास बहुत दिनों तक काम नहीं होता ! ऐसे लोगों पर लिखने बैठें तो ग्रंथ बन जाए ! पर इन लोगों ने आत्महत्या तो नहीं कर ली ....................!      
 
#हिन्दी_ब्लागिंग
टी.वी. से फिल्मों में आए सुशांत सिंह ने किन्हीं अज्ञात कारणों से ख़ुदकुशी कर ली। एक हसमुख उभरते कलाकार का ऐसा अंत सभी को हिला कर रख गया ! पर साथ ही यह मार्मिक व दुखद घटना हमारे फिल्म जगत की चकाचौंध के पीछे छिपी उसकी व्यवस्था, उसकी मानसिकता, उसकी संवेदनशीलता पर भी कई प्रश्न चिन्ह लगा गई ! उनकी मृत्यु के दिन से ही लोगों की प्रतिक्रियाओं की बाढ़ सी आई हुई है। हर कोई विशेषज्ञ बना अपनी राय, अपने विचार थोपे जा रहा है ! जिनमें संवेदनाएं कम अपनी पसंद-नापसंद के लोगों पर कुंठायुक्त पूर्वाग्रही आक्षेप ज्यादा सामने आने लगे हैं। कुछ अपने नाम को सुर्ख़ियों में रखने के लिए इस पर शोध की बातें करने लगे हैं !
 
यह बात बिल्कुल सही है कि मुंबईया फ़िल्मी जगत में स्वजन-पक्षपात बहुत ज्यादा है ! वहां अपनी-अपनी पसंद है !अपने-अपने गिरोह हैं ! अपने-अपने खेमे हैं ! जिसके खोल में हर कोई सुरक्षित रहना चाहता है। फिल्म निर्माण इतना खर्चीला हो गया है कि अधिकांश फिल्मों की लागत भी नहीं निकल पाती। एक फिल्म का पिटना कई घरों का दिवाला निकाल देता है ! इसीलिए सभी निरापद और सक्षम घोड़े पर दांव लगाना पसंद करते हैं। पर इसके साथ-साथ यह भी सच है कि यहां रिश्ते तभी तक निभाए जाते हैं जब तक अपना फ़ायदा हो रहा हो। दुनिया में इतना निष्ठुर, मतलबी, बेमुरौवत, बेवफा, तोताचश्म व्यवसाय शायद ही कोई और हो ! यहां सदा से ही चढ़ते सूरज को सलाम ठोका जाता रहा है। पर यह तो सदा से ही रहा है। कोई नई बात नहीं है।

कहा जा रहा है कि सुशांत की करण जौहर गाहे-बगाहे बेइज्जती करता, करवाता रहता था ! उसके एक कॉफी वाले शो में भी उसका काफी मजाक वगैरह बनाया गया था ! जौहर और उसके दोस्त उसे काम देने में भी काफी टाल-मटोल किया करते थे ! तो ऐसा क्या था जो इस ''गैंग'' को ना छोड़ पाने को उसे मजबूर कर रखा था ! इतने सबके बावजूद फिर क्यों उसकी ही स्तर हीन फिल्म ''ड्राइव'' में काम करने का लोभ संवरण नहीं हो पाया ! ऐसे कई सवाल अनुत्तरित रह जाते हैं !  
   
इधर आज फिर कुछ लोग भाई-भतीजा वाद को लेकर कुछ लोगों को निशाना बना रहे हैं। आज फिर कुछेक को मौका मिल गया है अपनी नापसंदगी पर आक्रोषित होने का ! जिन पर आरोप लग रहे हैं वे कोई बहुत महान फिल्मकार नहीं हैं ! ना हीं उन्होंने इस विधा का कुछ भला किया है । वे कला के बल पर नहीं सिर्फ अपने रिश्तों और भाग्य के कारण मशहूर हो पाए हैं। जो पांच-छह नाम लिए जा रहे हैं, उनमें कोई एक भी अपनी ऐसी उपलब्धि दिखा दे जिसे गौरव के साथ फिल्मों के इतिहास में जगह मिल सकती हो। जिसे लोग वर्षों बाद भी याद रख सकें। फिर ऐसा भी नहीं है कि मुंबई में सिर्फ यह लोग फिल्म बनाते हों ! ये लोग सत्यजीत रे, हृषिकेश मुखर्जी या राजकपूर के पासंग भी नहीं हैं कि इनकी फिल्म में काम कर के गौरवान्वित महसूस किया जाए या इनके साथ काम कर के कोई विशेष सम्मान या पहचान बन जाती हो ! तो फिर यदि ऐसे लोग किसी का बहिष्कार करते हैं तो करें, क्यूँ मरे जाना उनके ही साथ काम करने को ! लियाकत है, खुद पर विश्वास है तो काम देर-सबेर खुद चल कर आता है और सफलता मिलते ही ऐसे लोग आगे-पीछे घूमते हुए दुम हिलाने लगते हैं। दर्जनों ऐसे उदाहरण हैं ! 

रही बात नेपोटिस्म की ! तो यह बुराई है तो जरूर, पर किसी के संरक्षण से कोई बुलंदियां नहीं छू पाता ! फिल्म हो, खेल हो, व्यवसाय हो या राजनीति ! इनमें किसी की सहायता से ''इंट्री'' भले ही मिल जाए, टिकाव और सफलता तो अपनी लियाकत से ही मिल पाती है। यदि ऐसा ना होता तो एकता कपूर के भाई तुषार के पास आज काम की वजह से दम लेने तक की फुरसत न होती। अभिषेक बच्चन से ज्यादा पॉवर-फुल और कौन होता ! दो साल से इंडस्ट्री पर राज करने वाला शाहरुख, जिसके बारे में यही जौहर कहा करता था कि उसके बिना वह फिल्म ही नहीं बनाएगा, आज घर बैठा हुआ है। गोविंदा, जिसके पीछे लोग चिरौरियां करते घूमते थे, उसे आज कोई पूछ नहीं रहा ! बहुत से ऐसे कलाकार हुए हैं जिनके पास बहुत दिनों तक काम नहीं होता ! ऐसे लोगों पर लिखने बैठें तो ग्रंथ बन जाए ! पर इन लोगों ने आत्महत्या तो नहीं कर ली !!

सुशांत ! काश तुमने कर्मठ लोगों के जीवन से सबक लिया होता ! तुम्हारे सामने तो सबसे बड़ा उदाहरण अमिताभ बच्चन का था ! क्या-क्या नहीं सहा, देखा, उन्होंने यहां ! काम मिलना बंद हो गया था ! कर्ज के मारे दिवालिया होने तक की नौबत आ गई थी ! पर अगले ने हर समस्या का सामना किया और आज इस उम्र में उनको केंद्र में रख फ़िल्में रची जा रही हैं। उसी एकता कपूर, जिसने तुम्हें अपने सीरियल में काम दिया और तुम उसके इस एहसान के बदले पता नहीं क्या-क्या सहते रहे, उसी के पिता को जब यहां सबने नकार दिया था तो उसने हार ना मानते हुए मद्रास का रुख किया और बाद की बात सभी जानते हैं ! काश तुम देखते कि तकरीबन हर बड़े कलाकार ने कैसी-कैसी मुसीबतों का सामना करने के पश्चात अपना मुकाम हासिल किया ! ऐसे एक नहीं दर्जनों नाम हैं, जिन्हें इस निष्ठुर नगरी ने दुत्कारा पर जब उनने अपनी जीजीविषा की बदौलत सफलता पाई तो यही उनके चरणों में लोटने को मजबूर हो गई। काश ! तुम देखते कि आज अपनी चमक बिखेरने वाले सितारों को कभी किसी ''गॉड फादर'' की जरूरत महसूस नहीं हुई। उन्होंने जो हासिल किया अपने बलबूते पर किया। काश ! तुमने अपने पर, अपनी लियाकत पर और विश्वास किया होता ! कुछ और धैर्य रखा होता ! लोगों के जीवन से सबक लिया होता ! भावनाओं से निकल यथार्थ को स्वीकार किया होता !

सोमवार, 15 जून 2020

गुलाबो-सिताबो खूब लड़े हैं, आपस मा

किसी समय घुमंतू जातियों के लोगों के उपार्जन के विभिन्न जरियों में कठपुतली का तमाशा भी एक करतब हुआ करता था। इसमें ज्यादातर दो महिला किरदारों के आपसी पारिवारिक झगड़ों के काल्पनिक रोचक किस्से बना अवाम का मनोरंजन किया जाता था। किरदारों को कभी सास-बहू, कभी ननद-भौजाई, कभी देवरानी-जेठानी या फिर कभी सौतों का रूप दे दिया जाता था। उन किरदारों को ज्यादातर गुलाबो-सिताबो के नाम से बुलाया जाता था..........!


#हिन्दी_ब्लागिंग  

अभी पिछले दिनों अमिताभ-आयुष्मान की एक फिल्म प्रदर्शित हुई है, नाम है गुलाबो-सिताबो। फिल्म चाहे जैसी भी बनी हो पर उसने दो महत्वपूर्ण कार्यों को तो अंजाम दिया ही है। इस फिल्म ने OTT (Over The Top) पर प्रदर्शित होने वाली पहली हिंदी फिल्म के रूप में अपना नाम तो दर्ज करवाया ही साथ ही साथ गुमशुदगी के अंधेरे में विलोपित होती उस कठपुतली कला का नाम भी आमजन को याद दिलवा दिया, जिसे कम्प्यूटर गेम्स जैसे साधनों के आने के बाद लोग तकरीबन भूल ही गए थे। गुलाबो-सिताबो इसी कला की दो महिला दस्ताना कठपुतलियों (Glove Puppets) के नाम हैं, जिन्होंने एक समय उत्तर प्रदेश में धूम मचा रखी थी और वहां की कला व संस्कृति में पूरी तरह रच-बस गयी थीं।   

गुलाबो-सिताबो, किसी समय घुमंतू जातियों के लोगों के उपार्जन के विभिन्न जरियों में कठपुतली का तमाशा भी एक करतब हुआ करता था। इसमें ज्यादातर दो महिला किरदारों के आपसी पारिवारिक झगड़ों के काल्पनिक रोचक किस्से बना अवाम का मनोरंजन किया जाता था। किरदारों को कभी सास-बहू, कभी ननद-भौजाई, कभी देवरानी-जेठानी या फिर कभी सौतों का रूप दे दिया जाता था। उन किरदारों को ज्यादातर गुलाबो-सिताबो के नाम से बुलाया जाता था। इनके किस्से प्रदेश में एक लम्बे अरसे तक छाए रहे थे। 

निरंजन लाल श्रीवास्तव और उनकी कठपुतलियां 

नवाब वाजिद अली शाह के समय ये कठपुतलियां कला का पर्याय बन गईं थीं। गुलाबो-सिताबो का सफर भले ही आजादी से पहले शुरू हुआ था, लेकिन इन्हें पुख्ता पहचान 1950 के दशक में जा कर मिल पाई, जब प्रतापगढ़ निवासी राम निरंजनलाल श्रीवास्तव, बी.आर. प्रजापति और जुबोध लाल श्रीवास्तव सरीखे कलाकारों ने कठपुतली कला का भलीभांति प्रशिक्षण ले उसे नई ऊंचाइयों पर पहुंचा, उसका देश के विभिन्न नगरों में प्रदर्शन कर उसे व्यापक ख्याति दिलवाई। हालांकि इनकी कठपुतलियों के पहरावे, रंग-रोगन में काफी बदलाव आया था पर उन किरदारों का नाम स्थाई रूप से गुलाबो-सिताबो कर दिया गया। कारण भी था, इन नामों की प्रसिद्धि और लोकप्रियता लगातार बढ़ती ही जा रही थी। लोग उन्हीं नामों को देखना-सुनना पसंद करने लगे थे। इनकी प्रसिद्धि इतनी बढ़ गई थी कि गुलाबो-सिताबो के जरिए सरकारी योजनाओं का प्रचार-प्रसार होने लगा था। यहां तक कि अग्रिम मोर्चों पर तैनात जवानों के मनोरंजन के लिए भी इनको भेजा जाने लगा था।


शूजित सरकार द्वारा निर्देशित इस फिल्म का नाम गुलाबो-सिताबो प्रतीतात्मक है, क्योंकि इसमें झगड़ने वाले पात्र महिला न हो कर पुरुष हैं और उनकी भाषा भी व्यंग्यात्मक होने के बावजूद बहुत संयमित और सधी हुई है। पर क्या यह मात्र एक संयोग है या कुछ और कि उत्तर प्रदेश के जिस प्रतापगढ़ जिले के एक कायस्थ परिवार ने गुलाबो-सिताबो को देश-विदेश में व्यापक पहचान और प्रसिद्धि दिलवाई; उन्हीं किरदारों के नाम से जब एक फिल्म बनी तो उसमें मुख्य किरदार निभाने वाले कायस्थ कलाकार के पूर्वजों का संबंध भी उसी जिले से है ! चलो चाहे जो हो मतलब तो गुलाबो-सिताबो की नोक-झोंक और उनकी तनातनी से है, -

''जहां साग लायी पात लायी और लायी चौरैया, दूनौ जने लड़ै लागीं, पात लै गा कौआ'' 

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