pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शुक्रवार, 12 जुलाई 2019

अंधकार से ही जीवन व ज्ञान उपजा है

अंधकार ! जिसकी बात होते आते या दिखते ही एक नकारात्मक भावना दिलों में छा जाती है ! पर सच्चाई तो यही है कि अँधेरा चाहे कितना भी घना हो, उसके पीछे, उसी परिवेश में, उसी के संरक्षण में सृजन, सृष्टि व विकास का क्रम लगातार, अनवरत रूप से सतत चलता ही रहता है ! तभी तो जीवन का प्रादुर्भाव हुआ ! प्रकाश की उत्पत्ति हुई ! प्रकाश हुआ तभी ज्ञान का भी विकास हो पाया ! ज्ञान बढ़ा तभी समाज, देश, दुनिया की तरक्की हो पायी। इतना सब होने और देने के बावजूद, अकारण ही हम अँधेरे को अमंगल मान बैठे हैं। ये तो हमारा ही संकुचित दृष्टिकोण और अज्ञान हुआ ! कायनात की इस विशाल, रहस्यमयी, चिलमन के पीछे, क्या छिपा है, प्रकृति क्या बुन रही है, प्रभु की कौन सी लीला अवतरित होने वाली है: कौन जानता है........!  

#हिन्दी_ब्लागिंग
उजाला और अँधेरा, जैसे एक ही सिक्के के दो पहलु ! पर उजास को जहां ज्ञान, जीवन, उत्साह, शुचिता और जीवंतता का प्रतीक माना जाता है, वहीं अंधकार को निराशा, हताशा, अज्ञान या अमंगल का पर्याय मान लिया गया है। पर एक सच्चाई यह भी है कि आज भी ब्रह्मांड में इसका अस्तित्व उजाले से कहीं ज्यादा है, चाहे उसका विस्तार अनंत अंतरिक्ष में हो, चाहे सागर की अतल गहराइयों में ! चाहे इंसान के अबूझ मस्तिष्क की बात हो चाहे अगम मन की, सब जगह अंधकार अपने स्थूल रूप में विद्यमान नजर आता है। भले ही इस बात से मुंह फेर लिया जाए पर अंधकार के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। चाहे पौराणिक कथाएं हों, कथा-कहानियां हों या वैज्ञानिक तथ्य सबमें अंधकार की उपस्थिति अनिवार्यत: दिखलाई पड़ती है।

यहां अंधेरे के गुणगान का प्रयास नहीं हो रहा पर कुछ तो होगा इसके रहस्यमय वातावरण में जिसके कारण विष्णु जी को सागर की अतल गहराइयां मुनासिब बैठतीं होंगी ! क्यों ऋषि-मुनि पहाड़ों की अँधेरी गुफाओं में जा कर ही तप करते होंगे ! क्यों प्रकृति ने अंतरिक्ष और सागर की गहराइयों में प्रकाश की व्यवस्था नहीं की ! क्यों आँखें बंद कर अँधेरे की शरण में जा कर ही प्रभु का ध्यान लग पाता है ! क्यों आदमी को अपने जीवन का करीब एक तिहाई नींद के अँधेरे में गुजारना पड़ता है ! कैसे आँखों में रौशनी ना होने, जगत के प्रकाश की चकाचौंध से अनजान रहने के बावजूद भी सूरदास, मिल्टन, के सी डे, हेलेन केलर, जैसे सैंकड़ों लोग अंधेपन के अंधेरे के सानिध्य रह कर भी अपने आप को जगत्प्रसिद्ध कर पाए !


ज्ञान की बात करें तो प्रकाश की उपयोगिता को तो किसी भी तरह नकारा नहीं जा सकता। अंधकार से निकलने के पश्चात ही ज्ञान-विज्ञान की प्राप्ति हुयी। दुनिया ने तरक्की की। एक-दूसरे को जाना-पहचाना। तरह-तरह की ईजादें हुईं। ज्ञान-विज्ञान से इंसान और यह संसार नई-नई ऊंचाइयों तक पहुंचे। लोगों के जीवन में खुशहाली आई। पर जब सृजन की बात आती है, नव निर्माण की बात आती है, सृष्टि की बात आती है तो अंधकार की भूमिका अहम हो जाती है। जीवन की बात करें तो सारे जीव-जंतु, पशु-पक्षी, जानवर-इंसान सभी तो माँ के गर्भ के अंदर अंधकार में पल कर ही जीवन पाते हैं। यहां तक कि पेड़-पौधे, वृक्ष-लताएं इन सभी को सूरज का प्रकाश देखने के पहले धरा की अंधेरी कोख में ही रह कर अपनी जड़ें मजबूत करनी पड़ती हैं। जितनी कीमती और दुर्लभ धातुएं हैं उनका काया पलट धरती की गहराइयों की अंधेरी कोख में ही संभव है ! जीवनदाई जल अपने निर्मल रूप में धरा की अंधेरी गोद से ही निकल चराचर की प्यास शांत कर पाता है। सूर्यास्त के पश्चात, आसमान में कालिमा छाने के बाद ही कायनात की अद्भुत कारीगिरी, चाँद और सितारों के रूप में सामने आ पाती है ! जन्म लेने के बाद भी जीवन की ऊंचाइयों के सपने देखने के लिए इंसान अपनी आँखों की डिबिया बंद करने के पश्चात ही उस अँधेरी दुनिया के तिलिस्म में प्रवेश कर पाता है ! प्रकृति का सबसे बड़ा अजूबा हमारा शरीर हमें चलायमान रखने के लिए अपने सारे क्रिया-कलाप शरीर के अंदर के अँधेरे में ही पूरा करता है ! घने जंगलों के अंधकार में, धरती की गहरी-अंधी-घुप्प गुफाओं में, सागर की अगम्य-घनी-रौशनी विहीन गहराइयों में भी असंख्य जीव अपना जीवन चक्र बिना किसी बाधा या परेशानी के पूरा करते हैं ! सोचिए यदि कजरारे बादल नभ में छा, सुरमई अंधेरा फैला कर मधु-रस की वर्षा ना करते तो क्या धरा पर जीवन की कल्पना संभव हो पाती ! और तो और आज दुनिया का सबसे बड़ा, लोकप्रिय और सर्वव्यापी मनोरंजन का साधन सिनेमा,  हॉल में अंधेरा किए बिना देख पाना कहां संभव है, भले ही इसमें उजाले का भी कुछ हाथ हो ! 


* ऋग्वेद - सृष्टि से पहले सत नहीं था, असत भी नहीं, अंतरिक्ष भी नहीं, आकाश भी नहीं था। छिपा था क्या कहां, किसने देखा था उस पल तो अगम, अटल जल भी कहां था। था तो हिरण्य गर्भसृष्टि से पहले विद्यमान, वही तो सारे भूत जाति का स्वामी महान।............ यानी तम का साम्राज्य !

शिव पुराण - सृष्टि के पहले ब्रह्मा और विष्णु जी में कौन बड़ा और पूजनीय की बात को ले छिड़े विवाद के हल स्वरुप शिव जी उन दोनों के बीच एक विशाल अग्नि स्तम्भ के रूप में प्रकट हुए। घोर अंधकार और भयानक विस्फोट के साथ उपजे उस प्रकाश स्तंभ के ओर-छोर का पता करने हेतु हंस रूप धारण कर ब्रह्मा ऊपर तथा वराह रूपी विष्णु जी नीचे की ओर चल पड़े।...........  यानी चहूँ ओर अंधेरा !

* जिस समय सृष्टि में अंधकार था। न जल, न अग्नि और न वायु था तब वही तत्सदब्रह्म ही था जिसे श्रुति में सत् कहा गया है। सत् अर्थात अविनाशी परमात्मा।.........सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा !

* वैज्ञानिकों में एक अवधारणा यह भी हैं कि शुरुआत में ब्रह्मांड की सारी आकाश गंगाएं, आकाशीय पिंड, सभी कण और सभी पदार्थ  एक ही साथ, एक ही जगह, एक ही बिंदु पर स्थित थे ! यह बिंदु अत्यंत छोटा होते हुए भी अत्यधिक घनत्व और अत्यंत गर्म था। यह विवरण ''ब्लैक हॉल'' की याद दिलाता है जिससे प्रकाश भी बाहर नहीं आ पाता।................यानी गहन अंधकार !

ब्रह्मांड विज्ञान के वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि ब्रह्मांड का जन्म एक महाविस्फोट (Big Bang) से हुआ है और उसके पश्चात उसका लगातार विस्तार हो रहा है। उसके पहले क्या था ! कैसा था ! इसका तो अभी सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा रहा है।............ यहां भी अभी अन्धकार की थ्योरी ही काम कर रही है !
  
इन सारे तथ्यों से एक बात निकल कर सामने आती है कि पहले जो कुछ भी था वह निपट तम का ही एक हिस्सा था ! फिर एक भयंकर उथल-पुथल के फलस्वरूप हुए महाविस्फ़ोटों के कारण ब्रह्मांड का निर्माण हुआ, जिसके फलस्वरूप अत्यधिक ऊर्जा उत्पन्न हुई और उससे इलेक्ट्रान, प्रोटान, न्युट्रान तथा फोटॉन जैसे कण अस्तित्व में आए। इन्हीं में से का एक कण फोटॉन प्रकाश और रौशनी का कारक है। फोटान वो कण हैं जिनसे रौशनी बनती है; यानी ब्रह्मांड निर्माण के पहले सिर्फ अंधकार का ही साम्राज्य था ! अभी भी कायनात की इस विशाल, रहस्यमयी चिलमन के पीछे क्या छिपा है, प्रकृति क्या बुन रही है, प्रभु की कौन सी लीला अवतरित होने वाली है: कौन जानता है !  



इन सब से एक बात तो साफ़ हो जाती है कि अंधकार चाहे कितना भी घना हो, उसके पीछे, उसी परिवेश में, उसी के संरक्षण में सृजन, सृष्टि व विकास का क्रम तो लगातार, अनवरत रूप से सतत चलता ही रहता है ! तभी तो जीवन का प्रादुर्भाव हुआ ! प्रकाश की उत्पत्ति हुई ! प्रकाश हुआ तभी ज्ञान का भी विकास हो पाया ! ज्ञान बढ़ा तभी समाज, देश, दुनिया की तरक्की हो पायी। इतना सब होने और देने के बावजूद अकारण ही हम इसे अमंगल मान बैठे हैं। ये तो हमारा ही संकुचित दृष्टिकोण और अज्ञान हुआ ! 

सोमवार, 8 जुलाई 2019

''आशा व बाला'' का एक और रूप, वोडाफोन के नए अवतार में

विज्ञापनों में दादा-दादी बने ये दोनों पति-पत्नी कोई मामूली कलाकार नहीं हैं। वोडाफोन के विज्ञापन के आशा और बाला के रूप में प्रसिद्ध हुए, 73साल की शांता धनंजयन और 78साल के वी.पी. धनंजयन दोनों पति-पत्नी, दिग्गज नृत्य कलाकार हैं, जो चेन्नई के अड्यान में 1968 से भरतनाट्यम सिखाने के लिए भारत कलांजलि स्कूल चला रहे हैं। जिसके लिए उन्हें 2009 में पद्मभूषण से सम्मानित किया जा चुका है।  #वोडाफोन वाले बधाई के पात्र हैं जो फूहड़ता के इस  युग में भी इतने साफ़-सुथरे , दिल को छूने वाले, सार्थक, पारिवारिक विज्ञापनों की रचना करने का हौसला रखते हैं ............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
दिन-ब-दिन फूहड, छिछोरे और स्तरहीन होते जाते, बकवास इश्तिहारों के बीच कुछ ऐसे विज्ञापन भी देखने को मिल जाते हैं, जो दिल को छू लेते हैं। इनमें वोडाफोन एक आदर्श उदाहरण है। जो बिना किसी ''स्टार'' की बैसाखी के भी अपने विज्ञापनों को, दर्शकों के दिलो-दिमाग में पैवस्त कर, लोकप्रिय बनाने में माहिर हैं। सच कहा जाए तो इनके ''बुजुर्ग दम्पति या पग या जुजु सेना'' अपनी मासूमियत, भोलेपन और सरलता के कारण कई-कई सुपर स्टारों पर भारी पड़ते हैं।


गोवा भ्रमण  
टी.वी. दर्शक और खेल प्रेमी, वोडाफोन के करीब दो साल पहले 2017 में हुई IPL क्रिकेट स्पर्द्धा के खेलों के बीच आने वाले उन विज्ञापनों को भूले नहीं होंगे, जिनमें एक प्यारे, भोले-भाले, साठ पार के बुजुर्ग दम्पति, ''बाला और आशा'' के गोवा भ्रमण को केंद्र बना एक बहुत सुंदर विज्ञापन श्रृंखला रची गयी थी। आनन-फानन में, बिना किसी शोर-शराबे के दोनों ने लोगों के मनों को जीत उनके घर के सदस्य के रूप में जगह बना ली थी ! विज्ञापनों में दादा-दादी बने ये दोनों पति-पत्नी कोई मामूली कलाकार नहीं हैं। वोडाफोन के विज्ञापन के आशा और बाला के रूप में प्रसिद्ध हुए, 73 साल की शांता धनंजयन और 78 साल के वी.पी. धनंजयन दोनों दिग्गज नृत्य कलाकार हैं जो चेन्नई के अड्यान में 1968 से भरतनाट्यम सिखाने के लिए भारत कलांजलि स्कूल चला रहे हैं। जिसके लिए उन्हें 2009 में पद्मभूषण से सम्मानित किया जा चुका है। यह उनकी जिजीविषा ही है, जो अपने गोवा वाले विज्ञापन के लिए धनंजयन जी ने अठहत्तर पार की उम्र में पहली बार धोती के बदले पैंट-टी शर्ट पहनी, स्कूटर चलाना सीखा तथा युवाओं की तरह के हाव-भाव, करतब करते हुए विश्वसनीयता व सहजता से इंटरनेट का उपयोग कर जीवन का आनंद लेते  दिखे थे।  



अब फिर एक बार दोनों वोडाफोन की एक नयी विज्ञापन श्रृंखला ''The Future is exciting. Ready ?''  के साथ फिर एक बार परदे पर अवतरित हुए हैं। इस बार विदेश भ्रमण में रोमिंग की खासियतें, फोन पर डॉक्टर की सलाह या अपने खुद के किचन के व्यवसाय में वोड़ाफोन की सहूलियतों का उपयोग करते-बताते नजर आएंगे। फिलहाल अभी तो आशा जी की रसोई में सहयोगी बने बालाजी की अपनी पत्नी के साथ मासूमियत भरी प्यारी सी नोकझोंक देखते ही बनती है। इस बार भी यह बात तय है कि निर्मल हास्य का पुट लिए इस विज्ञापन श्रृंखला में भी दोनों पति-पत्नी अपने सहज, सरल, स्वाभाविक अभिनय से अपना पिछ्ला जादू जगाने में जरूर सफल होंगे ! 


नए अवतार में 
#वोडाफोन और उनकी पूरी टीम बधाई की पात्र है, जो उन्होंने फूहड़ता के इस युग में भी इतने साफ़-सुथरे, दिल को छूने वाले, सार्थक, पारिवारिक विज्ञापनों की रचना करने का हौसला दिखाया। इनसे उन विज्ञापन निर्माताओं और कंपनियों को सबक लेना चाहिए जो आए दिन बड़े नामों की लोकप्रियता, ओछे दृश्यों या अतिश्योक्ति भरे फिल्मांकन से दर्शकों को लुभाने की फूहड़ कोशिश में वक्त और पैसा दोनों बर्बाद करते रहते हैं ! पर होता अक्सर उनकी सोच का उल्टा है ! ज्यादातर ऐसे विज्ञापन दर्शकों को "बोर" करने लगते है। हजार की जगह लाखों फूँके हुए रुपये भी कोई जादू नहीं जगा पाते। काश, वे वोडाफोन से कुछ सबक ले पाते ! 

गुरुवार, 4 जुलाई 2019

कहै घाघ सुन भड्डरी,..... कौन थे ये दोनों

''घाघ'' जहां खेती, नीति एवं स्वास्थ्य से जुड़ी कहावतों के लिए विख्यात हैं, वहीं ''भड्डरी'' की रचनाएं वर्षा, ज्योतिष और आचार-विचार से विशेष रूप से संबद्ध हैं।घाघ के समान ही लोकजीवन से संबंधित कहावतों में कही गई भड्डरी की भविष्यवाणियां भी बहुत प्रसिद्ध हैं। दोनों समकालीन तो हैं साथ ही यह समानता भी है कि घाघ की तरह भड्डरी का जीवन वृतांत भी निर्विवाद नहीं है। अनेकानेक किंवदंतियां दोनों के साथ जुडी हुई हैं। पर साथ ही यह भी सच है कि जितनी ख्याति जनकवि घाघ को मिली उतनी प्रसिद्धि भड्डरी को नहीं मिल पाई !आज की वर्तमान पीढ़ी इनके बारे में शायद ज्यादा न जानती हो, फिर भी बरसात द्वारे पर है, इसलिए समीचीन होगा, उससे जुड़े इन दोनों विलक्षण और अद्भुत व्यक्तित्वों के बारे कुछ जानना ...........! 

#हिन्दी_ब्लागिंग      
हमारा देश सदियों से कृषि प्रधान रहा है और भरपूर फसल के लिए अति आवश्यक है अच्छी वर्षा ! इसीलिए हर किसान के लिए इस बात का ज्ञान होना बहुत जरुरी होता है कि वर्षा कब होगी, होगी कि नहीं या कितनी मात्रा में होगी ! पुराने जमाने में नाहीं विज्ञान ने इतनी तरक्की की थी और नाहीं ही कोई मौसम विभाग हुआ करता था ,जो बरसात की सटीक जानकारी दे सके ! तो सब कुछ पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे अनुभव पर ही निर्भर हुआ करता था। हालांकि हमारे ऋषियों-मुनियों ने यह सब बातें विस्तार से सदियों पूर्व लिपिबद्ध कर दी थीं पर वह सब संस्कृत में होने की वजह से अधिकांश लोगों के लिए अगम्य सी ही थीं ! इसी समस्या के निदान के लिए लोकभाषा में कहावतों के रूप में सूक्तियों का प्रादुर्भाव हुआ और इन्हीं कहावतों, भविष्यवाणियां के आधार पर वर्षों-वर्ष से हमारे किसान अपनी खेती एवं सामाजिक समस्याओं का निदान करते चले आए हैं। इन भविष्यवाणियों के जनक के रूप में करीब चार सौ सालों से निर्विवाद रूप से ''घाघ'' और 'भड्डरी'' का नाम लिया जाता रहा है। घाघ जहां खेती, नीति एवं स्वास्थ्य से जुड़ी कहावतों के लिए विख्यात हैं, वहीं भड्डरी की रचनाएं वर्षा, ज्योतिष और आचार-विचार के लिए प्रख्यात हैं। 

घाघ और भड्डरी के विषय में अनेक किंवदंतियां प्रसिद्ध हैं। पर दोनों के बारे में बहुत विस्तृत रूप से जानकारी उपलब्ध नहीं है ! चूँकि इनकी कहावतें एक ही शैली की होती हैं, इसलिए अनेक लोगों का विश्वास है कि ये दो अलग-अलग इंसान ना होकर एक ही आदमी के नाम हैं ! यहां तक कि कुछ लोग तो इनके दोहों की शुरुआत, ''कहै घाघ सुनु भड्डरी'' को देख इन्हें पति-पत्नी तक मानते हैं। कुछ लोगों के अनुसार उत्तर प्रदेश के पूर्वी क्षेत्र-बिहार, बंगाल एवं असम प्रदेश में ''डाक'' नामक कवि की भी घाघ जैसी ही कृषि सम्बन्धी कहावतें मिलती हैं जिसके आधार पर उन विद्वानों का अनुमान है कि डाक और घाघ भी एक ही थे। 

घाघ के बारे में मान्यता है कि बचपन से ही वे कृषि विषयक समस्याओं के निदान में दक्ष थे। छोटी उम्र में ही उनकी प्रसिद्धि इतनी बढ़ गयी थी कि दूर-दूर से लोग अपनी खेती सम्बन्धी समस्याओं को लेकर इनके पास आया करते थे। चाहे बैल खरीदना हो या खेत जोतना, बीज बोना हो अथवा फसल काटना, घाघ के पास उनकी हर मुश्किल का समाधान हुआ करता था। इस सब के बावजूद इनके बारे में कोई ठोस जानकारी उपलब्ध नहीं है। यहां तक कि घाघ नाम है या उपनाम इसमें भी मतभेद हैं ! पर पं. राम नरेश त्रिपाठी जी ने अपनी खोजों के आधार पर इनका नाम देवकली दुबे माना है। उनका जन्म, निर्विवाद रूप से तो नहीं फिर भी सोलहवीं शताब्दी में अकबर बादशाह के जमाने में उत्तर-प्रदेश के कन्नौज शहर के पास के एक गांव चौधरी सराय में हुआ माना जाता है। इस बात को इससे भी पुष्टि मिलती है कि, इनकी प्रतिभा से प्रभावित और प्रसन्न हो अकबर ने इन्हें प्रचुर धन, जमीन और चौधरी की उपाधि प्रदान की थी, जिस पर इन्होंने कन्नौज से कुछ ही दूरी पर सराय घाघ नामक गांव की स्थापना की थी। जिसका अस्तित्व आज भी है। इनकी सातवीं-आठवीं पीढ़ी के कुछ परिवार आज भी वहां रहते हैं। जो भी हो घाघ अपने कृषि संबंधी ज्ञान के लिए उत्तर तथा मध्य भारत के सबसे बड़े विद्वान, पर्यावरणविद, खगोल ज्ञानी, कृषि गुरु और दार्शनिक कवि माने जाते हैं। जिनकी सरल, सुगम्य स्थानीय भाषा आज भी सीधे-सादे, अशिक्षित किसानों का मार्गदर्शन कर रही है। 

सन के डंठल खेत छिटावै, तिनते लाभ चौगुनो पावै।


गोबर, मैला, नीम की खली, या से खेती दुनी फली।


वही किसानों में है पूरा, जो छोड़ै हड्डी का चूरा। 

भड्डरी कौन थे, किस प्रांत के थे, किस भाषा में उन्होने कहावतों का सृजन किया, यह आज भी विद्वानों में चर्चा का विषय है। भड्डरी के जन्म के सम्बन्ध में ग्रामीण अंचलों में अनेक किंवदंतियां चलन में हैं। कुछ उन्हें राजस्थान से जोड़ते हैं तो कुछ काशी से। और चूँकि घाघ की कविताओं में उनका अक्सर जिक्र आया है तो उनका काशी निवासी होना ज्यादा तर्क-सम्मत लगता है। ऐसी मान्यता है कि इनमें दैवीय प्रतिभा थी जिससे वे सटीक भविष्यवाणी किया करते थे। 

शुक्रवार की बादरी, रही सनीचर छाय।

तो यों भाखै भड्डरी, बिन बरसे ना जाए।।
:
भादों की छठ चांदनी, जो अनुराधा होय।
ऊबड़ खाबड़ बोय दे, अन्न घनेरा होय।। 

जो भी हो पर इतना तो सत्य जरूर है कि घाघ और भड्डरी दोनों में दैवी प्रतिभा थी। उनकी जितनी भी कहावतें हैं, सभी प्रायः खरी उतरती हैं। घाघ जहां खेती, नीति एवं स्वास्थ्य से जुड़ी कहावतों के लिए विख्यात हैं, वहीं भड्डरी की रचनाएं वर्षा, ज्योतिष और आचार-विचार से विशेष रूप से संबद्ध हैं। आज भी देश के सुदूर गांवों-कस्बों में किसानों को इनकी कहावतें कंठस्थ हैं और खेती-खलिहानी में पथ-प्रदर्शक का काम करते हुए खादों के विभिन्न रूपों, गहरी जोत, मेंड़ बाँधने, फसलों के बोने के समय, बीज की मात्रा, दालों की खेती के महत्व इत्यादि हर मसले पर सहायक होती हैं। हालाँकि घाघ का लिखा हुआ  कुछ भी उपलब्ध नहीं है पर उनका दृढ अभिमत था कि कृषि सबसे उत्तम व्यवसाय है। 

उत्तम खेती मध्यम बान, निकृष्ट चाकरी, भीख निदान।
:
उत्तम खेती जो हर गहा, मध्यम खेती जो सँग रहा।
:
खाद पड़े तो खेत, नहीं तो कूड़ा रेत।
गोबर राखी पाती सड़ै, फिर खेती में दाना पड़ै। 

दोनों में यह समानता भी है कि घाघ की तरह भड्डरी का जीवन वृतांत भी निर्विवाद नहीं है। दोनों  समकालीन थे।घाघ के समान ही लोकजीवन से संबंधित कहावतों में कही गई भड्डरी की भविष्यवाणियां भी बहुत प्रसिद्ध हैं। पर जितनी ख्याति जनकवि घाघ को मिली उतनी प्रसिद्धि भड्डरी को नहीं मिली।  

सोम सुक्र सुरगुरु दिवस, पौष अमावस होय।

घर घर बजे बधावनो, दुखी न दीखै कोय।।
:
सावन पहिले पाख में, दसमी रोहिनी होय।

महंग नाज अरु स्वल्प जल, विरला विलसै कोय।।

जो भी हो दोनों ही व्यक्ति अत्यंत कुशल, बुद्धिमान, नीतिमान तथा भविष्य का ज्ञान रखने वाले थे। आज के समय में यदि कोई इंसान नीतिनिपुण, चालाक व गहरी सूझबूझ वाला हो तो उस ''घाघ'' कहकर बुलाया जाने लगता है ! इसीसे उसकी व्यक्तित्व की गहराई का अंदाजा लग जाता है।

मंगलवार, 2 जुलाई 2019

बूँदों की सरगम पर राग पावस

नन्ही-नन्हीं बूँदों के अलौकिक संगीत के बीच सतरंगी पुष्पों से श्रृंगार किए, धानी चुनरी ओढ़े, दूब के मखमली गलीचे पर जब प्रकृति, इंद्रधनुषी किरणों के साथ हौले से पग धरती है तो नभ के अमृत-रस से सराबोर हुए पृथ्वी के कण-कण का मन-मयूर नाचने-गाने को बाध्य सा हो जाता है। बसंत यदि ऋतु-राज है तो वर्षा ऋतु-साम्राज्ञी है......!


#हिन्दी_ब्लागिंग  

इस बार देश में पड़ी भीषण, झुलसा देने वाली भयंकर गर्मी ने अपने रौद्र रूप से सारे इलाकों को त्रस्त कर रख दिया था ! दिनकर के प्रकोप से सारी धरा व्याकुल हो उठी ! जल संकट गहराने लगा, जीव-जंतु, पशु-पक्षी, मनुष्य-पादप सब निर्जीव से हो गए, तब जा कर प्रकृति ने फिर करवट बदली है ! कुछ देर से ही सही सकून देने वाली पावस ऋतु के कदमों में बंधी पायल की सुमधुर रिम-झिम ध्वनि सुनाई पड़ने लगी है। धीरे-धीरे सारा देश इस मधुर ध्वनि के आगोश में खो जाने वाला है। इस बार कुछ देर से ही सही पर आकाश से बरसने वाली इस अमृत रूपी बरसात से जल्द ही सिर्फ हमारा देश ही नहीं, पाकिस्तान और बांग्ला देश भी तृप्त और खुशहाल होने वाले हैं। जून से सितंबर तक होने वाली इस बरसात को जो हवाएं, हिंद और अरब महासागर से उठ, अपने देश को दक्षिण-पश्चिम दिशा से घेर, जमीन की तरफ पानी लेकर आती हैं उन्हीं हवाओं को "मानसून" के नाम से जाना जाता है। मानसून नाम अरबी भाषा के ''मावसिम'' शब्द से आया है।


इन दिनों की राह तो जैसे सारी कायनात देख रही होती है ! मौसम का यह खुशनुमा बदलाव समस्त चराचर को अभिभूत कर रख देता है। आकाश में जहां सिर्फ आग उगलते सूर्य का राज होता था वहीं अब जल से भरे कारे-कजरारे मेघों का आधिपत्य हो जाता है। उनसे झरती नन्ही-नन्हीं बूँदों के अलौकिक संगीत के बीच जब सतरंगी पुष्पों से श्रृंगार किए, धानी चुनरी ओढ़े, दूब के मखमली गलीचे पर जब प्रकृति, इंद्रधनुषी किरणों के साथ हौले से पग धरती है तो नभ के अमृत-रस से सराबोर हुए पृथ्वी के कण-कण का मन-मयूर नाचने-गाने को बाध्य सा हो जाता है। बसंत यदि ऋतु-राज है तो वर्षा ऋतु-साम्राज्ञी है। प्राचीन काल के ऋषि-मुनियों से लेकर आज तक शायद ही कोई कवि या रचनाकार हुआ होगा जो इसके प्रेम-पाश से बच सका हो। 



भारत में इसका आगाज तक़रीबन एक जून से हो जाता है, पर इसकी आहट मई के अंतिम हफ्ते से ही सुनाई देने लग जाती है। हमारा मौसम विभाग देश भर के विभिन्न भागों से तापमान, हवा के रुख, बर्फ़बारी, वायुमंडल के दवाब इत्यादि आंकड़ों को ध्यान में रख कई तथ्यों का अध्ययन कर आने वाले मौसम की भविष्यवाणी करता है। पर आंकड़ों में जरा सी चूक आकलन में काफी हेर-फेर ला देती है ! फिर भी इस विभाग की उपयोगिता और उसकी कर्मठता पर सवाल खड़े नहीं किए जा सकते। सवाल तो खड़े होने चाहिए हम पर ! जिनकी  गलतियों का खामियाजा भुगत कर पर्यावरण दूषित हो रहा है, ''ग्लोबल वार्मिंग'' बढ़ रही है ! यह डर की बात तो है ही और ऐसा लग भी रहा है कि मानसून, जो सदियों से भारत पर सहृदय, दयाल और मेहरबान रहता आया है वह आने वाले वक्त में अपना समय और दिशा बदल सकता है। उससे हमारे विशाल देश को कितनी समस्याओं का सामना करना पडेगा उसका अंदाज लगाना भी मुश्किल है ! ऐसा हो न हो कि प्रकृति का यह अनुपम, अनमोल तोहफा, राग पावस और बूँदों की सरगम की मधुर ध्वनि किसी कंप्यूटर की डिस्क में ही सिमट कर रह जाए !

मंगलवार, 25 जून 2019

#कादम्बिनी_सम्पादक_मंडल से ऐसी आशा नहीं थी

आलोचना को भी स्वीकार करने का माद्दा होना चाहिए  ! जो पत्र आपकी मर्जी के  मुताबिक  ना हों उन्हें छापना ना छापना आप के ऊपर निर्भर है , पर किसी भी हालत  में  भेजे गए  पत्र के मजमून से छेड़खानी नहीं होनी चाहिए ! प्रकाशक और पाठक में  फर्क है ! प्रकाशक चाहे जैसे भी येन-केन-प्रकारेण, इच्छा-अनिच्छा से, अच्छा-बुरा जैसा  भी अंक निकाले उसे अपना मेहनताना मिल ही जाना है ! पर पाठक पैसे खर्च करता है  तो उसका हक़ बनता है कि उसे उच्च कोटि की, सार  गर्भित, नामी-गिरामी लेखकों  की  रचनाएं पढ़ने को मिलें ना कि संपादक मंडल की थोपी हुई रचनाएं या ऐसे लोगों  के  अनगढ़ विचार जो हिंदी की दो लाइनें भी सही ना  बोल पाते हों.............

#हिन्दी_ब्लागिंग     
हिंदी साहित्य, पत्र-पत्रिकाओं में रूचि रखने वाला शायद ही ऐसा कोई पाठक होगा जिसने  #कादम्बिनी का नाम ना सुना हो। हमारे परिवार का तो यह अपने जन्म के साथ ही सदस्य बन गयी थी। हिन्दुस्तान टाइम्स की यह गैर राजनीतिक मासिक पत्रिका अपने आप में ज्ञान, संस्कृति, साहित्य, कला, सेहत जैसे विषयों का भंडार हुआ करती थी। इसकी सुरुचिपूर्ण एवं प्रभावी प्रस्तुति और स्वस्थ मनोरंजन इसकी ख़ास पहचान थी। शुरूआती समय से ही इसे विद्वान व निपुण लोगों का सहारा तथा महादेवी वर्मा तथा कुंवर नारायण जैसे विद्वानों का संरक्षण तथा आशीर्वाद मिलता रहा। सालों शिखर पर रही इस पत्रिका की अपनी एक गौरवमयी  पहचान रही है और तो और इसके पाठकों को भी समाज में सम्मानजनक दृष्टि से देखा जाता था। पर धीरे-धीरे समय के साथ सब उलट-पलट होता चला गया ! पहले जैसा स्तर भी ना रहा ! पाठक घटते चले गए ! ऐसी हालत देख शुरू से इससे जुड़े लोगों को दुःख होना स्वाभाविक है पर लगता है कि इसको लेकर कोई भी गंभीर नहीं है ! पिछले दिनों इसी को लेकर एक आलोचनात्मक पत्र संपादक जी को लिखा था पर यह देख स्तंभित रह गया कि उसको काट-छांट कर एक प्रशंसात्मक रूप दे प्रसस्ति पात्र बना दिया गया ! दोनों पत्र ब्लॉग के पाठकों के अवलोकन के लिए यहां दे रहा हूँ !
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मेरा पत्र सम्पादक मंडल को -
माननीय महोदय,
नमस्कार। 
एक समय था जब कादम्बिनी गागर में सागर थी। स्वस्थ, ज्ञानवर्धक जानकारियां, उच्च कोटि के लेखकों की श्रेष्ठ रचनाएं, कथा-कहानियां ही स्थान पाती थीं। समय के साथ ''सारथी'' बदलते गए कोई तंत्र-मंत्र, साधू-संतों को ले आया, कोई अपने ही सगे-संबंधियों को स्थान देने लगा, किसी के लगे-बधों को झेलना पाठक की मजबूरी हो गयी तो किसी ने तो आ कर इसकी अपनी पहचान को ही ख़त्म कर, आम पत्रिकाओं का रूप दे ''बुक स्टॉलों'' के ढेर में की एक बना डाला।  

पहले एक चलन था कि विनम्र संपादक अपने पाठकों की रुचि, उनके विचार जान कादम्बिनी को लोकप्रिय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे ! ऐसे ही नहीं इसने एक लाख प्रतियों का आंकड़ा छू लिया था ! गैर हिंदी प्रदेशों में भी यह खूब पढ़ी जाती थी। सालों शिखर पर रही इस पत्रिका की अपनी एक गौरवमयी पहचान रही  है ! यहां तक की इसके पाठकों को भी सम्मानजनक दृष्टि से देखा जाता था। पर आज हालत यह है कि यदि कोई मेहमान घर आ इसे सामने पाता है तो आश्चर्य से पूछता है ''अरे ! यह अभी भी निकल रही है ?''

आज तो ऐसा लगता है जैसे इसकी बेहतरी की चिंता किए बिना, एक ''फार्मेल्टी'' के तहत इसे निकाला जा रहा है ! पहले जहां यह एक सुरुचिपूर्ण, राह दिखाने वाली, सामाजिक संदेशों से भरी साफ़-सुथरी, अनेकों गुणों को समेटे एक फिल्म की तरह होती थी, वहीं आज यह एक नीरस, उबाऊ ''डाक्यूमेंट्री'' की तरह हो कर रह गयी है। फिल्म से याद आया कि पहले यह फिल्मों और फिल्म वालों से कुछ दूरी बना कर ही चला करती थी। पर अब तो लगता है कि मनुहार-विनती कर उनके नाम को शामिल किया जाता है। समय बदल चुका है, फ़िल्मी कलाकारों को पुस्तक से जोड़ने में कोई बुराई नहीं है, लोगों की पहली पसंद बने हुए हैं ये, आजकल ! पर उनके तथाकथित लेख पत्रिका की श्रेणी के तो हों ! ऐसे-ऐसे लोग अपनी विद्वता झाड़ते यहां मिलते हैं जो ढंग से हिंदी की चार लाइनें भी नहीं बोल पाते ! फ़िल्मी जगत में भी विद्वानों, जानकारों, गुणवानों की कोई कमी नहीं है ! उनके विचार, लेख, रचनाएं क्यों नहीं पाठकों तक पहुंचतीं ?

अभी भी समय है, मेरे जैसे हजारों लोग इसका इंतजार करते हैं। आपसे विनम्र निवेदन है कि इसे और लोकप्रिय बनाने की ओर ध्यान दिया जाए ! ''थीम अंक'' के नाम पर आधी से ज्यादा पत्रिका को समेट कर उसे बोझिल बनाने के बजाए उस विषय को पंद्रह-बीस पृष्ठों तक ही सिमित रख, बाकी में अन्य विषयों को स्थान दें तो बेहतर होगा ! लेखकों से निवेदन किया जाए कि भाषा सरल-सुगम हो जिससे बच्चों में भी इसकी लोकप्रियता बढे। अपने देश, देशवासियो, इतिहासिक-पौराणिक महान चरित्रों को, ईसप-पंचतत्र जैसी कथाओं के लिए भी एक कोना सुरक्षित कर दें। ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि आज की पीढ़ी को अपने इतिहास की जानकारी ना के बराबर है ! अभी पिछले दिनों उदयपुर-हल्दीघाटी जाना हुआ तो बेहद दुःख और आश्चर्य का सामना करना पड़ा जब साथ के दसवीं के छात्र ने हल्दी घाटी और चेतक के बारे में अपनी अनभिज्ञता जाहिर की ! और तो और उनकी माताश्री जो खुद शिक्षक हैं. दिल्ली में, उनकी जानकारी भी इस विषय में सतही ही थी। 

आशा है अन्यथा ना लेते हुए,  कुछ समय निकाल, इस विषय पर भी गौर किया जाएगा। 
धन्यवाद। 
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पत्र जो उनके द्वारा छापा गया। 

बुधवार, 19 जून 2019

जब भजन मंडली ने दो-दो कंबल ओढ़वाए

वह गायन लय-ताल के साथ अपने में शिक्षा, उपदेश, भजन सब कुछ समेटे था। तक़रीबन सारे यात्रियों का ध्यान उस ओर खिंच कर रह गया था। एक दो घंटे के बाद भोजनोपरांत, सोने के पहले, आधेक घंटे के लिए वही माहौल फिर बना। गीत-भजनों का सार था, सर्वजन हिताय ! सर्व जन सुखाये ! हर जीव में भगवान है ! खुद कष्ट सह कर भी दूसरों का उपकार करो ! सब पर दया करो ! सब एक ही परमात्मा की संतानें हैं इत्यादि, इत्यादि ! पर कुछ देर बाद ही इस दिखावे की पोल खुल गयी ! जब गर्मी से बचाव के लिए ज्यादा पैसे खर्च कर खरीदी गयी ठंड से निजात पाने के लिए मजबूरन दो-दो कंबल ओढ़ने पड़े......!  

#हिन्दी_ब्लागिंग   
अभी पिछले हफ्ते मुंबई से दिल्ली आना हो रहा था। सहयात्रियों में एक 24-25 जनों की टोली भी थी। जिसमें युवा से अधेड़ उम्र के पढ़े-लिखे, सभ्रांत, शांत, सौम्य दिखते लोग शामिल थे, जो शायद देवस्थलों के भ्रमण के लिए निकले थे। गाडी चलने के बाद चाय-नाश्ता निपटने के उपरांत दो महिलाओं के गायन की स्वर लहरी सुनाई पड़ी जो कुछ ही देर बाद मंद, कर्णप्रिय समूह गान में परिवर्तित हो गयी। बीस-पच्चीस मिनट का वह गायन लय-ताल के साथ अपने में शिक्षा, उपदेश, भजन सब कुछ समेटे था। सारे यात्रियों का ध्यान उसी ओर था। एक दो घंटे के बाद भोजनोपरांत, सोने के पहले, आधेक घंटे के लिए वही माहौल फिर बना, गीत-भजनों का सार था, सर्व जन हिताय ! सर्व जन सुखाये ! हर जीव में भगवान है ! खुद कष्ट सह कर भी दूसरों का उपकार करो ! सब पर दया करो ! सब एक ही परमात्मा की संतानें हैं इत्यादि, इत्यादि !  
   
कुछ ही देर बाद जब हरेक यात्री सोने का उपक्रम कर रहा था तभी ऐसा लगा कि कोच का तापमान अचानक कम हो गया है। सबको कुछ ज्यादा ही ठंड महसूस होने लगी ! अटेंडेंट को बुला कर तापमान बढ़ाने को कहा तो उसने बताया कि कुछ लोगों ने जबरन ऐसा करवाया है। फिर भी उसने नॉर्मल करने की बात कही।  कुछ देर तो ठीक रहा उसके बाद फिर ठंड बढ़ गयी तो मैंने सम्बंधित कर्मचारी को फिर कहा, तो उसने फिर वही बात दोहराई और बताया कि उस मंडली के दो-तीन लोग लड़ने पर उतारू हो तापमान नीचे करवा रहे हैं ! उसने बताया कि, उन्हें दूसरे यात्रियों की परेशानियों का हवाला भी दिया, यह भी कहा कि बुजुर्ग यात्रियों को तकलीफ हो रही है ! पर वे नहीं माने ! वे सिर्फ अपनी बेआरामी की बात कर रहे हैं ! फिर उसने सुझाव दिया कि, सर, आप लोग एक-एक कंबल और ले लीजिए, बेकार इतनी रात को बात बढ़ाने से कोई फायदा तो है नहीं ! खैर बात वहीँ ख़त्म कर दी गयी ! हालांकि एक-दो लोग कक्ष के बाहर जा कर बैठे भी दिखे ! अजीब विडंबना थी ! पहले गर्मी से बचाव के लिए ज्यादा पैसे खर्च कर ठंड का इंतजाम करो; और फिर उसी खरीदी गयी ठंड से निजात पाने के लिए कंबल ओढो ! 

मैं कभी भी यात्रा के दौरान उपलब्ध कंबलों का इस्तेमाल नहीं करता पर उस दिन मजबूरी में चादर के ऊपर पैरों तक ओढ़ यही सोचता रहा कि मुंह से गाये या दिए गए उपदेश लोग कब अपने दिलों में भी उतारेंगे ! कब दूसरों की तकलीफों, उनकी परेशानियों को भी समझेंगे ! कब सिर्फ दिखावे, रूटीन या दूसरों को उपदेश देने, सुनाने के बजाय खुद भी उनका अनुसरण करेंगे ! कब ! 

शनिवार, 15 जून 2019

छत्तीसगढ में खेल और खेलों में संस्कृत

क्रिकेट = कंदुक क्रीड़ा।
रन       = भावनांक।  
चौका   = सिद्ध चतुष्कम।
बढ़िया शॉट = पुष्ठु प्रहार। 
बाउंड्री = कंदुक परिधि लंघनम। 
कैच     =  ग्रहणम। 
आउट = निर्गत। 

#हिन्दी_ब्लागिंग  
ये कोई मजाक की बात नहीं हो रही ना ही हिंदी को असमर्थ भाषा बताने की साजिश ! यह तो छत्तीसगढ के संस्कृत विद्या मंडलम का प्रदेश में संस्कृत भाषा को लोकप्रिय और बढ़ावा देने के साथ-साथ खेलों में भी इस भाषा के प्रयोग को प्रोत्साहन देने का एक प्रयास है। इससे छत्तीसगढ़ देश का पहला ऐसा राज्य होगा जहां क्रिकेट, फ़ुटबाल, बैडमिंटन जैसे हर प्रचलित खेलों के नाम व नियम के लिए संस्कृत में तकनीकी शब्दावली होगी। इसकी तैयारी चरणबद्ध तरीके से, नए शिक्षा सत्र से संस्कृत स्कूलों में खेलों के प्रचलित नामों की जगह संस्कृत के नामों से पुकारे जाने से की जा रही है। इसके साथ ही यह भी कोशिश रहेगी कि खेलकूद की प्रतियोगिताओं में संस्कृत ही में उसका विवरण प्रसारित किया जाए। इसके साथ ही यह भी प्रयास किया जाएगा कि स्थानीय और देशज लोकप्रिय खेलों के नामों और नियमों का भी संस्कृत में अनुवाद किया जा सके, इस पर रिसर्च भी की जा रही है।  

वैसे इससे मिलता-जुलता एक प्रयास इस साल बनारस में संपूर्णानंद विश्वविद्यालय ने संस्कृत क्रिकेट प्रतियोगिता का आयोजन करवा कर किया था, जिसमें खिलाड़ियों ने धोती-कुर्ता पहन कर क्रिकेट खेला था। इस में कॉमेंट्री व अन्य नियम कायदे सबमें संस्कृत का ही उपयोग किया गया था। जब खेलों प्रतियोगिताओं में भी संस्कृत का प्रयोग होने लगेगा तो बच्चे भी इस भाषा से और ज्यादा जुड़ाव और लगाव महसूस करने लगेंगे। अभी जो संस्कृत में खेलों के नाम का शब्दकोष बनाया जा रहा है उसमें खेलों के नाम कुछ इस तरह के होंगे -

* क्रिकेट = कंदुक क्रीड़ा !            * फ़ुटबॉल  = पाद कंदुकम !                 * बॉस्केटबॉल = हस्तपाद कंदुकम !
* वॉलीवाल = अपाद कंदुकम !     * टेबल टेनिस = उत्पीठिका कंदुकम !    * बैडमिंटन = खगक्षेपण क्रीड़ा !
* दौड़ = धावनम !                        * कबड्डी = रुद्ध्यते बाध्यते !                   * खोखो = खो गति प्रतिघात !      
* कुश्ती = मल्लयुद्धम !   

शुरू में यह सब अजीबोगरीब या अटपटा सा जरूर लगता है ! साथ ही यह आशंका भी है कि सदा की तरह भारतीय भाषाओं को अक्षम बताते हुए उनका विरोध कर, अंग्रजी को तरजीह देने वाले कुछ लोग इस कदम को भी निरुत्साहित करने, इसे अव्यवहारिक और कलिष्ट बताने, इसका मजाक बनाने के साथ-साथ अंग्रजी शब्दों के उपयोग को ख़त्म करने के विरोध में मुहीम चलाने की पुरजोर कोशिश कर सकते हैं ! अब तो यह समय ही बताएगा कि यह प्रयास कितना सफल होता है। लोगों का कितना सहयोग मिलता है और जुबान पर चढ़े शब्दों की जगह नए शब्दों के प्रयोग में कितना समय लगता है या फिर अवाम स्वीकार करती भी है या नहीं ! क्योंकि संस्कृत में टी.वी. पर पढ़ी जाने वाली खबरों का उदहारण हमारे सामने है !

*संदर्भ - दैनिक भास्कर        

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