pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

सोमवार, 8 जुलाई 2019

''आशा व बाला'' का एक और रूप, वोडाफोन के नए अवतार में

विज्ञापनों में दादा-दादी बने ये दोनों पति-पत्नी कोई मामूली कलाकार नहीं हैं। वोडाफोन के विज्ञापन के आशा और बाला के रूप में प्रसिद्ध हुए, 73साल की शांता धनंजयन और 78साल के वी.पी. धनंजयन दोनों पति-पत्नी, दिग्गज नृत्य कलाकार हैं, जो चेन्नई के अड्यान में 1968 से भरतनाट्यम सिखाने के लिए भारत कलांजलि स्कूल चला रहे हैं। जिसके लिए उन्हें 2009 में पद्मभूषण से सम्मानित किया जा चुका है।  #वोडाफोन वाले बधाई के पात्र हैं जो फूहड़ता के इस  युग में भी इतने साफ़-सुथरे , दिल को छूने वाले, सार्थक, पारिवारिक विज्ञापनों की रचना करने का हौसला रखते हैं ............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
दिन-ब-दिन फूहड, छिछोरे और स्तरहीन होते जाते, बकवास इश्तिहारों के बीच कुछ ऐसे विज्ञापन भी देखने को मिल जाते हैं, जो दिल को छू लेते हैं। इनमें वोडाफोन एक आदर्श उदाहरण है। जो बिना किसी ''स्टार'' की बैसाखी के भी अपने विज्ञापनों को, दर्शकों के दिलो-दिमाग में पैवस्त कर, लोकप्रिय बनाने में माहिर हैं। सच कहा जाए तो इनके ''बुजुर्ग दम्पति या पग या जुजु सेना'' अपनी मासूमियत, भोलेपन और सरलता के कारण कई-कई सुपर स्टारों पर भारी पड़ते हैं।


गोवा भ्रमण  
टी.वी. दर्शक और खेल प्रेमी, वोडाफोन के करीब दो साल पहले 2017 में हुई IPL क्रिकेट स्पर्द्धा के खेलों के बीच आने वाले उन विज्ञापनों को भूले नहीं होंगे, जिनमें एक प्यारे, भोले-भाले, साठ पार के बुजुर्ग दम्पति, ''बाला और आशा'' के गोवा भ्रमण को केंद्र बना एक बहुत सुंदर विज्ञापन श्रृंखला रची गयी थी। आनन-फानन में, बिना किसी शोर-शराबे के दोनों ने लोगों के मनों को जीत उनके घर के सदस्य के रूप में जगह बना ली थी ! विज्ञापनों में दादा-दादी बने ये दोनों पति-पत्नी कोई मामूली कलाकार नहीं हैं। वोडाफोन के विज्ञापन के आशा और बाला के रूप में प्रसिद्ध हुए, 73 साल की शांता धनंजयन और 78 साल के वी.पी. धनंजयन दोनों दिग्गज नृत्य कलाकार हैं जो चेन्नई के अड्यान में 1968 से भरतनाट्यम सिखाने के लिए भारत कलांजलि स्कूल चला रहे हैं। जिसके लिए उन्हें 2009 में पद्मभूषण से सम्मानित किया जा चुका है। यह उनकी जिजीविषा ही है, जो अपने गोवा वाले विज्ञापन के लिए धनंजयन जी ने अठहत्तर पार की उम्र में पहली बार धोती के बदले पैंट-टी शर्ट पहनी, स्कूटर चलाना सीखा तथा युवाओं की तरह के हाव-भाव, करतब करते हुए विश्वसनीयता व सहजता से इंटरनेट का उपयोग कर जीवन का आनंद लेते  दिखे थे।  



अब फिर एक बार दोनों वोडाफोन की एक नयी विज्ञापन श्रृंखला ''The Future is exciting. Ready ?''  के साथ फिर एक बार परदे पर अवतरित हुए हैं। इस बार विदेश भ्रमण में रोमिंग की खासियतें, फोन पर डॉक्टर की सलाह या अपने खुद के किचन के व्यवसाय में वोड़ाफोन की सहूलियतों का उपयोग करते-बताते नजर आएंगे। फिलहाल अभी तो आशा जी की रसोई में सहयोगी बने बालाजी की अपनी पत्नी के साथ मासूमियत भरी प्यारी सी नोकझोंक देखते ही बनती है। इस बार भी यह बात तय है कि निर्मल हास्य का पुट लिए इस विज्ञापन श्रृंखला में भी दोनों पति-पत्नी अपने सहज, सरल, स्वाभाविक अभिनय से अपना पिछ्ला जादू जगाने में जरूर सफल होंगे ! 


नए अवतार में 
#वोडाफोन और उनकी पूरी टीम बधाई की पात्र है, जो उन्होंने फूहड़ता के इस युग में भी इतने साफ़-सुथरे, दिल को छूने वाले, सार्थक, पारिवारिक विज्ञापनों की रचना करने का हौसला दिखाया। इनसे उन विज्ञापन निर्माताओं और कंपनियों को सबक लेना चाहिए जो आए दिन बड़े नामों की लोकप्रियता, ओछे दृश्यों या अतिश्योक्ति भरे फिल्मांकन से दर्शकों को लुभाने की फूहड़ कोशिश में वक्त और पैसा दोनों बर्बाद करते रहते हैं ! पर होता अक्सर उनकी सोच का उल्टा है ! ज्यादातर ऐसे विज्ञापन दर्शकों को "बोर" करने लगते है। हजार की जगह लाखों फूँके हुए रुपये भी कोई जादू नहीं जगा पाते। काश, वे वोडाफोन से कुछ सबक ले पाते ! 

गुरुवार, 4 जुलाई 2019

कहै घाघ सुन भड्डरी,..... कौन थे ये दोनों

''घाघ'' जहां खेती, नीति एवं स्वास्थ्य से जुड़ी कहावतों के लिए विख्यात हैं, वहीं ''भड्डरी'' की रचनाएं वर्षा, ज्योतिष और आचार-विचार से विशेष रूप से संबद्ध हैं।घाघ के समान ही लोकजीवन से संबंधित कहावतों में कही गई भड्डरी की भविष्यवाणियां भी बहुत प्रसिद्ध हैं। दोनों समकालीन तो हैं साथ ही यह समानता भी है कि घाघ की तरह भड्डरी का जीवन वृतांत भी निर्विवाद नहीं है। अनेकानेक किंवदंतियां दोनों के साथ जुडी हुई हैं। पर साथ ही यह भी सच है कि जितनी ख्याति जनकवि घाघ को मिली उतनी प्रसिद्धि भड्डरी को नहीं मिल पाई !आज की वर्तमान पीढ़ी इनके बारे में शायद ज्यादा न जानती हो, फिर भी बरसात द्वारे पर है, इसलिए समीचीन होगा, उससे जुड़े इन दोनों विलक्षण और अद्भुत व्यक्तित्वों के बारे कुछ जानना ...........! 

#हिन्दी_ब्लागिंग      
हमारा देश सदियों से कृषि प्रधान रहा है और भरपूर फसल के लिए अति आवश्यक है अच्छी वर्षा ! इसीलिए हर किसान के लिए इस बात का ज्ञान होना बहुत जरुरी होता है कि वर्षा कब होगी, होगी कि नहीं या कितनी मात्रा में होगी ! पुराने जमाने में नाहीं विज्ञान ने इतनी तरक्की की थी और नाहीं ही कोई मौसम विभाग हुआ करता था ,जो बरसात की सटीक जानकारी दे सके ! तो सब कुछ पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे अनुभव पर ही निर्भर हुआ करता था। हालांकि हमारे ऋषियों-मुनियों ने यह सब बातें विस्तार से सदियों पूर्व लिपिबद्ध कर दी थीं पर वह सब संस्कृत में होने की वजह से अधिकांश लोगों के लिए अगम्य सी ही थीं ! इसी समस्या के निदान के लिए लोकभाषा में कहावतों के रूप में सूक्तियों का प्रादुर्भाव हुआ और इन्हीं कहावतों, भविष्यवाणियां के आधार पर वर्षों-वर्ष से हमारे किसान अपनी खेती एवं सामाजिक समस्याओं का निदान करते चले आए हैं। इन भविष्यवाणियों के जनक के रूप में करीब चार सौ सालों से निर्विवाद रूप से ''घाघ'' और 'भड्डरी'' का नाम लिया जाता रहा है। घाघ जहां खेती, नीति एवं स्वास्थ्य से जुड़ी कहावतों के लिए विख्यात हैं, वहीं भड्डरी की रचनाएं वर्षा, ज्योतिष और आचार-विचार के लिए प्रख्यात हैं। 

घाघ और भड्डरी के विषय में अनेक किंवदंतियां प्रसिद्ध हैं। पर दोनों के बारे में बहुत विस्तृत रूप से जानकारी उपलब्ध नहीं है ! चूँकि इनकी कहावतें एक ही शैली की होती हैं, इसलिए अनेक लोगों का विश्वास है कि ये दो अलग-अलग इंसान ना होकर एक ही आदमी के नाम हैं ! यहां तक कि कुछ लोग तो इनके दोहों की शुरुआत, ''कहै घाघ सुनु भड्डरी'' को देख इन्हें पति-पत्नी तक मानते हैं। कुछ लोगों के अनुसार उत्तर प्रदेश के पूर्वी क्षेत्र-बिहार, बंगाल एवं असम प्रदेश में ''डाक'' नामक कवि की भी घाघ जैसी ही कृषि सम्बन्धी कहावतें मिलती हैं जिसके आधार पर उन विद्वानों का अनुमान है कि डाक और घाघ भी एक ही थे। 

घाघ के बारे में मान्यता है कि बचपन से ही वे कृषि विषयक समस्याओं के निदान में दक्ष थे। छोटी उम्र में ही उनकी प्रसिद्धि इतनी बढ़ गयी थी कि दूर-दूर से लोग अपनी खेती सम्बन्धी समस्याओं को लेकर इनके पास आया करते थे। चाहे बैल खरीदना हो या खेत जोतना, बीज बोना हो अथवा फसल काटना, घाघ के पास उनकी हर मुश्किल का समाधान हुआ करता था। इस सब के बावजूद इनके बारे में कोई ठोस जानकारी उपलब्ध नहीं है। यहां तक कि घाघ नाम है या उपनाम इसमें भी मतभेद हैं ! पर पं. राम नरेश त्रिपाठी जी ने अपनी खोजों के आधार पर इनका नाम देवकली दुबे माना है। उनका जन्म, निर्विवाद रूप से तो नहीं फिर भी सोलहवीं शताब्दी में अकबर बादशाह के जमाने में उत्तर-प्रदेश के कन्नौज शहर के पास के एक गांव चौधरी सराय में हुआ माना जाता है। इस बात को इससे भी पुष्टि मिलती है कि, इनकी प्रतिभा से प्रभावित और प्रसन्न हो अकबर ने इन्हें प्रचुर धन, जमीन और चौधरी की उपाधि प्रदान की थी, जिस पर इन्होंने कन्नौज से कुछ ही दूरी पर सराय घाघ नामक गांव की स्थापना की थी। जिसका अस्तित्व आज भी है। इनकी सातवीं-आठवीं पीढ़ी के कुछ परिवार आज भी वहां रहते हैं। जो भी हो घाघ अपने कृषि संबंधी ज्ञान के लिए उत्तर तथा मध्य भारत के सबसे बड़े विद्वान, पर्यावरणविद, खगोल ज्ञानी, कृषि गुरु और दार्शनिक कवि माने जाते हैं। जिनकी सरल, सुगम्य स्थानीय भाषा आज भी सीधे-सादे, अशिक्षित किसानों का मार्गदर्शन कर रही है। 

सन के डंठल खेत छिटावै, तिनते लाभ चौगुनो पावै।


गोबर, मैला, नीम की खली, या से खेती दुनी फली।


वही किसानों में है पूरा, जो छोड़ै हड्डी का चूरा। 

भड्डरी कौन थे, किस प्रांत के थे, किस भाषा में उन्होने कहावतों का सृजन किया, यह आज भी विद्वानों में चर्चा का विषय है। भड्डरी के जन्म के सम्बन्ध में ग्रामीण अंचलों में अनेक किंवदंतियां चलन में हैं। कुछ उन्हें राजस्थान से जोड़ते हैं तो कुछ काशी से। और चूँकि घाघ की कविताओं में उनका अक्सर जिक्र आया है तो उनका काशी निवासी होना ज्यादा तर्क-सम्मत लगता है। ऐसी मान्यता है कि इनमें दैवीय प्रतिभा थी जिससे वे सटीक भविष्यवाणी किया करते थे। 

शुक्रवार की बादरी, रही सनीचर छाय।

तो यों भाखै भड्डरी, बिन बरसे ना जाए।।
:
भादों की छठ चांदनी, जो अनुराधा होय।
ऊबड़ खाबड़ बोय दे, अन्न घनेरा होय।। 

जो भी हो पर इतना तो सत्य जरूर है कि घाघ और भड्डरी दोनों में दैवी प्रतिभा थी। उनकी जितनी भी कहावतें हैं, सभी प्रायः खरी उतरती हैं। घाघ जहां खेती, नीति एवं स्वास्थ्य से जुड़ी कहावतों के लिए विख्यात हैं, वहीं भड्डरी की रचनाएं वर्षा, ज्योतिष और आचार-विचार से विशेष रूप से संबद्ध हैं। आज भी देश के सुदूर गांवों-कस्बों में किसानों को इनकी कहावतें कंठस्थ हैं और खेती-खलिहानी में पथ-प्रदर्शक का काम करते हुए खादों के विभिन्न रूपों, गहरी जोत, मेंड़ बाँधने, फसलों के बोने के समय, बीज की मात्रा, दालों की खेती के महत्व इत्यादि हर मसले पर सहायक होती हैं। हालाँकि घाघ का लिखा हुआ  कुछ भी उपलब्ध नहीं है पर उनका दृढ अभिमत था कि कृषि सबसे उत्तम व्यवसाय है। 

उत्तम खेती मध्यम बान, निकृष्ट चाकरी, भीख निदान।
:
उत्तम खेती जो हर गहा, मध्यम खेती जो सँग रहा।
:
खाद पड़े तो खेत, नहीं तो कूड़ा रेत।
गोबर राखी पाती सड़ै, फिर खेती में दाना पड़ै। 

दोनों में यह समानता भी है कि घाघ की तरह भड्डरी का जीवन वृतांत भी निर्विवाद नहीं है। दोनों  समकालीन थे।घाघ के समान ही लोकजीवन से संबंधित कहावतों में कही गई भड्डरी की भविष्यवाणियां भी बहुत प्रसिद्ध हैं। पर जितनी ख्याति जनकवि घाघ को मिली उतनी प्रसिद्धि भड्डरी को नहीं मिली।  

सोम सुक्र सुरगुरु दिवस, पौष अमावस होय।

घर घर बजे बधावनो, दुखी न दीखै कोय।।
:
सावन पहिले पाख में, दसमी रोहिनी होय।

महंग नाज अरु स्वल्प जल, विरला विलसै कोय।।

जो भी हो दोनों ही व्यक्ति अत्यंत कुशल, बुद्धिमान, नीतिमान तथा भविष्य का ज्ञान रखने वाले थे। आज के समय में यदि कोई इंसान नीतिनिपुण, चालाक व गहरी सूझबूझ वाला हो तो उस ''घाघ'' कहकर बुलाया जाने लगता है ! इसीसे उसकी व्यक्तित्व की गहराई का अंदाजा लग जाता है।

मंगलवार, 2 जुलाई 2019

बूँदों की सरगम पर राग पावस

नन्ही-नन्हीं बूँदों के अलौकिक संगीत के बीच सतरंगी पुष्पों से श्रृंगार किए, धानी चुनरी ओढ़े, दूब के मखमली गलीचे पर जब प्रकृति, इंद्रधनुषी किरणों के साथ हौले से पग धरती है तो नभ के अमृत-रस से सराबोर हुए पृथ्वी के कण-कण का मन-मयूर नाचने-गाने को बाध्य सा हो जाता है। बसंत यदि ऋतु-राज है तो वर्षा ऋतु-साम्राज्ञी है......!


#हिन्दी_ब्लागिंग  

इस बार देश में पड़ी भीषण, झुलसा देने वाली भयंकर गर्मी ने अपने रौद्र रूप से सारे इलाकों को त्रस्त कर रख दिया था ! दिनकर के प्रकोप से सारी धरा व्याकुल हो उठी ! जल संकट गहराने लगा, जीव-जंतु, पशु-पक्षी, मनुष्य-पादप सब निर्जीव से हो गए, तब जा कर प्रकृति ने फिर करवट बदली है ! कुछ देर से ही सही सकून देने वाली पावस ऋतु के कदमों में बंधी पायल की सुमधुर रिम-झिम ध्वनि सुनाई पड़ने लगी है। धीरे-धीरे सारा देश इस मधुर ध्वनि के आगोश में खो जाने वाला है। इस बार कुछ देर से ही सही पर आकाश से बरसने वाली इस अमृत रूपी बरसात से जल्द ही सिर्फ हमारा देश ही नहीं, पाकिस्तान और बांग्ला देश भी तृप्त और खुशहाल होने वाले हैं। जून से सितंबर तक होने वाली इस बरसात को जो हवाएं, हिंद और अरब महासागर से उठ, अपने देश को दक्षिण-पश्चिम दिशा से घेर, जमीन की तरफ पानी लेकर आती हैं उन्हीं हवाओं को "मानसून" के नाम से जाना जाता है। मानसून नाम अरबी भाषा के ''मावसिम'' शब्द से आया है।


इन दिनों की राह तो जैसे सारी कायनात देख रही होती है ! मौसम का यह खुशनुमा बदलाव समस्त चराचर को अभिभूत कर रख देता है। आकाश में जहां सिर्फ आग उगलते सूर्य का राज होता था वहीं अब जल से भरे कारे-कजरारे मेघों का आधिपत्य हो जाता है। उनसे झरती नन्ही-नन्हीं बूँदों के अलौकिक संगीत के बीच जब सतरंगी पुष्पों से श्रृंगार किए, धानी चुनरी ओढ़े, दूब के मखमली गलीचे पर जब प्रकृति, इंद्रधनुषी किरणों के साथ हौले से पग धरती है तो नभ के अमृत-रस से सराबोर हुए पृथ्वी के कण-कण का मन-मयूर नाचने-गाने को बाध्य सा हो जाता है। बसंत यदि ऋतु-राज है तो वर्षा ऋतु-साम्राज्ञी है। प्राचीन काल के ऋषि-मुनियों से लेकर आज तक शायद ही कोई कवि या रचनाकार हुआ होगा जो इसके प्रेम-पाश से बच सका हो। 



भारत में इसका आगाज तक़रीबन एक जून से हो जाता है, पर इसकी आहट मई के अंतिम हफ्ते से ही सुनाई देने लग जाती है। हमारा मौसम विभाग देश भर के विभिन्न भागों से तापमान, हवा के रुख, बर्फ़बारी, वायुमंडल के दवाब इत्यादि आंकड़ों को ध्यान में रख कई तथ्यों का अध्ययन कर आने वाले मौसम की भविष्यवाणी करता है। पर आंकड़ों में जरा सी चूक आकलन में काफी हेर-फेर ला देती है ! फिर भी इस विभाग की उपयोगिता और उसकी कर्मठता पर सवाल खड़े नहीं किए जा सकते। सवाल तो खड़े होने चाहिए हम पर ! जिनकी  गलतियों का खामियाजा भुगत कर पर्यावरण दूषित हो रहा है, ''ग्लोबल वार्मिंग'' बढ़ रही है ! यह डर की बात तो है ही और ऐसा लग भी रहा है कि मानसून, जो सदियों से भारत पर सहृदय, दयाल और मेहरबान रहता आया है वह आने वाले वक्त में अपना समय और दिशा बदल सकता है। उससे हमारे विशाल देश को कितनी समस्याओं का सामना करना पडेगा उसका अंदाज लगाना भी मुश्किल है ! ऐसा हो न हो कि प्रकृति का यह अनुपम, अनमोल तोहफा, राग पावस और बूँदों की सरगम की मधुर ध्वनि किसी कंप्यूटर की डिस्क में ही सिमट कर रह जाए !

मंगलवार, 25 जून 2019

#कादम्बिनी_सम्पादक_मंडल से ऐसी आशा नहीं थी

आलोचना को भी स्वीकार करने का माद्दा होना चाहिए  ! जो पत्र आपकी मर्जी के  मुताबिक  ना हों उन्हें छापना ना छापना आप के ऊपर निर्भर है , पर किसी भी हालत  में  भेजे गए  पत्र के मजमून से छेड़खानी नहीं होनी चाहिए ! प्रकाशक और पाठक में  फर्क है ! प्रकाशक चाहे जैसे भी येन-केन-प्रकारेण, इच्छा-अनिच्छा से, अच्छा-बुरा जैसा  भी अंक निकाले उसे अपना मेहनताना मिल ही जाना है ! पर पाठक पैसे खर्च करता है  तो उसका हक़ बनता है कि उसे उच्च कोटि की, सार  गर्भित, नामी-गिरामी लेखकों  की  रचनाएं पढ़ने को मिलें ना कि संपादक मंडल की थोपी हुई रचनाएं या ऐसे लोगों  के  अनगढ़ विचार जो हिंदी की दो लाइनें भी सही ना  बोल पाते हों.............

#हिन्दी_ब्लागिंग     
हिंदी साहित्य, पत्र-पत्रिकाओं में रूचि रखने वाला शायद ही ऐसा कोई पाठक होगा जिसने  #कादम्बिनी का नाम ना सुना हो। हमारे परिवार का तो यह अपने जन्म के साथ ही सदस्य बन गयी थी। हिन्दुस्तान टाइम्स की यह गैर राजनीतिक मासिक पत्रिका अपने आप में ज्ञान, संस्कृति, साहित्य, कला, सेहत जैसे विषयों का भंडार हुआ करती थी। इसकी सुरुचिपूर्ण एवं प्रभावी प्रस्तुति और स्वस्थ मनोरंजन इसकी ख़ास पहचान थी। शुरूआती समय से ही इसे विद्वान व निपुण लोगों का सहारा तथा महादेवी वर्मा तथा कुंवर नारायण जैसे विद्वानों का संरक्षण तथा आशीर्वाद मिलता रहा। सालों शिखर पर रही इस पत्रिका की अपनी एक गौरवमयी  पहचान रही है और तो और इसके पाठकों को भी समाज में सम्मानजनक दृष्टि से देखा जाता था। पर धीरे-धीरे समय के साथ सब उलट-पलट होता चला गया ! पहले जैसा स्तर भी ना रहा ! पाठक घटते चले गए ! ऐसी हालत देख शुरू से इससे जुड़े लोगों को दुःख होना स्वाभाविक है पर लगता है कि इसको लेकर कोई भी गंभीर नहीं है ! पिछले दिनों इसी को लेकर एक आलोचनात्मक पत्र संपादक जी को लिखा था पर यह देख स्तंभित रह गया कि उसको काट-छांट कर एक प्रशंसात्मक रूप दे प्रसस्ति पात्र बना दिया गया ! दोनों पत्र ब्लॉग के पाठकों के अवलोकन के लिए यहां दे रहा हूँ !
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मेरा पत्र सम्पादक मंडल को -
माननीय महोदय,
नमस्कार। 
एक समय था जब कादम्बिनी गागर में सागर थी। स्वस्थ, ज्ञानवर्धक जानकारियां, उच्च कोटि के लेखकों की श्रेष्ठ रचनाएं, कथा-कहानियां ही स्थान पाती थीं। समय के साथ ''सारथी'' बदलते गए कोई तंत्र-मंत्र, साधू-संतों को ले आया, कोई अपने ही सगे-संबंधियों को स्थान देने लगा, किसी के लगे-बधों को झेलना पाठक की मजबूरी हो गयी तो किसी ने तो आ कर इसकी अपनी पहचान को ही ख़त्म कर, आम पत्रिकाओं का रूप दे ''बुक स्टॉलों'' के ढेर में की एक बना डाला।  

पहले एक चलन था कि विनम्र संपादक अपने पाठकों की रुचि, उनके विचार जान कादम्बिनी को लोकप्रिय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे ! ऐसे ही नहीं इसने एक लाख प्रतियों का आंकड़ा छू लिया था ! गैर हिंदी प्रदेशों में भी यह खूब पढ़ी जाती थी। सालों शिखर पर रही इस पत्रिका की अपनी एक गौरवमयी पहचान रही  है ! यहां तक की इसके पाठकों को भी सम्मानजनक दृष्टि से देखा जाता था। पर आज हालत यह है कि यदि कोई मेहमान घर आ इसे सामने पाता है तो आश्चर्य से पूछता है ''अरे ! यह अभी भी निकल रही है ?''

आज तो ऐसा लगता है जैसे इसकी बेहतरी की चिंता किए बिना, एक ''फार्मेल्टी'' के तहत इसे निकाला जा रहा है ! पहले जहां यह एक सुरुचिपूर्ण, राह दिखाने वाली, सामाजिक संदेशों से भरी साफ़-सुथरी, अनेकों गुणों को समेटे एक फिल्म की तरह होती थी, वहीं आज यह एक नीरस, उबाऊ ''डाक्यूमेंट्री'' की तरह हो कर रह गयी है। फिल्म से याद आया कि पहले यह फिल्मों और फिल्म वालों से कुछ दूरी बना कर ही चला करती थी। पर अब तो लगता है कि मनुहार-विनती कर उनके नाम को शामिल किया जाता है। समय बदल चुका है, फ़िल्मी कलाकारों को पुस्तक से जोड़ने में कोई बुराई नहीं है, लोगों की पहली पसंद बने हुए हैं ये, आजकल ! पर उनके तथाकथित लेख पत्रिका की श्रेणी के तो हों ! ऐसे-ऐसे लोग अपनी विद्वता झाड़ते यहां मिलते हैं जो ढंग से हिंदी की चार लाइनें भी नहीं बोल पाते ! फ़िल्मी जगत में भी विद्वानों, जानकारों, गुणवानों की कोई कमी नहीं है ! उनके विचार, लेख, रचनाएं क्यों नहीं पाठकों तक पहुंचतीं ?

अभी भी समय है, मेरे जैसे हजारों लोग इसका इंतजार करते हैं। आपसे विनम्र निवेदन है कि इसे और लोकप्रिय बनाने की ओर ध्यान दिया जाए ! ''थीम अंक'' के नाम पर आधी से ज्यादा पत्रिका को समेट कर उसे बोझिल बनाने के बजाए उस विषय को पंद्रह-बीस पृष्ठों तक ही सिमित रख, बाकी में अन्य विषयों को स्थान दें तो बेहतर होगा ! लेखकों से निवेदन किया जाए कि भाषा सरल-सुगम हो जिससे बच्चों में भी इसकी लोकप्रियता बढे। अपने देश, देशवासियो, इतिहासिक-पौराणिक महान चरित्रों को, ईसप-पंचतत्र जैसी कथाओं के लिए भी एक कोना सुरक्षित कर दें। ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि आज की पीढ़ी को अपने इतिहास की जानकारी ना के बराबर है ! अभी पिछले दिनों उदयपुर-हल्दीघाटी जाना हुआ तो बेहद दुःख और आश्चर्य का सामना करना पड़ा जब साथ के दसवीं के छात्र ने हल्दी घाटी और चेतक के बारे में अपनी अनभिज्ञता जाहिर की ! और तो और उनकी माताश्री जो खुद शिक्षक हैं. दिल्ली में, उनकी जानकारी भी इस विषय में सतही ही थी। 

आशा है अन्यथा ना लेते हुए,  कुछ समय निकाल, इस विषय पर भी गौर किया जाएगा। 
धन्यवाद। 
* * * * *
 
पत्र जो उनके द्वारा छापा गया। 

बुधवार, 19 जून 2019

जब भजन मंडली ने दो-दो कंबल ओढ़वाए

वह गायन लय-ताल के साथ अपने में शिक्षा, उपदेश, भजन सब कुछ समेटे था। तक़रीबन सारे यात्रियों का ध्यान उस ओर खिंच कर रह गया था। एक दो घंटे के बाद भोजनोपरांत, सोने के पहले, आधेक घंटे के लिए वही माहौल फिर बना। गीत-भजनों का सार था, सर्वजन हिताय ! सर्व जन सुखाये ! हर जीव में भगवान है ! खुद कष्ट सह कर भी दूसरों का उपकार करो ! सब पर दया करो ! सब एक ही परमात्मा की संतानें हैं इत्यादि, इत्यादि ! पर कुछ देर बाद ही इस दिखावे की पोल खुल गयी ! जब गर्मी से बचाव के लिए ज्यादा पैसे खर्च कर खरीदी गयी ठंड से निजात पाने के लिए मजबूरन दो-दो कंबल ओढ़ने पड़े......!  

#हिन्दी_ब्लागिंग   
अभी पिछले हफ्ते मुंबई से दिल्ली आना हो रहा था। सहयात्रियों में एक 24-25 जनों की टोली भी थी। जिसमें युवा से अधेड़ उम्र के पढ़े-लिखे, सभ्रांत, शांत, सौम्य दिखते लोग शामिल थे, जो शायद देवस्थलों के भ्रमण के लिए निकले थे। गाडी चलने के बाद चाय-नाश्ता निपटने के उपरांत दो महिलाओं के गायन की स्वर लहरी सुनाई पड़ी जो कुछ ही देर बाद मंद, कर्णप्रिय समूह गान में परिवर्तित हो गयी। बीस-पच्चीस मिनट का वह गायन लय-ताल के साथ अपने में शिक्षा, उपदेश, भजन सब कुछ समेटे था। सारे यात्रियों का ध्यान उसी ओर था। एक दो घंटे के बाद भोजनोपरांत, सोने के पहले, आधेक घंटे के लिए वही माहौल फिर बना, गीत-भजनों का सार था, सर्व जन हिताय ! सर्व जन सुखाये ! हर जीव में भगवान है ! खुद कष्ट सह कर भी दूसरों का उपकार करो ! सब पर दया करो ! सब एक ही परमात्मा की संतानें हैं इत्यादि, इत्यादि !  
   
कुछ ही देर बाद जब हरेक यात्री सोने का उपक्रम कर रहा था तभी ऐसा लगा कि कोच का तापमान अचानक कम हो गया है। सबको कुछ ज्यादा ही ठंड महसूस होने लगी ! अटेंडेंट को बुला कर तापमान बढ़ाने को कहा तो उसने बताया कि कुछ लोगों ने जबरन ऐसा करवाया है। फिर भी उसने नॉर्मल करने की बात कही।  कुछ देर तो ठीक रहा उसके बाद फिर ठंड बढ़ गयी तो मैंने सम्बंधित कर्मचारी को फिर कहा, तो उसने फिर वही बात दोहराई और बताया कि उस मंडली के दो-तीन लोग लड़ने पर उतारू हो तापमान नीचे करवा रहे हैं ! उसने बताया कि, उन्हें दूसरे यात्रियों की परेशानियों का हवाला भी दिया, यह भी कहा कि बुजुर्ग यात्रियों को तकलीफ हो रही है ! पर वे नहीं माने ! वे सिर्फ अपनी बेआरामी की बात कर रहे हैं ! फिर उसने सुझाव दिया कि, सर, आप लोग एक-एक कंबल और ले लीजिए, बेकार इतनी रात को बात बढ़ाने से कोई फायदा तो है नहीं ! खैर बात वहीँ ख़त्म कर दी गयी ! हालांकि एक-दो लोग कक्ष के बाहर जा कर बैठे भी दिखे ! अजीब विडंबना थी ! पहले गर्मी से बचाव के लिए ज्यादा पैसे खर्च कर ठंड का इंतजाम करो; और फिर उसी खरीदी गयी ठंड से निजात पाने के लिए कंबल ओढो ! 

मैं कभी भी यात्रा के दौरान उपलब्ध कंबलों का इस्तेमाल नहीं करता पर उस दिन मजबूरी में चादर के ऊपर पैरों तक ओढ़ यही सोचता रहा कि मुंह से गाये या दिए गए उपदेश लोग कब अपने दिलों में भी उतारेंगे ! कब दूसरों की तकलीफों, उनकी परेशानियों को भी समझेंगे ! कब सिर्फ दिखावे, रूटीन या दूसरों को उपदेश देने, सुनाने के बजाय खुद भी उनका अनुसरण करेंगे ! कब ! 

शनिवार, 15 जून 2019

छत्तीसगढ में खेल और खेलों में संस्कृत

क्रिकेट = कंदुक क्रीड़ा।
रन       = भावनांक।  
चौका   = सिद्ध चतुष्कम।
बढ़िया शॉट = पुष्ठु प्रहार। 
बाउंड्री = कंदुक परिधि लंघनम। 
कैच     =  ग्रहणम। 
आउट = निर्गत। 

#हिन्दी_ब्लागिंग  
ये कोई मजाक की बात नहीं हो रही ना ही हिंदी को असमर्थ भाषा बताने की साजिश ! यह तो छत्तीसगढ के संस्कृत विद्या मंडलम का प्रदेश में संस्कृत भाषा को लोकप्रिय और बढ़ावा देने के साथ-साथ खेलों में भी इस भाषा के प्रयोग को प्रोत्साहन देने का एक प्रयास है। इससे छत्तीसगढ़ देश का पहला ऐसा राज्य होगा जहां क्रिकेट, फ़ुटबाल, बैडमिंटन जैसे हर प्रचलित खेलों के नाम व नियम के लिए संस्कृत में तकनीकी शब्दावली होगी। इसकी तैयारी चरणबद्ध तरीके से, नए शिक्षा सत्र से संस्कृत स्कूलों में खेलों के प्रचलित नामों की जगह संस्कृत के नामों से पुकारे जाने से की जा रही है। इसके साथ ही यह भी कोशिश रहेगी कि खेलकूद की प्रतियोगिताओं में संस्कृत ही में उसका विवरण प्रसारित किया जाए। इसके साथ ही यह भी प्रयास किया जाएगा कि स्थानीय और देशज लोकप्रिय खेलों के नामों और नियमों का भी संस्कृत में अनुवाद किया जा सके, इस पर रिसर्च भी की जा रही है।  

वैसे इससे मिलता-जुलता एक प्रयास इस साल बनारस में संपूर्णानंद विश्वविद्यालय ने संस्कृत क्रिकेट प्रतियोगिता का आयोजन करवा कर किया था, जिसमें खिलाड़ियों ने धोती-कुर्ता पहन कर क्रिकेट खेला था। इस में कॉमेंट्री व अन्य नियम कायदे सबमें संस्कृत का ही उपयोग किया गया था। जब खेलों प्रतियोगिताओं में भी संस्कृत का प्रयोग होने लगेगा तो बच्चे भी इस भाषा से और ज्यादा जुड़ाव और लगाव महसूस करने लगेंगे। अभी जो संस्कृत में खेलों के नाम का शब्दकोष बनाया जा रहा है उसमें खेलों के नाम कुछ इस तरह के होंगे -

* क्रिकेट = कंदुक क्रीड़ा !            * फ़ुटबॉल  = पाद कंदुकम !                 * बॉस्केटबॉल = हस्तपाद कंदुकम !
* वॉलीवाल = अपाद कंदुकम !     * टेबल टेनिस = उत्पीठिका कंदुकम !    * बैडमिंटन = खगक्षेपण क्रीड़ा !
* दौड़ = धावनम !                        * कबड्डी = रुद्ध्यते बाध्यते !                   * खोखो = खो गति प्रतिघात !      
* कुश्ती = मल्लयुद्धम !   

शुरू में यह सब अजीबोगरीब या अटपटा सा जरूर लगता है ! साथ ही यह आशंका भी है कि सदा की तरह भारतीय भाषाओं को अक्षम बताते हुए उनका विरोध कर, अंग्रजी को तरजीह देने वाले कुछ लोग इस कदम को भी निरुत्साहित करने, इसे अव्यवहारिक और कलिष्ट बताने, इसका मजाक बनाने के साथ-साथ अंग्रजी शब्दों के उपयोग को ख़त्म करने के विरोध में मुहीम चलाने की पुरजोर कोशिश कर सकते हैं ! अब तो यह समय ही बताएगा कि यह प्रयास कितना सफल होता है। लोगों का कितना सहयोग मिलता है और जुबान पर चढ़े शब्दों की जगह नए शब्दों के प्रयोग में कितना समय लगता है या फिर अवाम स्वीकार करती भी है या नहीं ! क्योंकि संस्कृत में टी.वी. पर पढ़ी जाने वाली खबरों का उदहारण हमारे सामने है !

*संदर्भ - दैनिक भास्कर        

बुधवार, 12 जून 2019

क्या हुआ था उस दिन, आज की तारीख पर !

जस्टिस सिन्हा ने अपना फैसला सुनाते हुए श्रीमती गाँधी को चुनावों में भ्रष्ट आचरण का दोषी करार देते हुए उनका चुनाव तो रद्द किया ही साथ ही उन्हें अगले छह वर्ष तक किसी भी संवैधानिक पद के लिए भी  अयोग्य घोषित कर दिया। कोर्ट के बाहर-अंदर सन्नाटा पसर गया। भरी दोपहरी में भी आधी रात का सा माहौल छा गया सा लगने लगा था। इंदिरा गांधी का चेहरा सफ़ेद पड़ गया, उन्हें पूरी आशा थी कि फैसला उनके ही हक़ में होगा ! हालांकि उन्हें अपील के लिए पंद्रह दिन का समय मिला था पर ऐसे निर्णय की तो उन्होंने तो क्या किसी ने भी कल्पना तक नहीं की थी, इसीलिए उन्होंने आगे अपील के लिए कोई वकील भी नियुक्त नहीं किया था...................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
इलाहाबाद हाईकोर्ट परिसर, 12 जून 1975, जैसे सारा शहर ही वहां आ इकठ्ठा हुआ हो ! चहुँ ओर जन-सैलाब ! होता भी क्यों ना ! आज देश की प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के रायबरेली से चुनाव जीतने के नतीजे को सोशलिस्ट नेता राजनारायण द्वारा दी गयी चुन्नौती का फैसला जो आना था। जज थे जगमोहनलाल सिन्हा। अचानक भीड़ में भारी अफरातफरी मच गयी, नारे लगने लगे, भीड़ बेकाबू होने लगी, उसी रेलम-पेल में एक काले रंग की गाडी कोर्ट परिसर में आ कर रुकी और उसमें से उतरीं श्रीमती इंदिरा गाँधी ! देश के तब तक के इतिहास में कोई प्रधान मंत्री पहली बार अपना फैसला सुनने अदालत पहुंचा था। चेहरे पर हल्के से तनाव के बावजूद एक निश्चिंतता भरी मुस्कान लिए उन्होंने अपने समर्थकों और कार्यकर्ताओं का हाथ हिला कर अभिवादन किया। नारों के शोर से सारा माहौल गुंजायमान हो उठा ! श्रीमती गांधी धीरे-धीरे चलते हुए कोर्ट के कक्ष में प्रवेश कर गयीं। अगले पलों में जो होने वाला था उसका किसी को भी लेश मात्रअंदाजा नहीं था ! 

बात 1971 की है। इंदिरा गांधी ने उत्तर प्रदेश की अपनी परंपरागत रायबरेली सीट पर अपने प्रतिद्वंदी सोशलिस्ट पार्टी के राजनारायण को भारी बहुमतों से परास्त कर जीत हासिल की थी। हारने के बाद राजनारायण ने चुनावी गड़बड़ियों का आरोप लगाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल कर दी थी। जिसे दो आधारों पर स्वीकार कर लिया गया था। पहला था प्रधान मंत्री सचिवालय के ओएसडी राजकुमार कपूर का चुनाव एजेंट की तरह काम करना और दूसरा उनकी चुनाव रैलियों के आयोजन में उत्तर प्रदेश के सरकारी अधिकारीयों का सहयोग। 

समयानुसार जस्टिस सिन्हा ने अपना फैसला सुनाते हुए श्रीमती गाँधी को चुनावों में भ्रष्ट आचरण का दोषी करार देते हुए उनका चुनाव तो रद्द किया ही साथ ही उन्हें अगले छह वर्ष तक किसी भी संवैधानिक पद के लिए अयोग्य घोषित भी कर दिया। कोर्ट के बाहर-अंदर सन्नाटा छा गया। एक अजीबोगरीब चुप्पी सारे जन-सैलाब पर छा गयी। भरी दोपहरी में भी आधी रात का सा माहौल पसर गया लगता था। इंदिरा गांधी का चेहरा सफ़ेद पड़ गया, मानो काटो तो खून नहीं ! उन्हें पूरी आशा थी कि फैसला उनके ही हक़ में होगा ! हालांकि उन्हें अपील के लिए पंद्रह दिन का समय मिला था पर ऐसे निर्णय की तो उन्होंने तो क्या किसी ने भी कल्पना तक नहीं की थी, इसीलिए उन्होंने आगे अपील के लिए कोई वकील भी नियुक्त नहीं किया था। उनके साथ के सारे नेता, कार्यकर्त्ता, साथी किंकर्तव्यविमूढ़ से खड़े थे। किसी को कुछ भी नहीं सूझ रहा था। ऐसे में वहीं के एक स्थानीय वकील वी. एन. खेर ने अपनी तरफ से ही एक अर्जी हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दाखिल कर दी। बाद में यही खेर साहब भारत के मुख्य न्यायाधीश भी बने। 

उसके बाद जो हुआ वह तो सभी जानते हैं कि कैसे सुप्रीम कोर्ट में अवकाश होने की वजह से इस मामले की सुनवाई अवकाशकालीन जस्टिस कृष्णा अय्यर ने करते हुए 24 जून को श्रीमती गांधी को राहत दे उन्हें प्रधान मंत्री बने रहने की छूट दे दी। जिसके अगले ही दिन 25 जून को इमरजेंसी लगा दी गयी। आगे चल कर हाई कोर्ट का फैसला भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द कर दिया गया।  

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