बुधवार, 10 जून 2026

गर्मी को धता बताता टिटलागढ़ का शिव मंदिर

ऐसी मान्यता ​​है कि प्रचंड गर्मी में भी यह ठंड मंदिर के निर्माण, उसमें प्रयुक्त हुई खास किस्म की चट्टानों या धरती के नीचे से आने वाली ठंडी हवा के कारण होती है। कुछ लोग इसे भगवान की लीला मानते हैं। कुछ लोगों का मानना ​​है कि यह जादुई ठंडक माता पार्वती और भगवान शिव की मूर्तियों का करिश्मा है ! जितने लोग उतनी बातें पर अभी तक मंदिर का यह रहस्य सुलझ नहीं पाया है। पुजारी जी का कहना है कि यदि मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाएं तो अंदर हाड़ जमाने वाली ठंड हो जाती है.....................! 

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

मारा देश एक धर्म प्रधान देश है ! यहां हजारों-लाखों मंदिर, देवस्थान हैं ! उनमें से अनगिनत ऐसे  हैं, जिनके साथ कोई ना कोई रहस्यात्मक बात जुडी हुई है, जिसका अथक प्रयासों, वैज्ञानिक कोशिशों के बावजूद निवारण नहीं हो पाया है ! ऐसा ही एक शिव-पार्वती मंदिर, उड़ीसा के टिटलागढ़ में स्‍थापित है जो अपनी अनूठी विशेषता के कारण जगत्प्रसिद्ध है ! 

 

प्रवेश द्वार 

डिशा ! देश के पूर्वी तट पर स्थित यह हमारा आठवां सबसे बड़ा राज्य है। यह अपनी समृद्ध संस्कृति, इतिहास और प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है। यहां कई प्राचीन, रहस्यमय, विश्वविख्यात मंदिर हैं।देश की इस सबसे गर्म जगह का भी सबसे गर्म इलाका है टिटलागढ़ ! जहां गर्मियों में दिन का अधिकतम तापमान 55 डिग्री तक चला जाता है ! उसी टिटलागढ़ के कुम्हडा पहाड़ी की चोटी पर भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती का एक अद्भुत मंदिर स्थित है। गर्मियों में कुम्हरा पर्वत की चट्टानें और पत्थर इतने गर्म हो जाते हैं कि वहां किसी का भी कुछ मिनटों के लिए भी ठहरना मुहाल हो जाता है ! पर आश्चर्य की बात यह है कि इस भीषण गर्मी का मंदिर के अंदर लेष मात्र भी असर नहीं पड़ता और वहां ठंडक बनी रहती है ! 

प्रांगण 
इस अनोखे मंदिर की अनूठी विशेषता यह है कि बाहर जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती है, वैसे-वैसे इसके अंदर बिना एसी, कूलर या पंखे के तापमान कम होता चला जाता है ! कभी-कभी तो यह दस डिग्री से भी नीचे पहुंच जाता है ! बाहर के 50 डिग्री के तापमान से आया इंसान तब आश्चर्यचकित सा रह जाता है, जब वह मंदिर के अंदर विद्यमान पुजारी और श्रद्धालुओं को गर्म कपड़े ओढ़े बैठा देखता है ! पर कुछ ही देर में मंदिर में प्रवेश करते ही बाहर की भीषण गर्मी से परेशान वह श्रद्धालु भी ठंड से कांपने लगता है और उसे भी किसी गर्म वस्त्र की जरुरत पड़ ही जाती है ! तापमान के इस बदलाव का रहस्य अभी तक वैज्ञानिक भी नहीं सुलझा पाए हैं। 

विलक्षणता 
ऐसी मान्यता ​​है कि प्रचंड गर्मी में भी यह ठंड मंदिर के निर्माण, उसमें प्रयुक्त हुई खास किस्म की चट्टानों या धरती के नीचे से आने वाली ठंडी हवा के कारण होती है। कुछ लोग इसे भगवान की लीला मानते हैं। कुछ लोगों का मानना ​​है कि यह जादुई ठंडक माता पार्वती और भगवान शिव की मूर्तियों का करिश्मा है ! जितने लोग उतनी बातें पर अभी तक मंदिर का यह रहस्य सुलझ नहीं पाया है। पुजारी जी का कहना है कि यदि मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाएं तो अंदर हाड़ जमाने वाली ठंड हो जाती है ! 

हर हर महादेव 
यह शिव मंदिर प्राचीन भारतीय वास्तुकला का एक अद्भुत उदाहरण है। मंदिर का निर्माण पत्थरों से किया गया है और इसकी दीवारों पर सुंदर नक्काशी भी की गई है। मंदिर के अंदर एक शिवलिंग स्थापित है, हालांकि, इसके निर्माण का समय या इसे किसने बनवाया, इस बारे में कोई स्पष्ट ऐतिहासिक प्रमाण मौजूद नहीं है। आस्था के इस केंद्र में भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमाएं स्थापित हैं। मंदिर के भीतर एक छोटा सा कुंड है, बाहर चाहे कितनी भी गर्मी क्यों न हो पूरे साल इसमें ठंडा पानी मौजूद रहता है ! हो सकता है कि इस पानी के स्रोत की वजह से मंदिर में तापमान कम रहता हो ! जो भी हो मंदिर की यही विशेषता इसको और भी अद्वितीय बनाती है। 

 

विहंगम दृश्य 
डिसा के बालांगीर जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग 59 पर स्थित टिटलागढ़ इलाके में विद्यमान इस मंदिर तक देश के किसी भी हिस्से से रेल, हवाई या सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है ! ओडिशा के सबसे बड़े शहरों में से एक टिटलागढ़ का सभी जगहों से बेहतरीन कनेक्शन है। विदेशों की यात्राओं से पहले हमें अपने देश को एक बार पूरी तरह देख, समझ, टटोल लेना चाहिए !

@ सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

गुरुवार, 4 जून 2026

अपनी औकात नहीं भूलनी चाहिए

बिना मेहनत के रोज पेट भर खाने और निश्चिन्तता के कारण वह मुफ्तखोर गीदड़ दिनों-दिन फलने-फूलने लगा। उसे शेर के साथ रहता देख, जंगल के बाकि जानवर उससे कतराने लगे, कौन पंगा ले ! इससे गीदड़ अपने-आप को सक्षम और ताकतवर समझने लगा। जंगल में उसकी दादागिरी चलने लगी ! सीधे-साधे जीवों को रोज तंग करने लगा ! किसी से कुछ भी छीन लेना उसके लिए आम बात हो गई ! अब इस कहानी से आपको अपने किसी आस-पास के नेता, अभिनेता, दबंग, किसी की शह पर नाचते किसी बड़बोले देश या किसी ताजा घटना की याद आ जाए तो.....................तो आने दीजिए ना, हर्ज क्या है.............  😊   

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र इंसान के जीवन में कम से कम एक बार तो समय अनुकूल होता ही है ! उसी वक्त की मेहरबानी के चलते पिद्दी भी पहलवान बन जाती है ! पर कुछ पिद्दियां इतिहास से कोई सबक ना लेते हुए इस अनुकूलता को अपनी नियति, अपना शौर्य समझ इतनी अराजक, अहंकारी और धृष्ट हो जाती हैं कि खुद को ही भगवान समझने लगती हैं ! वे भूल जाती हैं कि समय कभी भी एक समान नहीं रहता ! ऐसी ही कुछ पिद्दियों का हश्र देख बचपन की एक कहानी याद आ गई, जो यही सीख देती है कि किसी को भी अपनी औकात, अपनी बिसात कभी भी नहीं भूलनी चाहिए ! कहानी कुछ इस प्रकार है :

भटकन 
क जंगल में एक गीदड़ रहता था। किसी तरह दूसरों के किए गए शिकार पर उसके दिन कटा करते थे। एक दिन भोजन की तलाश में जंगल में भटकते हुए अचानक उसके सामने एक शेर आ गया। गीदड़ के तो देवता कूच कर गए। थर-थर कांपते उसे अपनी मौत साक्षात नजर आने लगी ! पर वह बहुत काइयां था ! मौके की नजाकत को ताड़ वह तुरंत शेर के पैरों में लोट गया। शेर अभी शिकार से लौटा था, उसका पेट भरा हुआ था। इस नौटंकी को देख उसने पूछा, क्या हुआ ? क्या बात है ? शेर को शांत देख गीदड़ की जान में जान आई, बोला महाराज जंगल के जानवर मुझे बहुत तंग करते हैं। कुछ खाने जाता हूं, तो मार कर भगा देते हैं। बड़ी मुसीबत में हूं, मुझे अपनी सेवा में रख लीजिए। शेर ने कहा ठीक है, तुम मेरे साथ रहो। तुम्हें न खाने-पीने की चिंता रहेगी और ना किसी से ड़रने की।


ऐश 
गीदड़ के समय के अनुकूल होते ही उसके दिन फिर गए। बिना मेहनत के रोज पेट भर खाने और निश्चिन्तता के कारण वह दिनों-दिन फलने-फूलने लगा। उसे शेर के साथ रहता देख, जंगल के बाकि जानवर उससे कतराने लगे, कौन पंगा ले ! इससे गीदड़ अपने-आप सक्षम और ताकतवर समझने लगा। जंगल में उसकी दादागिरी चलने लगी ! सीधे-साधे जीवों को तंग करने लगा ! किसी से उसका कुछ भी छीन लेना आम बात हो गई ! धीरे-धीरे उसे लगने लगा की इन डरपोक जानवरों का तो मैं भी शिकार कर सकता हूँ !  ऐसा ख्याल आते ही अब वह शेर को शिकार करते हुए ध्यान देखने लगा। उसने पाया कि शिकार के पहले शेर की आंखें लाल हो जाती हैं, शरीर धनुष की तरह तन जाता है और वह जोर की दहाड़ मार बिजली की गति से शिकार की गर्दन पर झपट कर उसका काम तमाम कर देता है। 
समझाइश 
गीदड़ अपने गुमान में अपनी औकात भूल गया ! उसे लगने लगा कि शिकार करना तो बहुत आसान है, यह तो वह भी कर सकता है। सो एक दिन उसने शेर से कहा कि आप इतने दिनों से मेरे लिये भोजन का प्रबंध करते आए हैं, आज मैं आप के लिये शिकार कर लाउंगा। शेर ने उसे बहुत समझाया, खतरे बताए, पर गीदड़ जिद पर अड़ा रहा तो शेर ने उसे इजाजत दे दी। समय ने करवट ले ली थी !
मतिभृष्टता 
अंत 
दूसरे दिन सुबह वह मांद से निकला। जंगल में कुछ ही दूरी पर उसे एक हाथी नजर आ गया। आज तक उसने हाथी का मांस नहीं खाया था। पर उसे मालुम नहीं था कि ऐसा इसलिए था, क्योंकि शेर भी हाथी से कतराता था। गीदड़ ने सोचा आज इसे मार कर ले जाउंगा तो शेर खुश हो जाएगा। यह सोच वह हाथी के करीब गया, अपनी आंखें लाल करने की कोशिश की, शरीर को ताना और जोर से चिल्ला कर हाथी पर कूद तो गया, पर हाथी के विशाल शरीर से टकरा कर जमीन पर गिर पड़ा। हाथी ने उसकी हरकत पर झुंझला कर उसे सूंड में लपेट दूर उछाल दिया ! गीदड़ की हड़्ड़ियां चूर-चूर हो गयीं। हाथी ने जोर की चिंघाड़ भरी और जंगल में गुम हो गया। शेर ने एक बार उधर देखा फिर अपना मुंह मोड़ लिया !
ब इस कहानी से आपको अपने किसी आस-पास के नेता, अभिनेता, दबंग, किसी की शह पर नाचते किसी बड़बोले देश या कोई ताजा घटना याद आ जाए तो.....................तो आने दीजिए ना, हर्ज क्या है 😊  

@छवियों के लिए अंतर्जाल का हार्दिक आभार 

शुक्रवार, 29 मई 2026

दुनिया तिलचट्टों से नहीं, इंसानों से चलती है

कुछ अति ज्ञानी लोग भूल गए कि दुनिया तिलचट्टों से नहीं, इंसानों से चलती है ! इंसान दिवास्वपन नहीं देखते ! वे उद्यम करते हैं ! विध्वंस नहीं करते ! दूसरों की क्षति नहीं सोचते ! गंदगी से दूर रहते हैं ! जहां भी रहते हैं, उसकी रक्षा और स्वच्छता बनाए रखते हैं ! उनको इसका भी इल्म नहीं है कि जिस युवा वर्ग को लक्ष्य बनाने की नापाक कोशिश कर रहे हैं, उसके लिए राष्ट्र प्रथम है ! वह अब देश की प्रगति का हिस्सा बन चुका है ! वह समझदार है ! अच्छे-बुरे को पहचानता है ! कॉकरोच उसके लिए गाली के समान है...........😡

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अभी पिछले दिनों कुछ पूर्वाग्रही, कुंठित, अराजक तत्वों ने देश की युवा पीढ़ी की तुलना उस   2.5x4x1.5cm के आकार के कीड़े से की, जो इस दुनिया में करीब 35 करोड़ सालों से रेंग रहा है ! जो एक कीड़ा नहीं बल्कि चलता-फिरता जीवाश्म है ! तो क्या ऐसे लोगों ने सिर्फ इसलिए एक घृणित जीव को अपना आदर्श बना लिया क्योंकि वह करोड़ों वर्षों से ''सर्वाइव'' कर रहा है ? नहीं ! उनका मुख्य उद्देश्य उस जीव के ''सर्वाइवालपने'' के पैटर्न को अपने से जोड़, एक गलत नेरेटिव गढ़, देश के युवा वर्ग को गुमराह करना था ! पर उनके उस विलेन नुमा हीरो के चरित्र, उसका व्यवहार, उसकी कारस्तानियों ने इनके गुब्बारे के फूलने से पहले ही हवा निकाल दी ! 

एजेंडा 

वैसे तो इस कीड़े का हमारे ग्रंथों में कोई जिक्र नहीं मिलता, पर ऐसा तो नहीं कि इस राक्षसी प्रवृति के सर्वाहारी जीव को अपने दुराचार, पापों, कुकर्मों की वजह से, अश्वस्थामा की तरह ही कोई श्राप मिला हो, जिसकी वजह से इसे घृणा-वितृष्णा सहते हुए धरती पर गंदगी व मलिनता में वर्षों-वर्ष से रहना पड़ रहा हो ! उसी मलिनता के कारण दूषित हुए दिलो-दिमाग ने इसे ''वेक्टर'' बना दिया हो !

अनगिनत बीमारियों का वाहक 
पि छले दिनों देश में जो एक अराजक माहौल बनाया गया, जिसका आधार, वर्षों पहले विश्व-विख्यात उपन्यासकार फ्रांज काफ्फा का लोकप्रिय उपन्यास ''द मेटामॉफोर्सिस'' था ! जिसमें उन्होंने एक अकर्मण्य, आत्मश्लाघि, बरोजगार, परदोषी युवक की कहानी बयां की थी जो अपने को, लियाकत ना होते हुए भी सर्वगुणसम्पन्न समझता है ! एक दिन जब वह अपनी नौकरी जाने के बाद, गंदगी से भरे अपने कमरे में सुबह नींद से जागता है तो खुद को एक कीड़े के रूप में पाता है और वह कीड़ा था कॉकरोच यानी तिलचट्टा ! 

किताब का कवर 

इसी को आधार बनाया गया 

ले खक काफ्फा ने उस युवक को एक पीड़ित के रूप में दर्शाया था ! इन दिनों उसी भाव को ले उड़ा गया कि मैं पीड़ित हूँ ! मेरे ऊपर अत्याचार किया जा रहा है ! मुझे सताया जा रहा है ! सिस्टम दोषी है ! इसे बदलने के लिए क्रांति करनी होगी ! विडंबना यह है कि जो परजीवी खुद को पीड़ित दिखा रहे हैं, वे खुद कोई उपक्रम करना नहीं चाहते ! बस पड़े रहना, गंदगी फैलाना और जहां हैं उसी को बर्बाद करना उनका उद्देश्य है ! फिर भी उस उपन्यास के लड़के की तरह ये लोग चाहते हैं कि बिना कुछ किए, दूसरों की तरह उन्हें सम्मान मिले, उनकी बात सुनी जाए, उन्हें अधिकार भी दिए जाएं ! 

कपट 
ऐसा होने से पहले ही उपाय जरुरी 
कुछ अति ज्ञानी लोग भूल गए कि दुनिया तिलचट्टों की नहीं, इंसानों की है ! इंसान दिवास्वपन नहीं देखते ! वे उद्यम करते हैं ! विध्वंस नहीं करते ! दूसरों की क्षति नहीं सोचते ! गंदगी से दूर रहते हैं ! जहां भी रहते हैं, उसकी सुरक्षा और स्वच्छता बनाए रखते हैं ! क्या ऐसे लोग, अभिभावक या समाज अपने बच्चों को कभी भी कॉकरोच कहलवाना गवारा करेगा ? क्या कोई भी माँ-बाप यह चाहेगा कि उसका बच्चा आलसी, निकम्मा बन घर पर बोझ बने ? क्या कोई भी चाहेगा कि उसकी संतान को देश-परिवार-समाज विरोधी समझ हिकारत से देखा जाए और उन्हें ताने सुनने पड़ें ? काफ्फा भी अपने नायक के प्रति सहानुभूति रखने के बावजूद सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ पाया और उसको उस नालायक युवा का उसी के परिवार के सदस्यों द्वारा बहिष्कार करते हुए दिखाना पड़ा ! 
मनोरमता 
नको इसका भी इल्म नहीं है कि जिस युवा वर्ग कॉकरोच कह अपना लक्ष्य साधने की नापाक कोशिश कर रहे हैं, उसके लिए राष्ट्र प्रथम है ! वह अब देश की प्रगति का हिस्सा बन चुका है ! वह समझदार है ! अच्छे-बुरे को पहचानता है ! वह बेहद  क्षुब्ध हुआ है ऐसी हरकत से ! कॉकरोच उसके लिए गाली के समान है ! वह यह भी अच्छी तरह से जानता है कि यदि इन सर्वाहारी जीवों को जरा सी भी सहानुभूति दे पनपने दिया, तो एक दिन वे उसी को खा जाएंगे, समाज को नष्ट कर देंगे, देश को खतरे में डाल देंगे  !  इसलिए वह सावधान भी है ! 

जागरूकता 
 मय बदल गया है ! लोग अब अफवाहों, गलत नेरेटिव के बहकावे में नहीं आते ! समाज जागरूक हो चुका है ! उसके पास गंदे, घिनौने, चालाक, कीड़े की खाल ओढ़ धोखा देने वाले कपटी और कुटिलों की खातिर के लिए पुरातन उपाय चप्पल का तो है ही, साथ में आधुनिक हथियार ''हिट'' तो हइए है...........!

@चित्रों के लिए अंतर्जाल का हार्दिक आभार 

शुक्रवार, 22 मई 2026

हल्की आंच पर भुनते खोवे के धुएं ने कइयों के भूत उतार दिए

जब उनमें से एक-दो कानून के हत्थे चढ़ गए और जिन आकाओं के कसीदे पढ़ते थे, वे भी कन्नी काट गए, तब उन्हें अपनी औकात का एहसास हुआ ! तदुपरांत जब उनके कुकर्मों के खोवे को धीमी आंच पर भूना जाने लगा, तो उससे उठते धुएं ने उसी बिरादरी के वैसे ही कुंठित, बददिमाग, पूर्वाग्रही और कई लोगों के दिलो-दिमाग पर सवार नफरत की राजनीति के भूत का भी इलाज कर दिया ! फिजा में बदलाव साफ नजर आने लगा है ! भौंपुओं के सुर बदल गए हैं ! कर्कशता की जगह जुबान में चाशनी घुलने लगी है ! निम्न स्तरीय आलोचनाओं की जगह कहानीयां-संस्मरण, चुटकुले सुनाए जाने लगे हैं ............!

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बहुत पहले एक कहानी पढ़ी थी जिसमें पाठशाला के शिक्षक, श्रेष्ठि और रसूखदार लोगों के उद्धंड व बिगड़ैल बच्चों को दंडित ना कर उनके चापलूस, मतलबपरस्त, पिच्छलगु दोस्तों को छड़ियाते थे, इससे वे नवाबजादे भी डर कर सही राह पर आ जाते थे ! आज की राजनीती में भी ऐसी ही सजा की जरुरत थी, पर पता नहीं उसको इतने दिनों तक लागू क्यों नहीं किया गया ! 

ताड़ना भी जरुरी है 
अभी कुछ दिनों पहले तक अलग-अलग दलों के चरणचाटू प्रवक्ताओं के कार्यकलापों और उनकी बेलगाम जुबान से झरते शूलों को देश की जनता बड़ी हैरत से देख-सुन रही थी ! अचंभित इसलिए थी कि अपने झूठे, मक्कार, सत्तालोलुप, सजायाफ्ता आकाओं के बचाव में ये लोग बिना किसी शर्म व लिहाज के दिन-रात तरह-तरह के झूठे निरेटिव गढ़ते रहते थे ! कुछ तो इतने धूर्त और कुटिल थे कि जनता को कुनैन भी चीनी में लपेट कर दिया करते थे ! अपने हित-स्वार्थ और आम जनता को बहकाने के लिए इन बेशउरों ने बड़े-बड़ों की माँ-बहनों की बेइज्जती करने के बाद देश की न्यायपालिका तक की मर्यादा पर भी लांछन लगा दिए थे आम नागरिक जो अपने संस्कारों के साथ जीता है, जिसमें अभी भी बड़े-छोटे की लिहाज है, जो पद की गरिमा, उसकी मर्यादा समझता है, हैरान और अचंभित था कि संबंधित संस्थाएं इतना सब होने पर भी चुप क्यों है ! ऐसा भी क्या धैर्य ? आम और खास के लिए न्याय  मानदंड क्यों ? 
दिनचर्या 
होता क्या था कि जैसे जीभ कुछ भी बकवास कर खुद तो मुंह में दुबक जाती है और इसके परिणाम स्वरूप सिर को जूते खाने पड़ते हैं, वैसे ही कोई भी बड़बोला प्रवक्ता सच की तरफ से आंखें मूंदे कुछ भी अनर्गल बोल खुद तो किनारे हो जाता था, पर उसकी बदजुबानी का दोष कमोबेश उसके आका पर ही लगता था कि उसी की शह पर यह सब कहा जा रहा है ! फिर कुछ विरोध-सिरोध होने पर माफी-वाफी का नाटक होता था और बात आई-गई हो जाती थी ! इससे उन प्यादों की जुर्रत बढ़ती ही चली जाती थी ! 

आंखों पर अंकुश, जुबान बेलगाम 
फिर समय बदला ! पर वे अराजक, उच्श्रृंखल, बदजुबान वाले भूल गए कि अब किसका राज है ! ऐसे में जब उनमें से एक-दो कानून के हत्थे चढ़ गए और जिन आकाओं के कसीदे पढ़ते थे, वे भी कन्नी काट गए, तब उन्हें अपनी औकात का एहसास हुआ ! तदुपरांत जब उनके कुकर्मों के खोवे को धीमी आंच पर भूना जाने लगा तो उससे उठते धुएं ने उसी बिरादरी के वैसे ही कुंठित, बददिमाग, पूर्वाग्रही और कई लोगों के दिलो-दिमाग पर सवार नफरत की राजनीति के भूत का भी इलाज कर दिया ! 
 

फिजा में भी जरा-जरा ही सही, बदलाव नजर आने लगा है ! भौंपुओं के सुर बदल गए हैं ! आवाज में कर्कशता की जगह चाशनी घुलने लगी है ! निम्न स्तरीय आलोचनाओं की जगह कहानीयां, संस्मरण, चुटकुले सुनाए जाने लगे हैं ! वार्तालाप के विषय बदल गए है ! अच्छा है समय रहते समझ आ गई ! वैसे इतिहास भी यही बताता आया है कि घमंड, अहम, गरूर तो किसी का यानी किसी का भी नहीं रहा ! इससे आम इंसान को भी कुछ तसल्ली मिली है ! खुश तो है वह भी, पर सोच भी रहा है कि "शठे शाठ्यं" समय रहते क्यों नहीं होता.........!

@चित्रअंतर्जाल के सौजन्य से 

मंगलवार, 19 मई 2026

आजकल वो इस तरफ देखता है कम

प्रभु ने सृष्टि बनाई ! चलो अच्छा किया ! बैठे-बैठे बोर होने से क्या फायदा ! पर आजकल धरती पर अवतरित होने वाली इंसानों की खेप को देख साफ महसूस होने लगा है कि जैसे ऊपर सारे निर्माण कार्य  को ठेके पर दे दिया गया हो ! क्योंकि वर्षों से इंसान को गढ़ने वाली मिट्टी में ईर्ष्या, द्वेष, लालच, घमंड,अहंकार, जलन जैसे घातक विकारों की मिलावट बदस्तूर वैसे ही चली आ रही है ! मानकीकरण के लिए यदि दो-चार अच्छाइयां मिलाई भी जाती हैं, तो वे भी समय के साथ बेअसर हो जाती हैं ! विडंबना यह है कि इस काम के सर्वाधिकारों पर बिना किसी प्रतिस्पर्द्धा के एकाधिकार है ऊपर वालों का ! वैसे साख भी तो उन्हीं की दांव पर लगी है.................!

#हिन्दी_ब्लागिंग  

प्रभु ने सृष्टि बनाई ! चलो अच्छा किया ! बैठे-बैठे बोर होने से क्या फायदा ! उन्होंने तरह-तरह के निर्माण किए ! ऋतुएं बनाईं ! पेड़-पौधे, लता-गुल्म, नदी-पहाड़, जीव-जंतु, पशु-पक्षी और ना जाने क्या-क्या ! फिर उनमें तालमेल भी बैठाया ! उनकी जरूरतों की हर चीज मुहय्या करवाई ! तस्वीर में सारे रंग भरे ! कहीं कोई कमी नहीं ! पर फिर पता नहीं क्या सूझी, एक पुतला बना उसे इंसान नाम दे, धकेल दिया धरती पर ! उन्हें लगा यह मेरी सबसे उत्कृष्ट रचना है और इसके साथ ही एक अलग सा संसार अपनी समय सीमा के साथ अस्तित्व में आ गया ! 

सृष्टि रचना 

दे वलोक के झरोखे पे बैठ इन खिलौनों का वीडियो गेम खेला व देखा जाने लगा ! पर खेल कितना भी मनोरंजक हो, कितनी देर तक देखा जा सकता है ? सो अगला भी कुछ समय पश्चात इसे ''ऑटोपायलट मोड'' पर डाल फारिग हो गया ! इसमें उसके तो कुछ पल ही व्यतीत हुए पर पृथ्वी पर करोड़ों साल निकल गए, सदियां बीत गईं, युग बदलते चले गए ! शुरूआती समय तो अच्छा था, कृतियों को प्रभु ने मन लगा कर बनाया था, वे नेक, समझदार, विवेकी थीं ! पर प्रभु ने समय भी तो बनाया था, जो कहीं भी, कभी भी, किसी को भी एक सा नहीं रहने देता !

मानवातरण 
वैसे नीचे जो भी टूट-फूट या किसी की एक्सपायरी हो, उसका रिप्लेसमेंट और सप्लाई ऊपर से बदस्तूर जारी तो है ! पर वस्तु की क्वालिटी में गिरावट का एहसास दिखने लगा है ! खासकर आजकल धरती पर अवतरित होने वाली इंसानों की खेप को देख साफ महसूस होने लगा है कि जैसे ऊपर सारे निर्माण कार्य को ठेके पर दे दिया गया हो ! क्योंकि वर्षों से इंसान को गढ़ने वाली मिट्टी में ईर्ष्या, द्वेष, लालच, घमंड,अहंकार, जलन जैसे घातक विकारों की मिलावट लगातार बढ़ती ही जा रही है ! यदि मानकीकरण के लिए यदि दो-चार अच्छाइयां मिलाई भी जाती होंगी, तो वे भी समय के साथ बेअसर हो जाती हैं ! विडंबना यह है कि इस काम के सर्वाधिकारों पर बिना किसी प्रतिस्पर्द्धा के एकाधिकार है ऊपर वालों का ! ध्यान तो उन्हें ही देना है ! साख तो उन्हीं की दांव पर लगी है !

धरा 
इसी लापरवाही का नतीजा है कि संसार में कोई ऐसी जगह नहीं बची जहां शांति हो ! जहां लोग चैन से रहते हों ! जहां लोगों का जीवन दुश्वार ना हो गया हो ! जहां के रहवासियों के स्वभाव में असहिष्णुता न समा गयी हो ! जहां भाईचारा खत्म ना हो गया हो। लोग बेवजह धर्म-जाति-भाषा-रंग भेद पर मर-मिटने पर उतारू ना हो जाते हों ! जरा-जरा सी बात पर कत्ले-आम न हो जाता हो ! पडोसी एक-दूसरे को दुश्मन ना समझते हों ! ऐसा ही रहा तो क्या ईश्वर की बेहतरीन कृति और सृष्टि ज्यादा समय तक बच पाएंगे ? 

तांडव, हर जगह 
अब तो प्रभु ही कुछ करें तो करें ! निर्माण के दौरान वहीं सुधार हो जाए ! कमियां वहीं दूर कर दी जाएं ! वहां के उत्पादन का परिक्षण धरा पर ना किया जाए  ! कसौटी पर कसने के लिए संसार को परिक्षण केन्द्र ना बनाया जाए ! यदि ऐसा हो सके तो इन विकारों से उपजी व्याधियों, अराजकताओं, विघ्नों, दुखों, कष्टों को दूर करने, मिटाने के लिए, जो बार-बार कभी प्रभू को, कभी जगत जननी माँ को, तो कभी विघ्नेश्वर को इस धरा पर आना पड़ता है, उस आने-जाने से बचने वाले समय का सदुपयोग वे अपनी ही कृतियों की भलाई में कर सकते है ! क्योंकि उनका मकसद और उद्देश्य भी तो अपने बच्चों को खुश रखने का है, ना कि उन्हें दंडित करने का........!

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 🙏 

रविवार, 17 मई 2026

मकड़ी, सांप और हाथी को समर्पित, एक मंदिर

मकड़ी शिवलिंग पर अपना जाल बना देती थी, जिससे वहां साफ- सफाई बनी रहे ! सांप मणियों को अर्पित कर लिंग से लिपट कर आराधना करता था और हाथी नदी से अपनी सूंड़ में पानी ला कर शिवलिंग का अभिषेक किया करता था ! पर हाथी के अभिषेक से सांप, उसकी मणियां और मकड़ी का जाल बह जाया करते थे ! इस बात पर उन तीनों में रोज झगड़ा-विवाद भी होता था ! प्रभु तो आशुतोष हैं, उन्होंने इनकी निष्काम भक्ति से प्रसन्न हो तीनों को अपने लोक बुलवा लिया..........! 

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

मारे देश में हजारों-लाखों मंदिर, पूजा स्थान व धर्म-स्थल हैं ! उनकी भव्यता, उनकी संरचना, उनकी विलक्षणता विश्व प्रसिद्ध है ! इसके साथ ही उनके निर्माण और उनसे जुड़ी आस्था को लेकर कोई ना कोई कथा-कहानी भी जुड़ी हुई है। उनमें से कुछ कथा-कहानियां तो बहुत ही हैरतंगेज होती हैं ! ऐसी ही एक कथा जुड़ी हुई है आंध्रप्रदेश के एक कस्बे में स्थित अति प्राचीन श्रीकालहस्ती शिव मंदिर के साथ ! यहां श्री का मतलब है, मकड़ी ! काल शब्द सर्प के लिए प्रयुक्त हुआ है और हस्ती का अर्थ तो हाथी होता ही है !

श्रीकालहस्ति महादेव 

मंदिर का विहंगम दृश्य 
आं ध्रप्रदेश के चित्तूर जिले में पेन्नार दरिया की एक सहायक शाखा स्वर्णामुखी नदी के किनारे एक छोटा सा कस्बा है, कालाहस्ती ! जिसका नामकरण वहां स्थित करीब 2000 साल पुराने, तीन विशाल गोपुरम और सौ स्तंभों वाले श्रीकालहस्ती महादेव मंदिर के नाम पर ही हुआ है ! ये तीर्थ नदी के तट से लेकर मंदिर के पार्श्व में तिरुमलय पहाड़ी की तलहटी तक फैला हुआ है। इसे दक्षिण कैलाश या दक्षिण काशी के नाम से भी जाना जाता है। यहां भगवान कालहस्तीश्वर के संग देवी ज्ञानप्रसूनअंबा भी स्थापित हैं। देवी की मूर्ति परिसर में , मुख्य मंदिर के बाहर ही स्थापित है। 

गर्भगृह 
इस मंदिर के साथ जुडी हुई कथा हमारे उस विश्वास को स्थापित करती है जिसके अनुसार सृष्टि के कण-कण में ईश्वर का वास है यानी ईश्वरः सर्वभूतेषु ! इस स्थान का नाम तीन जीवों, श्री यानी मकड़ी, काल यानी सर्प एवं हस्ती यानी हाथी के नाम पर किया गया है। इन तीनों ने यहां शिवजी की आराधना कर अपनी योनि से मुक्ति पाई थी ! मान्यताओं के अनुसार मकड़ी शिवलिंग पर अपना जाल बना देती थी जिससे वहां साफ- सफाई बनी रहे ! सांप मणियों को अर्पित कर लिंग से लिपट कर आराधना करता था और हाथी नदी से अपनी सूंड़ में पानी ला कर शिवलिंग का अभिषेक किया करता था ! पर हाथी के अभिषेक से सांप, उसकी मणियां और मकड़ी का जाल बह जाया करते थे ! उनमें रोज विवाद होता था ! फिर आपस में तय पाया गया कि पहले हाथी अभिषेक कर ले, उसके बाद सर्प अपनी मणियां अर्पित करे तदुपरांत शिव-लिंग पर मकड़ी अपना जाल बन दे तो सभी की आराधना हो सकेगी ! उनके भक्तिभाव को देख प्रभु ने तीनों को अपने लोक बुलवा लिया ! इसके अलावा भी कई कथाएं यहां के लिए प्रचलित हैं ! 
 
मकड़ी, सांप और हाथी की मूर्तियां 

पूजारत तीनों जीव 
यहां पर इन तीनों जीवों की मूर्तियां भी स्थापित है। श्रीकालहस्ती का उल्लेख स्कंद पुराण, शिव पुराण और लिंग पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है। स्कंद पुराण के अनुसार एक बार इस स्थान पर अर्जुन ने प्रभु कालहस्तीवर के दर्शन किए थे। इसके अलावा कणप्पा नामक एक आदिवासी ने यहां पर भगवान शिव को अपनी आंख अर्पित कर आराधना की थी। ये मंदिर राहुकाल पूजा के लिए भी विशेष रुप से जाना जाता है।
गोपुरम 
मं दिर के परिक्रमा पथ में कई शिवलिंग, भगवान पशुपति, गणेश, कार्तिकेय, चित्रगुप्त, यमराज, धर्मराज, चण्डिकेश्वर, नटराज, सूर्य, बाल सुब्रह्मण्य, लक्ष्मी-गणपति, बाल गणपति, कालभैरव तथा धनुर्धर अर्जुन की मूर्तियां भी स्थापित हैं। मंदिर के आस-पास और भी बहुतेरे दर्शनीय स्थल मौजूद हैं ! 
स्तंभ 
यहां का नजदीकी हवाई अड्डा तिरुपति में है, जो यहाँ से करीब बीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। रेल द्वारा चेन्नई-विजयवाड़ा लाइन पर स्थित गुंटूर या चेन्नई से यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। आंध्र प्रदेश परिवहन की बस सेवा भी तिरुपति से इस स्थान के लिए उपलब्ध है। यहां साल में कभी भी जाया जा सकता है पर सितम्बर से मार्च तक का समय उपयुक्त है। 

@अंतर्जाल का हार्दिक आभार 🙏

रविवार, 10 मई 2026

मातृदिवस, दस मई को ही क्यों

माता के समान कोई छाया नहीं, माता के समान कोई सहारा नहीं, माता के समान कोई रक्षक नहीं, माता के समान कोई शिक्षक नहीं और माता के ममत्व के समान कोई चीज नहीं है। उसके बारे में जितना भी कहा जाए कम है, उसका ऋण कभी भी नहीं चुकाया जा सकता ! ऐसा कहा गया है कि भगवान हर स्थान पर मदद करने नहीं पहुंच सकते, इसलिए उन्होंने माँ को बनाया। इसीलिए माँ  को भगवान का स्वरुप माना गया है 🙏🙏     

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

माँ ! जो सिर्फ देना जानती है, लेना नहीं ! उसकी ममता का, निस्वार्थ प्रेम का कोई ओर-छोर नहीं होता। सागर से गहरे, धरती से सहनशील और आकाश से भी विशाल उसके स्नेहसिक्त आँचल में तो तीनों लोक समाए रहते हैं। माँ इस धरती पर ईश्वर का प्रत्यक्ष रूप है। जिस घर में माँ खुश रहती है, वहां खुशियों का खजाना कभी खाली नहीं होता। कोई कष्ट, कोई व्याधि, कोई मुसीबत नहीं व्यापति ! अपने बच्चों को खुश देख खुश रह लेने वाली माँ अपनी खुशी के एवज में भी बच्चों की खुशी ही मांगती है !

माँ ! जिसके बिना इस दुनिया की कल्पना नहीं की जा सकती, उसी के लिए हमने एक दिन निर्धारित कर दिया ! माँ या उसका ममत्व कोई चीज या वस्तु नहीं है कि उसके संरक्षण की जरुरत हो ! नाहीं वह कोई त्यौहार या पर्व है कि चलो एक दिन मना लेते हैं ! अरे ! जब भगवान के लिए कोई दिन निर्धारित नहीं है, तो फिर माँ के लिए क्यों ? भगवान भी माँ से बड़ा नहीं होता ! वह तो खुद माँ के चरणों में पड़ा रह कर खुद को धन्य मानता है

ममत्व तो ईश्वर को भी चाहिए 
माँ ! उसको कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसके लिए कोई खास दिन निर्धारित किया गया है कि नहीं ! उसे न तोहफों की लालसा होती है नाहीं उपहारों की ख्वाहिश। मिल जाएं तो ठीक, ना मिलें तो और भी ठीक। वह तो निस्वार्थ रह बिना किसी चाहत के अपना प्यार उड़ेलती रहती है ! खुशी में सबके साथ खुश और दुःख में  ढाढस दे आंसू पोछंती ! वह भगवान से भले ही नाखुश हो जाए पर अपने बच्चों के लिए उसके मुख पर सदा आशीष ही रहती है। इसीलिए ऊपर वाले से कुछ मांगना हो तो सदा हमें अपनी माँ की सलामती मांगनी चाहिए ! हमारे लिए तो माँ हर वक़्त दुआ मांगती ही रहती है !

ममता 
माँ ! जैसे विशाल, अद्वितीय, अप्रतिम, दैवीय व्यक्तित्व के लिए एक दिन का निर्धारण ! इस बात को लेकर कई बार हम भावुक और आक्रोशित भी हो जाते हैं ! पर मई माह के दूसरे रविवार को मातृ दिवस मनाने के पीछे भी एक बेटी की अपनी माँ के प्रति अटूट प्रेम, सम्मान और सामाजिक सुधार की भावना काम कर रही थी ! उस बेटी का नाम है, एना मारिया जार्विस ! एना की मां का निधन 9 मई 1905 को हुआ था, जो उस वर्ष मई का दूसरा रविवार था, इसीलिए मई के दूसरे रविवार को ही ''मदर्स डे'' मनाने की परंपरा शुरू हुई !

एना जार्विस 
माँ ! ऐन रीव्स जार्विस अमेरिका के वेस्ट वर्जीनिया में रहते हुए समाज सेवा से जुड़ी हुई थीं। वह महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य के लिए लगातार काम करती रहती थीं। एक तरह से उन्होंने अपना जीवन खपा दिया था, जरूरतमंद महिलाओं और बच्चों के लिए ! एना अपनी माँ से बहुत प्रभावित थीं और उनसे बेहद प्यार करते हुए अपना प्रेरणास्रोत मानती थी ! ऐसा कहा जाता है कि ऐन रीव्स की यह इच्छा थी कि माँओं के सम्मान में एक दिन मनाया जाना चाहिए। इसीलिए अपनी मां की इच्छा को पूरा करने के लिए एना ने एक अभियान चलाया, लोग जुड़ते गए और पहली बार 10 मई 1908 को मदर्स डे मनाया गया ! इसे आधिकारिक रूप देने के प्रयास चलते रहे और साल 1914 में अमेरिका के राष्ट्रपति ने मई के दूसरे रविवार को आधिकारिक रूप से मदर्स डे घोषित कर दिया। इसके बाद मदर्स डे पूरी दुनिया में मशहूर होता चला गया। 

मातृदिवस का ऐतिहासिक चिन्ह 
माँ ! ऐन रीव्स जैसी माँओं के सम्मान के लिए निर्धारित दिन का बाजार के कारोबार का जरिया बनता देख खुद एना इस दिन के खिलाफ हो गईं थीं ! उन्होंने कई जगह विरोध प्रदर्शन भी किए और लोगों से अपील की कि मदर्स डे को केवल औपचारिक रूप या दिखावे के लिए ना मनाएं ! उनका मानना था कि माँओं को उपहार नहीं सिर्फ सच्चा प्यार और सम्मान चाहिए। बाद में मदर्स डे को खत्म करने तक की मुहिम शुरू कर दी थी ! 

ममत्व 
पर बाजार तो बाजार है, उसने हर पावन त्यौहार, समारोह, परंपरागत उत्सव सभी को अपनी गिरफ्त में ले लिया है और लेता जा रहा है............!

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

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