शुक्रवार, 23 सितंबर 2022

मिसिंग टाइल सिंड्रोम, जो पास नहीं है उसका दुःख

जीवन में आगे बढ़ना, तरक्की करना, बड़े लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उद्यम कर उसे हासिल करने की कोशिश करते रहना बुरी बात नहीं है ! ऐसा होना भी चाहिए ! परन्तु हमेशा इसी का चिंतन करके परेशान रहना, जो हासिल है उसे नजरंदाज करना, तनाव को बुलावा देना है ! फिर ऐसा भी नहीं है कि जो हमारे पास नहीं है, वह यदि किसी तरह हमें मिल जाए तो हम संतुष्ट हो जाएंगे ! लालसा एक ऐसी मनोवृत्ति है जो कभी संतुष्ट नहीं होती, एक चीज मिली तो दूसरी के लिए यह जागृत हो जाएगी ! यही अनियंत्रितता हमें कभी भी खुश नहीं रहने दे सकती ! खुश रहने के सैंकड़ों कारण होने के बावजूद दुखी होने का एक कारण हमें विचलित कर देता है...........! 

#हिंदी_ब्लागिंग 
एक बार एक शहर में एक व्यवसाई ने अपने होटल के नवीकरण के दौरान उसमें एक विश्वस्तरीय स्विमिंग पूल बनवाया। साफ-स्वच्छ पानी के इंतजाम के साथ-साथ उसमें चारों ओर बेहतरीन इटैलियन टाइल्स लगवाए ! परन्तु संयोगवश एक स्थान पर एक टाइल नहीं लग पाया ! होटल के खुलने पर वहाँ पर्यटकों की लाइन लग गई ! जो भी आता वह स्विमिंग पूल की सुंदरता का कायल हुए बिना नहीं रहता ! हरेक का ध्यान बेहतरीन टाइल्स की खूबसूरती पर मुग्ध हो रह जाता ! हर कोई बड़े ध्यान से इस कलाकारी को देखता और प्रशंसा करते नहीं थकता ! पर जैसे ही उसकी नजर उस मिसिंग टाइल पर पड़ती, वहीं अटक कर रह जाती ! उसके सारे हाव-भाव बदल जाते ! वह दुखी व खिन्न हो जाता ! वहाँ से लौटने वाले हर व्यक्ति की एक ही शिकायत होती कि पूल में एक टाइल मिसिंग है। हजारों टाइल्स की सुंदरता के बावजूद वह एक टाइल उसके दिमाग में पैबस्त हो रह जाती ! हरेक को उस टाइल की जगह को देख कर बहुत दुःख होता कि इतना परफेक्ट बनाने के बावजूद एक टाइल रह ही गई। तो कई लोग प्रबंधन को सलाह भी देते कि जैसे भी हो उस जगह को ठीक करवा दिया जाए। बहरहाल वहां से कोई भी खुश नहीं निकलता ! इतना सुन्दर निर्माण भी लोगों को खुशी नहीं दे पाया !
दरअसल उस स्विमिंग पूल में वो मिसिंग टाइल एक मनोवैज्ञानिक प्रयोग था, इस बात को सिद्ध करने के लिए कि हमारा ध्यान कमियों की तरफ ही जाता है ! कितना भी खूबसूरत कुछ बन पड़ रहा हो पर यदि कहीं जरा सी चूक रह गई तो हमारा ध्यान उसी पर जाएगा ! उदाहरण स्वरूप आप कहीं साफ-स्वच्छ, कितना भी कीमती कपड़ा टांग कर उस पर तिल भर का एक काला दाग लगा दें तो लोगों की निगाह कपडे की सुंदरता पर न जा कर उस दाग पर ही जाएगी ! अभी हाल ही में मैंने अपनी संस्था की पत्रिका निकाली ! वर्तनी की जांच के बावजूद प्रिंटर से एक चूक हो गई ! अब पत्रिका की दसियों अच्छाइयों के बावजूद लोग मुझे उस कमी के बारे में बताने से नहीं चूकते !  
यह टाइल वाली बात एक मनोवैज्ञानिक समस्या है, जिसे ''मिसिंग टाइल सिंड्रोम'' नाम दिया गया है और जो कमोबेस तकरीबन हर इंसान में मौजूद होती है ! किसी चीज की ''मिसिंग'' पर ही हमारा ध्यान जाना, हमारी जिंदगी के दुःख का सबसे बड़ा कारण है ! जो हमारे पास है, उससे हम उतना खुश नहीं होते जितना कि जो हमारे पास नहीं है उसके लिए दुखी होते हैं
यह टाइल वाली बात एक मनोवैज्ञानिक समस्या है, जिसे ''मिसिंग टाइल सिंड्रोम'' नाम दिया गया है और जो कमोबेस तकरीबन हर इंसान में मौजूद होती है ! किसी चीज की ''मिसिंग'' पर ही हमारा ध्यान जाना, हमारी जिंदगी के दुःख का सबसे बड़ा कारण है ! जो हमारे पास है, उससे हम उतना खुश नहीं होते जितना कि जो हमारे पास नहीं है उसके लिए दुखी होते हैं ! अपने आस-पास ही हमें ऐसे बहुत से उदाहरण मिल जाएंगे, जिसमें लोग उन्हें क्या-क्या मिला है, उस पर खुश होने की जगह उन्हें क्या-क्या नहीं मिल पाया है, उस पर दुखी रहते हैं। अपनी उसी एक कमी के पीछे सारा जीवन परेशान रहते हैं। 
जीवन में आगे बढ़ना, तरक्की करना, बड़े लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उद्यम कर उसे हासिल करने की कोशिश करते रहना बुरी बात नहीं है ! ऐसा होना भी चाहिए ! परन्तु हमेशा इसी का चिंतन करके परेशान रहना, जो हासिल है उसे नजरंदाज करना तनाव को बुलावा देना है ! फिर ऐसा भी नहीं है कि जो हमारे पास नहीं है, वह यदि किसी तरह हमें मिल जाए तो हम संतुष्ट हो जाएंगे ! लालसा एक ऐसी मनोवृत्ति है जो कभी संतुष्ट नहीं होती, एक चीज मिली तो दूसरी के लिए यह जागृत हो जाएगी ! यही अनियंत्रितता हमें कभी भी खुश नहीं रहने दे सकती ! खुश रहने के सैंकड़ों कारण होने के बावजूद दुखी होने का एक कारण हमें विचलित कर देता है ! इसकी वजह से ही कई तरह की बीमारियां हमें आ दबोचती हैं ! इसलिए सही समय पर इस मनोवृत्ति पर काबू पाना बहुत जरुरी है ! इसके लिए जो कुछ भी अपने पास है उसके लिए प्रभु को धन्यवाद दें ! उसका शुक्र मनाएं उसके द्वारा दिए गए अनगिनत उपहारों हेतु ! सदा खुश रहने का यह सीधा-सादा सबसे सरल तरीका है !  

रविवार, 18 सितंबर 2022

चीते आ गए, स्वागत है

छाता प्रजाति जीवों की उन विशेष श्रेणी को कहा जाता है, जिनके संरक्षण से धरती की अन्य प्रजातियों को भी संरक्षित कर पर्यावरण को संतुलित करने में सहायता मिलती है ! इनमें पशु और पक्षी दोनों ही सामान रूप से सम्मिलित होते हैं ! ये संरक्षण क्षेत्रों के आकार, संरचना और पारिस्थितिक तंत्र को बचाए रखने में भी मदद करते हैं। ये भले ही अप्रत्यक्ष रूप से ही सही, अन्य जीवों को रहत पहुंचते हैं, इसीलिए इन्हें छाता या अंब्रेला प्रजाति कहा जाता है .......!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

हमारे यहां एक प्रथा कुछ वर्षों से काफी चलन में है, वह है विरोध ! सरकार द्वारा कुछ भी हो रहा हो या किया जाए तुरंत एक खास पूर्वाग्रही, कुंठित, विघ्नसंतोषी तबका उसके विरोध में चिल्ल-पों मचाना शुरू कर देता है ! उस काम के औचित्य पर, उसके प्रयोजन पर, उसके परिणाम पर सवाल उठाने आरंभ कर दिए जाते हैं ! भले ही वह काम देश के या लोगों के हित में ही क्यों ना हो ! अभी देश की ग्रासलैंड इकोलॉजी को सुधारने के लिए विलुप्त हो चुके चीतों के पुनर्स्थापन की योजना के तहत नामीबिया से आठ चीते, जिनमें पांच मादा तथा तीन नर हैं, लाए गए ! इस पर उनको लाने और जगह विशेष में बसाने पर भी ऐसे लोगों को राजनीती नजर आने लगी ! जबकि यह पर्यावरण के लिए बहुत आवश्यक था !

चीतों का लाना इस लिए जरुरी था क्योंकि इसे ''अंब्रेला प्रजाति का जीव'' माना जाता है. जिसका स्थान ''फूड चेन'' में सबसे ऊपर होता है ! अगर इसे नहीं लाया जाता तो हमारा बिगड़ता हुआ फूड चेन का संतुलन पूरी तरह से खतरे में पड़ जाता ! रही बात मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क के चयन की तो वह इसलिए सर्वाधिक उचित था, क्योंकि वहां पर नवांगतुकों को भोजन की कोई समस्या नहीं होगी ! वहां पर्याप्त मात्रा में चीतों के शिकार करने लायक जीव हैं ! जिनमें उनकी खास पसंद चीतल भी काफी संख्या में मौजूद हैं ! एहतियाद के तौर पर दो सौ के करीब और चीतलों को भी वहां छोड़ा गया है !


छाता प्रजाति जीवों की उन विशेष श्रेणी को कहा  जाता है, जिनके संरक्षण से धरती  की अन्य प्रजातियों को भी संरक्षित कर  पर्यावरण को संतुलित करने में  सहायता मिलती  है ! इनमें  पशु और पक्षी दोनों  ही सामान रूप से सम्मिलित  होते हैं ! ये संरक्षण क्षेत्रों के आकार, संरचना और  पारिस्थितिक तंत्र को बचाए रखने में भी बहुत मददगार होते हैं। ये भले ही अप्रत्यक्ष  रूप से ही सही, अन्य जीवों को  राहत पहुंचाते हैं, इसीलिए इन्हें छाता या अंब्रेला प्रजाति कहा जाता है !

किसी भी देश से दूसरे देश में जीवों को लाने ले जाने के IUCN (International Union for Conservation of Nature) के कुछ नियम हैं, जिनका पालन करना जरुरी होता है ! उसी के तहत चीतों के लिए  पांच राज्यों के 10 जगहों को तय किया गया था ! जो सात अलग-अलग तरह के लैंडस्केप पर मौजूद हैं. छत्तीसगढ़ में गुरु घासीदास नेशनल पार्क ! गुजरात में बन्नी ग्रासलैंड्स ! मध्यप्रदेश में डुबरी वाइल्डलाइफ सेंचुरी, संजय नेशनल पार्क, बागडारा वाइल्डलाइफ सेंचुरी, नॉराडेही वाइल्डलाइफ सेंचुरी और कूनो नेशनल पार्क ! राजस्थान में डेजर्ट नेशनल पार्क वाइल्डलाइफ सेंचुरी और शाहगढ़ ग्रासलैंड्स और उत्तर प्रदेश की कैमूर वाइल्डलाइफ सेंचुरी !

फिर काफी सोच-विचार मश्शकत के बाद राजस्थान के मुकुंदारा हिल्स टाइगर रिजर्व, शेरगढ़ वाइल्डलाइफ सेंचुरी और भैंसरोर गढ़ वाइल्डलाइफ सेंचुरी तथा मध्यप्रदेश की गांधी सागर वाइल्डलाइफ सेंचुरी, माधव नेशनल पार्क को भी आजमाया गया ! पर अंत में हर दृष्टिकोण से श्योपुर स्थित कूनो नॅशनल पार्क ही हर कसौटी पर खरा उतरा ! जहां स्पेशल हवाई जहाज से, विशेष व्यवस्था और निगरानी के तहत नए मेहमानों को ला कर, प्रधान मंत्री मोदी जी द्वारा उनके इस नए आवास में छोड़ा गया !

कूनो को सर्वाधिक उपयोगी इसलिए पाया गया ! क्योंकि चीतों को खुले जंगलों में रहने के बजाए थोड़ी ऊँची घास वाले ऐसे मैदानी इलाके पसंद होते हैं जहां वातावरण में थोड़ा सूखापन हो, ज्यादा उमस, ठंड व बारिश न हो ! इसके साथ ही लोगों की आवाजाही भी कम से कम हो ! ऐसे में कूनो का 748 वर्ग किलोमीटर का इलाका पूरी तरह खरा उतरता है ! यहां पानी की प्रचुर मात्रा लिए कूनो नदी है ! बिना तेज ढाल वाली पहाड़ियां हैं और साथ ही इफरात मात्रा में भोजन भी उपलब्ध है !

चीते का हमारे संस्कृत ग्रंथों में चित्रक यानी चित्तीदार के रूप में विवरण मिलता है ! नवपाषाण युग की गुफाओं में भी इनके चित्र मिलते हैं ! आशा है, करीब सत्तर साल बाद आए, दुनिया के सबसे तेज धावक,  हमारे इन नए मेहमानों को यहां स्थाई निवासी बनने, रहने, पनपने में कोई अड़चन नहीं आएगी ! उनका परिवार फलेगा-फूलेगा ! इसके साथ ही इस इलाके में पर्यटन बढ़ेगा ! लोग चीतों को देखने आएंगे ! जिससे राज्य और देश को भी फायदा होगा ! 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से, आभार 

मंगलवार, 6 सितंबर 2022

प्लास्टिक को पहचानें उस पर दिए गए कोड से

आज प्लास्टिक को बिलकुल नकार दिया जाना सम्भव नहीं है। हालंकि इनमें से कुछ पर्यावरण के तथा इंसान के लिए हानिरहित भी हैं। पर अधिकतर हमारे लिए हानिकारक ही हैं। इन्हें कभी भी गर्म नहीं करना चाहिए, जब तक उस पर ऐसा करना हानिरहित न लिखा हो। ज़रा सी टूट-फूट होते ही इन्हें प्रयोग से बाहर कर देना ही उचित है ! वैसे भी प्लास्टिक का  उपयोग खूब सोच-समझ कर ही करना चाहिए। इसकी श्रेणियों में  क्रमांक 1, 2, 4, 5  को उपयोग के लिए सुरक्षित और 3, 6, 7, खासकर 7 को हानिकारक मान कर उनका कम ही काम में लाया जाना उचित है .......! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

एक जमाना था, जब आज के प्लास्टिक की जगह  हर तरफ कांच की वस्तुओं का  बोलबाला था। हालांकि बड़े या ज्यादा सामान के लिए टीन के डिब्बों और कनस्तरों का भी चलन था पर दूध, पानी, जूस, ठंडे पेय, खाद्य पदार्थों से लेकर दवाऐं, कास्मेटिक आदि का सामान कांच की बोतलों,  बर्नियों,  शीशियों में साधारण सामान कागज के लिफाफों या कपडे-जुट के थैलों में लाया ले जाया जाता था !  

घरों में रसोई या स्नानागारों में काम आने वाले बड़े कंटेनर भी धातुओं के ही हुआ करते थे। पर फिर समय बदला। लोगों के जीवन में प्लास्टिक ने पदार्पण किया और देखते ही देखते, उसने समाज के हर हिस्से पर अपना वर्चस्व कायम कर लिया। इसका  सबसे बड़ा कारण था, इसका  मजबूत होने के साथ-साथ  हल्का, टिकाऊ, लचीला, कम टूट-फूट वाला, जंग - मोर्चे से दूर, नमी तथा केमीकल रोधक तथा साफ-सफाई में आसान और सबसे बड़ी बात इसका सस्ता होना था। आज  इसे अपने आस-पास, घर-दफ्तर सभी जगह देखा-पाया जा सकता है। फिर चाहे हमारे खाने-पीने का सामान हो, पहनने-सोने का सामान हो, काम में आने वाला सामान हो,  खिलौने, कंप्यूटर,  फोन, चम्मच - प्लेट, हमारे दांत,  चश्मा तथा उसके लेंस यहां तक कि हमारे शरीर के अंदर धड़कने वाला दिल भी इसी से बनने लगा है !

पर इसके अनगिनत फायदों के साथ ही इसके नुक्सान भी बहुत हैं। जैसे इसके वर्षों-वर्ष नष्ट न होने की क्षमता के कारण यह पर्यावरण के लिए अति खतरनाक साबित होता जा रहा है ! इसके अलावा घटिया प्लास्टिक का उपयोग विभिन्न रोगों और बीमारियों को बुलावा देना है। खासकर यह बच्चों के लिए बहुत हानिकारक होता है। इन्हीं बातों को ध्यान में रख ''सोसायटी आफ ऑफ द प्लास्टिक इंडस्ट्रीज'' ने इस की ग्रेडिंग कर इसे अलग-अलग श्रेणियों के अनुसार चिन्हित कर दिया है। इन चिन्हों में घडी की दिशा में मुड़े तीन तीरों से बने त्रिभुज के बीच लिखे गए अंकों से उस वस्तु विशेष के स्तर का पता चल जाता है, जिससे जाना जा सकता है कि इस्तेमाल की जाने वाली वस्तु कितनी सुरक्षित है। इन्हें 1 से 7 तक के नम्बर दिए गए हैं जिनसे प्लास्टिक के स्तर के साथ-साथ निम्नलिखित बातों की जानकारी भी मिलती है -

1.  Plastic-recyc-01.svgइस चिन्ह वाला प्लास्टिक शीतल पेय, पानी और द्रव्य रखने की बोतलें, मक्खन और जैम के जार इत्यादि के बनाने में काम में लाया जाता है। यह एक बार में काम में लाने के लिए बेहतर होता है। इसे गर्म नहीं करना चाहिए। काफी समय से काम में ना लाई गयी बोतल या डिब्बा भी खतरनाक हो सकता है। इसको रीसायकल कर फिर अन्य सामान बनाया जा सकता है।  यह पारदर्शी, मजबूत, कठोर, तथा तथा गैस और नमी अवरोधक होता है। इसे पॉलीएथाइलीनटेरेफ्थालेट (Polyethylene terephthalate) PET या PETE के नाम से जाना जाता है।  
2.  Plastic-recyc-02.svgयह ज्यादातर पानी के पाइप, छल्ले, खिलौने,  दूध, जूस और पानी की बोतलें, शैम्पू, प्रसाधन की बोतलें इत्यादि को बनाने के काम आता है। इसे भी रीसायकल किया जा सकता है। यह अपनी मजबूती, कठोरता, नमी प्रतिरोधक, गैस के आवागमन के लिए सुरक्षित होने के कारण काम में लाया जाता है। इसे हाई-डेन्सिटी पॉलीएथाइलीन, HDPE के नाम से जाना जाता है।  

3. Plastic-recyc-03.svg यह जूस की बोतलें, फिल्में; पीवीसी पाइप, फ्लोरिंग, साइडिंग, टेबल कवर, इत्यादि बनाने के काम आता है। यह बहुउद्देशीय, पारदर्शी, आसानी से मिश्रित होने वाला, मज़बूत, तथा कठोर होता है।  इसे  पॉलीविनाइल क्लोराइड PVC के  जाना जाता है। इससे बचाव करना चाहिए। इसको बनाते समय कई हानिकारक पदार्थ भी बन जाते हैं। यह आसानी से रिसायकल भी नहीं होता। 

4.  Plastic-recyc-04.svgयह प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों के बैग, लचीली बोतलों, फिल्मों, डिब्बों या जारों के ढक्कन, ट्यूब आदि के बनाने के काम में लिया जाता है। यह अपनी  मजबूती, कठोरता, लचीलापन, सील करने में आसान, नमी अवरोधकता तथा अपनी आसानी से होने वाली प्रोसेसिंग के लिए जाना जाता है। इसे लो-डेन्सिटी पॉलीएथाइलीन, LDPE के नाम से जानते हैं। यह सुरक्षित पदार्थ है। इसकी रिसाइकिलिंग से थैले वगैरह बनाए जाते हैं। 
5.  Plastic-recyc-05.svg इससे रीसायकल योग्य बर्तन, रसोई में तथा माइक्रोवेव में पकाने योग्य डिस्पोजेबल डिब्बे, बर्तन, खाद्य पदार्थों को रखने के डिब्बे, टब, ऑटो पार्ट्स, इंडस्ट्रीयल काम, डिस्पोजेबल कप, प्लेटें इत्यादि बनाए हैं। यह मजबूती, कठोरता, ऊष्मा, रसायन, ग्रीस, तेल, नमी अवरोधक, बहुउद्देशीय पदार्थ के रूप में जाना जाता है। इसे पॉलीप्रोपाइलीन, PP के नाम से जानते हैं। यह सुरक्षित तो है पर इसको रीसायकल कर लेना चाहिए।
  
6. Plastic-recyc-06.svg इसका प्रयोग अंडों को रखने वाले डिब्बे, सूखे मेवों, मूंगफली इत्यादि की पैकिंग, डिस्पोजेबल कप, ग्लास, प्लेटें, ट्रे, कटलरी, डिब्बे, फर्नीचर को पैक करने के फोम इत्यादि बनाने में होता है। विभिन्न कामों में उपयोग में आने वाला यह पारदर्शी आसानी से गठित हो जाने वाला पदार्थ है। इसे पॉलीस्टाइरीन, PS के नाम से जाना जाता है। इसे सँभाल कर उपयोग में लाना चाहिए यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। 
7. Plastic-recyc-07.svgइसे ज्यादातर एक्रेलिक, नायलोन और इलेक्ट्रॉनिक आवरण बनाने के काम में लाया जाता है। इसे पॉलिमर के संयोजन से बनाया जाता है। यह सबसे ज्यादा हानिकारक पदार्थ है। इससे बड़े-बड़े पानी के कन्टेनर, केन्स, तेल की टंकियो, डीवीडी, कंप्यूटर केस, आईपैड इत्यादि बनाए जाते हैं। इसे अक्सर पॉलीकार्बोनेट के बदले काम में लिया जाता है। 


आज हर तरफ प्लास्टिक का बोल-बाला है। इन्हें बिलकुल नकार दिया जाना भी सम्भव नहीं है।  इनमें से कुछ पर्यावरण के तथा इंसान के लिए हानिरहित भी हैं। पर अधिकतर हमारे लिए और पर्यावरण के लिए हानिकारक ही हैं। इन्हें कभी भी गर्म नहीं करना चाहिए, जब तक उस पर ऐसा करना हानिरहित न लिखा हो। ज़रा सी टूट-फूट होने के बाद इनका उपयोग नहीं करना चाहिए।  इनका उपयोग भी खूब सोच-समझ कर ही करना चाहिए। इसकी श्रेणियों में 1, 2, 4, 5  को उपयोग के लिए सुरक्षित और 3, 6, 7, खासकर 7 को हानिकारक मान कर उनका कम  उपयोग करना चाहिए। यदि किसी प्लास्टिक की वस्तु पर कोई कोड ना लिखा हो तो उसे ना खरीदना ही बेहतर है।  
संदर्भ अंतर्जाल 

सोमवार, 29 अगस्त 2022

तेरह साल के भ्रष्टाचार को तेरह सेकेंड में खत्म किया जा सकता है, दृढ इच्छाशक्ति होनी चाहिए

अब उन डाक्टरों पर भी नकेल कसी जानी चाहिए जो शिकंजे में फंसे अपने आकाओं को बताते हैं कि कोर्ट के कितनी दूर जाने पर उनको हार्ट अटैक आएगा या कितने दिन पूछ-ताछ पर उनकी यादाश्त चली जाएगी ! उन सी.ए. और आर्थिक सलाहकारों से भी पूछ-ताछ होनी चाहिए जो अपने सरपरस्तों के काले धन के अंबार को ठिकाने लगाने में सहायता करते हैं ! उन वकीलों से भी जिरह होनी चाहिए जो एक पेशी के दसियों लाख की रकम ले, जान-बूझ कर देश द्रोहियों, हत्यारों, कुकर्मियों, जालसाजों, भ्रष्टाचारियों के लिए झूठ को सच का जामा पहन  कानून की पतली गलियों से बचा निकाल ले जाते हैं ! उन पुलिस और कलेक्टर को भी जिम्मेदार मान उन पर कार्यवाही होनी चाहिए, जिनके क्षेत्र में  दंगे-फसाद या कोई भी गंभीर गैर कानूनी हरकतें होती हैं ..........!!         

आखिर दिल्ली के बेहद नजदीक, उत्तर प्रदेश के नोएडा के सेक्टर 93-A  में, 102 मीटर ऊँचे, दबंगई, भ्रष्टाचार, रसूख, धनबल के प्रतीक जुड़वां टॉवरों को जमींदोज कर ही दिया गया ! संरचना में दो जुड़वां टॉवर बने हुए थे, जिनमें एक की ऊंचाई 102 मीटर और दूसरे की 95 मीटर थी ! 32 मंजिला इस इमारत को बनाने में करीब तेरह साल का समय, सैंकड़ों कर्मियों का योगदान तथा तकरीबन 300 करोड़ रुपये खर्च हुए थे ! केस वगैरह ना होते तो आज इसकी कीमत 1000 करोड़ के आस-पास होती !  

नोएडा के जुड़वां स्तूप 

ऐसा कहा जा रहा है कि इन स्तूपों को गिराना भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ा संदेश है ! अच्छी बात है ! इसके साथ ही यह भी आभास मिल रहा है कि दृढ इच्छाशक्ति हो तो तेरह साल के भ्रष्टाचार को तेरह सेकेंड में खत्म किया जा सकता है ! पर क्या सिर्फ विष-वृक्ष का तना काट देने से समस्या का निदान हो जाएगा ? जितना ऊँचा यह टॉवर था उससे कहीं गहरी हैं, दुराचरण की जड़ें हमारे देश में ! आज इतने छापे पड़ रहे हैं ! इतनी धर-पकड़ हो रही है ! आरोपियों के घरों से रद्दी कागजों के ढेर की तरह नोटों के टीले बरामद हो रहे हैं ! पर ना लालच खत्म होता दिखता है, नाहीं कहीं कानून का डर काबिज होता नजर आ रहा है !  

आज एक रोजगार से परेशान आम इंसान कहीं एक ठेला लगा ले तो दिन भर में मक्खियों की तरह निगम वाले, पुलिस वाले, सड़क वाले, कार्पोरेशन वाले और ना जाने कौन-कौन अपना रौब गाँठ कर उसको एक मिनट टिकने नहीं देंगे ! क्योंकि वह समाज की सबसे पिछली कतार में खड़ा होने वाला एक अशक्त, बेसहारा, जीव मात्र है ! और इधर तेरह साल तक एक निर्माण होता रहा और उन्हीं रौबीले कारिंदों को ना कुछ दिखाई दिया और ना ही सुझाई ! सुना तो यह जा रहा है कि कोर्ट के निर्देश के बावजूद बिना किसी खौफ के काम जारी रहा ! किसका इतना सशक्त वरदहस्त निर्माता के सर पर था कि वह कानून को भी धत्ता बताता चला गया ! अब इमारत तो गिर गई ! गिरते-गिरते भी तीस करोड़ की चपत लगा गई ! उसके साथ ही उसमें खर्च हुए देश के संसाधन, पैसे, समय और जनबल भी धूल-धूएं-मलबे में बदल कर रह गए ! पता नहीं निर्माता कंपनी का क्या हुआ ! यह भी नहीं पता कि इस सजा से लोग सबक लेंगे भी कि नहीं ! क्योंकि नियम-कानून पर अपराध भारी पड़ता दिखता है ! लोग बिना किसी डर-भय के अनैतिक कार्य करते चले जा रहे हैं ! 

आज यदि देश-समाज-लोगों में कानून का रौब, खौफ, दहशत तारी करना है तो जड़ों पर प्रहार को करना होगा ! उस खाद-पानी का परिमार्जन करना होगा जो भ्रष्टाचार को पल्ल्वित-पुष्पित होने में सहायक होते हैं ! अपराधियों के साथ ही उन डाक्टरों पर भी नकेल कसी जानी चाहिए जो शिकंजे में फंसे अपने आकाओं को बताते हैं कि कोर्ट के कितनी दूर जाने पर उनको हार्ट अटैक आएगा या कितने दिन पूछ-ताछ पर उनकी यादाश्त चली जाएगी ! उन सी. ए. और आर्थिक सलाहकारों से भी पूछ-ताछ होनी चाहिए जो अपने सरपरस्तों के काले धन के अंबार को ठिकाने लगाने में सहायता करते हैं ! उन वकीलों से भी जिरह होनी चाहिए जो एक पेशी के दसियों लाख की रकम ले, जान-बूझ कर देश द्रोहियों, हत्यारों, कुकर्मियों, जालसाजों, भ्रष्टाचारियों के लिए झूठ को सच का जामा पहना कानून की पतली गलियों से बचा निकाल ले जाते हैं ! कहते हैं कि यदि पुलिस चाहे तो किसी आम नागरिक के घर से कोई झाड़ू तक नहीं चुरा सकता ! तो क्यों नहीं घटना ग्रस्त इलाके का जिम्मेदार वहाँ के कोतवाल को माना जाता ! यदि सरकार विधान बना दे कि किसी भी घटना की जिम्मेदारी वहाँ के थाने और उसके स्टाफ की होगी तो क्या मजाल है कि अपराधी तो क्या चिड़िया भी पर मार जाए या इस तरह देश के संसाधनों और पैसे की बर्बादी हो जाए ! 

माना यह सब कहना-सुनना बहुत आसान है, पर इसको कार्यान्वित करना जरा मुश्किल तो है, पर नामुमकिन कतई नहीं है ! सिर्फ देश प्रेम की भावना और दृढ इच्छाशक्ति की जरुरत है ! कोई ना कोई रास्ता जरूर निकलेगा, निकालना ही होगा जिससे अपराधियों के मन में खौफ जगह बना सके ! कुछ भी गलत करने के पहले उसे दस बार सोचना पड़े ! उसे भविष्य के महलों के ख्वाब से पहले वर्तमान की जेल की सलाखें नजर आएं ! जेल जाते-आते महानुभाव हाथ उठा विजय चिन्ह ना बना सर झुका कर हमारे सामने से निकलें ! उनके वंशधर हिम्मत ना कर सकें कभी सत्ता की कुर्सी की तरफ आँख उठा देखने की ! इसके लिए धर्म-भाषा-जाति से ऊपर उठ कुछ बदलाव तो हमें भी अपने में लाने होंगे ! गलत बातें होते देख मन ही मन कुढ़ने की बजाए आक्रोश तथा विरोध तो जाहिर करना ही होगा ! नहीं तो ऐसे ही निर्माण गिर-गिर कर फिर-फिर बनते रहेंगे !

रविवार, 28 अगस्त 2022

माउजर, जिसने अंत तक चंद्रशेखर आजाद का साथ दिया

रात के घुप्प अंधेरे में, उफनती बंगाल की खाड़ी के अथाह जल में, अकेले बिना किसी सहारे, शचीन्द्रनाथ बक्शी तैरते हुए जहाज तक गए, वहां भुगतान कर हथियार हासिल किए और फिर उतने भार के साथ उसी समय वापस तैर कर किनारे भी आए ! धन्य थे वे लोग ! धन्य थी उनकी वीरता ! धन्य था उनका समर्पण ! यह वही खेप थी, जिसकी एक माउजर पिस्तौल की गोली से वीर राजगुरु ने साण्डर्स को दूसरे लोक पहुंचा दिया था ! यही वह खेप थी जिसकी एक माउजर अमर सेनानी, अजेय, क्रांतिकारियों के महानायक, हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के कमांडर-इन-चीफ, चंद्रशेखर  आजाद की अंतिम समय तक साथी रही.........! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 
मानव स्वभाव शायद सारी दुनिया में एक जैसा ही है ! उनको लगता है कि कोई आए और हमारी सारी चिंताएं, परेशानियां, मुसीबतें, कष्ट दूर कर जाए ! इसके बदले में हम साल के दो दिन उसको याद कर फूल अर्पित करते रहें ! पढ़ने-सुनने में अजीब लगता है पर असलियत यही है ! 1857 की असफल जन-क्रांति के बावजूद, देश की आजादी के लिए मर-मिटने वाले जहां कभी हताश-निराश नहीं हुए, वहीं देश की अधिकांश जनता या तो अपने में मशगूल थी या फिर तटस्थ ! उधर राजनीती में दखल रखने वाले ब्रिटिश हुकूमत की दलाली कर राय साहब जैसी उपाधियों को अपनी शान समझने लगे थे ! इसके साथ ही एक अच्छा खासा वर्ग, जो आजादी भी चाहता था, वह अहिंसावादी हो चुका था !
चंद्रशेखर आजाद की माउजर 
ऐसे में आजादी के लिए दिल-ओ-जान से समर्पित क्रान्तिकारियों को अंग्रेजी हुकूमत और उनके गुर्गों से जूझने के लिए अनेकानेक समस्याओं का सामना करना पड़ता था ! उसी में एक थी हथियारों की जरुरत ! हथियार भी ऐसा जो शक्तिशाली भी हो और छुपाया भी जा सके ! काफी सोच-विचार के बाद जर्मनी में बनी माउजर पिस्तौल माफिक पाई गई ! पर उस सस्ते के जमाने में भी उसकी कीमत 75 रुपये थी जो चोरी-छुपे खरीदने पर तीन सौ रुपये में मिलती थी ! तीन सौ रूपये की कीमत इसी से आंकी जा सकती है कि उस समय एक रुपये का 20 सेर दूध, दो सेर शुद्ध घी, 30 सेर गेहूँ तथा सोना 20 रुपये का एक तोला था ! पर जरुरत थी तो हथियार लेना ही था ! वह भी सशक्त ! 
काकोरी काण्ड में प्रयुक्त माउजर 
माउजर, जर्मनी में बनी इस छोटी पर सशक्त पिस्तौल की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसके बट के साथ लकड़ी का बड़ा कुन्दा अलग से जोड़ कर इसे आवश्यकतानुसार किसी रायफल की तरह भी इस्तेमाल किया जा सकता था। इससे इसकी मारक क्षमता बढ़ जाती थी। इसकी दूसरी विशेषता यह थी कि इसके चैम्बर में 6, 10 और 20 गोलियों वाली छोटी या बड़ी कोई भी मैगजीन फिट हो जाती थी। इसके अतिरिक्त इस पिस्तौल की एक विशेषता यह थी कि इसके पीछे लगाया जाने वाला लकड़ी का कुन्दा ही इसके खोल का काम करता था। भारतीय क्रांतिकारी इसकी क्षमता को आजमा भी चुके थे, जब अमर क्रान्तिकारी रामप्रसाद बिस्मिल ने इन्हीं, तीन-तीन सौ रुपयों में खरीदी गईं चार माउजर पिस्तौलों के दम पर, 9 अगस्त 1925 को काकोरी के पास ट्रेन रोक कर सरकारी खजाना लूट लिया था।बाद में यह चीन और स्पेन में भी बनने लगी पर नाम माउजर ही रहा !आज भी इस पिस्तौल का कोई जवाब नहीं है !
विडंबना है कि किस्मत से, छींका टूटने से जब हमारी झोली में आजादी आ ही गिरी तो उसका सारा श्रेय, बिना किसी हिचक, बिना किसी अपराधबोध के, बिना किसी शर्म के हमने खुद को ही देते हुए बड़ी सरलता से उन सैकड़ों हजारों वीरों के उत्सर्ग को, उनके समर्पण को, उनकी देशप्रेम की मिसाल को भुलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी 
भारत में माउजर की खरीद-फरोख्त खतरा खड़ा कर सकती थी ! इसके लिए किसी का जर्मनी जाना जरुरी था ! वह भी कोई आसान काम नहीं था ! पर जहां चाह होती है, वहां कोई ना कोई राह निकल ही आती है ! काशी में लम्बी तैराकी की प्रतियोगिताओं को क्रांतिकारी शचीन्द्रनाथ बक्शी नामक युवक ने प्रारंभ करवाया था ! जो कि खुद भी बहुत अच्छे तैराक थे और तैराकी संघ के मंत्री भी ! संघ क्रांतिकारियों के लिए एक आड़ का काम भी करता था ! संस्था के एक अन्य बहुत ही कुशल तैराक थे, केशव चक्रवर्ती ! इन्हें सब कुछ समझा-बुझा कर जर्मनी में होने वाली तैराकी प्रतियोगिता में हिस्सा लेने भेज दिया गया ! केशव अपना काम कर वापस भारत आ गए ! 
माउजर और उसका खोल 
असले का इंतजाम तो हो गया था पर उसे हासिल करने के लिए पैसों की भी जरुरत थी ! उसी के इंतजाम का नतीजा था, काकोरी ट्रेन कांड ! इसी से मिली रकम को ले कर शचीन्द्रनाथ बक्शी और राजेंद्र लाहिड़ी कलकत्ता रवाना हो गए, पार्सल छुड़वाने के लिए ! पर बात इतनी आसान नहीं थी कि गए, पैसे दिए और सामान ले लिया ! कलकत्ता बंदरगाह पर तो ऐसा करना सोचा भी नहीं जा सकता था ! उन दिनों अंतराष्ट्रीय कानून अनुसार भारत की समुद्री सीमा तीन मील थी ! उसके बाद अस्थाई तौर पर सागर का वह हिस्सा उस देश का माना जाता था जिसका जहाज हो और जब तक हो ! इसलिए पानी में देश से तीन मील दूर तक जा कर ही सामान लिया जा सकता था ! 
श्री शचीन्द्रनाथ बक्शी 
उसका एक ही उपाय था ! वही किया गया ! रात के घुप्प अंधेरे में, उफनती बंगाल की खाड़ी के अथाह जल में, अकेले बिना किसी सहारे, शचीन्द्रनाथ बक्शी तैरते हुए जहाज तक गए, वहां भुगतान कर हथियार हासिल किए और फिर उतने भार के साथ, उसी समय वापस तैर कर किनारे आए ! धन्य थे वे लोग ! धन्य थी उनकी वीरता ! धन्य था उनका समर्पण ! यही वह खेप थी, जिसकी एक माउजर पिस्तौल की गोली से वीर राजगुरु ने साण्डर्स को दूसरे लोक पहुंचा दिया था ! यही वह खेप थी जिसकी एक माउजर अमर सेनानी, क्रांतिकारियों के नायक, हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के कमांडर-इन-चीफ, अजेय, चंद्रशेखर आजाद की अंतिम समय तक साथी रही ! 
काकोरी स्टेशन 
उन वीरों की हिम्मत, समर्पण, त्याग, देशप्रेम का कोई सानी नहीं था ना है और शायद ही आगे कभी हो पाएगा ! आजादी के बाद होना तो यह चाहिए था कि उनकी बिना किसी अपेक्षा के देशप्रेम की भावना को हम पीढ़ी दर पीढ़ी अक्षुण रखते ! पर विडंबना है कि किस्मत से, छींका टूटने से जब हमारी झोली में आजादी आ ही गिरी तो उसका सारा श्रेय, बिना किसी हिचक, बिना किसी अपराधबोध के, बिना किसी शर्म के हमने खुद को ही देते हुए बड़ी सरलता से उन सैकड़ों हजारों वीरों के उत्सर्ग को, उनके समर्पण को, उनकी देशप्रेम की मिसाल को भुलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी ! जनता तब भी ऐसी थी, अब भी वैसी ही है ! सिर्फ अपने मतलब से मतलब..............😢

संदर्भ व आभार -
*क्रान्तिकारी आन्दोलन - धर्मेन्द्र गौड़ जी 
*अंतर्जाल 

शनिवार, 20 अगस्त 2022

वामनराव बलिराम लाखे

उन दिनों स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े क्रांतिकारियों की गोपनीयता के चलते उनको उनके नाम से नहीं, बल्कि एक अलग उपनाम या कोड से पहचाना जाता था ! ऐसे में कुछ लोग अपने उपनाम से ही प्रसिद्ध हो उसी नाम से जाने लग गए थे ! 1930 में जब महात्मा गाँधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत की तो छत्तीसग़ढ के रायपुर जिले में उसकी बागडोर वामनराव लाखे, महंत लक्ष्मीनारायण दास, ठाकुर प्यारेलाल सिंह, शिवदास डागा और मौलाना रऊफ ने संभाली ! प्रचलन के तहत इन पाँचों को पांच पांडव के नाम से जाना जाने लगा, जिनमें वामनराव जी को युधिष्ठिर के रूप में जाना जाता था...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

सन 1857 की असफल जन-क्रांति के बावजूद, देश की जनता आजादी पाने के लिए सदा प्रयास रत रही थी ! इस मुहीम के यज्ञ में हजारों-हजार आजादी के परवानों की बिना किसी अपेक्षा के आहुतियां पड़नी बदस्तूर जारी थीं ! पर दुःख इस बात का है कि गुलामी से मुक्ति मिलते ही हम अपने कर्म-कांडों में ऐसे उलझे कि उन शूरवीरों को भूलाते चले गए ! आज हालत यह है कि नई पीढ़ी से यदि देश पर न्योछावर हुए वीरों के नाम पूछे जाएं, तो शायद हाथों की उंगलियां ज्यादा पड़ जाएंगी ! हालत तो ऐसी भी है कि लोगों को अपने ही शहर में स्थित किसी स्मारक का नाम, जो किसी क्रांतिवीर के नाम पर हो, तो पता होता है, पर उसके इतिहास के बारे में कोई जानकारी नहीं होती ! हर राज्य में ऐसे अनगिनत उदाहरण मिल जाएंगे ! हर राज्य पर काबिज राजनैतिक दल का, चाहे वह किसी भी विचारधारा से संबंधित हो, फर्ज बनता है कि वह अतीत की धुंध में खो गए उन महानायकों का परिचय वर्तमान पीढ़ी से करवाए ! उन्हें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि वे जो कुछ भी आज है वो उन्हीं की बदौलत हैं !

वामनराव बलिराम जी लाखे

उन दिनों स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े क्रांतिकारियों की गोपनीयता के चलते उनको उनके नाम से नहीं, बल्कि एक अलग उपनाम या कोड से पहचाना जाता था ! ऐसे में कुछ लोग अपने उपनाम से ही प्रसिद्ध हो उसी नाम से जाने लग गए थे ! 1930 में जब महात्मा गाँधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत की तो छत्तीसग़ढ के रायपुर जिले में उसकी बागडोर वामनराव लाखे, महंत लक्ष्मीनारायण दास, ठाकुर प्यारेलाल सिंह, शिवदास डागा और मौलाना रऊफ ने संभाली ! प्रचलन के तहत इन पाँचों को पांच पांडव के नाम से जाना जाने लगा ! सबसे बड़े और सामाजिक कार्यों में अग्रणी होने के कारण वामनराव जी, जिनका पूरा नाम वामनराव बलिराम लाखे था, को युधिष्ठिर भी कहा जाने लगा था ! जिनका जन्म दिन सितम्बर महीने में पड़ता है ! आज उन्हीं के बारे में संक्षिप्त जानकारी !  

श्री वामनराव बलिराम लाखे का जन्म 17 सितम्बर, 1872 को रायपुर, छत्तीसगढ़ में हुआ था। उनके पिता पंडित बलिराम गोविंदराव लाखे जी ने अपने कठोर परिश्रम से अपने परिवार की माली हालत सुधारी थी ! जब वामनराव जी का जन्म हुआ, उस समय तक उनके परिवार की गणना रायपुर क्षेत्र के समृद्ध घरानों में होने लगी थी। रायपुर से मैट्रिक पास करने और जानकी बाई जी से विवाहोपरांत वामनराव जी ने नागपुर से कानून की परीक्षा पास कर वापस रायपुर आ सार्वजनिक, सामाजिक व राजनीतिक कार्यों के साथ ही वकालत भी करनी शुरू की ! पर उनका उद्देश्य पैसे का अर्जन ना हो कर जन-साधारण की सेवा ही था, जिसमें उनकी पत्नी ने भी हमेशा उनका साथ दिया था।

वामनराव जी ने उस दौरान लोगों को जागरूक करने हेतु आंदोलनों के अलावा पत्रकारिता का भी सहारा लेते हुए माधवराव सप्रे जी, जो उनके स्कूल के साथी थे, के सहयोग से  "छत्तीसगढ़ मित्र", जो इस क्षेत्र की पहली पत्रिका थी, के प्रकाशन के द्वारा राष्ट्रिय चेतना का विकास करते हुए युवाओं को एक नई दिशा प्रदान की थी

श्री वामनराव बलिराम लाखे जी की निर्भीकता अनुकरणीय है ! एक सभा में उन्होंने अंग्रेजी शासन को गुण्डों का राज कह दिया था जिसके फलस्वरूप उन्हें एक साल की सजा और 3000 रुपये जुर्माना हुआ था ! 1941 में रायपुर के पास सिमगा में सत्याग्रह करते हुए गिरफ्तार कर चार महीनों के लिए नागपुर जेल भेज दिया गया था ! उस वक्त उनकी उम्र 70 वर्ष की थी ! इसके छह साल बाद जब देश आजाद हुआ तो उन्होंने 15 अगस्त को रायपुर के गाँधी चौक में तिरंगा फहराया !

वामनराव लाखे स्कूल, रायपुर 
श्री वामनराव जी अपने मृदु स्वभाव और सामाजिक कार्यों के कारण लोगों में अति लोकप्रिय थे ! उन्होंने उस समय सहकारिता के क्षेत्र में जो कार्य किए थे, उन प्रयासों का लाभ आज भी छत्तीसगढ़ के किसानों को मिल रहा है ! उन्होंने उस दौरान लोगों को जागरूक करने हेतु आंदोलनों के अलावा पत्रकारिता का भी सहारा लेते हुए माधवराव सप्रे जी, जो उनके स्कूल के साथी थे और उनके नाम पर भी एक जाना-माना स्कूल रायपुर में है, के सहयोग से  "छत्तीसगढ़ मित्र", जो इस क्षेत्र की पहली पत्रिका थी, के प्रकाशन के द्वारा राष्ट्रिय चेतना का विकास करते हुए युवाओं को एक नई दिशा प्रदान की थी ! इन्होंने ही रायपुर में कोऑपरेटिव सेन्ट्रल बैंक की स्थापना की थी ! बलौदा बाजार स्थित 75 वर्ष पुराना सहकारी किसान राइस मिल लाखेजी की यादगार कर्मठता और संगठन क्षमता की निशानियां हैं। उम्र भर खादी धारण करने वाले वामनराव जी ने बच्चों व युवाओं को शिक्षित करने के लिए स्कूल-कॉलेज भी खुलवाए ! रायपुर में "ए.वी.एम. स्कूल" की स्थापना में उनका महत्वपूर्ण योगदान था ! इसीलिए उनकी मृत्यु के पश्चात, उनके सम्मानार्थ इस स्कूल का नाम बदलकर "श्री वामनराव लाखे उच्चतर माध्यमिक शाला" कर दिया गया !

स्कूल का अंदरूनी भाग 
अब रायपुर की इस ऐतिहासिक शाला को ही लें ! इस लोकप्रिय स्कूल का नाम तो बहुत प्रसिद्ध है, पर वामनराव जी के बारे में लोगों को उतनी जानकारी नहीं है ! ऐसी एक नहीं हजारों धरोहरें देश भर में बिखरी पड़ी हैं ! जिनका संबंध किसी राजनैतिक दल से नहीं बल्कि देश से जुड़ा हुआ है ! पर बीतते समय के साथ उनका स्वर्णिम इतिहास धीरे-धीरे काल के गाल में समाता जा रहा है ! हम सब की हर प्रांत के मुखियाओं से यही प्रार्थना है कि वे बिना किसी भेद-भाव के, मातृभूमि को सदियों की गुलामी से मुक्ति दिलाने में सर्वस्व समर्पित करने वाले बलिदानियों की उपेक्षित पावन स्मृतियों को संरक्षण प्रदान करें ! उन्हें सहेजें ! उनका प्रचार करें ! उनकी तथा उनसे जुड़े लोगों की विशेषता बतलाने का इंतजाम करें, जिससे पश्चिमोत्तर मुखी हमारी वर्तमान पीढ़ी इतिहास के सच से अवगत हो सके ! गर्व कर सके अपने पूर्वजों पर, जिनके प्रयास से ही हम खुली हवा में सांस ले पा रहे हैं ! 

जय हिंद -

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

बुधवार, 17 अगस्त 2022

हमें अपने बचपन को बचाए रखना है

हमारे विद्वान ऋषि-मुनियों ने अपने ग्रंथों में शिक्षा देते समय मानवता पर, इंसानियत पर जोर दिया है ! यदि इंसान इंसानियत ना छोड़े, मानव; महामानव बनने की लालसा में मानवता से दूर ना चला जाए, तो इस धरा पर कभी भी शांति, सौहार्द, परोपकार का माहौल खत्म ना हो ! ना किसी युद्ध की आशंका हो ! ना प्रकृति के दोहन या उससे छेड़-छाड़ की गुंजाइश बचे ! नाहीं कायनात को अपना रौद्र रूप धारण करने की जरुरत हो..........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

अब तो साफ लगने लग गया है कि प्रकृति हमसे रुष्ट हो चुकी है ! खफा तो बहुत पहले से ही थी, जिसका समय-समय पर एहसास भी दिलाती रही है ! पर अपने दर्प में चूर हमने कभी उसकी चेतावनियों पर ध्यान ही नहीं दिया ! इस धरा पर, प्रकृति पर लगातार बिना किसी अपराधबोध के जुल्म ढाते रहे ! उसके दिए अनमोल संसाधनों का शोषण करते रहे ! पर हर चीज की एक हद होती है ! आखिर कायनात ने भी हमें सबक सिखाने की ठान ही ली ! दुनिया भर में मौसम बदलने शुरू हो गए हैं ! कहीं अति वृष्टि, तो कहीं भयंकर सूखा ! कहीं पहाड़ दरक गए तो कहीं बादल फट गए ! कही बाढ़ ने कहर ढा दिया ! जहां सदियों से लोगों ने 25-30 से ऊपर तापमान ना देखा हो वहां पारा 45 के ऊपर जा टिका है ! पहाड़ों में जहां कभी घरों की छत में पंखा टांगने के हुक की जरुरत महसूस नहीं हुई, वहां कूलर बिकने शुरू हो गए हैं ! सागरों ने अपना अलग रौद्र रूप धारण कर लिया है !  पर बाज हम फिर भी नहीं आ रहे !

बाढ़ की विभीषिका 
अभी हाल ही के गर्म मौसम ने सबकी ऐसी की तैसी कर धर दी थी ! विभिन्न इलाकों में गर्मी ने तकरीबन 2000 से अधिक लोगों को मौत की नींद सुला दिया ! कुछ वर्ष पहले तक गर्मी से बचने लोग पहाड़ों का रुख किया करते थे, पर अब वहाँ भी पारे का 40 डिग्री तक पहुँच जाना आम बात हो गई है ! उस पर पानी की बेहद तंगी ! ऐसे में मैदानी भागों के हाल का अंदाजा बखूबी लगाया जा सकता है ! 
 
गर्मी से दरकी जमीन 
विड़बना है कि हमारे जीवन से सादगी और सहजता पूरी तरह से तिरोहित हो चुकी है ! सहजता का मतलब जो जैसा है, वैसा ही सबको स्वीकार्य हो ! कोई भेद-भाव नहीं ! क्या प्रकृति के पाँचों मूल तत्व किसी से भेदभाव करते है ? हम भले ही उन्हें उनके रूप में ना स्वीकारें पर उनकी तरफ से कोई भेद-भाव नहीं होता ! उनके लिए पेड़-पौधे, लता-गुल्म, पशु-पक्षी, जानवर-इंसान सब एक बराबर हैं ! धरा ने अपने आँचल में सभी को समेट कर रखा है ! हरेक के लिए भोजन-आश्रय का प्रबंध किया है ! पानी सबको शीतलता प्रदान करता है, प्यास बुझाता है ! वायु प्राणिमात्र को समान राहत देती है, ऐसा नहीं कि वो मानव का ज्यादा ख्याल रखती हो और कंटीली झाड़ियों को बिना छुए निकल जाती हो ! अग्नि अपने दहन में कोई भेद-भाव नहीं करती ! आकाश सभी को अपनी गोद समान रूप से उपलब्ध करवाता है ! ऐसे में माँ प्रकृति की भी यही इच्छा रहती है कि जगत के समस्त प्राणी सबके हों सबके लिए हों ! पर मानव ने अपने हित के लिए सभी को हर तरह का नुक्सान ही पहुंचाया है !  
ढहते पहाड़ 
सृष्टि ने बनाया तो मानव को भी सहज, निश्छल, सरल बनाया है ! शैशवावस्था में उसमें कोई छल-कपट, वैर, अहम् नहीं होता ! प्रकृति के सारे, सहजता, सरलता, सादगी, निश्छलता जैसे गुण उसमें मौजूद होते हैं ! बचपन में ये सारे गुण उसमें सुरक्षित रहते हैं ! इसीलिए वह सबसे हिल-मिल जाता है ! सबसे एक जैसा प्रेमल व्यवहार करता है ! किसी को हानि पहुंचाने की तो वह सोच भी नहीं सकता ! पर जैसे-जैसे बड़ा होता जाता है, आस-पास के माहौल, परिस्थितियों व अन्य कारणों से वह इन सब को भूलता चला जाता है ! सहजता की जगह आडंबर ले लेता है ! अहम् सर चढ़ बोलने लगता है ! परोपकार की जगह स्वार्थ ले लेता है ! खुद को ही महान समझने लगता है ! यहीं से वह प्राणिमात्र तो क्या प्रकृति का भी दुश्मन बन जाता है !  
भोला मासूम बचपन 
इसीलिए हमारे विद्वान ऋषि-मुनियों ने अपने ग्रंथों में शिक्षा देते समय मानवता पर, इंसानियत पर जोर दिया है ! यदि इंसान इंसानियत ना छोड़े, मानव; महामानव बनने की लालसा में मानवता से दूर ना चला जाए, तो इस धरा पर कभी भी शांति, सौहार्द, परोपकार का माहौल खत्म ना हो ! ना किसी युद्ध की आशंका हो ! ना प्रकृति के दोहन या उससे छेड़-छाड़ की गुंजाइश बचे ! नाहीं कायनात को अपना रौद्र रूप धारण करने की जरुरत हो ! इसके लिए हमें सिर्फ अपने बचपन को बचाए रखना है ! 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

विशिष्ट पोस्ट

मिसिंग टाइल सिंड्रोम, जो पास नहीं है उसका दुःख

जीवन में आगे बढ़ना, तरक्की करना, बड़े लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उद्यम कर उसे हासिल करने की कोशिश करते रहना बुरी बात नहीं है ! ऐसा होना भी चाहि...