मंगलवार, 27 जनवरी 2026

दुर्योधन की वह एक चूक

श्री कृष्ण बोले, तुम्हारे पास एक ऐसा योद्धा था, जिसे काल भी परास्त नहीं कर सकता था ! जो तुम्हारे सारे सेनापतियों से ज्यादा सक्षम था ! जो इस युद्ध को सिर्फ एक पहर में ही तुम्हारे पक्ष में समाप्त करवा सकता था ! पर तुम्हारा कभी उसकी ओर ध्यान ही नहीं गया ! तुम अपनी भावनाओं, मित्रता, भावुकता में अपने सेनापति चुनते रहे ! दुर्योधन अवाक हो श्री कृष्ण जी का मुंह ताकता रह गया, फिर संभल कर पूछा, गोविंद ऐसा कौन सा वीर था जिसे मैं जान ही नहीं पाया ?

#हिन्दी_ब्लागिंग 

किसी संगठन, संस्थान  या प्रतिष्ठान के  साधन या उपादान चाहे  कितने भी सक्षम हों, यदि उनका दूरदर्शी नेतृत्वकर्ता, निस्वार्थ भाव से, उसको  संभालने के लिए  सही व्यक्ति  का चयन और नियुक्ति, सही  समय पर करता है, तभी  इसे असली नेतृत्व  कहा जा सकता है ! पर अक्सर  देखा गया है कि नेतृत्वकर्ता  या संचालक अपने  मोह, पूर्वाग्रहों, भावनाओं, द्वेष  या अहम के वशीभूत हो कर अपने सबसे काबिल सहायक, कार्यकर्त्ता को  नजर-अंदाज  कर संगठन के हित पर, अपनी  पसंद  को वरीयता दे देता है और  जब तक  इस चूक की कीमत समझ आती है, तब तक तो बहुत देर हो चुकी होती है ! सदियों से ऐसा होता चला आ रहा है !

रणक्षेत्र 

18 दिनों के भीषण रक्तपात के बाद कुरुक्षेत्र का मैदान अब युद्धभूमि नहीं, श्मशान बन चुका था ! जहां कल तक सैनिकों की हुंकार, शंखनाद और तलवारों की खनखनाहट थी, आज वहां मृत्यु अपने भयावह सन्नाटे के साथ मौजूद थी ! दिव्यास्त्रों की आग और ताप से कोसों दूर तक के लता-पादप-वृक्ष भस्म हो चुके थे। उनसे उठे धुएं ने आकाश को कालिमा से ढक चारों ओर अंधकार कायम कर दिया था ! मांसभक्षी जानवरों ने क्षत-विक्षत लाशों को लोथड़ों में तब्दील कर दिया था ! टूटे हुए रथ, घोड़े-हाथियों के शव दूर-दूर तक बिखरे पड़े थे ! सड़ती लाशों और रक्त से सनी मिट्टी के साथ मिल कर हवा ने पूरे वातावरण को विषाक्त और दुर्गंधमय बना दिया था ! ऐसे में अपने पतियों, पुत्रों, भाइयों के शवों को ढूंढने रणभूमि में पहुंचीं महिलाओं के मर्मभेदी विलाप से रह-रह कर आकाश कांप उठता था ! 

विभीषिका 
इन्हीं के बीच घायलावस्था में अपनी टूटी हुई जंघाओं के साथ, तन और मन  की मर्मांतक पीड़ा सहता, कुरु वंश का  अभिमानी युवराज दुर्योधन अकेला  पड़ा हुआ था ! उसकी  सांसें तो उखड़ रही थीं, लेकिन ह्रदय में पराजय  की आग और अपने साथ  हुए छल  का आक्रोश उसे मरने नहीं दे रहा था !  तभी वहां  श्री कृष्ण का आगमन हुआ। दुर्योधन ने कृष्ण को देखते ही उन पर आरोप जड़ दिए कि सिर्फ तुम्हारे छल ने मुझे हराया है ! यदि धर्म युद्ध होता, तो पांडव कभी नहीं जीतते ! श्री कृष्ण के चेहरे पर दया और करुणा व्याप्त थी ! 

प्रभु 

उन्होंने दुर्योधन के पास आ कर उसके सर पर हाथ फेरा और कहा, तुम अभी भी सिर्फ पांडवों के छल को देख रहे हो, लेकिन अपनी ओर से हुए कपट और अन्याय की तरफ तुम्हारा ध्यान नहीं जा रहा ! जैसा तुमने किया उसी का फल तुम्हें मिला ! पर बात इतनी सी नहीं है ! युद्ध की शुरुआत से ही तुम गलतियां करते आ रहे हो ! तुम हारे अपनी गलत नीतियों से, अपने गलत चयनों से, अपने गलत निर्णयों की वजह से ! तुमने यदि युद्ध की शुरुआत में सोच-विचार कर निष्पक्ष भाव से निर्णय लिया होता तो यह युद्ध एक दिन में ही खत्म हो इतिहास बदल सकता था ! 

करुणा 
प्रभु के स्पर्श से पीड़ामुक्त हुए दुर्योधन ने चकित हो पूछा, गोविन्द मैंने ऐसी कौन सी चूक की ?  

श्री कृष्ण बोले, तुम्हारे पास एक ऐसा योद्धा था, जिसे काल भी परास्त नहीं कर सकता था ! जो तुम्हारे सारे सेनापतियों से ज्यादा सक्षम था ! जो इस युद्ध को सिर्फ एक पहर में ही तुम्हारे पक्ष में समाप्त करवा सकता था ! पर तुम्हारा कभी उसकी ओर ध्यान ही नहीं गया ! तुम अपनी भावनाओं, मित्रता, भावुकता में अपने सेनापति चुनते रहे ! दुर्योधन अवाक हो श्री कृष्ण जी का मुंह ताकता रह गया, फिर संभल कर पूछा, गोविंद ऐसा कौन सा वीर था जिसे मैं जान ही नहीं पाया ?

अश्वथामा 
गुरु द्रोण के पुत्र, शिव अंशावतार अश्वत्थामा ! जिसको तुम्हारी भावनाओं और मित्रता के मोह ने अनदेखा कर दिया था ! श्री कृष्ण ने उसकी रणनीतिक भूलों को याद दिलाते हुए कहा, सबसे पहले तुमने भीष्म पितामह को बनाया, जो अजेय थे पर पांडवों से स्नेह रखते थे ! वे उन्हें मारना ही नहीं चाहते थे। उनके बाद तुमने गुरु द्रोण को बागडोर सौंप दी, जिनका मोह अर्जुन के साथ था ! उनके जाने के पश्चात तुमने मित्र मोह में कर्ण का चुनाव किया, जबकि तब तुम्हें अश्वत्थामा को चुनना चाहिए था, जिसका क्रोध अपने पिता की मृत्यु के कारण चरम पर था वह साक्षात काल बन चुका था ! उसके बाद भी तुमने उसे अनदेखा कर शल्य को कमान सौंप दी ! तुम यह भी नहीं सोच पाए कि जिन लोगों को तुम नेतृत्व सौंप रहे हो, वे सब नश्वर थे जबकि अश्वस्थामा को अमरता का वरदान प्राप्त था !

युद्ध 

दुर्योधन निश्चल हो पड़ा था, पर उसके ज्ञान चक्षु खुल चुके थे ! काम-क्रोध-द्वेष-मोह-लिप्सा सब तिरोहित हो चुके थे ! एक-एक कर उसे अपनी गलतियां साफ दिखाई पड़ने लगी थीं ! भाइयों से द्वेष ना कर उनका का हिस्सा उन्हें दे देता तो लाखों-करोड़ों लोगों की जान बच जाती ! प्रकृति का विनाश ना होता ! द्रोपदी का सम्मान करने की बजाय उसका अपमान किया ! जब प्रभु खुद उसके पास आए थे तो उसने उनकी शरण की बजाए उनकी सेना मांग ली थी ! जरासंध, जयद्रथ जैसों का विनाश भी सही-गलत की पहचान नहीं करवा पाया ! 

दुर्योधन की आँखें जैसे अतीत में झांक रहीं थीं ! अब उसे याद आ रही थी अश्वस्थामा की शक्ति जो हजारों योद्धाओं से एक साथ लड़ सकता था ! जिसे अपने पिता के अलावा परशुराम, व्यास और दुर्वासा जैसे ऋषियों से भी युद्ध कौशल का ज्ञान प्राप्त था ! उसके पास अर्जुन से भी घातक दिव्यास्त्र थे ! फिर उसे याद आई वह काली रात, जब उसने अंत समय में अश्वस्थामा को सेना नायक बनाया था और उसने कुछ ही समय में पांडवों के सेनापति धृष्टद्युम्न, शिखंडी, पाण्डवपुत्रों के साथ-साथ उनकी बची हुई समस्त सेना का भी नाश कर दिया था !  

पर अब क्या हो सकता था, सिवा पछताने के और उसके लिए भी समय कहां था ! पर उसके साथ ही यह भी ध्रुव सत्य है कि होता वही है जो प्रभु चाहते हैं ! इसलिए जो होना है वह तो हो कर ही रहेगा और वह जो करेगा अच्छा ही करेगा, यह विश्वास बना रहना चाहिए ! दुर्योधन तो चला गया ! कहते हैं कि दुनिया में ऐसा कुछ भी घटित नहीं होता, जो महाभारत ग्रंथ में उल्लेखित ना हो ! पर फिर भी यदि हम उससे कोई सबक नहीं सीखते, तो फिर दुर्योधन की तरह पछताने के सिवा कोई चारा भी नहीं बचता ! 

@चित्र व संदर्भ हेतु अंतर्जाल का हार्दिक आभार 🙏 

शनिवार, 17 जनवरी 2026

व्यक्तिगत कुंठा जब दंभ का चोला पहन, शब्दों का रूप अख्तियार करती है, तो अनर्थ ही होता है

कोई अपने अहंकार में यदि अपनी भूल को भूल ही नहीं मानता और ऐसे में जब उसकी कुंठा व सोच, दंभ का चोला पहन, शब्दों का रूप अख्तियार कर अवाम के सामने आती है, तब-तब जनता उसे सबक सिखाती है ! इसका कोई भी अपवाद नहीं है ! देश प्रेमी जनता कभी भी दुर्वचनों, दुर्भावनाओं या गलतबयानियों को प्रशय नहीं देती ! सामने वाले का मफलर, गमछा, टोपी, शॉल किस  रंग का है, इससे पब्लिक को कोई मतलब नहीं होता, उसके लिए सामने वाले के मनोभाव, उद्गार तथा देश के प्रति निष्ठा मायने रखती है.......................!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

अभी बहुत ज्यादा दिन नहीं हुए जब किसी ने अपने सबसे बड़े सहयोगी की जरुरत को ही नकार दिया था ! तब जनता ने उन्हें ही कुछ हद तक नकारा बना दिया था ! एक था, जिसने जन्मों-जन्मों तक की भविष्यवाणी कर दी थी, जनता ने उसी के सिम्बल से उसे बुहार कर किनारे कर दिया ! एक के लगातार विष-वमन से तंग आ लोगों ने उसका दायरा ही तंग कर डाला ! एक ने जातियों का व्यूह रचा, अवाम ने उसे पांति के ही लायक ना छोड़ा ! एक ने डर, हिंसा, खौफ का माहौल बना खुद को अजेय करना चाहा, उसे आज दर-दर भटकने को मजबूर होना पड़ रहा है ! देश प्रेमी जनता कभी भी दुर्वचनों, दुर्भावनाओं या गलतबयानियों को प्रशय नहीं देती ! सामने वाले का मफलर, गमछा, टोपी, शॉल किस  रंग का है, इससे पब्लिक को कोई मतलब नहीं होता, उसके लिए सामने वाले के मनोभाव, उद्गार तथा देश के प्रति निष्ठा मायने रखती है ! 

जनता जनार्दन 
फिर भी है कि लोग समझते ही नहीं, ताजा उदाहरण है, एक भाई साहब, जिनका नाम भी देश के अधिकांश लोगों ने नहीं सुना होगा, अचानक अपने सहयोगी दल को एक मजबूरी बता मिडिया की सुर्खियां बन गए ! अब वह लाख सफाई देते रहें, अपने कहे का अर्थ बदलते रहें, नुक्सान तो हो गया ! लातूर जिले में ऐसी ही बयानबाजी के चलते मिले विपरीत परिणामों से भी उन्होंने कुछ नहीं सीखा !  बोलना है कुछ भी भक्क से उगल दिया ! ऐसी ही हरकत सामने से भी कुछ दिनों पहले हुई थी, जिसने दोस्त, मित्र, साथी, अनुयायी सभी को सकते में ला दिया था !

याद आता है जब 1977 में इंदिरा जी चुनाव हारी थीं, तब जीतने के बाद जनता दल, देश और देशवासियों के हित में कुछ करने के बजाय सिर्फ इस बात पर जुट गया कि इस महिला को जेल भिजवाना है ! पब्लिक को यह सब रास नहीं आया और जनता दल को ही दलदल बना डाला ! 

खुद के गुमान में डूबे ऐसे लोगों को समझना चाहिए कि जब आपका व्यवहार, बर्ताव, कथनी करनी का फर्क, ढोंग या उदण्डता लोगों को बार-बार दिखाई देती है, तो वे आपको नकार देते हैं ! आपका समाज को खंडित, विखंडित करने या देश को तनावग्रस्त या कमजोर करने का प्रयास जनता कतई बर्दास्त नहीं करती ! झूठे किस्से, कहानियों, आरोपों को वह समझने-पहचानने लगी है ! समय बदल रहा है, जितनी जल्दी हो समझ व संभल जाएं नहीं तो अप्रासंगिक होते देर नहीं लगेगी ! हाल ही के बहुतेरे उदाहरण सामने हैं ! बड़े-बड़े तीसमारखाँ निपटा दिए जनता ने ! क्योंकि अब देश के अवाम को राष्ट्रबोध, स्वयंबोध, शत्रुबोध, इतिहासबोध अच्छी तरह होने लगा है ! अब वह बहकावे में नहीं आती !

निष्कर्ष यही है कि कोई अपने अहंकार में यदि अपनी भूल को भूल ही नहीं मानता और ऐसे में जब उसकी कुंठा व सोच, दंभ का चोला पहन, शब्दों का रूप अख्तियार कर अवाम के सामने आई है, तब-तब जनता ने उसे सबक सिखाया है, इसका कोई भी अपवाद नहीं है ! पब्लिक सब बूझती है ! किसी नायक, नेता की नीयत और फितरत उससे छिपी नहीं रहती ! देर-सबेर वह सबक जरूर सिखाती है ! उसके लिए परिवार, जाति, भाषा, धर्म मायने जरूर रखते हैं, पर देश की सुरक्षा, देश की भलाई या देश की उन्नति की कीमत पर नहीं !    

जय हिंद 🙏

मंगलवार, 6 जनवरी 2026

है अपनी ये तो रीत नहीं, है अपना ये व्यवहार नहीं

अभी-अभी पश्चिमी कैलेंडर ने नए साल का ऐलान किया और हम सब जुट गए उसके स्वागत समारोह में, कोई बुराई नहीं ! पर एक बार अपने नव वर्ष के समय और इस नए साल के समय का तुलनात्मक विश्लेषण कर लें तो साफ फर्क नजर आ आएगा कि नई परिस्थिति का उल्लास क्या होता है ! जब प्रकृति, कायनात, निसर्ग खुद अंगड़ाई ले आलस्य त्यागती है तो ऐसे प्रफुल्लित वातावरण में धरा का जर्रा-जर्रा उल्लसित नजर आने लगता है ! जड़ में भी जान आ जाती है ! एक बार पूर्वाग्रह त्याग, तुलना कर देखें तो सही.........🙏

#हिन्दी_ब्लागिंग 

मारा देश एक उत्सव-धर्मी देश है ! हमारी आत्मा बसती है, इन उत्सवों में ! इतने विविध त्यौहार दुनिया के शायद ही किसी और देश में मनाए जाते हों ! रंग-बिरंगे, उल्लासमय, खुशियां बिखेरते, प्रकृति, परंपराओं से, गाथाओं से जुड़े हुए, एक से एक बढ़ कर महोत्सव ! होना तो यह चाहिए था कि दुनिया हमारे समारोहों को मनाए, पर हुआ इसके ठीक विपरीत, हम जुट गए पाश्चात्य जश्नों को अपनाने में ! यही नहीं हम तो एक कदम और आगे बढ़ अपने मासूम से पर्वों को पश्चिमी रंगों से रंगने की धृष्टता करने से  भी बाज नहीं आए !

पावन, पवित्र 
ऐसा नहीं है कि किसी और के त्यौहार को मनाना गलत है ! त्यौहार तो खुशी का प्रतीक हैं ! खुशियां अपनानी ही चाहिए ! पर हमारे हमारे पर्व गौण क्यों होते चले गए ? ऐसा क्योंकर हुआ ? तो इसका एक कारण यह भी समझ में आता है कि सैकड़ों वर्षों की पराधीनता ने अधिकांश देशवासियों में जो एक हीन भावना का संचार कर दिया था, उसी से हम आक्रांताओं को अपने से बेहतर मानने लग गए, जिसका परिणाम यह रहा कि हमें अपने ऊपर ही विश्वास नहीं रह गया ! हमारी समृद्ध परिपाटी, परंपरा, इतिहास, सभी हाशिए पर सिमटते चले गए !   

जैसे अभी-अभी पश्चिमी कैलेण्डर ने नए साल का ऐलान किया और हम सब जुट गए उसके स्वागत समारोह में, कोई बुराई नहीं ! पर एक बार अपने नव वर्ष के समय और इस नए साल के समय का तुलनात्मक विश्लेषण कर लें तो साफ फर्क नजर आ आएगा कि नई परिस्थिति का उल्लास क्या होता है ! जब प्रकृति, कायनात, निसर्ग खुद अंगड़ाई ले आलस्य त्यागती है तो ऐसे प्रफुल्लित वातावरण में धरा का जर्रा-जर्रा उल्लसित नजर आने लगता है ! जड़ में भी जान आ जाती है ! एक बार पूर्वाग्रह त्याग, तुलना कर देखें तो सही ! 

इसी बात का उल्लेख वर्षों पहले अपनी कविता  ''यह नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं'' में हमारे राष्ट्र कवि श्री रामधारी दिनकर जी ने पूरे विस्तार के साथ किया था ! हम सभी को उसे पढ़ना चाहिए, वे कहते हैं कि -


ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं                                
है अपना ये त्यौहार नहीं                                                          


है अपनी ये तो रीत नहीं
है अपना ये व्यवहार नहीं

धरा ठिठुरती है सर्दी से,
आकाश में कोहरा गहरा है                                               
बाग़ बाज़ारों की सरहद पर                                                                  
सर्द हवा का पहरा है                                                                             

सूना है प्रकृति का आँगन
कुछ रंग नहीं , उमंग नहीं
हर कोई है घर में दुबका हुआ
नव वर्ष का ये कोई ढंग नहीं

चंद मास अभी इंतज़ार करो
निज मन में तनिक विचार करो
नये साल नया कुछ हो तो सही
क्यों नक़ल में सारी अक्ल बही                                                                                                  

उल्लास मंद है जन-मन का
आयी है अभी बहार नहीं
ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं

ये धुंध कुहासा छंटने दो
रातों का राज्य सिमटने दो
प्रकृति का रूप निखरने दो
फागुन का रंग बिखरने दो

प्रकृति दुल्हन का रूप धार
जब स्नेह – सुधा बरसायेगी
शस्य श्यामला धरती माता
घर-घर खुशहाली लायेगी

तब चैत्र शुक्ल की प्रथम तिथि
नव वर्ष मनाया जायेगा
आर्यावर्त की पुण्य भूमि पर
जय गान सुनाया जायेगा

युक्ति प्रमाण से स्वयंसिद्ध
नव वर्ष हमारा हो प्रसिद्ध                                                                                    
आर्यों की कीर्ति सदा -सदा
नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा


अनमोल विरासत के धनिकों को
चाहिये कोई उधार नहीं
ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं                                                                                    

है अपनी ये तो रीत नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं                                                                                                                                           

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 🙏🙏

गुरुवार, 1 जनवरी 2026

कौंडिन्य, जिनके नाम पर नौसेना के पाल-पोत का नामकरण हुआ

जिसने हजारों साल पहले हिंद महासागर से दक्षिण पूर्व एशिया तक की सफल समुद्री यात्राएं ही नहीं कीं थीं, बल्कि दक्षिण पूर्व एशिया में फुनान साम्राज्य, जो मेकांग डेल्टा क्षेत्र में स्थित था, की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी ! जिसने ऐसा अनोखा इतिहास रचने में अपना योगदान दिया था, उसी, अब तक एक तरह से अज्ञात, गुमनाम महान नाविक को सम्मान देते हुए भारतीय नौसेना ने अपने इस नये जहाज का नाम INSV कौंडिन्य रख, देशवासियों को उससे परिचित करवाया है ! इसके लिए नौसेना को साधुवाद..........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

इस साल के अंत में एक अद्भुत, सुखद घटना घटी ! जब भारतीय नौसेना ने अपना एक खास अग्रणी ''सिला हुआ पाल-पोत,'' INSV कौंडिन्य सोमवार, 29 दिसंबर को गुजरात के पोरबंदर से ओमान के मस्कट तक भारत की प्राचीन समुद्री परंपराओं के परीक्षण तथा प्राचीन समुद्री व्यापार मार्ग का पता लगाने के लिए रवाना किया। 19.6 x 6.5 x 3.3 आयामी इस जहाज में 17 नाविक सवार हैं, जिनका नेतृत्व कमांडर विकास सोरेन तथा उनके सहायक कमांडर वाई हेमंत कुमार संभालेंगे। कौंडिन्य उन 1400 की.मी. लंबे ऐतिहासिक समुद्री मार्गों का प्रतीकात्मक पुनरावलोकन करेगा, जिन्होंने सहस्राब्दियों तक भारत को व्यापक हिंद महासागर क्षेत्र से जोड़े रखा था। 

इतिहास रचने की तैयारी

नौसेना का हिस्सा 
कौंडिन्य की विशेषता यह है कि यह आज के आधुनिक नौसैनिक जहाजों से बिलकुल अलग है। कौंडिन्य में ना कोई इंजन है, नाहीं आधुनिक प्रोपल्शन तकनीक। इसे अजंता की गुफाओं में दर्शाए गए एक जहाज के चित्र के आधार पर, लकड़ी के तख्तों से, 2000 साल से भी अधिक पुरानी जहाज निर्माण पद्धति के अनुसार बनाया गया है। इसमें लोहे या धातु की कीलों का प्रयोग ना कर, नारियल के रेशों, उसकी रस्सियों, मछली के तेल, प्राकृतिक राल, और लाल ईंटों के चूर्ण का उपयोग किया गया है। एक तरह से यह एक सिला हुआ जहाज है। यह समुद्र की लहरों, हवा और अपने पाल के सहारे ही अपनी यात्रा पूरी करेगा !

कौंडिन्य 

पूर्णतया सिला हुआ 
इसका नाम रखा गया है कौंडिन्य ! कौन थे ये ? जिनके नाम पर इस जहाज का नाम रखा गया ! तो यह उस भारतीय व्यक्ति का नाम है, जिसने हजारों साल पहले हिंद महासागर से दक्षिण पूर्व एशिया तक की सफल समुद्री यात्राएं ही नहीं की थीं बल्कि दक्षिण पूर्व एशिया में फुनान साम्राज्य, जो मेकांग डेल्टा क्षेत्र में स्थित था, की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी ! पर जिसके बारे में हमारे छद्म इतिहासकारों ने कभी बताया ही नहीं ! हम तो अब तक कोलंबस, वास्कोडिगामा आदि को ही साहसी नाविक मानते रहे थे ! 
गर्व के पल 
कौंडिन्य का जन्म कलिंग राज्य के एक ब्राह्मण परिवार हुआ था ! वे एक महान विद्वान तथा निडर साहसिक नाविक थे। जो हिंद महासागर से दक्षिण पूर्व एशिया तक की अपनी यात्राओं के लिए जाने जाते रहे हैं। उनकी कहानी ऐतिहासिक तथ्य और पौराणिक कथाओं का मिश्रण है, जो भारत और दक्षिण पूर्व एशिया के बीच गहरे सांस्कृतिक और समुद्री संबंधों का प्रतीक है। एक कुशल नाविक के रूप में अपनी उपलब्धियों के अलावा, कौंडिन्य वैदिक ज्ञान में और मार्शल आर्ट में भी पारंगत थे। जो हमारे प्राचीन खोजकर्ताओं की बहुआयामी विलक्षणता को दर्शाता है ! 

तब कितनी कठिन रही होगी यात्रा 
कौंडिन्य का विस्तृत विवरण प्राचीन चीनी अभिलेखों में उपलब्ध है, जिनके अनुसार, कौंडिन्य ने बंगाल की खाड़ी के पार, दिव्य स्वप्न द्वारा निर्देशित हो एक यात्रा शुरू की। मेकांग डेल्टा में कौंडिन्य और उनके चालक दल पर समुद्री लुटेरों, जिसका नेतृत्व एक नागा (सर्प) कबीले के मुखिया की बेटी रानी सोमा कर रही थी, ने हमला कर दिया। जिसमें इन्होंने सोमा की सेनाओं को हराया। कौंडिन्य के साहस और कौशल से प्रभावित हो कर रानी सोमा ने उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा, जिसे कौंडिन्य ने स्वीकार कर लिया।


समय के साथ कौंडिन्य ने फुनान साम्राज्य की स्थापना कर, व्याधपुरा (वर्तमान कंबोडिया) में बा फनोम को अपनी राजधानी के रूप में स्थापित किया। कौंडिन्य और रानी सोमा के विवाह को व्यापक रूप से भारतीय और स्थानीय खमेर संस्कृतियों के संबंधों की सुदृढ़ता के रूप में माना जाता है। इस सांस्कृतिक एकीकरण ने एक संपन्न सभ्यता की नींव रखी। समय के साथ, फुनान समुद्री व्यापार के एक प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित हुआ।    

सन्नद्ध 

जिसने ऐसा इतिहास रचने में अपना योगदान दिया था, उस, अब तक एक तरह से, अज्ञात, गुमनाम महान नाविक को सम्मान देते हुए भारतीय नौसेना ने अपने इस नये जहाज का नाम INSV कौंडिन्य रख, देशवासियों को उससे परिचित करवाया है ! इसके लिए नौसेना का हार्दिक आभार और साथ ही साधुवाद !

@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

बुधवार, 31 दिसंबर 2025

प्रॉफेट, जिसका डायरेक्ट कनेक्शन ईश्वर से है

मौत से सभी को डर लगता है ! हजारों आस्थावान लोग अपना टीन-टप्पर बेच कर, जान बचाने खातिर पैगंबर साहब के पास पहुंच गए ! क्रिसमस भी आया और चला गया ! पर ना कोई बरसात हुई ना हीं बाढ़ दिखी, न दुनिया डूबी, न धरती कांपी, न आसमान फटा ! लोग पूछने लगे, नोआ भाई, पानी कहां है ? पैगंबर साहब बोले, मेरी ईश्वर से बात हुई, मैंने उनसे आप लोगों के भले के लिए दुआ की और कहा कि नावें कम पड़ रही हैं, तो उन्होंने मुझे और नावें बनाने का समय देते हुए, फिलहाल बाढ़ को स्थगित कर दिया है ! लोग मान भी गए.............!    

#हिन्दी_ब्लागिंग 

इं सान ने जब से होश संभाला है, शायद तभी से उसका सबसे बड़ा डर अपनी मौत का ही रहा है ! अपनी या अपने प्रियजनों की मृत्यु उसे सदा भयभीत किए रखती है ! आस्था और डर के बीच बहुत ही महीन रेखा होती है, उसी घालमेल का फायदा उठा संसार भर में कुटिल लोग इस भय को अपने हित में भुनाते रहे हैं ! आज के सोशल मीडिया का बवंडर यदि ऐसे लोगों के चेहरे बेनकाब करता है तो दूसरी और उन्हें मशहूर करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ता !   

स्वयंभू पैगंबर, एबो नूह
गस्त 2025 ! अचानक एक  “What will happen and how it will happen” शीर्षक का वीडियो, टिकटॉक, इंस्टाग्राम, फेसबुक और एक्स पर तेजी से वायरल होने लगा ! जिसमें अफ्रीकी देश घाना के कसोआ इलाके का एक टाट (बोरा) धारी, एबो नूह (Ebo Noah) नामक स्वयंभू पैगंबर दावा करता नजर आता है कि उसे ईश्वर से संदेश प्राप्त हुआ है कि आगामी क्रिसमस के दिन से भीषण बरसात होगी, जिसके फलस्वरूप भयंकर बाढ़ आएगी, जिसका प्रकोप तीन साल तक रहेगा। धरती का अधिकतम हिस्सा जलमग्न हो जाएगा ! सारे मनुष्य, जीव-जंतु, पेड़-पौधे नष्ट हो जाएंगे ! आगे वह बताता है कि इस विपदा से बचने के लिए उसने आठ विशाल नावें बनाई हैं ! जो लोग इन नावों में आएंगे, दान देंगे, जगह बुक करेंगे, सिर्फ वही बचेंगे, बाकि सब खत्म हो जाएंगे ! डर बेचने का उसका धंधा चल निकला ! वैसे इस शख्स ने खुद को वर्तमान समय का नोआ यानी नूह घोषित कर रखा है, जो आने वाली हर विपदा से अपने अनुयायियों को बचाता रहेगा ! 
विशालकाय नौका 
निर्माणाधीन 

जा हिर है ! मौत से सभी को डर लगता है ! एबो की भविष्यवाणी से डर कर हजारों आस्थावान लोग अपना टीन-टप्पर बेच कर, जान बचाने खातिर उसकी शरण में पहुंच गए ! क्रिसमस भी आया और चला गया ! पर ना कोई बरसात हुई ना हीं बाढ़ दिखी, न दुनिया डूबी, न धरती कांपी, न आसमान फटा ! लोग पूछने लगे, नूह भाई, पानी कहां है ? पैंगबर साहब बोले, मेरी ईश्वर से बात हुई, मैंने उनसे आप लोगों के भले के लिए दुआ की और कहा कि नावें कम पड़ रही हैं, तो उन्होंने मुझे और नावें बनाने का समय देते हुए, फिलहाल बाढ़ को स्थगित कर दिया है ! लोग मान भी गए !   

मौत का खौफ 

इस आदमी के करीब 35000 पिच्छलगु हैं ! ये सदा टाट, बोरा पहने रहता है ! खुद को जमीन से जुड़ा बताता है ! मंहगे फोन को ईश्वर से कांटेक्ट के लिए जरुरी बताता है ! ईश्वर की राह पर चलते हुए इसने खुद को ही कॉन्ट्रैक्टर भी बना लिया, प्रॉफ़ेट भी और टिकट चेकिंग क्लर्क भी, सब कुछ एक साथ ! फिर भी लोग उस पर भरोसा कर रहे हैं ! वे यह नहीं देख पाते कि उन्हें प्रलय का दिन बताने वाला एक लाख डॉलर की नई गाड़ी खरीद रहा है ! जिसे वह उन्हीं के प्रेम की भेंट बताता है ! कोई यह नहीं पूछता कि बाढ़ आ ही क्यों रही थी ? यदि आनी जरुरी थी तो रुक क्यों गई ? हमने जो अपना घर-बार बेच दिया उसका क्या होगा ? वही डर, वही भय, वही आशंका, इन सभी लोगों को चुप रखे हुए है ! छोड़ दिया है सबको अपनी नियति पर !

शौक 
धर एबो के खिलाफ  काफी  कुछ लिखा भी  जा रहा है ! कई धार्मिक  नेताओं ने भी साफ कहा है कि ये बाइबल की कहानी को तोड़-मरोड़कर अपने  फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहा है ! कानून अपने ही दायरे में कैद है ! उधर पब्लिक है कि  मानती ही नहीं कि उसके साथ  कुछ गलत हुआ है, उसे सिर्फ  अपनी जान बचाने की पड़ी है और इसके लिए वो इंतजार कर रही है बाकि नावों के बनने का !
हश्र 
हा लांकि खबर यह है कि फिलहाल पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया है, पर इससे उसकी ''पूंछ'' और भी बढ़ गई है और उसे अपने पुराने गेट-अप में तरह-तरह के समारोहों में शामिल होने का न्योता मिल रहा है,  जिनमें Sarcodie's Concert भी एक है ! जय हो ! 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

ड्राई फ्रूट्स और सूखे मेवे ! फर्क है जरा सा दोनों में

जो भी हो, हैं तो सभी पौष्टिक आहार ही ! इन दोनों श्रेणियों में ही विटामिन, मिनरल तथा अन्य पोषक पदार्थ भरपूर मात्रा में होते हैं, जो हम सब को सेहतमंद तो बनाते ही हैं ना ! तो सर्दियों में इन सब का संतुलित मात्रा में उपयोग जरूर करें ! ध्यान यह भी रहे कि ''अति सर्वत्र वर्जयेत्''..............! 

#हिन्दी_ब्लागिंग  

वैसे तो इनकी बारहों महीने मांग रहती है पर सर्दियों में पूछ कुछ ज्यादा ही बढ़ जाती है ! पर इधर मीडिया पर आई पोषण, खान-पान संबंधित सलाहकारों की बहार के डराने-धमकाने पर आम इंसान मिठाइयां, केक, चॉकलेट छोड़ इनकी तरफ कुछ ज्यादा ही मेहरबान हो गया है ! जी हाँ, ड्राई फ्रूट ! जिनका नाम सामने आते ही काजू, बादाम, किसमिस, अखरोट आदि की तस्वीरें सामने आ जाती हैं ! पर क्या नाम के अनुसार ये सभी ड्राई फ्रूट हैं ?   

नट्स 

ड्राई फ्रूट्स 

देखा जाए तो ड्राई फ्रूट का अर्थ होता है, सूखे फल, जैसे किसमिस, खजूर, अंजीर, खुबानी इत्यादि। ऐसे फल जिन्हें धूप में या व्यावसायिक ड्रायर मशीनों में सुखा कर तैयार किया जाता है। काजू, बादाम वगैरह तो नट्स या बीज होते हैं। यहां भी हमारी भाषा की समृद्धि सामने आती है ! जहां इन्हें मेवा कहा जाता है ! इन सभी का अपना-अपना पौष्टिक महत्व है और इन्हें आहार में शामिल भी किया जाता है, लेकिन इनकी परिभाषा अलग-अलग है। 

 

प्रकृति की नेमत 
इनमें मुख्य अंतर यह है कि ड्राई फ्रूट्स वो फल होते हैं जिनकी नमी हटा, सुखा कर तैयार किया जाता है, जैसे अंजीर, खजूर, किसमिस, खुबानी इत्यादि ! दूसरी तरफ बादाम, काजू, अखरोट, पिस्ता आदि कठोर छिलके वाले फल के अंदर के बीज या उनका हिस्सा होते हैं ! इस तरह देखा जाए तो काजू, बादाम औरअखरोट इत्यादि तकनीकी रूप से मेवे हैं, जो अक्सर ड्राई फ्रूट्स के साथ ही खाए जाते हैं, लेकिन सूखे फल मेवों की श्रेणी में नहीं आते, पर सभी को सुविधा के लिए ड्राई फ्रूट्स कह दिया जाता है। 

पौष्टिकता 

जो भी हो, हैं तो सभी पौष्टिकता से भरपूर आहार ही ! इन दोनों श्रेणियों में ही विटामिन, मिनरल तथा अन्य पोषक पदार्थ भरपूर मात्रा में होते हैं, जो हम सब को सेहतमंद तो बनाते ही हैं ना ! तो सर्दियों में इन सब का संतुलित मात्रा में उपयोग जरूर करें ! ध्यान यह भी रहे कि ''अति सर्वत्र वर्जयेत् !'' 

स्वस्थ रहें, प्रसन्न रहें !

@अंतर्जाल का हार्दिक आभार 

गुरुवार, 18 दिसंबर 2025

धोनी के राम बाबू , भारतीय क्रिकेट के सुपरफैन (2)

धोनी बेहतरीन खिलाडियों में से एक हैं, इसमें कोई शक नहीं, पर उनका ईगो भी बहुत बड़ा है ! इसी ईगो के चलते कई बार सही-गलत अफवाहें भी सामने आती रही हैं ! अपने सीनियर खिलाडियों से उनकी ''तनातनी'' कोई दबी-छुपी बात भी नहीं है ! हो सकता है कि सुधीर को देख उन्हें भी अपने लिए भी वैसे ही किसी प्रशंसक की जरुरत महसूस होने लगी हो और सामने राम बाबू को पा कर सुधीर की एक रेप्लिका अपने नाम से क्रिकेट जगत में प्रोजेक्ट कर दी  हो ! हो सकता है कि यह गलत हो, पर लगता तो है.......!  

#हिन्दी_ब्लागिंग 

पि छले अंक में भारतीय क्रिकेट के एक तरह से सबसे बड़े फैन सुधीर कुमार चौधरी की बात की थी ! जिनके क्रिकेट के प्रति जुनून ने उनकी जिंदगी बदल दी ! आज इस खेल से जुड़ा हुआ तकरीबन हर खेल प्रेमी उनका नाम जानता है ! आज वैसे ही एक और व्यक्ति की बात ! ये भी सुधीर की तरह ही मैदान की दर्शक दीर्घा में तिरंगा फहराते नजर आते हैं ! ये हैं मोहाली, पंजाब के राम बाबू ! धोनी के प्रशंसक हैं,  उनके द्वारा प्रायोजित किए गए हैं, इसीलिए इनके शरीर पर धोनी का नाम और जर्सी नंबर पेंट किया दिखता है ! 

राम बाबू 

सुधीर कुमार चौधरी 

दु निया में बहुत से लोग, सफल और विख्यात लोगों की सफलता से प्रेरित हो उसी तरह का काम या पेशा अपना लेते हैं ! कुछ सफल भी हो जाते हैं, पर शायद ही ऐसा कभी हुआ हो कि प्रेरित व्यक्ति अपने प्रेरक से भी आगे निकल गया हो ! कुछ ऐसा ही यहां भी है ! सुधीर और राम बाबू में कुछ समानताएं भी हैं ! दोनों ने गरीबी का दंश झेला है ! दोनों के परिवार इनके इस ''शौक'' के खिलाफ  रहे हैं ! दोनों को अपना जुनून पूरा करने के लिए दोस्तों-मित्रो से आर्थिक सहायता लेनी पड़ी है ! दोनों क्रिकेट के सबसे मशहूर खिलाडियों के फैन हैं ! पर सुधीर, राम बाबू से बहुत आगे हैं ! शायद इसलिए कि उन्हें BCCI की स्पॉन्सरशिप हासिल है। साथ ही उनके आदर्श साफ-सुथरी-अविवादित छवि वाले सचिन तेंदुलकर हैं ! दूसरी ओर राम बाबू धोनी द्वारा प्रायोजित हैं, जिन पर कई बार विभिन्न तरह की शंकाएं उठ चुकी हैं ! 

राम बाबू 

ऐसा लगता है कि सुधीर को हर मैच में तिरंगा फहराते, लोगों को उनकी बात करते, खिलाड़ियों के साथ उनकी फोटो को देख, राम बाबू के मन में भी आशा जगी होगी कि इस तरह वह भी मशहूरी प्राप्त कर सकते हैं ! क्रिकेट से उनका लगाव था ही ! कई बार, मैदान के बाहर, प्लेयरों को ले जाने वाली बस के नजदीक या अन्य मौकों पर वह धोनी के नारे लगाते उनका ध्यान अपनी रंगी-पुती आकृति की ओर खींच भी चुके थे ! एक बार धोनी के बुलावे पर उनके घर भी जा चुके थे !

मुलाकात 

क्रि केट के बेहतरीन खिलाडियों में से धोनी एक हैं, इसमें कोई शक नहीं ! पर उनका ईगो भी बहुत बड़ा है ! इसी ईगो के चलते कई बार सही-गलत अफवाहें भी सामने आती रही हैं ! अपने सीनियर खिलाडियों से उनकी ''तनातनी'' कोई दबी-छुपी बात भी नहीं है ! हो सकता है कि सुधीर को देख उन्हें भी अपने लिए भी वैसे ही किसी प्रशंसक की जरुरत महसूस होने लगी हो और सामने राम बाबू को पा कर सुधीर की एक रेप्लिका अपने नाम से क्रिकेट जगत में प्रोजेक्ट कर दी  हो ! हो सकता है कि यह गलत हो, पर लगता तो है। 

उपलब्धि 
राम बाबू और सुधीर को कई और बातें भी अलग करती हैं ! सुधीर ने खेल के प्रति लगाव के कारण शादी तक नहीं की ! उधर राम बाबू ने पत्नी और सातवीं में पढ़ने वाले बेटे तथा उससे एक साल छोटी बिटिया को उनके भाग्य के सहारे छोड़ दिया ! उनकी पत्नी किसी तरह घर चलाती रही हैं ! अपनी अलग पहचान बनाने के बावजूद राम बाबू की किसी तरह की कोई कमाई नहीं है, वह अपनी यात्रा, ठहरना और अन्य जरूरतों के लिए लोगों की सहायता पर निर्भर है ! उनके अनुसार मैच देखने के अलावा जीवन में और कोई योजना नहीं है ! अब धोनी उनको स्पांसर कर रहे हैं, तो यथा संभव कभी-कभी परिवार की सहायता कर देते हैं ! 

दर्शक दीर्घा में 
राम बाबू के धोनी के अलावा किसी और खिलाड़ी से कोई दोस्ताना संबंध नहीं हैं। नाहीं किसी से किसी तरह की आर्थिक सहायता मिलती है ! कभी-कभी मैच का टिकट जरूर मिल जाता है ! दोस्तों और शुभचिंतकों की सहायता से इस 40 वर्षीय क्रिकेट फैन के रहने-खाने-यात्रा संबंधित काम पूरे हो जाते हैं ! यह पूछने पर कि टीवी पर आपको देख क्या परिवार खुश होता है, राम बाबू चुप्पी साध लेते हैं ! फिर मायूसी के साथ बतलाते हैं कि सभी का कहना है कि जब इससे परिवार को कोई सहायता नहीं मिलती तो इस सब का क्या मतलब !

चिंतामग्न 

नको इसका भी कहीं मलाल तो है कि सुधीर को एक ट्रैवल एजेंसी के साथ-साथ और भी कई तरह की स्पांसरशिप मिल चुकी है। पर पता नहीं क्यों उनकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता ! पर उन्हें इस बात का गर्व भी है कि धोनी उन्हें जानते हैं और मैदान में मैचों के दौरान उनको नजरंदाज नहीं किया जाता ! इसीलिए जब तक शरीर साथ देगा तब तक वे भारतीय टीम के मैचों में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते रहेंगे, आगे ऊपर वाले की मर्जी !

@अंतर्जाल का आभार 

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