शनिवार, 7 मार्च 2026

एक था, अहोम साम्राज्य

हमारे वे महानायक कितने महान योद्धा रहे होंगे, जिनका वर्णन ना चाहते हुए भी, उन पोषित कारकूनों को, जो आगे चल कर इतिहासकार कहलाए, मजबूरन करना पड़ा ! उन्हीं कुंठित लोगों ने, उन हजारों हजार वीरों, जिनके रहते आक्रांताओं की इधर आँख उठा कर देखने की मजाल नहीं रही या जिन्होंने भारत को विश्व में शिरोमणि बनाए रखा, उन साम्राज्यों और उनके महानायकों का जिक्र अपने पर्चों में कभी और कहीं भी नहीं किया ..............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

भी-कभी विचार आता है कि जो भी हमें पढ़ाया गया, उस इतिहास में उँगलियों पर गिने जा सकने वाले हमारे वे महानायक कितने महान योद्धा रहे होंगे, जिनका वर्णन ना चाहते हुए भी, उन पोषित कारकूनों को, जो आगे चल कर इतिहासकार कहलाए, मजबूरन करना पड़ा ! उन्हीं कुंठित लोगों ने, उन हजारों हजार वीरों, जिनके रहते आक्रांताओं की इधर आँख उठा कर देखने की मजाल नहीं रही या जिन्होंने भारत को विश्व में शिरोमणि बनाए रखा, उन साम्राज्यों, उनके महानायकों और वीरांगनाओं का जिक्र अपने पर्चों में कभी और कहीं भी नहीं किया ! 

अहोम राज 
भारत के ऐसे ही अनजाने उन महान अनेकानेक साम्राज्यों में से एक था अहोम साम्राज्य ! जो आज के असम की पूर्वी ब्रह्मपुत्र घाटी में स्थित था। यह पूर्वोत्तर भारत में एक दुर्जेय शक्ति थी ! इसने 1228 ईस्वी से शुरू होकर लगभग 600 वर्षों तक अपनी संप्रभुता लगातार बनाए रखी थी ! 13वीं शताब्दी के आरंभ में भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में दो महान साम्राज्य हुआ करते थे। एक अहोम तथा दूसरा कामरूप, जिसकी राजधानी प्राग्यज्योतिषपुर थी, जो आजकी गुवाहाटी है। अहोम लोग अब आसाम के अन्य निवासियों में घुल मिल गये हैं और उनकी संख्या बहुत कम रह गई है। 

अहोम साम्राज्य 
राजा चाओलुंग सुकफा ने 13वीं शताब्दी में बर्मा के कुछ हिस्सों, ऊपरी असम तथा उसके निकटवर्ती क्षेत्रों और वहां की जनजातियों को अपने अधीन कर, पुरानी  व्यवस्था को समाप्त करते हुए अहोम राजवंश की स्थापना की थी ! हालांकि अहोम साम्राज्य के लोग अपने आदिवासी देवताओं की पूजा-उपासना करते थे पर उन्होंने हिंदू धर्म को भी अपनाए रखा ! अहोम राजाओं की सफलता का राज यह था कि राजा ही सर्वोच्च सेनापति भी होता था, जो सदा सेना का आगे बढ़ कर नेतृत्व किया करता था ! अपनी दूरदर्शिता के चलते उन्होंने नागरिकों, सैनिकों तथा धनाढ्य श्रेष्ठि वर्ग के बीच आपसी समझ और एकता को सदा बनाए रखा !  जिससे कभी आपसी वैमनस्य नहीं उभरा ! 

वीर सेनानी 
पनी बहादुरी के लिये विख्यात अहोम, शक्तिशाली मुगल साम्राज्य के आगे भी कभी नहीं झुके। उल्टे इन्होंने मुगलों को सत्रह बार बुरी तरह परास्त किया था ! मुगलों का यह हश्र देख किसी अन्य आक्रांता की हिम्मत नहीं हुई, इन पर आक्रमण करने की ! इसीलिए यह साम्राज्य 600 वर्षों तक लगातार वजूद में रहा !इस अवधि में 39 अहोम राजा गद्दी पर बैठे। यहाँ के राजाओं की उपाधि 'स्वर्ग देव' थी। अहोम राजाओं ने आसाम में बहुत अच्छा शासन प्रबंध किया। हालांकि उस सामन्तवादी प्रबंधन में अच्छाइयाँ और बुराइयाँ शामिल थीं ! शासन अपना पूरा लेखा-जोखा रखता था, जिसे बुरंजी कहा जाता था। यह राज्य यंदाबू की संधि पर वर्ष 1826 में ब्रिटिश भारत में शामिल कर लिया गया ! 

लाचित बोड़फुकन
पने इतने अहम और महत्वपूर्ण साम्राज्य के बारे में अपने ही देश के लोगों की जानकारी नगण्य सी है ! उसी को प्रकाश में लाने का उपक्रम मार्च, 2021 में किया गया, जब अहोम साम्राज्य के सेनापति लाचित बोड़फुकन को, जिनका जन्म 24 नवंबर, 1622 को हुआ था और जिन्होंने 1671 में हुए सराईघाट के युद्ध में अपनी सेना का प्रभावी नेतृत्व करते हुए मुगल सेना का असम पर कब्जा करने का प्रयास विफल कर दिया था, भारत की "आत्मनिर्भर सेना का प्रतीक'’ की उपाधी प्रदान की गई ! इसके अलावा उनके नाम का एक स्वर्ण पदक भी जारी किया गया जो राष्ट्रीय रक्षा अकादमी के सर्वश्रेष्ठ कैडेट को प्रदान किया जाता है !

वीरांगना मुला गभारू 
स्मारक 
ह तो सिर्फ एक बानगी है ! ऐसी सैंकड़ों कथाएं-गाथाएं हैं, जिनको सामने लाने की आवश्यकता है ! अब समय है नई पीढ़ी को अपने गौरवमय इतिहास उसके उन नायकों, महानायकों, योद्धाओं के व्यक्तित्व की सच्चाई बताने का, जिन्होंने देश के लिए अपना सब कुछ समर्पित कर दिया था ! पर षड्यंत्रवश उनके कर्मों, उनके प्रयासों, उनके त्याग को कभी उजागर नहीं किया गया ! उन्हें सदा गुमनामी के अंधकार में छुपाए रखा गया ! 

@चित्र और संदर्भ अंतर्जाल के सौजन्य से  

बुधवार, 4 मार्च 2026

होली, रिलायंस की ! यादें बचपन की

 शुरुआत होती थी उन ''पांच-सात देव-पुरुषों'' से जो झक्क सफेद शर्ट-पैंट में मंथर गति से चलते हुए आ कर लॉन में एक-दूसरे को बधाई दे, जरा-जरा सा गुलाल लगा खड़े हो जाते थे। फिर उनके युवा सहकर्मी उन्हें गुलाल लगा आशीर्वाद पाते थे और फिर उस एक दिन को मिली छूट का पूरा लाभ उठा वानर सेना के सेनानी, पिल पड़ते थे अपने हथियारों समेत उन पर और जब तक उनके लिबास में चिन्दी भर भी सफेदी नज़र आती थी तब तक रंगों की बरसात जारी रहती थी। हमारी हसरतें पूरी होते ही वे आपस में विदा ले अपने-अपने घरों को बढ़ लेते थे। आज वह सब सोच कर उन पर तरस और प्यार के साथ आँखें भी नम हो जाती हैं कि कैसे वे लोग चुप-चाप खड़े रह कर हमें खुश होने का भरपूर मौका दिया करते थे.........................😌😍🙏 

#हिन्दी_ब्लागिंग 
     
होली फिर आ गई और साथ ही ले आई बचपन के दिनों की रंग में सराबोर यादें। बचपन के वे दिन जो रिलांयस में बीते ! वैसे तो समय के साथ-साथ जैसे-जैसे वहां निज़ाम बदलते गए, वैसे-वैसे मिल के वाशिंदों के आचार-व्यवहार-त्यौहार आदि में भी थोड़ा-बहुत बदलाव आता चला गया, जोकि लाज़िमी भी था। पर आज जो बात बतला रहा हूँ, वह बिल्कुल शुरू के कुछ वर्षों में मनाई-खेली जाने वाली होली की है। 


दिनों सर, मैडम, मिसेज या अंकल-आंटी जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं के बराबर ही होता था। जो पंद्रह-बीस परिवार परिसर में रहते थे, उनकी महिला सदस्य एक-दूसरे को संबोधित करने के लिए भैन (बहन) या भैन जी तथा एक-दो अपवादों को छोड़, पुरुष सदस्यों के लिए उनका उपनाम या भाई जी का प्रयोग ही हुआ करता था। आज तो मुझे लगता था कि शायद मिल के स्टाफ का पूरा नाम तो सिर्फ कैशियर अंकल ही जानते होंगे, जिन्हें सैलरी देने के लिए पूरे नामों की जरुरत पड़ती होगी ! हाँ बच्चा पार्टी बिना भेद-भाव,जात-पात के सिर्फ नाम से पुकारी जाती थी। 
गुजरा ज़माना बचपन का 
तो बात हो रही थी होली की ! वैसे तो सारा परिसर एक ही परिवार था ! पर पुरुष वर्ग की ''क्रिमी लेयर'' के पांच-सात लोग बहुत ही मित्त-भाषी, सादगी प्रिय, गंभीर और एक अनुशासित ''औरा'' में ही रहने वाले थे ! ऐसा नहीं था कि वे स्वभाव से कठोर या अहम वाले थे ! वे सब बहुत प्रेमिल थे, पर अपने पर और अपनी भावनाओं पर उनका पूरा नियंत्रण हुआ करता था। समय-समय पर उनकी जिंदादिली भी सामने आती रहती थी पर कभी-कभी, किसी पूर्णिमा पर या एकादशी पर ! ये सब इसलिए बता रहा हूँ कि जिससे एक खाका खिंच सके, उस समय का। 
पहचान कौन 😜
मि में होली की दस्तक हफ्ते भर पहले ही शुरू हो जाती थी, उसके स्वागत में मिल का युवा स्टाफ रात दस बजे के बाद परिवेश के एक किनारे बने ''बेबी क्रेश'' में चंग या ढपली के साथ राजस्थानी फाग गीतों की स्वर लहरी छेड़ उसके पदचाप की ध्वनि सब तक पहुंचा देता था। ये पारंपरिक राजस्थानी होली गीत होते थे, जिनमें कुछ ''वयस्क शब्दों'' का समावेश भी होता था। इसीलिए यहां बच्चों के प्रवेश की अघोषित मनाही होती थी, पर तरुणाई में कदम रखते मैं और सुमन, बिना शब्दों के अर्थ जाने सिर्फ ढपली की मधुर आवाज से खिंचे वहां चले जाते थे ! भाई लोग कुछ देर तो हमारा लिहाज करते पर फिर गीतों की मस्ती में पूरी तरह डूब जाते थे ! न कोई माइक ना हीं कोई तामझाम, सिर्फ दिल से निकलती आवाज ! कुछ बड़े हो जाने पर उस झिझक का कारण भी समझ में आया 😀

होली के दिन भांग जरूर घुटा करती थी, जिसका पूरा सामान ''कलकत्ते'' से दो दिन पहले पहुँच जाता था। भांग-ठंडाई, बिना किसी मशीन या बाहरी इंसान की सहायता के खुद ही बनाई जाती थी। यह भी एक बड़ा कार्यक्रम होता था ! 60-70 लोगों के लिए इसको बनाना कोई हंसी-खेल नहीं था। सारी सामग्री, घटकों तथा मसालों का सही अनुपात-मात्रा का पूरा ज्ञान और ध्यान रख पूरी तन्मयता और एकांत में उसका निर्माण किया जाता था। भांग बच्चों के लिए पूरी और कठोरता से निषिद्ध थी। होली के एक दिन पहले होलिका दहन की रस्म पूरे रीती-रिवाजों के साथ पूरी की जाती थी और फिर आ जाता था वह दिन जिसका इंतजार हम बच्चे साल भर से करते रहते थे। 
होलिका दहन 
होली की चहल-पहल सुबह साढ़े आठ-नौ बजे शुरू हो जाती थी। महिलाओं-लड़कियों का अलग गुट होता था जो मैनेजर गेट के पास बांए हाथ के छोटे से मैदान में जुटता था। बाकी छोटे-बड़े पुरुष सामने लॉन में रंगों की धूम मचाते थे। गंगा सामने थीं, पानी इफरात था, रंगों की पूर्ती मिल से होती थी। हम अपनी हाफ पैंटों-निकरों की जेबों में तरह-तरह के रंगों को संजोए मोर्चे पर निकलने को तैयार होने लगते थे। ये दूसरी बात है कि ज्यादातर बच्चों की जेबों में कागज की पुड़ियों में रखे रंग पानी से मिलीभगत कर उन्हीं के बदन को ज्यादा रंगीन कर जाते थे। 

लॉन 
शुरु होती थी उन ''पांच-सात देव-पुरुषों'' से जो झक्क सफेद शर्ट-पैंट में मंथर गति से चलते हुए आ कर लॉन में एक-दूसरे को बधाई दे, जरा-जरा सा गुलाल लगा खड़े हो जाते थे। फिर उनके युवा सहकर्मी उन्हें गुलाल लगा आशीर्वाद पाते थे और फिर उस एक दिन को मिली छूट का पूरा लाभ उठा वानर सेना के सेनानी, बिना अपने-पराए का भेद-भाव कर, पिल पड़ते थे अपने हथियारों समेत उन पर और जब तक उनके लिबास में चिन्दी भर भी सफेदी नज़र आती थी तब तक रंगों की बरसात जारी रहती थी। उसी बीच मिठाई का आदान-प्रदान भी बदस्तूर चलता रहता था। हमारी हसरतें पूरी होते ही वे आपस में विदा ले अपने-अपने घरों को बढ़ लेते थे।  आज वह सब सोच कर उन पर तरस और प्यार के साथ आँखें भी नम हो जाती हैं कि कैसे वे लोग चुप-चाप खड़े रह कर हमें खुश होने का भरपूर मौका दिया करते थे। तीन-चार घंटों के हुड़दंग के बाद, माँओं के, बाथरूम को गंदा ना कर ध्यान से नहाने के कड़े निर्देशों का पालन करते हुए हम सब अपने-अपने जिद्दी रंगों को छुड़ाने की मशक्कत में जुट जाते थे। यह दूसरी बात है कि रंगों और हमारा स्नेह दो-तीन दिनों तक तो बना ही रहता था। 
हुदंग 

शा को पांच बजे के आस-पास लॉन में ठंडाई का कार्यक्रम भी पूरे उत्साह के साथ संपन्न होता था। उसके बाद कभी-कभी वहीं ''स्क्रीन'' लगा किसी फिल्म का भी प्रदर्शन हो जाता था। पूरा दिन कैसे छू-मंतर हो जाता था, पता ही नहीं चलता था।  उसके बाद थके-हारे कैसे बिस्तर पर पहुंचते थे, कब नींद आती थी, कब सुबह होती थी कुछ नहीं पता ! पता था तो सिर्फ यह कि अगली होली का इंतजार उसी दिन से फिर शुरू हो जाता था 😴😍  

@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

बदहाली से जूझता एक किला

परन्तु आज किले के प्रवेश द्वार से ही लगने लगता है कि इसका सिर्फ दोहन हो रहा है ! संरक्षित स्मारक होने के बावजूद किले के अंदर विशाल बुर्जों में दसियों होटल खुल गए हैं ! जगह-जगह दुकानें और पटरियों पर बिकता सामान, झरोखों पर टंगे कपड़े, जब-तब होती फिल्मों की शूटिंग, अंदर के रहवासियों की दौड़ती गाड़ियां, लोगों का हुजूम, बाजारवाद और आधुनिकता का दखल, जलवायु और मानवजनित क्षरण, कहीं-कहीं दरकती दीवारें कुछ अलग ही कथा बयान करती नजर आती हैं.........................😔   


#हिन्दी_ब्लॉगिंग 


किला जैसलमेर का ! सन 1156 में भाटी शासक रावल जैसल ने इस ऐतिहासिक किले की त्रिकूट पहाड़ी पर बहुत सोच-समझ कर और रणनीतिक दृष्टिकोण को सामने रखते हुए नींव रखी थी। उनके वंशजों ने यहाँ रहते हुए, भारत के गणतंत्र में परिवर्तन होने तक, बिना वंश क्रम को भंग किए हुए लगातार 770 वर्ष तक शासन किया, जो अपने आप में एक महत्वपूर्ण कीर्तिमान है ! भाटी वंश स्वयं को भगवान श्रीकृष्ण के यादव वंश से जोड़ता है ! इस गौरवपूर्ण परंपरा का उल्लेख प्रचलित लोककथाओं में, शिलालेखों के साथ-साथ राजवंश के वृतांतों में भी स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है।  

रावल जैसल 

सोने का किला 

जैसलमेर का किला 
अनमोल विरासत 
रा जस्थान की राजधानी जयपुर से करीब 575 किलोमीटर की दूरी पर, 99 विशाल बुर्जों और 30 फुट ऊंची दीवार से घिरे, थार मरुस्थल के केंद्र में स्थित इस किले का निर्माण पीले बलुआ पत्थरों से किया गया है, जो सूर्य की रौशनी में चमक कर सोने का अहसास कराते हैं ! इसीलिए इसे सोने का किला भी कहा जाता है ! देश के सुविख्यात फिल्म निर्माता सत्यजीत रे ने इसको केंद्र में रख 1974 में सोनार केल्ला (सोने का किला) नामक एक बंगला फिल्म भी बनाई थी ! 
प्रवेश द्वार


हवा कक्ष 
यह किला भारत का एक प्रमुख पर्यटन स्थल तो है ही, साथ ही यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में भी इसका नाम शामिल है। जैसलमेर का यह स्वर्ण किला दुनिया के उन गिने-चुने किलों में से एक है, जिसमें हजारों लोग रहते हैं यानी यह एक जीवंत किला है ! यह बहुद सुखद अनुभूति है कि इसके रहवासी आज भी अपने त्योहारों, परम्पराओं और लोकगीतों को भूले नहीं हैं ! अच्छी बात है ! पर परंपराओं के साथ-साथ  इस अनमोल धरोहर के संरक्षण, इसके रख-रखाव, इसकी सुरक्षा का भी ध्यान पूरी शिद्दत से रखा जाना चाहिए !

शयन कक्ष 

झरोखा 

पत्थर पर बेहतरीन नक्काशी 

पि छले दिनों अपनी संस्था के सौजन्य से जोधपुर-जैसलमेर यात्रा का अवसर मिला। जोधपुर जितना साफ-सुथरा और व्यवस्थित दिखा उतना जैसलमेर नजर नहीं आया ! खासकर दोनों के दुर्गों में जमीन-आसमान का फर्क दिखा ! जैसलमेर के किले के प्रवेश द्वार से ही एहसास होने लगता है कि इसका सिर्फ दोहन हो रहा है ! संरक्षित स्मारक होने के बावजूद किले के अंदर विशाल बुर्जों में दसियों होटल खुल गए हैं ! जगह-जगह दुकानें और पटरियों पर बिकता सामान, झरोखों पर टंगे कपड़े, जब-तब होती फिल्मों की शूटिंग, अंदर के रहवासियों की दौड़ती गाड़ियां, लोगों का हुजूम, कहीं-कहीं दरकती दीवारें कुछ अलग ही कथा बयान करती नजर आती हैं ! दुःख सा महसूस होता है हालत देख कर !

आवाजाही 

व्यवसाय 

दुकानदारी 

ढ़ती आमदनी के कारण स्थानीय लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी और जीवन शैली पर बाजारवाद और आधुनिकता का दखल साफ तौर से दिखने लगा है ! जिसका असर मानवजनित क्षरण के रूप में किले पर भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से पड़ने लगा है और यही बात चिंता का विषय भी है कि यदि तुरंत इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो कहीं इसका अस्तित्व ही खतरे में ना पड़ जाए ! 

गली-गली में दुकान 

यात्री वाहन 
पनी इस अनमोल विरासत को सहेजे रखना हम सबके लिए जितना महत्वपूर्ण है, इसके संरक्षण की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है ! आज इसकी पहचान, इसकी खासियत, इसकी विश्व-प्रसिद्ध लोकप्रियता ही इसके अस्तित्व के लिए खतरा बन गई है ! वाहनों द्वारा उत्पन्न प्रदूषण ! अनगिनत लोगों को सुविधा प्रदान करने का दवाब ! रख-रखाव की कमी ! बढ़ती दुकानदारी ! समय की मार, इन सबको झेलने में इसका दम फूलता नजर आता है ! 

निजी वाहन, बदहाल राहें 
एक बात का बेहद अचरज होता है कि जब इसे विश्व धरोहर घोषित कर दिया गया है तो इसके अंदर बुर्जों में होटल खोलने की इजाजत क्यों और कैसे दी गई ! होटल हैं तो पर्यटक भी आएंगे, भीड़ बढ़ेगी, जाहिर है दवाब बढ़ेगा तो मानवजनित क्षरण भी बढ़ेगा ! क्या इस बात पर ध्यान नहीं दिया गया या आमदनी के सामने इसको इसकी हालत पर छोड़ दिया गया ? इसके पड़ोस में ही जोधपुर के मेहरानगढ़ की हालत बहुत ही अच्छी है। जैसलमेर को उसका अनुकरण करना चाहिए, जबकि यहां संसाधनों की किसी भी तरह की कोई कमी भी नहीं है !

@अंतिम तीन चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से  

सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

अनोखी समाधि, एक महावृक्ष की

पुरोला देवता रेंज के चीड़ के पेड़ों में एक ऐसा वृक्ष भी था, जिसकी बढ़त आम पेड़ों से अलग थी। समय के साथ 2.70 मीटर की मोटाई वाले तने के इस पेड़ की ऊंचाई 60.65 मीटर तक पहुँच गई थी ! इस खूबी के कारण वह एशिया महाद्वीप का सबसे लंबा चीड़ का पेड़ बन गया था ! जब यह खबर पर्यावरण मंत्रालय तक पहुंची तो 1997 में पर्यावरण मंत्रालय ने एशिया के इस सबसे बड़े और ऊँचे चीड़ के पेड़ को सम्मानित करते हुए इसे ''महावृक्ष'' की उपाधि से नवाज, सम्मानित किया................!
#हिन्दी_ब्लॉगिंग 
माधि ! वैसे तो यह योग की अंतिम अवस्था है, जब साधक ध्येय वस्तु के ध्यान मे पूरी तरह से डूब जाता है और उसे अपने अस्तित्व का भी ज्ञान नहीं रहता ! योग और समाधि एक दूसरे के पूरक शब्द हैं ! परंतु साधारण बोलचाल में इसे चलायमान प्राणियों के लिए भी प्रयुक्त किया जाता है ! जब किसी मृत व्यक्ति या प्राणी का जिस जगह अंतिम संस्कार होता है और उस जगह पर उसकी स्मृति में कोई स्मारक बना दिया जाता है तो उस जगह को उस व्यक्ति या प्राणी की समाधि कहते हैं। पर क्या किसी पेड़ की भी समाधी हो सकती है ?
समाधि स्थल 
जी हाँ ! उत्तराखंड के उत्तरकाशी से 160 किमी की दूरी पर टौंस वन प्रभाग, पुरोला देवता रेंज के अंतर्गत मोरी-त्यूणी सड़क मार्ग पर टौंस नदी के किनारे स्थित है एक अनोखी समाधि ! जिसका एशिया के सबसे बड़े चीड़ के वृक्ष, जिसे पर्यावरण मंत्रालय ने ''महावृक्ष'' की उपाधि प्रदान की थी, की याद को बनाए रखने के लिए वन विभाग द्वारा निर्माण किया गया है ! इसके बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है ! पर जिन्हें इस अनोखी और सुरम्य जगह का पता है, वह यहां मौका मिलते ही जरूर आते हैं !

अनोखी जगह 
त्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के पुरोला देवता रेंज में चीड़ के पेड़ों का एक जंगल है जिसका रखरखाव पर्यावरण मंत्रालय के वन-विभाग द्वारा किया जाता है। वहीं 220 साल की आयु का एक ऐसा वृक्ष भी था, जिसकी बढ़त आम पेड़ों से अलग थी। समय के साथ 2.70 मीटर की मोटाई वाले तने के इस पेड़ की ऊंचाई 60.65 मीटर तक पहुँच गई थी ! इस खूबी के कारण वह एशिया महाद्वीप का सबसे लंबा चीड़ का पेड़ बन गया था ! जब यह खबर पर्यावरण मंत्रालय तक पहुंची तो 1997 में पर्यावरण मंत्रालय ने एशिया के इस सबसे बड़े और ऊँचे चीड़ के पेड़ को सम्मानित करते हुए इसे ''महावृक्ष'' की उपाधि से नवाज, सम्मानित किया ! 

पर्यटकों का आकर्षण 
पर इस धरा पर जो भी आया है उसे जाना ही पड़ता है ! हर एक का समय निश्चित है ! यह महावृक्ष भी कवक रोग से ग्रसित हो गया ! कोई उपचार काम नहीं आया ! धीरे-धीरे यह अंदर से खोखला हो कमजोर होता चला गया और 2007 में आए एक भीषण तूफान का सामना ना कर सकने के फलस्वरूप धराशाई हो गया ! वन विभाग ने इसके मान और गौरव का ध्यान रखते हुए इस पेड़ के तनों के साथ ही इस पेड़ के अलग-अलग हिस्सों को संरक्षित कर नदी किनारे एक संग्रहालय बना, उसके आस-पास इको पार्क का निर्माण करवा, उसे चीड़ के पेड़ की समाधि-स्थल का नाम दे दिया ! 
चीड़ वन 
दे वभूमि उत्तराखंड अपने प्राकृतिक सौंदर्य, ग्लेशियरों, नदियों, झीलों, तालों, बुग्यालों के लिए तो प्रसिद्ध है ही, इस चीड़ के पेड़ की समाधि को देखने के लिए भी बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं और उसके आसपास बने इको पार्क में भी समय व्यतीत करते हैं। महावृक्ष समाधि स्थल पर्यटकों के लिए हमेशा से ही आकर्षण का केंद्र बना रहा है, कभी समय और अवसर मिले तो जरूर जाइएगा !

@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

रविवार, 1 फ़रवरी 2026

व्यस्त रहें, मस्त रहें

अब यह तो पता नहीं कि खाली दिमाग ना मिलने पर शैतान कहां रहता होगा; पर यह जरूर लगता है कि दिमाग में घर बना कर वह इंसान का भला ही करता है, उसे कुछ ना कुछ करने के लिए उकसा कर ! जिससे शरीर चलायमान रहता है। अपनी तरफ से तो वह पूरी कोशिश करता है कि जिस शरीर के दिमाग  को उसने घर बनाया है वह स्वस्थ रहे ! बेशक उसकी नीयत ठीक होती है। पर नाम तो उसका बदनाम है, तो वह जो भी करवाता है, वह शैतानियत ही लगती है...........!

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वैसे तो मनुष्य की आदत है अपने भूतकाल को गौरवान्वित करने की ! पर जब कर्मविहीन इंसान, खासकर सेवानिवृत्त, वेल्ला होता है तो ऐसे में वह बैठे-बैठे अपने अतीत को खंगालने लगता है ! उस समय उसे बीते समय की खुशनुमा बातें तो कम याद आती हैं, उल्टे बुरी यादें, नाकामियां, आधे-अधूरे प्रसंग, कष्ट, अभाव व तकलीफ में गुजरे लम्हों की जैसे फिल्मी रील सी चलने लगती है। ऐसा ना हो तो फिर अनिश्चित भविष्य के खतरे, निर्मूल आशकाएं या अनहोनी घटनाओं का डर उसे घेर लेता है। इस नकारात्मक सोच का दिलो-दिमाग पर गहरा असर पड़ता है। जिससे वह अपने को बीमार सा महसूस करने लगता है। 
बेल्लापन 
सीलिए हर व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने-आप को सदा व्यस्त तथा किसी भी काम में उलझाए रखे। व्यस्तता ही सखा, साथी, सहारा बन जाना चाहिए। इससे नकारात्मक विचारों को दिमाग में घुसने का मार्ग नहीं मिल पाता, ऊल-जलूल बातों पर ध्यान नहीं जाता और सबसे बड़ी बात, शारीरिक और मानसिक रूप से थकने के बाद रात को नींद ना आने की बिमारी से भी मुक्ति मिल जाती है। दिमाग दुरुस्त रहता है और शरीर स्वस्थ। इसलिए हरेक को कुछ भी, कैसा भी, कोई ना कोई शौक, रूचि, ''हॉबी'' जरूर पाल कर रखनी चाहिए। 
कब्जा 
एक कहावत भी है, खाली दिमाग शैतान का घर ! अब यह तो पता नहीं कि खाली दिमाग ना मिलने पर शैतान कहां रहता होगा पर यह जरूर लगता है कि दिमाग में घर बना कर वह इंसान का भला ही करता है, उसे सही-गलत, कुछ ना कुछ करने के लिए उकसा कर ! जिससे उसका आवास चलायमान रहे। अब अपनी तरफ से तो वह पूरी कोशिश करता है कि जिस शरीर के दिमाग को उसने घर बनाया है, वह स्वस्थ रहे, पर नाम ऐसा बदनाम है कि उसका किया-धरा सब कुछ लोगों को शैतानियत ही लगता है ! 
खुशहाली 
एक सच्चाई यह भी है कि इंसान के व्यस्त व स्वस्थ रहने का सकारात्मक असर उसके परिवार की शांति और सकून पर भी पड़ता है। क्योंकि घर के अन्य लोग, उसकी बेवजह दखलंदाजी, फिजूल के हस्तक्षेप, बिन मांगी सलाहें, बेकार की टोका-टाकी, बार-बार की चाय-पानी की पानी की फरमाइश से बचे रहते हैं, जिसके फलस्वरूप परिवार के सदस्य व आत्मीय-जन सुकून महसूस करते हैं, नतीजतन घर में शांति बनी रहती है। 

विभिन्न रुचियां 
तो लब्बो-लुआब यह है कि यदि हम अपने-आप को व्यस्त रखने का कोई जरिया ढूंढ लेते हैं, जिसमें व्यस्त रहते हुए खुशी और संतुष्टि भी मिले। आनंद महसूस हो। कुछ ज्ञान बढे। सृजनता का आभास हो। समय की बर्बादी न लगे और ना हीं मजबूरी ! ऐसा हो तो यह तय है कि दिमाग दुरुस्त व शरीर चुस्त तो रहेगा ही, साथ-साथ बोनस में घरेलू सुख-शांति-सुकून तो हईए है ! 
  
@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से  

गुरुवार, 29 जनवरी 2026

पिगी बैंक में सूअर ही क्यों 🤔

ये चाहे मिट्टी से बनें हों, प्लास्टिक से या किसी भी दूसरी धातु से, बच्चों में अत्यंत प्रिय, इनका नाम पिगी बैंक ही होता है ! समय के साथ अब इनकी बनावट भी बदली है और यह विभिन्न आकारों-प्रकारों में मिलने लगा है ! पर भले ही इसका आकार-प्रकार और इसको बनाने में प्रयुक्त पदार्थ बदल गए हों, पर जो चीज नहीं बदली, वह है इसका बचपन से सीख देता आ रहा संदेश कि बचत  करना अच्छी बात है........!

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चपन से ही देखते आने के बावजूद हम में से कभी किसी ने सोचा कि बच्चों की छोटी-छोटी बचत के लिए जो गुल्लक होती है, ज्यादातर उसका रूप पिग यानी सूअर का ही क्यों होता है ? दुनिया में हाथी, शेर, बाज, मोर जैसे और भी बहुतेरे जानवर और परिंदे हैं उनका आकार क्यों नहीं अपनाया गया ? सबसे पहले इन गुल्लकों को ऐसा रूप कहां मिला इस पर भी मतभेद है ! भले ही यह सब तय करना कुछ मुश्किल हो, पर कुछ तथ्य तो उपलब्ध हैं ही !

आओ बचत करें 
मध्य युग में धातुएं के अत्यधिक मंहगा होने के कारण  यूरोप में पाइग (pygg) नाम की एक खास मिट्टी से प्लेटें इत्यादि बर्तन बनाए जाते थे। उसी समय कुम्हारों ने अपने छोटे सिक्कों को सुरक्षित रखने के लिए गुल्लक बनाई और उसे पिगी बैंक कहा जाने लगा। समय के साथ धीरे-धीरे, सहूलियत या भूलवश पाइग पिग होता चला गया और Pygg शब्द को Pig समझ लिया गया। इसीलिए आगे चल कर कुम्हार लोग पिग को ध्यान में रख सूअर रूपी गुल्लकें बनाने लग गए। लोगों, खासकर बच्चों को यह बदलाव बहुत पसंद आया और इसी लोकप्रियता के कारण यह शब्द ''पिगी बैंक'' भी प्रचलित हो गया। कुछ लोग इसका संबंध चीन, जर्मनी और इंडोनेशिया से भी जोड़ते हैं क्योंकि वहां भी प्राचीन काल के ऐसे बर्तन मिले हैं ! कुछ लोग मिटटी के नाम पर भी संदेह करते हैं, इसीलिए इसके उद्भव के बारे में निश्चित तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता !  

पिग 
भले ही इतिहास, जिज्ञासाएं, कथाएं, कुछ भी हों, आज पिगी बैंक का मतलब या पर्याय सिक्के जमा करने के लिए बने किसी भी आकार और रूप के उपकरण से हो गया है ! ये चाहे मिट्टी से बनें हों, प्लास्टिक से या किसी भी दूसरी धातु से, बच्चों में अत्यंत प्रिय, इनका नाम पिगी बैंक ही होता है ! समय के साथ अब इनकी बनावट भी बदली है और यह विभिन्न आकारों-प्रकारों में मिलने लगा है ! पर भले ही इसका आकार-प्रकार और इसको बनाने में प्रयुक्त पदार्थ बदल गए हों, पर जो चीज नहीं बदली, वह है इसका बचपन से सीख देता आ रहा यह संदेश कि बचत  करना अच्छी बात है और यह नियम लोगों के बड़े होने पर आदत में तब्दील होता चला जाता है !  

आधुनिक पिग्गी 
एक नजर उस पिग मिटटी से मिलते-जुलते नाम वाले पिग जैसे दिखने और अपने यहां पाए जाने वाले जीव पर भी ! भारत में पाए जाने वाले इस पिग को पिग्मी हॉग के नाम से जाना जाता है, जो असल में जंगली सूअरों की एक लुप्तप्राय प्रजाति है। अपने असम के राष्ट्रिय उद्यानों में इसे सुरक्षित रखा गया है ! घास के मैदानों में रहने वाला यह जीव अपनी थूथन से मिटटी खोद कर कंद, जंगली फल, केंचुए, दीमक जैसे कीटों को अपना आहार बनाता है और उसके इन्हीं उपक्रमों से मिटटी उपजाऊ होती चली जाती है ! 
पिग्मी हॉग 
अब यह तो प्रभु की माया और इच्छा है कि कौन-कब-कहां ख्याति प्राप्त करता है ! कैसे जंगल-जंगल घूमने वाला घर-घर में पैठ बना लेता है ! चलते-चलते एक मनोरंजक जानकारी, कोलकाता के सबसे प्रतिष्ठित इलाके, धर्मतल्ला यानी चौरंगी की लिंडसे स्ट्रीट पर 1874 में बना शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, न्यू मार्किट स्थित है ! इसका एक नाम हॉग मार्केट भी है ! बंगला भाषा में इसे हॉग साहेबेर बाजार भी कहा जाता है 😅

@संदर्भ और चित्रों के लिए अंतर्जाल का हार्दिक आभार 🙏  

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