गुरुवार, 20 नवंबर 2008

पेशोपेश में हूं, पप्पू बनूं या लल्लू

कल मतदान है और अभी तक तय नहीं कर पाया हूं कि पप्पू बनूं या लल्लू। जिस तरह हनुमानजी को उनकी शक्ति की याद दिलाई जाती थी, उसी तरह मुझ पर चहुं ओर से मत दो, मत दो के फर्ज बाण, विभिन्न माध्यमों से, छोड़े जा रहे हैं। कभी-कभी तो यही समझ में नहीं आता कि कहा क्या जा रहा है, मत दो या मत,दो। अजीब धर्म संकट है, मत दूं तो सदा की तरह लल्लू बनता हूं और मत,दूं तो पप्पू कहलाता हूं।

मेरे इलाके से पांच लोग 'उम्मीद' से हैं। एक थप्पड़, माफ कीजिएगा फिलहाल हाथ दिखा रहा है। जिसमे भाग्य रेखा ही नहीं है, लगता है कह रहा है, आईये ना हमारा भाग्य आप के ही हाथों में है। दूसरा अधखिला फूल लिए घूम रहा है, मानो कह रहा हो कि आप साथ देगें तो मेरी किस्मत का फूल भी खिल जाएगा। तीसरा हाथी पर सवार है। अब सीमित दृष्टि वाले इस विशालकाय जीव का क्या ठिकाना, पोरस की सेना ना बचा सकी अपने आप को तो मैं किस खेत का क्या हूं। एक का चिन्ह ऊंट है। जो कभी भी अपने मतलब के लिए कैसी भी करवट ले सकता है। और अंतिम, तिजोरी की पहचान वाला तो सबसे महान है जो गुहारे जा रहा है, कि कोई कुछ तो दे दो कि मैं बैठूं।

यह थी चिन्हों की बात। अब उनको धारण करने वालों पर नजर डालता हूं तो पाता हूं कि सारे के सारे अपनी आत्माओं की आवाज पर "जैसी बहे ब्यार पीठ पुनि तैसी किजे" की धुन पर नाचने वाले रहे हैं। सर्वशक्तिमान 'क' सारे प्रदेश को अपनी बपौती तथा जनता को अपना गुलाम समझते रहे हैं। जो जमीन, मकान, जगह पसंद आ गयी वह उनकी। जिधर भी बीस-पच्चिस सेकेंड टकटकी बांध देख लेते हैं वहां के मालिक को अपना भविष्य नजर आने लग जाता है। दल कपड़ों की तरह बदलते हैं। श्रीमान 'ख' अनगिनत पूजा समितियों तथा सर्वहारा संघ के अध्यक्ष हैं। उनके गुर्गे-चमचे यत्र-तत्र-सर्वत्र फैले रह कर लोगों को नेताजी के नाम को भूलने नहीं देते। उनके खौफ से धन की बरसात चेरापूंजी की याद दिलाती रहती है। पैसे गिने नहीं तौले जाते हैं। अब वह अपने कुलदीपक को इस लाईन का ककहरा सिखा रहे हैं। इनकी आत्मा बदलाव की हिमायती है। श्रीमान 'स' की मेधा सर्पेंनटाईन-लेन की तरह है। फूट डालने के इनके तरीकों को देख अंग्रेज भी चुल्लू भर पानी खोजने लग जायें। इंसान की हर कमजोरी इनकी ताकत है। यह अलग बात है कि समय, माहौल तथा परिस्थिति के अनुसार यह मोल्ड होते रहते हैं। और श्रीमान 'ह' के बारे में तो इतना ही कह सकता हूं कि "कल तक जिन्हें हिज्जे ना आते थे हमारे सामने, आज वो हमें पढ़ाने चले हैं, खुदा की शान है।"

इनके बीच फंसा मैं सोच रहा हूं कि क्या किया जाए। वोट रूपी लालीपाप को ले जाते वक्त उन सब की आंखों में कुटिल भावनायुक्त नकली सम्मान और लौटते वक्त उन्हीं आंखों और चेहरे पर फिर अपने लल्लू बनने के प्रमाण रूपी हंसी देखूं। या फिर, किस-किस को देखें, किस-किस को रोएं, चाय सुड़कते हुए, वन डे में अंग्रेजों को फिर धोएं। भले ही पप्पू बन कर।
अभी समय है। रुकता हूं फिर सोचता हूं। आप भी इस संकट काल में मुझे राह दिखा सकते हैं।

6 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

पप्पू से तो लल्लू ही बेहतर है लेकिन थप्पड के झांसे मत आ जाईयेगा

बेनामी ने कहा…

sahi kaha bhai
When you rearrange the letters
"ELECTION RESULTS"
U will get
"LIES - LET'S RECOUNT"

दिनेशराय द्विवेदी ने कहा…

वे तो हमें बने बनाए ही समझते हैं।

राज भाटिय़ा ने कहा…

वोट जरुर दे, जब सभी वॊट देगे तो यह हाथी उंट वाले समझ जायेगे कि अब वोट बेकं एक नही जिसे यह रिझाये,

Smart Indian ने कहा…

वोट तो देना ही चाहिए. उससे भी एक कदम आगे - अगर हो सके तो प्रत्याशी चयन को भी प्रभावित करना चाहिए.

Unknown ने कहा…

मैं भी इस पशोपेश में पड़ा था, पर अब नहीं. अब तो मैंने निश्चय कर लिया है कि वोट जरूर दूँगा. मेरे ब्लाग पर आइये और कुछ पोस्ट बांचिये, आपका भी संशय दूर हो जायेगा.
http://votersforum.blogspot.com

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