मंगलवार, 27 नवंबर 2018

पंजाब फिर बनेगा सिरमौर

पंजाब के दो दिन के प्रवास में जो भी देखा-पाया, वह प्रदेश के बारे में फैले या फैलाए गए दुष्प्रचार के बिल्कुल विपरीत था। हालांकि यह आकलन सिमित समय और दायरे का ही था पर हांडी में पक रहे चावलों का अंदाज उसके एक कण से ही लग जाता है। पर इसका अर्थ यह भी नहीं है कि वहां सब कुछ चाक-चौबंद या दुरुस्त है पर वैसा भी नहीं है जैसा पूरे देश को बताया जा  रहा था। पर ऐसा हुआ क्यों ? लोगों का मानना है कि  पहले आपसी सहयोग से ही खेती-खलिहानी होती थी। फिर जैसे प्रकृति में किसी जगह हवा गर्म हो ऊपर उठती है तो तत्काल आस-पास की वायु उस रिक्त स्थान की पूर्ति करने पहुंच जाती है, वैसे ही जब पंजाब के हर घर से लोग विदेश जाने लगे तो उसकी खानापूर्ति के लिए यू.पी., बिहार, यहां तक कि बांग्लादेशी भी अपनी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ रोजगार के सिलसिले में यहां आ बसे। शायद तभी से कुछ गलत आदतें यहां पनपी ! फिर भी पहले से हालात में बहुत सुधार हुआ है।  अच्छा लगा मोबाइल थामने की जगह बच्चों को दौड़ते-भागते-खेलते देख कर ................!

#हिन्दी_ब्लागिंग
वर्षों बाद पिछले हफ्ते पंजाब जाना हुआ। साथ थीं, तरह-तरह की आशंकाऐं, भ्रांतियां, गैर-जिम्मेदराना मिडिया द्वारा प्रदत्त, नशे और पंजाब को एक दूसरे का पर्याय बताने वाली उल्टी-सीधी जानकारियां,  पर वहां के दो दिन के प्रवास में जो भी देखा-पाया वह प्रदेश के बारे में फैले या फैलाए गए दुष्प्रचार के बिल्कुल विपरीत था। हालांकि यह आकलन सिमित समय और दायरे का ही था पर हांडी में पक रहे चावलों का अंदाज उसके एक कण से ही लग जाता है। पर इसका अर्थ यह भी नहीं है कि वहां सब कुछ चाक-चौबंद या दुरुस्त है पर वैसा भी नहीं है जैसा पूरे देश को बताया जा  रहा था। 

यात्रा के दौरान मुझे तीन गांवों में जाने का अवसर मिला। पहला अपने ननिहाल हदियाबाद, जो फगवाड़ा शहर से ड़ेढेक की. मी. की दूरी पर फगवाड़ा-नूरमहल रोड पर स्थित है, पर अब शहर का ही हिस्सा बन गया है। वहां जाने के लिए फगवाड़ा बस-अड्डे से कुछ आगे शुगर मिल से बाएं मुड़ते ही वह रामगढ़िया कालेज है, जहां फिल्म स्टार धर्मेंद्र ने अपनी शुरुआती पढ़ाई की थी, संयोगवश मेरे चाचाजी भी वहीं पढ़े थे। वहाँ मेरे बड़े मामाजी के दोस्त दो शिक्षक हैं, घर के कार्यक्रम में उनसे मिलना हुआ, कुछ देर बात की। गांव में भी पूरा दिन गुजरा, पर कहीं भी कुछ अस्वाभाविक जैसा नहीं लगा। उल्टे आत्मीयता, प्रेम, भाईचारे का ही माहौल मिला। वहाँ की तक़रीबन सौ साल पुरानी पाठशाला और सरकारी स्कूल के गुरुजनों से भी युवाओं के बारे में, पंजाब के हालात के बारे में बात हुई। पर किसी ने भी परिस्थिति को चिंताजनक नहीं बताया।

दूसरा पड़ाव था, जालंधर शहर के जमशेर कस्बे के पास का गांव, चननपुरा। यहां मेरे मौसाजी का पुश्तैनी घर है। भाई जीवन के साथ रात में वहीं बसेरा था। वहां का नजारा ही कुछ और था ! बढती ठंड के बावजूद रात के आठ-साढ़े आठ बजे गांव के बच्चे फ्लड लाइट में फ़ुटबाल खेल रहे थे। यहां अक्सर इस खेल की प्रतियोगिताएं होती रहती हैं। दूसरा दिन छुट्टी का था। अल-सुबह भी बच्चे खेल-कूद में व्यस्त दिखे ना कि मोबाइल में ! वहीं भाई के पडोसी स्थानीय वैद्य श्री विनोद जी ने प्रदेश में नशे इत्यादि के चलन को सिरे से तो नहीं नकारा, पर इस गांव में किसी के भी लती होने की या उनसे ऐसे किसी व्यक्ति के इलाज करवाने की किसी भी बात से इंकार किया। लत तो यहां मोबाईल की भी नहीं दिखी किसी में भी !

तीसरा पड़ाव था होशियारपुर के पास का एक और छोटा सा गांव रिहाणा-जट्टा, कभी देहात हुआ करता यह गांव आज सीवर युक्त पक्के मार्ग, अच्छे-खासे घरों, दुकानों, बिजली-पानी जैसी जरूरतों से युक्त साफ़-सुथरी जगह है। हमारे वहां पहुंचने पर घर का युवक, घर में बाइक होने के बावजूद सायकिल ले कर कुछ लाने निकला। जीतनी देर भी हम वहां रहे, किसी ने भी मोबाइल को हाथ नहीं लगाया। बाद में ध्यान दिया तो वहां अधिकांश लोग सायकिल का उपयोग करते दिखे। सुविधा व सम्पन्नता होने के बावजूद ! अच्छा लगा यह देख कर।

कार्यक्रम के दौरान एक सज्जन से भेंट हुई जो ''लवली यूनिवर्सिटी'' में प्रोफ़ेसर हैं। बातचीत के दौरान इशारों में ही वहां के युवा और नशे की बात छेड़ी तो उन्होंने बे-बाक हो कहा कि पहले आपसी सहयोग से ही खेती-खलिहानी होती थी। फिर लोगों में विदेश जाने का मोह बहुत बढ़ गया। फिर जैसे प्रकृति में किसी जगह हवा गर्म हो ऊपर उठती है तो तत्काल आस-पास की वायु उस रिक्त स्थान की पूर्ति करने पहुंच जाती है। वैसे ही जब पंजाब के हर घर से लोग विदेश जाने लगे तो उसकी खानापूर्ति के लिए यू.पी., बिहार, यहां तक कि बांग्लादेशी भी अपनी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ रोजगार के सिलसिले में यहां आ बसे। शायद तभी से कुछ गलत आदतें यहां पनपीं ! फिर भी पहले से हालात में बहुत सुधार हुआ है। यहां के मुख्य मंत्री #कैप्टन_अमरिंदर_सिंह इस बारे में बहुत गंभीर हैं और पूरी तरह प्रदेश को नशे की गिरफ्त से छुटकारा दिलाने को प्रतिबद्ध हैं। कानून-व्यवस्था भी काफी सुधरी है। आशा है पंजाब फिर अपना खोया गौरव प्राप्त कर लेगा, जल्दी।

अपनी इस संक्षिप्त यात्रा में एक बात जो सबसे अच्छी लगी वह यह कि छोटे से छोटे गांवों में भी खेलने के लिए अच्छे-खासे मैदान उपलब्ध कराए गए हैं, बिजली की सुविधा के साथ। वहाँ के बच्चे-युवा-युवतियां भी खेलों में रूचि रखते हैं जो एक सकारात्मक निशानी है, लोगों के जागरूक होने की। तसल्ली यह भी हुई कि पंजाब के हालात सुधार की ओर हैं। वैसे नशाखोरी कहां नहीं होती हमारे देश में ! कुछ प्रदेशों में तो शराब वितरण भी वहाँ की सरकारें ही करती हैं। और तो और देश की राजधानी की हालत भी बहुत अच्छी तो नहीं ही कही जा सकती ! इसलिए इस जहर से अपनी नस्लों-पीढ़ियों को बचाने की मुहीम आम जनता को ही छेड़नी पड़ेगी, बिना सरकार का मुंह जोहे !  

सोमवार, 26 नवंबर 2018

'तूँ प्रकाशो दा मुंडा वें ?''.......मेरे पंजाब की बात ही कुछ और है

''काका; सुणीं !'' मैंने मुड कर देखा, एक घर के दरवाजे में बैठीं,  एक बुजुर्ग-वृद्ध महिला मेरी ओर मुखातिब थीं ! मैं उनके पास गया पंजाबी तहजीब के अनुसार उनके चरण स्पर्श किए, उन्होंने ढेरों आशीर्वाद देने के बाद पूछा ''तूँ प्रकाशो दा मुंडा हैं ना; गोगी ?''  प्रकाशवती मेरी माताजी का नाम है और वहां मेरे बचपन का नाम गोगी ही था। माँ का स्वर्गवास हुए दो साल हो चुके हैं। वे भी मेरे साथ ही वर्षों पहले वहां गयीं थीं। मेरा चौंकना स्वाभाविक था, एक तो इतने लंबे अंतराल के बाद मेरा वहां जाना हुआ था, दूसरे वृद्धावस्था में ऐसे ही यादाश्त कमजोर हो जाती है, तीसरा समय के साथ-साथ चेहरे-मोहरे में अनेकों परिवर्तन हो जाते हैं ! चौथा वे हमारे परिवार की सदस्य नहीं थीं, चार-पांच घर छोड़, पडोसी थीं; फिर भी मुझे पहचान रही थीं ...............!

#हिन्दी_ब्लागिंग     
पिछले हफ्ते, करीब सोलह-सत्रह साल बाद अपने ननिहाल हदियाबाद जाने का मौका मिला। इतने सालों में पंजाब तो दो बार गया था, पर यहां नहीं जा पाया था। इस यात्रा के दौरान मुझे दो-तीन जगह सुदूर गावों में जाने का अवसर प्राप्त हुआ। पहला तो अपने ननिहाल हदियाबाद, जो फगवाड़ा शहर से ड़ेढेक की. मी. की दूरी पर फगवाड़ा-नूरमहल रोड पर स्थित है, पर अब शहर का ही हिस्सा बन गया है। वहीं मेरे बड़े और छोटे मामाजी के विदेश गए सदस्यों में बचे हुए सदस्य रहते हैं। दोनों घरों में कुछ ही मीटर का फैसला है। पंजाब के बाहर रहते हुए इन दिनों तरह-तरह की फैली या फैलाई जा रही अफवाहें, खबरें, भ्रामक जानकारियां मिलने-जानने-सुनने की वजह से मन कुछ आशंकित सा था। पर वहां पहुंच कर जो माहौल मिला वह सिर्फ आत्मीयता, प्रेम, वात्सल्य का ही था। वहां के एक नहीं दो-दो वाकयों ने मेरी आँखें नम कर दीं। जिन्हें शायद ही कभी भूल पाऊं ! 

हुआ कुछ यूं कि हदियाबाद के कार्यक्रम के दौरान मैं एक घर से दूसरे घर जा रहा था कि पीछे से आवाज आई ''काका; सुणीं !'' मैंने मुड कर देखा, एक घर के दरवाजे में बैठीं,  एक बुजुर्ग-वृद्ध महिला मेरी ओर मुखातिब थीं ! मैं उनके पास गया पंजाबी तहजीब के अनुसार उनके चरण स्पर्श किए, उन्होंने ढेरों आशीर्वाद देने के बाद पूछा ''तूँ प्रकाशो दा मुंडा हैं ना; गोगी ?''  प्रकाशवती मेरी माताजी का नाम है और वहां मेरे बचपन का नाम गोगी ही था। माँ का स्वर्गवास हुए दो साल हो चुके हैं। वे भी मेरे साथ ही वर्षों पहले वहां गयीं थीं। मेरा चौंकना स्वाभाविक था, एक तो इतने लंबे अंतराल के बाद मेरा वहां जाना हुआ था, दूसरे वृद्धावस्था में ऐसे ही यादाश्त कमजोर हो जाती है, तीसरा समय के साथ-साथ चेहरे-मोहरे में अनेकों परिवर्तन हो जाते हैं ! चौथा वे हमारे परिवार की सदस्य नहीं थीं, चार-पांच घर छोड़, पडोसी थीं; फिर भी मुझे पहचान रही थीं ! भावुक मन और नम आँखें लिए कुछ देर उनके पास बैठा, उतनी ही देर में पचास-साठ सालों का इतिहास ताजा हो गया। फिर इजाजत ले उठ तो गया, पर अभी भी मन में यह बात घुमड़ रही है कि शहरों में बीसियों साल रहने के बाद भी जहां आपकी ज्यादातर पहचान आपके सरनेम या आपके मकान नंबर से ही होती है वहीं सुदूर गांव की एक पड़ोसी महिला को भी पचास-साठ साल बाद भी आपकी माँ और आपका नाम चेहरे समेत याद रहता है ! 

दूसरा वाकया भी ऐसा ही हैरतंगेज था। दूसरे दिन मेरा अपने मौसा जी के बड़े बेटे जीवन तथा उनकी पत्नी सुषमा  जी के साथ उनकी बुआजी के घर जाना हुआ। वे होशियारपुर के पास एक गांव में रहती हैं, मुझे नहीं याद कि मैं उनसे कब मिला था ! शायद चालीस साल पहले इन्हीं भाई की शादी में ! पर उन्हें नब्बे से ज्यादा की उम्र में भी मेरी पहचान थी, सिर्फ एक बार याद दिलाना पड़ा था कि कलकत्ते वाली मासीजी के बेटे हैं ! बस; सब कुछ याद आ गया था ! मेरा नाम तक ! अब वहां से आना मुश्किल ! रात रहने की जिद ! वर्षों बाद मिलने की दुहाई ! 

सोचता हूँ क्या है यह ? कौन सा अपनत्व है ? कौन सा लगाव है ? कौन सी ममता है ? कौन सा रिश्ता है जो वर्षों बाद मिले दूर-दराज के रिश्ते के लोगों को भी गले लगा, अपना वात्सल्य उड़ेलने को तत्पर रहता है ? आज जहां सगे भाई-बहन अपना फर्ज भूलाए बैठे हों वहाँ यह पीढ़ी जग को अपना बनाने से परहेज नहीं करती। आधुनिकता और कमाई की होड़ में जहां आज माँ-बाप से बात तक करने की फुर्सत नहीं मिलती वहीं कुछ लोगों को अपने पराये का भेद ही मालुम नहीं हैं ! यही फर्क है आजकी और पुरानी पीढ़ी का  ! यही फर्क है शहर और गांव का ! यही फर्क है आधुनिकता और पुरातनता का ! यही फर्क है दिल और दिमाग का ! 

गुरुवार, 22 नवंबर 2018

ब्लैक फ्राइडे, अजीब से नाम वाला एक खरीददारी दिवस

इस दिन से ही अमेरिका और कुछ यूरोपीय देशों में क्रिसमस की खरीददारी की शुरुआत होती है। इस दिन बडी-बडी कंपनियां तरह-तरह के ऑफर तो देती ही हैं, बाजार के छोटे तथा खुदरा व्यापारी भी ग्राहकों को लुभाने और खरीदने को प्रेरित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। पिछले कई सालों से यह दिन खरीददारी का सबसे व्यस्त, बड़ा और लाभप्रद दिन माना जाता है। इसकी कुछ-कुछ तुलना हम अपने यहां के ''धन तेरस'' या चीन के "सिंगल या बैचलर डे''  से कर सकते हैं पर बिक्री के लिहाज से इसकी कोई बराबरी नहीं है.........!

#हिन्दी_ब्लागिंग     
पश्चिमी देशों में बाइबल से जुड़े होने के कारण शुक्रवार का एक अलग महत्व तो है ही उसके अलावा सप्ताहंत दिवस होने के कारण भी यह महत्वपूर्ण हो जाता है, और यदि वह किसी उत्सव से जुड़ जाए तो ? ऐसा ही एक शुक्रवार है ''ब्लैक फ्राइडे'' यानी काला शुक्रवार ! नाम जरूर अजीब है पर इस दिन से ही वहां क्रिसमस की खरीदारी की शुरुआत होती है। इस दिन बडी बडी कंपनियां तरह-तरह के ऑफर तो देती ही हैं, बाजार के छोटे तथा खुदरा व्यापारी भी ग्राहकों को लुभाने और खरीदने को प्रेरित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। पिछले कई सालों से यह दिन खरीददारी का सबसे व्यस्त, बड़ा और लाभप्रद दिन माना जाता है। इसकी कुछ-कुछ तुलना हम अपने यहां के ''धन तेरस'' या चीन के "सिंगल या बैचलर डे''  से कर सकते हैं पर बिक्री के लिहाज से इसकी कोई बराबरी नहीं है।


अमेरिका का एक दिन है थैंक्स-गिविंग डे यानि धन्यवाद दिवस ! जो नवंबर के चौथे गुरुवार को मनाया जाता है। यह हमारे यहां मनाए जाने वाले फसल पर्व की तरह ही है। वहां नवंबर तक फसलों की कटाई हो जाती है, इस काम में आपसी सहयोग के लिए, एक-दूसरे का आभार जताने के लिए इसे मनाते हैं। यह वहां का राष्ट्रीय पर्व है।  इसीके अगले दिन को ब्लैक फ्राइडे कहते हैं, जो तक़रीबन 23 और 29 नवम्बर के बीच आता है। इसी दिन से पारंपरिक तौर पर क्रिसमस की खरीदारी की शुरुआत होती है। इस मोके पर कई विक्रेता अपनी दुकानें बहुत जल्दी, अक्सर 4.00 बजे सबेरे या उससे भी पहले खोल लेते हैं और बिक्री बढ़ाने और ग्राहकों को लुभाने के लिए तरह-तरह के प्रलोभन यथा, ब्‍लैक फ्राइडे डील, स्‍पेशल सेल, क्रिसमस छूट जैसे ऑफर मार्केट में पेश करते हैं। कुछ खुदरा विक्रेता तो इस तिमाही में इतना कमा लेते हैं कि उन्हें वर्ष भर का मुनाफ़ा मिल जाता है। ब्लैक फ्राइडे अमेरिका में एक उत्‍सव की तरह मनाया जाता है। वैसे यह छुट्टी का दिन नहीं होता लेकिन बहुत से नियोक्ता अपने कर्मचारियों को इस दिन छुट्टी दे देते हैं जिससे बाजार में ग्राहकों की संख्या में कई गुना इजाफा हो जाता है।




अब सवाल यह है कि जब यह ग्राहकों के लिए खरीदारी, मौज-मस्ती वाला दिन है, अगर यह दिन खुदरा विक्रेताओं के लिए वर्ष की बिक्री का सबसे बड़ा दिन है तो इसे ब्लैक फ्राइडे क्यों कहा जाता है ? देखा जाए तो यह नाम उन लोगों द्वारा पड़ा, जिनकी मुसीबत इस दिन बढ़ जाती है ! चूँकि यह दिन वर्ष का सबसे व्यस्त खरीदारी का दिन होता है और लगता है, जैसे देश का हर वाशिंदा कुछ न कुछ खरीदने को बाजार में आ निकला है ! लोग जमकर खरीदारी का आनंद लेते हैं, जैसे आज नहीं तो फिर नहीं। इसी कारण वहां गलियों, सड़कों, दुकानों, बाजार-हाट में इतनी भीड़ बढ़ जाती है कि व्यवस्था बनाए रखना और उसे संभालना, यातायात को सुचारु बनाए रखना पुलिस के लिए दूभर हो जाता है। सार्वजनिक वाहनों का चलना-चलाना कष्टसाध्य हो जाता है। दुकानों के रास्ते जाम हो जाते हैं, स्वचालित सीढ़ियों पर लोगों का अंबार लग जाता है, बेकाबू भीड़ का कोई ओर-छोर नहीं होता ! इसी वजह से कई असामान्य व प्रतिकूल परिस्थितियां भी बन जाती हैं, जिनकी वजह से  पुलिस की मुसीबतें-परेशानियां और दिनों की अपेक्षा ज्यादा बढ़ जाती हैं। टैक्सी और बस चालक घंटों जाम में फसे रहने के कारण इस दिन को मुसीबत भरा, सिर दर्द व तनाव बढ़ाने वाला मानते हैं ! उनके अलावा इस दिन परेशान होने वाले वे लोग भी हैं जो दुकानों इत्यादि में काम करते हैं, इस दिन उन्हें अतिरिक्त मेहनत से बिना थके काम करना पड़ता है ! यह कर्मचारियों के लिए कड़ी मेहनत का एक लंबा दिन होता है। इन्हीं सब के चलते इस दिन को ये सब लोग 'ब्लैक फ्राइडे' कहने लग गए जो धीरे-धीरे इस दिन का पर्याय ही बन गया।


विदेशी वस्तुओं, फैशन, रहन-सहन और आयातित त्योहारों की तरह भले ही हम इसे भी अपने यहां मनाने लग जाएं पर दुनिया के कई देश इस दिन को फिजूल और बिना जरुरत की खरीददारी से जोड कर देखते हुए इसे  ''बाय नथिंग डे'' के रूप में मनाते हैं। इस दिन ख़ासकर खरीददारी का विरोध किया जाता है। लोग अपने क्रेडिट कार्ड्स तक को जला देते है और खरीददारी न करने का भी मैसेज प्रचारित-प्रसारित करते हैं ! दुनिया के करीब 65 देश इस दिन को नकारात्मक दिवस के रूप में मनाते है। जिनमें जापान, नीदरलैंड, नार्वे, फ्रांस और युनाइटेड किंगडम जैसे देश शामिल हैं। काश ! हम ''उनसे'' नहीं ''इनसे'' कुछ सीखें ! 

मंगलवार, 20 नवंबर 2018

जयंति, पुण्यतिथि वही, जिससे राजनितिक लाभ मिल सके !

किसी को सरोजिनी नायडू, अरुणा आसफ अली, भीकाजी कामा, कमला देवी चट्टोपाध्याय जैसी अनेकानेक महिलाओं के बारे में भी कुछ जानकारी है ? क्या इन आदरणीय महिलाओं का देश की स्वतंत्रता की लड़ाई में दिया गया योगदान किसी को भी याद नहीं ! या फिर इनकी जंयती या पुण्यतिथि कोई राजनितिक लाभ नहीं दे सकती इसलिए इन्हें याद ही नहीं किया जाता ! इस ओर तो कभी महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिलवाने का शोर मचाने वाले, महिलाओं की हालत पर ग्लिसरिनी आंसू बहाने वाले, तथाकथित लेखक-लेखिकाओं, बुद्धिजीवियों, नाट्य-कर्मियों की तरफ से कोई बयान पढ़ा-सुना नहीं ! ऐसा क्यूँ ? क्या सिर्फ इसलिए क्यूंकि उससे नाहीं दाम मिलता है ना हीं नाम ! नाहीं कोई ''फ़ायदा''..................!

#हिन्दी_ब्लागिंग   
होता होगा किसी जमाने में राजनीती का मतलब देश की सेवा और देशवासियों का उत्थान ! पहले भी मताविरोध होता था, सबका अलग-अलग नजरिया था, अलग-अलग सोच भी थी, पर पक्ष-विपक्ष का ध्येय एक ही होता था, देश की तरक्की और देशवासियों को खुशहाली। पर आज यह अधिकाँश के लिए सिर्फ अपना और अपने कुटुंब को तारने का जरिया हो गया है। हर तरफ झूठ, फरेब, धोखा, छल का बोलबाला नजर आता है। ना कोई आस्था बची है ना हीं कोई निष्ठा ! ना किसी का लिहाज नाहीं किसी का सम्मान ! हरेक को सिर्फ सत्ता चाहिए ! वह भले ही कहीं से, किसी भी तरह, किसी के द्वारा भी मिले ! हालात ऐसे हो गए हैं कि कोई सच भी बोलता है तो लोग शक करने लगते हैं। कोई ईमानदारी से काम करना चाहता है तो उसमें भी खोट खोजा जाने लगा है। 

आज लोगों का विश्वास पूरी तरह से नेता बिरादरी से उठ गया है। ज्यादातर लोग उनकी चालों को समझने लगे हैं। उनके कहने को कोई गंभीरता से नहीं लेता ! ये बात महानुभाव लोग भी समझ गए हैं इसीलिए इन दिनों एक नया चलन सामने आया है ! वह यह कि चुनाव इत्यादि के समय, साफ़-सुथरी छवि वाले, किसी नामी खानदान से जुड़े, अराजनीतिक लोगों से कोई ऐसी बात कहलवाना जिससे उकसाने वाले की मंशा पूरी हो जाए ! इससे अजीब सा माहौल हो गया है ! कोई भी उठ कर कुछ भी कहने लगता है ! जैसे, नियत कुछ भी हो, अभी भाजपा ने ग्वालियर की राजमाता सिंधिया की जन्मशती मनाई। ग्वालियर कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा की सीट है। उसे लगा होगा कि कहीं चुनावी ऊंट करवट ना बदल दे ! पर इस आयोजन का विरोध भी नहीं किया जा सकता। पर कुछ तो होना ही चाहिए था, शायद इसी लिए  अब एक व्यक्तव्य तारा भट्टाचार्य, की तरफ से आया या दिलवाया गया है कि ''मोदी सरकार राजमाता सिंधिया की जन्मशती मना रही है लेकिन ''कस्तूरबा गांधी जी'' की 150वीं जयंती मनाने के लिए कोई राष्ट्रीय समिति नहीं बनी !''

अभी सरदार पटेल की मूर्ति का विवाद थमा नहीं है, जिसमें बार-बार भाजपा पर आरोप लगता है कि उसने कांग्रेस के नेता को अपना बनाने की कोशिश की है। तो यदि इधर से कस्तूरबा जी की 150 जयंती का आयोजन भी कर दिया जाए तो विघ्नसंतोषी क्या गांधी जी का भी भगवाकरण करने का आरोप नहीं लगाएंगे ? क्योंकि गंदी राजनीती ने देश तो देश, नेताओं को भी बाँट कर रख दिया है। अब उनके कर्मों, उनके देश के लिए किए गए बलिदान, उनके त्याग की बात नहीं देखि जाती, सिर्फ उनके समय उनकी पार्टी को देख-दिखा कर उनका दर्जा तय किया जाता है। इसके साथ ही सवाल यह भी उठता है कि क्या इसके पहले ''बा'' की 50वीं या 100वीं जयंती मनाई गयी थी ? जो इसी बार अनदेखा होने की बात की जा रही है ! क्या इस बारे में कोई प्रस्ताव भेजा गया था या सिर्फ मौके को ताड़ कर आलोचना शुरू कर दी गयी है ! ज्यादा संभावना तो इसी बात की है कि चुनाव के कारण राजमाता के कार्यक्रम का विरोध भारी पड़ जाएगा इसलिए  इस बात को कहलवाया गया है ! जिसने भी यह बात उठवाई है क्या उसे सरोजिनी नायडू, अरुणा आसफ अली, भीकाजी कामा, कमला देवी चट्टोपाध्याय जैसी महिलाओं के बारे में भी कुछ जानकारी है ? ये तो कुछ नाम हैं, ऐसी अनगिनत महिलाओं ने अपनी जान, घर, परिवार की चिंता किए बगैर अपने आप को स्वतंत्रता के लिए होम कर दिया ! इसके बदले में उनके परिवार ने भी कभी देश से कुछ नहीं चाहा ! शायद इसी कारण उन्हें भुला भी दिया गया ! पर जिनके नाम याद भी हैं, उन आदरणीय महिलाओं की किसी को भी याद नहीं आती ? या फिर इनकी जंयती या पुण्यतिथि कोई राजनितिक लाभ नहीं दे सकती इसलिए इन्हें याद ही नहीं किया जाता ! इस ओर तो कभी महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिलवाने का शोर मचाने वाले, महिलाओं की हालत पर ग्लिसरिनी आंसू बहाने वाले, तथाकथित लेखक लेखिकाओं, बुद्धिजीवियों, नाट्य-कर्मियों की तरफ से कोई बयान पढ़ा-सुना नहीं ! ऐसा क्यूँ ? क्या सिर्फ इसलिए क्यूंकि उससे नाहीं दाम मिलता है ना हीं नाम ! नाहीं कोई ''फ़ायदा'' !
इस पर भी कभी कोई सोचेगा, बात उठाएगा, धरना देगा ! शायद नहीं !!  

सोमवार, 19 नवंबर 2018

विश्व टॉयलेट दिवस

यदि खुले में शौच जाना बंद हो जाए तो हर साल करीब सवा दो करोड़ जानें बचाई जा सकती हैं ! एक सर्वे के अनुसार सौ ग्राम इंसानी मल में करीब दो अरब हानिकारक परजीवी कीटाणु-जीवाणु पाए जाते हैं। अंदाज लगाया जा सकता है कि हम जाने-अनजाने कितना विष रोज वातावरण में घोलते जाते हैं। पहले की बात अलग थी आबादी काफी कम हुआ करती थी। लोग खेतों-जंगलों में निवृत हो आते थे तो प्रकृति संभाल लेती थी। पर अब जब जंगलात वगैरह खत्म हो रहे हैं, खेतों में रसायनों का चलन बढ़ रहा है तो उन्हें और दूषित कर हम अपराध ही तो कर रहे हैं..........! 

#हिन्दी_ब्लागिंग    
आज  विश्व टॉयलेट दिवस है। इसे प्रत्येक वर्ष आज के ही दिन 19 नवंबर को इस उद्देश्य के साथ मनाया जाता है कि लोगों को गंदगी के खिलाफ जागरूक किया जाए, उन्हें स्वच्छता का महत्व बताया जाए जिससे असमय इंसानी गंदगी से होने वाली करोड़ों जानों को असमय कालल्वित होने से बचाया जा सके ! इसी दिन 19 नवंबर 2001 को सिंगापुर में जैक सिम नाम के एक जागरूक इंसान ने 15 सदस्य देशों के साथ एक
अंतरराष्ट्रीय गैर-लाभकारी संस्था ''विश्व शौचालय संगठन'' की शुरूआत की थी। इसी संस्था ने दुनिया के कई देशों में लोगों को जागरुक करने के लिए विश्व शौचालय सम्मेलन आयोजित किए। जिससे प्रभावित हो कर बारह साल बाद संयुक्त राष्ट्र ने मान्यता दी। उन्हीं के अनुसार आज भी विश्व की तकरीबन ढाई अरब की आबादी को पर्याप्त स्वच्छता मयस्सर नहीं है ! इसके अलावा करीब एक अरब लोग खुले में निवृत होने को मजबूर हैं, जिनमें से लगभग आधे हमारे देश में ही हैं ! इस विवशता के कारण सबसे ज्यादा परेशानी महिलाओं और बालिकाओं को होती है।दुनिया में हर तीन में से एक महिला को सुरक्षित शौचालय की सुविधा उपलब्ध नहीं है। खुले में जाने से बीमारियां तो फैलती ही हैं पर्यावरण भी दूषित होता है। इसी कारण, देर से ही, सरकार द्वारा चलाए गए स्वच्छ भारत अभियान का स्वागत होना चाहिए ! पर उसके पूर्णतया सफल होने में कुछ दिक्कतें भी आ रही हैं। पहली तो सरकारी अमले की तरफ से ही है ! अपना ''टारगेट'' पूरा करने के लिए आधे-अधूरे शौचालयों का निर्माण, जो बने भी हैं उनमें पानी अनुपलब्धता, जल-मल का अनुचित प्रबंधन ! इसके साथ ही हमारे लोगों की मानसिकता भी एक अड़चन है, जिनके मुताबिक खुले में शौच जाना ज्यादा सुविधाजनक उपाय है।



यह तो बाहर-अंदर की बात हुई ! एक और बहस तकनिकी पर भी जोरों-शोरों से चल रही है और वह है कि कौन सा टायलेट या ढंग, शौच जाने के लिए बेहतर है, योरोपियन या भारतीय ! इसमें भारतीय पद्यति के पक्ष में कुछ बातें जाती हैं, जैसे उकडूँ बैठ कर निवृत होने की क्रिया प्राकृतिक मुद्रा है। इसमें तो दो राय नहीं है: प्रकृति ने भी माँ के गर्भ में जीव को उँकड़ू हो कर ही पलने दिया है। इस मुद्रा में जाघों का दवाब आँतों पर पड़ने से पेट ठीक से साफ़ होता है। इससे आँतों की क्रियाशीलता बढ़ती है। कब्ज की शिकायत नहीं रहती। पाचन ठीक से होता है और सबसे बड़ी बात आँतों के कैंसर की संभावना कम हो जाती है। कमोड से शरीर के ज्यादा हिस्से का सम्पर्क नहीं होने से यह स्वास्थ्यप्रद भी है। इसमें थोड़ी वर्जिश भी हो जाती है। गर्भवती महिलाओं के लिए भी यह लाभदायक होता है। इन बातों को तो अब योरोप के डॉक्टर भी मानने लगे हैं। हाँ एक बात इसके विरुद्ध यह जाती है कि ज्यादा उम या किसी रोग से कमजोर पुरुषों व महिलाओं को इस पर बैठ कर उठने में बहुत कष्ट होता है। ऐसे लोगों या उनके लिए जो किसी भी कारणवश सीट वाले टॉयलेट का उपयोग नहीं छोड़ना चाहते वे अपने पैरों के नीचे एक सात-आठ इंच ऊंचा स्टूल रख लें जिससे घुटने कुछ दवाब के साथ पेट से जा लगें। इससे सीट पर बैठने से होने वाली समस्याओं का कुछ हद तक निदान हो सेहोने वाली समस्याओं का कुछ हद तक निदान हो जाएगा।



एक सर्वे के अनुसार यदि खुले में शौच बंद हो जाए तो हर साल करीब सवा दो करोड़ जानें बचाई जा सकती हैं। उनके अनुसार सौ ग्राम इंसानी मल में करीब दो अरब हानिकारक परजीवी कीटाणु-जीवाणु पाए जाते हैं। अंदाज लगाया जा सकता है कि हम जाने-अनजाने कितना विष रोज वातावरण में घोलते जाते हैं। पहले की बात अलग थी आबादी का थी लोग खेतों जंगलों में निवृत हो जाते थे तो प्रकृति संभाल लेती थी। पर अब जब जंगलात वगैरह खत्म हो रहे हैं, खेतों में रसायनों का चलन बढ़ रहा है तो उन्हें और दूषित कर हम अपराध ही तो कर रहे हैं। 

इस बारे में लोगों की सोच तो बदलते-बदलते ही बदलेगी। पर अभी सभी का ध्यान ऐसे शौचालयों के निर्माण की ओर हैं जो पर्यावरण मित्र भी हों और उनमें पानी की खपत भी ना हो ! क्योंकि अभी दूर-दराज के क्षेत्रों में, जहां ना ''सीवरेज'' की सुविधा होती ही नहीं पाइपों द्वारा जल-मल को दूर भेजा जा सकता है ! गड्ढे इत्यादि बना कुछ तो हल निकलता है पर उसमें भी दसियों दिक्कतें रहती ही हैं। इसलिए शौचालय तो बन जाते हैं पर निस्तारण की समस्या खड़ी हो जाती है। सारे संसार में इस ओर कोशिशें हो रही हैं कुछ देशों ने अति आधुनिक व्यवस्था खोज भी ली है। आशा है जल्दी ही इस विश्व-व्यापी समस्या का निदान हो जाएगा। 

गुरुवार, 15 नवंबर 2018

प्रणाम, एक प्रभावी प्रक्रिया, इसकी आदत बचपन से ही डालें

यदि बचपन से ही बड़ों के पैर छू कर उनका आशीर्वाद लेने के संस्कार बच्चों में डाले जाएं तो घरों में कभी भी अप्रिय स्थिति बनने की नौबत ही ना आए। अनुशासन बना रहे, क्रोध व अहंकार को स्थान ना मिले, आदर-सत्कार की भावना प्रबल हो जाए । यह सिर्फ कहने की नहीं आजमाने की बात है। यदि घर का नियम हो कि हर छोटे सदस्य को सुबह उठते ही सबसे पहला काम बड़ों का आशीर्वाद लेना है तो विगत रात चाहे जैसा भी भारी माहौल रहा हो, किसी कारण कटुता  फ़ैल गयी हो, कुछ मनमुटाव ही क्यों ना हो गया हो यदि घर के बच्चे  सुबह-सबेरे बड़ों के चरण स्पर्श करते हैं तो ऐसा कोई भी बुजुर्ग सदस्य नहीं होगा जो सब कुछ भूल निर्मल मन से आशीर्वाद ना दे ! बस यहीं से सब कुछ ''नार्मल'' हो जाता है और घर में शांति स्थाई हो जाती है। हमारे ग्रंथों में कहा भी गया है कि जो व्यक्ति रोज बड़े-बुजुर्गों के सम्मान में प्रणाम और चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करता है, उसकी उम्र, विद्या, यश और शक्ति बढ़ती ही जाती है ...........!       


#हिन्दी_ब्लागिंग           

अपने से बड़ों का अभिवादन करने के लिए चरण छूने की परंपरा हमारे यहां सदियों से चली आ रही है। अपने से बड़े के आदर स्वरुप उनके चरण स्पर्श करना बहुत उत्तम माना गया है। शास्त्रों में भी कहा गया है कि रोज बड़ों के चरण स्पर्श करके उनसे आशीर्वाद लेने से घर में सुख-शांति तथा समृद्धि का वास होता है। विशेष
तौर पर जब आप किसी जरूरी काम से कहीं जा रहे हों या कोई नया काम शुरू कर रहे हों, कोई ख़ास दिन या त्यौहार हो तब तो जरूर ही। आज के तथाकथित विद्वान या अपने को आधुनिक मानने वाले लोग इस पर विश्वास करें न करें पर जब भी हम किसी का झुक कर चरण स्पर्श करते हैं तो हम में विनम्रता का भाव आ जाता है, हम विनीत हो जाते है, नम्र हो जाते हैं जिससे हमारे शरीर की उर्जा की नकारात्मकता श्रेष्ठ व्यक्ति में पहुंचकर नष्ट हो जाती है, तथा उनकी सकारात्मक ऊर्जा आशीर्वाद के रूप में हमें मिल जाती है। पर इसके लिए हमारे मन में अपने बड़ों के प्रति, अपने गुरुजनों के प्रति श्रद्धा जरूर का होना जरुरी होता है। चरण स्पर्श करते समय हमेशा दोनों हाथों से दोनों पैरों को छूना चाहिए। एक हाथ से पांव छूने के तरीके को शास्त्रों में गलत बताया गया है।


आज घर-बाहर जो बड़ों के प्रति अवहेलना, तिरस्कार, अपमान जैसी परस्थितियां देखने में आती हैं उसका एक कारण जाने-अनजाने की गयी उनकी उपेक्षा भी है। यदि बचपन से ही बड़ों के पैर छू कर उनका आशीर्वाद लेने के संस्कार बच्चों में डाले जाएं तो घरों में कभी भी अप्रिय स्थिति बनने की नौबत ही ना आए, अनुशासन बना रहे, क्रोध व अहंकार को स्थान ना मिले, आदर-सत्कार की भावना प्रबल हो जाए। यह सिर्फ कहने की नहीं आजमाने की बात है। यदि घर का नियम हो कि हर छोटे सदस्य को सुबह उठते ही सबसे पहला काम बड़ों का आशीर्वाद लेना है तो विगत रात चाहे जैसा भी भारी माहौल रहा हो, किसी कारण कटुता  फ़ैल गयी हो, कुछ मनमुटाव ही क्यों ना हो गया हो यदि घर के बच्चे बड़ों के चरण स्पर्श करते हैं तो ऐसा कोई भी बुजुर्ग सदस्य नहीं होगा जो सब कुछ भूल निर्मल मन से आशीर्वाद ना दे ! बस यहीं से सब कुछ ''नार्मल'' हो जाता है। ग्रंथों में कहा भी गया है कि जो व्यक्ति रोज बड़े-बुजुर्गों के सम्मान में प्रणाम और चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करता है, उसकी उम्र, विद्या, यश और शक्ति बढ़ती जाती है। 

हमारे महान ग्रंथों में भी प्रणाम की महत्ता बताई गयी है। रामायण में तो प्रभू खुद ही गुरुजनों को आगे बढ़ प्रणाम कर एक आदर्श हमारे सामने रखते हैं। यहां तक की अपने सबसे बड़े बैरी रावण के अंतिम समय में लक्ष्मण जी को उसके पास ज्ञान-अर्जन के लिए जाने को कहते हैं तो उन्हें पहले प्रणाम करने की सीख दे कर भेजते हैं।

महाभारत में जब भीष्म अगले दिन पूरे पांडवों के वध की कसम लेते हैं तो श्री कृष्ण द्रौपदी को उनके पास ले जाकर प्रणाम करवा उसे अखंड सौभाग्यवती होने के वरदान दिलवा पांडवों की रक्षा करवाते हैं। साथ ही अत्यंत दुःख के साथ कहते हैं कि यदि दोनों परिवारों की स्त्रियां अपने और एक-दूजे के वरिष्ठ व गुरुजनों को प्रणाम किया करतीं तो यह युद्ध कभी भी नहीं होता। 

एक प्रणाम से तो ऋषि मार्कण्डेय जी, जिनका अल्पायु योग था ख़त्म हो गया था। जब उनके पिता महामुनि मृकण्डु को यह बात पता चली तो उन्होंने उनका जनेऊ संस्कार कर खा कि जो भी तुम्हारे सामने पड़े उसके सामने तुम झुक कर प्रणाम कर आशीर्वाद लेना। मार्कण्डेय जी ने पिता की आज्ञा शिरोधार्य कर वैसा ही करना शुरू कर दिया। ऐसे ही एक दिन उनके सामने सप्तऋषि आ गए मार्कण्डेय जी ने झुककर सप्तऋषियों का चरण स्पर्श किया। अनजाने में सप्तऋषियों ने मार्कण्डेय जी को दीर्घायु का आशीर्वाद दे दिया। जब उन्हें पता चला कि मार्कण्डेय जी अल्पायु हैं तो वे चिंता में पड़ गये। सप्तऋषि बालक मार्कण्डेय को ब्रह्मा जी के पास ले गये। मार्कण्डेय जी ने ब्रह्मा जी का भी चरण स्पर्श किया। ब्रह्मा जी ने भी मार्कण्डेय को दीर्घायु का आशीर्वाद दिया जिससे यमराज भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाए।           

पर यदि प्रणाम करने वाले के लिए कुछ नियम हैं तो जिन्हें प्रणाम किया जा रहा हो, वह चाहे स्त्री हो या पुरुष  उनका भी फर्ज होता है कि जब भी कोई चरण स्पर्श करे वे उसे हाथ उठा कर या उसके सर पर हाथ रख कर आशीर्वाद जरूर दें।  साथ ही भगवान या अपने इष्टदेव को भी याद करना चाहिए। क्योंकि पैर का किसी को लगना अशुभ कर्म माना गया है। तो जब कोई हमारे पैर छूता है तो हमें भी इस दोष से बचने के लिए मन ही मन भगवान से क्षमा मांगनी चाहिए। जब हम भगवान को याद करते हुए किसी को सच्चे मन से आशीर्वाद देते हैं तो उसे लाभ अवश्य मिलता है। किसी के लिए अच्छा सोचने पर हमारा पुण्य भी बढ़ता है। 

सोमवार, 12 नवंबर 2018

विज्ञापनों में सार्थक और सकारात्मक संदेश होने चाहिए

कंपनी को ऐसे विज्ञापन ही बनवाने चाहिए जिनमें यह संदेश हों कि आपकी अत्यधिक व्यस्तता के समय हम आपकी भोजन संबंधी परेशानियों को दूर करते हैं.........!

#हिन्दी_ब्लागिं
आज कंप्यूटर गेम, फ़ास्ट फूड, मोबाईल फोन की लत बच्चों और युवाओं में उस हद तक जा पहुंची है जिसके बहुत ही गंभीर परिणाम हो सकते हैं। विशेषज्ञों तथा डाक्टरों का मानना है कि समय रहते इससे छुटकारा पाना बहुत जरुरी है नहीं तो बात हाथ से निकल सकती है ! पर एक तरफ जहां लोगों में जागरूकता लाने की कोशिश की जा रही है, वहीं कुछ ऐसे लोग और कंपनियां हैं, जो इस बात को गंभीरता से नहीं ले रहे ! ऐसी ही एक कंपनी है #SWIGGY.


इसे अपने विज्ञापनों पर जरूर गौर करना कीजिए -
1) एक माँ अपने बेटे के साथ अपने घर में मोबाइल गेम खेल रही है। दोनों के हाव-भाव ऐसे हैं जैसे कोई जंग लड़ रहे हों ! खेलते-खेलते बेटा कहता है कि "माँ भूख लगी है !'' माँ स्विगी को फोन करती है और कुछ ही देर में किसी रेस्त्रां से उनके यहां खाना पहुँच जाता है।

2) एक कुछ ओवरवेट माँ टी.वी. के सामने खड़े हो बेतरतीब तरीके से उसमें दिखाई जा रही कसरत को दोहरा रही है ! इतने में उसकी बेटी आ पूछती है "माँ खाने में क्या है ?'' महिला दसियों आयटम गिना कर कहती है ''कुछ भी मंगा लो !'' वहाँ भी कुछ ही देर में स्विगी से खाना पहुंच जाता है। एक तरफ तो मोहतरमा अपनी सेहत को ले चिंतित हैं पर दूसरी ओर उनको बाहर के खाने का चस्का भी है।

3) इसी के एक विज्ञापन में तीन पीढ़ियां अपने सर में तेल लगवा रही हैं और ख़ास व्यंजन की याद आते ही स्विगी हाजिर हो जाता है। यह कुछ-कुछ युक्तिसंगत लगता है कि यदि समय कम है तो हमें याद करें। मेरे ख्याल से कंपनी को ऐसे विज्ञापन ही बनवाने चाहिए जिनमें यह संदेश हों कि आपकी अत्यधिक व्यस्तता के समय हम आपकी भोजन संबंधी परेशानियों को दूर करते हैं।

ऐसे विज्ञापनों से ऐसा भी लगता है जैसे हिदायतें सिर्फ आम जनता को देने की एक खानापूर्ति है ! उसको गंभीरता से कोई नहीं लेता और ना हीं उसे प्रभावी तौर पर लागू करवाने की किसी की कोई मंशा होती है ! जबकि देश के हर नागरिक को अपनी जिम्मेदारी का अहसास, समाज के प्रति अपना उत्तरदायित्व तथा आने वाली पीढ़ी की भी चिंता होनी चाहिए !

मंगलवार, 6 नवंबर 2018

नरकासुर वध तथा सोलह हजार बंदी युवतियों की मुक्ति

भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा को अपना सारथी बना युद्ध में शामिल कर उन्हीं की सहायता से कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरकासुर का वध कर देवताओं व संतों को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई तथा बंदी गृह से सोलह हजार युवतियों को मुक्त करवाया। युवतियां मुक्त तो हो गयीं पर सामाजिक विरोधो और मान्यताओं के चलते भौमासुर द्वारा बंधक बनकर रखी गई इन नारियों को कोई भी अपनाने को तैयार नहीं था, तब अंत में श्रीकृष्ण ने सभी को आश्रय दिया और उन सभी कन्याओं ने श्रीकृष्ण को पति रूप में स्वीकार किया। उन सभी को श्रीकृष्ण अपने साथ द्वारिकापुरी ले आए। वहां वे सभी कन्याएं स्वतंत्रता पूर्वक अपनी इच्छानुसार सम्मानपूर्वक रहने लगीं..........!

#हिन्दी_ब्लागिंग     
आज के ही दिन श्री कृष्ण जी ने अपनी पत्नी सत्यभामा की सहायता से नरकासुर का वध कर उसके बंदीगृह से सोलह हजार युवतियों को मुक्त करवाया था। भागवत पुराण के अनुसार तीनों लोकों में हाहाकार मचाने वाला
सोलह हजार युवतियों की मुक्ति 
भौमासुर भूमि माता का पुत्र था। जिस समय विष्णु जी ने वराह अवतार ले कर भूमि को समुद्र से निकाला था, उसी समय उनके और भूमि देवी के संयोग से एक पुत्र ने जन्म लिया
था। भूमि पुत्र होने के कारण वह भौम कहलाया। पर पिता एक परम देव और धरती जैसी पुण्यात्मा माता होने के बावजूद अपनी क्रूरता के कारण उसका नाम भौमासुर पड़ गया ! पर दिनोदिन उसका व्यवहार पशुओं से भी ज्यादा क्रूर, निर्मम और अधम होता चला गया उसकी इन्हीं करतूतों के कारण उसे नरकासुर कहा जाने लगा।     

नरकासुर 
कहते हैं जब रावण वध हुआ उसी दिन पृथ्वी के गर्भ से उसी स्थान पर नरकासुर का जन्म हुआ, जहाँ सीता जी का जन्म हुआ था। सोलह वर्ष की आयु तक राजा जनक ने उसे पाला; बाद में पृथ्वी उसे ले गई और विष्णु जी ने उसे प्रागज्योतिषपुर का, जो आज का असम प्रदेश है, राजा बना दिया। नरकासुर ने ब्रह्मा जी की घोर तपस्या कर के वर प्राप्त कर लिया था कि उसे देव-दानव-असुर-मनुष्य कोई नहीं मार सकेगा। कुछ दिनों तक तो नरकासुर ठीक से राज्य करता रहा, किन्तु समय की लीला तथा वाणासुर के सानिद्ध्य के कारण उसमें सारे अवगुण राक्षसों के भर गए।  
युद्धरत सत्यभामा और श्रीकृष्ण 
नरकासुर ने इंद्र को हराकर उसको स्वर्ग से बाहर निकाल दिया था। उस के अत्याचार से देवतागण तथा धरती पर संत-मुनि-मानव सभी त्राहि-त्राहि कर रहे थे। वह वरुण का छत्र, अदिति के कुण्डल और देवताओं की मणि छीनकर त्रिलोक विजयी हो गया था। जिससे अहंकार से भर महाअत्याचारी बन गया था। चूँकि उसको श्राप मिला हुआ था कि उसका वध एक स्त्री द्वारा होगा, इसलिए उसका अत्याचार उनके प्रति भी बहुत बढ़ गया था। उसने अपने रनिवास में सोलह हजार एक सौ स्त्रियों को बंदी बना कर रखा हुआ था। 
 
नरकासुर का अंत 
पर जब हर चीज की अति हो गयी तो सुर-नर सब मिल कर श्री कृष्ण जी के पास गए और नरकासुर से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। प्रभू ने उन सब को आश्वसान दिया। चूँकि नरकासुर को स्त्री के हाथों मरने का श्राप था इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा को अपना सारथी बना युद्ध में शामिल कर उन्हीं की सहायता से कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरकासुर का वध कर देवताओं व संतों को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई तथा बंदी गृह से सोलह हजार युवतियों को मुक्त करवाया। युवतियां मुक्त तो हो गयीं पर भौमासुर के यहां इतने दिन रहने के कारण सामाजिक विरोधों और मान्यताओं के चलते इन को कोई भी अपनाने को तैयार नहीं था, तब अंत में श्रीकृष्ण ने सभी को आश्रय दिया। उन सभी कन्याओं ने श्रीकृष्ण को पति रूप में स्वीकार किया। श्री कृष्ण उन सब को अपने साथ द्वारिकापुरी ले आए। जहां वे सभी कन्याएं स्वतंत्रता पूर्वक अपनी इच्छानुसार, सम्मानपूर्वक रहने लगीं। 

जब नरकासुर के त्रास से जगत को चैन और शान्ति मिली उसी की खुशी में दूसरे दिन अर्थात कार्तिक मास की अमावस्या को लोगों ने अपने घरों में दीए जलाए । तभी से नरक चतुर्दशी तथा दीपावली का त्योहार मनाया जाने लगा।

गुरुवार, 1 नवंबर 2018

रणथंभौर दुर्ग, उसमें स्थित भवन तथा मंदिर

इस अभेद्य दुर्ग के अंदर गणेश जी के मंदिर के अलावा एक रघुनाथ मंदिर, एक जैन मंदिर, एक माँ काली का शक्ति पीठ, बाइस खंबा छतरी के नीचे एक गुफा में एक विशाल शिव लिंग भी स्थापित है। इन सब के साथ ही यहां एक मस्जिद भी निर्मित है। परन्तु इनके साथ ही जिसकी भरमार है जो सैंकड़ों की तादाद में यहां, वहाँ, दाएं, बाएं, ऊपर, नीचे सब जगह मौजूद है, वे हैं लंगूर ! पर एक बात है वे किसी को कोई हानि नहीं पहुंचाते। शिमला के जाकू या मथुरा-वृन्दावन के शरारती वानर युथों से उनकी कोई तुलना नहीं है...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग  
रणथंभौर दुर्ग, राजस्थान के सवाई माधोपुर शहर से करीब से 12-13 कि.मी. की दुरी पर रन और थंभ नाम की पहाडियों के बीच रणथम्भौर अभ्यारण्य के बीच में स्थित यह एक अभेद्य दुर्ग है। हालांकि इसका निर्माण चौहान वंश के राजाओं द्वारा 944 ईस्वी शुरू हो गया था पर इसकी पहचान प्रमुखता से राव हम्मीर देव चौहान के साथ की जाती है। मुहम्मद गौरी से पृथ्वी राज चौहान के हार जाने के बाद उनके पुत्र गोविंदराज ने रणथम्भौर को अपनी राजधानी बनाया था। उनके अलावा विभिन्न राजाओं का यहां आधिपत्य रहा। पर इसको सबसे ज्यादा ख्याति मिली हम्मीर देव के, 1282-1301, शासन काल में। उनके 19 वर्षो का शासन इस दुर्ग का स्वर्णिम युग रहा था। उनके द्वारा लडे गए 17 युद्धों में से उन्हें 13 में विजय प्राप्त हुई थी। फिर बाद में सवाई माधो सिंह ने फिर से पास के गांव और इस इलाके का विकास किया और इस किले को और भी सुदृढ़ करवाया। इसीलिए इस पूरे इलाके का नाम उनके नाम पर सवाई माधोपुर रखा गया।



हम्मीर कुंड 









आज भी इस दुर्ग की मजबूती और बेहतर हालत को देख कर इसके स्वर्ण काल का अंदाज आसानी से लगाया जा सकता है। किले के अंदर बड़ी मात्रा में दीवारें देखने को मिलती है। यहां सात द्वार भी है जिनके नाम हैं, नवलखा पोल, हाथिया पोल, गणेश पोल, अंधेरी पोल, दिल्ली गेट, सत्पोल, सूरज पोल। इन द्वारों की विशालता-भव्यता और सुरक्षता देखते ही बनती है। 


हम्मीर महल 
छत्तीस खंबा छतरी 

दुर्ग के पश्चिमी दिशा में भी कई भवन और इमारतें अपनी उत्कृष्ट अवस्था में खड़े हैं। जिनमें प्रमुख हैं, हम्मीर पैलेस, बत्तीस खम्भा छत्री, हैमर, बडी कच्छारी,  छोटी कछारी इत्यादि। पर इन सब में जो स्थान सबसे लोकप्रिय, विश्व-प्रसिद्द, आस्था और मान्यता प्रद है, जिससे जन-जन की भावनाएं जुडी हुई हैं, वह है यहां का त्रिनेत्र गणेश या प्रथम गणेश मंदिर। इसमें गणपति अपने पूरे परिवार के साथ विराजमान हैं। इनके साथ एक कथा भी जुडी हुई है। बात तब की है जब राजा हम्मीर अल्लाउद्दीन खिलजी के साथ युद्ध रत थे। युद्ध के पहले ही किले में प्रचुर खाद्य सामग्री एकत्रित कर ली गयी थी। पर लड़ाई लंबी खिंच जाने के कारण अनाज के गोदाम खाली होने लगे। गणेश जी के महान भक्त राजा को चिंता ने घेर लिया। उसी समय एक रात उन्हें सपने में गणेश जी ने दर्शन दिए और कहा तुम्हारी सारी चिंताएं और मुसीबतें जल्द ही ख़त्म हो जाएंगीं। सुबह किले की एक दीवाल में तीन नेत्रों वाली मूर्ति चिपकी पाई गयी और सारे अन्न भंडार भी भरे-पुरे हो गए। युद्ध के समाप्त होने पर राजा हम्मीर ने वहीँ गणेश जी का मंदिर बनवा दिया। जहां गणेश चतुर्थी पर लाखों की भीड़ जुटती है। इसके साथ ही देश-विदेश से भक्तजन अपने किसी भी पुण्य कार्य को आरंभ करने के पहले श्री गणेश को पत्र लिख आमंत्रित करते हैं, जिससे उनका कार्य निर्विघ्न और सुखमय हो। इस काम के लिए डाक विभाग द्वारा एक पत्र वाहक सिर्फ मंदिर के लिए निमंत्रण पत्र ले जाने के लिए नियुक्त किया हुआ है। 


रघुनाथ मंदिर प्रवेश द्वार 


शक्ति पीठ, माँ काली मंदिर 
गणेश मंदिर 

गणेश जी के मंदिर के अलावा किले में एक रघुनाथ मंदिर, एक जैन मंदिर, एक माँ काली का शक्ति पीठ, बाइस खंबा छतरी के नीचे एक गुफा में एक विशाल शिव लिंग भी स्थापित है। इन सब के साथ ही यहां एक मस्जिद भी निर्मित है। परन्तु इनके साथ ही जिसकी भरमार है जो सैंकड़ों की तादाद में यहां, वहाँ, दाएं, बाएं, ऊपर, नीचे सब जगह मौजूद है, वे हैं लंगूर ! पर एक बात है वे किसी को कोई हानि नहीं पहुंचाते। शिमला के जाकू या मथुरा-वृन्दावन के शरारती वानर युथों से उनकी कोई तुलना नहीं है। 


जैन मंदिर 
गणेश मंदिर की ओर 


वानर परिवार 



वैसे रणथम्भौर का सबसे बड़ा आकर्षण तो यहां का वन्य अभ्यारण्य ही है। जहां बाघों के लिए सुरक्षित वातावरण उपलब्ध करवाया गया है। उनकी बढ़ती संख्या के  सुखद परिणाम भी मिले है। बाघों के अलावा जंगली सूअर, भालू, वैन भैंसे, हिरणों की कई प्रजातियों के साथ-साथ अनेक प्रकार के पक्षियों का भी यहां बसेरा है। जंगल सफारी के लिए सबसे अच्छा तथा अनुकूल मौसम ऑक्टूबर से मार्च-अप्रैल तक का होता है। वर्षा के मौसम में सफारी दो महीने के लिए बंद रहती है। यहां वायु या थल मार्ग से कहीं से भी आसानी से पहुंचा जा सकता है। रहने खाने के लिए भी बहुत सारे अच्छे और बजट वाले होटल वगैरह उपलब्ध हैं। 

विशिष्ट पोस्ट

कोई तो कारण होगा, धर्म स्थलों में प्रवेश के प्रतिबंध का !!

अभी कुछ दिनों पहले कुछ तथाकथित आधुनिक महिलाओं ने सोशल मिडिया पर गर्व से यह  स्वीकारा था कि माह के उन  कुछ ख़ास दिनों में भी वे मंदिर जात...