गुरुवार, 25 जून 2009

ब्लाग जगत लौंडे-लफाड़ियों तथा चाटुकारों का जमावडा है - बकलम बेनामी।

कभी-कभी कोई बात, कोई खबर मन को भा जाती है तो इच्छा जोर मारने लगती है कि उस बात को औरों तक भी पहुंचाया जाय। पर इस जोरा-जोरी में यह शाश्वत सत्य दब जाता है कि सब चीजें सब को अच्छी नहीं लग सकतीं। एक-दो दिन पहले दो-तीन चुटकुले अच्छे लगे तो मुस्कुराहट बिखेरने के लिये उन्हें पोस्ट कर दिया। नेट पर उस दिन आना ना हो सका। दूसरे दिन देखा तो वहां एक बेनाम व्यक्ति के विरुद्ध अविनाश जी मेरी तरफ से मोर्चा संभाले हुए हैं। अपने ही बीच के किसी ‘यार’ को चुटकुलों पर आपत्ती थी और उस भाई ने बेनामी की नकाब पहन अपनी नाराजगी इन शब्दों मे जाहिर की थी कि “आपका नाम अखबार में आया है और आप यहां चुटकुले सुना रहे हैं।” मेरी समझ में यह बात नहीं आयी कि अखबार में ब्लाग या नाम का जिक्र होने के बाद किसी को चुटकुले सुनाने क्यूं बंद कर देने चाहिये। क्या अखबार में छपाऊ होने के पश्चात आदमी को हरदम टेंशनाया हुआ बोर टाइप का मनहूस चेहरे वाला बुद्धिजीवी दिखते हुए ऐसे भारी-भरकम विषयों पर ही अपनी कलम चलानी चाहिये जो ना खुद को समझ आयें न दूसरे को। अखबारों में तो कयी बार ब्लाग का जिक्र हुआ है पर पहले तो किसी ने मुझे सुधारने की पहल नहीं की। वैसे भी मैंने कौन सा नवरात्रों में मदिरापान कर लिया या वकील बन कानून का उल्लंघन कर दिया जो किसी को नागवार गुजरा। और कर दिया तो कर दिया। खैर,
इधर अविनाश जी ढाल बने खड़े थे उधर वह महाशय अपना तरकश खाली करते-करते कटुता की सीमा पार कर कह गये कि “ब्लाग जगत लौंड़े-लफाड़ियों तथा चाटुकारों का जमावड़ा है” इस पर जहां अविनाश जी ने उन महाशय जी को उनकी उम्र का अंदाज लगवा दिया वहीं मुझे उनकी सेहत को मद्देनजर रख उन्हें चेताना पड़ा कि महाशय जब आप को यहां की आबो-हवा रास नहीं आती हमारा हंसना खुश होना आपको नहीं सुहाता तो क्यूं बार-बार इधर ताका-झांकी करने आ जाते हैं ? अरे भाई उस जगह जाना ही क्यूं जहां जाते ही रक्त चाप बढ कर सेहत के लिये खतरे की घंटी बजाना शुरु कर देता हो।
हो सकता है, कयी बार किसी विषय पर सहमत ना होने के कारण मन करता हो कि अपनी बात भी रखी जाय, पर झिझक के कारण कि अगले को शायद बुरा लगेगा, ऐसा कर पाना संभव न लगता हो तो लोग नकाब का उपयोग कर लेते हों। ठीक है अपनी राय रखने को सब स्वतंत्र हैं पर मेरी एक ही गुजारिश है कि कृपया शालीनता के साथ अपनी बात रखें। अपने गुस्से के कारण शब्दों में कटुता ना आने दें। ऐसे में तो वैमनस्य ही बढेगा।
एक बार फिर अविनाश वाचस्पति जी का आभारी हूं जिन्होंने मेरी और ब्लाग परिवार की तरफ से शालीनता को ना छोड़ते हुए मोर्चा संभाले रखा। जबकि कड़वी सच्चाई यह है कि बहुत बार ऐसी परिस्थितियां आने पर हम खुद विवादाग्रस्त होने के ड़र से सच्चाई का साथ ना दे किनारे खड़े हो जाते हैं।

30 टिप्‍पणियां:

राज भाटिय़ा ने कहा…

शर्मा जी, अब क्या कहे, यह बेनामी है तो कोई हम मै से ही, जो शयद चिढ कर ऎसा लिखता हो, ओर यह बिमारी सिर्फ़ आप के ब्लांग पर नही हर तरफ़ आ रही है स्वाईन फ़्लू की तरह से, चलिये दफ़ा किजिये इन लोगो को, क्योकि इन के साथ साथ हम इन जेसी भाषा नही बोल सकते,
चलिये आप एक को देख कर दिल खराब ना करे देखे कितने लोग आप को चाहने वाले है इस ब्लांग जगत मे,धन्यवाद

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

भाई अविनाश जी तो स्वभावत: ही सच के साथ रहते हैं. और इन बेनामियों से क्युं डरते हैं? ये तो फ़ोकट मे आपका इतना प्रचार कर देते हैं कि अखबार के विज्ञापन मे नही हो सकता.

कल ही एक ब्लाग पर हमको और शाश्त्रिजी को खूब तबियत से कम्बल मे लपेट लपेट कर संटियां मारी गई. कसम से मजा आगया..आज ही वहां का लिंक एक ब्लागर मित्र ने भेजा था. पढकर आनंद आगया.

वहां भी अविनाशजी पहुंच ही गये थे.अविनाश जी के जवाब दिये जाने के बाद हमे जवाब देने की आवश्यकता ही महसूस नही हुई. और इन राहु-केतुओं को क्या जवाब दोगे?

आप तो बिल्कुल आपके दिल के अनुसार लिखो जी..हमको आपका लिखा समझ मे भी आता है और अच्चा भी लगता है.

रामराम.

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

भूल सुधार :

अच्चा = अच्छा

Gagan Sharma, Kuchh Alag sa ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Gagan Sharma, Kuchh Alag sa ने कहा…

भाटिया जी तथा ताऊ जी, धन्यवाद।
यह हम सबका आपसी सहयोग, प्रेम ही तो है जो यहां बने हुए हैं।
पूरा ड़ेढ दिन सोचता रहा कि इस विषय को लिखूं या ना लिखूं, क्यूंकी यह कोई नयी बात तो है नहीं। मेरे दिल में ऐसे कोई मलाल भी नहीं है। पर जैसे अविनाश जी खड़े रहे मेरे पासंग उसको सबका साझा करना मुझे जरूरी लगा।
दूसरे इस तरह का हल्का शिर्षक देना ठीक नहीं लग रहा था पर फिर लगा कि शायद आज यही ठीक रहेगा। यदि अशोभनीय लग रहा हो तो सबसे क्षमा चाहता हूं।

परमजीत बाली ने कहा…

यह सब तो चलता ही रहेगा यहाँ....आप बस अपने रास्ते चलते रहें।

अजय कुमार झा ने कहा…

अरे उस पोस्ट के बारे में तो मैंने भी कहीं सुना था..वहाँ बेनामी भाई पूरा ग्रन्थ लिखनेवाले थे आप दोनों महारथियों के ऊपर..मगर ब्लॉगर ने बाद में अनाम कमेन्ट पर रोक लगा दी थी...कौन सी पोस्ट थी ..छोडिये याद नहीं आ रहा...हा..हा..हा..
मारिये गोली...लगे रहिये...

AlbelaKhatri.com ने कहा…

ye sab toh chalta hai dada,
jahan chaar bartan hote hain vahan khadkne ki aawaz to aati hi hai .....

aisa main nahin meri maa kahti hai...ha ha ha ha

Udan Tashtari ने कहा…

उनको अनदेखा कर आगे बढ़ जाना ही उनका इलाज है. तव्वजो देना फिजूल है. आप बढ़िया काम कर रहे हैं, जारी रहिये.

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

अजी शर्मा जी, ये सब तो इस चिट्ठाजगत पर अब हर रोज का किस्सा बनता जा रहा है,ओर सच पूछिए तो शायद हर व्यक्ति इसका आदि भी हो चुका है.....अब तो इन बेनामियों का जिक्र करने का भी मन नहीं करता. आप निसंकोच अपना लेखन जारी रखिए, जिसे अच्छा लगे वो पढे और जिसे न अच्छा लगे वो अपने घर बैठे. अब अगर हमें आपका लिखा पसन्द आता है, तभी तो पढने आते हैं। आप तो बस लिखते रहिए........

रंजन ने कहा…

shift + delete... न रहे बांस न बजे बांसुरी..

विनीत कुमार ने कहा…

जिनको ब्लॉगिंग पसंद नहीं है वो अपना रास्ता नापे,इस तरह की बयानबाजी करने से बचें।

विवेक सिंह ने कहा…

जलने वालों को जलाना है , हद से गुजर जाना है :)

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` ने कहा…

ब्लोग जगत में
आये दिन
कोई न कोइ
ज़हर फैलाने का
मन बना लेता है
ना जाने क्यूं ?
:-(


- लावण्या

Anil Pusadkar ने कहा…

टेंशन लेने का नही देने का।

HEY PRABHU YEH TERA PATH ने कहा…

गगनजी
कुछ दिन पुर्व मै स्वय इस बैनामी ऑतकवाद से पिडित था और आप लोगो ने सबलता प्रदान की थी। आप समझो कि इस बैनामी कीडे को टिपणियो या हवाले लेखो के छिडकाव से नही मारा जा सकता। इसके लिए हमारी टेक्निकल व्यव्स्था मजबुत नही है। हमे इस ओर सोचना चाहिऐ।

सभी ठिक होगा इसी के साथ।
आभार/मगलकामना

महावीर बी सेमलानी "भारती"
मुम्बई टाईगर
हे प्रभु यह तेरापन्थ

बेनामी ने कहा…

stat counter ek suvidha haen jissaey absolute ip address nikala jaa saktaa haen . maene naari blog par ek baar kaafi pehlae aaam comment kae ip ko diya thaa . agar sab log nirbheek ho kar apni post par aaye anaam kament ki ip ko batana shuru karade samsyaa suljh jaayeaegii . takriban sabne ip trakcer lagaaye haen phir ip bataney mae hichkichaat kyun
Rachna

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

आप सबने इतना लिख दिया है फिर भी सिर्फ एक बार की ओर ध्‍यान दिलाना चाहूंगा कि हमें इन बेनामी बंधुओं को मारना नहीं है, न उन्‍हें दुख पहुंचाना है बल्कि उनका हृदय परिवर्तन करना है। ताकि उन्‍हें अहसास हो कि वे जिन्‍हें अपना बैरी मान रहे हैं, वे उन्‍हें अपना मित्र ही बनाना चाहते हैं। हृदय परिवर्तन से अच्‍छा और उपयोगी रास्‍ता दूसरा नहीं, हो भी अगर पर पहले वाले रास्‍ते को ही प्रेम का रास्‍ता बनाने की ओर हम सभी ब्‍लॉगर/बेनामी बंधुओं को अग्रसर रहना चाहिए। बेनामी भी किसी न किसी कटुता से पीडि़त हैं, उन्‍हें इस पीड़ा से मुक्ति दिलाने का हमारा भी फर्ज बनता है। जरूरी नहीं है कि जो हमारा साथ दे, हम उसी का साथ दें। जो हमारा साथ न दे, सदा हमारे विरोध में रहे, उसका साथ देने/रहने में जो आनंद है वो और किसी तरह नहीं आ सकता।

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

सही नही है ऐसे छुप छुप कर टिप्पणियाँ करना,
अगर किसी को कुछ पसंद नही तो पढ़ता ही क्यों है.

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

अविनाश जी की टिप्पणी के बाद क्या बचता है कहने को । आभार ।

नीरज गोस्वामी ने कहा…

टिप्पणी देने वाले से वो भी जो अपना नाम तक बताने में घबरा रहा हो, ऐसे शिखंडी, से क्या घबराना...आप तो लिखो...बिंदास...मस्त हो कर.
नीरज

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

ब्लागों में बेनामी एक मानसिक बीमारी लग रही है . आप बेहिचक सतत ब्लॉग लेखन जारी रखें

Nirmla Kapila ने कहा…

लगे रहो----जिस घर मे सास बहु की लडाई ना हो वो घर ही क्या-- वाह वाह्

बेनामी ने कहा…

@Nirmla Kapila

सुझाव के लिये धन्यवाद..पर ये बताया जाये कि यहां सास कौन है और बहु कौन? बेनामी क्या है?:)

बेनामी ने कहा…

हमारा नाम क्यों खराब करते हैं? यहां का सब माहौल खराब करने मे आप जैसी पोस्ट लिखने वाले, शास्त्री, और सबका सरदार ताऊ और उसके चेले, राज भटिया, अरविंद मिश्रा, अविनाश वाचस्पति जैसे लोग जिम्मेदार हैं और हमारा नाम क्यों लेते हैं? महिलाओं का कुछ तो सम्मान करना सीखो।

प्रकाश गोविन्द ने कहा…

भाई आप भी कहाँ फालतू खटराग में पड़ गए !
मैंने तो अपने ब्लॉग पर एक नीति वाक्य भी लगा दिया है -

सबसे बड़ा रोग
क्या कहेंगे लोग !


और ऐसे बेनामी लोग ...

आप सबसे पहले इन बेनामिओं के मनो-विज्ञान को समझिये ... आप उनके अन्दर की तमाशा देखने की चाह को पूरा कर रहे हैं !

मैंने चुटकुले अभी पढ़े ....
मुझे तो बेहद आनंद आया बल्कि २-४ और होते तो अच्छा था ! हास-परिहास के बिना भी कोई जिन्दगी है .....??
यहो तो वो चीज है जो हमें तारो-ताजा रखती है !

नया कलेक्शन कब आ रहा है !
देखिये हम आपके फालोवर भी बन गए !

आज की आवाज

Shefali Pande ने कहा…

सिर्फ और सिर्फ एक बात
कर सकती है बेनामियों का
उत्तम इलाज, इनकी
टिप्पणियों को करें नज़रंदाज़
इन पर ना लिखे पोस्ट कोई
इन पर ना भिड़े एक दूजे से कोई

Arvind Mishra ने कहा…

हम भी बदनाम होने वालों में से हैं -कोई बात नहीं क्या हुआ जो बदनाम हुए नाम तो हुआ ! अब समय आ गया है की न्यूसेंस फैलाने वालों और हिन्दी ब्लागजगत को लेकर बहुत मानसिकता आप्नानी वालों का सामजिक बहिष्कार करें -उनकी नोटिस न लें ! अविनाश जी न तो युद्धिष्ठिर बनिए और न गांधी -समयानुकूल आचरण आवशयक है ! शठे शाठ्यम समाचरेत ! बहिष्कार की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है इसे न रोकें ! अपने आप बेनामियों और उनके पीछे छिपे घिनौने चेहरों की औकात सामने आ जायेगी ! ...सबसे कठिन जाति अवमाना !

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

हम सब का यह कर्तव्य है, कि यदि कोई किसी ब्लौगर बन्धु के खिलाफ़ कुछ गलत कहे तो सब मिलकर मोर्चा संभालें...अविनाश जी बधाई के पात्र हैं. वैसे इन बेनामियों की बात का जवाब नहीं देना ही सही रास्ता है.

kabeeraa ने कहा…

इसी लिए बड़े-बुजुर्ग कहा करते थे ,बच्चा पद लिख लो और जो लिखना वह याद भी रखना पर आप सब प्राईमरी में पढ़ा मुहावरा भूल चुके है ,'

'' कुत्ते भूंकते ही रहते है पर हाथी अपने रस्ते चलते रहतें हैं "
यही नीत अपना कर उनकी तिप्पनियं डिलेट करते रहें और जिस दिन ये पकड़
में आजायें एक साथ उनके ब्लॉग पर हमला करें और उनकी ब्लॉग की हर पोस्ट पर शब्दतः एक दुसरे की प्रतिलिप टिप्पणी इतनी अधिक संख्या में दें कि पोस्ट से भारी टिप्पणी अंश भारी हो जाये [१५०-२०० टिप्पणी ]शालीन हो पर हो अवश्य उनकी पोस्ट से बड़ी , और हो |