शनिवार, 22 जुलाई 2023

नाड़े वाली पायजामानुमा पैंट

तो लुब्ब-ए-लुबाब यह रहा कि उस नाड़े वाली, पायजामेनुमा पैंट या पैंटनुमा पायजामे ने पता नहीं मुझे कैसे, क्यों और इतना लुभा लिया कि उसे तो मैंने लिया ही साथ में उसके दो साथी और ले आया ! समय काटने गए थे, जेब कटा कर आ गए ! इसी लिए कहता हूँ, ''विंडो ब्राऊज़िंग नहीं आसां, इतना समझ लीजे,  ये मायाजाल का फरेब है, और बच कर आना है.............!'' 

       

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कल बेटे की तरफ से फिर ऑफर आया कि चलिए, कुछ कपड़े-लत्ते ले आए जाएं ! अक्सर ऐसे प्रस्ताव मैं ख़ारिज कर देता हूँ ! अब पहले जैसी आमद-ओ-रफ्त तो रही नहीं ! कभी-कभार ही कहीं निकलना होता है, तो उसके लिए इंतजाम है ही ! फिर भी सभी का साथ देने के लिए चल दिया कि चलो विंडो ब्राऊज़िंग ही सही ! अब आदमी गया है तो इतने बड़े मॉल में ठूंसे पड़े माल को तो देखेगा ही ! इसी देखा-देखी में वहां के खरीदारी सहायक ने मुझसे पूछा, सर; क्या दिखाऊं ! मैंने कहा, कुछ नहीं, बस; ऐसे ही देख रहा हूँ ! अब वह विक्रेता ही क्या, जो इतने से निराश हो जाए ! युवक कहीं से एक ट्राउज़र निकाल, मेरे पास लाया और बोला, यह नया आईटम है, बिलकुल हल्का और स्ट्रेचेबल ! इसमें ट्राउज़र कॉर्ड भी है !   

उस ''नए आइटम'' को अपने हाथ में लेते ही मेरी हंसी निकल गई ! युवक मेरे मुंह की तरफ देख रहा था ! तभी श्रीमती जी भी वहां आ गईं ! मैंने उनको इंगित करते हुए उस युवक से कहा, पैंतालीस साल पहले, तुम्हारे इसी नए आइटम के किसी पूर्वज को पहन मैं इनके घर गया था ! तब इसे ''स्ट्रेचलॉन'' कहा जाता था ! पर जब इसमें बेल्ट के लिए लूप लगे हैं तो इसमें यह ''नाड़ा'' क्यों डाल दिया है, बेचारा न पैंट रह गया ना हीं पायजामा ! पहनने वाले को एक और अतिरिक्त क्रिया को अंजाम देने के लिए समय निकालना होगा ! अब वह बेचारा क्या बोलता, उसने तो बनाया नहीं था, यह सब ! 

हम में से बहुतों ने इस ''चीज'' को देखा होगा, पर मैंने पहली बार दीदार किए थे ! बाजार अपनी सुरसाई भूख की जरुरत के लिए जो ना कर दे या बना दे कम है ! तो लुब्ब-ए-लुबाब यह रहा कि उस नाड़े वाली पायजामेनुमा पैंट या पैंटनुमा पायजामे ने पता नहीं मुझे कैसे, क्यों और इतना लुभा लिया कि उसे तो मैंने लिया ही साथ में उसके दो साथी और ले आया ! समय काटने गए थे, जेब कटा कर आ गए ! इसी लिए कहता हूँ, ''विंडो ब्राऊज़िंग नहीं आसां, इतना समझ लीजे, ये मायाजाल का इक फरेब है और बच कर आना है !''    

शनिवार, 15 जुलाई 2023

टालमटोल और मामला आँख का

तभी जैसे कुछ घटा ! अचानक मैंने महसूस किया कि मैं खुद को तनाव रहित पा रहा हूँ ! किसी भी तरह की कोई घबराहट नहीं ! कोई चिंता नहीं ! एक हल्कापन ! इस बदलाव को महसूस कर मैं विस्मित सा रह गया ! ऐसा, कैसे, क्या हुआ, समझ नहीं पा सका ! पहले कभी ऐसा नहीं हुआ कि सारा तनाव, सारी घबराहट कुछ पलों में ही तिरोहित हो गई हो, बिना किसी ख़ास वजह के ! एक कक्ष से दूसरे कक्ष में जाने के दौरान हुआ वह बदलाव आज भी एक पहेली बना हुआ है..........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

किसी काम को टालने के विभिन्न कारण हो सकते हैं, जैसे नकारात्मक परिणाम, असमंजस, आलस, जानकारी-समय-धन-आत्मविश्वास का अभाव ! पर शायद सबसे बड़ी वजह होती है, भय ! डर, किसी अनहोनी का ! जो कहीं मन की गहराइयों में दबा-छिपा बैठा रहता है और वक्त-बेवक्त अपना सर उठाता रहता है ! यह जानने के बावजूद भी कि इस काम को टालने के नकारात्मक या गलत परिणाम भी हो सकते हैं, भय के कारण उस काम को टालते रहा जाया जाता है ! इसको एक तरह की बिमारी भी कह सकते हैं,  जो धीरे-धीरे आदत में शुमार होती चली जाती है !  

भय
करीब तीन साल पहले श्रीमती जी के कैटरेक्ट के ऑपरेशन के समय ही डॉ. त्यागमूर्ति जी ने मेरा भी परिक्षण कर सर्जरी करवा लेने की सलाह दी थी ! पर अभी तो ठीक-ठाक काम चल ही रहा है, जैसे विचारों ने बात टाल दी ! पर क्या वाकई सब ठीक-ठाक चल रहा था या उस दबे-छिपे भय ने मजबूर किया था टालने को ! क्योंकि किसी को ऐसी सलाह दूसरों को देना बहुत आसान है कि आजकल सिर्फ, पंद्रह-बीस मिनट लगते हैं कैटरेक्ट के ऑप्रेशन में और आधे घंटे में तो घर जाने की इजाजत मिल जाती है ! चिंता की कोई बात ही नहीं है ! हो सकता है कि इन बातों से मरीज का हौसला बढ़ जाता हो ! पर जब खुद पर बात आती है तो अपने देवता कूच कर जाते हैं !  

अभी नहीं, फिर कभी  

आखिर टलते-टलते वह एक दिन आ ही गया जब लगा कि नहीं, अब और देर करना उचित नहीं है ! बढ़ती उम्र में पुनर्लाभ होने में समय भी लगने लगता है ! वैसे भी बच्चों का दवाब भी बढ़ रहा था ! सो कई तरह के अलग-अलग सुझावों, सलाहों, परामर्शों के बावजूद पहुँच गए #I-CREATE त्यागमूर्ति जी के नेत्र चिकित्सालय ! कारण भी था ! उनका सानिध्य एक अतिरिक्त भरोसा देता है ! मरीज सुरक्षा सी महसूस करने लगता है ! उनकी बातों से उनका आत्मविश्वास झलकता है, जो सामने वाले को तनाव मुक्त कर देता है ! उनके हाथ का शिफ़ा सैंकड़ों लोगों को नई रौशनी प्रदान कर चुका है ! लगता ही नहीं कि आँख की इतनी जटिल शल्य चिकित्सा कर रहे हों !

मंगलवार का दिन था, सुबह के दस बज रहे थे ! पहुंचते ही ऑपरेशन पूर्व तैयारी के लिए प्री-ऑप. कक्ष में ले जाया गया ! आँख में दवा डाली गई, इस तैयारी में कम से कम 40-45 मिनट का वक्त लगा और समय मेरे लिए सबसे कठिन था ! हर पल के साथ घबराहट बढ़ती जा रही थी ! उलटे-सीधे विचार तनाव का कारण बन रहे थे ! लाख कोशिशों के बावजूद मन की भटकन रुक नहीं पा रही थी ! अंत में खुद को भगवान शिव के वैद्यनाथ स्वरूप की शरण में डाल दिया !

डॉ. त्यागमूर्ति 
तभी एक सहायक ने आ कर अंदर चलने को कहा ! ऑपरेशन कक्ष में हल्की आवाज में, जगजीत सिंह द्वारा गाई गई राम धुन गूंज रही थी, तभी त्यागमूर्ति जी की आवाज आई, आइए शर्मा जी, कैसे हैं ! मैंने अभिवादन किया और कहा कि ठीक हूँ ! तभी जैसे कुछ घटा ! अचानक मैंने महसूस किया कि मैं खुद को तनाव रहित पा रहा हूँ ! किसी भी तरह की कोई घबराहट नहीं ! कोई चिंता नहीं ! एक हल्कापन ! कुछ ही क़दमों में आए इस बदलाव को साफ़ तौर पर महसूस कर मैं विस्मित सा रह गया ! ऐसा, कैसे, क्या हुआ, समझ नहीं पा सका ! पहले कभी ऐसा नहीं हुआ कि सारी घबराहट कुछ पलों में ही तिरोहित हो गई हो ! 


ऑपरेशन सफल रहा ! इसका सबसे बड़ा उदाहरण यही है कि जिस लोअर को मैं अब तक काले रंग का समझ रहा था वह नेवी ब्ल्यू का निकला 😄 भगवान शिव की कृपा ही थी जो डॉ. त्यागमूर्ति जी का साथ मिला ! उस बात को एक पखवाड़े से ऊपर हो गया है, पर उस एक कक्ष से दूसरे कक्ष में जाने के चंद क़दमों के दौरान हुआ बदलाव आज भी पहेली बना हुआ है ! 

बुधवार, 12 जुलाई 2023

आपा खोती प्रकृति

आज हजारों टन मिट्टी, पत्थर, चट्टाने जो पहाड़ों से अलग नीचे बिखरी पड़ी हैं, उन्हें वापस पहाड़ों पर फिर से ले जाया, लगाया तो नहीं जा सकता ! जीवन सुचारु बनाने के लिए वैसे छोड़ा भी नहीं जा सकता ! तो..........!  तो वही होगा जो वर्षों से होता चला आया है ! नदियों के तल ऊँचे होते चले जाएंगे ! फिर नदियाँ उफान पर आएंगी और फिर...!  इसके बावजूद क्या भविष्य में इंसान कोई सबक लेगा ? सुधरेगा ? यक्ष प्रश्न है कि क्या सुधरना उसके अपने बस में रह भी गया है ........?    

कई दिनों के चिंताजनक इंतजार के बाद आज सुबह, वहां फोन सेवा बहाल होने पर, भाई जीवन का हिमाचल से फोन आया ! सभी की सुरक्षा का हाल जान कुछ तसल्ली मिली ! पर हालात बहुत ही सोचनीय बने हुए हैं ! प्रदेश भर में निजी संपत्तियों को बेहिसाब नुकसान हुआ है तथा पूरे प्रदेश में सामान्य जनजीवन प्रभावित है। जो कुछ लोग पानी की आपदा से सुरक्षित हैं, वे अन्य कारणों से असुरक्षित हैं ! पीने के पानी की बेहद तंगी है ! समुद्र जैसा हाल हो गया है कि चारों ओर पानी ही पानी पर पीने को ज़रा सा भी नहीं ! बच्चों को दूध मिलना मुश्किल हो रहा है ! खाने का सामान है तो पकाने की चिंता सामने खड़ी है ! गैस ख़त्म हो जाए तो पकाने का और कोई साधन उपलब्ध नहीं है ! लकड़ियां गीली हैं ! बिजली बंद है ! सूखे उपले मिल नहीं रहे ! कोई बीमार पड़ जाए तो डॉक्टर के पास ले जाना दूभर है ! 

बार-बार चेताने के बावजूद, अपनी बेजा हरकतों से बाज नहीं आने वाले मनुष्यों को सबक सिखाने के लिए प्रकृति कितना और कब तक इंतजार करे ! और क्यों करे ! इंसान तो बाज आने से रहा ! पर क्रोधावस्था में रौद्र रूप धारण कर वह निर्दोष पशु-पक्षियों, लता-गुल्मों-पादपों का, यानी अपना भी संहार करती चली जा रही है ! मजबूरी है घुन का पिसना ! पहाड़ों के पेड़ों को अपने घरों को सुंदर और पुख्ता बनाने की ललक ने उनको अपनी जमीन से अलग तो कर दिया पर वही आशियाने तिनकों की तरह पानी के सैलाब में बह गए ! क्या मिला ? इसके बावजूद भविष्य में इंसान कोई सबक लेगा ? सुधरेगा ? पर यक्ष प्रश्न है कि क्या सुधरना उसके अपने बस में रह भी गया है ?  

आज हजारों टन मिट्टी, पत्थर, चट्टाने जो पहाड़ों से अलग नीचे बिखरी पड़ी हैं, उन्हें वापस पहाड़ों पर फिर से ले जाया, लगाया तो नहीं जा सकता ! जीवन सुचारु बनाने के लिए वैसे छोड़ा भी नहीं जा सकता ! तो..........!  तो वही होगा जो वर्षों से होता चला आया है ! सारा का सारा मलबा घाटियों में धकेल दिया जाएगा ! जो समय के साथ नदियों में जा गिरेगा ! नदियों के तल ऊँचे होते चले जाएंगे ! फिर पानी बरसेगा, फिर बर्फ पिघलेगी, फिर नदियाँ उफान पर आएंगी और फिर........!  

पर सारा दोष तो उस लालच को नहीं दिया जा सकता जिसने प्रकृति का दोहन किया ! सुदूर पहाड़ों या दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाले भले ही प्रकृति की गोद में रह रहे हों पर उनका रोजमर्रा का जीवन अति कष्टकारी था ! देश के विकास का असर, अन्य संसाधनों-सुविधाओं की पहुँच उन तक ना के बराबर थी ! सेना के आवागमन के लिए सड़कें तो थीं पर पर्याप्त नहीं थीं ! फिर दुर्गम क्षेत्रों में आने-जाने के लिए, सामान पहुंचाने के लिए मार्ग बने ! आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने के लिए पर्यटन को बढ़ावा दिया गया ! सुविधाएं बढ़ीं तो लोग पहुँचने लगे ! भीड़ बढ़ी तो उनके रहने, ठहरने के लिए होटलों की जरुरत पड़ी ! जिसके लिए जगलों को काट कर जगह बनाई गई ! जंगलों के वृक्ष कटे तो उनकी पकड़ के बगैर जमीन भुरभुरी हो गई ! फिर वही चक्र...! बरसात हुई, पहाड़ खिसके, नदी का तल ऊँचा हुआ , बाढ़ आई ! 

फिर वही ''तो''....! इस तो का तो सरल सा उपाय तो था, पर उस पर किसी ने अमल करने की जहमत नहीं उठाई ! कायनात का कायदा है, इस हाथ ले उस हाथ दे ! फिर कुदरत तो कभी भी उतना वापस भी नहीं चाहती, जितना वह लुटाती है ! पर हमारी खुदगर्जी ने यह भुला दिया कि किसी की भलमनसाहत का नाजायज फ़ायदा नहीं उठाना चाहिए ! क्या फायदा उस ज्ञान का, उस विकास का, जो अपने ही विनाश का कारण बने ! अभी भी यह एक चेतावनी ही है कि सुधर जाओ, नहीं तो...........!

शनिवार, 1 जुलाई 2023

छह करोड़ जिंदगियां. एक गुमनाम सा डॉक्टर, राष्ट्रीय डॉक्टर दिवस पर विशेष

कितने लोगों को पता है कि "ओआरएस" जैसे जीवन रक्षक मिश्रण का आविष्कारक एक भारतीय डॉक्टर था ! जिसकी पद्यति, ओ.आर.टी. ने अब तक विश्व भर में तकरीबन 6 करोड़ लोगों की जान बचाई है और भविष्य में और ना जाने कितने अनगिनत लोगों की जान बचाने का हेतु बनेगी ! पर इतनी बड़ी खोज करने वाले की कद्र उसी के देश में नहीं हो सकी ! अपने ही देश में वह गुमनाम सा हो कर रह गया ! उसका नाम तक अधिकाँश लोगों को नहीं पता ! एक तरह से गुमनामी के कोहरे में ही वह सबको अलविदा कह गया..........!

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

आज राष्ट्रीय डॉक्टर दिवस पर अपने ही देश के एक ऐसे डाक्टर की श्रद्धांजलि स्वरूप चर्चा, जिसके चिकित्सा क्षेत्र को दिए गए अपूर्व योगदान का अधिकांश देशवासियों को ही पता नहीं है !जबकि उनके आविष्कार का प्रयोग, जरुरत पड़ने पर, घर-घर में होता है। वे अगर चाहते तो अपने इस आविष्कार को पेटेंट करवा करोड़ों रूपए कमा सकते थे, पर उस सेवाभावी इंसान ने अपनी इस रामबाण खोज को मानवता के प्रति समर्पित कर बाजार में खुला छोड़ दिया, जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग उसका लाभ उठा सकें ! ज्यादा से ज्यादा जानें बचाई जा सकें ! इतना ही नहीं, जाते-जाते वे अपने जीवन भर की पूँजी भी आई.सी.एच, कोलकाता, को दान करते गए ! जहां उन्होंने पहली बार बाल रोग विशेषज्ञ के रूप में काम करना शुरू किया था ! वे थे डॉ. दिलीप महालनाबिस और उनकी ईजाद का नाम है, "ओआरएस" यानी ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्यूशन ! चौँकने के साथ-साथ गर्व महसूस करने की बात है कि इस जीवनदाई ओषधि की खोज हमारे अपने देश के ही एक डॉक्टर ने की थी !

डॉ. दिलीप महालनाबिस

अविभाजित बंगाल के किशोरगंज जिले में 12 नवम्बर 1934 में जन्मे दिलीप महालनाबिस ने 1958 में अपनी शिशु चिकित्सक की पढ़ाई कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में पूरी करने के बाद लंदन और एडिनबर्ग से भी डिग्री प्राप्त की ! वहीं क्वीन एलिजाबेथ हॉस्पिटल फॉर चिल्ड्रन के रजिस्ट्रार के रूप में चुने जाने वाले पहले भारतीय बने ! 1960 में स्वदेश लौट उन्होंने कोलकाता में काम करना शुरू कर दिया ! डॉ. दिलीप महालनाबिस उन कई डॉक्टरों में से थे, जिन्होंने बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम के दौरान 1971 में हैजा जैसी घातक बीमारी फैलने पर निस्वार्थ भाव से देश की सेवा की और लाखों लोगों की जान बचाई।  

उस समय हैजा के कारण मरने वालों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही थी। उन दिनों डिहाइड्रेशन का एकमात्र समाधान ड्रिप लगाना ही था ! डायरिया से पीड़ित अनगिनत लोगों की मदद के लिए एक बेहतर विकल्प ढूंढना बहुत जरुरी था ! ऐसी विकट परिस्थितियों में डॉ. दिलीप ने एक अनोखा पर सस्ता, मिश्रण तैयार किया, जिसे उन्होंने ओरल रिहाईड्रेशन सॉल्यूशन यानी ''ओ.आर.एस.'' का नाम दिया। इस सामान्य से मिक्सचर को पानी में मिला कर पिलाने से डिहाइड्रेशन दूर किया जा सकता था। इस तरह डॉ महालनाबिस ने बेहद सस्ती और कारगर ओरल रीहाइड्रेशन थेरपी (ओ.आर.टी.) को प्रचलित किया ! अन्य चिकित्सकों की लगातार आलोचना व प्रतिरोध के बावजूद उनका मानना था कि यह कार्य रोगियों के अप्रशिक्षित रिश्तेदारों द्वारा भी किया जा सकता है ! उन्होंने अपने पास ओ.आर.एस. के कई ड्रम भरवा कर रखे और परिवार और रिश्तेदारों से मरीज को घोल देते रहने को कहा। उनकी सोच और मेहनत रंग लाई और ओ.आर.एस. के चमत्कार से रोगियों में मृत्यु दर 30 प्रतिशत से घटकर 4 प्रतिशत से भी कम हो गई ! मरीज जल्द ही ठीक होकर घर भी लौटने लगे !  

अब तो विश्व स्वास्थ्य संगठन का भी यह मानना है कि ओरल रिहाईड्रेशन थेरेपी किसी भी  आपातकालीन स्थिति में दस्त से निर्जलीकरण की रोकथाम और उपचार के लिए इंट्रावेनस थेरेपी का एक विकल्प है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार ओ.आर.टी. ने तक़रीबन 6 करोड़ लोगों की जान बचाई है ! पर इतनी बड़ी खोज करने वाले की कद्र उसी के देश में नहीं हो सकी ! अपने ही देश में वह गुमनाम सा हो कर रह गया ! उसका नाम तक अधिकाँश लोगों को नहीं पता ! 

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नेत्र शल्य-चिकित्सा का विश्वसनीय केंद्र 

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दिलीप महालनाबिस एक अच्छे डॉक्टर, वैज्ञानिक, वनम्र और दयालु व्यक्ति थे, जो सदा देने में विश्वास करते रहे ! इतनी बड़ी खोज, जिससे वे दुनिया भर में मशहूर हो सकते थे, उसका मोह नहीं किया ! अब तक तकरीबन छह करोड़ और भविष्य में ना जाने कितने अनगिनत लोगों की जान बचाने का हेतु बनने वाला, एक तरह से गुमनामी के कोहरे में 15 अक्टूबर, 2022 को 87 साल की उम्र में सबको अलविदा कह गया ! मरणोपरांत, देश के 74वें गणतंत्र दिवस पर, भारत सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया ! देश और दुनिया के प्रति उनके योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा !    

गुरुवार, 15 जून 2023

दिल की जुबान हैं, आंसू

ऐसा समझा या माना जाता है कि कभी ना रोनेवाले या कम रोनेवाले मजबूत दिल के होते हैं ! पर डाक्टरों का नजरिया अलग है, उनके अनुसार ऐसे व्यक्ति असामान्य होते हैं ! उनका मन रोगी हो सकता है ! ऐसे व्यक्तियों को रोने की सलाह दी जाती है ! तो जब भी कभी आंसू बहाने का दिल करे (प्रभू की दया से मौके खुशी के ही हों) तो झिझकें नहीं ! पर इसके साथ ही यह भी ध्यान रहे कि आप के कारण किसी  के  आंसू ना  बहें .........!

#हिन्दी_ब्लागिंग  

दुनिया में शायद ही कोइ ऐसा इंसान होगा जिसकी आंखों से कभी आंसू न बहे हों ! जीवन के विभिन्न  हालातों, परिस्थितियों, घटनाओं  से इनका अटूट संबंध रहता है। समय कैसा भी हो, दुख का, पीड़ा का, ग्लानी का, परेशानी का, खुशी का, यह नयन जल, नयनों का बांध तोड़ खुद को उजागर कर ही देता है ! मन की विभिन्न अवस्थाओं पर शरीर की प्रतिक्रिया के फलस्वरुप आंखों से बहने वाला, जब भावनाएं बेकाबू हो जाती हैं तो मन को संभालने वाला, दुःख के समय मन को हल्का करने वाला, सुख के अतिरेक में भावनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम, हमारे शरीर का साथी है, यह "अश्रु" ! इतना ही नहीं सामान्य अवस्था में यह हमारी आंखों को साफ तथा कीटाणु-जीवाणु मुक्त भी रखता है। 
आंसू
इसके सामान्यतया तीन रूप होते हैं ! पहले हैं बेसल आंसू ! जो आंखों में नमी तथा स्नेहन की स्थिति बनाए रखते हैं, जिससे आँख साफ रहती है और आंखों का सूखेपन से होने वाले नुक्सान से बचाव होता है ! दूसरे होते हैं रीफ्लेक्स आंसू ! वह जल जो कभी धूल-कण या किसी कीड़े वगैरह के आँख में पड़ जाने से आंखों भर आता है, जिससे अवांछित वस्तु आँख से बाहर आ जाती है और तीसरा जो सबसे अहम् है, वह है साइकिक आंसू ! रुदन-समय पर बहने वाला रूप ! आंसू  हमारी मनोदशा को भी उजागर कर देते हैं ! दुख या सुख में निकलने वाले आंसू जाहिर कर देते हैं कि व्यक्ति खुश है या दुखी ! इसीलिए शायरों ने इन्हें दिल की जुबान कहा है ! वैसे बीमारी तथा भोज्य पदार्थ की तीक्ष्णता इत्यादि के कारण भी यह आंखों से बहने लगते हैं !  

आंसू का निर्माण "लैक्रिमल सैक" नाम की ग्रन्थी से होता है। भावनाओं की तीव्रता आंखों में एक रासायनिक क्रिया को जन्म देती है, जिसके फलस्वरुप आंसू बहने लगते हैं ! इसका रासायनिक परीक्षण बताता है कि इसका 94 प्रतिशत पानी तथा बाकी का भाग रासायनिक तत्वों का होता है। जिसमें कुछ क्षार और लाईसोजाइम नाम का एक यौगिक रहता है, जो कीटाणुओं को नष्ट करने की क्षमता रखता है। इसी के कारण हमारी आंखें जिवाणुमुक्त रह पाती हैं ! वैज्ञानिकों के अनुसार आंसूओं में इतनी अधिक कीटाणुनाशक क्षमता होती है कि इससे  छह हजार गुना ज्यादा  जल में भी इसका प्रभाव बना रहता है यानी एक चम्मच आंसू तकरीबन सौ गैलन पानी को कीटाणु रहित कर सकता है !

इन आंसुओं के बारे में वैज्ञानिक लंबे समय से रिसर्च कर रहे हैं ! प्रकृति की इस विलक्षण देन के अनुसंधान से कई अनोखे तथ्य सामने आए हैं ! जर्मन शोध की मानें तो महिलाएं, पुरुषों से अधिक रोती हैं ! महिलाओं के आंसुओं से संबंधित ग्लैंड पुरुषों से अधिक सक्रीय होते हैं और उनकी बनावट भी अलग होती है ! वैसे भी महिलाएं पुरुषों से ज्यादा भावुक होती हैं ! अब लोगों के "घंटों रोने" की बात मुहावरा बन चुकी है, क्योंकि आमतौर पर महिलाएं औसतन एक बार में कम से कम छह मिनट तक रोती हैं, जबकि पुरुषों के लिए आंसू बहने की अवधि आमतौर पर दो से चार मिनट तक ही होती है !    

बहुत छोटे बच्चे जब रोते हैं तो उनके आंसू नहीं बहते ! लगभग छः माह की उम्र होने तक रोने पर भी बच्चों की आँख से आँसू नहीं निकलते सिर्फ रोने की आवाज ही आती है ! आंसू बनाने वाला लैक्रिमल ग्लैंड आंखों के ऊपरी हिस्से में स्थित होता है ! बहुत अधिक आंसू बनने की दशा में ये आँखों से बाहर आने के साथ-साथ श्वास नली में भी चले जाते हैं, जिससे नाक बहने लगती है ! प्याज काटते वक्त इससे निकलने वाला ऑक्साइड, लैक्रिमल ग्लैंड को प्रभावित करता है ! यही वजह है प्याज काटते वक्त आंखों में जलन के साथ आंसू निकलते हैं। 
दुःख के आंसू 
प्राणी शास्त्रियों का कहना है कि सिर्फ बंदर ही ऐसा जीव है, जो दुख या तकलीफ में हमारी तरह आंसू बहाता है ! जानवर हमारी तरह आंसू बहाकर अपना दुख व्यक्त नहीं करते हैं। फिर भी जानवरों की आंखों से जो आंसू निकलते देखे जाते हैं, उनका जानवरों के दुख और तकलीफ से कोई लेना-देना नहीं है ! वह उनकी आँखों को साफ़ रखने की प्राकृतिक क्रिया है ! हम जब रोते हैं तो हमारी आंखों के चारों ओर की मांसपेशियों में खिंचाव होता है और हमारी अश्रुग्रंथियों पर दबाव पड़ता है, जिसकी वजह से आंसू बह निकलते हैं पर जानवरों में इस तरह की मांसपेशियां होती ही नहीं हैं ! उनका अपने दुःख-तकलीफ को जाहिर करने का दूसरा तरीका होता है !
खुशी के आँसू 
ऐसा समझा या माना जाता है कि कभी ना रोनेवाले या कम रोनेवाले मजबूत दिल के होते हैं ! पर डाक्टरों का नजरिया अलग है, उनके अनुसार ऐसे व्यक्ति असामान्य होते हैं ! उनका मन रोगी हो सकता है ! ऐसे व्यक्तियों को रोने की सलाह दी जाती है ! तो जब भी कभी आंसू बहाने का दिल करे (प्रभू की दया से मौके खुशी के ही हों) तो झिझकें नहीं ! पर इसके साथ ही यह भी ध्यान रहे कि हमारे कारण किसी और के आँसूं ना  बहें !
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आंसू की इस परिभाषा का भी ध्यान रखें -
It is a Hydraulic force through which Masculine WILL POWER defeated by Feminine WATER POWER. 😅

शुक्रवार, 9 जून 2023

यादगार यात्रा, डलहौजी-खजियार की

पहाड़ों में प्रचलित एक कहावत के अनुसार तीन Unpredictable ''W'' में से एक, Weather, का शाम होते-होते मिजाज बदलने लगा था ! आस-पास की पहाड़ियों पर घने काले बादल छाने व मंडराने लग गए थे ! इसके पहले कि उसका गुस्सा बढ़ता हमने अपने होटल की शरण लेना बेहतर समझा ! परंतु शॉपिंग का प्रेम कुछ लोगों को मॉल की ओर ले तो गया, पर बारिश ने प्रेम पर अपना आँचल डाल दिया, फिर क्या ! वही हुआ जो मंजूरे बरसात था ! कुछ लेना-खरीदना तो दूर जो अपने पास था वह भी पानी-पानी हो गया 😃

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

RSCB के मई के उत्तरार्द्ध के अमृतसर-चिंतपूर्णी यात्रा का अमृतसर के बाद दूसरा पड़ाव था, हिमाचल का खूबसूरत, छोटा सा पहाड़ी शहर डलहौजी ! सफर के दूसरे दिन होटल वगैरह की कार्यवाही निपटा, जालियांवाला बाग में श्रद्धांजलि अर्पित करने और दुर्गयाणा मंदिर के दर्शनों के पश्चात हमारी स्वस्थ-प्रसन्न टोली ने यहां से तक़रीबन 198 किमी दूर स्थित डलहौजी का रूख किया ! सड़क मार्ग से डलहौज़ी दिल्ली से 555 किमी तथा चंबा से 45 किमी है ! इसका निकटतम रेलवे स्टेहन पठानकोट यहां से 85 किमी की दूरी पर है !   

दुर्गियाना मंदिर 

जालियांवाला बाग, प्रवेश द्वार 

जालियांवाला बाग 

डलहौजी, 19वीं शताब्दी में भारत के ब्रिटिश गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौज़ी के नाम पर इसका नामकरण किया गया था ! धौलाधार पर्वत श्रृंखला की पांच पहाड़ियों, कैथलॉग, पोट्रेस, तेहरा, बकरोटा और बोलुन, पर बसा यह शहर, अपने सुरम्य परिदृश्य, अद्भुत वनों, प्राकृतिक दृश्यों, हरी, मृदु घास के मैदानों के लिए पर्यटकों में खासा लोकप्रिय है ! धुंध से घिरी धौलाधार पर्वत की घाटियां, उसकी स्वप्निल चोटियों से निकलती तेज प्रवाह नदियों के अनूठे घुमावदार मोड़, दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं ! यहां के ब्रिटिश कालीन, संरक्षित चर्च अपनी अनोखी वास्तुकला के चलते अभी भी बेहद दर्शनीय हैं ! 

डलहौजी

डलहौजी की शाम 
हाड़ी रास्ते के कारण डलहौजी के निर्धारित होटल तक पहुंचते-पहुंचते रात घिर आई थी ! कुछ बस यात्रा की थकान भी थी, सो कहीं बाहर ना जा, सभी सदस्यों ने चाय के सहारे एक साथ मिल-बैठ कर बेहतरीन समय का आनंद उठाया ! बेतकल्लुफ़ी के माहौल में एक-दूसरे को बेहतर तरीके से समझना-जानना हुआ ! कितनों की दबी-ढकी प्रतिभाएं सामने आईं ! एक-दूसरे के अनुभवों का, जानकारियों का आदान-प्रदान हुआ ! फिर सबने एक-दूसरे से विदा ली ! अगले दिन खजियार भी तो जाना था !

खजियार

खजियार
खजियार, कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भारत में एक से एक खूबसूरत, मनोरम व सकूनदायक पहाड़ी स्थल हैं। उन्हीं में से एक है, हिमाचल के डलहौजी शहर से करीब 24 किमी दूर एक मनोहारी स्थल, खजियार ! जिसने अपनी अत्यधिक प्राकृतिक सुंदरता के कारण, मिनी स्विटरजलैंड का खिताब हासिल किया हुआ है ! चारों ओर से चीड़ के वृक्षों से घिरे इसके बुग्याल में एक मनोरम झील भी है, जिसे खजियार लेक के नाम से जाना जाता है ! झील के पास ही एक नाग मंदिर है, जहां प्रस्तर से बनी नागदेवता की मूर्ति की विधिवत रोजाना पूजा की जाती है ! पहाड़ी स्थापत्य कला में निर्मित 10वीं शताब्दी का यह धार्मिक स्थल खज्जी नाग मंदिर के नाम से जाना जाता है। मंदिर के मंडप के कोनों में पांच पांडवों की लकड़ी की मूर्तियां स्थापित हैं। मान्यता है कि पांडव अपने अज्ञातवास के दौरान यहां आकर ठहरे थे। यहां की लोक-मान्यता के अनुसार इस जगह का नाम खज्जी नाग  के नाम पर पड़ा है, जिनका मूल निवास आज भी इसी झील में है !

खज्जीनाग मंदिर 
पंचपुला झरने की ओर 

पंचपुला झरना 
एक लोक कथा के अनुसार सदियों पहले पूंपर नामक इस गांव के लोगों को एक बार पहाड़ पर कुछ चमकीली चीज दिखाई दी ! उनके वहां खजाना समझ खुदाई करने पर चार नाग देवता प्रगट हुए ! जिनके आदेशानुसार उन्हें एक डोली में बैठा, नीचे ले आया जाने लगा, पर रास्ते में सुकरेही नामक स्थान पर डोली के अत्यधिक भारी हो जाने के कारण उसे वहीं रख देना पड़ा ! तब चारों नाग देवता वहां से अलग-अलग जगहों, खजियार, नधूईं, चुवाड़ी और जमुहार में जा कर बस गए ! तभी से इस जगह को खज्जी नाग के नाम पर खजियार या खज्जियार कहा जाने लगा ! खजियार के पास ही कई अन्य दर्शनीय स्थल भी हैं, जिनमें कालाटोप वन्यजीव अभ्यारण्य, पंचपुला, सुभाष बावली इत्यादि प्रमुख हैं !

                                                                 मस्ती, खुले दिल से           

लौटने का समय हो रहा था ! वैसे भी पहाड़ों में प्रचलित एक कहावत के अनुसार तीन Unpredictable ''W'' में से एक, Weather के स्वभाव में बदलाव आता दिख रहा था ! आस-पास की पहाड़ियों पर घने काले बादल छाने व मंडराने लग गए थे ! इसके पहले कि उसका मिजाज और खराब होता, हमने अपने होटल की शरण लेना श्रेयकर समझा ! परंतु इस हालात में भी शॉपिंग का प्रेम कुछ लोगों को मॉल की ओर ले ही गया ! पर बारिश ने उस प्रेम पर अपना आँचल डाल दिया ! फिर क्या....., वही हुआ जो मंजूरे बरसात था 😃   

-- कल धर्मशाला की ओर 

रविवार, 4 जून 2023

अटारी-वाघा, एक अनूठा अनुभव

देश प्रेम से ओत-प्रोत उस परिवेश में रमे-बसे लोग भूल गए थे गर्मी को, अपनी थकान को, अपनी भूख-प्यास को ! यदि कुछ था तो देश, देश की सेना और देश प्रेम ! यहां आ कर अपने और अपने पडोसी का फर्क साफ दिखाई-सुझाई पड़ने लगा था ! जहां इस ओर नाचते-गाते जयकारा लगाते हजारों-हजार लोग, वातावरण के साथ एकाकार हो रहे थे, वहीं चंद कदमों की दूरी पर, फाटक के दूसरी ओर पाकिस्तानी परिवेश में सन्नाटा पसरा हुआ था ! गिनती के पांच-सात लोग एक कोने में सिमटे बैठे थे ! वे भी शायद इधर की रौनक ही देखने आए लगते थे.........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

इस बार RSCB के कार्यक्रम के तहत मई के उत्तरार्द्ध में अमृतसर-डलहौज़ी-चिंतपूर्णी यात्रा की बागडोर मुझे संभालनी थी ! चूँकि सारी रूपरेखा हफ़्तों पहले से ही तय हो जाती है, इसलिए निर्धारित समय पर पड़ने वाली गर्मी जरा चिंता का विषय तो थी, पर मौसम के अजीबोगरीब उलटफेर के चलते पूरे मई के महीने ने अपने तेवर कुछ हद तक ढीले ही रखे ! हालांकि जब 22 मई की सुबह शताब्दी से चल कर हमारा तीस जनों का ग्रुप अमृतसर स्टेशन पर उतरा तो पारा 42-43 के बीच पींगे ले रहा था !  


अटारी-वाघा बॉर्डर भारत और पाकिस्तान के बीच एक अहम स्थान है। यह भारत और पाकिस्तान की सीमा पर स्थित है, जो अमृतसर (भारत) और लाहौर (पाकिस्तान) के बीच ग्रैंड ट्रंक रोड पर स्थित है। यहां रोजाना एक समारोह का आयोजन होता है जिसे बीटिंग रिट्रीट कहते हैं। जिसके दौरान संध्या समय दोनों देशों के झंडे सम्मान और विधिपूर्वक उतारे जाते हैं ! इस कार्यक्रम के लिए बार्डर को नियमित रूप से रोज पर्यटकों के लिए खोला जाता है। उस दिन यानी 22 मई की शाम वहां हमारी हाजरी लगनी थी ! इस तरह की यात्राओं की रूप-रेखा तैयार करने वाली, हमारी संस्था से वर्षों से जुड़ी, अनुभवी और दक्ष  FOXTRAV की टीम ने वहां सीटों की अग्रिम बुकिंग करवा रखी थी ! ऐसा न होने पर अपार भीड़ के कारण, उस भव्य परेड को सिर्फ वहां लगे बड़े स्क्रीन वाले टीवी पर ही देखना संभव हो पाता ! होटल में सामान वगैरह रख हम सब तकरीबन 4.30 बजे बॉर्डर पर पहुँच अपने निर्धारित स्थानों पर बैठ गए, जो सीमा पर के गेट के बिलकुल पास था ! 

हमारा ग्रुप 

अपार जन समूह वहां पहले से ही विद्यमान था ! गर्मी के बावजूद ठठ्ठ के ठठ्ठ लोग आए जा रहे थे ! लोगों का अटूट रेला, जिसमें बूढ़े, बच्चे, युवक, युवतियां, महिलाएं सभी शामिल थे, रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था ! ऊँची आवाज में बज रहे, देश प्रेम में पगे गाने लोगों के उत्साह को सातवें आसमान तक पहुंचा रहे थे ! बी.एस.एफ. का एक जवान अपनी तेज-तर्रार शैली में लगातार लोगों में जोश भरे जा रहा था ! उसका कौशल, उसकी ऊर्जा, उसकी शैली देखने लायक थी ! उस माहौल का वहां उपस्थित रह कर ही अनुभव किया जा सकता है ! शब्दों में वर्णन असंभव है ! 


असली भारत 
देश प्रेम से ओत-प्रोत उस परिवेश में रमे-बसे लोग भूल गए थे गर्मी को, अपनी थकान को, अपनी भूख-प्यास को ! यदि कुछ था तो देश, देश की सेना और देश प्रेम ! यहां आ कर अपने और अपने पडोसी का फर्क साफ दिखाई-सुझाई पड़ने लगा था ! जहां इस ओर नाचते-गाते, जयकारा लगाते हजारों-हजार लोग, वातावरण के साथ एकाकार हो गए थे, वहीं चंद कदमों की दूरी पर, फाटक के दूसरी ओर पाकिस्तानी परिवेश में सन्नाटा पसरा हुआ था ! गिनती के पांच-सात लोग एक कोने में सिमटे बैठे थे ! वे भी शायद इधर की रौनक ही देखने आए लगते थे !


उस ओर व्याप्त सन्नाटा 
सीमा पर झंडों को उतारने का समारोह एक दैनिक अभ्यास है ! जो दोनों देशों के सुरक्षा बलों द्वारा संयुक्त रूप से किया जाता है। झंडों को उतारने से पहले विशेष ड्रिल का आयोजन होता है जिसमें विस्तृत और लयबद्ध परेड में पैरों को जितना संभव हो उतना ऊंचा उठाना होता है ! यह समारोह हर शाम सूर्यास्त से ठीक पहले दोनों पक्षों के सैनिकों द्वारा धमाकेदार परेड के साथ शुरू होता है ! जैसे ही सूरज ढलता है, सीमा पर लगे लोहे के गेट खोल दिए जाते हैं और दोनों देशों के झंडों को पूरी तरह से समन्वित रूप से एक साथ उतार, सम्मान के साथ लपेट कर ले जाया जाता है ! इसके साथ ही समारोह एक रिट्रीट के साथ समाप्त हो जाता है ! जिसके बाद फाटकों को फिर से बंद कर दिया जाता है। इस अनोखे कार्यक्रम को देखने दोनों ओर के लोगों के साथ ही विदेशी पर्यटक भी शामिल होते हैं !   

उस दिन परेड की शुरुआत दो महिला कैडेट को करते देख, वहां उपस्थित हर देशवासी उनका अभिनंदन करने से खुद को नहीं रोक पा रहा था ! पड़ोस के देश में जहां महिलाओं का सांस लेना दूभर होता जा रहा है वहीं अपने यहां उनको देश की सुरक्षा में खड़ा देख हर नागरिक का मस्तक गर्व से ऊँचा हो जाता है ! अंत में मैं FOXTRAV और उनकी तरफ से हमारे साथ आए अंकित राजपूत को हार्दिक धन्यवाद देना चाहूंगा, जिन्होंने हम वरिष्ठ नागरिकों की अपने घर के बुजुर्गों की,  बिना किसी शिकायत और थकान के, देख-रेख और सहायता की ! उनके सहयोग की जितनी तारीफ की जाए कम है ! 

जय हिंद, जय हिंद की सेना !

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