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गुरुवार, 1 जनवरी 2026

कौंडिन्य, जिनके नाम पर नौसेना के पाल-पोत का नामकरण हुआ

जिसने हजारों साल पहले हिंद महासागर से दक्षिण पूर्व एशिया तक की सफल समुद्री यात्राएं ही नहीं कीं थीं, बल्कि दक्षिण पूर्व एशिया में फुनान साम्राज्य, जो मेकांग डेल्टा क्षेत्र में स्थित था, की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी ! जिसने ऐसा अनोखा इतिहास रचने में अपना योगदान दिया था, उसी, अब तक एक तरह से अज्ञात, गुमनाम महान नाविक को सम्मान देते हुए भारतीय नौसेना ने अपने इस नये जहाज का नाम INSV कौंडिन्य रख, देशवासियों को उससे परिचित करवाया है ! इसके लिए नौसेना को साधुवाद..........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

इस साल के अंत में एक अद्भुत, सुखद घटना घटी ! जब भारतीय नौसेना ने अपना एक खास अग्रणी ''सिला हुआ पाल-पोत,'' INSV कौंडिन्य सोमवार, 29 दिसंबर को गुजरात के पोरबंदर से ओमान के मस्कट तक भारत की प्राचीन समुद्री परंपराओं के परीक्षण तथा प्राचीन समुद्री व्यापार मार्ग का पता लगाने के लिए रवाना किया। 19.6 x 6.5 x 3.3 आयामी इस जहाज में 17 नाविक सवार हैं, जिनका नेतृत्व कमांडर विकास सोरेन तथा उनके सहायक कमांडर वाई हेमंत कुमार संभालेंगे। कौंडिन्य उन 1400 की.मी. लंबे ऐतिहासिक समुद्री मार्गों का प्रतीकात्मक पुनरावलोकन करेगा, जिन्होंने सहस्राब्दियों तक भारत को व्यापक हिंद महासागर क्षेत्र से जोड़े रखा था। 

इतिहास रचने की तैयारी

नौसेना का हिस्सा 
कौंडिन्य की विशेषता यह है कि यह आज के आधुनिक नौसैनिक जहाजों से बिलकुल अलग है। कौंडिन्य में ना कोई इंजन है, नाहीं आधुनिक प्रोपल्शन तकनीक। इसे अजंता की गुफाओं में दर्शाए गए एक जहाज के चित्र के आधार पर, लकड़ी के तख्तों से, 2000 साल से भी अधिक पुरानी जहाज निर्माण पद्धति के अनुसार बनाया गया है। इसमें लोहे या धातु की कीलों का प्रयोग ना कर, नारियल के रेशों, उसकी रस्सियों, मछली के तेल, प्राकृतिक राल, और लाल ईंटों के चूर्ण का उपयोग किया गया है। एक तरह से यह एक सिला हुआ जहाज है। यह समुद्र की लहरों, हवा और अपने पाल के सहारे ही अपनी यात्रा पूरी करेगा !

कौंडिन्य 

पूर्णतया सिला हुआ 
इसका नाम रखा गया है कौंडिन्य ! कौन थे ये ? जिनके नाम पर इस जहाज का नाम रखा गया ! तो यह उस भारतीय व्यक्ति का नाम है, जिसने हजारों साल पहले हिंद महासागर से दक्षिण पूर्व एशिया तक की सफल समुद्री यात्राएं ही नहीं की थीं बल्कि दक्षिण पूर्व एशिया में फुनान साम्राज्य, जो मेकांग डेल्टा क्षेत्र में स्थित था, की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी ! पर जिसके बारे में हमारे छद्म इतिहासकारों ने कभी बताया ही नहीं ! हम तो अब तक कोलंबस, वास्कोडिगामा आदि को ही साहसी नाविक मानते रहे थे ! 
गर्व के पल 
कौंडिन्य का जन्म कलिंग राज्य के एक ब्राह्मण परिवार हुआ था ! वे एक महान विद्वान तथा निडर साहसिक नाविक थे। जो हिंद महासागर से दक्षिण पूर्व एशिया तक की अपनी यात्राओं के लिए जाने जाते रहे हैं। उनकी कहानी ऐतिहासिक तथ्य और पौराणिक कथाओं का मिश्रण है, जो भारत और दक्षिण पूर्व एशिया के बीच गहरे सांस्कृतिक और समुद्री संबंधों का प्रतीक है। एक कुशल नाविक के रूप में अपनी उपलब्धियों के अलावा, कौंडिन्य वैदिक ज्ञान में और मार्शल आर्ट में भी पारंगत थे। जो हमारे प्राचीन खोजकर्ताओं की बहुआयामी विलक्षणता को दर्शाता है ! 

तब कितनी कठिन रही होगी यात्रा 
कौंडिन्य का विस्तृत विवरण प्राचीन चीनी अभिलेखों में उपलब्ध है, जिनके अनुसार, कौंडिन्य ने बंगाल की खाड़ी के पार, दिव्य स्वप्न द्वारा निर्देशित हो एक यात्रा शुरू की। मेकांग डेल्टा में कौंडिन्य और उनके चालक दल पर समुद्री लुटेरों, जिसका नेतृत्व एक नागा (सर्प) कबीले के मुखिया की बेटी रानी सोमा कर रही थी, ने हमला कर दिया। जिसमें इन्होंने सोमा की सेनाओं को हराया। कौंडिन्य के साहस और कौशल से प्रभावित हो कर रानी सोमा ने उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा, जिसे कौंडिन्य ने स्वीकार कर लिया।


समय के साथ कौंडिन्य ने फुनान साम्राज्य की स्थापना कर, व्याधपुरा (वर्तमान कंबोडिया) में बा फनोम को अपनी राजधानी के रूप में स्थापित किया। कौंडिन्य और रानी सोमा के विवाह को व्यापक रूप से भारतीय और स्थानीय खमेर संस्कृतियों के संबंधों की सुदृढ़ता के रूप में माना जाता है। इस सांस्कृतिक एकीकरण ने एक संपन्न सभ्यता की नींव रखी। समय के साथ, फुनान समुद्री व्यापार के एक प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित हुआ।    

सन्नद्ध 

जिसने ऐसा इतिहास रचने में अपना योगदान दिया था, उस, अब तक एक तरह से, अज्ञात, गुमनाम महान नाविक को सम्मान देते हुए भारतीय नौसेना ने अपने इस नये जहाज का नाम INSV कौंडिन्य रख, देशवासियों को उससे परिचित करवाया है ! इसके लिए नौसेना का हार्दिक आभार और साथ ही साधुवाद !

@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

शनिवार, 1 जुलाई 2023

छह करोड़ जिंदगियां. एक गुमनाम सा डॉक्टर, राष्ट्रीय डॉक्टर दिवस पर विशेष

कितने लोगों को पता है कि "ओआरएस" जैसे जीवन रक्षक मिश्रण का आविष्कारक एक भारतीय डॉक्टर था ! जिसकी पद्यति, ओ.आर.टी. ने अब तक विश्व भर में तकरीबन 6 करोड़ लोगों की जान बचाई है और भविष्य में और ना जाने कितने अनगिनत लोगों की जान बचाने का हेतु बनेगी ! पर इतनी बड़ी खोज करने वाले की कद्र उसी के देश में नहीं हो सकी ! अपने ही देश में वह गुमनाम सा हो कर रह गया ! उसका नाम तक अधिकाँश लोगों को नहीं पता ! एक तरह से गुमनामी के कोहरे में ही वह सबको अलविदा कह गया..........!

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

आज राष्ट्रीय डॉक्टर दिवस पर अपने ही देश के एक ऐसे डाक्टर की श्रद्धांजलि स्वरूप चर्चा, जिसके चिकित्सा क्षेत्र को दिए गए अपूर्व योगदान का अधिकांश देशवासियों को ही पता नहीं है !जबकि उनके आविष्कार का प्रयोग, जरुरत पड़ने पर, घर-घर में होता है। वे अगर चाहते तो अपने इस आविष्कार को पेटेंट करवा करोड़ों रूपए कमा सकते थे, पर उस सेवाभावी इंसान ने अपनी इस रामबाण खोज को मानवता के प्रति समर्पित कर बाजार में खुला छोड़ दिया, जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग उसका लाभ उठा सकें ! ज्यादा से ज्यादा जानें बचाई जा सकें ! इतना ही नहीं, जाते-जाते वे अपने जीवन भर की पूँजी भी आई.सी.एच, कोलकाता, को दान करते गए ! जहां उन्होंने पहली बार बाल रोग विशेषज्ञ के रूप में काम करना शुरू किया था ! वे थे डॉ. दिलीप महालनाबिस और उनकी ईजाद का नाम है, "ओआरएस" यानी ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्यूशन ! चौँकने के साथ-साथ गर्व महसूस करने की बात है कि इस जीवनदाई ओषधि की खोज हमारे अपने देश के ही एक डॉक्टर ने की थी !

डॉ. दिलीप महालनाबिस

अविभाजित बंगाल के किशोरगंज जिले में 12 नवम्बर 1934 में जन्मे दिलीप महालनाबिस ने 1958 में अपनी शिशु चिकित्सक की पढ़ाई कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में पूरी करने के बाद लंदन और एडिनबर्ग से भी डिग्री प्राप्त की ! वहीं क्वीन एलिजाबेथ हॉस्पिटल फॉर चिल्ड्रन के रजिस्ट्रार के रूप में चुने जाने वाले पहले भारतीय बने ! 1960 में स्वदेश लौट उन्होंने कोलकाता में काम करना शुरू कर दिया ! डॉ. दिलीप महालनाबिस उन कई डॉक्टरों में से थे, जिन्होंने बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम के दौरान 1971 में हैजा जैसी घातक बीमारी फैलने पर निस्वार्थ भाव से देश की सेवा की और लाखों लोगों की जान बचाई।  

उस समय हैजा के कारण मरने वालों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही थी। उन दिनों डिहाइड्रेशन का एकमात्र समाधान ड्रिप लगाना ही था ! डायरिया से पीड़ित अनगिनत लोगों की मदद के लिए एक बेहतर विकल्प ढूंढना बहुत जरुरी था ! ऐसी विकट परिस्थितियों में डॉ. दिलीप ने एक अनोखा पर सस्ता, मिश्रण तैयार किया, जिसे उन्होंने ओरल रिहाईड्रेशन सॉल्यूशन यानी ''ओ.आर.एस.'' का नाम दिया। इस सामान्य से मिक्सचर को पानी में मिला कर पिलाने से डिहाइड्रेशन दूर किया जा सकता था। इस तरह डॉ महालनाबिस ने बेहद सस्ती और कारगर ओरल रीहाइड्रेशन थेरपी (ओ.आर.टी.) को प्रचलित किया ! अन्य चिकित्सकों की लगातार आलोचना व प्रतिरोध के बावजूद उनका मानना था कि यह कार्य रोगियों के अप्रशिक्षित रिश्तेदारों द्वारा भी किया जा सकता है ! उन्होंने अपने पास ओ.आर.एस. के कई ड्रम भरवा कर रखे और परिवार और रिश्तेदारों से मरीज को घोल देते रहने को कहा। उनकी सोच और मेहनत रंग लाई और ओ.आर.एस. के चमत्कार से रोगियों में मृत्यु दर 30 प्रतिशत से घटकर 4 प्रतिशत से भी कम हो गई ! मरीज जल्द ही ठीक होकर घर भी लौटने लगे !  

अब तो विश्व स्वास्थ्य संगठन का भी यह मानना है कि ओरल रिहाईड्रेशन थेरेपी किसी भी  आपातकालीन स्थिति में दस्त से निर्जलीकरण की रोकथाम और उपचार के लिए इंट्रावेनस थेरेपी का एक विकल्प है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार ओ.आर.टी. ने तक़रीबन 6 करोड़ लोगों की जान बचाई है ! पर इतनी बड़ी खोज करने वाले की कद्र उसी के देश में नहीं हो सकी ! अपने ही देश में वह गुमनाम सा हो कर रह गया ! उसका नाम तक अधिकाँश लोगों को नहीं पता ! 

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नेत्र शल्य-चिकित्सा का विश्वसनीय केंद्र 

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दिलीप महालनाबिस एक अच्छे डॉक्टर, वैज्ञानिक, वनम्र और दयालु व्यक्ति थे, जो सदा देने में विश्वास करते रहे ! इतनी बड़ी खोज, जिससे वे दुनिया भर में मशहूर हो सकते थे, उसका मोह नहीं किया ! अब तक तकरीबन छह करोड़ और भविष्य में ना जाने कितने अनगिनत लोगों की जान बचाने का हेतु बनने वाला, एक तरह से गुमनामी के कोहरे में 15 अक्टूबर, 2022 को 87 साल की उम्र में सबको अलविदा कह गया ! मरणोपरांत, देश के 74वें गणतंत्र दिवस पर, भारत सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया ! देश और दुनिया के प्रति उनके योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा !    

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