pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शनिवार, 20 अगस्त 2022

वामनराव बलिराम लाखे

उन दिनों स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े क्रांतिकारियों की गोपनीयता के चलते उनको उनके नाम से नहीं, बल्कि एक अलग उपनाम या कोड से पहचाना जाता था ! ऐसे में कुछ लोग अपने उपनाम से ही प्रसिद्ध हो उसी नाम से जाने लग गए थे ! 1930 में जब महात्मा गाँधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत की तो छत्तीसग़ढ के रायपुर जिले में उसकी बागडोर वामनराव लाखे, महंत लक्ष्मीनारायण दास, ठाकुर प्यारेलाल सिंह, शिवदास डागा और मौलाना रऊफ ने संभाली ! प्रचलन के तहत इन पाँचों को पांच पांडव के नाम से जाना जाने लगा, जिनमें वामनराव जी को युधिष्ठिर के रूप में जाना जाता था...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

सन 1857 की असफल जन-क्रांति के बावजूद, देश की जनता आजादी पाने के लिए सदा प्रयास रत रही थी ! इस मुहीम के यज्ञ में हजारों-हजार आजादी के परवानों की बिना किसी अपेक्षा के आहुतियां पड़नी बदस्तूर जारी थीं ! पर दुःख इस बात का है कि गुलामी से मुक्ति मिलते ही हम अपने कर्म-कांडों में ऐसे उलझे कि उन शूरवीरों को भूलाते चले गए ! आज हालत यह है कि नई पीढ़ी से यदि देश पर न्योछावर हुए वीरों के नाम पूछे जाएं, तो शायद हाथों की उंगलियां ज्यादा पड़ जाएंगी ! हालत तो ऐसी भी है कि लोगों को अपने ही शहर में स्थित किसी स्मारक का नाम, जो किसी क्रांतिवीर के नाम पर हो, तो पता होता है, पर उसके इतिहास के बारे में कोई जानकारी नहीं होती ! हर राज्य में ऐसे अनगिनत उदाहरण मिल जाएंगे ! हर राज्य पर काबिज राजनैतिक दल का, चाहे वह किसी भी विचारधारा से संबंधित हो, फर्ज बनता है कि वह अतीत की धुंध में खो गए उन महानायकों का परिचय वर्तमान पीढ़ी से करवाए ! उन्हें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि वे जो कुछ भी आज है वो उन्हीं की बदौलत हैं !

वामनराव बलिराम जी लाखे

उन दिनों स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े क्रांतिकारियों की गोपनीयता के चलते उनको उनके नाम से नहीं, बल्कि एक अलग उपनाम या कोड से पहचाना जाता था ! ऐसे में कुछ लोग अपने उपनाम से ही प्रसिद्ध हो उसी नाम से जाने लग गए थे ! 1930 में जब महात्मा गाँधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत की तो छत्तीसग़ढ के रायपुर जिले में उसकी बागडोर वामनराव लाखे, महंत लक्ष्मीनारायण दास, ठाकुर प्यारेलाल सिंह, शिवदास डागा और मौलाना रऊफ ने संभाली ! प्रचलन के तहत इन पाँचों को पांच पांडव के नाम से जाना जाने लगा ! सबसे बड़े और सामाजिक कार्यों में अग्रणी होने के कारण वामनराव जी, जिनका पूरा नाम वामनराव बलिराम लाखे था, को युधिष्ठिर भी कहा जाने लगा था ! जिनका जन्म दिन सितम्बर महीने में पड़ता है ! आज उन्हीं के बारे में संक्षिप्त जानकारी !  

श्री वामनराव बलिराम लाखे का जन्म 17 सितम्बर, 1872 को रायपुर, छत्तीसगढ़ में हुआ था। उनके पिता पंडित बलिराम गोविंदराव लाखे जी ने अपने कठोर परिश्रम से अपने परिवार की माली हालत सुधारी थी ! जब वामनराव जी का जन्म हुआ, उस समय तक उनके परिवार की गणना रायपुर क्षेत्र के समृद्ध घरानों में होने लगी थी। रायपुर से मैट्रिक पास करने और जानकी बाई जी से विवाहोपरांत वामनराव जी ने नागपुर से कानून की परीक्षा पास कर वापस रायपुर आ सार्वजनिक, सामाजिक व राजनीतिक कार्यों के साथ ही वकालत भी करनी शुरू की ! पर उनका उद्देश्य पैसे का अर्जन ना हो कर जन-साधारण की सेवा ही था, जिसमें उनकी पत्नी ने भी हमेशा उनका साथ दिया था।

वामनराव जी ने उस दौरान लोगों को जागरूक करने हेतु आंदोलनों के अलावा पत्रकारिता का भी सहारा लेते हुए माधवराव सप्रे जी, जो उनके स्कूल के साथी थे, के सहयोग से  "छत्तीसगढ़ मित्र", जो इस क्षेत्र की पहली पत्रिका थी, के प्रकाशन के द्वारा राष्ट्रिय चेतना का विकास करते हुए युवाओं को एक नई दिशा प्रदान की थी

श्री वामनराव बलिराम लाखे जी की निर्भीकता अनुकरणीय है ! एक सभा में उन्होंने अंग्रेजी शासन को गुण्डों का राज कह दिया था जिसके फलस्वरूप उन्हें एक साल की सजा और 3000 रुपये जुर्माना हुआ था ! 1941 में रायपुर के पास सिमगा में सत्याग्रह करते हुए गिरफ्तार कर चार महीनों के लिए नागपुर जेल भेज दिया गया था ! उस वक्त उनकी उम्र 70 वर्ष की थी ! इसके छह साल बाद जब देश आजाद हुआ तो उन्होंने 15 अगस्त को रायपुर के गाँधी चौक में तिरंगा फहराया !

वामनराव लाखे स्कूल, रायपुर 
श्री वामनराव जी अपने मृदु स्वभाव और सामाजिक कार्यों के कारण लोगों में अति लोकप्रिय थे ! उन्होंने उस समय सहकारिता के क्षेत्र में जो कार्य किए थे, उन प्रयासों का लाभ आज भी छत्तीसगढ़ के किसानों को मिल रहा है ! उन्होंने उस दौरान लोगों को जागरूक करने हेतु आंदोलनों के अलावा पत्रकारिता का भी सहारा लेते हुए माधवराव सप्रे जी, जो उनके स्कूल के साथी थे और उनके नाम पर भी एक जाना-माना स्कूल रायपुर में है, के सहयोग से  "छत्तीसगढ़ मित्र", जो इस क्षेत्र की पहली पत्रिका थी, के प्रकाशन के द्वारा राष्ट्रिय चेतना का विकास करते हुए युवाओं को एक नई दिशा प्रदान की थी ! इन्होंने ही रायपुर में कोऑपरेटिव सेन्ट्रल बैंक की स्थापना की थी ! बलौदा बाजार स्थित 75 वर्ष पुराना सहकारी किसान राइस मिल लाखेजी की यादगार कर्मठता और संगठन क्षमता की निशानियां हैं। उम्र भर खादी धारण करने वाले वामनराव जी ने बच्चों व युवाओं को शिक्षित करने के लिए स्कूल-कॉलेज भी खुलवाए ! रायपुर में "ए.वी.एम. स्कूल" की स्थापना में उनका महत्वपूर्ण योगदान था ! इसीलिए उनकी मृत्यु के पश्चात, उनके सम्मानार्थ इस स्कूल का नाम बदलकर "श्री वामनराव लाखे उच्चतर माध्यमिक शाला" कर दिया गया !

स्कूल का अंदरूनी भाग 
अब रायपुर की इस ऐतिहासिक शाला को ही लें ! इस लोकप्रिय स्कूल का नाम तो बहुत प्रसिद्ध है, पर वामनराव जी के बारे में लोगों को उतनी जानकारी नहीं है ! ऐसी एक नहीं हजारों धरोहरें देश भर में बिखरी पड़ी हैं ! जिनका संबंध किसी राजनैतिक दल से नहीं बल्कि देश से जुड़ा हुआ है ! पर बीतते समय के साथ उनका स्वर्णिम इतिहास धीरे-धीरे काल के गाल में समाता जा रहा है ! हम सब की हर प्रांत के मुखियाओं से यही प्रार्थना है कि वे बिना किसी भेद-भाव के, मातृभूमि को सदियों की गुलामी से मुक्ति दिलाने में सर्वस्व समर्पित करने वाले बलिदानियों की उपेक्षित पावन स्मृतियों को संरक्षण प्रदान करें ! उन्हें सहेजें ! उनका प्रचार करें ! उनकी तथा उनसे जुड़े लोगों की विशेषता बतलाने का इंतजाम करें, जिससे पश्चिमोत्तर मुखी हमारी वर्तमान पीढ़ी इतिहास के सच से अवगत हो सके ! गर्व कर सके अपने पूर्वजों पर, जिनके प्रयास से ही हम खुली हवा में सांस ले पा रहे हैं ! 

जय हिंद -

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

बुधवार, 17 अगस्त 2022

हमें अपने बचपन को बचाए रखना है

हमारे विद्वान ऋषि-मुनियों ने अपने ग्रंथों में शिक्षा देते समय मानवता पर, इंसानियत पर जोर दिया है ! यदि इंसान इंसानियत ना छोड़े, मानव; महामानव बनने की लालसा में मानवता से दूर ना चला जाए, तो इस धरा पर कभी भी शांति, सौहार्द, परोपकार का माहौल खत्म ना हो ! ना किसी युद्ध की आशंका हो ! ना प्रकृति के दोहन या उससे छेड़-छाड़ की गुंजाइश बचे ! नाहीं कायनात को अपना रौद्र रूप धारण करने की जरुरत हो..........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

अब तो साफ लगने लग गया है कि प्रकृति हमसे रुष्ट हो चुकी है ! खफा तो बहुत पहले से ही थी, जिसका समय-समय पर एहसास भी दिलाती रही है ! पर अपने दर्प में चूर हमने कभी उसकी चेतावनियों पर ध्यान ही नहीं दिया ! इस धरा पर, प्रकृति पर लगातार बिना किसी अपराधबोध के जुल्म ढाते रहे ! उसके दिए अनमोल संसाधनों का शोषण करते रहे ! पर हर चीज की एक हद होती है ! आखिर कायनात ने भी हमें सबक सिखाने की ठान ही ली ! दुनिया भर में मौसम बदलने शुरू हो गए हैं ! कहीं अति वृष्टि, तो कहीं भयंकर सूखा ! कहीं पहाड़ दरक गए तो कहीं बादल फट गए ! कही बाढ़ ने कहर ढा दिया ! जहां सदियों से लोगों ने 25-30 से ऊपर तापमान ना देखा हो वहां पारा 45 के ऊपर जा टिका है ! पहाड़ों में जहां कभी घरों की छत में पंखा टांगने के हुक की जरुरत महसूस नहीं हुई, वहां कूलर बिकने शुरू हो गए हैं ! सागरों ने अपना अलग रौद्र रूप धारण कर लिया है !  पर बाज हम फिर भी नहीं आ रहे !

बाढ़ की विभीषिका 
अभी हाल ही के गर्म मौसम ने सबकी ऐसी की तैसी कर धर दी थी ! विभिन्न इलाकों में गर्मी ने तकरीबन 2000 से अधिक लोगों को मौत की नींद सुला दिया ! कुछ वर्ष पहले तक गर्मी से बचने लोग पहाड़ों का रुख किया करते थे, पर अब वहाँ भी पारे का 40 डिग्री तक पहुँच जाना आम बात हो गई है ! उस पर पानी की बेहद तंगी ! ऐसे में मैदानी भागों के हाल का अंदाजा बखूबी लगाया जा सकता है ! 
 
गर्मी से दरकी जमीन 
विड़बना है कि हमारे जीवन से सादगी और सहजता पूरी तरह से तिरोहित हो चुकी है ! सहजता का मतलब जो जैसा है, वैसा ही सबको स्वीकार्य हो ! कोई भेद-भाव नहीं ! क्या प्रकृति के पाँचों मूल तत्व किसी से भेदभाव करते है ? हम भले ही उन्हें उनके रूप में ना स्वीकारें पर उनकी तरफ से कोई भेद-भाव नहीं होता ! उनके लिए पेड़-पौधे, लता-गुल्म, पशु-पक्षी, जानवर-इंसान सब एक बराबर हैं ! धरा ने अपने आँचल में सभी को समेट कर रखा है ! हरेक के लिए भोजन-आश्रय का प्रबंध किया है ! पानी सबको शीतलता प्रदान करता है, प्यास बुझाता है ! वायु प्राणिमात्र को समान राहत देती है, ऐसा नहीं कि वो मानव का ज्यादा ख्याल रखती हो और कंटीली झाड़ियों को बिना छुए निकल जाती हो ! अग्नि अपने दहन में कोई भेद-भाव नहीं करती ! आकाश सभी को अपनी गोद समान रूप से उपलब्ध करवाता है ! ऐसे में माँ प्रकृति की भी यही इच्छा रहती है कि जगत के समस्त प्राणी सबके हों सबके लिए हों ! पर मानव ने अपने हित के लिए सभी को हर तरह का नुक्सान ही पहुंचाया है !  
ढहते पहाड़ 
सृष्टि ने बनाया तो मानव को भी सहज, निश्छल, सरल बनाया है ! शैशवावस्था में उसमें कोई छल-कपट, वैर, अहम् नहीं होता ! प्रकृति के सारे, सहजता, सरलता, सादगी, निश्छलता जैसे गुण उसमें मौजूद होते हैं ! बचपन में ये सारे गुण उसमें सुरक्षित रहते हैं ! इसीलिए वह सबसे हिल-मिल जाता है ! सबसे एक जैसा प्रेमल व्यवहार करता है ! किसी को हानि पहुंचाने की तो वह सोच भी नहीं सकता ! पर जैसे-जैसे बड़ा होता जाता है, आस-पास के माहौल, परिस्थितियों व अन्य कारणों से वह इन सब को भूलता चला जाता है ! सहजता की जगह आडंबर ले लेता है ! अहम् सर चढ़ बोलने लगता है ! परोपकार की जगह स्वार्थ ले लेता है ! खुद को ही महान समझने लगता है ! यहीं से वह प्राणिमात्र तो क्या प्रकृति का भी दुश्मन बन जाता है !  
भोला मासूम बचपन 
इसीलिए हमारे विद्वान ऋषि-मुनियों ने अपने ग्रंथों में शिक्षा देते समय मानवता पर, इंसानियत पर जोर दिया है ! यदि इंसान इंसानियत ना छोड़े, मानव; महामानव बनने की लालसा में मानवता से दूर ना चला जाए, तो इस धरा पर कभी भी शांति, सौहार्द, परोपकार का माहौल खत्म ना हो ! ना किसी युद्ध की आशंका हो ! ना प्रकृति के दोहन या उससे छेड़-छाड़ की गुंजाइश बचे ! नाहीं कायनात को अपना रौद्र रूप धारण करने की जरुरत हो ! इसके लिए हमें सिर्फ अपने बचपन को बचाए रखना है ! 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

रविवार, 14 अगस्त 2022

स्वतंत्रता दिवस और लाल किला

ब्रिटिश हुकूमत ने आजाद हिंद फौज के जांबाजों, जी एस ढिल्लन, कैप्टन शाहनवाज तथा कैप्टन सहगल पर यहीं मुकदमा चला उन्हें सजा देने की कोशिश की थी, पर उस समय सारा देश उनके पीछे खड़ा हो गया था। प्रचंड विरोध छा गया था पूरे देश में और डर के मारे अंग्रेजों को उन वीरों को मुक्त करना पड़ गया था। देश में विजयोत्सव मनाया गया और लाल किला उस विजय का प्रतीक बन गया। इसीलिए जब हमें आजादी मिली तब देश के पहले प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरु ने सर्वसम्मति से इसे पहले स्वतंत्रता दिवस पर झंडोतोलन के लिए सबसे उपयुक्त स्थल मान यहां से सारे राष्ट्र को संबोधित किया.......!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

स्वतंत्र भारत की पहली सुबह की अगवानी ! सारा देश रात भर सो ना पाया था ! अंग्रेजों के चंगुल से लहूलुहान स्वतंत्रता को छीन लाने में हजारों-हजार देशवासी मौत का आलिंगन कर चुके थे ! आखिर उनकी शहादत रंग लाई थी ! सारा देश जैसे सड़कों पर उतर आया था। लोगों की आंखें भरी पड़ी थीं खुशी और गम के आंसूओं से ! खुशी आजादी की, गम प्रियजनों के बिछोह का... !

आजादी का जश्न 
दिल्ली तो जैसे पगला सी गई थी। होती भी क्यों ना, आजाद देश की राजधानी जो थी ! रात के अँधेरे में भी नाचते-गाते लोगों के हुजूम के हुजूम, ठट्ठ के ठट्ठ बढ़े चले जा रहे थे, लाल किले की ओर ! हवा में भी जैसे स्वतंत्रता की भीनी-भीनी सुगंध घुल गई थी !आज यह एतिहासिक किला भी फूला नहीं समा रहा था अपने भाग्य पर ! बहुत उतार- चढ़ाव देख रखे थे, इसने अपने जीवन काल में ! जबसे शाहजहां, ने उस जमाने में करीब एक करोड़ की लागत से इसे नौ सालों में बनवा कर पूरा किया था, तब से आज तक यह अनगिनत घटनाओं का साक्षी रहा है ! देश के प्रमुख किले के खिताब का गौरव  इसे ऐसे ही नहीं मिल गया ! 
जहां यह किला मुगलों की शानो-शौकत का गवाह रहा था, वहीं करीब दो सौ साल बाद, अंतिम मुग़ल बादशाह की दर्दनाक मौत का अभिसाक्षी भी इसे बनना पड़ा ! सन 1857 की क्रांति में स्वतंत्रता संग्राम के वीरों ने अंग्रेजों को मात दे कर यहीं बहादुर शाह जफर को अपना सम्राट चुना था ! किला गवाह है, उस इतिहास का कि कैसे बदला लेने के लिए अंग्रेजों ने मौत का तांडव शुरु कर दिया था ! हजारों निहत्थे, बेकसूर, मासूम लोग मौत के घात उतार दिए गए ! कितनों को फांसी पर लटका दिया गया ! सैंकडों को काला पानी नसीब हुआ ! बुढे, बीमार, मजलूम बादशाह को कैद कर रंगून भेज दिया गया ! कितनी मांगें सूनी हो गईं ! कितनी गोदें उजड़ गईं ! कितनी आँखों का पानी सूख गया था ! जिनका कोई हिसाब नहीं ! इंसान का वहशीपन जैसे सजीव हो उठा था ! 
ऐसा नहीं है कि इसके पहले या बाद में इस दुर्ग ने जुल्मों-सितम नहीं देखे ! सालों बाद एक बार फिर 1945 में ब्रिटिश हुकूमत ने आजाद हिंद फौज के जांबाजों, जी एस ढिल्लन, कैप्टन शाहनवाज तथा कैप्टन सहगल पर यहीं मुकदमा चला उन्हें सजा देने की कोशिश की थी ! पर उस समय सारा देश उनके पीछे खड़ा हो गया था ! प्रचंड विरोध छा गया था पूरे देश में ! डर के मारे अंग्रेजों को उन वीरों को मुक्त करना पड़ गया था ! देश में विजयोत्सव मनाया गया और लाल किला उस विजय का प्रतीक बन गया ! इसीलिए जब हमें आजादी मिली तब देश के पहले प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरु ने सर्वसम्मति से इसे पहले स्वतंत्रता दिवस पर झंडोत्तोलन के लिए सबसे उपयुक्त स्थल मान, यहां से सारे राष्ट्र को संबोधित किया था ! उसके बाद से आज तक देश का हर प्रधान मंत्री यहां से झंडा फहरा कर अपने आप को गौरवांन्वित महसूस करता है ! यह किला हमारी आन-बान-शान का प्रतीक बन, गर्व से सर उठाए खड़ा है !
आप सभी को, असंख्य विडंबनाओं के बावजूद, देश की आजादी की 75 वीं सालगिरह पर अनेकानेक शुभकामनाएं ! हमारा देश दुनिया का सिरमौर बने ! सभी देशवासी सदा सुरक्षित, सुखी, स्वस्थ व प्रसन्न रहें ! यही कामना है !

वंदे मातरम, जय हिंद  

मंगलवार, 26 जुलाई 2022

श्रीराम वंशज बृहदबल ने कौरवों का साथ क्यों दिया

आश्चर्यचकित व विस्मित करने वाली बात यह है कि सुप्रसिद्ध इक्ष्वाकु वंश की पीढ़ी में राजा विश्रुतवंत के पुत्र तथा श्रीराम के वंशज और अयोध्या के राजा वृहद्वल ने, अधर्म पक्ष होते हुए भी, कौरवों का साथ क्यों दिया ? जबकि स्वंय प्रभु परमावतार के रूप में पांडवों के साथ थे ! ऐसी क्या मजबूरी या परिस्थिति थी कि युद्ध के सबसे निंदनीय, अनैतिक, अभिमन्यु हत्याकांड का भागीदार भी बनना पड़ा,,,,,,,,,,,!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
हमारे हिन्दू धर्म के मुख्यतम दो महान ग्रंथों में से एक महाभारत ! एक महान, अनुपम, धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक व दार्शनिक काव्य ग्रंथ ! जो विश्व का सबसे लंबा साहित्यिक ग्रंथ है ! जिसे आज भी प्रत्येक भारतीय के लिए एक अनुकरणीय प्रेणना स्रोत माना जाता है ! इसी ग्रंथ में श्रीराम जी के बाद श्रीविष्णु जी के, विश्वप्रसिद्ध, जन-जन में लोकप्रिय, जन-नायक, सर्वगुणसम्पन्न, आठवें परमावतार श्रीकृष्ण जी की कथा भी आती है ! जिन्होंने धर्म की रक्षा हेतु उस समय पांडवों का साथ दिया था ! 
सेनापति भीष्म द्वारा वृहद्वल को एक रथ का यानी रथी का ओहदा दिया गया था ! जो रथियों के ओहदे में अधिरथ और महारथ के बाद तीसरे क्रम का पद था ! जिससे उसकी सामर्थ्य और शक्ति का कुछ आकलन हो जाता है
भारतवर्ष के प्राचीन काल की इस ऐतिहासिक कथा के द्रोणपर्व में कथा के एक महत्वपूर्ण पात्र वीर अभिमन्यु का जिक्र आता है जिन्हें चक्रव्यूह में घेर कर कौरवों द्वारा छल पूर्वक मार डाला गया था ! उस समय युद्ध में कौरव सेना प्रमुख जयद्रथ, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, दुर्योधन, कर्ण, दु:शासनअश्वस्थामा जैसे सात महारथियों के अलावा, दुर्योधन, दू:शासन व शल्य के पुत्र, कर्ण के भाईयों सहित और भी बहुत से योद्धा मौजूद थे ! जिनमें से अधिकतर अभिमन्यु के हाथों मारे गए !

चक्रव्यूह 
उन्हीं कौरव-पक्षीय योद्धाओं में से एक था वृहद्वल या बृहदबल ! जिसको अभिमन्यु के तीक्ष्ण तीरों से वीर गति प्राप्त हुई थी ! आश्चर्यचकित व विस्मित करने वाली बात यह है कि सुप्रसिद्ध इक्ष्वाकु वंश की पीढ़ी में राजा विश्रुतवंत के पुत्र तथा श्रीराम के वंशज और अयोध्या के राजा वृहद्वल ने अधर्म पक्ष होते हुए भी कौरवों का साथ क्यों दिया ? जबकि स्वंय प्रभु परमावतार के रूप में पांडवों के साथ थे ! कोई तो कारण होगा जो विष्णुवतार श्रीराम जैसे मर्यादा पुरषोत्तम, धर्म-रक्षक, न्यायप्रिय, प्रजापालक, आदर्श शासक का वंशज होते हुए भी उसे कौरवों का साथ देना पड़ा ! इतना ही नहीं युद्ध के सबसे निंदनीय अभिमन्यु हत्याकांड का भागीदार भी बनना पड़ा ! उस समय ऐसा होने के लिए क्या परिस्थितियां थीं या क्या मजबूरियां थीं, यह पूर्णतया तो नहीं पता किया जा सकता, पर इतिहास खंगालने पर जो कुछ सामने आता है, उसी को कारण माना जा सकता है !  
महाभारत काल में तक आते-आते कोसल प्रदेश पांच भागों में विभक्त हो चुका था ! उस समय मध्य कोसल पर राम वंशज बृहदबल का शासन था, जिसकी राजधानी अयोध्या थी ! राजसूय यज्ञ की विजय यात्रा में भीम ने उसको पराजित किया था ! इस हार का क्षोभ भी पांडवों के विरुद्ध जाने का कारण हो सकता है ! तिस पर कुछ समय पश्चात कर्ण ने अपनी दिग्विजय प्रयाण के दौरान मध्य कोसल को अपने आधीन कर लिया था ! हो सकता है यह आधीनता भी एक कारण रहा हो, बृहद्बल को मजबूरीवश कौरवों का साथ देने का ! तीसरा कारण, जैसा कि ग्रंथों से पता चलता है कि पौराणिक काल में सेनानायक द्वारा योद्धाओं को उनकी योग्यता के अनुसार ही पद प्रदान किए जाते थे ! सेनापति भीष्म द्वारा वृहद्वल को एक रथ का यानी रथी का ओहदा दिया गया था ! जो रथियों के ओहदे में अधिरथ और महारथ के बाद तीसरे क्रम का पद था ! जिससे उसकी सामर्थ्य और शक्ति का कुछ आकलन हो जाता है ! जो भी हो युद्ध के तेहरवें दिन पद्मव्यूह द्वार पर अभिमन्यु से भीषण युद्ध के दौरान उसको वीर गति प्राप्त हुई थी ! 

मंगलवार, 19 जुलाई 2022

इंसानियत कभी खत्म नहीं होती

देश में अनगिनत लोग ऐसे हैं जो अपने दायरे में रह कर दूसरों की मदद करना चाहते हैं पर उन्हें समझ नहीं आता कि शुरुआत कैसे करें ! इसलिए शेकर जैसे परोपकारी नजरिया रखने वाले लोगों के उपक्रम का देश के ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचना अति आवश्यक है ! जिससे और लोग भी अपने तरीके से समाज की सेवा कर सकें ! साथ ही उन पराजीवियों व मुफ्तखोरों को भी सबक मिल सके जो अपने जीवनयापन के लिए भी सदा दूसरों के मोहताज रहते हैं ! अपनी जिंदगी का बोझ समाज के कंधों पर लाद देते हैं ! खुद की अक्षमता का दोषारोपण भी सरकार  पर करते रहते हैं...........! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

किसी की भलमनसाहत देख अक्सर सुनने में आता है कि इंसानियत अभी जिन्दा है ! पर सच्चाई तो यह है कि भलमनसी कभी खत्म नहीं होती ! इंसान पर चाहे कैसी भी मुसीबत आ जाए ! परिस्थितियां कितनी भी बिगड़ जाएं ! हताशा-निराशा चाहे कितना भी अँधेरा फैला लें, पर सुजनता या भलमनसत सदा उजास फैलाती रही है ! वह सदा इस दुनिया में बनी रही है और आगे भी बनी रहेगी ! इसके दसियों उदाहरण यदा-कदा सामने आते ही रहते हैं ! जो यह भी बताते हैं कि यदि इंसान में नेकी है, तो पता नहीं कौन सी घटना कब और कैसे उसकी जिंदगी की दशा और दिशा ही बदल दे ! 

अभी पिछले दिनों दुनिया पर एक भीषण कहर टूटा था कोविड के रूप में ! ना कोई इलाज था, न कोई दवा ! सारी दुनिया में हाहाकार मच गया था ! छोटा-बड़ा, अमीर-गरीब, सक्षम-सर्वहारा सभी इस की चपेट में आ गए थे ! इंसान को संभलने में ही महीनों लग गए थे ! सब कुछ अस्त-व्यस्त हो कर रह गया था ! ऐसे में भी मानवता पीछे नहीं रही ! इस भारी विपदा में भी, बिना अपने हित की चिंता किए, सैंकड़ों लोग सामने आए बिना किसी अपेक्षा-लालच या चाहत के और जुट गए दूसरों को बचाने, उनकी सहायता करने, बावजूद इसके कि उन्हें खुद मदद या सहायता की सख्त जरुरत थी ! उदाहरण तो अनेक हैं पर आज उसकी बात जिसने खुद मुसीबत में रहते हुए, कुछ कर गुजरते हुए, एक लक्ष्य निर्धारित किया, लोगों को राह दिखाई !

शेकर पुवरासन, इलेक्ट्रानिक्स और कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग का डिप्लोमा धारक ! अच्छी-खासी नौकरी ! पर कोविड के ज्वालामुखी में, हजारों लोगों की तरह इनकी आमदनी का जरिया भी भस्मीभूत हो कर रह गया ! बेरोजगारी का तनाव, घर पर बीमार पिता की चिंता, मुफलिसी का आलम, इन्हीं सब बातों से परेशान एक दिन सागर तट पर चहलकदमी करते हुए उन्हें चाय की दूकान पर बेहद दयनीय अवस्था में एक बुजुर्ग दिखाई पड़ा ! जिसे देख कर ही लगता था कि उसने कई दिनों से कुछ नहीं खाया है ! शेकर की जेब में भी सिर्फ दस रूपए ही थे ! फिर भी उसने बुजुर्ग को चाय पिलवा दी ! चाय पीने के बाद बुजुर्ग की आँखों के संतोष और धन्यवाद के भाव शेकर के दिल में बस गए ! उसे लगा कि अगर किसी भी इंसान को खाने के लिए गिड़गिड़ाना या भीख मांगना पड़े तो ये बेहद शर्मनाक बात है ! उसने तय किया कि जहां तक संभव होगा वह भूखे लोगों की मदद करेगा ! हालांकि उसके खुद की आर्थिक स्थिति बेहद डांवाडोल थी ! पर जहां चाह होती है वहां कोई न कोई राह निकल ही आती है ! 

बड़ी मुश्किल और खींचतान कर कुछ पैसों का जुगाड़ कर तिंडीवनम पुड्डूचेरी हाईवे इलाके में सड़क के किनारे एक छोटे से ठेले, manithaneyam यानी इंसानियत, पर भोजन सामग्री का वितरण शुरू कर दिया ! आहार की कोई कीमत नहीं दर्शाई गई, उनके अनुसार जीवन प्रदान करने वाले अन्न की कोई कीमत नहीं हो सकती ! पर रोज तकरीबन 60-70 लोगों के भोजन की व्यवस्था में पैसा तो लगता ही है इसके लिए शेकर ने  पास ही एक बक्सा रखा है, जिस पर लिखा है, पे व्हॉट यू कैन (इच्छानुसार पैसे दीजिए) ! उनके अनुसार रोज का खर्च 1500 रूपए के लगभग होता है पर वापस तीन-चार सौ ही आते हैं ! इसकी भरपाई दोस्तों की और सोशल मीडिया से मिलने वाली मदद से हो जाती है ! उनका सपना अपने इस मॉडल को लोकप्रिय बना जरूरतमंदों की यथासंभव सहायता करने का है, जिससे किसी को भी किसी के सामने भोजन के लिए गिड़गिड़ाना ना पड़े !

हमारे देश में अनगिनत लोग ऐसे हैं जो अपने दायरे में रह कर दूसरों की मदद करना चाहते हैं पर उन्हें समझ नहीं आता कि शुरुआत कैसे करें ! इसलिए शेकर जैसे परोपकारी नजरिया रखने वाले लोगों के उपक्रम का देश के ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचना अति आवश्यक है ! जिससे और लोग भी अपने तरीके से समाज की सेवा कर सकें ! साथ ही उन पराजीवियों व मुफ्तखोरों को भी सबक मिल सके जो अपने जीवनयापन के लिए भी सदा दूसरों के मोहताज रहते हैं ! अपनी जिंदगी का बोझ समाज के कंधों पर लाद देते हैं ! खुद की अक्षमता का दोषारोपण भी सरकार को देते रहते हैं !

सोमवार, 11 जुलाई 2022

सोशल मीडिया की रेशमी अंधियारे पक्ष वाली सुरंग

जाहिर है कि खतरा बहुत बड़ा है ! पर इससे बचाव का एक सीधा-सरल तरीका यह भी है कि हम किसी भी चीज पर अपना मत प्रगट करने में जल्दबाजी से बचें ! सामने आई खबर या जानकारी का धैर्य से मनन करें ! तत्काल प्रतिक्रिया ना दें ! उतावलेपन या हड़बड़ी में कोई प्रतिक्रिया दे, बेवकूफ बनने या किसी के मंतव्य का शिकार होने से बेहतर है, कुछ देर से ही सही, सच जानना..........!    

#हिन्दी_ब्लागिंग 

तमाम हिदायतों, निर्देशों, चेतावनियों, समझाईशों के बावजूद हम सोशल मीडिया की रेशमी अंधियारे पक्ष वाली सुरंग की अंतहीन गहराइयों में बिना अपने विवेक का सहारा लिए धंसते चले जा रहे हैं ! सम्मोहित अवस्था में हमें अच्छे-बुरे, सही-गलत का भान ही नहीं रह गया है ! उस पर मिली किसी भी उल-जलूल, चकित करने वाली खबर या बात को हम बिना जांचे-परखे आगे धकेलने को आतुर हो जाते हैं ! इसके पीछे एक भावना यह भी रहती है कि दोस्त-मित्र-लोगों में अपने जानकार होने की धाक जमे, जबकि ज्यादातर यह हमें अहमक और गैर जिम्मेदार ही साबित करती रही है !  

इन सब की शुरुआत छोटे से पैमाने से हुई थी ! बहुतों को याद होगा कि व्हाट्सएप पर फरवरी में एक मैसेज जंगल की आग की तरह फैला रहता था कि ऐसी फ़रवरी 800 या 1200 या ऐसे ही किसी लम्बे समय के बाद आ रही है, जिसमें सोम से लेकर रवि तक सारे दिन बराबर-बराबर एक ही अंक 4 वाले हैं ! इस अद्भुत योग के बारे में सभी को बताएं इत्यादि... इत्यादि ! अब हम इस बात से चमत्कृत हो बिना सोचे कि भई लीप ईयर को छोड़ हर फरवरी ऐसी ही होती है, दनादन अपने अंगूठों से अपनी विद्व्ता का ढिंढोरा पीटने लग जाते थे ! वैसे ही एक अहमकाना मैसेज में दावा किया जाता था कि स्क्रीन पर दिख रहे अंकों में से आपके द्वारा चयनित अंक, कुछ देर स्क्रीन पर दिख रही आँखों को देखने से गायब हो जाएगा ! अंक गायब होता भी था पर सिर्फ चयन किया हुआ नहीं, स्क्रीन पर पहले दिख रहे सारे के सारे अंकों के साथ ! मैसिजिआए सज्जन अभिभूत हो उसे आगे धकेलने में संलग्न हो जाते थे ! ऐसा ही कुछ कर एक ढोंगी लाल-हरी चटनी खिला कर महीनों लोगों को सामूहिक रूप से बेवकूफ बनाता रहा था ! यह तो एक बानगी भर है ! 

अब यह खेल बड़े पैमाने पर होने लगा है ! किसी का नाम क्या लेना पर कोई भी अपना हित साधने के लिए यहां कुछ भी चेप रहा है ! असामाजिक तत्वों का तो यह एक हथियार ही बन चुका है ! आम अवाम की लापरवाही, धैर्यहीनता, अज्ञानता, अधकचरी जानकारी का लाभ उठा अपना उल्लू सीधा करना आज का चलन बन गया है ! सुनने में आ रहा है कि जापान के पूर्व प्रधान मंत्री की हत्या करने वाला उनके बारे में फैली एक बेबुनियाद अफवाह के कारण उनसे नाराज हो गया था ! हमारे यहां होने वाले दंगे-फसादों-उपद्रवों-उत्पातों में भी ऐसे ही फैलाई गई आधी-अधूरी, सच्ची-झूठी, असली-नकली जानकारियों का बहुत बड़ा हाथ होता है !

अभी कुछ दिन पहले ही हर जगह बिहार के सहायक प्राध्यापक ललन कुमार के नाम के चर्चे हो रहे थे कि उन्होंने अपनी अंतरात्मा की आवाज पर अपनी तनख्वाह के 23 लाख 82 हजार 228 रूपए बिहार यूनिवर्सिटी को वापस कर दिए ! हर तरफ उनकी नैतिकता, दरियादिली, विवेकशीलता की तारीफ हो रही थी ! तभी असली सच्चाई सामने आई कि वह शख्स अपनी मनपसंद जगह पर तबादले के लिए नौटंकी कर रहा था ! 


 बहुत पहले जबकि कम्प्यूटर का नाम भी लोगों के लिए अनजान सा था, लेखक व चित्रकार ली फ़ाक ने अपने कॉमिक्स के किरदार जादूगर मैंड्रेक की मार्फ़त एक आशंका जताई थी, जिसमें कम्प्यूटर मनुष्यों को गुलाम बनाना आरंभ कर देता है ! वह कल्पना आज साकार होती नजर आती है ! बच्चे और युवा तो इसके चंगुल में तक़रीबन फंस ही चुके हैं ! यदि जल्द कोई कदम नहीं उठाया गया तो यह दुनिया की  प्रमुख मौलिक समस्याओं में अग्रणी होगा ! अब तो डाटा चुराने का नया अपराध भी विकराल रूप लेता जा रहा है ! जिससे लोगों के जान-माल-निजिता हर चीज खतरे में पड़ गई है !

जाहिर है कि खतरा बहुत बड़ा है ! पर सावधानी, सतर्कता, धैर्य बचाव भी है ! इससे बचाव का एक सीधा-सरल तरीका यह भी है कि हम किसी भी चीज पर अपना मत प्रगट करने में जल्दबाजी से बचें ! सामने आई खबर या जानकारी का धैर्य से मनन करें ! तत्काल प्रतिक्रिया ना दें ! उतावलेपन या हड़बड़ी में कोई प्रतिक्रिया दे बेवकूफ बनने या किसी के मंतव्य का शिकार होने से बेहतर है कुछ देर से ही सही, सच जानना !  

बुधवार, 6 जुलाई 2022

विडंबना, हमारी........देश की

उसे पता ही नहीं चलता कि कब उनमें से ही एक लगने वाले के नीचे से सायकिल की गद्दी खिसक कर हवाई जहाज की सीट आ जाती है ! कब उन्हीं से मांग कर बीड़ी-चाय पीने वाले की दसियों फैक्ट्रियां बन जाती हैं ! कब उसके और "उसके अपने" के बीच कमांडो की फौज आ खड़ी हो जाती है ! वह जुमलों, आश्वासनों और दिखाए जा रहे दिवास्वप्नों से ऐसा सम्मोहित हो जाता है कि उसे आभास ही नहीं होता कि उसकी एकलौती कमीज तो चीथड़ों में बदल गई है पर उसके खेवनहार के शरीर को रेशम सहलाने लगा है.......!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
हमारे देश में कुछ लोग सदा से अनपढ़, अर्धशिक्षित, मूढ़ व भोले-भाले लोगों के अज्ञान और उनकी सरलता का लाभ उठा, उन्हें जाति-धर्म-वर्ण के मायाजाल में उलझा, वर्षों से अपना उल्लू सीधा करते आए हैं। अपनी परिस्थितियों को अपनी नियति मान लेने वाले उनके पिछ्ल्गुओं को कभी यह ख्याल तक नहीं आता कि हमारा भला चाह-चाह कर "दुबले" होने वाले हमारे किसी एक नेता ने भी आज तक क़भी अपने बेटे या बेटी की शादी किसी सर्वहारा से कर उसके परिवार से नाता क्यों नहीं जोड़ा ?  क्यों किसी नेता की औलाद आज तक सेना में नहीं गई ? क्यों नहीं उनके परिवार किसी सदस्य को आम इंसान की तरह किसी नौकरी की तलाश में जूतियां घिसनी पड़तीं ? क्यों जरा सी छींक आने पर भी ये विदेश भागने लगते हैं ? क्यों इनकी संतानें, लायक ना भी हों तो भी, विदेशों में शिक्षा पाने पहुँच जाती हैं ? क्यों इनकी नस्लें देश को अपनी बपौती मान लेती हैं ? क्यों इनके शहजादे ही राजा बनने का हक पा जाते हैं ? क्यों तो बहुत सारे हैं पर धर्म, जाती, भाषा की अफीम में उनको ऐसा गाफिल कर दिया जाता है कि वह सामने वाले की तरक्की को ही अपनी सफलता समझने लगता है !     

उस एक वोट की शक्ति वाले को आश्वासनों के सुनहरे संसार में ऐसा दिग्भर्मित कर दिया जाता है कि वह कुछ देख-समझ ही नहीं पाता ! उसे पता ही नहीं चलता कि कब उनमें से ही एक लगने वाले के नीचे से सायकिल की गद्दी खिसक कर हवाई जहाज की सीट आ जाती है ! कब उन्हीं से मांग कर बीड़ी-चाय पीने वाले की दसियों फैक्ट्रियां बन जाती हैं ! कब उसके और "उसके अपने" के बीच कमांडो की फौज आ खड़ी हो जाती है ! वह अपने नेता के जुमलों, उसके आश्वासनों, उसके द्वारा दिखाए जा रहे दिवास्वप्नों में ऐसा सम्मोहित हो जाता है कि उसे आभास ही नहीं होता कि उसकी एकलौती कमीज तो चीथड़ों में बदल गई है पर उसके खेवनहार के शरीर को रेशम सहलाने लगा है !   

ऐसा नहीं है कि किसी ने इनको समझाने की कोशिश नहीं की या ऐसा पहली बार लिखा जा रहा है ! कोशिशें तो बेशुमार हुईं, पर उनको नाकाम करने की पुरजोर कोशिश भी साथ-साथ हुई ! अपना दबदबा, अपनी सियासत, अपना रुआब, अपना राजपाट कौन छोड़ना चाहता है ! गाहे-बगाहे इस टकराव का भीषण परिणाम देश-समाज को झेलना पड़ता रहा है ! उधर जिनके हित के लिए प्रयास किए जाते हैं उन पर धर्म-भाषा-जाति की कॉकटेल का नशा इतना हावी है कि उनकी समझने-विचारने की क्षमता लुप्तप्राय हो गई है ! मदमत्त यही देख-सुन कर आह्लादित होता रहता है कि उसकी जाती-धर्म वाले की हैसियत राज करने वाली है !   

हर बार विभिन्न मंचों से घोषणाएं होती रहती हैं कि अशिक्षा का अंधकार दूर होना चाहिए, किया जाएगा ! पर ऐसा बोलने वाला भी कब चाहता है कि अँधेरा दूर हो ! क्योंकि तम हटते ही उसके खम जगजाहिर हो जाएंगे ! पर कोई भी चीज-समय-परिस्थिति स्थाई नहीं होती ! इसीलिए उस सुबह का आना भी तय है, जब अज्ञानता का अँधेरा छंटेगा, ज्ञान का सूरज सभी दिशाओं को आलोकित करेगा ! शायद थोड़ा सा और इंतजार करना पड़े पर बदलाव आना निश्चित है.......!

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