pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

कब और कैसे भारत, इंडिया हो गया

ये तो सिर्फ एक बानगी है कि कैसे, ऐसे कुछ ज्ञानियों ने दूध का दही और दही का रायता बना दिया होगा ! क्यूँ-कब-कैसे धीरे-धीरे कुछ का कुछ हो जाता है, क्या से क्या हो जाता है, महसूस ही नहीं हो पाता ! कब असल एक किनारे हो नए को जगह दे देता है, एहसास ही नहीं होता ! और एक बार चलन में आने के बाद वही असली लगने लगता है ! पुराने को कोई याद भी नहीं करता ! अंग्रेंजों ने अपनी सहूलियत के लिए, कुटिलता से कब, क्यूँ और कैसे भारत को इंडिया बना दिया, हम भारतवासियों को भी यह कहां पता चल पाया..............!!

#हिन्दी_ब्लागिंग  

अपने देश में हजारों ऐसे स्थानों या जगहों के नाम सुनने-जानने को मिल जाएंगे जिनका उस स्थान से दूर-दूर का रिश्ता नहीं होता। ना हीं उस नाम के अर्थ से उसका कोई संबंध होता है। फिर ऐसा क्यों ! एक संभावना यह लगती है कि ऐसा जाने-अंजाने, जुबान पर ना चढ़ने वाले कलिष्ट शब्दों के सहजीकरण और बोलने की सहूलियतानुसार हो गया होगा। ऐसी जगहों पर शोध किया जाए तो एक ग्रंथ ही बन जाए। पिछली पोस्ट में दो-तीन अजीबोगरीब शब्दों वाले मुहावरों की बात उठी थी ! उसी बहाव में कुछ ऐसी जगहों के नाम याद आ गए जिनसे मेरा संबंध रह चुका है ! ऐसे ही मेरे दो प्रत्यक्ष-प्रमाणित उदाहरण पेश हैं - 

सबसे पहले तो एक आपबीती ! जिसके याद आते ही आज भी हंसी आ जाती है ! बंगाल के साउथ चौबीस परगना जिले के बज बज इलाके में कैलेडोनियन (Caledonian) नाम की जूट मील थी (आज भी है) । तब मैं नार्थ चौबीस परगना में स्थित कमरहट्टी जूट मील में कार्यरत था। एक बार मैंने अपने क्लर्क को वहां के लिए एक ऑफिशियल पत्र का मजमून बता उसका ड्राफ्ट बनाने को कहा। जब वह लेटर टाइप कर लाया तो उसमें कैलेडोनियन की जगह कालीदुनिया लिखा हुआ था ! मैंने विस्मित हो पूछा, तो वह बोला कि यह नाम कभी सुना नहीं था और आपका उच्चारण समझ नहीं पाया, तो मैंने सोचा यह कालीदुनिया होगा सो......! उस दिन तो ना गुस्सा होते बना ना हीं हँसते, पर आज उस लम्हे को याद कर मुस्कराहट जरूर आ जाती है।

बज बज वही जगह है, जिसके फेरी घाट पर, 19 फरवरी 1897 में शिकागो की अपनी इतिहासिक यात्रा के बाद स्वामी विवेकानंद ने भारत भूमि पर पग धरे थे ! यहीं पर कोमागाटामारु जहाज आ किनारे लगा था 
ऐसा ही एक और उदाहरण ! कोलकाता से लगभग पन्द्रह की.मी. की दूरी पर टीटागढ नामक एक जगह है। यहां एक पेपर मिल भी है। सडक से यह स्थान कोलकाता से जुडा हुआ है। इसी के बाद अगला कस्बा बैरकपुर का है। वही बैरकपुर जो ब्रिटिश काल में अंग्रेजी फौजों का केंद्र हुआ करता था। आज यहां भारतीय सेना की छावनी है। बैरकपुर से कोलकाता के लिए अच्छी-खासी सरकारी व निजी बस-सेवा उपलब्ध है। इनमें निजी बसों के साथ चलने वाले सहायक लडके यात्रियों की सुविधा के लिए बस-स्टापों के नाम जोर-जोर से बोलते रहते हैं। बैरकपुर और टीटागढ के बीच एक बस स्टाप है जिसे ये लडके 'बडा मस्तान' के नाम से पुकारते हैं। जिसका अर्थ होता है, कोई बलशाली या दबंग इंसान या फिर कोई मशहूर पीर या सिद्ध बाबा ! समय के साथ मरणोंपरांत उसकी समाधी या मजार बना दी जाती है। छुटपन में इन सब बातों पर ध्यान कहां जाता है ! पर होश संभालने पर जब कुछ खोज-खबर लेनी चाही तो उस बस-स्टॉप के आस-पास कोई समाधी या मजार का पता नहीं लग पाया। लोगों से जानकारी ली तो भी यही पता चला कि ''ऐसा कोई फकीर यहां हुआ ही नहीं। हां, बस-स्टाप से थोडी दूरी पर एक छोटे से अहाते में एक मंदिर है। उस जगह को ब्रह्म-स्थान के नाम से जाना जाता है।'' तब जाकर ज्ञान-चक्षुओं ने यह रहस्य खोला कि यह ब्रह्म-स्थान ही धीरे-धीरे अनपढ़, नासमझ लडकों की 'नीम-हकीमी' के कारण बडा मस्तान का रूप लेता चला गया।

ये तो सिर्फ एक बानगी है कि कैसे ऐसे कुछ ज्ञानियों ने दूध का दही और दही का रायता बना दिया होगा ! क्यूँ-कब-कैसे धीरे-धीरे कुछ का कुछ हो जाता है, क्या से क्या हो जाता है, महसूस ही नहीं हो पाता ! कब असल एक किनारे हो नए को जगह दे देता है, एहसास ही नहीं होता ! और एक बार चलन में आने के बाद वही असली लगने लगता है पुराने को कोई याद भी नहीं करता ! अंग्रेंजों ने अपनी सहूलियत के लिए कुटिलता से कब, क्यूँ और कैसे भारत को इंडिया बना दिया, हम भारतवासियों को भी कहां पता चल पाया !!!

शनिवार, 13 फ़रवरी 2021

गदा, उल्लू व कुतका

ऐसी अनगिनत कहावतें, लोकोक्तियाँ या मुहावरे हैं जिनके शब्द कुछ और होते हैं पर अर्थ कुछ और ! कहती कुछ और हैं, समझाती कुछ और ! नाम किसी का लेती हैं काम किसी और का करती है ! यानी कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना...............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

वर्षों से चली आ रही बहुतेरी कहावतों या मुहावरों के शाब्दिक अर्थ कुछ होते हैं गूढ़ार्थ कुछ और ! हो सकता है कि ऐसा जाने-अंजाने, कलिष्ट शब्दों के सहजीकरण या फिर नासमझी के कारण होता चला गया हो। या फिर आत्मश्लाघि, नीम-पंडितों और विद्वान व्याकरण के ज्ञाताओं के दिमाग की उपज हों। प्रस्तुत है ऐसी ही कुछ बातों का लेखा-जोखा ! 

खुदा मेहरबान तो गधा (गदा) पहलवान -  कहते हैं कि इसमें प्रयुक्त गधा असल में "'गदा'' है जो एक फ़ारसी शब्द है और जिसका अर्थ होता है फकीर या भिक्षा मांगने वाला। अब भिक्षा तो वही मांगेगा जो लाचार, मजबूर या कमजोर होगा ! इसलिए कहावत में गधा की जगह पर गदा अधिक अर्थवान लगता है जो कलिष्ट या मतलब ना समझ पाने की वजह से गधा हो गया होगा। 

अपना उल्लू सीधा करना - आजकल यह अपना मतलब सिद्ध करने के संदर्भ में प्रयुक्त होता है ! पर एक बार कादम्बिनी पत्रिका के ''शब्द स्तंभ में इब्बार रब्बी जी'' ने बताया था कि खेतों की मेढ़ों में पानी के बहाव को बदलने के लिए एक लकड़ी का टुकड़ा काम में लाया जाता है जिसे ''उल्लू'' बोलते हैं। किसान उसीको सीधा कर जब पानी के बहाव को अपने खेत की ओर मोड़ता है तो उसे उल्लू सीधा करना कहते हैं। समय के साथ इस का अर्थ मतलबपरस्ती से जुड़ गया। 

घर का कुत्ता ना घर का ना घाट का - इसका मोटा सा अर्थ यह लगाया जाता है कि चूँकि वह धोबी के साथ घाट के चक्कर लगाता रहता है इसलिए घर वाले समझते हैं कि वह घाट पर रोटी खा लेगा और घाट पर धोबी समझता है कि वह घर से खा आया होगा इस तरह बेचारा कुकुर भूखा ही रह जाता है ! पर यह बात उतनी जमती नहीं जितनी कि मित्र शिवम मिश्रा जी द्वारा बताई, ''आशुतोष राणा जी'' द्वारा दी गई जानकारी, मुहावरे के ज्यादा करीब लगती है। पहले घरों की दिवार पर एक खूँटिनुमा लकड़ी का टुकड़ा, जिसे ''कुतका'' कहते थे, लगाया जाता था।  इस पर घर के मैले  कपड़ों को टांग दिया जाता था जहां से धोबी उन्हें धोने के लिए ले जाता और धुले कपडे वहीं लटका जाता था। अब वह धोबी के लिए हो कर भी उसका नहीं होता था। फिर ठेठ गांवों को छोड़ शायद ही अब उसका अस्तित्व कहीं बचा हो ! इसलिए वैसी लुप्तप्राय और अनजान चीज भूलती चली गई और उसके बदले  कुत्ता अस्तित्व में आ गया, ऐसा लगता है ! जबकि धोबी का साथी ज्यादातर गधा हुआ करता था ! 

यह तो कुछ उदाहरण हैं पर ऐसी अनगिनत कहावतें, लोकोक्तियाँ या मुहावरे हैं जिनके शब्द कुछ और होते हैं पर अर्थ कुछ और ! कहती कुछ और हैं, समझाती कुछ और ! नाम किसी का लेती हैं काम किसी और का करती है ! यानी कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना !

आभार - शिवम मिश्रा  

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2021

सच तो यही है कि हम खुदगरज हैं

सरकार बिल्कुल बेकार है ! इस बार इनको वोट ही नहीं दूंगा ! ऐसा क्यों पूछने पर बोले, डीए ही नहीं बढ़ाया ! इतनी मंहगाई है कुछ सोचते ही नहीं ! पिछले वाले बढ़ाते रहते थे ! वे ठीक थे ! जब उन्हें कोई नए कर ना लगाने, करोड़ों लोगों को साल भर मुफ्त खाने तथा अन्य सुविधाओं का हवाला दिया तो बोले किसने देखा है कौन कहां क्या दे रहा है ! मुझे नहीं मिला यह मुझे पता है ! जब उनको कहा कि प्रायवेट सेक्टर में लाखों लोगों की नौकरियां ख़त्म हो गईं, आपकी तो बची हुई है ! तो चिढ कर बोले, किसने मना किया, कर लें सब सरकारी जॉब ! अब ऐसी सोच से क्या बहस !! 

#हिन्दी_ब्लागिंग   

दिल्ली के बाहर या विदेश से अदि कभी कोई ताना मारता है कि दिल्ली वालों ने सिर्फ मुफ्त के बिजली-पानी की वजह से ही किसी को सत्ता सौंपी है, तो हम लोग तिलमिला कर रह जाते हैं ! बेइज्जती महसूस करते हैं ! लगता है जैसे किसी ने भरे बाजार में मानहानि कर दी हो ! वैसे सच कहा-देखा जाए तो यह बात बिलकुल निराधार भी तो नहीं है ! हम में से अधिकतर  मुखौटाधारी लोग हैं ! पार्टियों में, सार्वजनिक जगहों में, टीवी देखते हुए, भाषण सुनते हुए हम पूरी तरह देश भक्त होते हैं ! पर जहां अपने निजी फायदे की बात आती है तो हमारा मुखौटा पता नहीं कब कहां जा हमारी असलियत उजागर कर देता है ! हम ऊपर से अपने को कितना भी परोपकारी, देश-समाज हितैषी या लालच विहीन दिखाने की कोशिश करें, भीतर ही भीतर रियायत पाने की लालसा, मुफ्त की चीज की हवस बनी ही रहती है। फ्री का नमक भी चीनी सी मिठास देता लगता है !  

पिछले दिनों बजट के बाद एक परिचित का घर आना हुआ ! सरकारी मुलाजिम हैं ! बातों ही बातों में बात सरकार पर आ गई ! बोले बिल्कुल बेकार है ! मैं इस बार इनको वोट ही नहीं दूंगा ! ऐसा क्यों पूछने पर बोले, डीए ही नहीं बढ़ाया ! इतनी मंहगाई है कुछ सोचते ही नहीं ! पिछले वाले बढ़ाते रहते थे ! वे ठीक थे ! जब उन्हें तर्क दिया गया कि इतनी आपदा के बावजूद कोई नया टैक्स नहीं लगाया ! करोड़ों लोगों को साल भर से मुफ्त खाना दिया जा रहा है ! गरीबों को आर्थिक सहायता तथा अन्य सुविधाएं मुहैया करवाई जा रही हैं ! उन सब के लिए भी तो पैसा चाहिए वह कहां से आएगा ! तो बोले किसने देखा है कौन कहां क्या दे रहा है ! मुझे नहीं मिला यह मुझे पता है ! जब उनको कहा कि प्रायवेट सेक्टर में लाखों लोगों की नौकरियां ख़त्म हो गईं आपकी तो बची हुई है ! तो चिढ कर बोले किसने मना किया, कर लें सब सरकारी जॉब ! अब ऐसी सोच से क्या बहस !!

यह तो एक बानगी भर थी ! हजारों-लाखों लोग ऐसे हैं जो प्याज-टमाटर-पेट्रोल पर अपनी आस्था बदल लेते हैं ! तो बिजली-पानी तो बहुत बड़ी बात है ! हमें दो-तीन-पांच साल बाद की खुशहाली से कोई मतलब नहीं है ! आज और अभी फौरी तौर पर क्या फायदा हो रहा है, हमारे लिए यही मायने रखता है ! वर्तमान में जिओ, भविष्य किसने देखा है ! चतुर लोगों ने इसी कमजोर नस को परखा और फ़ायदा उठा लिया ! अब तिलमिलाते रहो तानों पर ! 

एक बात और भी है, कहना नहीं चाहिए ! कइयों को नागवार भी गुजर सकती है ! पर सरकारी नौकरी वालों को कुछ ऐसा लगता है जैसे देश के संसाधनों पर बाकियों से उनका हक़ ज्यादा है ! वह भी औने-पौने या मुफ्त की सुविधाओं के साथ ! यह एक कड़वी सच्चाई है कि आज देश के अधिकतर संसाधन अपने कर्मचारियों को मुफ्त की सेवाऐं प्रदान करने की वजह से ही बिकने के खतरे की कगार पर आन पड़े हैं ! यह कोई कुंठा या पूर्वाग्रह से ग्रसित विचार नहीं है, मेरे भी दसियों बहुत ही अपने-करीबी सरकारी पदों पर आसीन हैं, पर सच्चाई तो सच्चाई ही है ! सरकार को कड़वा घूँट पी, बहुत ही जरुरी को छोड़ मुफ्त की रेवड़ियों की बंदर बांट बंद कर ही देनी चाहिए !!  

रविवार, 7 फ़रवरी 2021

कुछ हो तो जरूर रहा है

शुरुआत में  नौसिखिए खिलाड़ियों के मारे गए बेतरतीब शॉट्स के कैच लपक जो वाम पंथी पूरी तरह से मैच पर हावी हो, उद्दंडता, हठधर्मिता के बाउंसर फेंक रहे थे; दर्शक-दीर्घाओं से अपने लिए समर्थन जुटा रहे थे, वे मैदान के बाहर हो गए ! सारा परिदृश्य ही बदल गया। परिस्थियाँ बदल गईं।बागडोर अब टिकैत के हाथ में आ गई थी। पंजाब का आंदोलन अब यू पी के नाम हो गया। उसी पश्चिमी यू.पी. के नाम जिसने भाजपा को 44 में से 37 सीटें दीं ! लोकसभा की 9 में से  सात सीटों से नवाजा था ! अब जो सहमति होगी उसका सारा श्रेय भी उत्तर प्रदेश को ही मिलेगा .............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कुछ हो तो जरूर रहा है ! कोई जरुरी नहीं कि मैं सही ही होऊँ ! मैं गलत भी हो सकता हूँ ! पर पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लग रहा है कि जो दिख रहा है वैसा हो नहीं रहा और जो हो रहा है वह दिख नहीं रहा ! यवनिका के पीछे बहुत ही सोच-समझ कर, समझदारी और चतुराई से समस्या का आकलन कर उससे पार पाने की तरकीब निकाली जा रही है। जिन्होंने वर्षों-वर्ष से चली आ रही अड़चनों को एक झटके में दूर कर दिया हो वे क्या देश की अस्मिता के साथ खिलवाड़ करने वालों की हरकतों पर हाथ पर हाथ धरे बैठे होंगे ! 

फिर सहमति का सारा श्रेय भी पंजाब के वामियों-कांगियों ने ले उड़ना था ! पर अब जो भी होगा उसका सारा श्रेय उत्तर प्रदेश को मिलेगा। उसके किसानों को मिलेगा 

करीब दो अढ़ाई महीने पहले जो किसान आंदोलन पंजाब से शुरू हुआ जिसे कुछ स्पोर्ट हरियाणा से मिला उसमें सबसे ज्यादा प्रतिशत पंजाब के वाम पंथी और उग्रवादी नेताओं का था ! जिनका मुख्य उद्देश्य शायद किसानों की सहायता से ज्यादा केंद्र सरकार को नीचा दिखाना था। इसीलिए दसियों बैठकें हुईं सरकार के साथ पर कोई नतीजा नहीं निकला या निकलने नहीं दिया गया ! फिर गणतंत्र दिवस पर जो हुआ उसे विश्व ने देखा !

26 जनवरी के कांड के दो दिन बाद एकबारगी तो लगा कि नौटंकी का पटाक्षेप हो गया है और सरकार ने पूरी तरह स्थिति पर काबू पा लिया है। पर अचानक नाटक में जुटे बीसियों किसान नेताओं में से एक, पश्चिमी उतर प्रदेश के राकेश टिकैत, जो अपने दल का मुख्य प्रवक्ता था, मुखिया नहीं, ने अपने अभिनय का कौशल दिखलाया और इस बार पंजाब के बदले उत्तर प्रदेश के किसानों के हुजूम को दिल्ली बार्डर पर ला, चरित्र अभिनेता से नायक बन गया ! यहीं से लगने लगा कि शतरंज पर एक नए व्यूह की रचना कर दी गई है !

शुरुआत में  नौसिखिए खिलाड़ियों के  मारे गए बेतरतीब शॉट्स के कैच लपक जो वाम पंथी पूरी तरह से मैच पर हावी हो, उद्दंडता,  हठधर्मिता के बाउंसर फेंक रहे थे;  दर्शक-दीर्घाओं से अपने लिए  समर्थन जुटा रहे थे वे मैदान के बाहर हो गए !  सारा परिदृश्य ही बदल गया।  परिस्थियाँ बदल गईं। बागडोर अब टिकैत के हाथ में आ गई थी। पंजाब का आंदोलन अब यू पी के नाम हो गया। उसी पश्चिमी यू.पी. के नाम जिसने भाजपा को 44 में से 37 सीटें दीं ! लोकसभा की 9 में से  सात सीटों से नवाजा था। जहां  वोट प्रतिशत क्रमश: 43.6 और 53.1 हो, वहीं के किसानों से बात होगी। हो सकता है कि इस बार सरकार दो कदम पीछे भी हटे !  किसानों को संतुष्ट किया जाएगा !  सरकार और  किसान दोनों का सम्मान बचा रहेगा ! उधर वामियों-कांगियों को, जो अभी तक मोदी जी को समझ ही नहीं पा रहे, फिर कहीं मुंह छुपाने की जगह खोजनी होगी। 

यदि 28 की रात को दिल्ली बॉर्डर खाली करवा लिया जाता तो उसका एक संदेश यह भी जा सकता था कि सरकार ने जबरदस्ती दमनकारी रुख अख्तियार कर आंदोलन ख़त्म करवाया। तानाशाही काआरोप जड़ दिया जाता। लुटे-पिटे विपक्ष को तो मौका चाहिए ही होता है। फिर सहमति का सारा श्रेय भी पंजाब के वामियों-कांगियों ने ले उड़ना था ! पर अब जो भी होगा उसका सारा श्रेय उत्तर प्रदेश को मिलेगा। उसके किसानों को मिलेगा ! अभी भले ही सरकार की मुश्किलें बढ़ी हुई लग रही हों पर मुझे लगता है कि बहुत जल्द इस समस्या का हल निकाल लिया जाएगा ! क्योंकि आगामी साल यू.पी. में फिर चुनाव हैं उन पर भी इस बात का सकारात्मक प्रभाव पडेगा। 

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2021

विदेशी ट्विटर वीरांगनाएं और देसी किसान

इन ट्विटर वीरांगनाओं में से एक तो किसी तरह की तवज्जो देने के लायक ही नहीं हैं ! रही थनबर्ग की बात, तो पता नहीं उसे क्या बताया या समझाया गया कि वह उबाल खा गई, पर लगता है कि उसे हकीकत जल्दी समझ आ गई कि उसे जिनका समर्थन देने के लिए उकसाया जा रहा है, वे तो खुद पराली जला कर उस पर्यावरण को नुक्सान पहुंचाते हैं, जिसको बचाने की मुहीम वह चला रही है ! वैसे इन महान, जगत्प्रसिद्ध, ताकतवर, ज्ञानी हस्तियों के विपरीत एक अदने से देश अमेरिका ने तीनों किसान कानूनों का समर्थन किया है..............!  

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दो-तीन दिन पहले अचानक रिहाना, ग्रेटा थनबर्ग और मिया खलीफा ये तीन नाम सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गए ! अलग-अलग क्षेत्रों की इन तीन महिलाओं से एक ही मंच से किसान आंदोलन के पक्ष में एक दो लाइने उगलवाई गईं थीं। उनके उगालदान को सर पर रख ऐसे लोग भी नाचने लगे जिनको यह भी पता नहीं था कि ये महिलाएं हैं कौन हैं और इनका धंधा क्या है ! आश्चर्य तो और भी हुआ जब फेस बुक पर बुद्धिजीवी, कवियित्री और लेखिका के रूप में पहचानी जाने वाली और खुद को प्रगतिशील मानने वाली महिलाएं भी उनके बयान से आत्मविभोर हो गईं !

यह सोचने की बात है कि जिन्हें शायद यह भी ना मालुम हो कि भारत दुनिया के किस कोने में है, उन्हें अचानक किस अलौकिक प्रेणना की वजह से ऐसा दिव्य ज्ञान हासिल हो गया ! बात साफ़ है कि वह अलौकिक प्रेणना उन्हें ''भौतिक प्रसाद'' के रूप में उपलब्ध हुई ! आजकल किसी मशहूर कलाकार से समय लेने के लिए उसके मैनेजर से ही बात करनी  पड़ती है ! वह जैसा चाहता है वैसा ही होता है ! सारा खेल पैसे का हो गया है ! 

खबर है कि रिहाना सिर्फ एक ट्वीट करने का साढ़े तीन करोड़ रूपए लेती है। अब कोई बड़ी या असंभव बात नहीं है कि उसे उसकी मुंहमांगी रकम दे कर कुछ भी कहलवा लिया गया हो ! अब बॉलीवुड के कलाकार अमीर घरानों के शादी-ब्याहों जो पैसे के बदले ठुमके लगाते हैं तो जरुरी नहीं कि उस परिवार के सुख-दुःख, मान्यताओं या रीती-रिवाजों के भी सहभागी हों ! उन्हें सिर्फ पैसे से मतलब होता है !

इन ट्विटर वीरांगनाओं में से एक तो किसी तरह की तवज्जो देने के लायक ही नहीं हैं ! रही थनबर्ग की बात, तो पता नहीं उसे क्या बताया या समझाया गया कि वह भी उबाल खा गई ! पर लगता है कि उसे हकीकत जल्दी समझ आ गई कि उसे जिनका समर्थन देने के लिए उकसाया गया है, वे तो खुद पराली जला कर उस पर्यावरण को नुक्सान पहुंचाते हैं जिसको बचाने की मुहीम वह चला रही है ! और जिसके लिए शायद विश्व उसका सम्मान कर दे ! यह बात ध्यान में आते ही उसने अपना ट्वीट हटा लिया ! 

इन महान, जगत्प्रसिद्ध, ताकतवर, ज्ञानी हस्तियों के विपरीत एक अदने, नामालूम, कमजोर से देश अमेरिका ने तीनों कानूनों का समर्थन किया है ! वैसे भी इन पैसों के धागे पर नाचने वाली कठपुतलियों से क्या गिला करना, असली दोषी तो वह है जो अपने आकाओं के कुत्सित सपनों को पूरा करने के लिए, इनके अल्प ज्ञान का फ़ायदा उठा, अपनी ऊंगलियों पर नचा रहा है ! नाचने वालों को शायद भनक भी ना हो कि किस दुष्चक्र में फांसे जा चुके हैं ! अब तो साफ़ है कि यह किसान आंदोलन किसानों के हाथ से निकल उनके हाथ पहुँच गया है जो सोते-जागते, उठते-बैठते सिर्फ इस देश की बुराई चाहते हैं।

इन हरकतों के चलते इधर एक छींका फिर टूट गया बिल्लियों के भाग ! मक्खियों की तरह लोग भिनभिनाने लगे हैं इस तथाकथित आंदोलन के ठीयों पर ! जिनका नाम भी लोग भूल चुके थे वह भी प्रेतावतार में यहां नमूदार हो गए हैं। इतनी बेशर्मी, इतनी नफरत, इतनी लिप्सा कि जिस आदमी ने डंडे-सोटे ले कर लाल किले पहुँचने की साजिश की, देश के सम्मान को मिटटी में मिलाने का षड्यंत्र रचा ! उसी आदमी के गले मिल-मिल कर जबरन अपना समर्थन थोपने की हिमाकत कर रहे हैं ! क्या इन्हें देशवासियों से डर नहीं लगता या ये उन्हें निरा बुड़बक समझ बैठे हैं ! पर यह जनता है जो सब जानती है ! जवाब तो मिलेगा और शायद ऐसा कि इनकी पीढ़ियां याद रखेंगी ! 

बुधवार, 3 फ़रवरी 2021

प्रायवेट सेक्टर से नफ़रत है तो सुबह के टूथ-ब्रश से लेकर रात तक उन्हीं के बनाए बेड-पिलो पर नींद कैसे आ जाती है

जहां और जैसे मेरे फोन के तार जोड़े गए हैं वहाँ कोई जोर से छींक भी देता है तो मेरा फोन बेचारा किसी अनिष्ट की आशंका से अपने खोल में सिमट जाता है।  अब जब फोन बंद हो जाता है तो इन भले लोगों की शर्त है कि खराबी की शिकायत भी BSNL के फोन से ही होनी चाहिए। अब इस कंपनी का फोन तो चिराग लेकर ढूंढने से ही मिलता है, और उसकी खराबी का पता लगाने में इन्हें हफ़्तों लग जाते हैं ! तंग आ कर आखिरी नमस्ते करने में भी मुझे तीन घंटे और उनके दफ्तर के चार चक्कर लगाने पड़े। यह तो सबको पता है कि लंच टाइम में तो सरकारी आदमी अपनी भी नहीं सुनता..........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

इधर कुछ लोग सरकारी कंपनियों को निजी हाथों में देने के विरोध में रोज ही कुछ ना कुछ बयान दर्ज करवाते रहते हैं। ऐसा लगता है कि वे सरकार के हर काम का विरोध करने को निर्देशित हैं सिर्फ इसीलिए ऐसा किया जा रहा है। क्या कभी उन्होंने उस कंपनी की सेवा का जायजा लिया है ? क्या वे उसकी कार्यप्रणाली से वाकिफ है ? क्या कभी उसके उपभोक्ताओं से उसके बारे में राय जानी है ? बाकियों की बात फिर कभी आज BSNL के बारे में अपना अनुभव बांटना चाहता हूँ !

जर्जर अवस्था वाले एक बांस में खुली तारों के सहारे मेरा फोन क्योंकि उस घने इलाके में भी उनकी सेवा लेने वाला सिर्फ मैं ही अकेला था ! 

शुरू से हमारी यही धारणा रही है कि स्वदेशी और सरकारी संस्थाओं, उपक्रमों का ही उपयोग करना चाहिए ! इसी सोच के तहत ही सरकारी फोन सेवा की शरण ली थी। पर शुरुआत से ही उसकी तारें तरह-तरह के झटके देती रहीं !

आखिर #BSNL के भूमि-पकड़, अचल फोन को नमस्ते भेज दी है। हाथ जोड़ने का कारण जानने के लिए उन्होंने जो फॉर्म दिया उसमे वही सारे कारण थे जिनसे उपभोक्ता हलकान रहता है। आश्चर्य होता है और हंसी भी आती है कि अंदाजे के बावजूद सब कुछ वैसे ही बदस्तूर चला आ रहा है, सुधार की कोई कोशिश ही नहीं होती

विभिन्न समयों में तंगाए  हुए दिमाग के कुछ अंश ! छोटे-मोटे दो-तीन दिनों के अवरोध या इंटरनेट की चाल-ढाल-रुकावट का तो जिक्र ही नहीं है.......! 

17-08-2009 

..........................ऐसा ही कुछ पिछले एक पखवाड़े से मेरे साथ हो रहा था, #दीपिका_पादुकोंण_को_खम-खा-कर #BSNL का प्रचार करते देख। उसके अनुसार #BSNL पूरे "इंडिया" को लाइटिनिंग युग में ले जायेगा। हर चीज विद्युत की तेजी से सम्पन्न हो जाया करेगी। अब बताईये जिसका फोन पिछले 14 दिनों से कोमा में पड़ा हो, जिसका चोंगा घर का हर सदस्य दिन में दर्जनों बार धड़कन वापस आने की उम्मीद से उठाता हो, जिसकी मधुर ध्वनी सुनने के लिये सब के कान चौबीसों घंटे उसकी ओर लगे हों उनके दिल पर क्या बीतती होगी यह सब देख-सुन कर। जी हां पूरे चौदह दिनों से मेरा फोन कोमा में है। इसके डाक्टरों को पूछ-पूछ कर हार गया कि ऐसा कौन सा फ्लू इसे हो गया है जो इसकी बोलती बंद है। पर आज तक किसी डाक्टर ने सही जवाब दिया है जो यह बताते। रोज कल-कल करते कितने कल निकल गये यह सच साबित करते हुए कि क्या कभी कल भी आया है।

15-10-2014   

...............जहां और जैसे मेरे फोन के तार जोड़े गए हैं वहाँ कोई जोर से छींक भी देता है तो मेरा फोन बेचारा किसी अनिष्ट की आशंका से अपने खोल में सिमट जाता है।  अब जब फोन बंद हो जाता है तो इन भले लोगों की शर्त है कि खराबी की शिकायत भी BSNL के फोन से ही होनी चाहिए। अब इस कंपनी का फोन तो चिराग लेकर ढूंढने से ही मिलता है। और उसकी खराबी का पता लगातने में इन्हें हफ़्तों लग जाते हैं !  पता नहीं सरकारी काम, नियम, कानून ऐसे क्यों होते है ?  

आज पूरे इक्कीस दिन हो गए फोन को बंद हुए ! कभी-कभी दो जने आते हैं ! एक छाया में बैठ बीड़ी पिने लगता है दुसरा इधर-उधर कुछ टटोल नाकामी में सर हला देता है ! आज के समय में उच्च तकनीकी उपकरणों की सहायता से जहां इनके प्रतिद्वंदी एक दो दिन में उपकरणों में जान डाल देते हैं वहीं सरकारी सहायता आने में हफ़्तों लग जाते हैं। यही हाल इनके मोबाइल कनेक्शन का है।  जो सबके सामने खुले में ही बात करवाता है,  घर के अंदर से बात करवाने में शर्माता है। जिन्होंने इसे छोड़ा है वे पूछने पर बतलाते है कि भाई उससे तो टावर के नीचे खड़े हो तो भी बात नहीं होती थी। अब ऐसा क्यों है कि प्रायवेट कंपनियां दिन-दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रही हैं, लोग उनसे जुड़ते जाते हैं और इस महावीर को अपनी ताकत ही पता नहीं चलती 

30-09-15
............आखिर #BSNL के भूमि-पकड़, अचल फोन को नमस्ते भेज दी है। हाथ जोड़ने का कारण जानने के लिए उन्होंने जो फॉर्म दिया उसमे वही सारे कारण थे जिनसे उपभोक्ता हलकान रहता है। आश्चर्य होता है और हंसी भी आती है कि अंदाजे के बावजूद सब कुछ वैसे ही बदस्तूर चला आ रहा है, सुधार की कोई कोशिश ही नहीं होती !
 
सही दिशा निर्देश ना होने के कारण कल कनेक्शन कटवाने के लिए मुझे तीन घंटे और उनके दफ्तर के चार चक्कर लगाने पड़े, जब मेरे द्वारा जमा किया हुआ फार्म वहीं के एक कार्यकुशल सज्जन से इधर-उधर होने पर वैसी ही क्लियरेंस को दोबारा दूसरे ऑफिस से लाने को कहा गया।  इसके पहले कि खोपड़ी सटकती, कागज़ तो मिल गया पर डेढ़ बज गए। अब यह तो सबको पता है कि लंच टाइम में तो सरकारी आदमी अपनी भी नहीं सुनता !  सो मजबूरी थी। वह तो अच्छा है कि "भ्रामरी प्राणायाम" से दिमाग थोड़ा शांत रहने लग गया है। सज्जन ने  दो बजे की बजाए  पौने तीन बजे आ कर लोगों को उपकृत किया......!

ऐसे कनेक्शन देती रही है BSNL 36 गढ़ की राजधानी रायपुर में   
यह तो सिर्फ BSNL की बात है ! सुना है सरकारी लोहे के कारखानों का तो और भी बुरा हाल है सिर्फ भिलाई स्टील प्लांट सबको खाना खिला रहा है ! वही हाल दूरदर्शन का है ! वही टाटा से जबरन छीनी गई हवाई सेवा का है ! वही हाल बैंको का है ! विरोध करने में इन उपक्रमों से मुफ्त का फ़ायदा उठाने-पाने वालों, बिना ज्यादा काम किए पगार पाने वालों और यहां के कामगारों से अपनी राजनितिक दूकान चलाने वालों का बहुत बड़ा हाथ है !  

एक बात और जैसा कि बेच दिया-बेच दिया (मौनी बाबा के राज्य में भी झाँक लेना उचित होगा) का शोर मचाया जाता है तो यदि कोई काम सरकार नहीं संभाल पाती और उसे अपने ही देशवासी को सौंप दिया जाता है तो इसमें बुराई क्यों खोजी जाती है। प्रायवेट सेक्टर से इतनी ही नफ़रत है तो सुबह उठते ही टूथ-ब्रश से लेकर रात तक उन्हीं के द्वारा निर्मित बेड-पिलो पर कैसे नींद आ जाती है ! ! ! 

रविवार, 31 जनवरी 2021

ऐसा भी होने लगा है

अब ! आप तो स्तब्ध !! कहीं और से भी कुछ इंतजाम नहीं हो सकता ! फोन पर चिल्लाने का भी कोई फायदा नहीं ! हालांकि आपके पैसे वापस मिल जाएंगें ! आप कहीं कम्प्लेन भी दर्ज करवा देंगे ! पर उस समय सर पर आई मुसीबत का क्या ! अच्छे-खासे माहौल-मूड का सत्यानाश ! हार -थक कर वही ब्रेड-बटर, नमकीन और ड्राई फ्रूट ! ये कोई कल्पना नहीं है ! ऐसा होने लगा है आजकल........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कोरोना काल के बाद धीरे-धीरे सप्ताह का हर दिन, अपना महत्व पहले की तरह फिर पाने लगा है। आज रविवार है, तकरीबन साल भर पहले के रविवारों की तरह छुट्टी का दिन ! आप मस्ती के मूड में हैं ! आपने तफरीह के तौर पर या किसी और कारण से अपने इष्ट-मित्र, बंधु-बांधव या प्रियजनों के साथ रात के खाने का प्रोग्राम बना लिया है ! अब पहले की तरह घर पर भोजन बनाने का चलन तो रहा नहीं, सो आपने भी किसी ''ईटरी'' को अपने पसंदीदा भोजन का ऑर्डर दे दिया है और उसने भी तयशुदा समय पर सब चीजें पहुँचाने का आश्वासन दे आपको निश्चित कर दिया है ! सब आपके चाहेनुसार हो रहा है। 

  

शाम विदाई लेने लगी है और उसका पल्लू थामे आहिस्ता-आहिस्ता रात का पदार्पण भी शुरू हो चला है।मेहमानों की आवक होने लगी है।  हंसी-ख़ुशी का माहौल है। समय कैसे खिसक रहा है पता ही नहीं चल रहा। ऐसे में अचानक आपके फोन में घुरघुराहट होती है, आप फोन उठाते हैं, उधर से आपके डिलीवरी ब्वाय की आवाज आती है - सर ! फ़लाने-फ़लाने कारण से आपके ऑर्डर की डिलवरी नहीं हो पाएगी ! आय एम वेरी-वेरी सॉरी !!   

                                  

अब ! आप तो स्तब्ध !! कहीं और से भी कुछ इंतजाम नहीं हो सकता ! फोन पर चिल्लाने का भी कोई फायदा नहीं ! हालांकि आपके पैसे वापस मिल जाएंगें ! आप कहीं कम्प्लेन भी दर्ज करवा देंगे ! पर उस समय सर पर आई मुसीबत का क्या ! अच्छे-खासे माहौल-मूड का सत्यानाश ! हार-थक कर वही ब्रेड-बटर, नमकीन और ड्राई फ्रूट ! ये कोई कल्पना नहीं है ! ऐसा होने लगा है आजकल ! खाने का ऑर्डर कर निश्चिन्त बैठे लोगों को ऐन मौके पर मैसेज मिलता है कि आपका ऑर्डर नहीं पहुँच पा रहा है ! देखिए भुग्तभोगी क्या कह रहे हैं -  

1)  मिस्टर वर्मा, जनकपुरी, को जब खाना पहुँचना था उस समय फोन आता है कि सर, आपका ऑर्डर नहीं पहुंचा पा रहा हूँ, क्योंकि मेरी बाइक का टायर पंक्चर हो गया है ! जबकि वर्मा जी अपने ऐप पर लोकेशन फाइंडर में गाडी को चलते हुए देख रहे हैं ! शिकायत करने पर उन्हें पैसे तो मिल जाते हैं पर पैसों से पेट को क्या मतलब !  

2) मिस्टर सक्सेना, गुरुगाम, को ऐन वक्त पर पता चलता है कि उनके खाने की डिलीवरी नहीं हो सकती क्योंकि डिलीवरी ब्वॉय के पास रेस्त्रां से सामान उठाने के पैसे नहीं थे ! क्योंकि ऑनलाइन पेमेंट ना होने पर सामान ले जाने वाले को पैसे दे कर सामान ले जाना होता है और वह पैसे ग्राहक से लेता है। लो कर लो बात ! ढूँढो फ्रिज में क्या बचा पड़ा है !

3)  शर्मा जी तो सकते में आ गए जब उनको सामान पहुंचाने वाले लड़के ने उनसे पेट्रोल के लिए पैसे मांग लिए ! जब उन्होंने कहा कि मैं तो पेमेंट कर चुका हूँ तो उसने एक उपाय भी सुझा दिया। वह कहने लगा कि मैं कंपनी को फोन कर देता हूँ कि आपका खाना गिर गया है, इस तरह आपको पूरा रिफंड मिल जाएगा और उसका आधा आप मुझे दे दीजिएगा ! गजब की स्कीम; खाना भी खाइए और पैसे भी पाइए ! 

कुछ दिनों पहले सोशल मीडिया पर एक डिलीवरी ब्वॉय की हरकत वायरल हुई थी जिसमें वह आर्डर के सामान को खोल उससे अपनी भूख मिटा रहा था ! खाना छीन लिए जाने की बातें भी होने लगीं हैं। ऑर्डर से कुछ कम या ''टुकि'' हुई खाद्य सामग्री की शिकायतें भी आम हो चली हैं। अब इन सब बातों में कितनी सच्चाई है, कितना झूठ और कितनी धूर्तता यह सब खोज का विषय है ! पर यदि आप घर पर बाहर से खाना मंगाने का प्लान बना रहे हैं तो ऐसा कर बिल्कुल निश्चिन्त ना हो जाएं ! उसके साथ प्लान ''बी'' भी तैयार रखें ! क्योंकि आजकल कुछ भी हो सकता है ! हर बात संभव है ! 


हालांकि इस काम को कर रहे युवक बहुत मेहनती, नम्र, कर्तव्यपरायण व ईमानदार होते हैं। उन पर महानगरों की भीड़-भाड़, जाम रहने वाली सड़कों पर अपनी राह बना, ग्राहक का सामान, नियत और तय समय पर पहुँचाने का भारी तनाव रहता है। उस पर अल सुबह, देर रात, ठंड-गर्मी बरसात हर स्थिति में चलायमान रहना होता है। तिस पर ट्रैफिक पुलिस, ग्राहक और नियोक्ता की नाराजगी का भय भी बना रहता है। ऐसे में कुछ ना कुछ भूल-चूक हो ही जाती है। इन सब बातों का, उन की मजबूरी का, उनके हालातों का हम सब को भी ध्यान  रखना और समझना चाहिए। 


@संदर्भ व आभार HT City      

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पुलिस जिसका नाम ही काफी है ! उसका एक जवान यदि किसी मरघिल्ले को पांच सेकेंड भी घूर कर देख ले तो उसका वस्त्र गीला-पीला हो जाए ! सिर्फ एक बार स...