शनिवार, 13 फ़रवरी 2021

गदा, उल्लू व कुतका

ऐसी अनगिनत कहावतें, लोकोक्तियाँ या मुहावरे हैं जिनके शब्द कुछ और होते हैं पर अर्थ कुछ और ! कहती कुछ और हैं, समझाती कुछ और ! नाम किसी का लेती हैं काम किसी और का करती है ! यानी कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना...............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

वर्षों से चली आ रही बहुतेरी कहावतों या मुहावरों के शाब्दिक अर्थ कुछ होते हैं गूढ़ार्थ कुछ और ! हो सकता है कि ऐसा जाने-अंजाने, कलिष्ट शब्दों के सहजीकरण या फिर नासमझी के कारण होता चला गया हो। या फिर आत्मश्लाघि, नीम-पंडितों और विद्वान व्याकरण के ज्ञाताओं के दिमाग की उपज हों। प्रस्तुत है ऐसी ही कुछ बातों का लेखा-जोखा ! 

खुदा मेहरबान तो गधा (गदा) पहलवान -  कहते हैं कि इसमें प्रयुक्त गधा असल में "'गदा'' है जो एक फ़ारसी शब्द है और जिसका अर्थ होता है फकीर या भिक्षा मांगने वाला। अब भिक्षा तो वही मांगेगा जो लाचार, मजबूर या कमजोर होगा ! इसलिए कहावत में गधा की जगह पर गदा अधिक अर्थवान लगता है जो कलिष्ट या मतलब ना समझ पाने की वजह से गधा हो गया होगा। 

अपना उल्लू सीधा करना - आजकल यह अपना मतलब सिद्ध करने के संदर्भ में प्रयुक्त होता है ! पर एक बार कादम्बिनी पत्रिका के ''शब्द स्तंभ में इब्बार रब्बी जी'' ने बताया था कि खेतों की मेढ़ों में पानी के बहाव को बदलने के लिए एक लकड़ी का टुकड़ा काम में लाया जाता है जिसे ''उल्लू'' बोलते हैं। किसान उसीको सीधा कर जब पानी के बहाव को अपने खेत की ओर मोड़ता है तो उसे उल्लू सीधा करना कहते हैं। समय के साथ इस का अर्थ मतलबपरस्ती से जुड़ गया। 

घर का कुत्ता ना घर का ना घाट का - इसका मोटा सा अर्थ यह लगाया जाता है कि चूँकि वह धोबी के साथ घाट के चक्कर लगाता रहता है इसलिए घर वाले समझते हैं कि वह घाट पर रोटी खा लेगा और घाट पर धोबी समझता है कि वह घर से खा आया होगा इस तरह बेचारा कुकुर भूखा ही रह जाता है ! पर यह बात उतनी जमती नहीं जितनी कि मित्र शिवम मिश्रा जी द्वारा बताई, ''आशुतोष राणा जी'' द्वारा दी गई जानकारी, मुहावरे के ज्यादा करीब लगती है। पहले घरों की दिवार पर एक खूँटिनुमा लकड़ी का टुकड़ा, जिसे ''कुतका'' कहते थे, लगाया जाता था।  इस पर घर के मैले  कपड़ों को टांग दिया जाता था जहां से धोबी उन्हें धोने के लिए ले जाता और धुले कपडे वहीं लटका जाता था। अब वह धोबी के लिए हो कर भी उसका नहीं होता था। फिर ठेठ गांवों को छोड़ शायद ही अब उसका अस्तित्व कहीं बचा हो ! इसलिए वैसी लुप्तप्राय और अनजान चीज भूलती चली गई और उसके बदले  कुत्ता अस्तित्व में आ गया, ऐसा लगता है ! जबकि धोबी का साथी ज्यादातर गधा हुआ करता था ! 

यह तो कुछ उदाहरण हैं पर ऐसी अनगिनत कहावतें, लोकोक्तियाँ या मुहावरे हैं जिनके शब्द कुछ और होते हैं पर अर्थ कुछ और ! कहती कुछ और हैं, समझाती कुछ और ! नाम किसी का लेती हैं काम किसी और का करती है ! यानी कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना !

आभार - शिवम मिश्रा  

10 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (14-02-2021) को "प्रणय दिवस का भूत चढ़ा है, यौवन की अँगड़ाई में"   (चर्चा अंक-3977)   पर भी होगी। 
-- 
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
--
"विश्व प्रणय दिवस" की   
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ-    
--
सादर...! 
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
--

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शास्त्री जी
हार्दिक आभार

Jigyasa Singh ने कहा…

मुहावरों के बारे में एक नई तरह की जानकारी देने के लिए बहुत बहुत आभार..

Shantanu Sanyal शांतनु सान्याल ने कहा…

लोकोक्तियां अपने आप में बहुत कुछ छुपाए होती हैं मज़ेदार बात ये है कि विभिन्न भाषाओँ में उनका अर्थ प्रायः एक ही होता है, आपकी शोधात्मक लेखन मुग्ध करता है साधुवाद सह।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

जिज्ञासा जी
प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शांतनु जी
जी बिल्कुल! भले ही शब्द आज के हिसाब से मेल ना खाते हों पर अर्थ अभी भी सामयिक होता है। आभार

मन जैसा कुछ ने कहा…

बहुत बढ़िया..बेहतर

सादर नमन...

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

अर्पिता जी
प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार

Kamini Sinha ने कहा…

लोकोक्तियों के बारे में शोधात्मक लेखन, लोकोक्तियों के गहरे भाव को समझना आज के समय में थोड़ा मुश्किल है।
बहुत ही सुंदर,सादर नमन आपको

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

कामिनी जी
सही कहा आपने ! शोध का विषय भी है ! फिर भी कुछ ना कुछ अंदाज लग ही जाता है

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