बुधवार, 3 फ़रवरी 2021

प्रायवेट सेक्टर से नफ़रत है तो सुबह के टूथ-ब्रश से लेकर रात तक उन्हीं के बनाए बेड-पिलो पर नींद कैसे आ जाती है

जहां और जैसे मेरे फोन के तार जोड़े गए हैं वहाँ कोई जोर से छींक भी देता है तो मेरा फोन बेचारा किसी अनिष्ट की आशंका से अपने खोल में सिमट जाता है।  अब जब फोन बंद हो जाता है तो इन भले लोगों की शर्त है कि खराबी की शिकायत भी BSNL के फोन से ही होनी चाहिए। अब इस कंपनी का फोन तो चिराग लेकर ढूंढने से ही मिलता है, और उसकी खराबी का पता लगाने में इन्हें हफ़्तों लग जाते हैं ! तंग आ कर आखिरी नमस्ते करने में भी मुझे तीन घंटे और उनके दफ्तर के चार चक्कर लगाने पड़े। यह तो सबको पता है कि लंच टाइम में तो सरकारी आदमी अपनी भी नहीं सुनता..........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

इधर कुछ लोग सरकारी कंपनियों को निजी हाथों में देने के विरोध में रोज ही कुछ ना कुछ बयान दर्ज करवाते रहते हैं। ऐसा लगता है कि वे सरकार के हर काम का विरोध करने को निर्देशित हैं सिर्फ इसीलिए ऐसा किया जा रहा है। क्या कभी उन्होंने उस कंपनी की सेवा का जायजा लिया है ? क्या वे उसकी कार्यप्रणाली से वाकिफ है ? क्या कभी उसके उपभोक्ताओं से उसके बारे में राय जानी है ? बाकियों की बात फिर कभी आज BSNL के बारे में अपना अनुभव बांटना चाहता हूँ !

जर्जर अवस्था वाले एक बांस में खुली तारों के सहारे मेरा फोन क्योंकि उस घने इलाके में भी उनकी सेवा लेने वाला सिर्फ मैं ही अकेला था ! 

शुरू से हमारी यही धारणा रही है कि स्वदेशी और सरकारी संस्थाओं, उपक्रमों का ही उपयोग करना चाहिए ! इसी सोच के तहत ही सरकारी फोन सेवा की शरण ली थी। पर शुरुआत से ही उसकी तारें तरह-तरह के झटके देती रहीं !

आखिर #BSNL के भूमि-पकड़, अचल फोन को नमस्ते भेज दी है। हाथ जोड़ने का कारण जानने के लिए उन्होंने जो फॉर्म दिया उसमे वही सारे कारण थे जिनसे उपभोक्ता हलकान रहता है। आश्चर्य होता है और हंसी भी आती है कि अंदाजे के बावजूद सब कुछ वैसे ही बदस्तूर चला आ रहा है, सुधार की कोई कोशिश ही नहीं होती

विभिन्न समयों में तंगाए  हुए दिमाग के कुछ अंश ! छोटे-मोटे दो-तीन दिनों के अवरोध या इंटरनेट की चाल-ढाल-रुकावट का तो जिक्र ही नहीं है.......! 

17-08-2009 

..........................ऐसा ही कुछ पिछले एक पखवाड़े से मेरे साथ हो रहा था, #दीपिका_पादुकोंण_को_खम-खा-कर #BSNL का प्रचार करते देख। उसके अनुसार #BSNL पूरे "इंडिया" को लाइटिनिंग युग में ले जायेगा। हर चीज विद्युत की तेजी से सम्पन्न हो जाया करेगी। अब बताईये जिसका फोन पिछले 14 दिनों से कोमा में पड़ा हो, जिसका चोंगा घर का हर सदस्य दिन में दर्जनों बार धड़कन वापस आने की उम्मीद से उठाता हो, जिसकी मधुर ध्वनी सुनने के लिये सब के कान चौबीसों घंटे उसकी ओर लगे हों उनके दिल पर क्या बीतती होगी यह सब देख-सुन कर। जी हां पूरे चौदह दिनों से मेरा फोन कोमा में है। इसके डाक्टरों को पूछ-पूछ कर हार गया कि ऐसा कौन सा फ्लू इसे हो गया है जो इसकी बोलती बंद है। पर आज तक किसी डाक्टर ने सही जवाब दिया है जो यह बताते। रोज कल-कल करते कितने कल निकल गये यह सच साबित करते हुए कि क्या कभी कल भी आया है।

15-10-2014   

...............जहां और जैसे मेरे फोन के तार जोड़े गए हैं वहाँ कोई जोर से छींक भी देता है तो मेरा फोन बेचारा किसी अनिष्ट की आशंका से अपने खोल में सिमट जाता है।  अब जब फोन बंद हो जाता है तो इन भले लोगों की शर्त है कि खराबी की शिकायत भी BSNL के फोन से ही होनी चाहिए। अब इस कंपनी का फोन तो चिराग लेकर ढूंढने से ही मिलता है। और उसकी खराबी का पता लगातने में इन्हें हफ़्तों लग जाते हैं !  पता नहीं सरकारी काम, नियम, कानून ऐसे क्यों होते है ?  

आज पूरे इक्कीस दिन हो गए फोन को बंद हुए ! कभी-कभी दो जने आते हैं ! एक छाया में बैठ बीड़ी पिने लगता है दुसरा इधर-उधर कुछ टटोल नाकामी में सर हला देता है ! आज के समय में उच्च तकनीकी उपकरणों की सहायता से जहां इनके प्रतिद्वंदी एक दो दिन में उपकरणों में जान डाल देते हैं वहीं सरकारी सहायता आने में हफ़्तों लग जाते हैं। यही हाल इनके मोबाइल कनेक्शन का है।  जो सबके सामने खुले में ही बात करवाता है,  घर के अंदर से बात करवाने में शर्माता है। जिन्होंने इसे छोड़ा है वे पूछने पर बतलाते है कि भाई उससे तो टावर के नीचे खड़े हो तो भी बात नहीं होती थी। अब ऐसा क्यों है कि प्रायवेट कंपनियां दिन-दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रही हैं, लोग उनसे जुड़ते जाते हैं और इस महावीर को अपनी ताकत ही पता नहीं चलती 

30-09-15
............आखिर #BSNL के भूमि-पकड़, अचल फोन को नमस्ते भेज दी है। हाथ जोड़ने का कारण जानने के लिए उन्होंने जो फॉर्म दिया उसमे वही सारे कारण थे जिनसे उपभोक्ता हलकान रहता है। आश्चर्य होता है और हंसी भी आती है कि अंदाजे के बावजूद सब कुछ वैसे ही बदस्तूर चला आ रहा है, सुधार की कोई कोशिश ही नहीं होती !
 
सही दिशा निर्देश ना होने के कारण कल कनेक्शन कटवाने के लिए मुझे तीन घंटे और उनके दफ्तर के चार चक्कर लगाने पड़े, जब मेरे द्वारा जमा किया हुआ फार्म वहीं के एक कार्यकुशल सज्जन से इधर-उधर होने पर वैसी ही क्लियरेंस को दोबारा दूसरे ऑफिस से लाने को कहा गया।  इसके पहले कि खोपड़ी सटकती, कागज़ तो मिल गया पर डेढ़ बज गए। अब यह तो सबको पता है कि लंच टाइम में तो सरकारी आदमी अपनी भी नहीं सुनता !  सो मजबूरी थी। वह तो अच्छा है कि "भ्रामरी प्राणायाम" से दिमाग थोड़ा शांत रहने लग गया है। सज्जन ने  दो बजे की बजाए  पौने तीन बजे आ कर लोगों को उपकृत किया......!

ऐसे कनेक्शन देती रही है BSNL 36 गढ़ की राजधानी रायपुर में   
यह तो सिर्फ BSNL की बात है ! सुना है सरकारी लोहे के कारखानों का तो और भी बुरा हाल है सिर्फ भिलाई स्टील प्लांट सबको खाना खिला रहा है ! वही हाल दूरदर्शन का है ! वही टाटा से जबरन छीनी गई हवाई सेवा का है ! वही हाल बैंको का है ! विरोध करने में इन उपक्रमों से मुफ्त का फ़ायदा उठाने-पाने वालों, बिना ज्यादा काम किए पगार पाने वालों और यहां के कामगारों से अपनी राजनितिक दूकान चलाने वालों का बहुत बड़ा हाथ है !  

एक बात और जैसा कि बेच दिया-बेच दिया (मौनी बाबा के राज्य में भी झाँक लेना उचित होगा) का शोर मचाया जाता है तो यदि कोई काम सरकार नहीं संभाल पाती और उसे अपने ही देशवासी को सौंप दिया जाता है तो इसमें बुराई क्यों खोजी जाती है। प्रायवेट सेक्टर से इतनी ही नफ़रत है तो सुबह उठते ही टूथ-ब्रश से लेकर रात तक उन्हीं के द्वारा निर्मित बेड-पिलो पर कैसे नींद आ जाती है ! ! ! 

18 टिप्‍पणियां:

शिवम् कुमार पाण्डेय ने कहा…

बहुत बढ़िया।
उम्दा लेख।🌻

Dr Varsha Singh ने कहा…

विचारोत्तेजक आलेख...
ज्वलंत प्रश्न...

साधुवाद !!!

MANOJ KAYAL ने कहा…

बहुत ही सुंदर सृजन।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शिवम जी
जबरदस्ती का विरोध नागवार गुजरता है ! मजबूरीवश उत्तर देना पड़ता है

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

वर्षा जी
भुग्तभोगी को जब बेकार का उपदेश सुनने को मिलता है तो कोफ़्त तो होनी ही होती है

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

मनोज जी
हार्दिक स्वागत है

सधु चन्द्र ने कहा…

बहुत ही सुंदर रचना। सादर।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

सधु जी
हौसलाअफजाई के लिए हार्दिक आभार

प्रवीण गुप्ता - PRAVEEN GUPTA ने कहा…

बहुत ही अच्छी और सारगर्भित पोस्ट हैं, आपने तो बखिया उधेड़ कर रख दी. सारे के सारे सरकारी विभागों का यही हाल हैं. चाहे केंद्र के हो या राज्य के. राज्य के विभागों का तो और भी बुरा हाल है. सरकार का काम प्रशासन व सुरक्षा हैं, व्यापार नहीं.

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

प्रवीण जी
स्वागत है आपका! कभी-कभी तो यही लगता है कि सिर्फ विरोध करना है इसीलिए विरोध किया जाता है

Meena Bhardwaj ने कहा…

सादर नमस्कार,
आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 05-02-2021) को
"समय भूमिका लिखता है ख़ुद," (चर्चा अंक- 3968)
पर होगी। आप भी सादर आमंत्रित हैं।
धन्यवाद.


"मीना भारद्वाज"

विकास नैनवाल 'अंजान' ने कहा…

सरकारी कर्मचारियों की लापरवाही तो जगविदित है। मुझे लगता है सरकारी संस्थानों को बेचने की जगह नीतिगत बदलावों की जरूरत है। यह सरकारी लोग ही देश चला रहे हैं। अगर वह संस्थान नहीं चला पा रहे तो देश कैसे चला पाएंगे। बीएसएनल जैसी संस्था तभी उभर पाएंगी जब प्राइवेट की तरह परफॉरमेंस के हिसाब से इंसेंटिव दिए जाएंगे। वही नौकरी जाने का खतरा भी इन पर होगा।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

मीना जी
सम्मिलित करने हेतु अनेकानेक धन्यवाद

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

विकास जी
संस्थान चलाने को देश से नहीं जोड़ा जाना चाहिए! पर वहां काम करने वालों की जवाबदेही भी जरूर होनी चाहिए! सब चलता है और हमें क्या होने वाला है जैसा रवैया खत्म होना बहुत जरुरी है

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

सोचने को विवश करता अच्छा आलेख।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

बहुत-बहुत धन्यवाद, शास्त्री जी

Kamini Sinha ने कहा…

बहुत ही अच्छी विचारणीय लेख ,सादर नमन आपको

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

कामिनी जी
अनेकानेक धन्यवाद

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