बुधवार, 16 सितंबर 2020

शिखरारूढ के लिए जिम्मेदारी निभाना जरूरी है

आजकल किसी भी समारोह, सम्मान, उपाधि आदि को सदी से जोड़ देने का चलन चल पड़ा है ! सदी का यह, सदी का वह,  इत्यादि, इत्यादि ! सवाल यह उठता है कि क्या ऐसा आयोजन करने वालों को उस विधा विशेष के सौ सालों के दिग्गजों के बारे में पूरी जानकारी होती भी है ? क्या जिन्हें सम्मानित किया जा रहा है वे पिछले सौ वर्ष में उस विधा के महापुरुषों के पासंग भी हैं ? पिछले लोगों की समाज के प्रति निष्ठा, देश के प्रति समर्पण, अवाम से लगाव व प्रेम जैसा कुछ, आज उपाधि लेने को अग्रसर होते व्यक्ति में भी है ? उनकी और इनकी उपलब्धियों की कोई तुलना की गई है ? ऐसा क्यूँ है कि दशकों बाद भी वे लोग लोगों के जेहन में जीवित हैं, जबकि आज इन उपलब्धियों से नवाजे जाने वालों को, कुछेक को छोड़, उनके शहर से बाहर भी कोई नहीं जानता ! शायद यही कारण है कि अधिकांश सम्मान समारोह विवादित रहते हैं और अधिकांश अलंकरणों का पहले जैसा मान नहीं रह गया है ! और लेने वाले भी अपने कप-बोर्ड पर एक और शो पीस टांग देते हैं बिना उसके साथ आई जिम्मेदारी को महसूसने के .............................................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

रजतपट पर अदाकारी दिखाने वाले कलाकारों का दबदबा समाज पर सदा से ही रहा है। पर्दे पर बुराई, अन्याय, भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेड़ने वाले, असत्य पर सत्य को विजय दिलाने वाले इनके किरदार अपार लोकप्रियता हासिल कर इन्हें असल जीवन में भी अवाम का नायक बना देते हैं। भले ही अपने निजी जीवन में वे अपने निभाए हुए किरदारों के बिल्कुल विपरीत ही क्यों न हों ! मध्यम-निम्न-सर्वहारा वर्ग के लोग, जो व्यवस्था से, समाज के सशक्त वर्ग से या भ्रष्टाचारी संतरी-मंत्री के जुल्मों का शिकार होते हैं और निर्बल होने के कारण उनका कुछ बिगाड़ नहीं पाते, ऐसे लोग जब पर्दे पर अपने जैसे एक आम इंसान को उनको दंड देते, प्रताड़ित करते या अपना हक़ छींन कर लेते देखते हैं तो उस किरदार को निभाने वाले शख्स को सर-माथे पर बैठा लेते हैं ! उसमें अपनी छवि देखने लगते हैं ! उससे खुद को इस हद तक जोड़ लेते हैं कि उसे भगवान तक का दर्जा दे देते हैं। इसी लिए कभी सुदूर किसी दूसरे देश में भी यदि इनके नायक के साथ कानूनन भी कोई कार्यवाही हो जाए तो उसके चाहने वाले देश में हंगामा बरपा देते हैं। 

पर्दे पर के नायकों का प्रभाव लोगों पर इतना गहरा होता है कि इनकी हर बात को ब्रह्मवाक्य मान उस पर विश्वास कर लिया जाता है। जनता की इसी कमजोरी का लाभ उठा, विज्ञापनदाता अपने उत्पादों के प्रचार के लिए इनका "उपयोग'' करते आ रहे हैं। इस श्रेणी में अपवाद स्वरुप दो-चार लोग, अलग क्षेत्र से जरूर शामिल हैं, पर वे सब दूसरी पायदान पर ही बने रह पाए हैं। सोच कर देखिए कि यदि कोई प्रभावशाली धर्मगुरु या कोई नेता या उद्योगपति किसी चीज की सिफारिश करे तो क्या लोग उनकी बात मान उस ओर उतना आकर्षित होंगें जितना किसी दूसरे या तीसरे दर्जे के अभिनेता या अभिनेत्री के कहने से हो जाएंगे !  कभी नहीं ! 

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एक चलन और ध्यान देने लायक है ! यह किसी व्यक्ति विशेष पर निशाना साधने या किसी को कमतर आंकने की कोशिश नहीं है। पर देखने में आया है कि किसी भी समारोह, पुरूस्कार, उपाधि, उपलब्धि को सदी से जोड़ दिया जाने लगा है !  सदी के कलाकार ! सदी के व्यंगकार ! सदी के महानायक ! सदी का भव्य आयोजन सदी का यह, सदी का वह,  इत्यादि, इत्यादि

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पर विडंबना क्या है ? वही भगवान बने बैठे लोग, कुछेक को छोड़, उन करोड़ों लोगों, जिन्होंने उन्हें सर माथे पर बैठाया, जिनकी बदौलत उन्हें नाम-दाम-यश-शोहरत-सम्मान मिला, उनकी ही कभी फ़िक्र नहीं करते ! उन्हें सिर्फ और सिर्फ अपनी और अपने परिवार की ''सेहत'' की चिंता रहती है। अवाम से जुडी या समाज को प्रभावित करने वाली बात पर ये लोग चुप्पी साध लेते हैं ! कौन पचड़े में पड़े ! कौन खतरा मोल ले ! पता नहीं, कोई बात क्या बिगाड़ कर रख दे ! कल बातों ही बातों में कुछ ऊक-चूक हो जाए तो काम-धंधा ही ठप्प ना पड़ जाए ! और ये वे लोग हैं जो पैसा मिलने पर बेझिझक किसी के शादी-ब्याह में नाचने या किसी गलत और बेतुकी चीज का ब्रांड एम्बेस्डर बनने में पीछे नहीं रहते ! यह बात सही है कि देश के हर नागरिक की तरह इन्हें अपनी मर्जी का काम करने का अधिकार है ! पर शिखर पर पहुंचते ही कुछ जिम्मेदारियां खुद ब खुद झोली में आ गिरती हैं ! प्रशंसकों की अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं ! देश-समाज इनकी तरफ देखने लगता है ! तब आप का जीवन सिर्फ आपका नहीं रह जाता ! पर रील की जिंदगी के ये हीरो रियल जिंदगी में जीरो ही साबित होते हैं ! हमारे ये तथाकथित नायक सब कुछ अनदेखा-अनसुना कर निरपेक्ष भाव से आँखें मूंदे पड़े रहते हैं। इस बात में हमारे दक्षिणी भारतीय अदाकार अपने कर्त्वयों और समाज की जिम्मेदारी के प्रति फिर भी कुछ जागरूक हैं। 

अभी ताजा हालातों पर ही गौर किया जाए तो यही पाया जाएगा की शीर्ष पर बैठे, अवाम के तथाकथिक ''आदर्श'' अपने मुंह पर टेप लगाए रहे, किसी ने चूँ तक नहीं की ! दो-चार थकी-दबी ध्वनियां उठीं भी, तो ऐसे लोगों की जो इस सुअवसर को ख़बरों में आने का मौका मान चौका लगाना नहीं चूके ! ऐसे लोगों का बोलना जनता को नहीं बल्कि अपने क्षेत्र के दिग्गजों को सुना, अपने अस्तित्व का भान कराना था।  हाशिए पर बैठे ऐसे लोग क्या और उनकी बातों का वजन क्या ! सब मौकापरस्ती और अवसरवादिता का खेल ! शायद कोई छींका टूट ही जाए। 

इधर एक चलन और ध्यान देने लायक है ! यह किसी व्यक्ति विशेष पर निशाना साधने या किसी को कमतर आंकने की कोशिश नहीं है। पर देखने में आया है कि किसी भी समारोह, पुरूस्कार, उपाधि, उपलब्धि को मशहूर करने के लिए उसे सदी से जोड़ दिया जाने लगा है !  सदी के कलाकार ! सदी के व्यंगकार ! सदी के महानायक ! सदी का भव्य आयोजन सदी का यह, सदी का वह,  इत्यादि, इत्यादि ! सदी यानी सौ वर्ष !!

सवाल यह उठता है कि ऐसा आयोजन करने वालों को उस विधा के सौ सालों के दिग्गजों के बारे में पूरी जानकारी होती भी है क्या ? क्या जिन्हें सम्मानित किया जा रहा है वे पिछले सौ वर्ष में उस विधा के महापुरुषों के पासंग भी हैं ? पिछले लोगों की समाज के प्रति निष्ठा, देश के प्रति समर्पण, अवाम से लगाव व प्रेम जैसा कुछ, आज उपाधि लेने को अग्रसर होते व्यक्ति में भी है ? उनकी और इनकी उपलब्धियों की कोई तुलना की गई है ? ऐसा क्यूँ है कि दशकों बाद भी वे लोग लोगों के जेहन में हैं, जबकि आज इन उपलब्धियों से नवाजे जाने वालों को, कुछेक को छोड़, उनके शहर से बाहर भी कोई नहीं जानता ! शायद यही कारण है कि अधिकांश सम्मान समारोह विवादित रहते हैं और अधिकांश अलंकरणों का पहले जैसा मान नहीं रह गया है ! और लेने वाले भी अपने कप-बोर्ड पर एक और शो पीस टांग देते हैं बिना उसके साथ आई जिम्मेदारी को महसूसने के !

सोमवार, 14 सितंबर 2020

कोरोना ने समझाया परिवार का महत्व

एक सर्वे के अनुसार तकरीबन 10-15 साल पहले से, अमेरिकन लोगों की सोच में बदलाव और संयुक्त परिवार की ओर रुझान  शुरू हो गया था। जो इस कोरोना संकट की घडी में और पुख्ता हुआ और लोगों ने पुरानी जीवन शैली व रहन-सहन को तेजी से अपनाना शुरू कर दिया। अब तो यह भी सामने आने लगा है कि वहां ऐसे परिवार बहुत लोकप्रिय हो रहे हैं, जिनके पीढ़ियों से आपसी संबंध अटूट रहे हों। लोग उनसे जुड़ने, उनसे संबंध बनाने में गौरव महसूस करने लगे हैं। उसके उलट, उनकी हर बात का अनुसरण कर अपने को आधुनिक और प्रगतिशील दिखाने की चेष्टा करने वाले हम, जिनका सदियों से संयुक्त परिवारों में रहने का चलन रहा है, इतिहास रहा है, आज अपनी छांवनी अलग डाल, खुद को स्वतंत्र मान -दिखा अत्याधुनिक होने का भ्रम पाले बैठे हैं......................!

#हिन्दी_ब्लागिंग   

जगत में घटने वाली हर बात में अच्छाई और बुराई, दोनों ही निहित रहती हैं। अब जैसे इस कोरोना आपदा को ही लें जो मानवमात्र के अस्तित्व के लिए अभूतपूर्व संकट के रूप में जाना जाता तो रहेगा, परंतु इसके भी कुछ परोक्ष और अपरोक्ष फायदे तो मिले ही हैं। जैसे जल-थल-वायु का साफ़ होना ! पर्यावरण की गुणवत्ता में सुधार ! इंसान का संयमित होना ! कम संसाधन वाले देशों के प्रति सक्षम देशों का मैत्रीपूर्ण व्यवहार इत्यादि ! परन्तु सबसे बड़ी बात है कि इसी बीच इंसानों की सोच-आचार-व्यवहार में भी बदलाव दिखाई पड़ने लगा है। अमेरिका की, जिसके तौर-तरीके और जीवन शैली अपनाने के लिए हम लालायित रहते हैं, खबर है कि वहां के लोग अब अपने माता-पिता या अभिवाककों के पास जा कर रहने लगे हैं। एकल के बनिस्पत संयुक्त परिवारों में रहना लोग पसंद करने लगे हैं। उनको समझ में आ गया है कि उसकी सुरक्षा, प्रेम, अपनापन अन्यत्र हासिल नहीं हो सकता। बच्चों को बेहतर, नेक और भला इंसान बनाने में भी संयुक्त परिवार और उसके बुजुर्ग सदस्यों का बहुत बड़ा योगदान रहता है। 

कोरोना के कारण लागू लॉकडाउन के तहत भागती-दौड़ती ज़िंदगी में अचानक आए ठहराव, बीमार होने के डर, अकेलेपन के तनाव ने लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव डालना शुरू कर दिया है। इससे उत्पन्न चिंता, डर, अकेलेपन और अनिश्चितता के माहौल से दिन-रात जूझते लोगो को परिवार की याद सताने लगी ! उन युवाओं के अलावा, जो किसी भी तरह की खलल से दूर रह कर अपनी जिंदगी जीना चाहते थे ! वे दम्पत्ति जो पहले अपनी स्वतंत्र्ता में किसी की टोका-टाकी ना चाहते हुए अकेले रहना चाहते थे, या जो किसी भी कारणवश सिर्फ अपने लिए जीने का ख्वाब पाले बैठे थे ! ऐसे लोगों को इस विपदा ने परिवार की अहमियत समझा दी। वे अब अपने माँ-बाप, यहां तक की बुजुर्ग दादा-दादी के पास जा कर रहने में सकून पाने लगे हैं ! एक मोटे अनुमान के अनुसार इस साल के मार्च से मई तक के समय में करीब 29 से 30 लाख लोगों ने संयुक्त परिवार  को फिर से अपना लिया है। ये रुझान दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है। इसमें पढ़ाई करने वाले युवाओं की संख्या शामिल नहीं है जो मजबूरी में परिवार से दूर रह रहे थे। दूसरे शब्दों में कहें तो संयुक्त परिवार का माहौल उन्हें फिर मुआफ़िक लगने लगा है।  

वैसे यह बदलाव कोरोना संकट के पहले से ही आकार लेने लगा था। एक सर्वे के अनुसार तकरीबन 10-15 साल पहले से, अमेरिकन लोगों की सोच में बदलाव और संयुक्त परिवार की ओर रुझान शुरू हो गया था। जो इस संकट की घडी में और पुख्ता हुआ और लोगों ने पुरानी जीवन शैली व रहन-सहन को तेजी से अपनाना शुरू कर दिया। अब तो यह भी सामने आने लगा है कि वहां ऐसे परिवार बहुत लोकप्रिय हो रहे हैं, जिनके पीढ़ियों से आपसी संबंध अटूट रहे हों। लोग उनसे जुड़ने, उनसे संबंध बनाने में गौरव महसूस करने लगे हैं।उसके उलट, उनकी हर बात का अनुसरण कर अपने को आधुनिक और प्रगतिशील दिखाने की चेष्टा करने वाले हम, जिनका सदियों से संयुक्त परिवारों में रहने का चलन रहा है, इतिहास रहा है, आज अपनी छांवनी अलग डाल, खुद को स्वतंत्र मान-दिखा अत्याधुनिक होने का भ्रम पाले बैठे हैं। 

हमारी इस मनोवृत्ति की आंच को हवा दे, अपनी रोटी सेकने में बाजार भी पीछे नहीं रह रहा ! आए दिन ऐसे विज्ञापन परदे पर दिखाई देते रहते हैं जो ढके-छिपे, द्विअर्थी शब्दों के जाल फैला, एकल परिवार की वकालत करने से बाज नहीं आते ! जितना लोग अलग और अकेले रहेंगे, उतनी ही इनकी खपत बढ़ेगी ! इन पर ध्यान और लगाम कसना जरुरी है ! पर हमारा चलन है कि जब तक पानी सर से ऊपर नहीं हो जाता तब तक हम और हमारी सरकार नशे में गाफिल ही रहते हैं। कुछ दिनों पहले एक बैंक भी ऐसा ही कुछ एकल परिवार के फायदों के बारे में समझा रहा था ! आजकल एक बाहरी कंपनी Disney+hotstar  का विज्ञापन आ रहा है। जिसमें पता नहीं किस मध्यम वर्गीय परिवार की अजीबोगरीब तस्वीर दिखा कर युवाओं को अपने परिवार से विमुख होने को उकसाया जा रहा है ! #सरकार_तक_बात_पहुंचाने_की_कोशिश_के_बावजूद_धड़ल्ले_से_यह_विज्ञापन_प्रसारित_हो_रहा_है। 

विडंबना ही तो है कि दुनिया में परिवार एकजुट होने की ओर तत्पर हैं और हम टूटन में अच्छाई खोज रहे हैं !

@संदर्भ, दैनिक भास्कर 

गुरुवार, 10 सितंबर 2020

हमें तो खबर चाहिए, सिर्फ टीआरपी के लिए

अभी हफ़्तों तक एक रहस्यमयी, ''ह्त्या या आत्महत्या'' नामक नौटंकी का प्रसारण हर टी वी चैनल पर होता रहा है ! जिसमें लोगों की दिलचस्पी मरने वाले पात्र से ज्यादा उसके धन और संबंधों के खुलासे पर थी। चैनलों ने इसे नेशनल इश्यू बना डाला था ! रोज इसकी पर्दे पर बखिया उधेड़ी जाती रही ! इन दिनों लगता ही नहीं था कि देश दुनिया में ऐसी कोई और खबर भी है जो देशवासियों को सुननी-जाननी चाहिए ! यहां तक कि कोरोना भी सहम कर दूसरे-तीसरे पन्नों पर जा दुबका था ! सरहद पर घिरती अशांति से ज्यादा इन खबरनवीसों को नौटंकी के पात्रों को तरजीह देने की फ़िक्र थी। फिर नायिका के जेलग्रस्त होते ही यवनिका का पटाक्षेप हो गया ! पर तब तक चैनलों के भाग्य से एक और सनसनी हवा में तैरनी शुरू हो चुकी थी ..........................!   

#हिन्दी_ब्लागिंग    

देखते-देखते समय कितना बदल गया है ! बीते दिनों में अपनी भाषा को सुधारने के लिए, शब्दों के सही उच्चारण के लिए या भाषा पर पूरा अधिकार पाने के लिए हमसे अखबार पढ़ने और रेडिओ पर ख़बरें सुनने को कहा जाता था ! टी वी के शुरूआती दिनों में भी उस पर प्रसारित होने वाली ख़बरों को, चाहे वे किसी भी भाषा में हों, बहुत सोच समझ कर प्रसारित किया जाता था ! उन्हें पढ़ने वालों का उस भाषा पर पूरा नियंत्रण होता था। टी आर पी नामक सुरसा का जन्म नहीं हुआ था। अवाम पूरी तरह इन माध्यमों पर विश्वास करता था ! 

आज क्या हम अधोगति को प्राप्त इन माध्यमों पर लेश मात्र भी भरोसा कर सकते हैं ! जो आज सिर्फ और सिर्फ दर्शकों को जुटाने के लिए कुछ भी, कैसा भी दिखा-सुना-समझा, अपना उल्लू सीधा करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तत्पर रहते हैं ! तोताचश्म तो इतने की सुबह की बात दोपहर और दोपहर की बात रात को बिना किसी झिझक के बदलते रहते हैं। सच को झूठ और झूठ को सच बनाने में इन्हें महारथ हासिल है। सीधी सी जगजाहिर बात है कि हर चैनल, हर अखबार अपना पेट भरने के लिए किसी ना किसी गुट में शामिल हो चुका है ! उस पर वही दिखाया-सुनाया-समझाया जाता है, जैसा उसको निर्देश मिलता है ! जाने-अनजाने उसके अपने-अपने श्रोता और पाठक बन गए हैं ! उन्हें उनके स्वादानुसार भोजन परोसा जाता है। इन्हें ना समाज से मतलब है नाही अवाम से, नाहीं किसी की भावनाओं से ! इन्हें सिर्फ अपने विज्ञापनों की संख्या से मतलब है, वह चाहे जैसा भी हो ! इसीलिए आज छोटे परदे पर ऊल-जलूल, फूहड़, अनर्गल, भदेश संदेशों की बाढ़ सी आई हुई है ! उनसे बच्चों के अपरिपक्व दिलो-दिमाग पर क्या असर पड़ता है, इसकी किसी को कोई चिंता नहीं है !   

''अपने आप को ख़बरों में बनाए रखने को आतुर, ख्याति की चकाचौंध में बने रहने की लालसा में एक अदाकारा उल्टा-सीधा बयान दे देती है ! चिढ कर और अपनी राजनीती चमकाने-बचाने के लिए  तथाकथित नेता उसे धमकी दे देते हैं ! मौका देख अदाकारा को केंद्र की तरफ से सुरक्षा प्रदान कर दी  जाती है ! बाजार की कभी ना मिटने वाली भूख को कुछ और दिनों के लिए रसद मिल जाती है !'' 

अभी हफ़्तों तक एक रहस्यमयी, ह्त्या या आत्महत्या नामक नौटंकी का प्रसारण हर टी वी चैनल पर होता रहा ! जिसमें लोगों की दिलचस्पी मरने वाले पात्र से ज्यादा उसके धन और संबंधों के खुलासे पर थी। चैनलों ने इसे नेशनल इश्यू बना डाला ! दिन-रात बस वही और वही ! दर्शकों में से कुछ ने मजबूरन ना चाहते हुए भी देखा क्योंकि हर जगह उसका ही आलाप लिया जा रहा था ! कुछ ने न्यूज़ देखना ही बंद कर दिया ! पर अधिकांश ऐसे थे जो इस कथानक में पूर्णरूपेण डूब इसका रसास्वादन करते थे ! इन्हीं की शह पर रोज इसकी पर्दे पर बखिया उधेड़ी जाती रही ! इन दिनों लगता ही नहीं था कि देश दुनिया में कुछ अघटित भी घट रहा है ! कोई ऐसी खबर ही नहीं है जो देशवासियों को सुननी-जाननी चाहिए ! यहां तक कि कोरोना भी सहम कर दूसरे-तीसरे पन्नों पर जा दुबका था ! सरहद पर घिरती अशांति से ज्यादा इन खबरनवीसों को नौटंकी के पात्रों को तरजीह देने की फ़िक्र थी। फिर नायिका के जेलग्रस्त होते ही यवनिका का पटाक्षेप हो गया ! पर तब तक चैनलों के भाग्य से एक और सनसनी हवा में तैरनी शुरू हो गई थी ! 

वैसे इन सब में किसी का दोष नहीं है ! जैसी मांग रहती है बाज़ार वही सप्लाई करता है ! आज हमारी मानसिकता ही अपने तक सिमट कर रह गई है ! जैसे हम हैं वैसे ही हमारे नेता हो गए हैं। आज जब हमारे सामने अभूतपूर्व चुन्नोतियां ख़म ठोक रही हैं ! त्रिमुखी संकट हमें घेरने की फिराक में हैं ! ऐसे में भले ही हमारे आपसी कितने भी मतभेद हों, सारे देश को एकजुट हो, सरकार को सकारात्मक समर्थन देने की जरुरत है ! अपनी हैसियत और सहूलियत के अनुसार अपना योगदान देने की आवश्यकता है। राष्ट्र तो सदा ही पहले रहता है, हम सब और हमारे दल बाद में आते हैं।    

पर हो क्या रहा है ! हमारे कुछ तथाकथित नेता एक फ़िल्मी अदाकारा से जुमलेबाजी में उलझे हैं ! एक दूसरे की हद समझाई जा रही है ! अपने ही देश में अपने ही राज्यों में एक-दूसरे के आने-जाने पर देख लेने की धमकी दी जा रही है ! कारण....! एक फ़िल्मी अदाकारा अपने आप को ख़बरों में बनाए रखने की खातिर, ख्याति की चकाचौंध में बने रहने की लालसा में उल्टा-सीधा बयान दे देती है ! चिढ कर और अपनी राजनीती चमकाने-बचाने के लिए कुछ तथाकतित नेता उसे धमकी दे देते हैं ! मौका देख अदाकारा को केंद्र की तरफ से सुरक्षा प्रदान कर दी  जाती है ! बाजार की कभी ना मिटने वाली भूख को कुछ और दिनों के लिए रसद मिल जाती है ! 

इस कर्म-काण्ड को देख ऐसा नहीं लगता कि गलत समय पर गलत जगह निवेश कर दिया गया हो। जिस समय सारी पार्टियों को मिल कर आसन्न संकट के समय दुश्मन को अपनी एकजुटता का संदेश देना चाहिए ! वहां एक फ़िल्मी अदाकारा के साथ तू-तू-मैं-मैं कर अपनी अदाकारी दिखाई जा रही है ! दूसरी ओर जो संसाधन या पैसा, भले ही वह कितना भी हो, इस आपाद स्थिति में देश हित में काम आता, कोरोना को ख़त्म करने का हेतु बनता, उत्पादन बढ़ाने में प्रयुक्त होता, मुसीबतजदा लोगों की सहायता का सबब बनता उसे एक छद्म अदाकारी के गैर उत्पादक डिबेंचर पर लगा दिया गया ! इस खेल में यदि किसी का भला होगा तो सिर्फ और सिर्फ उस अदाकारा का ! जो शायद भविष्य में राजनेता बन अपना भविष्य सुरक्षित कर ले और हम आप जैसे उसको आता-जाता देख तालियां बजाते रहें। पहले भी तो कमोबेश हर पार्टी के द्वारा उसके जैसे कई ''शो-पीस" सदनों को सजाने के लिए भेजे जाते रहे हैं, जिनमें इक्के-दुक्के को छोड़ प्राय: सभी के कारनामे हम देख ही चुके हैं !   

शनिवार, 5 सितंबर 2020

बहुत हो गया परिवार

आज हर ऐसे चैनल पर जिसकी  नकेल विदेशी  हाथों में है,  ऐसे ही ऊल - जलूल,  तर्कहीन, अतिरेक  से भरपूर, बिना किसी तथ्य या शोध के धार्मिक कथानक परोसे जा रहे हैं ! इधर एक नया चलन O.T.T. का शुरू हो गया है,  जिस पर किसी का  भी नियंत्रण नहीं है और  कुछ  भी दिखाने की आजादी है !  जिसके फलस्वरूप  मौकापरस्त  अपने लाभ  के लिए  कुछ  भी बना  कर यहां रिलीज  कर छोटे - छोटे बच्चों के अपरिपक्व दिलोदिमाग में जहर भरने से बाज नहीं आ रहे.............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

आजकल टीवी पर  Disney+hotstar  का एक विज्ञापन आ रहा है।  जिसमें पता नहीं कैसी-कैसी  कल्पना कर युवाओं को अपने परिवार से विमुख होने को उकसाया जा रहा है ! विज्ञापन के  अनुसार अगर आप परिवार में रह कर क्रिकेट का मैच देखेंगे तो घर के सदस्यों की भदेस हरकतों और गतिविधियों (अतिरेक) की वजह से बेहाल हो जाएंगे ! यदि अकेले देखेंगे तो सुकून से सब कुछ देख पाएंगे ! विज्ञापन दाताओं ने  बड़ी चालाकी और कुटिलता से क्रिकेट के खेल की लोकप्रियता को  भुनाते हुए उसके कंधे  पर रख दो निशानों पर गोली चलाई है !  पहला अभीष्ट तो अपने सीरियल वगैरह के लिए भीड़ जुटाना है ! दूसरा परिवार का विघटन करना !  जिससे काम  से लौटे इंसान को मनोरंजन के लिए उन्हीं पर निर्भर रहना पड़े बजाए, परिवार के ''झमेलों'' के ! 

आज जब पहले ही पारिवारिक मूल्य तार-तार हो रहे हों ! देश में परिवारों का विघटन हो रहा हो ! एकल परिवारों का ''फैशन'' जोर पकड़ रहा हो ! रिश्ते-नाते सब ताक पर धरे जा रहे हों ! बच्चों को बुआ-फूफा, मौसा-मौसी, काका-ताऊ जैसे शब्द अजूबा लगने लगे हों ! छोटे-छोटे शहरों में वृद्धाश्रमो की बाढ़ सी आ गई हो ! शादी-ब्याह जैसी रस्मों को भूल युवा, यूज एंड थ्रो जैसी सुगम पर अनैतिक लीव इन रिलेशन जैसा चलन अपना रहे हों ! तब इस तरह के विज्ञापन तो उत्प्रेरक का ही काम करेंगें ! सबसे नागवार बात तो यह है कि विदेशी आका और उसकी स्थानीय कठपुतलियों ने पता नहीं किस घर की तस्वीर पेश की है ! क्या भारत के मध्यम वर्ग के घर ऐसे होते हैं ! 

आज बाहरी शक्तियां अपने स्वार्थ के लिए जी तोड़ कोशिश कर रही हैं, देश में अस्थिरता लाने की ! यह विज्ञापन भी उन्हीं के षड्यंत्र का एक हिस्सा लगता है ! पहले इंसान फिर समाज, फिर उसकी आस्था-मान्यता-रीति-रिवाज को तोड़ो, अस्थिरता अपने आप आ जाएगी ! आज हर ऐसे चैनल पर जिसकी नकेल विदेशी हाथों में है, ऐसे ही ऊल-जलूल, तर्कहीन, अतिरेक से भरपूर, बिना किसी तथ्य या शोध के धार्मिक कथानक परोसे जा रहे हैं ! इधर एक नया चलन OTT का शुरू हो गया है, जिस पर किसी का भी नियंत्रण नहीं है और कुछ भी दिखाने की आजादी है ! जिसके फलस्वरूप मौकापरस्त अपने लाभ के लिए कुछ भी बना कर यहां रिलीज कर छोटे-छोटे बच्चों के अपरिपक्व दिलोदिमाग में जहर भरने से बाज नहीं आ रहे !

आशा तो यही है कि #सरकार, #सूचना_तथा_संचार_मंत्रालय इस तरफ ध्यान देंगें और इस तरह के, अवाम, समाज, देशहित विरोधी चलन पर सख्ती से रोक लगाएंगे। 

गुरुवार, 3 सितंबर 2020

राम मंदिर और सोमपुरा परिवार

अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण से जुडा सोमपुरा परिवार एक ऐसा अनोखा परिवार है, जो पिछली सोलह पीढ़ियों से मंदिर निर्माण कार्य में जुटा हुआ है। नागर शैली में मंदिरों की रचना में  इस परिवार को महारथ  हासिल है। इसी शैली में अयोध्या में राममंदिर का निर्माण भी होना है। सोमपुरा परिवार का मानना है कि उनके पुरखों ने मंदिरों की रचना और उनकी बनावट की कला दैव्य वास्तुकार विश्वकर्मा से सीखी थी । उनके दादा प्रभाशंकर जी ने जगत-प्रसिद्ध गुजरात के सोमनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था.......................!

#हिन्दी_ब्लागिंग  

राम मंदिर ! सदियों से करोड़ों-करोड़ लोगों की आँखों में पलता एक सपना ! जिसे पूरा होता देखने की चाह में अनगिनत पीढ़ियां दिवंगत हो गईं। जिसको साकार करने की चाह में हजारों लोगों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए ! जिसकी राह में अपनों ने ही रोड़े अटकाए ! तुच्छ राजनीती के तहत श्री राम के अस्तित्व पर ही सवाल उठाए गए ! बेबुनियाद तर्कों का माया जाल रचा गया ! कुछ अवसरवादियों ने अपने मतलब के लिए इसे राजनीतिक, सामाजिक व धार्मिक विवाद बना दिया ! अमन-शान्ति के नाम पर रुकावटें खड़ी की गईं ! पर आखिरकार अनगिनत पीढ़ियों का संघर्ष, प्रभु के भक्तों का बलिदान और करोड़ों लोगों की आस्था रंग लाई और सारी बाधाओं को पार कर अब वह सपना साकार होने की ओर अग्रसर हो गया है। 

अब ऐसे महान, चिरप्रतीक्षित, देश की बहुसंख्यक आबादी के साथ-साथ देश-विदेश के करोड़ों लोगों की आस्था के प्रतीक को साकार करने हेतु कुछ ऐसा रूप देना, जो संसार में अप्रतिम, अनूठा, नायाब और अपने आप में मिसाल हो, कोई आसान काम नहीं था ! वह भी तब, जबकि सारे संसार की नजर इस घटनाक्रम पर टिकी हुई थीं ! कमोबेस सभी देशों को इस फैसले का उत्सुकतापूर्वक इन्तजार था ! इसकी भव्यता, विशालता और सुंदरता के लिए कौतूहल था ! सभी बड़ी आतुरता के साथ इसका निर्माण होते देखना चाहते थे ! इसे सभी की अपेक्षाओं पर खरा उतरना था। एक उदाहरण स्थापित करना था ! एक ऐसा निर्माण जिसे देश की पहचान बनना था ! बहुत कठिन परीक्षा की घडी थी। ऐसे में खोज जा कर ख़त्म हुई, महान शिल्पकार चंद्रकांत सोमपुरा के पास !                         
चंद्रकांत सोमपुरा
                        
गुजरात राज्य के भावनगर जिले के पालिताणा नगर में रहने वाला सोमपुरा परिवार एक ऐसा अनोखा परिवार है, जो पिछली सोलह पीढ़ियों से मंदिर निर्माण कार्य में जुटा हुआ है। नागर शैली में मंदिरों की रचना में  इस परिवार को महारथ हासिल है। इसी शैली में अयोध्या में राममंदिर का निर्माण भी होना है। सोमपुरा परिवार का मानना है कि उनके पुरखों ने मंदिरों की रचना और उनकी बनावट की कला दैव्य वास्तुकार विश्वकर्मा से सीखी है। गुजरात के इस परिवार के द्वारा अब तक 200 से भी ज्यादा मंदिरों के डिजाइन तैयार किए जा चुके हैं। उनके दादा प्रभाशंकर जी ने जगत-प्रसिद्ध गुजरात के सोमनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था। देश-विदेश में बिरला परिवार के लिए कई मंदिर इस परिवार ने बनवाए हैं। अक्षरधाम और अंबाजी जैसे कई आस्था स्थल सोमपुरा परिवार के डिजाइन पर ही बने हैं। मथुरा के मंदिर के निर्माण में भी इनका योगदान रहा है। 

बड़ी अनोखी बात है कि भव्य राम मंदिर का मॉडल तैयार करने वाले श्री चंद्रकांत सोमपुरा के पास वास्तुकला की कोई औपचारिक डिग्री नहीं है ! इन्होंने जो भी सीखा, अपने पिता से ही सीखा है। इसके बावजूद इनके हुनर के बल पर इन्हें देश-दुनिया से बड़े-बड़े मंदिरों का मॉडल बनाने के लिए बुलाया जाता रहा है।  खुद सोमपुरा अपने-आप को मंदिर का वास्तुविद कहलाना पसंद करते हैं। इन्होने ना सिर्फ अपने देश बल्कि दुनिया में भी नागर शैली के मंदिरों का नक्शा तैयार किया है। लंदन के सुप्रसिद्ध अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण मंदिर, जो अपने स्थापत्व और भव्यता के लिए दुनिया में सर्वोपरि माना जाता है, उसका नक्शा भी इन्होंने ही बनाया था।  

अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण मंदिर, लंदन 
अपने परिवार के मुखिया श्री चंद्रकांत सोमपुरा बताते हैं कि घनश्यामदास बिरला जी ने उन्हें विश्व हिंदू परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष अशोक सिंघल जी से मिलवाया था। जिनके आग्रह पर 1987 में उन्होंने राम मंदिर की रूप-रेखा तैयार की थी और उनके साथ मिल कर मंदिर पर काम शुरू किया था। इसमें लगने वाले पत्थरों के लिए बंसी पहाड़पुर के बलुआ-पत्थरों का चुनाव किया गया था, जिनकी उम्र 1500 साल मानी जाती है। बंसी पहाड़पुर, राजस्थान के भरतपुर जिले की एक तहसील रूपबास के रुदावल क्षेत्र का छोटा सा गांव है। जो अपने गुलाबी पत्थरों के लिए विश्वप्रसिद्ध है। इस पत्थर की उम्र हजारों साल की मानी जाती है। इसके अलावा इसकी खासियत है कि ना तो यह चटकता है, नाहीं इसमें सीलन आती है और तो और जैसे-जैसे इस पर पानी पड़ता है, वैसे-वैसे इसकी चमक और भी बढती जाती है। इसीलिए इसका चुनाव इस ऐतिहासिक मंदिर के निर्माण हेतु किया गया। हालांकि मंदिर के मुख्य द्वार पर जगत्प्रसिद्ध मकराना का सफ़ेद संगमरमर लगाया जाएगा।  


अब 77 साल के हो चुके चंद्रकांत सोमपुरा ने अपनी उम्र और कोरोना संकट के चलते अपने बेटे आशीष को यह भार सौंपा है। जो अनुबंध प्राप्त कंपनी लार्सन एंड टर्बो के साथ मिलकर अयोध्या में राम मंदिर पर काम कर रहे हैं। इस महान और ऐतिहासिक कार्य में उनके छोटे भाई निखिल उनके सहायक हैं। आशीष को यह कला अपने पिता और दादा से मिली है। पूरा परिवार ही बहुत रोमांचित और उत्साहित है। उनका मानना है कि आदिकाल से ही उनके परिवार पर सदा ईश-कृपा बनी रही है। यह प्रभु का आशीर्वाद ही है कि श्री राम मंदिर के साथ ही उनका नाम भी जुड़ गया है। अब राम मंदिर के निर्माण के साथ ही उनके जीवन में एक और नए अध्याय की शुरुआत होगी।

@अंतर्जाल का आभार 

मंगलवार, 1 सितंबर 2020

बोया पेड़ बबूल का तो.....!!

क्या बबूल का पेड़ लगाने वाला इतना मूर्ख था और उसे पौधे की ज़रा सी भी पहचान और इस बात का एहसास नहीं था कि वह क्या रोपने जा रहा है ! हो सकता है, उसने सोच-समझ. देख-भाल कर, इस पेड़ को ही चुन कर लगाया हो ! उसे भलीभांति इस बात का ज्ञान हो कि यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण वृक्ष है, जिसका प्रत्येक भाग पत्तियों से लेकर फल-फूल-छाल-गोंद व जड़ तक औषधिय गुणों से भरपूर हैं और इससे अनेक आयुर्वेदिक दवाइयां बनाई जा सकती हैं। हो सकता है कि वह कोई वैद्य ही हो.....!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

एक बहुत पुरानी कहावत है, बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां ते होय ! भले ही इसकी अन्तर्निहित सीख यही है कि बुरे काम का अच्छा नतीजा नहीं मिल सकता। पर दूसरी तरफ इस मुहावरे को सुन कुछ ऐसा नहीं लगता कि जैसे बबूल का पेड़ लगाने वाले ने कोई बहुत बड़ी गलती कर दी हो और आम जैसे महत्वपूर्ण, फलदार वृक्ष की जगह इस बेकार, कंटीले व अनुपयोगी से पेड़ को लगा दिया हो ! चलो, यदि लगा भी दिया, तो फिर वह इससे आम की उम्मीद क्यों करेगा ! फिर सवाल यह भी उठता है कि ऐसा कह कौन रहा है, और किससे कह रहा है, और वह कौन है जो चुपचाप सुने जा रहा है ! कहता क्यों नहीं कि बबूल अपनी जगह आम के पेड़ से किसी भी तरह कमतर नहीं है ! 

सोचने की बात है, क्या बबूल का पेड़ लगाने वाला इतना मूर्ख था और उसे पौधे की ज़रा सी भी पहचान और इस बात का एहसास नहीं था कि वह क्या रोपने जा रहा है ! हो सकता है, उसने सोच-समझ. देख-भाल कर, चुन कर ही इस पेड़ को ही  लगाया हो ! उसे भलीभांति इस बात का ज्ञान हो कि यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण वृक्ष है, जिसका प्रत्येक भाग, पत्तियों से लेकर फल-फूल-छाल-गोंद व जड़ तक औषधिय गुणों से भरपूर हैं और इससे अनेक आयुर्वेदिक दवाइयां बनाई जा सकती हैं। हो सकता है कि वह कोई वैद्य ही रहा हो ! जिसने इंसान, समाज और पशुओं तक की भलाई को ध्यान में रख अपनी दूरदर्शिता का उपयोग करते हुए इस बहूपयोगी वृक्ष का रोपण किया हो ! अगर ऐसा है तो वह इस वृक्ष से आम की उम्मीद क्यों करेगा ! 

 
यदि मान लें  कि पौधा लगाने  वाला  कोई भोला बंदा था. जिसे  वनस्पतियों के  बारे में कोई जानकारी नहीं थी,  इसी  लिए वह अपने बबूल के पेड़ से  आम के फल की आस लगाए बैठा रहा  तो  उसे आम का  बतला कर बबूल का पौधा  किसने थमाया !  फिर वर्षों उसे  जलील  कर नसीहतें देता रहा !  इस पर  भी यदि  वह भोला बंदा अपने बबूल के पेड़ से आम की उम्मीद लगाए बैठा रहा,  तो उसके आस - पास के  किसी  भलेमानुष  ने  उसे  सच्चाई क्यों  नहीं बताई !  क्यों उसे  प्रताड़ित  करवा, उदाहरण बना  दूसरों को ज्ञान बांटना शुरू कर दिया गया ! 

                                      
वैसे तो दोनों की पेड़ों की तुलना करना ही उचित नहीं है। दोनों वृक्षों की अपनी-अपनी खूबियां हैं, अपनी-अपनी विशेषताएं हैं ! बबूल में जो औषधीय गुण हैं वे आम में नहीं हैं और जो स्वाद, मिठास व दूसरी खूबियां आम में हैं वे बबूल में नहीं हैं। कायनात ने बनाया ही इस तरह है कि जो बात आम में है वह बबूल में नहीं हो सकती और जो खासियतें बबूल में हैं उन्हें किसी दूसरे वृक्ष में खोजना तो नासमझी ही होगी ! मरू-भूमि में उगने वाले काँटेदार बबूल की अहमियत जाननी हो तो वहाँ के स्थानीय निवासियों से इसके बारे में पूछ कर देखें, जिनके लिए यह प्रकृति की बेहतरीन सौगात है।फिर आम और बबूल ही क्यों, संसार की किसी भी वनस्पति की एक दूसरे से तुलना करना या किसी को कम आंकना, किसी भी दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता। सब अपनी-अपनी विशेषताएं, गुण तथा उपयोगिताएं लिए होते हैं। सबकी अपनी अलग-अलग पहचान होती है ! 

                           
ऐसी मान्यता है कि बबूल के पेड़, जिसे कीकर भी कहा जाता है, पर देवताओं का वास होता है। प्राचीन काल में इसकी पूजा की जाती रही है। इसको अत्यंत शुभ, पावन और वैभवदाई माना जाता है। इसका प्रत्येक भाग किसी न किसी उपयोग में जरूर आता है। इसकी लकड़ी औरों की बनिस्पत काफी मजबूत व क्षयरोधी होती है। चाहे मरुभूमि का फैलाव हो या पानी का कटाव इसके होते इन दोनों से बचाव हो जाता है। इसीलिए इसको काटना या नष्ट करना निषेद्ध माना गया है। ऐसे पेड़ की किसी दूसरे वृक्ष से तुलना कर इसे हेय करार देना नादानी ही मानी जानी चाहिए ! अब यह दूसरी बात है कि महान संत, समाज सुधारक को बुराई की तुलना के लिए यही पादप मिला ! 

शनिवार, 29 अगस्त 2020

इकलौता मंदिर, जहां गणेश जी की नरमुख रूप में पूजा होती है

कुछ दिनों पहले एक ऐसे स्थान का विवरण मिला था जहां गणेश जी के गजमुख लगने से पहले वाले मस्तक की पूजा होती है। जो उत्तराखंड में पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट से 14 किलोमीटर दूर भुवनेश्वर नामक गांव की एक गुफा में प्रतिष्ठित है। इस गुफा को पाताल भुवनेश्वर के नाम से जाना जाता है।मान्‍यता है कि इस गुफा में गणेश जी का असली सिर भगवान शिव द्वारा स्थापित किया गया था ! आज उसी कड़ी में एक ऐसे इकलौते मंदिर का ब्यौरा जहां गौरी पुत्र की पूजा मानव मुख के साथ होती है ! आस्था में तर्क का कोई भी स्थान नहीं होता................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

आस्था में तर्क के लिये कोई स्थान नहीं होता। वर्षाें से, पीढ़ी दर पीढ़ी जो देखा-सुना जाता है, खासकर धर्म के मामले में, उसी पर हमारी आस्था हो जाती है। समय के साथ-साथ यह इतनी गहरी और दृढ हो जाती है कि हमें यदि उसके इतर भी कुछ मिलता है तो हम उसे भी संभव मान इसी में समाहित कर लेते हैं ! जैसे कि वर्षों-वर्ष से यही पढ़ते, सुनते, देखते, विश्वास करते आएं हैं कि गौरी पुत्र गणेश जी गजानन हैं, और यह गजमुख उन्हें बाल्यकाल में ही उनके साथ घटी एक घटना के फलस्वरूप मिला था। उनकी सदा इसी रूप में पूजा भी होती आई है। पर अभी एक अनोखी, विस्मयकारी एवं अनूठी जानकारी ''भास्कर'' से मिली कि सुदूर दक्षिण के तमिलनाडु राज्य में एक अनूठा, इकलौता गणेश जी का  एक ऐसा मंदिर भी है, जहां उनकी मानव मुखी प्रतिमा की पूजा-अर्चना होती है। यह जानकारी चौंका जरूर देती है पर किसी  तरह का अविश्वास नहीं करती ! यही आस्था है जिसमें तर्क की कोई भी गुंजाइश नहीं ! गणेशोत्सव के पावन दिनों के अवसर पर  आज उसी को साझा कर रहा हूँ। 

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नरमुखी गणेश 

कुछ दिनों पहले एक ऐसे स्थान का विवरण मिला था, जहां गणेश जी के गजमुख के पहले वाले वास्तविक मस्तक की पूजा होती है। जो उत्तराखंड में पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट से 14 किलोमीटर दूर भुवनेश्वर नामक गांव की एक गुफा में प्रतिष्ठित है। इस गुफा को पाताल भुवनेश्वर के नाम से जाना जाता है। मान्‍यता है कि इस गुफा में गणेश जी का असली सिर भगवान शिव द्वारा स्थापित किया गया था ! आज उसी कड़ी में एक ऐसे मंदिर का ब्यौरा जहां गौरी पुत्र की नर रूप में स्थापित प्रतिमा की पूजा-अर्चना की जाती है। 

पाताल भुवनेश्वर 

पाताल भुवनेश्वर, पूजा स्थल 
देश के सुदूर दक्षिणी इलाके का राज्य तमिलनाडु। इसके तिरुवरुर जिले के कुटनूर नगर से करीब तीन किमी की दुरी पर स्थित है, तिलतर्पण पुरी । यहीं 7वीं सदी में निर्मित एक ऐसा प्राचीन आदि विनायक मंदिर है जिसमें गणेश जी की नरमुख रूप यानी इंसान स्वरुप में माँ पार्वती जी के साथ पूजा होती है। मान्यता है कि माता पार्वती ने अपने उबटन की मैल से जिस बालक की रचना की थी, यह प्रतिमा उसी का पहला रूप है ! ऐसा माना जाता है कि विश्व भर में यह इकलौता मंदिर है जहां विघ्नहर्ता नरमुख रूप में विराजमान हैं।  


पितृपक्ष में यहां लोग अपने पूर्वजों का तिल से तर्पण  करते हैं। ये प्रथा अनादिकाल से चली आ रही है। प्रभु राम ने भी अपने पिता दशरथ का तर्पण यहां किया था। यहां ऐसी कथा प्रचलित है कि जब श्री राम अपने पिता दशरथ का अंतिम संस्कार कर रहे थे तब उनके द्वारा चढ़ाए जा रहे चार पिंड बार-बार खंडित हो बिखरे जा रहे थे और उनमें कीड़े लग रहे थे ! तब श्री राम ने भगवान शिव से प्रार्थना की और उनके कहेनुसार आदि विनायक मंदिर पर आकर अपने पिता की आत्मा की शांति के लिए भोलेनाथ की पूजा की। तत्पश्चात चावल के वो चार पिंड चार शिवलिंग में बदल गए, जो आज भी आदि विनायक मंदिर के पास मुक्तेश्वर मंदिर में मौजूद हैं। 

आमतौर पर पितृ शांति की पूजा किसी नदी के तट पर की जाती है, लेकिन यहां मंदिर के अंदर ही यह अनुष्ठान होता है। पितृ-पूजा के लिए इसे काशी, रामेश्वरम तथा गया जी के बराबर माना जाता है। हजारों लोग अपने पूर्वजों की मोक्ष की कामना ले कर यहां आते रहते हैं। 

@सभी चित्र अंतर्जाल से -

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