pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शनिवार, 5 सितंबर 2020

बहुत हो गया परिवार

आज हर ऐसे चैनल पर जिसकी  नकेल विदेशी  हाथों में है,  ऐसे ही ऊल - जलूल,  तर्कहीन, अतिरेक  से भरपूर, बिना किसी तथ्य या शोध के धार्मिक कथानक परोसे जा रहे हैं ! इधर एक नया चलन O.T.T. का शुरू हो गया है,  जिस पर किसी का  भी नियंत्रण नहीं है और  कुछ  भी दिखाने की आजादी है !  जिसके फलस्वरूप  मौकापरस्त  अपने लाभ  के लिए  कुछ  भी बना  कर यहां रिलीज  कर छोटे - छोटे बच्चों के अपरिपक्व दिलोदिमाग में जहर भरने से बाज नहीं आ रहे.............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

आजकल टीवी पर  Disney+hotstar  का एक विज्ञापन आ रहा है।  जिसमें पता नहीं कैसी-कैसी  कल्पना कर युवाओं को अपने परिवार से विमुख होने को उकसाया जा रहा है ! विज्ञापन के  अनुसार अगर आप परिवार में रह कर क्रिकेट का मैच देखेंगे तो घर के सदस्यों की भदेस हरकतों और गतिविधियों (अतिरेक) की वजह से बेहाल हो जाएंगे ! यदि अकेले देखेंगे तो सुकून से सब कुछ देख पाएंगे ! विज्ञापन दाताओं ने  बड़ी चालाकी और कुटिलता से क्रिकेट के खेल की लोकप्रियता को  भुनाते हुए उसके कंधे  पर रख दो निशानों पर गोली चलाई है !  पहला अभीष्ट तो अपने सीरियल वगैरह के लिए भीड़ जुटाना है ! दूसरा परिवार का विघटन करना !  जिससे काम  से लौटे इंसान को मनोरंजन के लिए उन्हीं पर निर्भर रहना पड़े बजाए, परिवार के ''झमेलों'' के ! 

आज जब पहले ही पारिवारिक मूल्य तार-तार हो रहे हों ! देश में परिवारों का विघटन हो रहा हो ! एकल परिवारों का ''फैशन'' जोर पकड़ रहा हो ! रिश्ते-नाते सब ताक पर धरे जा रहे हों ! बच्चों को बुआ-फूफा, मौसा-मौसी, काका-ताऊ जैसे शब्द अजूबा लगने लगे हों ! छोटे-छोटे शहरों में वृद्धाश्रमो की बाढ़ सी आ गई हो ! शादी-ब्याह जैसी रस्मों को भूल युवा, यूज एंड थ्रो जैसी सुगम पर अनैतिक लीव इन रिलेशन जैसा चलन अपना रहे हों ! तब इस तरह के विज्ञापन तो उत्प्रेरक का ही काम करेंगें ! सबसे नागवार बात तो यह है कि विदेशी आका और उसकी स्थानीय कठपुतलियों ने पता नहीं किस घर की तस्वीर पेश की है ! क्या भारत के मध्यम वर्ग के घर ऐसे होते हैं ! 

आज बाहरी शक्तियां अपने स्वार्थ के लिए जी तोड़ कोशिश कर रही हैं, देश में अस्थिरता लाने की ! यह विज्ञापन भी उन्हीं के षड्यंत्र का एक हिस्सा लगता है ! पहले इंसान फिर समाज, फिर उसकी आस्था-मान्यता-रीति-रिवाज को तोड़ो, अस्थिरता अपने आप आ जाएगी ! आज हर ऐसे चैनल पर जिसकी नकेल विदेशी हाथों में है, ऐसे ही ऊल-जलूल, तर्कहीन, अतिरेक से भरपूर, बिना किसी तथ्य या शोध के धार्मिक कथानक परोसे जा रहे हैं ! इधर एक नया चलन OTT का शुरू हो गया है, जिस पर किसी का भी नियंत्रण नहीं है और कुछ भी दिखाने की आजादी है ! जिसके फलस्वरूप मौकापरस्त अपने लाभ के लिए कुछ भी बना कर यहां रिलीज कर छोटे-छोटे बच्चों के अपरिपक्व दिलोदिमाग में जहर भरने से बाज नहीं आ रहे !

आशा तो यही है कि #सरकार, #सूचना_तथा_संचार_मंत्रालय इस तरफ ध्यान देंगें और इस तरह के, अवाम, समाज, देशहित विरोधी चलन पर सख्ती से रोक लगाएंगे। 

गुरुवार, 3 सितंबर 2020

राम मंदिर और सोमपुरा परिवार

अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण से जुडा सोमपुरा परिवार एक ऐसा अनोखा परिवार है, जो पिछली सोलह पीढ़ियों से मंदिर निर्माण कार्य में जुटा हुआ है। नागर शैली में मंदिरों की रचना में  इस परिवार को महारथ  हासिल है। इसी शैली में अयोध्या में राममंदिर का निर्माण भी होना है। सोमपुरा परिवार का मानना है कि उनके पुरखों ने मंदिरों की रचना और उनकी बनावट की कला दैव्य वास्तुकार विश्वकर्मा से सीखी थी । उनके दादा प्रभाशंकर जी ने जगत-प्रसिद्ध गुजरात के सोमनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था.......................!

#हिन्दी_ब्लागिंग  

राम मंदिर ! सदियों से करोड़ों-करोड़ लोगों की आँखों में पलता एक सपना ! जिसे पूरा होता देखने की चाह में अनगिनत पीढ़ियां दिवंगत हो गईं। जिसको साकार करने की चाह में हजारों लोगों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए ! जिसकी राह में अपनों ने ही रोड़े अटकाए ! तुच्छ राजनीती के तहत श्री राम के अस्तित्व पर ही सवाल उठाए गए ! बेबुनियाद तर्कों का माया जाल रचा गया ! कुछ अवसरवादियों ने अपने मतलब के लिए इसे राजनीतिक, सामाजिक व धार्मिक विवाद बना दिया ! अमन-शान्ति के नाम पर रुकावटें खड़ी की गईं ! पर आखिरकार अनगिनत पीढ़ियों का संघर्ष, प्रभु के भक्तों का बलिदान और करोड़ों लोगों की आस्था रंग लाई और सारी बाधाओं को पार कर अब वह सपना साकार होने की ओर अग्रसर हो गया है। 

अब ऐसे महान, चिरप्रतीक्षित, देश की बहुसंख्यक आबादी के साथ-साथ देश-विदेश के करोड़ों लोगों की आस्था के प्रतीक को साकार करने हेतु कुछ ऐसा रूप देना, जो संसार में अप्रतिम, अनूठा, नायाब और अपने आप में मिसाल हो, कोई आसान काम नहीं था ! वह भी तब, जबकि सारे संसार की नजर इस घटनाक्रम पर टिकी हुई थीं ! कमोबेस सभी देशों को इस फैसले का उत्सुकतापूर्वक इन्तजार था ! इसकी भव्यता, विशालता और सुंदरता के लिए कौतूहल था ! सभी बड़ी आतुरता के साथ इसका निर्माण होते देखना चाहते थे ! इसे सभी की अपेक्षाओं पर खरा उतरना था। एक उदाहरण स्थापित करना था ! एक ऐसा निर्माण जिसे देश की पहचान बनना था ! बहुत कठिन परीक्षा की घडी थी। ऐसे में खोज जा कर ख़त्म हुई, महान शिल्पकार चंद्रकांत सोमपुरा के पास !                         
चंद्रकांत सोमपुरा
                        
गुजरात राज्य के भावनगर जिले के पालिताणा नगर में रहने वाला सोमपुरा परिवार एक ऐसा अनोखा परिवार है, जो पिछली सोलह पीढ़ियों से मंदिर निर्माण कार्य में जुटा हुआ है। नागर शैली में मंदिरों की रचना में  इस परिवार को महारथ हासिल है। इसी शैली में अयोध्या में राममंदिर का निर्माण भी होना है। सोमपुरा परिवार का मानना है कि उनके पुरखों ने मंदिरों की रचना और उनकी बनावट की कला दैव्य वास्तुकार विश्वकर्मा से सीखी है। गुजरात के इस परिवार के द्वारा अब तक 200 से भी ज्यादा मंदिरों के डिजाइन तैयार किए जा चुके हैं। उनके दादा प्रभाशंकर जी ने जगत-प्रसिद्ध गुजरात के सोमनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था। देश-विदेश में बिरला परिवार के लिए कई मंदिर इस परिवार ने बनवाए हैं। अक्षरधाम और अंबाजी जैसे कई आस्था स्थल सोमपुरा परिवार के डिजाइन पर ही बने हैं। मथुरा के मंदिर के निर्माण में भी इनका योगदान रहा है। 

बड़ी अनोखी बात है कि भव्य राम मंदिर का मॉडल तैयार करने वाले श्री चंद्रकांत सोमपुरा के पास वास्तुकला की कोई औपचारिक डिग्री नहीं है ! इन्होंने जो भी सीखा, अपने पिता से ही सीखा है। इसके बावजूद इनके हुनर के बल पर इन्हें देश-दुनिया से बड़े-बड़े मंदिरों का मॉडल बनाने के लिए बुलाया जाता रहा है।  खुद सोमपुरा अपने-आप को मंदिर का वास्तुविद कहलाना पसंद करते हैं। इन्होने ना सिर्फ अपने देश बल्कि दुनिया में भी नागर शैली के मंदिरों का नक्शा तैयार किया है। लंदन के सुप्रसिद्ध अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण मंदिर, जो अपने स्थापत्व और भव्यता के लिए दुनिया में सर्वोपरि माना जाता है, उसका नक्शा भी इन्होंने ही बनाया था।  

अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण मंदिर, लंदन 
अपने परिवार के मुखिया श्री चंद्रकांत सोमपुरा बताते हैं कि घनश्यामदास बिरला जी ने उन्हें विश्व हिंदू परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष अशोक सिंघल जी से मिलवाया था। जिनके आग्रह पर 1987 में उन्होंने राम मंदिर की रूप-रेखा तैयार की थी और उनके साथ मिल कर मंदिर पर काम शुरू किया था। इसमें लगने वाले पत्थरों के लिए बंसी पहाड़पुर के बलुआ-पत्थरों का चुनाव किया गया था, जिनकी उम्र 1500 साल मानी जाती है। बंसी पहाड़पुर, राजस्थान के भरतपुर जिले की एक तहसील रूपबास के रुदावल क्षेत्र का छोटा सा गांव है। जो अपने गुलाबी पत्थरों के लिए विश्वप्रसिद्ध है। इस पत्थर की उम्र हजारों साल की मानी जाती है। इसके अलावा इसकी खासियत है कि ना तो यह चटकता है, नाहीं इसमें सीलन आती है और तो और जैसे-जैसे इस पर पानी पड़ता है, वैसे-वैसे इसकी चमक और भी बढती जाती है। इसीलिए इसका चुनाव इस ऐतिहासिक मंदिर के निर्माण हेतु किया गया। हालांकि मंदिर के मुख्य द्वार पर जगत्प्रसिद्ध मकराना का सफ़ेद संगमरमर लगाया जाएगा।  


अब 77 साल के हो चुके चंद्रकांत सोमपुरा ने अपनी उम्र और कोरोना संकट के चलते अपने बेटे आशीष को यह भार सौंपा है। जो अनुबंध प्राप्त कंपनी लार्सन एंड टर्बो के साथ मिलकर अयोध्या में राम मंदिर पर काम कर रहे हैं। इस महान और ऐतिहासिक कार्य में उनके छोटे भाई निखिल उनके सहायक हैं। आशीष को यह कला अपने पिता और दादा से मिली है। पूरा परिवार ही बहुत रोमांचित और उत्साहित है। उनका मानना है कि आदिकाल से ही उनके परिवार पर सदा ईश-कृपा बनी रही है। यह प्रभु का आशीर्वाद ही है कि श्री राम मंदिर के साथ ही उनका नाम भी जुड़ गया है। अब राम मंदिर के निर्माण के साथ ही उनके जीवन में एक और नए अध्याय की शुरुआत होगी।

@अंतर्जाल का आभार 

मंगलवार, 1 सितंबर 2020

बोया पेड़ बबूल का तो.....!!

क्या बबूल का पेड़ लगाने वाला इतना मूर्ख था और उसे पौधे की ज़रा सी भी पहचान और इस बात का एहसास नहीं था कि वह क्या रोपने जा रहा है ! हो सकता है, उसने सोच-समझ. देख-भाल कर, इस पेड़ को ही चुन कर लगाया हो ! उसे भलीभांति इस बात का ज्ञान हो कि यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण वृक्ष है, जिसका प्रत्येक भाग पत्तियों से लेकर फल-फूल-छाल-गोंद व जड़ तक औषधिय गुणों से भरपूर हैं और इससे अनेक आयुर्वेदिक दवाइयां बनाई जा सकती हैं। हो सकता है कि वह कोई वैद्य ही हो.....!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

एक बहुत पुरानी कहावत है, बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां ते होय ! भले ही इसकी अन्तर्निहित सीख यही है कि बुरे काम का अच्छा नतीजा नहीं मिल सकता। पर दूसरी तरफ इस मुहावरे को सुन कुछ ऐसा नहीं लगता कि जैसे बबूल का पेड़ लगाने वाले ने कोई बहुत बड़ी गलती कर दी हो और आम जैसे महत्वपूर्ण, फलदार वृक्ष की जगह इस बेकार, कंटीले व अनुपयोगी से पेड़ को लगा दिया हो ! चलो, यदि लगा भी दिया, तो फिर वह इससे आम की उम्मीद क्यों करेगा ! फिर सवाल यह भी उठता है कि ऐसा कह कौन रहा है, और किससे कह रहा है, और वह कौन है जो चुपचाप सुने जा रहा है ! कहता क्यों नहीं कि बबूल अपनी जगह आम के पेड़ से किसी भी तरह कमतर नहीं है ! 

सोचने की बात है, क्या बबूल का पेड़ लगाने वाला इतना मूर्ख था और उसे पौधे की ज़रा सी भी पहचान और इस बात का एहसास नहीं था कि वह क्या रोपने जा रहा है ! हो सकता है, उसने सोच-समझ. देख-भाल कर, चुन कर ही इस पेड़ को ही  लगाया हो ! उसे भलीभांति इस बात का ज्ञान हो कि यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण वृक्ष है, जिसका प्रत्येक भाग, पत्तियों से लेकर फल-फूल-छाल-गोंद व जड़ तक औषधिय गुणों से भरपूर हैं और इससे अनेक आयुर्वेदिक दवाइयां बनाई जा सकती हैं। हो सकता है कि वह कोई वैद्य ही रहा हो ! जिसने इंसान, समाज और पशुओं तक की भलाई को ध्यान में रख अपनी दूरदर्शिता का उपयोग करते हुए इस बहूपयोगी वृक्ष का रोपण किया हो ! अगर ऐसा है तो वह इस वृक्ष से आम की उम्मीद क्यों करेगा ! 

 
यदि मान लें  कि पौधा लगाने  वाला  कोई भोला बंदा था. जिसे  वनस्पतियों के  बारे में कोई जानकारी नहीं थी,  इसी  लिए वह अपने बबूल के पेड़ से  आम के फल की आस लगाए बैठा रहा  तो  उसे आम का  बतला कर बबूल का पौधा  किसने थमाया !  फिर वर्षों उसे  जलील  कर नसीहतें देता रहा !  इस पर  भी यदि  वह भोला बंदा अपने बबूल के पेड़ से आम की उम्मीद लगाए बैठा रहा,  तो उसके आस - पास के  किसी  भलेमानुष  ने  उसे  सच्चाई क्यों  नहीं बताई !  क्यों उसे  प्रताड़ित  करवा, उदाहरण बना  दूसरों को ज्ञान बांटना शुरू कर दिया गया ! 

                                      
वैसे तो दोनों की पेड़ों की तुलना करना ही उचित नहीं है। दोनों वृक्षों की अपनी-अपनी खूबियां हैं, अपनी-अपनी विशेषताएं हैं ! बबूल में जो औषधीय गुण हैं वे आम में नहीं हैं और जो स्वाद, मिठास व दूसरी खूबियां आम में हैं वे बबूल में नहीं हैं। कायनात ने बनाया ही इस तरह है कि जो बात आम में है वह बबूल में नहीं हो सकती और जो खासियतें बबूल में हैं उन्हें किसी दूसरे वृक्ष में खोजना तो नासमझी ही होगी ! मरू-भूमि में उगने वाले काँटेदार बबूल की अहमियत जाननी हो तो वहाँ के स्थानीय निवासियों से इसके बारे में पूछ कर देखें, जिनके लिए यह प्रकृति की बेहतरीन सौगात है।फिर आम और बबूल ही क्यों, संसार की किसी भी वनस्पति की एक दूसरे से तुलना करना या किसी को कम आंकना, किसी भी दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता। सब अपनी-अपनी विशेषताएं, गुण तथा उपयोगिताएं लिए होते हैं। सबकी अपनी अलग-अलग पहचान होती है ! 

                           
ऐसी मान्यता है कि बबूल के पेड़, जिसे कीकर भी कहा जाता है, पर देवताओं का वास होता है। प्राचीन काल में इसकी पूजा की जाती रही है। इसको अत्यंत शुभ, पावन और वैभवदाई माना जाता है। इसका प्रत्येक भाग किसी न किसी उपयोग में जरूर आता है। इसकी लकड़ी औरों की बनिस्पत काफी मजबूत व क्षयरोधी होती है। चाहे मरुभूमि का फैलाव हो या पानी का कटाव इसके होते इन दोनों से बचाव हो जाता है। इसीलिए इसको काटना या नष्ट करना निषेद्ध माना गया है। ऐसे पेड़ की किसी दूसरे वृक्ष से तुलना कर इसे हेय करार देना नादानी ही मानी जानी चाहिए ! अब यह दूसरी बात है कि महान संत, समाज सुधारक को बुराई की तुलना के लिए यही पादप मिला ! 

शनिवार, 29 अगस्त 2020

इकलौता मंदिर, जहां गणेश जी की नरमुख रूप में पूजा होती है

कुछ दिनों पहले एक ऐसे स्थान का विवरण मिला था जहां गणेश जी के गजमुख लगने से पहले वाले मस्तक की पूजा होती है। जो उत्तराखंड में पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट से 14 किलोमीटर दूर भुवनेश्वर नामक गांव की एक गुफा में प्रतिष्ठित है। इस गुफा को पाताल भुवनेश्वर के नाम से जाना जाता है।मान्‍यता है कि इस गुफा में गणेश जी का असली सिर भगवान शिव द्वारा स्थापित किया गया था ! आज उसी कड़ी में एक ऐसे इकलौते मंदिर का ब्यौरा जहां गौरी पुत्र की पूजा मानव मुख के साथ होती है ! आस्था में तर्क का कोई भी स्थान नहीं होता................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

आस्था में तर्क के लिये कोई स्थान नहीं होता। वर्षाें से, पीढ़ी दर पीढ़ी जो देखा-सुना जाता है, खासकर धर्म के मामले में, उसी पर हमारी आस्था हो जाती है। समय के साथ-साथ यह इतनी गहरी और दृढ हो जाती है कि हमें यदि उसके इतर भी कुछ मिलता है तो हम उसे भी संभव मान इसी में समाहित कर लेते हैं ! जैसे कि वर्षों-वर्ष से यही पढ़ते, सुनते, देखते, विश्वास करते आएं हैं कि गौरी पुत्र गणेश जी गजानन हैं, और यह गजमुख उन्हें बाल्यकाल में ही उनके साथ घटी एक घटना के फलस्वरूप मिला था। उनकी सदा इसी रूप में पूजा भी होती आई है। पर अभी एक अनोखी, विस्मयकारी एवं अनूठी जानकारी ''भास्कर'' से मिली कि सुदूर दक्षिण के तमिलनाडु राज्य में एक अनूठा, इकलौता गणेश जी का  एक ऐसा मंदिर भी है, जहां उनकी मानव मुखी प्रतिमा की पूजा-अर्चना होती है। यह जानकारी चौंका जरूर देती है पर किसी  तरह का अविश्वास नहीं करती ! यही आस्था है जिसमें तर्क की कोई भी गुंजाइश नहीं ! गणेशोत्सव के पावन दिनों के अवसर पर  आज उसी को साझा कर रहा हूँ। 

nar
नरमुखी गणेश 

कुछ दिनों पहले एक ऐसे स्थान का विवरण मिला था, जहां गणेश जी के गजमुख के पहले वाले वास्तविक मस्तक की पूजा होती है। जो उत्तराखंड में पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट से 14 किलोमीटर दूर भुवनेश्वर नामक गांव की एक गुफा में प्रतिष्ठित है। इस गुफा को पाताल भुवनेश्वर के नाम से जाना जाता है। मान्‍यता है कि इस गुफा में गणेश जी का असली सिर भगवान शिव द्वारा स्थापित किया गया था ! आज उसी कड़ी में एक ऐसे मंदिर का ब्यौरा जहां गौरी पुत्र की नर रूप में स्थापित प्रतिमा की पूजा-अर्चना की जाती है। 

पाताल भुवनेश्वर 

पाताल भुवनेश्वर, पूजा स्थल 
देश के सुदूर दक्षिणी इलाके का राज्य तमिलनाडु। इसके तिरुवरुर जिले के कुटनूर नगर से करीब तीन किमी की दुरी पर स्थित है, तिलतर्पण पुरी । यहीं 7वीं सदी में निर्मित एक ऐसा प्राचीन आदि विनायक मंदिर है जिसमें गणेश जी की नरमुख रूप यानी इंसान स्वरुप में माँ पार्वती जी के साथ पूजा होती है। मान्यता है कि माता पार्वती ने अपने उबटन की मैल से जिस बालक की रचना की थी, यह प्रतिमा उसी का पहला रूप है ! ऐसा माना जाता है कि विश्व भर में यह इकलौता मंदिर है जहां विघ्नहर्ता नरमुख रूप में विराजमान हैं।  


पितृपक्ष में यहां लोग अपने पूर्वजों का तिल से तर्पण  करते हैं। ये प्रथा अनादिकाल से चली आ रही है। प्रभु राम ने भी अपने पिता दशरथ का तर्पण यहां किया था। यहां ऐसी कथा प्रचलित है कि जब श्री राम अपने पिता दशरथ का अंतिम संस्कार कर रहे थे तब उनके द्वारा चढ़ाए जा रहे चार पिंड बार-बार खंडित हो बिखरे जा रहे थे और उनमें कीड़े लग रहे थे ! तब श्री राम ने भगवान शिव से प्रार्थना की और उनके कहेनुसार आदि विनायक मंदिर पर आकर अपने पिता की आत्मा की शांति के लिए भोलेनाथ की पूजा की। तत्पश्चात चावल के वो चार पिंड चार शिवलिंग में बदल गए, जो आज भी आदि विनायक मंदिर के पास मुक्तेश्वर मंदिर में मौजूद हैं। 

आमतौर पर पितृ शांति की पूजा किसी नदी के तट पर की जाती है, लेकिन यहां मंदिर के अंदर ही यह अनुष्ठान होता है। पितृ-पूजा के लिए इसे काशी, रामेश्वरम तथा गया जी के बराबर माना जाता है। हजारों लोग अपने पूर्वजों की मोक्ष की कामना ले कर यहां आते रहते हैं। 

@सभी चित्र अंतर्जाल से -

मंगलवार, 25 अगस्त 2020

ढाक ने अपनी रीत बताई, तीन पात ही रहेंगें भाई !

चौथा स्थान फिलहाल खाली है, शायद उसके लिए तैयारी चल रही है। अब पांचवें पायदान पर तकरीबन पचास लोग, गिरने से अपने को बचाने, अपने अस्तित्व को संभालने, अपनी पहचान बनाए रखने के लिए जोर आजमाइश में जुटे हुए हैं। यह जानते हुए भी कि तीन के बाद सब तृण हो जाते हैं ! दुनिया को तीन तक ही कुछ याद रह पाता है, स्वर्ण-रजत-कांस्य ! उसके बाद तू कौन, तो मैं कौन..............!


#हिन्दी_ब्लागिंग 

कोरोना काल में दूरदर्शन के रेट्रो चैनल पर आ रहे पुराने दिलचस्प  की तरह कल कांग्रेस की भी एक नाटिका का पुनर्मंचन हुआ ! जाने-माने कथानक का अंत वैसे तो सबको मालुम ही था, पर कुछ कलाकारों की नई गतिविधियों से कुछ अलग होने का क्षीण सा अनुमान भी लगाया जा रहा था पर ढाक ने अपनी रीत बताई, तीन पात ही रहेंगें भाई ! पद छोड़ने का खतरा तो कभी भी नहीं लिया जा सकता ! खासकर आज के परिवेश में ! क्योंकि क्या ठिकाना कि कल जिस स्वामिभक्त को कुर्सी सौंपी, वही स्वामी ना बन जाए ! अब बार-बार देवकांत बरुआ या मनमोहन सिंह जैसे लोग तो मिलने से रहे ! फिर इसका भी क्या पता कि शिखर से पद छोड़ने का संदेश सिर्फ स्वामिभक्ति के परीक्षार्थ ही जारी किया जाता हो ! पिछले दिनों का पत्र काण्ड इसका ठोस उदाहरण है ! जिसे पार्टी में दिग्गज समझे जाने वाले 23 नेताओं ने अपने को तुर्रम खां समझ, कांग्रेस में सुधार लाने के लिए सोनिया जी को कुछ लिख डाला। राहुल की एक घुड़की ने सभी की हवा निकाल दी ! पतझड़ में वृक्ष से चिपके इन पीले पत्तों की अब घिघ्घी बंधीं हुई है !      

अब वे दिन तो लद गए जब इस पार्टी में एक से बढ़ कर एक नेता हुआ करते थे ! जिन्हें सारा देश जानता-मानता था। अब तो सब कुछ सिमट कर तीन जनों पर आ सिमटा है। सोनिया जी, राहुल तथा प्रियंका ! दल के प्रथम तीन स्थानों पर इन्हीं का बर्चस्व है और होना भी चाहिए, पार्टी के यही तीन सदस्य ऐसे हैं जिनकी देश भर में पहचान है। कहीं भी जाएं देश के हर हिस्से में इनका संगठन अभी भी मौजूद है। कमोबेस इनके समर्थक सभी जगह मिल ही जाएंगें। फिलहाल चौथा स्थान अभी खाली है ! ऐसी हवा है कि शायद उसके लिए तैयारी चल रही है। अब पांचवें पायदान पर तकरीबन पचास लोग, गिरने से अपने को बचाने, अपने अस्तित्व को संभालने, अपनी पहचान बनाए रखने के लिए एक दूसरे को धकियाते-लतियाते जोर आजमाइश में जुटे हुए हैं। यह जानते हुए भी कि तीन के बाद सब तृण हो जाते हैं ! दुनिया को तीन तक ही कुछ याद रह पाता है, स्वर्ण-रजत-कांस्य ! उसके बाद तू कौन तो मैं कौन !

सच्चाई तो यह है कि जनता भले ही किसी बात से परेशान हो, उसे लगता है कि उस मुसीबत से मोदी ही उबार सकता है और कोई नहीं ! संकट आया है तो मोदी ही कोशिश कर रहा है उससे उबारने की ! क्योंकि अवाम भी आज देख रहा है कि जो काम वर्षों-वर्ष टाले जाते रहे, जिनको पिछली सरकारें विषम, असंभव, नामुमकिन बताती रहीं वे कैसे एक झटके में पूरे हो गए। बड़े-बड़े राष्ट्र जो आए दिन आंखें दिखाने से बाज नहीं आते थे, आज आगे बढ़ कर हाथ मिलाने की कोशिश कर रहे हैं !

वैसे भी अभी जो तीन या तेरह में हैं, उनकी पहचान तभी तक है जब तक सर पर टोपी और पीठ पर हाथ है ! उसके बिना उनके शहर में भी शायद ही कोई उन्हें पहचाने। अधिकतर को पता है कि वे किसी भी चुनाव में कभी भी जीत ही नहीं सकते सिर्फ पार्टी की बदौलत ही उनकी पहचान है। ऐसे जनाधार हीन लोगों का एक ही लक्ष्य सदा रहा है कि गांधी परिवार का कोई सदस्य सर्वोच्च पद पर आसीन रहे। इसीलिए जब भी मीटिंग-मीटिंग का खेल होता है, हर सदस्य के संवाद पहले से तय होते हैं। किसको क्या और कब बोलना है, सब पूर्वनिर्धारित रहता है, और अंत सुखान्त ! इसके अलावा यहां हर कोई अपना अहम्, अपनी अहमियत, अपना गरूर का भार सदा अपने कंधों पर टांगे रहता है जिसका बोझ इनआत्मश्लाघियों को किसी और की हथेली-तले काम करना तो दूर वैसी सोच को भी निकट नहीं फटकने देता ! 

नियति ने राहुल को राजनीती में ला फंसाया है। उनकी मजबूरी है कि लाख चाहते हुए भी वह यहां से अब निकल नहीं सकते ! वे चाहेंगे तो भी लोग अपने स्वार्थवश उन्हें निकलने नहीं देंगे ! इसलिए अब वहां टिके रहने के लिए यह निहायत जरुरी है कि वे अपनी व्यक्तिगत मोदी विरोधी सोच बदलें ! परिपक्व हों ! चाटुकार, चापलूस, छुटभइए घाघ लोगों से छुटकारा पा पढ़े-लिखे, समझदार साथ ही अनुभवी लोगों को अपना सलाहकार बनाएं, जो देश-समाज-लोगों के हित में सोचें और उसी दिशा में काम करें ! मोदी जी के कपड़ों, उनकी चाल-ढाल या उनके दैनन्दिनी कार्यों पर उलटी-सीधी टिपण्णी कर या उनका मखौल बना, अपने आप को पार्टी और नेतृत्व का हितैषी सिद्ध करने वाले मतलबपरस्तों से बचें और उनको दूर ही रखें ! इसी में भलाई होगी। भले ही उनकी ऐसी हरकतें फौरी तौर पर ''दरबार'' में खूब वाह-वाही बटोर रही हों पर यह निहायत जरुरी है कि वक्त रहते इस धीमे विष से छुटकारा पा लिया जाए !  

जैसे बिना अंकुश के हाथी और बिन ड्राइवर के गाडी का जो हाल होता है वही बिना विपक्ष की किसी भी सरकार का हो जाता है। इसीलिए लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष का होना बहुत जरुरी होता है ! पर आज देश में विपक्ष सिर्फ खानापूर्ति के लिए ही रह गया है ! वो चाहे जितना भी दम भर ले ! कितना भी हाथ-पैर पटक ले ! कितना भी चीख-चिल्ला ले ! कैसा भी जोड़-तोड़ लगा ले ! उसे एक बात समझनी और माननी ही पड़ेगी कि दूर-दूर तक कोई ऐसा नेता नजर नहीं आता जो मोदीजी को हराना तो दूर उनके सामने कोई छोटी-मोटी चुन्नौती ही खड़ी कर सके। खामियां तो आज कोई भी राह चलता निकाल देता है पर उसका पर्याय तो बताए ! हर बात में खामियां खोजने वाले उसका हल तो बताएं ! सच्चाई तो यह है कि जनता भले ही किसी बात से परेशान हो, उसे लगता है कि उस मुसीबत से मोदी ही उबार सकता है और कोई नहीं ! संकट आया है तो मोदी ही कोशिश कर रहा है उससे उबारने की ! क्योंकि अवाम भी आज देख रहा है कि जो काम वर्षों-वर्ष टाले जाते रहे, जिनको पिछली सरकारें विषम, असंभव, नामुमकिन बताती रहीं वे कैसे एक झटके में पूरे हो गए। बड़े-बड़े राष्ट्र जो आए दिन आंखें दिखाने से बाज नहीं आते थे, आज आगे बढ़ कर हाथ मिलाने की कोशिश कर रहे हैं ! दुनिया में एक नई पहचान बन रही है। ऐसे में हारे-थके-लुटे-पिटे हाशिए पर सिमटा दिए गए दलों और उनके लगभग गुमनाम होते आकाओं की नजर, बार-बार राहुल पर ही जा टिकती है, बलि का बकरा बनाने के लिए ! लगता तो यही है कि फिर इस बंदे को दूसरों की लड़ाई में ना चाहते हुए भी भाग लेना और अपना कुछ ना कुछ होम करना पडेगा ! 

गुरुवार, 20 अगस्त 2020

हमीं ने दर्द दिया, हमें ही दवा देनी है

कुछ वर्षों पहले तक बाजार में हर तरह का सामान तक़रीबन खुला मिलता था। चाहे घर के किराने का सामान हो, चाहे सब्जियां-फल वगैरह हों, बेकरी की चीजें हों या अन्य घरेलू जरुरत का सामान ! दूध और पानी की पैकिंग तो शायद ही कोई सोचता हो। आज साफ़-सफाई या शुद्धता का हवाला दे कर हर चीज को प्लास्टिक में लपेटा जाने लगा है। पहले लोग सामान वगैरह लाने के लिए थैला वगैरह ले कर ही घर से चलते थे ! उधर दुकानदार सामान देने के लिए कागज़ के ठोंगों या लिफाफों को काम में लाते थे। पर पॉलीथिन के चलन में आते ही वे सब बीते दिनों की बात हो गए। अब छोटी से लेकर बड़ी से बड़ी चीज यहां तक कि झाड़ू-झाड़न जैसी  चीजें भी रैपर में लिपटी मिलने लगी हैं। बाजार ने हमें अच्छी तरह समझा दिया है कि सस्ती खुली मिलने वाली वस्तुएं हमारे और हमारे परिवार के लिए कितनी हानिकारक हैं ! अब साफ़-सफाई या शुद्धता का तो पता नहीं पर इस चलन से पलास्टिक या पॉलीथिन का कचरा बेलगाम-बेहिसाब बढ़ना ही था सो बढ़ता चला जा रहा है...................! 


#हिन्दी_ब्लागिंग 

कुछ साल पहले तक हमारे कृषि प्रधान देश को भरपूर उपज, खुशहाली, समृद्धि व जलीय आपूर्ति के लिए जीवन दायिनी पावस ऋतु का बड़ी बेसब्री से इन्तजार रहा करता था। पर अब इसकी जरुरत तो है, इन्तजार भी रहता है, पर साथ ही इसकी भयावहता को देख-सुन-याद कर एक डर, एक खौफ भी बना रहता है। अब हर साल बरसात के साथ आने वाला जलप्लावन हमारी नियति ही बन गया है। पता ही नहीं चला कब यह जीवन दायिनी ऋतू, प्राण हरिणी के रूप में बदल गई ! ऐसा भी नहीं है कि यह सबअचानक हो गया हो ! कायनात वर्षों से हमें चेताती आ रही थी पर हम अपने लालच, अपनी महत्वकांक्षाओं, अपनी लिप्सा में अंधे हो उसका शोषण करने से बाज ही नहीं आ रहे थे। विकास की अंधी दौड़ में ऐसी-ऐसी चीजों का आविष्कार कर डाला गया जो प्रकृति को नुक्सान पहुंचाने में अव्वल थीं। इन्हीं चीजों में एक है प्लास्टिक ! जिससे सारा विश्व त्रस्त हो चुका है। दुनिया भर के सागर-नदी-तालाबों में टनों के हिसाब से इस ना गलने-सड़ने-नष्ट होने वाले दानव का जमावड़ा पृथ्वी के अस्तित्व के लिए भी ख़तरा बनता जा रहा है ! इस विश्वव्यापी संकट से हमारा देश भी अछूता नहीं है ! आज जगह-जगह जलभराव होने का यह एक प्रमुख कारण है। 


आज प्लास्टिक हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा है। हमारे जीवन का शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जहां इसका दखल नहीं है ! इस बेहद लचीले और मजबूत पदार्थ ने हमें सुविधाएं तो बहुत दीं, पर अब अपनी सैंकड़ों खूबियों और उपयोगिताओं के नावजूद यह हमारी जिंदगी, हमारे वातावरण, हमारे पर्यावरण यहां तक की हमारी पृथ्वी के लिए भी विनाशकारी सिद्ध हो रहा है। इसमें भी इसका दोष उतना नहीं है जितनी हमारी इस पर निर्भर होते चले जाने की विवेकहीन, अदूरदर्शी निर्भरता ! सुबह टूथ ब्रश करने से लेकर रात बिस्तर पर सोने तक हम सैकड़ों तरह की प्लास्टिक निर्मित वस्तुओं का, बिना उनका दुष्परिणाम जाने, उपयोग करते रहते हैं। इसीलिए घरों से निकलने वाले कचरे में साल-दर-साल प्लास्टिक की वस्तुओं की मात्रा बढ़ती जा रही है। जागरूकता की कमी के चलते इसके अंधाधुंध इस्तेमाल के बाद फेंक दिये जाने वाले प्लास्टिक के रैपर, बोतलें, पॉलीबैग्स, पैकेट्स, डिब्बे और ना जाने कौन-कौन सी चीजों के कचरे से हमारी धरती, हवा, पानी, सागर, नदियां, तालाब सब कुछ प्रदूषित हो गए हैं। जिससे मानव तो मानव, पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं के जीवन को भी भयानक खतरे का सामना करना पड़ रहा है

**********************************************************************************************************

प्लास्टिक को लेकर बहुत गुल-गपाड़ा मचता रहता है ! पर जब हम सुबह टूथब्रश करने से लेकर रात बिस्तर पर सोने तक सैकड़ों तरह की प्लास्टिक निर्मित वस्तुओं का, बिना उनका दुष्परिणाम जाने, उपयोग करते रहेंगें, बाजार से पॉलीथिन में लिपटी चीजें लेते रहेंगें तो इसकी खपत कम कैसे होगी ! इसीलिए घरों से  निकलने वाले कचरे में दिन-प्रति-दिन प्लास्टिक की वस्तुओं की मात्रा बढ़ती जा रही है

**********************************************************************************************************

कुछ वर्षों पहले तक बाजार में हर तरह का सामान तक़रीबन खुला मिलता था। चाहे घर के किराने का सामान हो, चाहे सब्जियां-फल वगैरह हों, बेकरी की चीजें हों या अन्य घरेलू जरुरत का सामान ! दूध और पानी की पैकिंग तो शायद ही कोई सोचता हो। आज साफ़-सफाई या शुद्धता का हवाला दे कर हर चीज को प्लास्टिक में लपेटा जाने लगा है। पहले लोग सामान वगैरह लाने के लिए थैला वगैरह ले कर ही घर से चलते थे ! उधर दुकानदार सामान देने के लिए कागज़ के ठोंगों या लिफाफों को काम में लाते थे। जो कुछ ही समय में अपने को प्रकृति के समरूप कर लेते थे। पर पॉलीथिन के चलन में आते ही वह सब बीते दिनों की बात हो गए। अब छोटी से लेकर बड़ी से बड़ी रोजमर्रा की चीजों के साथ-साथ अनाज, फल, सब्जियां, बेकरी उत्पाद यहां तक कि झाड़ू-झाड़न जैसी चीजें भी रैपर में लिपटी आने लगी हैं। ड्राइक्लीन करने वाले भी अब कपड़ों को पॉलीथिन के लिफ़ाफ़े में रख देने लगे हैं। बाजार ने हमें अच्छी तरह समझा दिया है कि खुली मिलने वाली वस्तुएं हमारे और हमारे परिवार के लिए कितनी हानिकारक हैं !! बिना पैकिंग की चीज यानी घटिया स्तर की !! अब जब हर चीज को प्लास्टिक या पॉलीथिन में सजा कर पेश किया जाएगा तो उसका उपयोग तो बढ़ेगा ही ! जितना उपयोग बढ़ेगा उतनी मात्रा में उसका कचरा भी बढ़ना तय है। ध्यान इस ओर देने की भी आवश्यकता है ! सिर्फ रेहड़ी-ढेले वालों पर जोर डालने से तो यह संक्रमण रुकने से रहा !! 


आज इस भयानक समस्या की ओर सभी का ध्यान जरूर गया है पर हमारी लापरवाही, गैर जिम्मेदाराना हरकतों, जागरूकता की कमी और सिर्फ अपने परिवेश का ध्यान, इसका हल नहीं निकलने दे रहे ! आज भी, हमारा घर साफ़ रहे, बाहर का हमें क्या, वाली मानसिकता के तहत अधिकांश घरों से रसोई का कचरा पॉलीथिन में भर आसपास किसी खुले स्थान या सड़क किनारे फेंक देना आम बात है। रास्ते चलते खाली हुए नमकीन के पैकेट, पानी की बोतलें या छोटे-मोटे रैपर को इधर-उधर फेंक देना असभ्यता नहीं माना जाता ! किसी पार्क में या सैर-सपाटे के दौरान अल्पाहार का मजा ले उस जगह को साफ़ कर भी दिया तो उस कूड़े को पास की झाडी इत्यादि के हवाले कर अपने फर्ज की इतिश्री मान ली जाती है ! जबकि अधिकांश जगहों पर कूड़ा पेटी लगी रहती है पर उस तक जाना भी कई लोग गवारा नहीं करते ! ऐसे ही कचरे को जानवर इत्यादि पॉलीथिन समेत निगल रोग ग्रस्त हो जाते हैं ! कई तो अकाल मृत्यु को भी प्राप्त हो जाते हैं। यही लावारिस कचरा बरसात के दौरान पानी के साथ गलबहियां डाल नालियों और सीवर में पहुँच जाता है। फिर जो होता है, वह तो होना ही होता है। 

जब मुसीबत गले पड़ती है तब हमें यह ज़रा भी ध्यान नहीं आता कि इसका कारण कमो-बेस हम ही हैं ! हमारी लापरवाही हमारे शहर की साफ-सफाई में बाधा डाल, कर्मचारियों पर बोझ तो बढ़ाती ही है साथ ही पर्यावरण को हानि पहुंचाने में भी उसका योगदान कम नहीं होता। इधर बरसात हुई, उधर नाली-सीवर में कचरा फंसा। पानी का दम घुटा ! वह सांस लेने पलटा और बाहर आ कर हमारे साथ-साथ सारे नगर और नगरवासियों का हवा-पानी-खाना-सोना सब हराम कर दिया ! पर इंसान ठहरा इंसान ! उसको कहां अपनी भूल-गलतियों का एहसास रहता है ! वह तो सर झुकाए लग पड़ता है आन पड़ी विपदा से येन-केन पिंड छुड़ाने, उससे किसी तरह पार पाने की जुगत में ! क्योंकि वह एक तरह से मान चुका है कि ऐसा तो होता ही रहता है !

इधर ऐसा सुनहरा सुअवसर पा विपक्ष पिल पड़ता है सरकार पर ! निगम पर ! कर्मचारियों पर ! आरोप-प्रतिरोप का दौर शुरू ! आम आदमी की परेशानियों को दरकिनार कर बात जा पहुंचती है राजनीति के अखाड़े में ! वहां विपक्ष, यह भूल कि चंद दिनों पहले वह भी सत्ता सुख में लिप्त था, को मौका मिल जाता है दुसरों पर आरोपों की बौछार करने का ! वादों के सपने दिखाने का ! अपने को श्रेष्ठ सिद्ध करने का !  पर मूल समस्या से ज्यादा छेड़-छाड़ नहीं की जाती ! उसे तकरीबन जस का तस रहने दिया जाता है कभी आगे आने वाले समय में सदुपयोग के लिए ! 

इसलिए और किसी पर भरोसा ना कर अवाम को खुद ही समझदार, जागरूक और विवेकशील होने की जरुरत है। हम सब को समझना होगा कि नगर, शहर, परिवेश को साफ रखना हम सभी की जिम्मेदारी है। इधर -उधर, खाली जगहों में, सड़कों पर कचरा फेंकने के बजाय अगर सभी लोग डस्टबीन में कचरा डालने की आदत बना लें तो सफाई कर्मचारियों को भी अपने काम करने में आसानी होगी। हमें भी बेहतर सेवा मिल पाएगी। इसके साथ ही अब यह कोशिश भी होनी चाहिए कि पॉलीथिन के बजाए कपड़े या जूट के थैलों का इस्तेमाल किया जाए। ऐसा नहीं है कि इस समस्या से पार नहीं पाया जा सकता ! बस थोड़ी सी इच्छाशक्ति को मजबूत करने की जरुरत है। एक बार आदत पड़ गई तो फिर शहरों के आस-पास से कुतुबमीनार जितने ऊँचे कचरे के पहाड़ रूपी दानवों से मुक्ति मिलते देर नहीं लगेगी। 

सोमवार, 17 अगस्त 2020

दशरथ जी के संतान योग पर भारी, रावण की अभिसंधि

पर ऐसा क्यूँ हुआ कि अयोध्यापति संतान का मुख देखने को तरस गए ! जबकि विष्णु जी ने उनका पुत्र बनने का वचन दिया था ! तीन-तीन रानियां थीं ! पूरा परिवार यौवनावस्था में था ! पहले एक संतान हो भी चुकी थी ! हर सुख-सुविधा मुहैय्या थी ! उस युग में ज्ञान-विज्ञान अपने चरमोत्कर्ष पर था, जैसाकि उन दिनों की कथा कहानियों से निष्कर्ष निकलता है ! तिस पर उन्हें पुत्र वियोग का श्राप भी मिला हुआ था, जो तभी फलीभूत होता जब उनके संतान होती ! फिर ऐसा कौन सा कारण था जो अयोध्या को उसका उत्तराधिकारी नहीं मिल पा रहा था ...........!

#हिन्दी _ब्लागिंग 

कई बार कुछ ऐसा पढ़ने को मिल जाता है जो सालों-साल से चली आ रही कथा-कहानियों की किसी घटना या विवरण को एक अलग नजरिया प्रदान कर देता है ! अब जैसे रामायण को ही लें इस महाग्रंथ को कई भाषाओं में विभिन्न विद्वानों द्वारा भिन्न-भिन्न रूप में लिखा गया है। रचयिता की जैसी भावना रही, उसने उसी के अनुरूप अपने ग्रंथ में चरित्रों की व्याख्या भी की। कभी-कभी तो ये उप कथाएं अत्यंत रोचक और सटीक भी लगती हैं। अभी रामजी की बहन शांता देवी के बारे में खोज करने पर एक और रोचक विवरण पढ़ने में आया, उसी को साझा कर रहा हूँ।

राम भगिनी देवी शांता 
सभी राम कथाओं में यह वर्णित है कि राजा दशरथ को कोई संतान नहीं थी इसलिए उन्हें पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाना पड़ा था। पर जैसी अन्य कथाओं से जानकारी मिलती है, उससे यह पता चलता है कि उनके कन्या रूपी एक संतान पहले थी, जिसका नाम शांता था। उसे उन्होंने कौशल्याजी की बहन वर्षिणीजी को, जो अंगराज रोमपद को ब्याही गयी थीं तथा कई वर्षों तक निःसंतान रहने के कारण सदा चिंतित, दुःखी व अस्वस्थ रहने लगीं थीं, गोद दे दिया था। उस समय ऐसा करते हुए कोई कारण भी नहीं था जो दशरथ जी को जरा सा भी आभास होने देता कि भविष्य में उनको संतान प्राप्ति के लिए बेहद चिंतित होना पडेगा।

राजा दशरथ 
फिर ऐसा क्यूँ हुआ कि अयोध्यापति संतान का मुख देखने को तरस गए ! जबकि विष्णु जी ने उनका पुत्र बनने का वचन दिया था ! तीन-तीन रानियां थीं ! पूरा परिवार यौवनावस्था में था ! पहले एक संतान हो भी चुकी थी ! हर सुख-सुविधा मुहैय्या थी ! उस पर उस युग में ज्ञान-विज्ञान अपने चरमोत्कर्ष पर था, जैसाकि उन दिनों की कथा कहानियों से निष्कर्ष निकलता है ! तिस पर उन्हें पुत्र वियोग का श्राप भी मिला हुआ था, जो तभी फलीभूत होता जब उनके संतान होती ! फिर ऐसा कौन सा कारण था जो अयोध्या को उसका उत्तराधिकारी नहीं मिल पा रहा था ! इसका जवाब दक्षिण की एक राम कथा देती है।

रावण 
जब रावण ने ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त किया, जिसके अनुसार उसकी मृत्यु का कारण सिर्फ कोई मानव हो सकता था, तो उसने उस मानव के बारे में जानने की ठानी ! वह परम ज्ञानी, त्रिकालदर्शी, ज्योतिष शास्त्री तथा प्रकांड पंडित तो था ही, उसने ज्ञात कर लिया कि उसकी मृत्यु कौशल्या पुत्र के हाथों होगी। इसलिए उसने अपनी मृत्यु को टालने के लिए, जिस दिन सारे लोग दशरथ-कैकेई के ब्याह में व्यस्त थे, मौका पा कर उसने कौशल्या जी का हरण कर उन्हें मंजूषा में बंद कर दूर एक सुनसान द्वीप पर कड़े पहरे के अंतर्गत ले जा कर रख दिया। इस घटना की सूचना नारद जी द्वारा मिलने पर दशरथ जी सेना सहित वहां पहुंचे पर घनघोर युद्ध के पश्चात  तकरीबन हार चुके दशरथ जी को जटायु जी की सहायता ने बचा लिया। इसके बाद दशरथ और जटायु अभिन्न मित्र बन गए। उधर श्रीराम के जन्म से पहले ही अपनी मौत को टालने का रावण का प्रयास विफल रहा ! परन्तु उसने ग्रहों-नक्षत्रों को वश में कर कुछ ऐसी अभिसंधि की, जिससे दशरथ को पुत्र प्राप्ति हो ही ना सके। यही कारण था कि वर्षों-वर्ष अयोध्या के राजपरिवार में किसी बच्चे की किलकारी नहीं गूँज पाई ! 

श्रृंगी दंपत्ति 
संतान-दुःख, बढती उम्र और चिंता के कारण राजा का मन हर चीज से उचाट हो गया ! राज-पाट से विमुख हो गए ! तब गुरु वशिष्ठ के सुझाव पर श्रृंगी ऋषि को आमंत्रित किया गया, जिन्होंने निस्वार्थ भाव से अपने जीवन भर की घोर तपस्या से अर्जित सारे पुण्यों को होम कर दशरथ जी के लिए, कठिनतम माना जाने वाला पुत्रकामेष्ठि यज्ञ सम्पन्न करवा अयोध्या के साथ देश-दुनिया की विपदा भी हर ली। इस यज्ञ के प्रभाव और उसके दैवीय प्रसाद के फलस्वरूप ही रावण-पाश से मुक्ति संभव हो सकी और श्री राम और उनके तीन भाइयों का जन्म निर्विघ्न हो पाया और फिर कालांतर में रावण का वध हुआ।

प्रसाद के साथ अग्निदेव, देवी शांता भी प्रतिलक्षित हैं 
यहां एक जिज्ञासा का उठना स्वाभाविक है कि जब पुत्रकामेष्ठि यज्ञ से संतान प्राप्ति संभव थी तो उसे पहले ही क्यों नहीं करवा लिया गया। तो इसके बारे में जो जानकारी उपलब्ध है उसके अनुसार महीनों तक चलने वाले इस बेहद कठिन विधि-विधान वाले यज्ञ को पूर्ण करवाना हर किसी के लिए संभव नहीं था ! यदि ऐसा होता तो गुरु वशिष्ठ या गुरु विश्वामित्र इसे पहले ही करवा चुके होते। इसके लिए ऐसे ऋषि की आवश्यकता थी, जो दिव्य, ज्ञानी, परोपकारी, प्रकांड पंडित, सौम्य, पर-हितकारी और वेदमंत्रों का उद्भट ज्ञाता हो ! जिसका अपनी इन्द्रियों व भावनाओं पर पूरा नियंत्रण हो ! इसके साथ ही अपने जीवन भर के पुण्यों की आहुति, बिना किसी हिचक, सोच या पछतावे के, यज्ञ में होम कर सके ! क्योंकि उन्हीं पुण्यों के तेज और प्रताप से दैवी प्रसाद का निर्माण संभव था। इसीलिए वशिष्ठ जी ने श्रृंगी ऋषि के नाम का अनुमोदन किया था। जो राजा दशरथ के जमाता भी थे और वर्षों, अपनी एक घोर तपस्या को पूर्ण कर उन्हीं दिनों अपने आश्रम लौटे थे। राजा दशरथ के अनुरोध और अपनी पत्नी शांता देवी की सलाह पर त्रिकालदर्शी और ज्ञानी श्रृंगी ऋषि ने जब अपनी दिव्य दृष्टि से यह भी जाना कि उस यज्ञ से प्राप्त संतान के रूप में खुद विष्णु जी, राम रूप में पृथ्वी पर अवतरित होंगें तो वे उस अभूतपूर्व घटना का माध्यम तथा साक्षी बनने को राजी हो गए। इस कार्य हेतु उनकी एक ही शर्त थी कि इस महायज्ञ में उनकी पत्नी भी सहभागी होंगी। दशरथ जी ने उनकी बात मान ली। इस तरह ऋषि दंपत्ति के पुण्य-प्रताप से यज्ञ की पूर्णाहुति हो सकी और खुद अग्नि देव चांदी के पात्र से ढके सोने के कलश में दैवीय प्रसाद को ले प्रकट हुए और उसे राजा दशरथ को सौंप दिया। इस महायज्ञ के पश्चात श्रृंगी ऋषि फिर अपने पुण्यों को अर्जित करने हेतु जंगल में जा घोर तपस्या में लीन हो गए। उनके परिवार की जिम्मेदारी राजा दशरथ ने संभाली।      

हमारे ऋषि-मुनियों ने जो भी नियम-कायदे बनाए और उन्हें तरह-तरह की कथा-कहानियों के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाने की कोशिश की उसका एक ही उद्देश्य था कि लोग सरल, सहज, अहम् रहित, धर्मपरायण रह समाज कल्याण हेतु जीवन यापन करें। जीव-जंतुओं का हित हो ! देश-प्रदेश में सुख-समृद्धि-ऐश्वर्य का वास रहे। मानव संस्कृति फले-फूले। उन्हीं महान आत्माओं का प्रताप है कि तरह-तरह के बलशाली, विशाल प्रणियों के अस्तित्व के लुप्त हो जाने के बावजूद मानव इस धरा पर विद्यमान है और निरंतर प्रगति भी कर रहा है।

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

विशिष्ट पोस्ट

नकारों को नकारते नवयुवा

हमारे देश की यह बदनसीबी है कि यहां अपने स्वार्थ, अपने वर्चस्व, स्वहित के लिए किसी भी हद तक जाने वालों की कभी कमी नहीं रही है !  अभी कुछ दि...