pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शनिवार, 11 मई 2019

परीक्षा में प्राप्त होने वाले शत-प्रतिशत अंक, शंकाओं के दायरे में

सिर्फ वस्तुनिष्ठता पर निर्भर रहने से वह मात्र सूचना भर रह जाती है ! परंतु लगने लगा है कि आज की स्कूली शिक्षा में इस तरफ कतई ध्यान नहीं दिया जाता ! सूचना ही अभीष्ट हो गयी है और उसे ही ज्ञान मान लिया गया है, जो आज के इंटरनेट के युग में सर्वसुलभ है ! कोई आश्चर्य नहीं कि अंक प्रदान करने वाले माननीयों के ज्ञान का स्रोत भी वही अंतरजाल ही हो और उसी के द्वारा प्रदत्त तथाकथित ज्ञान को आधार मान स्कूलों में अंक ''वितरित'' किए जाते हों ! कई वैश्विक सर्वे यह बताते हैं कि भारतीय छात्रों में पेशेवर क्षमता नहीं होती ! देश की नियामक या कार्यविधि समितियां भी ऐसा ही मानती हैं ....!

#हिन्दी_ब्लागिंग    
पिछले दिनों के स्कूलों के परीक्षा रिजल्ट देख बहुतों के जेहन में कुछ सवाल उठने लगे हैं ! इतिहास, मनोविज्ञान, भाषा, साहित्य इत्यादि में भी 99 या शत-प्रतिशत अंक ? यहां बच्चों की काबिलियत या उनकी मेहनत पर कोई शक नहीं है पर उत्तर पुस्तिकाओं की जांच, शासन की प्रणाली और उसकी नीतियों पर जरूर  कुछ प्रश्न खड़े हो रहे हैं ! जिसमें इजाफा हो रहा है दिल्ली की वर्तमान सरकार के उस बयान से, जिसमें दावा किया गया है कि उनकी सरकार की नीतियों, उनके द्वारा दी गयी सुविधाओं और वातावरण से शिक्षा का स्तर बढ़ा है ! यदि उनके दिए गए कारणों से शिक्षा सुधरती तो राजा, नवाबों, मंत्री-संतरी के बच्चे तो सदा ही टॉप करते ! क्योंकि उन्हें ही सबसे ज्यादा सुविधा और सहूलियतें मय्यसर होती हैं। और यदि वाकई बच्चे रचनात्मकता की इस ऊंचाई पर पहुंच गए हैं तो यह देश और समाज के लिए गर्व का विषय है पर यदि सोचे-समझे ''सिस्टम'' के तहत ऐसा हो रहा है तब तो बच्चे क्या देश को ही अंधेरे की तरफ ढकेला जाना शुरू हो चुका है। 

ऐसा सोचने के कारण भी हैं ! अभी कुछ दिनों पहले यूपीएससी के नतीजे भी आए थे, जिसमें टॉप करने वाले अभ्यर्थी को 55.35 अंक मिले थे ! सवाल वही है कि यदि शिक्षा की गुणवत्ता, उसके स्तर में सुधार हुआ है तो फिर यहां 100 फीसदी के सामने आधे अंक क्यों ?  यह सही है कि यूपीएससी देश की सबसे कठिन परीक्षा है पर उसमें भाग भी तो सबसे प्रतिभावान छात्र ही लेते हैं ! फिर यहां परीक्षाओं की तुलना नहीं की जा रही ! दोनों की तुलना होनी भी नहीं चाहिए, क्योंकि उनका मकसद, उसमें भाग लेने वाले की मानसिकता, ध्येय और बौद्धिकता एक दम अलग होते हैं। पर चिंता इस बात की है कि ऐसा तो नहीं कि स्कूलों की परीक्षा में एक भी अंक ना छोड़ने की कोशिश करने वाले वाले बच्चे की समझ अंकों के अनुरूप विकसित हो ही ना पाती हो ! ऐसा तो नहीं कि कहीं ''किसी और'' उद्देश्य को हासिल करने के लिए बच्चों को मोहरा बनाया जा रहा हो ? यह शक बेबुनियाद भी नहीं है ! कई वैश्विक सर्वे यह बताते हैं कि भारतीय छात्रों में पेशेवर क्षमता नहीं होती ! देश की नियामक या कार्यविधि समितियां भी ऐसा ही मानती हैं ! ऐसा भी कई बार सामने आया है कि टॉप करने वाले छात्र किसी ओर जगह साधारण से प्रश्नों का जवाब भी नहीं दे पाते ! अनेकों बार तो शिक्षकों तक को ज्ञानहीनता के कारण शर्मिंदा होते देखा गया है !


आज बहुत सारे लोग यह सोचने लगे हैं कि 500 में 499 अंक मिलने का आधार क्या है ? गलत ना भी होते हुए यह बात पचती नहीं है ! सौ फीसदी अंक देखकर उस विद्यार्थी के मानसिक स्तर को नहीं परखा जा सकता, ऐसे में वास्तविक स्थिति का आकलन भी नहीं हो पाता है। शिक्षा में वस्तुनिष्ठा के साथ-साथ तर्क और  विश्लेषण की क्षमता का समावेश भी जरूर होना चाहिए। किसी भी बात का तार्किक विश्लेषण होना या करना अति आवश्यक होता है। सिर्फ वस्तुनिष्ठता पर निर्भर रहने से वह मात्र सूचना भर रह जाती है ! परंतु लगने लगा है कि आज की स्कूली शिक्षा में इस तरफ कतई ध्यान नहीं दिया जाता ! सूचना ही अभीष्ट हो गयी है और उसे ही ज्ञान मान लिया गया है, जो आज के इंटरनेट के युग में सर्वसुलभ है ! कोई आश्चर्य नहीं कि अंक प्रदान करने वाले माननीयों के ज्ञान का स्रोत भी वही अंतरजाल ही हो और उसी के द्वारा प्रदत्त तथाकथित ज्ञान को आधार मान स्कूलों में अंक ''वितरित'' किए जाते हों, जो आज ऐसी हद पर जा बैठे हैं, जहां उन पर उंगलियां उठनी शुरू हो गयी हैं। 

इसी के साथ एक बात और भी गहरा रही है कि क्या प्राप्तंकों और लियाकत का कोई संबंध है ? वैसे तो पुराने समय की पढ़ाई और आज की शिक्षा की कोई तुलना ही नहीं की जा सकती ! पहले 50-55 प्रतिशत के ऊपर अंकों की प्राप्ति गौरव की बात कहलाती थी। बहुत ही जहीन बच्चों के लिए भी 70-80 प्रतिशत अंक लाना बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी। पर तब और अब में जमीन आसमान का फर्क आ गया है। पढ़ने-पढ़ाने की तकनीक में बहुत बदलाव हो चुका है ! तरह-तरह की नई सुविधाएं, जानकारियां उपलब्ध हो चुकी हैं। पर साथ ही यह भी लगने लगा है कि आज के छात्रों को संपूर्ण होने के भ्रम में डाल उनको तर्क और विश्लेषण की क्षमता से धीरे-धीरे दूर किया जा रहा है। आज उनके पास ''सूचनाएं'' तो बहुत हैं पर जानकारी की निहायत कमी है ! पहले छात्रों का ज्ञान, विषयों की जानकारी, उनकी समझ, उनके बौद्धिक स्तर का अनुमान, उनके द्वारा परीक्षा में पाए गए अंकों से लगाया जा सकता था ! अपने विषय के अलावा भी उनकी जानकारियों का दायरा काफी बड़ा हुआ करता था। पर अब वैसा नहीं रह गया है। यदि यह आशंका सही है तो जिम्मेवार लोगों को, इसके पहले की स्थिति काबू के बाहर हो जाए, इस पर ध्यान केंद्रित कर हालात को सुधारने के लिए तुरंत आवश्यक कदम उठाने की सख्त जरुरत है। 
@संदर्भ - दैनिक भास्कर   

गुरुवार, 9 मई 2019

पानी को ले कर भ्रमित न हों

हमारी एक सांसद वर्षों से एक ख़ास कंपनी की RO मशीन खरीदने की सिफारिश करती आ रही हैं, जबकि विशेषज्ञ यह कहते हैं कि पानी को साफ़ करने की RO विधि बहुत उपयोगी नहीं है। हर जगह इसकी जरुरत भी नहीं होती। इस प्रक्रिया में पानी के बहुत सारे गुण और तत्व नष्ट हो जाते हैं। इसके अलावा इससे जितना पानी साफ़ होता है उससे तीन गुना पानी बर्बाद भी हो जाता है। एक तरफ तो हमें पानी की बचत का पाठ पढ़ाया जाता है तो दूसरी तरफ तरह-तरह की खामियों, दोषों और अनुपयोगिता के बावजूद  ऐसी मशीन खरीदने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है , जो पानी को साफ़ कम बर्बाद ज्यादा करती है ............!

#हिन्दी_ब्लागिंग     
कल यहीं बात की थी कि कैसे पानी की कोई कमी ना होने के बावजूद लोगों को भरमा-डरा कर, 50-60 साल पहले 1965 में बोतल बंद पानी की शुरुआत बिसलरी ने तब की बंबई में कर दी थी। देखा जाए तो बोतलबंद पानी का पहला व्यापार 1845 से ही पोलैंड के मैनी शहर में होना शुरू हो चुका था। आज दुनिया में दस हजार से भी ज्यादा कंपनियां इस धंधे में लगी हुई हैं। दुनिया भर में तेजी से फ़ैल रहे इस धंदे का खेल आज सैंकड़ों अरब डॉलर का हो चुका है। अपनी ही बात करें तो हमारे यहां तीन रूपये की लागत लगा बीस रुपये वसूलने वाली तकरीबन 200 छोटी-बड़ी कंपनियां करीब 15 हजार करोड़ रुपए का खेल खेल रही हैं। जबकि दुनिया जानती है कि इस तरह का पानी सेहत के लिए हानिकारक भी हो सकता है। पर पानी की बूंद-बूंद से पैसा कमाने में लगी देशी विदेशी कंपनियों ने अपने विज्ञापनों के जरिए लोगों के मन में यह विश्वास जमा दिया है कि वे जो पानी पी रहे हैं वो पूरी तरह से सुरक्षित है। जबकि हाल ही के दिनों में कई ब्रांडों के बोतलबंद पानी के नमूनों में मानक से कई गुणा ज्यादा कीटनाशक पाए गए। कई बार तो बोतलें ही खतरनाक स्टार तक अशुद्ध पाई गयीं। इसके अलावा जहाँ भी पानी के फ़िल्टर प्लांट लगते हैं वहां भू-जल का स्तर खतरनाक रूप से कम हो जाता है। प्लास्टिक की बोतलें और उनका अनैतिक उपयोग जो कहर ढाता है, वो अलग !

विडंबना तो यह है कि ऐसे पानी की जांच का कोई सरल और सुलभ तरीका है ही नहीं ! इसलिए हम सिर्फ भरोसा कर बिना सही-गलत जाने उसका उपयोग करते चले जा रहे हैं। पानी ही तो है इसलिए किसी बात पर ज्यादा ध्यान भी नहीं देते ! जबकी कुछ सावधानियां बहुत जरुरी होती हैं, इस तरह के पानी का इस्तेमाल करते समय। जैसे कि चलती कार में बोतलबंद पानी नहीं पीना चाहिए, क्योंकि कार में बोतल खोलने पर कार के वातावरण और पानी में मिले रसायनों की प्रतिक्रियाएं काफी तेजी से होती हैं और पानी अधिक खतरनाक हो जाता है। यही बात तेज धूप में बोतल से पानी पीने पर लागू होती है। 

वैसे तो बोतल का पानी उपयोग में ना ही लाया जाए तो बेहतर है पर आज के समय इस बात को कठोरता से लागू भी नहीं किया जा सकता। ऐसा भी नहीं है कि सारी कंपनियां नियमों का उल्लंघन कर रही हैं और बोतलबंद पानी सेहत के लिए एक दम से खराब है। जरूरत है तो बोतलबंद पानी को लेकर जागरुक रहने की। तो ऐसे में कुछ सावधानियां जरूर बरतें ! पानी या कोई भी बोतल बंद द्रव्य लेते समय उस पर लीटर का मानक मार्क अंग्रेजी का अक्षर ‘एल’ लिखा हो। पानी का पाउच या बोतल खरीदते समय एक बार उसकी जांच जरूर कर लें। बिना एक्सपायरी डेट लिखे पानी के पाउच और बोतल ना खरीदें। 
आज दुनिया भर के देश इस तरह के प्लांट को दरकिनार कर उन पर रोक लगा रहे हैं। पर दुर्भाग्यवश हमारे देश में यह व्यापार दिन दूनी, रात चौगुनी रफ़्तार से बढ़ रहा है। भ्रमित करने वाले विज्ञापनों ने हमारी आँखों पर पट्टी बाँध दी है ! जबकि विशेषज्ञ यह कहते हैं कि पानी को साफ़ करने की RO विधि बहुत उपयोगी नहीं है। हर जगह इसकी जरुरत भी नहीं होती। इस प्रक्रिया में पानी के बहुत सारे गुण और तत्व नष्ट हो जाते हैं। इसके अलावा यह जितना पानी साफ़ करती है उससे तीन गुना पानी बर्बाद भी हो जाता है। एक तरफ तो हमें पानी की बचत का पाठ पढ़ाया जाता है तो दूसरी तरफ ऐसी मशीन खरीदने के लिए प्रतिष्ठित लोगों द्वारा प्रोत्साहित किया जाता है ! हमारी एक सांसद तो वर्षों से एक ख़ास कंपनी की RO मशीन खरीदने की सिफारिश करती आ रही हैं। क्या उसकी खामियों, उसके दोषों, उसकी अनुपयोगिता का उन्हें पता नहीं है। 

यह सच है कि सर्वजन को पानी उपलब्ध करवाना सरकार का जिम्मा है। पर उसके उपयोग, संचय, बचत, रख-रखाव, का कर्तव्य अवाम का ही है। पर कड़वी और डरावनी सच्चाई तो यह है कि अपनी मूर्खताओं के कारण हमने इस अति आवश्यक प्राकृतिक नेमत की कीमत नहीं समझी, और उसी का फल हम आज तरह-तरह से भुगतने को मजबूर हैं। पानी की उपलब्धता बहुत तेजी से घटती जा रही है पर हालात बिल्कुल ही बेकाबू हो गए हों ऐसा भी नहीं है ! हजारों लोग इसका समाधान निकाल रहे हैं। पुरानी परम्पराओं को जीवित किया जा रहा है। रेगिस्तान को नखलिस्तान और ुसार को जंगल में बदला जा रहा है। अभी पैमाना छोटा है पर सब मिल के जुट जाएं तो फिर सूखी नदियां, झीलें, सरोवर, तालाब पुनर्जीवित हो लहलहा उठेंगे।  

मंगलवार, 7 मई 2019

सुलभ जल को दुर्लभ करने की कवायद

तभी प्रादुर्भाव हुआ बाल्टी में बर्फ के बीच रखी बोतलों में भूरे, नारंगी, सफ़ेद ''कोल्ड ड्रिंक्स'' को कोला,ऑरेन्ज, लिम्का के नाम से बेचने की साजिश का ! बिक्री बढ़ाने की साजिश में सार्वजनिक जगहों पर लगे जल प्रदायों को बंद या ख़त्म कर दिया गया। हैंडपंपों के पानी को दूषित बताने का कुचक्र रचा गया ! टोटियां या तो तोड़ दी गयी या फिर उनमें पानी की आमद रोक दी गयी ! घरों में आने वाले पानी को दूषित या कम गुणवत्ता का बना दिया गया ! परेशान, हलकान लोगों की मजबूरी कुछ लोगों के लिए  धनवर्षा का सुयोग बन गयी...........! 

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वर्ष 1989 के शुरुआती दिनों की एक शाम,    
रायपुर के पत्रकार क्लब के पास एक छोटा सा खाने-पीने का ठीया !   
उस दिन कांउटर पर पानी के पाउच तथा आधा लीटर की पानी की बोतल रखी देख जिज्ञासावश पूछने पर पता चला कि यह बिकने के लिए है ! घोर आश्चर्य हुआ कि जिस शहर में अभी घर से बाहर चाय पीने का चलन भी पूरी तरह से शुरू नहीं हुआ है वहां पानी कौन खरीद कर पिएगा ! पर कुछ ही दिनों के बाद एक ''फ़िल्टर वाटर प्लांट'' के उद्घाटन का आमंत्रण पत्र मिला। पहुँचने पर  दिखा, शहर के जाने-माने लोगों का जमावड़ा ! दैवयोग से सत्य नारायण शर्मा जी, जो तब भी शायद एमएलए ही थे मेरी बगल में बैठे थे, मैंने ऐसे ही पूछ लिया, सत्तू भैया म्युनिस्पल कार्पोरेशन का इतना बड़ा फ़िल्टर प्लांट है, पानी भी ठीक-ठाक आता है, तो फिर इसका औचित्य ? बोले, रायपुर का भूमिजल भारी है ये लोग अपनी कालोनी के लिए इंतजाम कर रहे हैं। यानी सरकार के समर्पण की शरुआत ! तब अंदाज कहां था कि जहां आम आदमी अपनी अक्ल पर चश्मा चढ़ा, आने वाले दो-एक साल का आकलन बमुश्किल कर पाता है, वहीं चतुर लोग अपनी आँखों पर दूरबीन लगा, दसियों साल आगे का समय भांप लेते हैं। बात आई-गयी हो गयी ! 

उस समय ट्रेनों में सुराहियों का चलन हुआ करता था, पांच-सात लीटर की सुराही गर्मियों के सफर के दौरान निर्मल-शीतल जल का पर्याय थीं। रास्ते में उसे दोबारा भरने के लिए स्टेशनों पर पानी सदा उपलब्ध रहता था। पर एकाएक स्टेशनों के नल सूख गए ! कहीं एकाध जगह पानी आता भी था तो दसियों मिनट लग जाते थे बर्तन भरने में ! इधर पाँव भर पानी के लिए धक्का-मुक्की, उधर गाडी सीटी बजा रही चलने की ! लोग परेशान ! खासकर महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे ! जो ना गाडी से उतरने की हिम्मत रखते थे नाहीं प्यासे रह सकते थे ! तभी प्रादुर्भाव हुआ बाल्टी में बर्फ के बीच रखी बोतलों में भूरे, नारंगी, सफ़ेद ''कोल्ड ड्रिंक्स'' को कोला,ऑरेन्ज, लिम्का के नाम से बेचने की साजिश का ! बिक्री बढ़ाने की साजिश में सार्वजनिक जगहों पर लगे जल प्रदायों को बंद या ख़त्म कर दिया गया। हैंडपंपों के पानी को दूषित बताने का कुचक्र रचा गया ! टोटियां या तो तोड़ दी गयी या फिर उनमें पानी की आमद रोक दी गयी ! इसमें सरकारी कारीदों की मिलीभगत से इंकार नहीं किया जा सकता। घरों में आने वाले पानी को दूषित या कम गुणवत्ता का बना दिया गया ! परेशान, हलकान लोगों की मजबूरी कुछ लोगों के लिए  धनवर्षा का सुयोग बन गयी। 

समय अविराम गति से चलता रहा साथ ही चलती रहीं सर्व सुलभ, तक़रीबन मुफ्त की प्रकृति की नेमत को सोने की खान में तब्दील करने की साजिशें ! पूरे योजनाबद्ध तरीके से तक़रीबन पचास साल पहले बने गए जाल में उलझ कर उस देश का नागरिक छटपटा रहा है जहां कायनात ने खुले हाथों अपनी दौलत लुटा रखी है। पहले बोतलबड़ पानी को ''स्टेटस सिंबल'' दिया गया। बड़े-बड़े होटलों में होने वाले सेमिनारों, फ़िल्मी समारोहों, देश-विदेश की राजनितिक मीटिंगों में इन्हें टेबलों पर स्थान दिया जाने लगा जहां  से कि कैमरों के फोकस में आ सकें। फिर एक षड्यंत्र का कुचक्र शुरू हुआ ! लोगों को पानी के बारे में अजीबोगरीब जानकारियां देना शुरू हो गया। अच्छे-भले पानी को विलेन बना लोगों को इतना डरा दिया गया कि उसे पीना तो दूर मुंह-हाथ धोने में भी घरेलू पानी से भय लगने लगा ! नतीजतन पानी के सफाई के घरेलू यंत्रों की बेतहाशा बिक्री शुरू हो गयी ! बाजार में इसे पाउच, गिलास, बोतलों में बंद कर बेचा जाने लगा। घरों के लिए जेरिकेन उपलब्ध करवाए जाने लगे। स्वास्थ्य की चिंता में डूबे लोग, सिर्फ भरोसे पर आँख मूँद कर पैसा बहाने लगे, बिना किसी जांच-पड़ताल या खोज-खबर के कि हम जो पी रहे हैं वह है क्या ! 

है भी तो यह बहुत फायदे का सौदा ! जिस एक लीटर पानी की बोतल को हम बीस रुपये में खरीदते है उस पर बमुश्किल चार रुपये भी खर्च नहीं आता ! डेढ़ सौ अरब से भी ज्यादा के इस कारोबार में सैंकड़ों कंपनियों के अलावा हजारों लोग लगे हुए हैं लोगों को पानी पिलाने में, पर बिना किसी नैतिकता या उअत्तरदायित्व के ! पचासों बार ऐसी बातें सामने आईं हैं, जब बोतलों में नगर सप्लाई का पानी भर कर बेचा जाता मिला है। कई बार तो ट्रेनों में टायलेट का पानी यात्रियों को पीने के लिए दिए जाने पर भी हड़कंप मचा पर बस कुछ देर के लिए। अभी पिछले दिनों यह बात भी सामने आई थी कि दिल्ली सरकार की अदूरदर्शी मुफ्त पानी योजना का लाभ उठा कुछ चंट लोग मुफ्त के पानी को केन में भर पैसा कमाने में लगे हुए थे। 

अब तो मुसीबत सचमुच सामने आन खड़ी हुई है ! पर तस्वीर अभी भी उतनी भयावह नहीं है कि हताश-निराश हो बैठ जाया जाए ! असंख्य लोग लगे हुए हैं इस युद्ध में जीत हासिल करने को, सफल भी हो रहे हैं ! हालांकि दायरा अभी सिमित है पर शुरुआत तो हो ही चुकी है। यह कामअकेले सरकारों के बस का भी नहीं है, समाज को भी साथ खड़े होना पड़ेगा। इस दानव से मुक्ति पाने के लिए अपने-अपने स्टार पर सभी को कोशिश करनी है।हरेक नागरिक को, बच्चे-बच्चे के जागरूक होने का समय है। बचत ही उपलब्धि जरूर है, पर क्यों ना चादर को ही इतना बड़ा कर लें कि पैर पसारने के लिए सोचना ही ना पड़े ! 

मंगलवार, 30 अप्रैल 2019

अथ रसगुल्ला कथा

इसकी प्रसिद्धि का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस मिठाई पर अपना हक़ जताने के लिए दो प्रांतों, बंगाल और ओडिसा में सालों कानूनी जंग चलती रही। ओडिसा का कहना था कि इसकी पैदाइश उनके यहां हुई थी और वर्षों से उसका भोग जगन्नाथ जी को लगता आ रहा है। पर वहां के ''रसगोले'' का रंग भूरापन लिए होता है और उसे खीरमोहन नाम से जाना जाता रहा है। जो थोड़ा सा कड़ापन लिए होता है। जबकि बंगाल का ''रोशोगुल्ला'' मुलायम, स्पॉन्जी और दूधिया सफ़ेद रंग का होता है। वैसे भी दोनों मिठाइयों के रंग के अलावा उनके स्वाद, चाशनी, प्रकृति और बुनावट में भी काफी फर्क होता है..........!


#हिन्दी_ब्लागिंग  

"नोवीन दा किछू  नोतून कोरो, डेली ऐक रोकोमेर मिष्टी आर भालो लागे ना."

"हेँ, चेष्टा कोच्ची (कोरची), दैखो की होय."    
1866, कलकत्ता के बाग बाजार इलाके की एक मिठाई की दुकान। शाम का समय, रोज की तरह ही दुकान पर युवकों की अड्डेबाजी जमी हुई थी। मिठाईयों के दोनो के साथ तरह-तरह की चर्चाएं, विचार-विमर्श चल रहा था।तभी किसी युवक ने दुकान के मालिक से यह फर्माइश कर डाली कि नवीन दा कोई नयी चीज बनाओ। (नोवीन दा किछू नुतून कोरो)।
नवीनचंद्र दास 

नवीन बोले, कोशिश कर रहा हूं। और सच में वे कोशिश कर भी रहे थे कुछ नया बनाने की जिसमें उनका भरसक साथ दे रही थीं उनकी पत्नी, खिरोदमोनी । उसी कुछ नये के बनाने के चक्कर में एक दिन उनके हाथ से छेने का एक टुकड़ा चीनी की गरम चाशनी में गिर पड़ा। उसे निकाल कर जब नवीन ने चखा तो उछल पड़े, यह तो एक नरम और स्वादिष्ट मिठाई बन गयी थी। उन्होंने इसे और नरम बनाने के लिए छेने में "कुछ" मिलाया, अब जो चीज सामने आयी उसका स्वाद अद्भुत था। खुशी के मारे नवीन को इस मिठाई का कोई नाम नहीं सूझ रहा था तो उन्होंने इसे रशोगोल्ला यानि रस का गोला कहना शुरु कर दिया। इस तरह रसगुल्ला जग में अवतरित हुआ।



कलकत्ता वासियों ने जब इसका स्वाद चखा तो जैसे सारा शहर ही पगला उठा। बेहिसाब रसगुल्लों की खपत रोज होने लग गयी। इसकी लोकप्रियता ने सारी मिठाईयों की बोलती बंद करवा दी। हर मिठाई की दुकान में रसगुल्लों का होना अनिवार्य हो गया। जगह-जगह नयी-नयी दुकानें खुल गयीं। पर जो खूबी नवीन के रसगुल्लों में थी वह दुसरों के बनाये रस के गोलों में ना थी। इस खूबी की वजह थी वह  "चीज"  जो छेने में मिलाने पर उसको और नरम बना देती थी। जिसका राज नवीन की दुकान के कारिगरों को भी नहीं था।

नवीन और उनके बाद उनके वंशजों ने उस राज को अपने परिवार से बाहर नहीं जाने दिया। आज उनका परिवार कोलकाता के ध्नाढ्य परिवारों में से एक है, पर कहते हैं कि रसगुल्लों के बनने से पहले परिवार का एक सदस्य आज भी अंतिम "टच" देने दुकान जरूर आता है। इस गला काट स्पर्द्धा के दिनों में भी इस परिवार ने अपनी मिठाई के स्तर को गिरने नहीं दिया है। नविनचंद्र दास की जीवनी पर एक फिल्म भी बन चुकी है।  


बंगाल के रसगुल्ले जैसा बनाने के लिये देश में हर जगह कोशिशें हुईं, पर उस स्तर तक नहीं पहुंचा जा सका। हार कर अब कुछ शहरों में बंगाली कारिगरों को बुलवा कर बंगाली मिठाईयां बनवाना शुरु हो चुका है। पर अभी भी बंगाल के रसगुल्ले का और वह भी नवीन चंद्र की दुकान के "रोशोगोल्ले" का जवाब नहीं। इसकी प्रसिद्धि का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस मिठाई पर अपना हक़ जताने के लिए दो प्रांतों बंगाल और ओडिसा में सालों कानूनी जंग चलती रही। ओडिसा का कहना था कि इसकी पैदाइश उनके यहां हुई थी और वर्षों से उसका भोग जगन्नाथ जी को लगता आ रहा है। पर वहां के ''रसगोले'' का रंग भूरापन लिए होता है और उसे खीरमोहन नाम से जाना जाता रहा है। जो थोड़ा सा कड़ापन लिए होता है। जबकि बंगाल का ''रोशोगुल्ला'' मुलायम, स्पॉन्जी और दूडिया सफ़ेद रंग का होता है। वैसे भी दोनों मिठाइयों के रंग के अलावा उनके स्वाद, चाशनी, प्रकृति और बुनावट में भी काफी फर्क होता है। 
ओडिसा का और बंगाल का रसगुल्ला 

जो हो इसका जन्म तब के ईस्ट इंडिया का ही माना जाता है जिसे आज
बंगाल और ओडिसा के नाम से जानते हैं। वैसे 2017 में सरकार द्वारा बनाई गयी कमिटी ने ''बांग्लार रोशोगोल्ले'' को  Geographical Indications (GI) Tag  प्रदान कर दिया है। उस दिन बंगाल में ऐसी ख़ुशी मनाई गयी जैसे कोई बहुत बड़ी जंग जीत  हो।  यह है इस मिठाई का ''क्रेज़''। हालांकि आजकल बदलते समय के साथ कई लोग इसके नाम का सहारा ले उल्टी-सीधी मिठाइयां, जैसे पान रसगुल्ला, मिर्ची रसगुल्ला, गुलाब रसगुल्ला, चॉकलेट रसगुल्ला जैसे सौ स्वादों वाले रसगुल्ले बनाने का दावा कर नाम और दाम कमाने से नहीं हिचकिचा रहे। यह सही है कि किसी को कुछ बनाने की रोक नहीं है पर किसी की ख्याति को भुनाना भी उचित नहीं होता। देखना है कि बंगाल का, अपनी परंपराओं से लगाव रखने वाला, भद्रलोक किसे सर-माथे पर बिठाए रखता है।    
तो यदि कभी कोलकाता जाना हो तो बड़े नामों के विज्ञापनों के चक्कर में ना पड़ बाग बाजार के नवीन बाबू की दुकान का पता कर, इस आलौकिक मिठाई का आनंद जरूर लें।

सोमवार, 29 अप्रैल 2019

जब तक देर है, तब तक तो अंधेर का रहना तय ही है !

जहां बाकी त्योहारों में अवाम अपने आराध्य की पूजा-अर्चना कर उसे खुश करने की कोशिश करता है, वहीं  इस उत्सव में  ''आराध्य'' दीन-हीन बन  अपने भक्तों को रिझाने में जमीन-आसमान एक करने में कोई कसर नहीं छोड़ता। मजे की बात यह है कि आम जिंदगी में लोगों को अलग-अलग पंथों, अलग-अलग मतों को मानने की पूरी आजादी होती है और इसमें उनके आराध्य की कोई दखलंदाजी नहीं होती पर इस त्यौहार के ''देवता'' साम-दाम-दंड-भेद हर निति अपना कर यह पुरजोर कोशिश करते रहते हैं कि उनके मतावलंबी का प्रसाद किसी और को ना चढ़ जाए...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
हमारा देश तो सदा से उत्सव प्रिय रहा है। हफ्ते, महीने या साल में आने वाले ऐसे मौकों पर आम इंसान अपनी बेहतरी के लिए सारे रंजो-गम भूल-भूला कर उन्हें मनाने में कोई कोताही नहीं बरतता। ऐसा ही एक पंचसाला उत्सव आजकल अपने पूरे शबाब पर है। पर इसमें और बाकी त्योहारों में मूल फर्क यह है कि जहां बाकियों में अवाम अपने आराध्य की पूजा-अर्चना कर उसे खुश करने की कोशिश करता है, वहीं इसमें ''आराध्य'' दीन-हीन बन  अपने भक्तों को रिझाने में जमीन-आसमान एक करने में कोई कसर नहीं छोड़ता। मजे की बात यह है कि आम जिंदगी में लोगों को अलग-अलग पंथों, अलग-अलग मतों को मानने की पूरी आजादी होती है और इसमें उनके आराध्य की कोई दखलंदाजी नहीं होती पर इस त्यौहार के ''देवता'' साम-दाम-दंड-भेद हर नीति अपना कर यह पुरजोर कोशिश करते रहते हैं कि उनके मतावलंबी का प्रसाद किसी और को ना चढ़ जाए। 

इसी चेष्टा में यह उत्सव, उत्सव ना रह कर झूठोत्सव बन एक ऐसा संग्राम बन जाता है जिसमे सब कुछ जायज है। सब कुछ, गाली-गलौच, मार-पीट, धोखा-धड़ी, मौकापरस्ती, वायदे, विश्वासघात, झूठ, लालच, अपमान ! नहीं है तो सिर्फ अवाम की भलाई ! जिसकी गरीबी उसके परिवार का अभिन्न अंग बन चुकी है। जिसका अतीत भी आज है और भविष्य भी ! जिसके लिए बीमार पड़ जाना किसी अपराध से कम नहीं है ! उसे यह नहीं पता कि हाड-तोड़ मेहनत के बावजूद वह क्यों नहीं एक वक्त भी भरपेट भोजन कर पाता जबकि उसका ''आका'' बिन कुछ किए ही अपनी स्वर्ण नगरी स्थापित कर लेता है ! 

विचित्र हैं हमारे देशवासी ! जिस तरह वे हर अच्छाई, सौभाग्य, सुख का श्रेय भगवान को देते हैं और दुर्भाग्य को अपनी किस्मत का दोष मानते हैं ! खुद भूखे पेट भले ही हों धर्मस्थलों में भरसक दक्षिणा देने में नहीं हिचकिचाते ! इनके सामने ही इनके त्यागमय दान से धर्मस्थल ऐसी अकूत संपत्ति का ठीहा बन जाते रहे हैं जिसका कोई उपयोग नहीं होता। ठीक वैसे ही वर्षों से जाति, धर्म, भाषा, पंथ की भूलभुलैया में भटकाने वाले अपने आधुनिक देवताओं को ये कभी दोष नहीं देते ! सालों साल खुद एक झोपड़ी में पड़े-पड़े ही ये अपने आराध्यों के महल स्वर्णमंडित होता देख उसे भी उनका भाग्य और प्रभू का आशीर्वाद मान इसी बात पर निहाल होते रहते हैं कि अगला इनकी जाति का है ! उन्हें इस बात का कोई मलाल नहीं होता कि उसकी जाति-धर्म वाले ने उसका ''मनोरंजन'' करने के सिवा कुछ नहीं किया बल्कि उसे इस बात की ख़ुशी होती है कि उसके उसने फलांनी जाति और धर्म वाले को नीचा दिखा दिया। और यह नीचा दिखाने पर खुश होने की अफीम का डोज़ उसे सालों-साल दिया जाता रहा है और रहेगा !

शायद आसमान पर रहने वाला कभी जमीन की ओर देखे ! सद्बुद्धि वितरित करे ! शिक्षा बढे ! जन जागरण हो ! तब कहीं जा कर दिन बदलें ! कहने को तो कहा जाता है कि घूरे के भी दिन बदलते हैं ! पर अभी तो पता नहीं कितनी देर है ! पर जब तक देर है, तब तक तो अंधेर का रहना तय ही है ! 

सोमवार, 22 अप्रैल 2019

अपने इतिहास को जानना भी जरुरी है

बहुत खेद हुआ जब हल्दीघाटी के बारे में एक दसवीं के छात्र ने अनभिज्ञता दर्शाई ! हल्दीघाटी तो एक मिसाल भर है। ऐसी  शौर्य, साहस , निडरता, देशप्रेम की याद दिलाने वाली सैंकड़ों जगहें हैं जो हमारे गौरवशाली इतिहास की प्रतीक है ! पर दुःख इसी बात का है कि हमारी तथाकथित आधुनिक शिक्षा प्रणाली में ऐसे विषयों की कोई अहमियत नहीं रह गयी है। जिसके फलस्वरूप आज के बच्चों को तो छोड़िए उनके अभिभावकों तक को इनके बारे में पूरी और सही जानकारी नहीं है ! इसमें उनका कोई दोष भी नहीं है, जब आप किसी चीज के बारे में बताओगे ही नहीं तो उसके बारे में किसी को क्या जानकारी होगी ......... !

#हिन्दी_ब्लागिंग  
हल्दीघाटी, नाम सुनते ही जो पहली तस्वीर दिमाग में बनती है वह एक पर्वतीय घाटी में राणा प्रताप और मुगलों के बीच हुए भीषण युद्ध का खाका खींच देती है। अधिकांश लोगों को यही लगता है कि यह पहाड़ियों के बीच स्थित बड़ी सी जगह होगी जहां प्रताप ने मुगलों के दांत खट्टे कर दिए थे। पर सच्चाई कुछ और है। हल्दी घाटी उदयपुर से तक़रीबन 48 की.मी. की दूरी पर अरावली पर्वत शृंखला में खमनोर और बलीचा गांवों के बीच लगभग एक की.मी. लंबा और लगभग 17-18 फुट चौड़ा, एक दर्रा (pass) मात्र है। जहां 18 जून 1576 में राणा प्रताप ने गोरिल्ला युद्ध लड़ते हुए अपने से चौगुनी अकबर की सेना को तीन की.मी. तक पीछे धकेल भागने को मजबूर कर दिया था। इस जगह की मिट्टी का रंग बिल्कुल हल्दी की तरह होने के कारण इसका नाम हल्दीघाटी पड़ा, पर उस दिन तो महाराणा ने खून का अर्ध्य दे कर इसे लाल कर दिया था ! उस निर्जन सी जगह में खड़े हो यदि आप पांच-छह सौ पहले की कल्पना करने की कोशिश भी करें तो रोमांच हावी हो जाएगा। श्रद्धा से उन राण बांकुरों के प्रति सर झुक जाएगा जिन्होंने विकट और कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपनी मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। आज जरुरत है ऐसी व्यवस्था की जो आधुनिक पीढ़ी को उनके बारे में जानकारी दे सके ! 

शौर्य, साहस, निडरता, देशप्रेम की याद दिलाने वाली यह जगह हमारे गौरवशाली इतिहास की प्रतीक है ! पर यह अत्यंत खेद का विषय है कि हमारी तथाकथित आधुनिक शिक्षा प्रणाली में ऐसे विषयों की कोई अहमियत नहीं रह गयी है। जिसके फलस्वरूप आज के बच्चों को तो छोड़िए उनके अभिभावकों तक को पूरी और सही जानकारी नहीं है। आजकी शिक्षा-पद्दति सिर्फ और सिर्फ एक कागज का प्रमाण पत्र हासिल कर उसकी सहायता से किसी नौकरी को लपकने का जरिया मात्र रह गयी है। क्या कुछ ऐसा नहीं हो सकता कि स्कूलों में प्रथमिक शिक्षा के दौरान ज्यादा ना सही कम से कम हफ्ते या पंद्रह दिनों में एक बार अपने इतिहास, उसके महानायकों, उनकी उपलब्धियों, उनके योगदान की सच्चाई के बारे में, बिना किसी कुंठा और पूर्वाग्रह के, बताया जाए ! ठीक उसी तरह जैसे पिछले जमाने में दादी-नानी की किस्से-कहानियां बच्चों में नैतिकता, त्याग, प्रेम, संस्कार इत्यादि के साथ-साथ पौराणिक तथा ऐतिहासिक जानकारीयां भी रोपित कर देती थीं।   

अभी पिछले दिनों उदयपुर जाने का अवसर मिला तो हल्दीघाटी तो जाना ही था ! वहां पहुंचने के दौरान जब साथ के बच्चे से, जो दिल्ली के एक नामी ''क्रिश्चियन स्कूल'' की दसवीं कक्षा का छात्र है, वहां के बारे में पूछ तो उसने पूरी तरह अनभिज्ञता दर्शाई ! यहां तक की उसकी ''मम्मी'' को भी सिर्फ आधी-अधूरी जानकारी थी, जबकि वह खुद एक स्कुल में अध्यापक हैं। विडंबना यही है कि अपने बच्चों के भविष्य, उनके कैरियर की चिंता में आकंठ डूबे अभिभावकों को आजके समय की गला काट पर्टियोगिताओं के चलते इतना समय ही नहीं मिलता कि वे इस तरह की बातों पर ध्यान दें। इसकी जिम्मेवारी तो पाठ्यक्रम बनाने वालों पर होनी चाहिए ! शिक्षा पद्यति कुछ ऐसी हो जो सिर्फ जानकारियां ही न दे बच्चों के ज्ञान में भी बढ़ोत्तरी करे। 

इसी यात्रा के दौरान होटल में केंद्रीय मानव संसाधन एवं विकास मंत्री श्री प्रकाश जावड़ेकर जी से मुलाकात का संयोग बना था पर यह समय ऐसी गंभीर बातों के लिए उचित नहीं था। चुनावी समय के अलावा और कोई वक्त होता तो यह बात उनके कानों में जरूर डाल दी जा सकती थी। वैसे सूना जा रहा ही कि केंद्र सरकार नई शिक्षा नीति पर काम कर रही है। अब शिक्षा नीति पर गठित सलाहकार समिति क्या सलाह देती है यह देखने की बात होगी। 

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019

श्रीनाथद्वारा, नंदनंदन श्रीकृष्ण जी का मंदिर

मुख्य मंदिर में श्री नाथ जी की अत्यंत सुंदर, मनमोहक काले रंग के संगमरमर से बनी करीब-करीब आदमकद की प्रतिमा विराजमान है, जिसके मुख के नीचे ठोड़ी पर एक हीरा जड़ा हुआ है | यहां श्रीनाथजी के दर्शनों का समय निर्धारित है। कुल मिला कर आठ दर्शन होते हैं, मंगला, श्रृंगार, ग्वाल, राजभोग, उत्थपन, भोग, आरती और शयन। प्रभू के प्रत्येक दर्शन का श्रृंगार अलग होता है। इसीलिए ब्रज के मंदिरों की तरह ही यहां रुक-रुक कर दर्शन करने को मिलते हैं..........!


#हिन्दी_ब्लागिंग   
श्रीनाथद्वारा, पुष्टिमार्गीय वैष्णव सम्प्रदाय की प्रमुख पीठ है। जो राजस्थान के राजसमंद जिले में स्थित है। यहां नंदनंदन, आनंदकंद श्रीकृष्ण जी का तीन सौ साल से भी पुराना भव्य मंदिर है। यह देवस्थल उयदयपुर से सिर्फ 48 की.मी. की दूरी पर है। कहा जाता है कि प्रभु श्रीजी का प्राकट्य ब्रज के गोवर्धन पर्वत पर जतिपुरा गाँव के निकट हुआ था। पर मुगलों के आक्रमण के समय इसकी पवित्रता और सुरक्षा के लिहाज से इसे वहां से हटा लिया गया। मूर्ती को राजस्थान लाने का जिम्मा मेवाड़ के राजा राजसिंह ने लिया था। जिस बैलगाड़ी में विग्रह को लाया जा रहा था, उस बैलगाड़ी के पहिये नाथद्वारा में आकर मिट्टी में धंस गये और लाख कोशिशों के बाद भी गाडी को आगे नहीं ले जाया जा सका। तब पुजारियों ने श्रीनाथजी को यहीं स्थापित कर दिया। उस समय मंदिर बनाने का समय उपलब्ध ना होने के कारण प्रतिमा को एक हवेली में ही विधि-विधान पूर्वक स्थापित कर दिया गया था। इसीलिए यह मंदिर परंपरागत मंदिरों की तरह नहीं है। हवेली में स्थित होने के कारण ही इस मंदिर को श्रीनाथ जी की हवेली भी कहा जाता है।
 मंदिर में पहुँच के लिए तीन द्वार हैं। जो मोतीमहल दरवाजा, नक्कारखाना द्वार तथा प्रीतम पोल कहलाते हैं। मोतीमहल से प्रवेश करने पर पहले श्री लालन मंदिर मिलता है, जहां बाल गोपाल के दर्शन होते हैं। नक्कारखाने से प्रवेश करने पर एक खुली जगह आती है जो पुरुषों के इन्तजार के काम आती है। यहां से श्रीनाथ जी के सीधे दर्शन किए जाते हैं। महिलाओं के लिए पास में ही संगमरमरी विशाल कमल चौक है जो घूम कर नक्कारखाने से आ मिलता है। इधर से महिलाओं के लिए दर्शन की व्यवस्था है। प्रीतम पोल से बाहर बाजार की तरफ जाया जा सकता है।




मुख्य मंदिर में श्री नाथ जी की अत्यंत सुंदर, मनमोहक काले रंग के संगमरमर से बनी करीब-करीब आदमकद की प्रतिमा विराजमान है, जिसके मुख के नीचे ठोड़ी पर एक हीरा जड़ा हुआ है | यहां श्रीनाथजी के दर्शनों का समय निर्धारित है। कुल मिला कर आठ दर्शन होते हैं, मंगला, श्रृंगार, ग्वाल, राजभोग, उत्थपन, भोग, आरती और शयन। प्रभू के प्रत्येक दर्शन का श्रृंगार अलग होता है। इसीलिए ब्रज के मंदिरों की तरह ही यहां रुक-रुक कर दर्शन करने को मिलते हैं।
 नक्कारखाना द्वार 

हम लोग मेवाड़ एक्स. से सुबह साढ़े सात के लगभग उदयपुर पहुंच गए थे। बुक की हुई गाड़ियों को लेकर करीब साढ़े नौ बजे होटल यूई (Yois) पहुंचे। तरण-ताल का उपयोग कर तरोताजा हो बारह बजे के कुछ बाद हल्दी घाटी के लिए रवाना हुए। नयी जगह, अनजान रास्ते का सहारा गूगल ही था; उसकी मेहरबानी थी कि वह कुछ मान-मनौअल, कुछ नखरे के बावजूद राह दिखाता रहा। हल्दीघाटी, चेतक की समाधि और राणा प्रताप संग्रहालय देखने के बाद करीब चार बजे श्री नाथ जी के दर्शन हेतु नाथद्वारा रवाना हुए। आखिर भीड़-भाड़, संकरी गलियों, दूर की पार्किग से जैसे-तैसे निबट कर प्रभू के द्वार पहुंच ही गए। अप्रैल का मध्य था गर्मी अपना जोर दिखाने लग गयी थी, जिससे कुछ-कुछ थकान का एहसास होने लगा था। ऊपर से पंडों-दलालों की किच-किच ! पर मेरा शुरू से ही यह इरादा रहता है कि बिना किसी सहायता के खुद अपने बल-बूते पर ही दर्शन किए जाएं। इससे मन में किसी तरह का अपराध बोध नहीं आता। आजकल ये सारी बातें हर धार्मिक स्थल पर आम हो गयीं हैं। माया की माया का जाल सब जगह फ़ैल चुका है। फिर भी दर्शनों की अटूट इच्छा के सामने ऐसी सब बातें हर तरह से गौण हो जाती हैं।
दर्शनोपरांत 
जब हम नक्कारखाना द्वार पर पहुंचे, उस समय भी मंदिर के कपाट शृंगार के कारण बंद थे। नियमानुसार जूते वगैरह उतार, हाथ-मुंह धो, कैमरा, मोबाइल, बड़े बैग-पर्स सब जमा करवा कर महिलाओं और पुरुषों का अलग-अलग लाइनों में लगना हुआ। तभी दस मिनट के बाद पंद्रह मिनटों के लिए किवाड़ खुले, अपार जनसमूह, जय-जैकार, धक्का-मुक्की, सबको दर्शन करने की बेताबी, दर्शनों को जितना हो सके लंबा खींचने की कामना और दर्शनोपरांत भी हटने की अनिच्छा कभी-कभी अराजकता भी उत्पन्न कर देती थी। वैसे ऐसा होना स्वाभाविक भी है ! दूर-दूर से आए दर्शनार्थी, जिनमें कइयों का दोबारा आना शायद ही संभव हो, मनमोहन की छवि को जैसे सदा के लिए अपने नयनों में बसा लेना चाहते हों। हो भी क्यों ना ! श्री नाथ जी के दर्शन कर किसका मन भावविभोर नहीं हो जाता है | हमें भी दर्शन हुए ! भले ही कुछ दूर से हुए, पर खूब हुए ! नयन तृप्त हुए, मन भाव-विभोर हो गया।

नाथद्वारा बाजार 
होटल का तरण-ताल 
तीन-चार मिनट तक जन सैलाब के थपेड़े, मानव हुजूम का झंझावात सहने के बाद प्रभू को आँखों में समोए किसी तरह बाहर आए, प्रसाद लिया। सबको इकठ्ठा होने में कुछ समय लगना ही था, लगा। फिर कार पार्किंग के स्थान को लेकर हुए दिशा भ्रम को स्थानीय लोगों की मदद से दूर कर करीब छह बजे वापस उदयपुर की ओर का रूख हो पाया। होटल के तरण-ताल के कुछ-कुछ ठंडे पानी ने दिन भर की थकान को जैसे अपने में समेट हमें फिर से तरो-ताजा कर दिया। 

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