pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शनिवार, 5 जनवरी 2019

हम वाकई में असहिष्णु हैं !

यह सब लिखने-बोलने की तनिक भी इच्छा नहीं करती, क्योंकि ऐसा करना बर्रे के छत्ते पर पत्थर फेंकने के समान है !पर जब कुछ लोग रोज-रोज सोशल मिडिया पर आ बकवास कर दूसरों पर सही-गलत इल्जाम मढ़ने से बाज नहीं आते तो ना चाहते हुए भी रोष प्रकट हो जाता है ! कई दिनों से घुमड़ता आक्रोश आज ना चाहते हुए भी सहिष्णुता का बाना त्याग असहिष्णुता का आकार पा ही गया ! पर यह भी सच है कि जिस दिन देश के अवाम के सामने सारी असलियत आ जाएगी, उस दिन ऐसे लोगों की तक़रीबन बंद हो चुकी दुकानें, ढहा भी दी जाएंगी। क्योंकि अति तो किसी भी चीज की खतरनाक होती है और सच का सूर्य कितने भी घने बादलों से ढका हो अपने तेज व प्रकाश से सामने आ ही जाता है और तब सहिष्णु और असहिष्णुता का फर्क भी किसी को समझाना नहीं पडेगा ............!

#हिन्दी_ब्लागिंग
हमारे देश में कुछ लोग ऐसे हैं जो ना हीं देश को अपना मानते हैं और नाहीं भगवान को ! ऐसे लोगों को भी हमने सर माथे पर बैठा रखा है, क्योंकि हम असहिष्णु जो हैं ! यहां रह कर, यहां का खा-पी कर विदेशों का गुण-गान करने वालों को भी हम अपने देश के सम्मानों से सम्मानित करते नहीं अघाते, क्योंकि हम असहिष्णु हैं ! अपने देवी-देवताओं की, अपनी आस्थाओं की ऐसी की तैसी करने वालों को भी हमने माननीय बना रखा है, क्योंकि हम असहिष्णु हैं ! अपने नेताओं को, अपने शहीदों को, अपने सुरक्षा बलों को गालियां देने वालों, उनको नीचा दिखाने वालों, उनका अपमान करने वालों की बातों को भी हम टाल जाते हैं क्योंकि हम असहिष्णु जो ठहरे। ऊपर से विडंबना यह है कि ऐसे लोग भक्क से मुंह खोल खुद तो रोज विष-वमन करते हैं, पर अपना जरा सा विरोध होते ही अपने जामे से बाहर हो जाते हैं, सामने वाले को तरह-तरह के अलंकारों से विभूषित करते हुए ! इन्हें हमारे रहन-सहन, बोल-चाल, खान-पान, आस्था-धर्म, परंपरा-विश्वास यानी हर चीज से शिकायत है ! पर असहिष्णु कौन ?... हम !

इन जैसे सहिष्णु जानते हैं कि इस देश में कैसा भी अपराध करने, अराजकता फ़ैलाने, दुष्कर्म करने, वैमनस्य फैलाने यानी किसी भी प्रकार का गलत काम करने पर यदि उसका हजार लोग विरोध करेंगे तो दस लोग पक्ष में भी खड़े हो जाएंगे, इन्हीं दस लोगों का साथ, इनका हौसला और हिमाकत सदा बनाए रखता है। यह बात समाज के हर क्षेत्र में होने वाले दुष्कर्मों पर लागू होती है। ताजा उदहारण है, सिर्फ हठधर्मिता के कारण ऐसी दो महिलाओं ने सबरीमाला के मंदिर में प्रवेश किया जिन्हें शायद ही यह पता भी हो कि अय्यप्पा कौन थे ? पर सिर्फ करोड़ों लोगों को नीचा दिखाने की गरज से आठ सौ साल से चली आ रही परंपरा को तोड़ने की हिमाकत कर डाली गयी। भगवान के लिए उसके सारे बच्चे बिना भेदभाव के बराबर होते हैं ; हरेक को पूरा हक़ है उसके पास जाने का, उसे अपने सुख-दुःख का भागीदार बनाने का, उससे अपने कष्टों से निजात दिलाने की प्रार्थना करने का, क्योंकि मनुष्य का अंतिम सहारा तो वही होता है ! यदि कहीं कोई मतभेद है तो उसे सुलझाया भी जा सकता है ! पर इस तरह की हेकड़ी और अक्खड़ता तो कतई स्वीकार करने योग्य नहीं है। यह जो हुआ वह आस्था की बात ही नहीं है उसका ध्येय समाज में आपस में दरार डालने का था, अराजकता फैलाने का था और वह सफल हुआ ! क्योंकि उन महिला रूपी मोहरों का किसी भी तथाकथित आजादी वाले अभियान से या किसी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से या किसी आस्था से कोई लेना-देना नहीं था ! उनका संबंध उस पंथ से है, जो देवी-देवता-भगवान् आदि पर विश्वास ही नहीं करता। जब किसी पर तुम्हारा विश्वास ही नहीं है, आस्था ही नहीं है तो तुम मंदिर में कौन सी पूजा कर लोगों के सामने कोई आदर्श रखने जा रहे हो ? पर हम तो यह पूछ ही नहीं सकते क्योंकि हम तो असहिष्णु हैं !

ये वही लोग हैं जो सदा ग़रीबों की गरीबी का रोना रो-रो कर अपने वर्तमान-भविष्य को हंसाते रहे हैं। एक तिहाई शताब्दी तक एक प्रदेश पर राज करने के बावजूद उस प्रदेश का आज भी यह हाल है कि वहां भिखारियों की तादाद देश में सबसे ज्यादा है ! गरीब-गुरबों को बराबरी का सपना दिखाने वाले इनके नेताओं के अपने परिवार में जब कोई ''उत्सव'' होता है तो उसमें करोड़ों की राशि पानी की तरह बहा दी जाती है ! और असहिष्णु हम हो जाते हैं। इनसे कभी बात कर के देखिए, लगेगा किसी पड़ोसी दुश्मन देश के प्रवक्ता से बात हो रही है। पर असहिष्णुता हम पर थोप दी जाती है। बहुत कम लोग जानते होंगे कि 1962 के युद्ध में हमारी बुरी तरह हार हुई थी ! हजारों जवान मारे और घायल हुए थे ! उसी समय कलकत्ता में घायल जवानों के उपचार के दौरान खून की जरुरत को लेकर रक्त-दान की अपील की गयी, एक पार्टी सदस्य ने अपना खून देने की इच्छा जाहिर की तो उसे पार्टी विरोधी हरकतों के इल्जाम के साथ बाहर का रास्ता दिखा दिया गया, पर असहिष्णु हम कहलाते हैं !

अपने कालेज के दौरान यह विचार बहुत अच्छा लगता था कि देश में हर इंसान को बराबरी का हक़ होना चाहिए। सबकी जिंदगी में खुशहाली होनी चाहिए। सब को अपने काम का उचित पारश्रमिक मिलना चाहिए। शोषण ख़त्म होना चाहिए इत्यादि इत्यादि ! पर नौकरी के दौरान जब हकीकत सामने आई तो दृश्य कुछ और ही था ! अधिकाँश नेताओं का किसी से कोई लेना-देना नहीं था ! हड़ताल, विरोध, हंगामें के बाद इन नेताओं के घर और बड़े और पक्के होते जाते थे, पैरों के बीच गाड़ियां आ जाती थीं, चेहरे की लुनाई और बढ़ जाती थी ! और जिसके बल पर यह होता था वह अपनी हफ्ते की तीन-चार रूपए की बढ़ोत्तरी पर ही संतुष्ट हो, अपने इन्हीं आकाओं के झंडे कंधों पर उठाए, उनका स्तुति गान करते हुए, अपनी कभी ख़त्म ना होने वाली सदाबहार गरीबी को ढोता रहता था, ढोता रहता था ! उसकी वह नियति आज भी वैसी ही है। धीरे-धीरे सड़क छाप लोग नेता बन अवाम को डरा-धमका कर पंथ के नाम पर उनकी मेहनत की कमाई की छिनताई करने लगे। धंधा अच्छा था बिना मेहनत-मजदूरी किए सब कुछ हासिल हो जाता था। त्यौहार के दिनों में तो खाते-पीते लोग घर से बाहर निकलने से घबराने लगे थे। यह सब देख बहुतेरों का गरीबों के इन छद्म मसीहाओं से मोह-भंग हो गया।

कौन नहीं चाहता कि गरीब, सर्वहारा भी दो समय का भोजन पा रात को एक छत के नीचे चैन की नींद सो सके ?  उसके बच्चे ढंग की शिक्षा पा सकें, हारी-बिमारी में उसे दूसरों का मोहताज ना होना पड़े !  पर इसके लिए किसी और की, दिन-रात मेहनत कर कमाई गयी कमाई को तो छीना नहीं जाना चाहिए ! बराबरी का हक़ जरूर मिले पर इसका मतलब यह तो नहीं कि आप किसी के घर में घुस कर उस पर कब्ज़ा कर लें ! एक सवाल और कि यह जितने भी अपने आप को गरीबों का मसीहा साबित करने में जुटे हुए शातिर हैं उनका खुद का क्या योगदान है ग़रीबों की सहायता करने में ? दूसरों का धन तो कोई भी किसी को दे सकता है ! पर इन्होंने खुद अपनी जेब से क्या दिया, कभी किसी को, सिर्फ भाषणों, आश्वासनों के अलावा ! कितने दरियादिल लोग हैं इनमें, जो किसी एक भी गरीब परिवार का जिम्मा लिए हुए है ? कड़वी सच्चाई यह है कि किसी को अवाम से नहीं सिर्फ उसके मत से मतलब है, जिससे येन-केन-प्रकारेण: साम-दाम-दंड-भेद, निति-अनीति कुछ भी अपनाते हुए सत्ता हासिल करने या उसके नजदीक मंडराते रह कर, लोगों को बेवकूफ बना अपनी दूकान में रोटियां सेकी जा सकें ! यह किसी एक दल की बात नहीं है: देश में कुकुरमुत्ते की तरह उग आए हर दल में ऐसे अनेकों मौकापरस्त-अवसरवादी लोग घुसे बैठे हैं।

कई दिनों से घुमड़ता आक्रोश आज ना चाहते हुए भी सहिष्णुता का बाना त्याग असहिष्णुता का आकार पा ही गया ! पर यह भी सच है कि जिस दिन देश के अवाम के सामने असलियत आ जाएगी उस दिन ऐसे लोगों की तक़रीबन बंद हो चुकी दुकानें, ढहा भी दी जाएंगी। क्योंकि अति तो किसी भी चीज की खतरनाक होती है और सच का सूर्य कितने भी घने बादलों से ढका हो अपने तेज व प्रकाश से सामने आ ही जाता है और तब सहिष्णु और असहिष्णुता का फर्क भी किसी को समझाना नहीं पडेगा !

गुरुवार, 3 जनवरी 2019

गुणों की खान है, गुड़

प्रकृति और इंसान के आपसी ताल-मेल की अद्भुत उपज है, गुड़। धरा ने आदमी की मेधा की परख के लिए द्रव्य रूप में अमृत रूपी रस को डंडों में भर खेतों में उपजाया तो इंसान ने उसे ठोस रूप दे एक बहुगुणी वस्तु की शक्ल दे दी। वस्तु भी कैसी, जिसका उपयोग वर्षों तक शादी-ब्याह, तीज-त्यौहार, सामान्य व शुभ अवसरों पर सदियों से अमीरों और ग़रीबों में मीठे और कुछ-कुछ ओषधि के रूप में होता रहा। भले ही विदेशी बाजार अपने मतलब के लिए इसे कितना ही अस्वास्थयकर कहे, पुरातन कहे पर सही मायने में यह अत्यंत गुणकारी, फायदेमंद, सेहतप्रद और सर्वसुलभ प्रकृति की देन है.........!


#हिन्दी_ब्लागिंग   

हमारे देश में व्यापार की अनंत संभावनाओं को देखते हुए विदेशी व्यापारियों ने यत्र-तत्र-सर्वत्रअपना जाल तो फैलाया ही है साथ ही हनारी कई उपयोगी-स्वास्थयकर और गुणकारी वस्तुओं, जैसे घी, तेल, मसाले, वनौषधियों, जड़ी-बूटियों इत्यादि के बारे में भ्रामक अफवाहें फैला उन्हें हानिकारक और निरुपयोगी सिद्ध करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी है ! ऐसी ही एक अत्यंत उपयोगी वस्तु है गुड़ !


प्रकृति और इंसान के आपसी ताल-मेल की अद्भुत उपज है, गुड़। धरा ने आदमी की मेधा की परख के लिए द्रव्य रूप में अमृत रूपी रस को डंडों में भर खेतों में उपजाया तो इंसान ने उसे ठोस रूप दे एक बहुगुणी वस्तु की शक्ल दे दी। वस्तु भी कैसी, जिसका उपयोग वर्षों तक शादी-ब्याह, तीज-त्यौहार, सामान्य व शुभ अवसरों पर सदियों से अमीरों और ग़रीबों में मीठे और कुछ-कुछ ओषधि के रूप में होता रहा। हालांकि समय के साथ इसको परिष्कृत कर इसके और शुद्ध रूपों की ईजाद, शक्कर तथा चीनी के रूपों में हुई, पर उनमे इसके लाभकारी गुणों का समावेश नहीं हो पाया।
सर्दियों की फसल, गन्ने से तैयार होने वाला गर्म तासीर वाला गुड़, मनुष्य को प्रकृति की अनुपम देन है। चिकित्सा-शास्त्र भी इसमें पाए जाने वाले खनिजों के कारण, मानता है कि यह इंसानों के साथ-साथ जानवरों के लिए भी उतना ही उपयोगी व गुणकारी है। इस बात का ज्ञान हमारे पूर्वजों को बहुत पहले से ही रहा है इसीलिए वे अपने पालतू पशुओं के लिए भी इसका उपयोग बेझिझक करते आ रहे हैं। पर बाजार के बहकावे में आ आधुनिक पीढ़ी और शहरवासी उचित जानकारी के अभाव में इसका उपयोग करने से कतराते हैं जबकि यह चीनी से ज्यादा सुरक्षित, फायदेमंद और गुणकारी है।
खजूर का गुड़ 
आधुनिकता भले ही इसे कितना ही अस्वास्थयकर कहे, पुरातन कहे पर सही मायने में यह अत्यंत गुणकारी, फायदेमंद, सेहतप्रद और सर्वसुलभ प्रकृति की देन है। उचित मात्रा में इसके सेवन से पाचन तंत्र सही रहता है, भोजन पचाने में सहायता करता है, भूख बढ़ाता है, पेट की व्याधियों को दूर करता है, अनीमिया से बचाता है, यादाश्त तेज करता है, रक्त-चाप ठीक रखता है, ऊर्जा का बेहतरीन स्रोत है,  खून को शुद्ध करता है, आँखों के लिए फायदेमंद है, सर्दी में शरीर का तापमान ठीक रखता है, हड्डियों को मजबूती प्रदान करता है, सर्दी-जुकाम-खांसी-एलर्जी, जोड़ों के दर्द आदि में भी फायदा पहुंचाता है। आयुर्वेद में रात के भोजनोपरांत रोज इसकी करीब एक तोला मात्रा लेने की सलाह दी जाती है। हाँ शुगर के रोगियों को थोड़ा परहेज जरुरी है।
नारियल गुड़ 

गुड़ का उत्पादन हमारे देश के अलावा श्री लंका, नेपाल, पकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, जापान, इंडोनेशिया, मेक्सिको, ब्राजील इत्यादि अनेक देशों में किया जाता है। हर जगह के वातावरण के अनुसार ही इसके स्वाद, गुण और विशेषताएं होती हैं। जो बहुत कुछ इसको बनाने वाले के हुनर और कार्यकुशलता पर भी निर्भर करती हैं।जहां श्री लंका के गुड़ को सर्वोपरि माना जाता है, वहीं हमारे देश में पंजाब का गुड़ और शक्कर बेहतरीन मानी जाती है। ईख के अलावा हमारे देश के पूर्वोत्तर और दक्षिणी राज्यों में खजूर के रस से भी गुड़ बनाया जाता है, जो हल्की या कुछ कम मिठास पसंद करने वालों के लिए बेहतरीन विकल्प है। इधर नारियल के रस से भी गुड़ बनाया जाने लगा है पर उसके गुण-शक्लो-सूरत चीनी के ज्यादा करीबी होते हैं। 


गुड़ चक्की 
वैसे तो इसका सेवन साल भर किया जा सकता है पर अभी इस सर्दी के मौसम में तो गुड़ के सेवन का बेहतरीन अवसर है। भले ही इसका सीधा उपयोग करें या फिर इससे बने ढेरों सुस्वादु खाद्य पदार्थों का सेवन करें ! पर जरा-ज़रा सा रोज जरूर खाएं और साल भर सेहतमंद रहने का फायदा उठाएं। 

मंगलवार, 25 दिसंबर 2018

बॉक्सिंग डे यानी डिब्बा दिवस

अब वहां विदेशों में छुट्टी कभी भी हो पर अपने देश के क्रिकेट प्रेमी तो इस बार यही दुआ कर रहे हैं कि इस बार बॉक्सिंग दिवस पर खेले जाने वाले मैच में भारतीय टीम का डिब्बा गोल ना हो। वर्षों से हमारी टीम के साथ जुड़ा हुआ ''जिंक्स'' भी जाने वाले साल के साथ ही विदा हो। आमीन ! 

 भारत ने अब तक 14 बॉक्सिंग डे टेस्ट मैच खेले हैं और इनमें से दस में उसे हार का सामना करना पड़ा. उसने केवल एक मैच जीता है जबकि तीन अन्य ड्रॉ रहे हैं. ऑस्ट्रेलिया में वह सात बॉक्सिंग डे टेस्ट का हिस्सा रहा और इनमें से पांच मैचों में उसे हार झेलनी पड़ी. जबकि दो मैच का कोई रिजल्‍ट नहीं निकला.
#हिन्दी_ब्लागिंग   
भारत ऑस्ट्रेलिआ के बीच तीसरा क्रिकेट टेस्ट मैच कल, यानी 26 दिसंबर 2018 को खेला जाना है। क्रिसमस के बाद का दूसरा दिन योरोप में "बॉक्सिंग दिवस'' के रूप में जाना जाता है। इसलिए इस दिन खेले गए मैच को बॉक्सिंग डे मैच कहते हैं। भारत ने अपने विदेशी दौरों पर 14 बॉक्सिंग डे मैच खेले हैं। जिनमें दस में हार मिली है, तीन ड्रॉ रहे हैं तथा सिर्फ एक मैच ही जीत पाया है वह भी साऊथ अफ्रीका से !  ऑस्ट्रेलिआ में बॉक्सिंग डे के मैच मेलबोर्न क्रिकेट ग्राउंड पर ही खेले जाते हैं। अब तक हम ने इस दिन वहां सात टेस्ट खेले हैं, जिनमें पांच में हार का सामना करना पड़ा है और बाकी दो ड्रॉ रहे हैं। इस तरह देखें तो तस्वीर निराशाजनक ही रही है। 
 मेलबोर्न क्रिकेट ग्राउंड 
अब रही इस दिन के नाम की बात ! बॉक्सिंग दिवस एक धर्मनिरपेक्ष उत्सव दिवस है। जो 26 दिसम्बर को मनाया जाता है, अर्थात बड़े दिन के अगले दिन, जो कि सेंट स्टीफेन दिवस भी है इसलिए यह एक धार्मिक अवकाश भी है। पर इसी दिन कई देशों में तरह-तरह के खरलों की शुरुआत होने के कारण ऐसा लगता है कि इस दिन का संबंध शायद बॉक्सिंग के खेल से हो, जबकी ऐसा नहीं है। हालांकि इस के बारे में कुछ ज्यादा स्पष्ट नहीं है। पर हर जगह ग़रीबों, जरूरतमंदों को धन या अन्य दान दे कर उनकी सहायता करने का चलन रहा है तो ऐसा मन जाता है कि तक़रीबन रोमन काल से यह परिपाटी चली आ रही है जब जरुरत का सामान और खाद्यपदार्थ डिब्बों में बंद कर उन्हें जरुरत मंद-बेसहारा लोगों के लिए चर्चों के बाहर रख दिए जाता था। वहीं कुछ खाली बॉक्स भी सेंट स्टीफेन की दावत के नाम पर कुछ रकम इकट्ठी करने के लिए रख दिए जाते थे। इन्हीं डिब्बों या बाक्सों के लेन-देन के कारण इस दिन का नाम बॉक्सिंग डे पड़ गया। 
इसको मनाने का कोई बहुत ही कठोर नियम नहीं है। कभी-कभी जब 26 दिसम्बर को रविवार पड़ जाता है तो बॉक्सिंग दिवस अगले दिन अर्थात 27 दिसम्बर को और यदि बॉक्सिंग दिवस शनिवार को पड़ जाये तो उसके बदले में आने वाले सोमवार को अवकाश दिया जाता है। परन्तु यदि क्रिसमस शनिवार को हो तो क्रिसमस की सुनिश्चित छुट्टी सोमवार 27 दिसम्बर को होती है और बॉक्सिंग दिवस का सुनिश्चित अवकाश मंगलवार 28 दिसम्बर को होता है।
अब वहां विदेशों में छुट्टी कभी भी हो पर अपने देश के क्रिकेट प्रेमी तो इस बार यही दुआ कर रहे हैं कि इस बार बॉक्सिंग दिवस पर खेले जाने वाले मैच में भारतीय टीम का डिब्बा गोल ना हो। वर्षों से हमारी टीम के साथ जुड़ा हुआ ''जिंक्स'' भी जाने वाले साल के साथ ही विदा हो। आमीन ! 

रविवार, 23 दिसंबर 2018

सूजी आटे-मैदे की मंझली बहन है

यह मैदा और सूजी किस चीज से बनते हैं भई SS ? नई पीढ़ी को तो शायद ही पता होना था, बीच वाली भी सोच में पड़ी दिखी ! कुछ देर के बाद जवाब आया ! मैदा तोआटे से बनता है: सूजी का...पता नहीं ! घूम-फिर कर करीब एक दर्जन निगाहें मेरी तरफ ! आप ही बताओ ! सवाल ने ''बूमरैंग'' हो मेरे को ही आ घेरा था ! सच्चाई यह थी कि मैदे का प्रोसेस तो कुछ-कुछ मुझे मालुम था, पर सूजी के बारे में यहां भी  निल बटे सन्नाटा ही था........ ! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 
कल रात मजे-मजे में एक ऐसी बात हो गयी: जो अजीब तो थी पर गरीब बिल्कुल नहीं थी ! क्योंकि उससे यह बात निकल कर सामने आई कि  ऐसी बहुत सी चीजें है, खासकर खाद्य-पदार्थ जिन्हें हम वर्षों, पीढी दर पीढ़ी उपयोग में  तो लाते रहते हैं पर उनके बारे में पूरी जानकारी नहीं होती हमें ! अब जैसे मैदे और सूजी को ही लें ! शायद ही कोई ऐसा घर होगा जहां इनका प्रयोग ना होता हो ! पर यह बनते कैसे हैं, बहुतों को नहीं पता ! 

तो हुआ कुछ यूँ कि कई दिनों की मसरूफियत के बाद कल रात मेरे कानूनी भाई के यहां इकट्ठा होने का मौका निकाला गया। जाहिर है भोजन का बंदोबस्त भी वहीं होना था, तो उदर-पूर्ति के लिए जो बनाया गया, वह था छोले-भटूरे और सूजी का हलवा। हल्का-फुल्का माहौल, ठंड का मौसम, स्वादिष्ट व्यंजन, दूसरे दिन अवकाश ! सब जने निश्चिंतता से संगत का लुत्फ़ उठा ही रहे थे कि अचानक मेरे जेहन में एक प्रश्न ने सर उठाया कि पूछूं तो सही कि यह मैदा और सूजी किस चीज से बनते हैं ? नई पीढ़ी को तो खैर क्या ही पता होना था: बीच वाली भी इसे ले, सोच में पड़ी दिखी ! कुछ देर के बाद जवाब आया, मैदा तो आटे से बनता है: सूजी का...पता नहीं ! घूम-फिर कर करीब एक दर्जन निगाहें मेरी तरफ ! आप ही बताओ ! सवाल ने ''बूमरैंग'' की तरह मेरे को ही आ घेरा था ! सच्चाई यह थी कि मैदे का प्रोसेस तो मुझे मालुम था, पर सूजी के बारे में यहां भी निल बटे सन्नाटा ही था। सब को यह बात बताई और कहा कल ब्लॉग में खुलासा करूंगा ! फिर वही हुआ जो ऐसे में होता है..''गूगलम शरणम गच्छामी''.. तो पेश है दूसरे दिन का लब्बो लुआब !

यह तो जग जाहिर है कि सेहत और पौष्टिकता के लिए आटा सर्वोपरि है। पर मैदा भले ही सेहत के लिए कुछ नुकसानदायक हो, इसके द्वारा बने अनगिनत व्यंजन होते तो सुस्वादु ही हैं। इसी कारण इसका प्रचलन कभी ख़त्म नहीं होता। इसको बनाने वाली मशीनें गेहूँ का आटा बनाने वाली चक्कियों से अलग होती हैं। जहां पहले गेहूँ को अच्छी तरह धो-सूखा कर उनकी सहायता से उसकी ऊपरी परत को निकाल देते हैं। फिर बचे हुए सफ़ेद भाग को बहुत ही महीन पीसा जाता है जिसके फलस्वरूप जो चिकना-हल्का पाउडर जैसा पदार्थ मिलता है वही मैदा कहलाता है। अब सवाल यह उठता है कि जब मैदा भी गेहूँ से ही बनता है तो फिर उससे परहेज करने को क्यों कहा जाता है ! इसका कारण है, इसके बनाने की विधि, जिसके दौरान ज्यादातर पौष्टिक पदार्थ जैसे मिनरल, विटामिन, प्रोटीन और फाइबर नष्ट हो जाते हैं पर कैलोरी बढ़ जाती है। फाइबर के ना होने से मैदा ठीक से पच नहीं पाता: वहीं अपनी चिकनाई की वजह से यह आँतों में चिपक भी जाता है, जिससे कब्ज इत्यादि की शिकायत बढ़ जाती है। इसके अलावा इसमें तेल इत्यादि को सोखने की नहुत क्षमता होती है जो खाद्य-पदार्थों को भारी बना देती है जिससे पेट से संबंधित अनेक परेशानियां होने लगती हैं। इसीलिए इसका कम से कम उपयोग करने की सलाह दी जाती है। 

अब रही सूजी की बात ! तो यह जान कर बड़ा आश्चर्य होगा कि सूजी, आटे-मैदे की मंझली बहन है ! वो ऐसे कि गेहूँ को मैदा बनाने के पहले चरण के दौरान उसकी ऊपरी परत हटाई जाती है तो इस प्रक्रिया में वह मोटे टुकड़ों में टूट जाता है। इन टुकड़ों में से भूसी को निकाल कर अलग करने के बाद जो बारीक बचे हुए कण प्राप्त होते हैं, उन्हीं को सूजी के नाम से जाना जाता है। जिनको फिर महीन पीस कर मैदा बनाया जाता है। यानी पहले गेहूं और उसका आटा, फिर सूजी और फिर मैदा ! तो हुई ना सूजी आटे मैदे की  मंझली बहन ! 

तो अगली बार जब भी इन व्यंजनों का लुत्फ़ लेने का मौका मिले तो इनके लाभ-हानि के साथ-साथ इनके आपसी रिश्ते को भी याद कर लें ! 

शनिवार, 15 दिसंबर 2018

ऐसे लोगों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए

यह सब देखने के बाद मैंने कैटरिंग के मालिक की खोज की तो पता चला कि वह घर चला गया है, फ्लोर मैनेजर पर जिम्मेदारी छोड़। मैंने उसी को घेरा, ''इतनी ठंड है पर आपके काम करने वालों के पास उचित कपडे नहीं हैं !'' पहले तो वह चौंका, फिर बोला, ''इनमें ज्यादातर परमानेंट नहीं हैं, काम और जरुरत के अनुसार इन्हें रखा जाता है।'' मैंने कहा, ''वह तो ठीक है, पर वे भी तो इंसान हैं, जैसे ये पोशाकें इन्हें उपलब्ध करवाते हैं, वैसे ही मौसम के अनुसार कपडे दिए जा सकते हैं !'' 
''अब ये तो भैया जी ही कर सकते हैं, मैं क्या बोलूँ !'' 

#हिन्दी_ब्लागिंग     
कल हरियाणा के रेवाड़ी नगर में एक विवाह समारोह में जाने का अवसर मिला। खुले पार्क में भव्य आयोजन था। तरह-तरह की सजावट, बिजली की चकाचौंध, ढेर सारे स्टॉल, छोटे-बड़े-बच्चे-बुजुर्ग सब के लायक भिन्न-भिन्न तरह के ढेरों भोजन-व्यंजनों की व्यवस्था। पर सब खुले में ! जाहिर है दिसंबर का महीना, रात का समय, बढती ओस की मौजूदगी, हल्की सी बयार उस खुले-खुले वातावरण में सिहरन ला दे रही थी। पर भले ही ठंड ज्यादा थी पर उसके बावजूद घराती-बाराती-मेहमान सभी मौसमानुसार शीतकालीन पोशाकों में प्रकृति के इस रूप का भी भरपूर आनंद ले रहे थे। हल्का-फुल्का खुशनुमा माहौल था। पता ही नहीं चला कब घडी की सूई ग्यारह के आंकड़े को पार कर गयी। हमें दिल्ली वापस भी लौटना था। सो उदर-पूर्ती के लिए निर्दिष्ट जगहों की ओर रुख किया ! इसी रुख को इस ब्लॉग पोस्ट का कारण बनना था !

मैं कुछ ज्यादा ही मिष्टान प्रिय इंसान हूँ। इसलिए जहां लोग मुख्य भोजन के बाद जाते हैं मैं उल्टे तौर पर वहीं से शुरु करता हूँ, भले एक-एक चम्मच ही लूँ। शुरुआत में वहां लोग भी कम ही होते हैं ! जैसा कि आजकल आम चलन है, खाना बड़े-बड़े डोंगों में किसी ताप-प्रदत्त यंत्र पर रखा रहता है और उसके साथ ही आपकी सहायता के लिए कैटरर का कर्मचारी एक आकर्षक वेश भूषा में वहां तैनात रहता है। यहां भी वही दस्तूर था। मैंने वहां जा एक चम्मच गाजर के हलुए की फरमाइश की ! वहां तैनात इंसान ने बड़ी शालीनता से मुझे पेश भी किया, तभी मैंने गौर किया कि उसका हाथ काँप रहा है। जानते हुए भी मेरे मुंह से निकल गया, ''ठंड लग रही है ?" उसने हौले से सिर हिलाया और धीरे से कहा, ''हाँ ! सर, ठंड तो है !''  
खाने से मेरा मन कुछ उचट गया और अब पूरा ध्यान विवाह के उल्लासपूर्ण माहौल से हट वहां खातिरदारी करने में जुटे तीस-चालीस लोगों पर जा अटका ! उनकी पोशाक पर गौर किया तो पाया कि कोट नुमा वस्त्र, सूती है और कइयों ने तो सिर्फ बनियान के ऊपर ही पहन रखा है ! जो इस ठंड में बिल्कुल नाकाफी था, खासकर मैदान में घूम-घूम कर सर्व करने वालों के लिए। पर स्टॉल के पीछे खड़े होने वालों की हालत भी खराब ही थी, तंदूर के पास काम करने वालों को छोड़ कर। उसी समय एक और बात दिखी कि तंदूर के पास के स्टॉल के कर्मचारी कुछ-कुछ देर बाद किसी ना किसी बहाने तंदूर के पास 10-20 सेकेंड के लिए जा खड़े होते हैं,  जितनी भी गर्मी मिल जाए !

यह सब देखने के बाद मैंने कैटरिंग के मालिक की खोज की तो पता चला कि वह घर चला गया है। फ्लोर मैनेजर पर जिम्मेदारी छोड़। मैंने उसी को घेरा, ''इतनी ठंड है पर आपके काम करने वालों के पास उचित कपडे नहीं हैं !'' पहले तो वह चौंका, फिर बोला, ''इनमें ज्यादातर परमानेंट नहीं हैं, काम और जरुरत के अनुसार इन्हें रखा जाता है।'' मैंने कहा, ''वह तो ठीक है, पर वे भी तो इंसान हैं, जैसे ये पोशाकें इन्हें उपलब्ध करवाते हैं, वैसे ही मौसम के अनुसार कपडे दिए जा सकते हैं !'' 
''अब ये तो भैया जी ही कर सकते हैं, मैं क्या बोलूँ !'' 

बहरहाल बात यहीं ख़त्म हो गयी, पर कुछ सवाल जरूर छोड़ गयी कि क्या यह भी शोषण नहीं है ? ऐसे ताम-झाम पर तक़रीबन तीस-पैंतीस लाख यानी एक चौथाई करोड़ से भी ऊपर का बिल थमा दिया जाता है, जिसमें कम से कम पच्चीस-तीस प्रतिशत की बचत तो होती ही होगी ! तो क्या उसमें से सिर्फ दस-पंद्रह हजार अपने लिए ही काम कर रहे लोगों पर खर्च नहीं किए जा सकते ? चलिए उतना बड़ा दिल नहीं है तो कम से कम काम के दौरान जरुरत के अनुसार तो कुछ सुविधा दी ही जा सकती है ! ठंड में ढंग की यूनिफार्म तो उपलब्ध करवाई जा ही सकती है ! इससे अपरोक्ष रूप से संस्था को ही फायदा होगा, जब कर्मचारी मन से काम करेगा। यह ठीक है कि काम के बदले वेतन दिया जाता है ! पर किसी मजबूरीवश उसके उपस्थित ना हो पाने पर किसी और की उपलब्धता भी तो सदैव बनी रहती है ! जब सक्षम हैं तो सामाजिकता, मानवता, इंसानियत पर भी तो कुछ ध्यान दिया जाना चाहिए ! 
इसी उहापोह में था की श्रीमती जी की आवाज से तंद्रा लौटी, ''साढ़े ग्यारह बज गए हैं, कुछ लिया कि नहीं ? वापस नहीं जाना है ? पहुंचते-पहुंचते दो बज जाएंगे''     

बुधवार, 12 दिसंबर 2018

''अहम् ब्रह्मास्मि'' होने का वहम

आम इंसान को तो वे अहमकाना नीतियां भी समझ नहीं आतीं जिनमें एक तरफ तो पर्यावरण के नाम पर निजी वाहनों के उपयोग को निरुत्साहित किया जाता है और दूसरी तरफ मेट्रो और बसों के किराए बढ़ा दिए जाते हैं। तो जब इस हार का विश्लेषण हो तो उन अर्थशास्त्रियों, सलाहकारों, विशेषज्ञों को भी जरूर तलब किया जाना चाहिए जो अपने वातानुकूलित कक्ष में बैठ बिना किसी की परेशानी को समझ सिर्फ अपने आकाओं को खुश करने की खातिर किसी भी कीमत पर पेट्रोल-गैस के दाम कम करने के खिलाफ थे। तख्तनशीं लोगों को भी समझ लेना चाहिए कि चुनाव में तेल कंपनियों को खुश करने की बजाय जनता का साथ ज्यादा जरुरी होता है। यदि समय रहते 10-15 रुपये की राहत दे दी गयी होती तो शायद..............!

#हिन्दी_ब्लागिंग  
पांच राज्यों में हुए चुनावों के परिणाम कइयों को अर्श से फर्श और फर्श से अर्श की तरफ ले आए। तरह-तरह के आकलन शुरू हो गए। अपनी कमजोरी को नजरंदाज कर दूसरों पर दोष मढ़े जाने लगे ! जीत पर अपनी ही पीठ थपथपाई जाने लगी ! और उधर हार के कारण गिनाए जाने लगे हैं। पर जरुरत है वास्विकता को समझने की। बातें हो रही हैं पदस्तता के विरुद्ध जनमत की ! सत्ता विरोधी लहर की ! थोपी गयी नीतियों की ! पूरे न किए गए वादों की ! अति आत्मविश्वास की ! सत्ता के गरूर की ! किसानों की अनदेखी की ! मौकापरस्तों की कलाबाजियों की ! पर इनमें ऐसी कौन सी बात है जो पहले कभी नहीं हुई ? किस सत्तारूढ़ दल को यह सब नहीं झेलना पड़ा ? फिर क्यों नहीं सबक लिया गया ? क्यों नहीं समय रहते चिड़ियों से खेत बचाया गया ? क्यों हवा के घोड़े पर सवार नेताओं को रोते-बिलखते-हैरान-निरीह लोग और उनकी परेशानियों, उनकी जद्दो-जहद नजर आनी बंद हो गयी ? जवाब वही पुराना है, सत्ता का नशा ! जिसमें आदमी अपने को ''अहम् ब्रह्मास्मि'' समझने लगता है ! इस हार का भी यही कारण रहा ! 

सच्ची बात तो यह है कि आम आदमी को फौरी तौर पर इससे कोई मतलब नहीं है कि पकिस्तान की करेंसी क्यों रसातल में चली गयी या जापान हमारे करीब क्यों आ गया या अमेरिका हमें क्यों गलबहियां डालने लगा है ! उसे मतलब होता है अपने रोजमर्रा के बढ़ते अनाप-शनाप खर्च से ! जब घर में रसोई गैस ख़त्म हो जाने पर चार सौ के बदले हजार रुपये का इंतजाम करना पड़ता है ! रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं को लेने के फेर में महीने के अंतिम दिन गुजारने मुश्किल हो जाते हैं ! घर के बुजुर्गों-बच्चों की जरूरतों को टालना पड़ता रहता है ! सुबह काम पर निकलते ही गाडी में पेट्रोल डलवाते समय हर बार कुछ ना कुछ ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ते हैं और कीमतें ना घटा पाने के बिना सिर-पैर के बहाने सुनने को मिलते हैं ! उसे तो वे अहमकाना नीतियां भी समझ नहीं आतीं जिनमें एक तरफ तो पर्यावरण के नाम पर निजी वाहनों के उपयोग को निरुत्साहित किया जाता है और दूसरी तरफ मेट्रो और बसों के किराए बढ़ा दिए जाते हैं। तो जब इस हार का विश्लेषण हो तो उन अर्थशास्त्रियों, सलाहकारों, विशेषज्ञों को भी जरूर तलब किया जाना चाहिए जो अपने वातानुकूलित कक्ष में बैठ बिना किसी की परेशानी को समझ सिर्फ अपने आकाओं को खुश करने की खातिर किसी भी कीमत पर पेट्रोल-गैस के दाम कम करने के खिलाफ थे। तख्तनशीं लोगों को भी समझ लेना चाहिए कि चुनाव में तेल कंपनियों को खुश करने की बजाय जनता का साथ ज्यादा जरुरी होता है। यदि समय रहते 10-15 रुपये की राहत दे दी गयी होती तो शायद जनता का आक्रोष कुछ कम किया जा सकता था ! पर उस समय सत्तामद में सिर्फ खजाना ही नजर आ रहा था !

कहते हैं ना कि जैसा राजा वैसी प्रजा, तो आज प्रजा का एक ख़ास तबका भी चुस्त-चालाक हो गया है ! वर्षों के अनुभव से वह भी समझ गया है कि जो सुविधा एक बार उपलब्ध होने लग जाए उसे फिर कोई रोक नहीं सकता, हाँ उससे ज्यादा मिलने की गुंजाइश जरूर हो जाती है। इसीलिए वह सत्ताविहीन दल द्वारा मुफ्त में मिलने वाले  लुभावने प्रस्तावों को लपकने के लिए सदा पाला बदलने के लिए तैयार रहने लगा है ! अब इसे भले ही पदस्तता के विरुद्ध यानी एंटी कम्बंसेंसी का नाम दे दिया जाए। ऐसी खैरातें बांटने में कोई भी दल पीछे नहीं रहता ! पर उसे उस एक बड़े तबके के रोष की खबर नहीं रहती जिसे आम भाषा में मध्यम वर्ग के नाम से जाना जाता है। इस तबके को सदा ही हाशिए पर रखा गया है, ना कभी इसकी जरूरतों पर ध्यान दिया जाता है ना ही उसकी मूलभूत सुविधाओं पर और ना ही उसकी परेशानियों पर ! जबकि यही लोग सरकार के खजाने को भरने में अपना सबसे ज्यादा योगदान देते है ! सरकारों द्वारा दी गयी हर खैरात पर इनकी जेब पर ही सबसे ज्यादा भार बढ़ता है। ना इनका कोई रहनुमा है ना कोई सुनने वाला ! क्योंकि अपनी विशाल आबादी के बावजूद यह आपस में ही बंटा-कटा हुआ है ! 

एक ख़ास बात, मुझ जैसा साधारण सा अराजनैतिक इंसान जिसका किसी भी पार्टी से कोई लेना-देना नहीं है जब उसे कुछ अटपटा लग सकता है तो जानकार-विद्वान लोगों को यह क्यों नहीं समझ आता कि खैरात बाँट कर या मुफ्त में वस्तुएं वितरित कर किसी का भी लम्बे समय तक भला नहीं होता ! ना जनता का और नहीं बांटने वाले का ! दसियों उदहारण हैं इसके। वादा-खिलाफी अविश्वसनीय का लेबल चिपकवा देती है ! कड़वी-अभद्र-बेलगाम जुबान को लोग सिरे से नापसंद करते हैं ! अपनी कमियों-नाकामियों को दूर करने के बजाय दूसरों के अवगुणों को गिनाना जनता को रास नहीं आता। इससे तात्कालिक तौर पर भले ही तालियां बज जाएं पर दूरगामी परिणाम खोटे ही निकलते हैं। धर्म-जाति-भाषा के बिना राजनीती नहीं हो सकती पर इसको माध्यम बना किसी को नीचे दिखाना बहुत मंहगा साबित हो सकता है। आत्मविश्वास एक गुण है पर अति-आत्मविश्वास आत्मघाती ही सिद्ध होता है। 

अब यह सब तो एक आम आदमी का नजरिया है ! माननीय लोग कब समझेंगे क्या पता ? प्रभू सबको सद्बुद्धि प्रदान करें, आमीन  

शनिवार, 8 दिसंबर 2018

एक मंदिर जहां वहीं के राजा का प्रवेश वर्जित है

धीरे-धीरे राजा प्रतापमल्ल को रोज-रोज इतनी दूर मंदिर में आना-जाना अखरने लगा तो उन्होंने नीलकंठ भगवान की एक मूर्ति राजमहल में ही स्थापित करवा ली। इससे भगवान नाराज हो गये और उन्होंने स्वप्न में आ राजा को श्राप दिया कि अब से तुम या तुम्हारा कोई भी उत्तराधिकारी यदि बूढा नीलकंठ हमारे दर्शन करने आएगा तो वह मृत्यु को प्राप्त होगा ! तब से सैकड़ों सालों के बाद आज भी  राजपरिवार का कोई भी सदस्य वहां जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया है.......!

#हिन्दी-ब्लागिंग 

पिछले दिनों हमारे यहां मंदिर  प्रवेश को लेकर काफी गुल-गपाड़ा मचा रहा। जिसमें इसकी-उसके अधिकार की बातें, कोर्ट-कचहरी, धर्म-अधर्म, राजनीती-सियासत सब तरह के रंग सामने आते रहे। ऐसे में एक ऐसे मंदिर की भी बात सामने आई, जहां खुद वहाँ के राजा का भी प्रवेश निषेद्ध है ! जी हाँ ! नेपाल में विष्णु भगवान का एक ऐसा मंदिर है जिसमें वहां के राजा को भी प्रवेश की मनाही है। जिसका कारण राजा खुद ही था !




राजधानी काठमांड़ू से नौ-दस की.मी. की दूरी पर शिवपुरी पहाड़ी के पास बूढ़ा नीलकंठ मंदिर स्थित है। प्रवेश-द्वार के सामने ही विशाल जलकुंड बना  हुआ है। जिसमें शेषनाग के ग्यारह फणों के छत्र वाली शेष शैय्या पर शयन कर रहे भगवान विष्णु की चर्तुभुजी प्रतिमा स्थापित है। प्रतिमा का निर्माण काले पत्थर की एक ही शिला से हुआ है।प्रतिमा की लम्बाई 5 मीटर है एवं जलकुंड की लम्बाई करीब 13 मीटर की है। जिसे बूढा नीलकंठ के नाम से जाना जाता है। मंदिर का नाम नीलकंठ है जो भगवान शिव का एक नाम है। द्वार पर भी श्री कार्तिकेय और गणेश जी की प्रतिमाएं लगी पर यहां मूर्ति भगवान विष्णु जी की है ! तब इसका नाम बूढ़ा नीलकंठ कैसे हो गया ? इसके पीछे जनश्रुति है कि समुद्र-मंथन के समय विषपान करने के पश्चात जब भगवान शिव का कंठ जलने लगा तब उन्होंने विष के प्रभाव शांत करने के लिए जल की आवश्यकता की पूर्ति के लिए एक स्थान पर आकर त्रिशूल का प्रहार किया जिससे एक झील का निर्माण हुआ। मान्यता है कि बूढा नीलकंठ में वहीं से जल आता है, जिसको गोसाईंकुंड के नाम से जाना जाता है। ऐसी मान्यता है कि सावन के महीने में विष्णु प्रतिमा के साथ भगवान शिव के विग्रह का प्रतिबिंब भी जल में दिखाई देता है। 

इसकी स्थापना की किंवदन्ती के अनुसार एक किसान खेत की जुताई कर रहा था तभी उसका हल एक पत्थर से टकराया तो वहां से रक्त निकलने लगा। जब उस भूमि को खोदा गया तो बूढ़ा नीलकंठ की यह प्रतिमा प्राप्त हुई, जिसके पश्चात उसे यथास्थान पर स्थापित कर दिया गया। तभी से नेपाल के निवासी बूढ़ा नीलकंठ का अर्चन-पूजन करते आ रहे हैं। पर एक विचित्र बात जो यहां से जुडी हुई है कि राजा, जो खुद भगवान का प्रतिनिधि होता है, उसी का यहां प्रवेश निषेद्ध है ! वैसे इसका जिम्मेवार राजा खुद ही था। 

बात तक़रीबन 17वीं शताब्दी की है। जब नेपाल के तत्कालीन नरेश राजा प्रतापमल्ल रोज भगवान के दर्शन करने हनुमान ढोका स्थित अपने महल से यहां आया करते थे। पर मतिभ्रम के चलते उन्होंने खुद को ही विष्णु का अवतार घोषित कर दिया। धीरे-धीरे उन्हें रोज इतनी दूर आना-जाना अखरने लगा तो उन्होंने नीलकंठ भगवान की एक मूर्ति राजमहल में ही स्थापित करवा ली। इससे भगवान नाराज हो गये और उन्होंने स्वप्न में आ राजा को श्राप दिया कि अब से तुम या तुम्हारा कोई भी उत्तराधिकारी यदि बूढा नीलकंठ हमारे दर्शन करने आएगा तो वह मृत्यु को प्राप्त होगा। तब से आज तक राजपरिवार का कोई भी सदस्य वहां जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया है।

वैसे भगवान विष्णु के इसी स्वरूप की एक और मूर्ती राजधानी के निकट बालाजू उद्यान में भी स्थित है जो असली मूर्ति से कुछ छोटी है। राजपरिवार के सदस्य यहीं प्रभू के दर्शन करने जाते हैं। नवम्बर माह में मुख्य मंदिर के साथ ही देव उठनी एकादशी को यहां भी बड़ा भारी मेला लगता है, दूर-दूर से लोग अपनी मनौतियां ले कर आते हैं। इस मंदिर की भी काफी मान्यता है।

विशिष्ट पोस्ट

रीयल आइस मैन ऑफ इंडिया

भीड़ में जिस शख्स का कद सबसे बड़ा था, पता चला वह शख्स किसी और के कांधे पर खड़ा था 😡 लद्दाख ! जहां लोगों की मुख्य आजीविका खेती है, वहां पानी...