इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
मंगलवार, 19 मई 2009
बंगाल के सुंदरवन में दहशत में इंसानी जिन्दगी
संसार में बंगाल का सुंदरवन ही शायद अकेली जगह है, जहाँ शेर लगातार आदमी का शिकार करते रहतें हैं। वहाँ के लोग किन परस्थितियों में जी रहे हैं इसका रत्ती भर अंदाज भी बाहर की दुनिया को नही है। वातानुकूलित कमरों में बैठ कर बंदरों-भालुओं को बचाने की बातें करने वाले तथाकथित पशु संरक्षकों से गुजारिश है कि कभी समय निकाल कर इंसान की जद्दोजहद की ओर भी ध्यान देने का कष्ट करें। वे पायेंगे कि कहीं-कहीं जानवर ही नहीं आदमी को भी बचाने की जरूरत है कुछ दिन पहले सुंदरवन के एक सुदूर गाँव का निवासी फटिक हालदार मछली पकड़ने अपने दो साथियों के साथ नदी पर गया था। फटिक तो पानी में उतर गया जबकि उसके दोनों साथी, बापी और दिलीप, नाव में उसकी सहायता के लिए रह गए। अभी फटिक ने जाल फेंका ही था कि पीछे से शेर ने उस पर धावा बोल दिया। फटिक तो शेर को देख भी ना पाया, परन्तु उसके दोनों साथी शेर की झलक पाते ही बेहोश हो नाव में गिर पड़े। शेर ने फटिक का कंधा अपने जबड़ों में ले झिन्झोड़ना शुरू कर दिया। पहले तो फटिक होशोहवाश खो बैठा, उसके पैर पानी में कीचड में धसे हुए थे , सर पर शेर सवार था, साथी बेहोश पड़े थे। फिर भी उसने हिम्मत नहीं हारी। उसे अपने पिता कि याद आयी जो इसी तरह शेर का शिकार हो गया था, उसे अपने बच्चों की याद आयी जो घर पर उसकी राह देख रहे थे। उसने अपने पैरों को मजबूती के साथ कीचड में गड़ाया और शेर के गले को अपनी बाँहों में कस कर पकड़ लिया। पानी में होने के कारण शेर भी फटिक पर काबू नहीं पा रहा था। फटिक के अनुसार उसके कन्धों में शेर के नुकीले दांत भाले की तरह घुसे हुए थे और वह पूरा मांस खींच लेना चाहता था। इसी बीच मैंने अपने घुटनों से उसके पेट पर वार किया और उसके मुहँ पर, चीखते हुए, एक जोरदार प्रहार किया। पता नहीं क्या हुआ भगवान् की दया से शेर मुझे छोड़ कर भाग गया और मैं पानी में गिर पडा पर मैं जानता था कि यदि मैं बेहोश हो गया तो मैं मर जाऊँगा सो मैंने किसी तरह नाव मे चढ़ कर अपने साथियों को होश दिलाया, फिर क्या हुआ मुझे नहीं पता। इसके बाद नाव में चार घंटों के सफर के बाद वे तीनो किसी तरह अपने गाँव पहुंचे । वहाँ से फटिक को एक घंटे की यात्रा के बाद जामत्तल्ला कस्बे की डिस्पेंन्सरी मे पहुंचाया गया जहाँ प्राथमिक चिकित्सा देने के बाद उसे कोलकत्ता भेजा गया। वहाँ डॉक्टरों के अथक प्रयास से फटिक की जान बच पाई । पर फटिक ने अपना पुस्तैनी धधा बंद करने का फैसला कर लिया है। वह नहीं चाहता कि ऐसे किसी हादसे मे उसकी जान चली जाने पर उसके परिवार को भूखा रहना पड़े।
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3 टिप्पणियां:
फटिक साहसी था। लेकिन शेर को और अन्य जानवरों को कहीं तो रहने देना पड़ेगा। मनुष्य को कुछ तो इलाके उन के लिए छोड़ने पड़ेंगे।
द्विवेदी जी से हम सहमत हैं.
"वहाँ डॉक्टरों के अथक प्रयास से फटिक की जान बच पाई ।"
यहअच्छा रहा।
पर फटिक ने अपना पुस्तैनी धधा बंद करने का फैसला कर लिया है।
यह सुन कर दुख हुआ।
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