शनिवार, 16 जून 2018

काहे को "रेस" लगाई

फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी है इसका डायरेक्शन, जिसे पता नहीं किसने, क्यों और क्या देख कर अब्बास-मस्तान जैसे सक्षम निर्देशकों को हटा कर, रमेश गोपी नायर यानी  #रेमो_डिसूजा को सौंप दिया। जिन्हें शुरू से लेकर अंत तक यही समझ में नहीं आया कि कहानी, उसके पात्रों और खासकर सलमान को कैसे और किस तरह पेश किया जाए ! इसीलिए कभी उसे बैट मैन, कभी रैंबो, कभी कमांडो और कभी जेम्स बॉन्ड की तरह दिखाने की नाकाम कोशिश करते रहे ! लब्बो-लुबाब यह है कि सलमान का "हार्ड कोर समर्थक" भी भले ही ऊपर से कुछ न बोले पर दिल ही दिल में जरूर कहेगा "भाई ये रेस क्यों लगाई".........!
#हिन्दी_ब्लागिंग   
कभी-कभी परिस्थितिवश कुछ ऐसा हो जाता है जो करने की जरा भी इच्छा न हो ! ऐसा ही पिछले शुक्रवार को हुआ जब सलमान की "रेस 3" देखने का मौका बना। समय काटने की मजबूरी और बाहर बेतहाशा गर्मी ना पड़ रही होती तो मैं बीच में ही फिल्म छोड़ उठ आया होता। ऐसी बिना सिर-पैर की लचर फिल्म इसके पहले कब देखी याद नहीं पड़ता। फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी है इसका डायरेक्शन, जिसे पता नहीं किसने, क्यों और
क्या देख कर अब्बास-मस्तान जैसे सक्षम निर्देशकों को हटा कर, रमेश गोपी नायर यानी #रेमो_डिसूजा को सौंप दिया। जिन्हें शुरू से लेकर अंत तक यही समझ में नहीं आया कि कहानी, उसके पात्रों और खासकर सलमान  को कैसे पेश किया जाए ! इसीलिए कभी उसे बैट मैन, कभी रैंबो, कभी कमांडो और कभी जेम्स बॉन्ड की तरह दिखाने की नाकाम कोशिश करते रहे।  बाकी संभालने के चक्कर में भी कभी कोई किसी का भाई बन जाता है या स्पाई, कभी बाप कभी दुश्मन, कभी रकीब। एक डायलॉग से या एक ठूंसे हुए सीन से पहले से ही लचर कहानी और भी हिचकोले खाती रहती है।  रेमो किसी भी चीज को ढंग से  "हैंडल"  नहीं कर पाए, सिवाय नाच-गाने के दृश्यों के, जो उनका वास्तविक काम है। पर वे भी म्यूजिक विडिओ की तरह लगते हैं। इसीलिए कहा गया है कि जिसका काज उसी को साजे, नहीं तो ..............! पर देखा जाए तो पूरा दोष उनका भी नहीं है, तथाकथित कहानी में ही इतना झोल है कि वह पौने तीन घंटे खुद तो झूलती ही है दर्शकों को भी झूला बना डालती है ! जिसने भी लिखने की हिमाकत की है, वह खुद ही इतना कंफ्यूजियाया हुआ है कि क्या लिखूं क्या ना समझ ही नहीं पा रहा ! इसीलिए वह कभी अवैध हथियारों की फैक्टरी डालता है; तो कभी ड्रग्स की शरण में जाता है; और यहां भी चैन नहीं मिलता तो नेताओं की चरित्र हीनता की चाशनी में कथा को लपेटने की बेमतलब चेष्टा करता है जिससे एक बेमजा, बेस्वाद, गरिष्ट सी डिश बन जाती है जो किसी को भी हजम नहीं होती !
   
जैसा कि सलमानी फिल्मों में होता है यह भी पूरी तरह उन्हीं के कंधों पर लदी हुई है। उनके आभामंडल से
आतंकित रेमो कभी उन्हें हजार फीट की मीनार पर खड़ा करवा देते हैं तो कभी "विंगसूट" पहना उड़वा देते हैं और तो और एक कार को उड़ाने में जहां बाकी फिल्मों में पिस्तौल की एक गोली काफी होती है उसके लिए रेमो जी चार बैरल को रॉकेट लांचर, बजूका, थमा देते हैं हीरो को, वह भी उसके उपयोग के गलत तरीके के साथ ! कारों के टकराव-धमाके-विस्फोट-आग-धूँआ सब रोहित शेट्टी की याद दिलाता है। लंबे समय के बाद वापसी कर रहे बॉबी को देखना अच्छा तो लगा
पर फिल्म का हश्र उसके लिए क्या तोहफा लाएगा यह तो वक्त की बात है। वैसे तो इस फिल्म में वह सब कुछ है जो इस तरह की फिल्मों में होता है, भव्य सेट, कार रेस, एक्शन, आगजनी, कैट-फाइट, धूम-धड़ाका, नायकों के वैसलीन पुते, उघडे तन-बदन की स्लो मोशन में लंबी-लंबी झड़पें ! पर नहीं है तो किसी भी चीज पर निर्देशक की पकड़। 
एक बात और समझ के बाहर है कि फिल्म जगत से वर्षों से जुड़े हुए, समझदार, उसकी बारीकियों को जानने वाले, इस विधा का ज्ञान रखने वाले #सलीम_खान ने क्या इस बेतुकी, लचर, उबाऊ फिल्म को प्रोड्यूस करने के पहले कोई सलाह या मशविरा  नहीं दिया ?  लब्बो-लुआब यह है कि सलमान का "हार्ड कोर समर्थक" भी भले ही ऊपर से कुछ न बोले पर दिल ही दिल में जरूर कहेगा "भाई ये रेस क्यों लगाई" !

गुरुवार, 14 जून 2018

सौंदर्य प्रसाधनों में "केसर" के उपयोग का छलावा

जिस तरह चाय की अलग-अलग कीमतें निर्धारित की जाती हैं उसकी विशेषता व गुणवत्ता को लेकर, वैसे ही केसर का मुल्यांकन भी होता है। अलग-अलग जगहों पर उपजने वाले केसर की कीमतों में भी फर्क होता है। फिर उसके संस्करण के दौरान बहुत कुछ बाहर आता रहता है जैसे बची हुई फूल की पत्तियां, चूरा, डस्ट, छोटी या टूटी हुई कलियाँ इत्यादि, कहलाता तो वह सब भी केसर ही है। पर उन सब की कीमतों में जमीन-आसमान का फर्क होता है......!
#हिन्दी_ब्लागिंग
एक पुराना चुटकुला है, जीटी रोड के एक ढाबे के बाहर लिखा हुआ था, यहां कद्दू और अंगूर की सब्जी मिलती है। एक पर्यटक इसे पढ़ वहाँ खाने गया पर उसे सब्जी में कुछ विशेष नहीं लगा, तो उसने ढाबे वाले को बुलाया और पूछा कि क्या सचमुच यह अंगूर और कद्दू की सब्जी है ? तो ढाबे के मालिक ने कहा, हां जी। पर्यटक ने कहा, पर मुझे तो सिर्फ कद्दू का स्वाद ही आया है, कितने अंगूर डालते हो ? जी ! पचास प्रतिशत, बराबर-बराबर, एक कद्दू और एक अंगूर ! ढाबे वाले ने जवाब दिया।     
यह इसलिए याद आया क्योंकि कई दिनों से घर में आ रहे पतंजलि के एलोवेरा जेल की ट्यूब पर उसमें मिश्रित सामग्री के रूप में केसर और चंदन के भी होने की बात लिखे होने से कौतुहल तो होता था कि केसर जैसी चीज जिसके कुछ ग्राम की कीमत ही हजारों रूपए है, उसका उपयोग व्यावसायिक दृष्टि से कैसे 70-80 रूपए के उत्पाद में किया जा सकता है ! पर जैसी की हमारे जैसे अधिकाँश लोगों की आदत है कि लिखी बात पर विश्वास कर लेते हैं, आँख मूँद कर ! सो मान लेते रहे कि 'बाबाजी' कह रहे हैं, तो होगा ही, और बात आई-गयी हो जाती थी। पर कल जब एक ट्यूब सामने दिखी तो रहा नहीं गया और छीछालेदर करने पर जो बात सामने आई..... वह यह रही !

इसकी 60 ml की ट्यूब के ऊपर लिखा हुआ है "सौंदर्य एलोवेरा जेल, केसर-चंदन" यानी एलोवेरा के साथ केसर और चंदन मिलाया हुआ है ! दुविधा यह थी कि केसर, जिसके कुछ ग्राम की कीमत ही हजारों रूपए में है उसका उपयोग व्यावसायिक दृष्टि से कैसे 70-80 रूपए के उत्पाद में किया जा सकता है ! फिर ट्यूब पर छपी मिश्रित सामग्री पर नजर डाली, जिसकी 'महीनताई' के कारण नंगी आँखों से पढ़ना, आँखों पर जुल्म ढाने के समान था, जो दिखा उससे वही कद्दू और अंगूर का अनुपात यहाँ भी मिला। वह भी भ्रामक और आधा-अधूरा ! यहाँ अंकित था, घृतकुमारी Aloe barbadensia 89%,  केसर  Crocus sativus 0.01%, सफ़ेद चंदन  Santalum album 0.10% । कुल 89.11%। बाकि क्या है उसकी जानकारी नहीं दी गयी है। अब 60 ml में 0.01%,.....? मेरा तो ना मैथ, ना ही दिमाग समझ पा रहा इस प्रतिशत को ! कितने लोग देखते हैं अपने द्वारा खरीदे गए सामान पर छपी मिश्रित सामग्री यानी "ingredients" की सूचि और उसके प्रतिशत को ? आज इसे देख नाहीं यह समझ में आ रहा कि यह मेल क्या गजब ढाएगा उपभोक्ता के सौंदर्य को बढ़ाने में ! इसके साथ ही यह आकलन भी नहीं हो पा रहा कि केसर के नाम पर यह छल है या धोखा ?

एक और बात, जिस तरह चाय की अलग-अलग कीमतें निर्धारित की जाती हैं उसकी विशेषता व गुणवत्ता को लेकर, वैसे ही केसर का मुल्यांकन भी होता है। अलग-अलग जगहों पर उपजने वाले केसर की कीमतों में भी फर्क होता है। फिर उसके संस्करण के दौरान कई कुछ बाहर आता रहता है जैसे बची हुई फूल की पत्तियां, चूरा, डस्ट, छोटी या टूटी हुई कलियाँ इत्यादि, हालांकि कहलाता तो वह सब भी केसर ही है। पर उन सब की कीमतों में जमीन-आसमान का फर्क होता है ठीक चाय की पत्तियों की तरह। अब इन सब प्रसाधनों में क्या मिलाया जाता है यह तो भगवान ही जाने या ये मिलाने वाले ! यह तो अब सुंदर और सुंदर दिखने की चाह में कुछ भी खरीद लेने वालों के विवेक पर निर्भर करता है कि वे इस तरह के लोक-लुभावने इश्तिहारों से कैसे बच कर अपनी गाढ़ी कमाई की पूँजी को बचाते हैं !

शुक्रवार, 8 जून 2018

"लिक्विड सोप" से बेहतर है, साबुन का "बार या बट्टी"

देखने में "लिक्विड सोप" अच्छा, साफ़-सुथरा, रख-रखाव की सुविधा और आधुनिकता का प्रतीक भले ही हो पर पुराना साबुन का "बार या बट्टी" उससे बेहतर है। खपत को ही लें, साबुन की बट्टी से हाथ धोते हुए मात्र 0.35 ग्राम साबुन की जरुरत पड़ती है, वहीँ लिक्विड सोप की खपत एक बार में दो से तीन ग्राम की होती है, जो आम साबुन से करीब दस गुना ज्यादा है ! पर बाजार तो यही चाहता है कि खपत ज्यादा हो और उसके उत्पाद की बिक्री बढे.......... !
#हिन्दी_ब्लागिंग 
हम कैसे विज्ञापनों से भ्रमित हो जाते हैं इसका अभी एक और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है। पिछले कुछ वर्षों से विज्ञापन के हर संभव माध्यम से यह प्रचारित होता आ रहा है कि साबुन की "बट्टी या बार" सफाई के लिए उचित नहीं है ! टीवी पर  बच्चों के द्वारा साबुन से हाथ धोते हुए "अंकलों" को बेवकूफ साबित करते,     
आधुनिक माँओं द्वारा अपने पति और बच्चों को लिक्विड सोप का महत्व बताते, सफ़ेद कोट वाले भाई साहब द्वारा सफाई की अहमियत जताते, स्कुल के बच्चों का आपस में बार साबुन को स्लो ठहराते, ढेरों विज्ञापन हमारे ऊपर दागे जा रहे हैं। अपने-अपने ब्रांड के तरल साबुन के घोल की प्रशंसा कर उसे साफ़ व सुरक्षित बताया जा रहा है। साबुन की बेचारी बट्टी को तो कीटाणुओं की पनाहगार तक बना दिया गया है। गोयाकि कीड़े मारने की दवा में ही कीड़े पड़ जाने की बात ! इस बम-वर्षा से प्रभावित हो बहुसंख्यक परिवारों ने विभिन्न कंपनियों के "लिक्विड सोप" खरीदना शुरू कर दिया, उसमें भी उन ब्रांडों की बिक्री का प्रतिशत ज्यादा रहा जो पहले से ही कीट-रोधी सोल्यूशन बनाते रहे हैं। या यूँ भी कह सकते है कि ऐसी ही कंपनियों ने शुरुआत कर सफाई बाजार पर कब्जा कर लिया है। 

अब यह बात सामने आ रही है कि देखने में "लिक्विड सोप" अच्छा, साफ़-सुथरा , रख-रखाव की सुविधा और आधुनिकता का प्रतीक भले ही है पर पुराना साबुन का "बार या बट्टी" उससे बेहतर है। खपत को ही लें, साबुन की बट्टी से हाथ धोते हुए मात्र 0.35 ग्राम साबुन लगता है वहीँ लिक्विड की खपत दो से तीन ग्राम की होती है, जो आम साबुन से करीब दस गुना ज्यादा है ! पर बाजार तो यही चाहता है कि खपत ज्यादा हो और उसके उत्पाद की बिक्री बढे ! दूसरे, यह बात भी शोधों से साबित हो चुकी है कि बार-बार खुले साबुन के 'बार' को उपयोग में लाने पर उस पर कीटाणु जमा हो जाने वाली बात, पूरी तरह निराधार है और सिर्फ बोतल बंद तरल साबुन की बिक्री बढ़ाने के लिए फैलाई गयी है।  वह हर तरह, हर लिहाज से सुरक्षित ही होता है। तीसरी अहम बात, साबुन की बट्टी अभी भी जिस कागज में लिपटी आती है वह वातावरण को नुक्सान नहीं पहुंचाता और तुरंत ही नष्ट हो जाता है पर लिक्विड सोप की लाखों-करोड़ों प्लास्टिक की बोतलें पर्यावरण का क्या हाल करती हैं उसका सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है। 

इस तरह देखें तो आधुनिक लिक्विड सोप अस्पतालों या भीड़-भाड़ वाली जगहों के लिए भले ही उपयुक्त हों पर पुराने चलन के साबुन हमारी जेब और प्रकृति के ज्यादा अनुकूल हैं। तो अगली बार आप विज्ञापनों को दर-किनार कर क्या अपनी जेब और प्रकृति का ख्याल रखेंगे ?

सोमवार, 4 जून 2018

पानी, प्लास्टिक, पर्यावरण ! सिर्फ डराइये या सुझाइये ही नहीं, कुछ कर के भी दिखाइए -

बहस में भाग लेने वाले "उस्ताद लोगों" के पास कोई ठोस उपाय नहीं होते; वह वहाँ बैठे ही होते है अपनी विद्वता के प्रदर्शन, दूसरों को उपदेश या उनकी आलोचना करने के लिए ! उनसे कोई पूछने वाला नहीं होता कि जनाब आपने इस मुसीबत से पार पाने के लिए निजी तौर पर क्या किया है ? क्या आपने अपने लॉन-बागीचे की सिंचाई में कुछ कटौती की है ? क्या आप शॉवर से नहाते हैं या बाल्टी से ? आपके 'पेट्स' की साफ़-सफाई में कितना पानी जाया किया जाता है ? क्या आपके घर के A.C. या T.V. के चलने का समय कुछ कम किया गया  है ? आपके घर से निकलने वाले कूड़े में कितनी कमी आई है ? क्या आप या आपके सेवक बाजार से सामान लाने के लिए जाते समय घर से थैला ले कर जाते हैं ? क्या आप अपनी गाडी को छोड़ कभी पब्लिक वाहन का उपयोग करते हैं ? क्या जब आप यहां  आए तो संयोजक से A.C. बंद कर पंखे की हवा में ही बात करने की सलाह दी ?
#हिन्दी_ब्लागिंग
याद आती है, अस्सी के दशक के अंत और नब्बे के शरुआत की: गर्मियों की छुट्टियों में जब बच्चों का रायपुर से दिल्ली आना होता था तो रास्ते के अधिकाँश स्टेशनों पर रेलवे के नल सूखे पड़े होते थे ! उन दिनों दिल्ली के लिए दो ही गाड़ियां हुआ करती थीं, छत्तीगढ़ एक्स. और समता। जाहिर है बेतहाशा गर्मी और बेहिसाब भीड़ के कारण यात्रा बहुत ही दुखदायी हुआ करती थी। उस पर रास्ते के लगभग सभी स्टेशनों पर रेलवे के पानी के नल सूखे पड़े होते थे। यह एक सोची-समझी, व्यापारियों और रेलवे के कुछ कर्मचारियों की मिली भगत से अंजाम दी गयी निकृष्ट हरकत होती थी। यात्रियों को मजबूरन कोक या घटिया, हानिकारक "कोल्ड ड्रिंक" के नाम से बिकने वाला रंगीन पानी अच्छी-खासी कीमत अदा कर खरीदना पड़ता था। यह बात इसलिए याद आ रही है क्योंकि आम अवाम को बेवकूफ बनाने के लिए बाजार सदा ही तत्पर रहता है। उसके लिए वह हर तरह का कपट-छल-छिद्र अपनाने से नहीं चूकता। हालांकि आज उपभोक्ता बहुत हद तक जागरूक हो चुका है पर बाजार की ताकतें उससे सदा ही दो कदम आगे रहने की तिकड़म भिड़ा लेती हैं। इसमें कुछ हद तक 'माननीयों' का भी हाथ होने से इंकार नहीं किया जा सकता।
 

कमो-बेश उपरिलिखित जैसे कुछ हालात आज भी नजर आ रहे हैं; पेय जल की तंगी के साथ ही बोतल बंद जल की मांग बेतहाशा बढ़ती ही जा रही है। क्या यह भी कोई विदेशी षडयंत्र ही तो नहीं ? वैसे तो आज सारी दुनिया तेजी से पीने के पानी की घटती उपलब्धता को लेकर चिंतित है। हमारा देश भी  कोई अपवाद नहीं है इस मामले में ! पर ऐसा क्यूँ कि पानी बचाने, उस का कम उपयोग करने, उसका संरक्षण करने की जिम्मेदारी आम इंसान और उसमें भी सिर्फ मध्यम वर्ग पर ही थोप दी गयी है ? क्यों उसे ही नैतिकता का पाठ पढ़ाया जाता है,  क्यों उसे ही नसीहत दी जाती है ? क्यों उसे ही भाषण पिलाए जाते हैं ? ठीक है, समाज के इस वर्ग की संख्या अपार है उसके संभलने से बहुत कुछ संभल सकता है ! पर क्या हमारे देश के कर्णधारों, उच्चवर्ग या निम्न वर्ग के वाशिंदों की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती ? क्यों वहां सैकड़ों एकड़ लॉनों की सिंचाई, असंख्य गाड़ियों की धुलाई या फिर लाखों बस्तियों में बिना टोंटी के नलों से पानी की बहाई पर रोक नहीं लगती ? क्यों सुबह लोगों को पानी की महत्ता पर भाषण झाड़ने वाले महानुभाव शाम को लाखों गैलन पानी की बर्बादी की कीमत पर होने वाले क्रिकेट के "तमाशे" में जा तालियां बजाने लगते हैं ? क्यों इस पर ध्यान नहीं दिया जाता कि जैसे-जैसे पीने के पानी पर हव्वा खड़ा किया जा रहा है वैसे-वैसे बोतल-बंद तथाकथित मिनरल जल की बिक्री बढ़ती जा रही है ? क्या यह भी कोई विदेशी साजिश है कि इस बार "कोल्ड ड्रिंक" ना सही पानी ही या फिर उसको साफ़ करने की मशीन खरीदनी पड़ रही है उनकी ? मशीन भी कैसी जो पानी की सफाई के दौरान करीब उतना ही पानी बर्बाद कर देती हो ! इसके अलावा यह भी सच है कि वर्षों से जिस ख़ास तरह की मशीन को लेने की सिफारिश हमारी एक जानी-मानी माननीय महोदया कर रही हैं, वह हर जगह के पानी के लिए जरूरी नहीं है और उससे बेशुमार पानी का अपव्यय भी होता है पर यहां कोई नैतिकता काम नहीं करती !

आज कोई भी पत्र-पत्रिका, चैनल, अखबार देख लीजिए सब में भविष्य के पर्यावरण का डरावना रूप ही दिखाया बताया जाता है ! चाहे हवा की बात हो, मौसम की बात हो या पानी की सब जगह नकारात्मक बातें की जाती हैं। वहाँ बैठे "उस्ताद लोगों" के पास कोई ठोस उपाय नहीं होते; वह वहाँ बैठे ही होते है दूसरों की या सरकार की आलोचना करने के लिए ! वे सिर्फ समय बताते हैं कि इतने सालों बाद यह हो जाएगा, उतने वर्षों बाद वैसा हो जाएगा; ऐसा करना चाहिए, हमें वैसा करना होगा, इत्यादि,इत्यादि। उनसे कोई पूछने वाला नहीं होता कि जनाब आपने इस मुसीबत से पार पाने के लिए क्या-क्या किया है ? क्या आपने अपने लॉन-बागीचे की सिंचाई के लिए कुछ कटौती की है ? आप के घर से नकलने वाले कूड़े में कितनी कमी आई है ? क्या आप शॉवर से नहाते हैं या बाल्टी से ? आपके 'पेट्स' की साफ़-सफाई में कितना पानी जाया किया जाता है ?  क्या आपके घर के AC या TV के चलने का समय कुछ कम हुआ है ? क्या आप यहां जब आए तो संयोजक से AC बंद कर पंखे की हवा में ही बात करने की सलाह दी ? क्या आप कभी पब्लिक वाहन का उपयोग करते हैं ? कोई पूछेगा भी नहीं क्योंकि यह सब तो मध्यम वर्ग का जिम्मा है ! उसी से उम्मीद की जाती है कि वह सब्सिडी छोड़ दे, इसी वर्ग के बुजुर्गों से गुजारिश की जाती है कि अपने मिलने वाले किराए की छूट को न लें ! समाज के इसी हिस्से के युवाओं को हतोत्साहित किया जाता है सक्षम होने के बावजूद ! इसी वर्ग पर हर तरह के टैक्सों को थोपा जाता है और इसी वर्ग से ही अपेक्षा की जाती है देश सेवा की !!

हर तरफ से उपेक्षित यह वर्ग अभी तो सब चुपचाप सहता जा रहा है: पर कब तक ? जिस दिन इसने सवाल पूछने शुरू कर दिए उस दिन अच्छे-अच्छों की बोलती बंद हो जाएगी !   

बुधवार, 30 मई 2018

कोलकाता का एक रेल स्टेशन, नाम है उल्टा डांगा !

इस नाम के पड़ने की वजह का कारण खोजने पर पता चला कि किसी समय यहां मछली पकड़ने में उपयोग होने वाली "डिंगा" यानी नौकाओं की मरम्मत की जाती थी। जिसके लिए उन्हें उल्टा कर उनके पेंदे के बाहरी हिस्से में कोलतार लगा सूखने के लिए छोड़ दिया जाता था। फिर उनको दुरुस्त कर काम लायक बनाया जाता था। इसलिए उस इलाके में 1970 के दशक तक सैंकड़ों डींगियाँ या डोंगियां उल्टी पड़ी रहती थीं, इसीलिए इस इलाके का नाम उल्टो डिंगा पड़ गया था जो समय के साथ उल्टो डांगा और फिर हिंदी में उल्टा डांगा हो गया। कुछ सालों पहले तक रात को लोग इधर आने से झिझकते थे, पर आज यह शहर के व्यस्ततम और समृद्ध इलाकों में से एक है ...............!!
#हिन्दी_ब्लागिंग
आज अखबार में किसी खबर के साथ एक अनोखा नाम जुड़ा देख बहुत कुछ पुराना याद आ गया।  जिंदगी का एक बड़ा भाग बंगाल में बीतने के कारण आज कई ऐसे नाम जेहन में आने लगे जिनसे रोज ही आमना-सामना हुआ करता था पर वे अजीब नहीं लगे थे कभी ! शायद रोज-रोज देखते सुनते आदत सी पड़ गयी थी।  चूँकि वर्षों स्कूल-कालेज फिर रोजगार के लिए लोकल ट्रेन ने अजीबो-गरीब स्टेशनों से परिचित करवाया सो उन्हीं का बखान पहले। अब तो भीड़-भाड़ बढ़ने से रेलवे ने और महानगरों की तरह कई जगहों से गाड़ियां चलाना शुरू कर दिया है पर तब के कलकत्ता के दो प्रमुख स्टेशन हुआ करते थे; पहला - हावड़ा; दुसरा - सियालदह। अब जब मुखियों के नाम ही ऐसे थे तो उनके पारिवारिक सदस्यों के नाम तो अजीब होने ही थे, लिलुआ, बेलूर, बाली, दमदम, बेलघरिया, खरदा इत्यादि, जो आज तक वैसे ही चले आ रहे हैं।

ऐसा ही एक स्टेशन है "उल्टाडांगा जंक्शन" जो उत्तरी चौबीस परगना या बैरकपुर की तरफ जाने पर सियालदह के बाद पहला स्टेशन है, अब इसका नाम बदल कर विधान नगर रोड हो जाने के बावजूद यह पुराने नाम से ही ज्यादा जाना जाता है। उस समय यह नाम कभी अजीब नहीं लगा था पर अब ध्यान देने पर विचित्र लगता है ! आज यह कोलकाता के सबसे भीड़-भाड़ वाली जगहों में से एक है। इसका स्टेशन सड़क से करीब तीस फीट ऊपर है और इसके पास नीचे से कोलकाता की सर्कुलर रेल गुजरती है इसीलिए यह जंक्शन कहलाता है।  यह शहर के उत्तर-पूर्वी इलाके में, साल्ट-लेक के पास स्थित है।
स्टेशन का विहंगम दृश्य, पीछे साल्ट लेक का इलाका  

प्लेटफार्म 

उल्टा डांगा जैसे नाम के पड़ने की वजह का कारण खोजने पर पता चला कि किसी समय यहां मछली पकड़ने में उपयोग होने वाली "डिंगा" यानी नौकाओं की मरम्मत की जाती थी। जिसके लिए उन्हें उल्टा कर उनके पेंदे के बाहरी हिस्से में कोलतार लगा सूखने के लिए छोड़ दिया जाता था। फिर उनको दुरुस्त कर काम लायक बनाया जाता था। इसलिए उस इलाके में 1970 के दशक तक सैंकड़ों डींगियाँ या डोंगियां उल्टी पड़ी रहती थीं, इसीलिए इस इलाके का नाम उल्टो डिंगा पड़ गया था जो समय के साथ उल्टो डांगा और फिर हिंदी में उल्टा डांगा हो गया। अब तो यह कोलकाता के समृद्ध इलाकों में से एक है हालांकि अब इसका नाम बदल  कर विधान नगर रोड कर दिया गया है पर यह अभी भी अपने पुराने नाम से ही ज्यादा जाना जाता है। पहले यहां इक्का-दुक्का लोकल गाड़ियां ही रुका करती थीं पर अब लोग इसका इस्तमाल मुख्य स्टेशन सियालदह से भी ज्यादा करने लगे हैं क्योंकि अब यहां से कोलकाता के किसी भी भाग में जाना ज्यादा सुविधाजनक हो गया है बनिस्पत मुख्य स्टेशन के। 

उल्टा डांगा कोई अपने आप में इकलौता अनोखा नाम नहीं है, यदि आप देश के विभिन्न भागों में घूमने-फिरने निकलें, चाहे रेल से या सड़क मार्ग से और आप उत्सुकता से राह में आने वाली जगहों को देख रहे हों तो रास्ते में आपको ऐसे-ऐसे नाम देखने-पढ़ने को मिलेंगे कि आप हैरत में पड़ जाएंगे कि यह कैसा नाम है  हम में से ज्यादातर लोग सफर करते हुए ऐसे नाम पढते हैं, चौंकते हैं और मुस्कुरा कर आगे बढ़ जाते है। 







देश भर में हजारों-लाखों ऐसे विचित्र नाम हैं, जगहों के, कि बाहरी इंसान इन्हें पहली बार देख-सुन कर सोचता ही रह जाता है कि ऐसा क्यों ? ऐसे नामों में इंसानी रिश्तों के अलावा जानवरों के नाम तक का उपयोग किया हुआ मिलता है। जैसे भैंसा गांव, गुड़ गांव, काला बकरा, बिल्ली जंक्शन, कुत्ता, दीवाना, छाता, लूला नगर, सिंगापूर, झंझारपुर, लिलुआ, बेलूर, रिसरा, बैंडल, बाप, साली, नाना, जेठानी  इत्यादि, इत्यादि, इत्यादि। यदि ऐसे नामों की लिस्ट बनाई जाए तो पता नहीं कितने पन्नों का ग्रंथ बन कर तैयार हो जाए ! कुछ नाम तो ऐसे भदेस हैं जिनको लिस्ट में संकोचवश शामिल भी नहीं किया जा सकता। पता नहीं वहाँ के लोग ऐसे नामों को बदलवाने की चेष्टा क्यों नहीं  करते हैं ?


ऐसा नहीं है कि ऐसे नाम बड़े शहरों से दूर-दराज इलाकों में ही हों ! आप अपने शहर या इलाके में भी खोजेंगे तो आप को दसियों ऐसे नाम मिल जाएंगे, पर फर्क यही है कि रोज-रोज उनसे दो-चार होते रहने के कारण वे हमें अजीब से नहीं लगते, हमें उनकी आदत पड़ जाती है।
ऐसे ही किसी अनोखे और मशहूर नाम के साथ फिर कभी.......... !       

गुरुवार, 24 मई 2018

एक निष्पक्ष नजरिया, 2019 का

आज देश में दो ही ऐसी राजनितिक पार्टियां हैं जिनका कुछ न कुछ आधार पूरे देश में है। इनमें भी पहले नंबर पर कांग्रेस है, जिसके समर्पित कार्यकर्त्ता देश के कोने-कोने में आस्था की अलख जगाए बैठे हैं। पर उसके अदूरदर्शी नेता इसका फायदा न उठा सिर्फ मोदी के पीछे पड़े हुए हैं ठीक उसी तरह जैसे इंदिरा जी को हराने के लिए विपक्ष ने जान लगा दी थी। पर इंदिरा जी ने पलट कर उनकी भाषा में जवाब देने के बदले काम पर ध्यान दिया; नतीजा क्या रहा ! सहानुभूति की लहर चली, सकल अवाम उस अकेली महिला के पीछे जा खड़ा हुआ। आज भी वही हालात हैं जैसे कभी इंदिरा गांधी के नाम पर वोट मिलता था, आज वोट मोदी जी के नाम पर पड़ता है। उनकी लोकप्रियता की टक्कर में कोई नहीं दिखता। ऐसी कोई पार्टी दिखती ही नहीं जो अकेली भाजपा को चुनौती दे पा रही हो। जो राष्ट्रीय पार्टी उसे चुनौती देने वाली थी, उसका हाल देख कर दुःख होता है.........  
#हिन्दी_ब्लागिंग 
अभी पूरा देश अजीब से संक्रमण काल से गुजर रहा है। सारे काम, योजनाएं, समस्याएं सब ठप्प हैं ! अवाम त्रस्त है पर सरकार और विपक्ष किसी को यदि कोई चिंता है तो सिर्फ यही कि किसी भी प्रकार 2019 में सत्ता हमें हासिल करनी ही है। नेता मुतमइन हैं कि देश कहीं जा नहीं रहा और देशवासियों का क्या है ऐसे ही चिल्लाते रहते हैं, उनकी तो आदत ही है; उसके लिए बस बीच-बीच में जरा सी आश्वासनों की खुराक और नौटंकी दिखाते रहने की जरुरत होती है और अभी चल रही नौटंकी का नाम है 2019 के चुनाव !

2019 के साल को पक्ष-विपक्ष ऐसे पेश कर रहा है जैसे उन दिनों कोई भारी क्रांति होने वाली हो। अंदर-अंदर ही सब हिले हुए हैं पर अपनी नेतागिरी बनाए रखने के लिए जमानत जब्त करवाने वाले, हाशिए पर धकेले गए, बिना कद वाले, जनाधार विहीन, जिद्दी, अक्खड़ हर तरह के लोग ऐसा दिखला रहे हैं कि जीतेंगे तो बस वही ! पर हताशा में जिस तरह विपक्ष बार-बार एक-जुट होने की दुहाई दे रहा है उससे आम जनता को यह संदेश भी मिल रहा है कि वर्तमान सरकार बरजोर है और उसका कोई मुकाबला नहीं कर सकता इसके अलावा वह 1977, 1989  1996 का इतिहास भी तो देख ही चुकी है, विफल गठबंधनों का ! आज मतदाता जागरूक है वह जानता है, समझता है और देख चुका है कि यदि केंद्र में एक ही दल की सरकार न हो तो क्या होता है !

आज भाजपा अगले साल के लिए निश्चित क्यूँ है ? इसके दो-तीन पुख्ता कारण हैं। अगले साल युवा पीढ़ी के करीब 10-11 करोड़ नए सदस्य पहली बार वोट डालेंगे। जरुरी नहीं है कि सभी भाजपा की तरफ ही जाएंगे पर आज के युवा की सोच बदल रही है, इनमें से अधिकांश ऐसे हैं जिनके अभिभावकों ने भी युद्ध की विभीषिका नहीं देखी है और यह पीढ़ी अपने भविष्य को ले कर बहुत सचेत है। झूठे वायदों, प्रलोभनों या छद्म देश-भक्ति के झुनझुने से इन्हें बहलाया नहीं जा सकता। इन्हें ठोस प्रमाण चाहिए हर चीज का। देश प्रेम है पर उसकी अपनी जगह है, यह पीढ़ी किसी तरह का अंध-प्रेम नहीं पालती। उनके लिए आज वसुधैव कुटुम्ब्कम है, अपने भविष्य को संवारने के लिए वे कभी भी और कहीं भी जा सकते है। इसका एक अजीब छोटा सा, पर सोचने लायक उदाहरण पिछले दिनों मिला जब "फिल्म राजी" की नायिका को देश के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर जान जोखिम में डालने की बात अदिकांश युवा होती पीढ़ी के गले नहीं उतरी,  उनको यह कोरी कल्पना लगी कि सिर्फ देश के लिए इतना बड़ा कदम कोई कैसे उठा सकता है ! अब इसके लिए किसे दोष दें, हमारी शिक्षा पद्द्यति को या परवरिश को ! एक और बात, वह पीढ़ी भी तेजी से ख़त्म होती जा रही है जो आज तक कांग्रेस के इतिहास और उसके योगदान से पूरी तरह वाकिफ थी और सोनियाजी  के सादे पहिरावे और सर पर पड़े पल्लू से सदा प्रभावित हो उन्हें अपने बीच का ही मान उनके प्रति समर्पित रहती आई थी। इसके साथ सत्ता के लिए हर दल की खींच-तान तो अपनी जगह है ही। इसके साथ ही साफ़ दिख रहा है कि पूरा विपक्ष मोदी सरकार की कमियों, कमजोरियों का जितना चाहे हल्ला मचा ले जनता का वोट अभी भी मोदी जी को ही मिल रहा है। 

आज देश में दो ही ऐसी राजनितिक पार्टियां हैं जिनका कुछ न कुछ आधार पूरे देश में है। इनमें भी पहले नंबर पर कांग्रेस ही है, जिसके समर्पित कार्यकर्त्ता देश के कोने-कोने में आस्था की अलख जगाए बैठे हैं। पर उसके अदूरदर्शी नेता इसका फायदा न उठा सिर्फ मोदी के पीछे पड़े हुए हैं ठीक उसी तरह जैसे इंदिरा जी को हराने के लिए विपक्ष ने जान लगा दी थी। हर तरह से उन्हें नीचा दिखने बदनाम करने की कोशिश की गयी थी, पर इंदिरा जी ने पलट कर उनकी भाषा में जवाब देने के बदले काम पर ध्यान दिया; नतीजा क्या रहा ! सहानुभूति की लहर चली, सकल अवाम उस अकेली महिला के पीछे जा खड़ा हुआ और उन्होंने जबरदस्त विजय प्राप्त की। आज भी वही हालात हैं सभी मानते हैं कि जैसे कभी इंदिरा गांधी के नाम पर वोट मिलता था, आज वोट मोदी जी के नाम पर पड़ता है। विपक्ष कितना भी झुठलाए पर अभी जितने भी सर्वे आ रहे हैं उनमें मोदी की लोकप्रियता की टक्कर में कोई नहीं दिखता। दूर-दूर तक ऐसा नजर नहीं आ रहा कि कोई राष्ट्रीय पार्टी भाजपा को चुनौती दे रही हो. जो राष्ट्रीय पार्टी उसे चुनौती देने वाली थी, उसका हाल तो सारा देश देख रहा है। जिसके पास कभी लोग आकर सरकार बनाने मदद मांगते थे, वही अब तीसरे-चौथे स्थान पर खड़ी हो, हर हाल में, किसी भी शर्त, पर खुद को गठबंधन में शामिल कर लेने की चिरौरी-विनती  कर रही है।  

ऐसा नहीं ही कि हर कसौटी पर वर्तमान सरकार खरी ही उतरी हो, अपने को एक अलग सी पार्टी का दंभ भरने  वाले दल को उसकी महत्वकांक्षाओं, जिद और सदा अपराजेय रहने-दिखाने की कामना ने और दलों के बराबर ला खड़ा कर दिया है। बात फिर भी संभली हुई थी पर कर्नाटक के नाटक ने छवि धूमिल ही की है। पर चाहे जो हो 2019 की सूई अभी भी मोदी जी की तरफ ही झुकी दिखाई पड़ रही है। विपक्ष को यदि कुछ हासिल करना है, दौड़ में बने रहना है तो उसे अपनी लालसा, अपना दंभ, अपना अड़ियलपन छोड़ एकजुटता निभानी होगी नहीं तो फिर इतिहास तो अपने को सदा दोहराता ही रहा है !      

बुधवार, 23 मई 2018

झूठ बेचते सितारे !

देखने वाला तंग हो जाता है, हर पांच मिनट के बाद "बेल्ले" हीरो को झेल, जो दिन भर कुत्ते-बिल्ली की तस्वीर खींचता बैठा है और उसे बिना कैमरे के पता ही नहीं चलता कि उसका कुत्ता बिन नहाए है। एक और महाशय ने पूरे देश की जुबान को रंगने का ठेका ले सबके दिमाग की ऐसी की तैसी कर धर दी है ! हमारे सिरमौर नायक ठंडे पेय के गुण-गान में इतने मग्न हो जाते हैं कि उन्हें पता ही नहीं चलता कि हाथ में पकड़ी हुई बोतल के बावजूद उनकी जैकेट कैसे उतर जाती है ! एक तो गजबे ही है जो अपनी पहचान अपने काम या नाम से नहीं बल्कि शरीर पर थोपे जाने वाले डेडोरेंट से करवाता है ! वही हाल RO वाले पानी के फ़िल्टर का है जिसके बारे में बार-बार कहा जाता है कि वैसे फ़िल्टर की जरुरत सब जगह नहीं होती पर वह महोदया बिना झिझक उसे सर्वश्रेष्ठ बताती चली आ रही हैं ! इनसे तो वोडाफोन की वे "चिट्टियाँ" गुड़ियाँ लाख दर्जे बेहतर हैं जो संदेश के साथ-साथ हर बार चेहरे पर मुस्कान ला देती हैं.............! 
#हिन्दी_ब्लागिंग 
यह युग विज्ञापन का है। अखबार, टी.वी., पत्रिकाएं, सड़कों पर के खंभे, दीवालें, वाहन, ऐसा क्या है, जिसका उपयोग इनके लिए नहीं होता ! विज्ञापन वह फंदा या जाल है जिसका उपयोग बाजार द्वारा उपभोक्ता को फंसाने के लिए किया जाता है। जिसका एकमात्र लक्ष्य उपभोक्ताओं की जेब में सेंध लगाना है अधिकांश विज्ञापनों का संबंधित वस्तु की गुणवत्ता से कोई सरोकार नहीं होता, यह कई-कई बार सिद्ध हो चुका है। आज हर चीज की गुणवत्ता परखने की सुविधा, उसके गुण-दोषों की जानकारी सब कुछ आसानी से उपलब्ध होने के बावजूद भी लोग झांसे में आते चले जाते हैं। क्योंकि बाजार ने इंसान के मनोविज्ञान को समझ उसकी इच्छाओं-कामनाओं-कमजोरियों की नस पकड़ रखी है। इस श्रेणी में अति विशाल जनसंख्या वाला मध्यम-वर्ग ही ज्यादा आता है। साथ ही उत्पादक दाताओं को यह भी मालूम है कि अगर बेचने वाले की साख समाज में हो तो उसका गहरा असर पडता है क्योंकि लोगों की अपने नायकों-नायिकाओं के प्रति ऐसी आस्था है कि वे समझते हैं कि हमारा नायक या नायिका कभी झूठ नहीं बोलेंगे ! सो वह उत्पाद पर भरोसा कर लेते हैं और उनके इसी भोलेपन के प्रभाव से जो चीज कम या भ्रामक गुणवत्ता की भी हो तो भी वह विज्ञापनों के सहारे निकल पड़ती है। इसीलिए किसी भी क्षेत्र के सितारे हर दूसरे-तीसरे विज्ञापन में नजर आ जाते हैं। यहां तक कि कई तो अपने क्षेत्र में हाशिए पर होने के बावजूद यहां माल कूटते नजर आते हैं। कुछ तो अपने रसूख के बल पर अपने रिश्तेदारों का भी भला करवा देते हैं। 

इश्तिहारों के अन्य माध्यम तो उपभोक्ता नजरंदाज कर भी सकता है पर टी.वी. का क्या ! जो हर दूसरे-तीसरे मिनट अपने दर्शकों पर तोप के गोलों की तरह विज्ञापन दागता रहता है ! जिसमें तो अब कई शालीनता की हद भी लांघने लगे हैं। कुछ जाने-अनजाने समाज के वर्गों में भेदभाव करने तो कुछ अपने उत्पाद का उपयोग ना करने पर उपभोक्ता को पिछड़ा हुआ बताने पर भी नहीं चूकते ! मनघड़ंत त्यौहार, दुर्लभ नक्षत्र, ख़ास दिन, आयातित उत्सव, कीमतों में भ्रामक कमी, दो के साथ एक मुफ्त और ना जाने क्या-क्या दिखा बता कर ग्राहक को ललचा, बहला, उकसा कर बाजार अपने सुरसा जैसी कभी ना ख़त्म होने वाली क्षुधा के लिए ईंधन का जुगाड़ करता रहता है। जिसके लिए ज्यादातर बच्चों को साध उनके अभिभावकों को निशाना बनाया जाता है। 

टी.वी पर समाचार या कोई अपना कार्यक्रम देखने वाला तंग हो जाता है, हर पांच मिनट के बाद "बेल्ले" हीरो को झेल, जो दिन भर कुत्ते-बिल्ली की तस्वीर खींचता बैठा है और उसे बिना कैमरे के पता ही नहीं चलता कि उसका कुत्ता बिन नहाए है या उसका जूता मुंह में दबाए भग रहा है। एक और महाशय ने पूरे देश की जुबान को रंगने का ठेका ले सबके दिमाग की ऐसी की तैसी कर धर दी है क्या जिम्मेदार लोग ऐसे बौड़म हैं कि शब्दों की हेरा-फेरी से उन्हें यह समझ ही नहीं आता कि कौन क्या बेचना चाह रहा है ? ठंडे बोतल बंद पेय पूरी दुनिया में नकारे जा रहे हैं पर हमारे सिरमौर नायक उसके गुण-गान में इतने मग्न हो जाते हैं कि उन्हें पता ही नहीं चलता कि हाथ में पकड़ी हुई बोतल के बावजूद उनकी जैकेट कैसे उतर जाती है ! एक तो गजबे ही है जो अपनी पहचान अपने काम या नाम से नहीं बल्कि शरीर पर थोपे जाने वाले डेडोरेंट से करवाता है ! वही हाल RO वाले पानी के फ़िल्टर का है जिसके बारे में बार-बार कहा जाता है कि वैसे फ़िल्टर की जरुरत सब जगह नहीं होती पर वह महोदया बिना झिझक उसे सर्वश्रेष्ठ बताती चली आ रही हैं जबकि संवैधानिक पद के कारण उनकी तो समाज के प्रति और भी जिम्मेदारी बढ़ जाती है। पर क्या कहा जाए ! लगे हुए हैं सब अपनी जून सुधरने में ! ये तो आमजन को सुध लेने की बात है जो जरा सा ध्यान दे और सोचे कि गंजी पहन लेने से ही दिलेरी नहीं आ जाती नाहीं कुछ खा-पी लेने से ताकत या बुद्धि बढ़ सकती है या कुछ लगाने से रंग बदल जाता है और सुंदरता बढ़ जाती है ! इनसे तो वोडाफोन की वे "चिट्टियाँ" गुड़ियाँ लाख दर्जे बेहतर हैं जो संदेश के साथ-साथ हर बार चेहरे पर मुस्कान ला देती हैं। 

ऐसा नहीं है कि विज्ञापन बंद ही कर दिए जाएं। कुछ चीजों के बारे में बताना जरुरी भी होता है। बहुत सी ऐसी चीजें हैं जिनका पता ही ना चले यदि बताया ना जाए। पर बनाने और बताने वाले की नैतिक जिम्मेदारी निश्चित की जानी चाहिए कि वह अतिरेक, गलत या भ्रामक जानकारी ना दे। विज्ञापन को लोकप्रिय बनाने के लिए शालीनता ना लांघे। बच्चों को बच्चा ही समझे अनावश्यक रूप से उनके काँधे पर रख कर बंदूक ना चलाए। हालांकि इन पर भी अंकुश रखने का प्रावधान है पर पतली गलियां भी तो ढेरों हैं !  

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