मंगलवार, 29 नवंबर 2016

अपानवायु, कुछ रोचक जानकारी

दीमक जैसा छोटा सा कीड़ा सबसे ज्यादा गैस उत्पादित करता है। फिर कतार में लगते हैं ऊंट, ज़ेबरा, भेड़, गाय, हाथी, कुत्ते तथा इंसान।  जान कर  आश्चर्य होगा कि चीन में   "Professional  Smeller"   द्वारा गंध सूंघ कर रोगों का निदान किया जाता रहा है। इनके काम की तरह ही इनको इस काम के एवज में मिलने वाली, करीब 50000 डॉलर की रकम भी हैरतंगेज है

अपानवायु, चिकित्सा जगत में भले ही इस पर काफी कुछ लिखा, बताया या शोध किया जा रहा हो, पर रोजमर्रा की जिंदगी में और आम बोल-चाल में यह काफी उपेक्षित सा विषय रहा है। आम धारणा में यह कुछ भदेस, असुसंस्कृत, बेशऊर, फूहड़ या कह सकते हैं कि कुछ हद तक अश्लीलता की श्रेणी में आता है। भले ही इस पर खुले-आम बात करने पर, असभ्यता माने जाने के कारण लोग कतराते हों, पर है यह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी की अभिन्न प्राकृतिक क्रिया। इसका नाता शरीर के साथ जन्म से लेकर मृत्यु तक बना रहता है। 

इधर इस को लेकर जगह-जगह, तरह-तरह ख़बरें, कुछ ज्यादा ही सामने आने लगी हैं। कुछ में इससे कुछ हद तक निजात पाने की बात रहती है, तो कुछ में इसकी दुर्गंध को रोकने पर हो रही शोध के बारे में बताया जाता है। यह तो हुई इस समस्या को लेकर उठाए गए गंभीर कदम, पर उधर कुछ फिल्मों और टी वी के तथाकथित हास्य सीरियलों में इसको लेकर फूहड़ हास्य पैदा करने की कोशिशें भी जारी हैं। जो कतई स्वागत योग्य नहीं हैं। शायद ऐसे लोगों को अपनी प्रतिभा पर विश्वास नहीं होता जो ऐसी हरकतों को दर्शाने में उतर आते हैं।   

इसका दवाब किसी को भी, कभी भी और कहीं भी हो सकता है। पर भीड़-भाड़ में यह एक शर्मनाक समस्या बन जाता है। पार्टी इत्यादि में सभी के सामने वायु-त्याग करना खुद ही अपमानित होने जैसा लगता है। पर इसके वेग को रोकना भी सेहत के लिए ठीक नहीं होता। ऐसा करने से सिरदर्द, सीने में दर्द, बेचैनी या पेट में दर्द या सूजन भी हो सकती है।  इसलिए हमें स्वस्थ खान-पान की आदत डालनी चाहिए जो कुछ हद तक इसका निवारण कर सकती है घर के बाहर का या कुछ भी, जो मिला पेट में डाल लेना, समय-असमय खाना,  विपरीत गुणों वाले खाद्य-पदार्थों को एक साथ लेना, इसके प्रमुख कारक हैं। मद्य व अत्यधिक धूम्र-पान जैसी आदतों को छोडने या कम करने से इसका प्रकोप भी काफी हद तक  नियंत्रित किया जा सकता है। बाजार में इससे निजात दिलाने वाली दवाएं भी उपलब्ध हैं। वैसे, जैसा कि प्रयोगों द्वारा साबित हुआ है, रोज एक केला खाने से बड़ी हद तक इसे काबू में किया जा सकता है। यह सब बातें तो आम हैं पर इसके बारे में कुछ दिलचस्प तथ्य भी खोज निकाले गए हैं जो सर्वविदित नहीं हैं।   

यह जान कर आश्चर्य होता है कि मनुष्य शरीर के वायु-प्रकोप को, जिसे हेय दृष्टि से देखा जाता है वह कुछ लोगों का परिवार चलाने का जरिया है। कहते हैं चीन में  "Professional Fart Smeller" गंध सूंघ कर रोगों का निदान करते हैं। इनके काम की तरह ही इनको इस काम के एवज में मिलने वाली, करीब 50000 डॉलर की रकम भी हैरतंगेज है। आम आदमी 10 फिट/सेकंड या 9.5 की.मी/ की गति से 'औसतन' रोज 14 बार वायु निष्काषित करता है, यह क्रिया ज्यादातर रात में सोते वक्त होती है। इसकी मात्रा इतनी होती है जिससे एक मध्यम साइज का गुब्बारा फुलाया जा सकता है। पर इस क्रिया का अधिकतम ऊचांई या पानी की गहराई में होना कुछ मुश्किल होता है। अब तो विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है कि आज इसकी आवाज और आयतन दोनों को नापना संभव हो गया है। गजब तो यह है कि अब खाने वाली ऐसी गोलियां भी मिलने लगी हैं जिनके सेवन से इसकी दुर्गन्ध, गुलाब या चॉकलेट जैसी चीजों की सुगंध में बदल जाती है। वैसे अधोवस्त्र बनाने वाले, वस्त्रों के कई निर्माता ऐसे कपडे को बाजार में लाने का उपक्रम कर रहे हैं जिससे निष्काषित वायु की दुर्गंध को रोका जा सके। इसमें सफलता भी मिलने लगी है। 
   
अपान वायु पेट में पाचन के दौरान वहां स्थित बैक्टेरिया के कारण बनी कई तरह की गैसों का मिश्रण है। यदि भोजन में सल्फर की मात्रा ज्यादा हो तो दुर्गन्ध भी उतनी ही बढ़ जाती है। इस श्रेणी में पत्तेदार सब्जियां, अंडे, रेड मीट, डेयरी के उत्पादन, प्याज, लहसुन इत्यादि आते हैं। यह मनुष्यों को ही नहीं संपूर्ण प्राणी जगत को प्रभावित करती है। यहां तक कि कीड़े-मकोड़े भी इससे अछूते नहीं हैं। जान कर  आश्चर्य होगा कि दीमक जैसा छोटा सा कीड़ा सबसे ज्यादा गैस उत्पादित करता है। फिर कतार में लगते हैं ऊंट, ज़ेबरा, भेड़, गाय, हाथी, कुत्ते तथा इंसान।  कितनी अजीब बात है कि मनुष्य को अपनी अपान वायु की दुर्गंध सदा दूसरों से कम बुरी लगती है। 

दुनिया भर में इस को चाहे कितना फूहड़, हेय या भदेस माना जाता हो, पर कुछ संस्कृतियां ऐसी भी हैं जहां इसे अन्य आम क्रियाओं की तरह मान्यता प्राप्त है, जैसे दक्षिणी अमेरिका की एक जन-जाति, यानोमामी, जो इसे अभिवादन के रूप में लेती है। चाहे जो हो वायु के इस प्रकार का हमारे शरीर पर बहुत गहरा असर रहता है। कोशिश यही रहनी चाहिए कि हम, जहां तक संभव हो, कफ और पित्त के साथ इसका संतुलन बनाए रखें। 
-संदर्भ अंतरजाल 

शनिवार, 26 नवंबर 2016

समय की मांग

हमारे देश की अधिकतम आबादी वह है जो अपना खून-पसीना एक करने बावजूद अपनी आवश्यकता के सौ रुपये के बदले नब्बे रुपये ही कमा पाती है। उसके पास अपना उजला धन ही नहीं टिकता तो काले धन की बात ही कहां !

आठ नवम्बर को एक जलजला आया, यह प्राकृतिक नहीं मानव निर्मित था, पर इससे सारा देश हिल गया। सरकार की तरफ से इसे भ्रष्टाचार, काले धन और बाजार में छाई नकली मुद्रा से निजात पाने के लिए उठाया गया कदम बताया गया। आम भारतीय जो देश के हित के लिए किसी भी प्रकार की परेशानी-कठिनाई सहने को और त्याग करने को तैयार हो जाता है उसने अपने स्वभाव के अनुसार दसियों दिन तकलीफें झेलीं पर इस कठोर निर्णय का स्वागत ही किया। कारण साफ़ था, हमारे देश की अधिकतम आबादी वह है जो अपना खून-पसीना एक करने बावजूद अपनी आवश्यकता के सौ रुपये के बदले नब्बे रुपये ही कमा पाती है। उसके पास अपना उजला धन ही नहीं टिकता तो काले धन की बात ही कहां ! यह तबका वर्षों से मंत्री, संत्री, नेता, अभिनेता, इंजिनियर, ठेकेदार, फलाने-ढिमकाने के पास या फिर उनके द्वारा ठिकाने लगाए गए काले धन के बारे में सुनता आ रहा था। आज उसके मन में कहीं दबे ऐसे धन्ना-सेठों के प्रति आक्रोश को तसल्ली मिली। काले धन के देश के काम आने की बात सुन उसने परेशानियों को सहते हुए भी इस निर्णय का स्वागत किया। विरोध किया विपक्ष ने, जो उसे करना ही था ! सरकार के इस दांव से सदमें में गया भौंचक्का से विपक्ष ने अपना दायित्व निभाते हुए इस कदम के नुक्सान गिनाने शुरू कर दिए। उधर अलग-अलग खेमों में बंटा मीडिया, अपना-अपना राग अलापने लगा। हम, यह जानते हुए भी कि सामने टी वी पर जो कहा जा रहा है वह अर्द्ध-सत्य होता है, उसी को पूरा सत्य मानने लग गए हैं। सच कहा जाए तो हम कहीं अंदर से अपना-अपना पसंदीदा चैनल चुन चुके है जिस पर हम आँख मूँद कर विश्वास भी करने लगे हैं। 

सरकार, विपक्ष और मीडिया सभी जानते हैं कि मुट्ठी भर लोग ही हैं जो इस नोटबंदी का कुछ न कुछ आकलन कर सकते हैं, पर बहुत बड़ी आबादी इस बारे में कुछ नहीं जानती उसे जो समझाया-बताया जा रहा है उसी पर विश्वास कर रही है, तो सब लगे हुए हैं राशन-पानी लेकर अपनी-अपनी बात सही साबित करने। विपक्ष यह बता रहा है कि इसी कदम से रुपया कमजोर हो रहा है, यह एक कारण हो सकता है, पर वह यह नहीं बताता कि इसका एक कारण अमेरिका में ट्रंप का राष्ट्रपति बनना भी है जिससे डॉलर मजबूत हुआ है और हमारे साथ-साथ एशिया के अन्य देशों यथा जापान, सिंगापुर, मलेशिया, दक्षिणी कोरिया व ताइवान की करेंसी में भी गिरावट आई है ! कोई स्वाइपिंग मशीनों की कमी को लें-दें में अड़चन बता रहा है पर यह नहीं कहता कि अब तक देश में नगदी में ही अधिकतम काम होता था, इसलिए जरुरत ही नहीं पड़ती थी अब आवश्यकता पड़ी है तो ज्यादा उपलब्ध करवाई जाएंगी। उधर सरकार आमजन को अपने पक्ष में देख आत्ममुग्धता की स्थिति में है और अपने कदम को एकदम सही मान कर चल रही है। शायद उसे गुमान भी नहीं है कि यदि उसके निर्णय से परेशानियों का दौर लम्बा खिंचा तो इसी समर्थन को गुस्से में तब्दील होने में देर नहीं लगेगी।

पहले भी ऐसा हो चुका है। 1975 से 1977 के बीच 21 माहीनों तक लगे आपातकाल का ख़ौफ़ ऐसा है कि उस दौरान जो दो-चार अच्छे काम हुए भी होंगे उन्हें कोई याद नहीं करना चाहता। वही हाल संजय गांधी द्वारा चलाए गए नसबंदी अभियान का हुआ। कौन नहीं जानता कि बढती आबादी हमारी सबसे बड़ी समस्या है जिसके सैलाब में हर छोटी-बड़ी योजना तबाह हो जाती है। उस समय यदि वह अभियान ढंग से चला होता, लोगों पर जबरदस्ती ना थोप ठीक से समझा कर लागू किया जाता, अपने अहम् की पूर्ती को छोड़ योजना की सफलता पर ध्यान दिया जाता तो आज हमारी जनसंख्या के बनिस्पत संसाधनों की मात्रा कहीं अधिक होती। पर जबरन लक्ष्य पूर्ती, अपनी काबिलियत साबित करने, आकाओं के गुस्से से बचने, अपनी नौकरी बचाने के लिए जिस तरह लाल फीताशाही ने अपने पद, अपनी हैसियत, अपने रसूख का दुरुपयोग किया उससे एक दूरदर्शी देश हित की  योजना दुःस्वप्न में बदल कर रह गयी। डर है कि उसी तरह का हश्र इस निर्णय का भी ना हो। क्योंकि ऊपर दल बदलते हैं, मंत्री बदलते हैं पर अफसरशाही तो वही रहती है, और उसके काम करने का तरीका बदलने का दुःसाहस कुछ ही लोग कर पाते हैं जिनके सफल रहने से सबसे ज्यादा तकलीफ भी इसी सरकारी तबके को होती है। इन पर बेलगामी अर्थ का अनर्थ कर डालती है। इसी के साथ, किसी के बहकावे या अफवाहों से बचते हुए, हमें भी धैर्य रख सारी परिस्थियों पर नजर रखनी चाहिए और अपने जमीर, अपने विवेक का सहारा ले उचित-अनुचित में भेद करना चाहिए। समय की मांग भी यही है। 

रविवार, 20 नवंबर 2016

अफवाहें नहीं सच्चाई को सामने लाया जाए

पहले भी ऐसी खबरें आती थीं कि फलां अस्पताल ने पैसे ना होने की वजह से बीमार को बाहर निकाल दिया या किसी डॉक्टर ने मरीज का इलाज अपनी फीस मिलने में देर होने की वजह से नहीं किया। तब इसे डॉक्टर या अस्पताल के अमानवीय व्यवहार के रूप में प्रचारित किया जाता था, आज उसे नोटों की तंगी से जोड़ा जा रहा है,.........मीडिया रुपी मौलवी शहर के अंदेशे से एवेंई, दुबले होते जा रहे हैं 

आजकल देश में जो एक ही मुद्दा छाया हुआ है उस पर तरह-तरह की बेबुनियाद, फिजूल, भ्रामक, भड़काऊ खबरें रोज ही उछाली जा रही हैं। ऐसा नहीं है कि लोग परेशान नहीं हैं, उन्हें दिक्कत नहीं हो रही पर उनकी सहनशीलता उन्हें साधुवाद का पात्र बनाती है। दूसरी ओर मीडिया रुपी मौलवी शहर के अंदेशे से एवेंई, दुबले होते जा रहे हैं। 

पहले भी ऐसी खबरें आती थीं कि फलां अस्पताल ने पैसे ना होने की वजह से बीमार को बाहर निकाल दिया या किसी डॉक्टर ने मरीज का इलाज अपनी फीस मिलने में देर होने की वजह से नहीं किया। तब इसे डॉक्टर या अस्पताल के अमानवीय व्यवहार के रूप में प्रचारित किया जाता था, आज उसे नोटों की तंगी से जोड़ा जा रहा है। यदि कोई चिकित्सालय या चिकित्सक ऐसा अमानवीय काम पैसों के ना मिलने की वजह से करते हैं तो उन पर कार्यवाही होनी चाहिए ना कि उसे नोटबंदी से जोड़ा जाना चाहिए !!

ऐसे भी खबरें उछाली गयीं हैं कि पैसों की कमी के कारण खाना न खरीद पाने की वजह से एक-दो लोग भूख से मर गए ! पहले तो ऐसा होना संभव नहीं है यदि ऐसा हुआ भी है तो इसकी सच्चाई का पता किसने लगाया ? हम इतने हृदयहीन नहीं हो गए हैं कि हमारे सामने कोई भूख से तड़प रहा हो और हम नोटों की लाइन में खड़े उसका तमाशा देखें। आज जगह-जगह से खबरें मिल रही हैं कि गली-मोहल्ले वाले कतार में खड़े लोगों को चाय-पानी-नाश्ता उपलब्ध करवा रहे है। सिख समाज तो निःस्वार्थ-भाव से वर्षों-वर्ष से भूखों को भोजन करवाता आ रहा है। कई मन्दिर और संस्थाएं जरूरतमंदों के लिए लंगर चलाते हैं। यदि पीड़ित व्यक्ति वहां ना भी सका हो तो आस-पास के लोगों से ही अपनी तकलीफ व्यक्त कर सकता था। अरे हमारे यहां तो जानवरों तक को भूखा रखना पाप समझा जाता है। किसी इंसान को कैसे ऐसी हालत में प्राण त्यागने दे सकता है ?

ऐसी ही एक स्थिति थकान की है, बुजुर्गों की है, उसमें भी आस-पास की सहायता आसानी से ली जा सकती है, अपने सामने-पीछे वाले को अपनी हालत बता, कतार से हट कर बैठा जा सकता है। इसमें बैंक वाले यदि टोकन के साथ समय भी इंगित कर दें तो और भी आसानी हो सकती है।

राजधानी के बड़े अखबार खोज-खोज कर ऐसे-ऐसे सरकार विरोधी डिजायनर "बंदों" से लेख लिखवा रहे हैं जिनकी एक सिटिंग का सिगरेट-शराब का खर्चा हजारों में होता है। कोई मोदी द्वारा देश को दसियों साल पीछे ले जाने की बात करता है तो कोई स्वाइपिंग मशीनों की कमी का रोना रोता है। वह यह नहीं बताता कि अब तक देश में नगदी में ही अधिकतम काम होता था, इसलिए जरुरत ही नहीं पड़ती थी अब ज्यादा उपलब्ध करवानी पड़ेंगी। विरोध कर अपनी उपस्थिति दर्ज करवानी है बस इसीलिए कुछ भी उगला जा रहा है।

आज मीडिया को अपने पर "बिके हुए" का तमगा हटाने का मौका मिला है। आज वह चाहे तो अपने-आप को विश्वसनीय और निष्पक्ष सिद्ध करने का प्रयास कर सकता है। अपनी लुटी-पिटी साख वापस पा सकता है। उसे सिर्फ सच्चाई को लाना है बस।    

शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

अपने मुंह में खबरिया चैनलों के शब्दों को जगह ना दें

आज  "मरीज" खुद  भी चाहता है कि वह ठीक हो, उसके हालात सुधरें, जिसके लिए वह किसी भी तरह का कष्ट किसी भी हद तक सहने को राजी है पर उसे भड़काया जा रहा है, अरे ! तुम्हारा आपरेशन होगा, तुम्हें कष्ट होगा, तुम्हें परेशानी होगी। आज कल नहाने का मौसम है तुम नहाओगे कैसे, तुम्हें सोचने -समझने का  समय ही नहीं दिया गया इत्यादि, इत्यादि। बजाए मरीज का हौसला बढ़ाने और उसकी मदद करने के उसे भरमाया जा रहा है, जिससे लोगों में और घबड़ाहट फ़ैल रही है ! पर कुछ लोग शायद चाहते भी यही हैं .....      

धन तो सदा ही आदमी को नचाता रहा है, हो तब भी और ना हो तब भी। अब जब उसके रूप-रंग में कुछ बदलाव आ रहा है तब भी इंसान चकरघिन्नी बना हुआ है। पर इस तिगनी के नाच में कुछ मजबूरीवश, कुछ घबड़ाहट के तहत, कुछ अफवाहों के चलते तो कुछ "प्रयोजित लोग" भी शामिल हैं, जो अलग-अलग गुटों में बंटे खबरिया चैनलों  की बीन की धुन पर, बिना अपने जमीर की सुने नाचे जा रहे हैं, नाचे जा रहे हैं। 

अभी एक मित्र की बच्ची की शादी के सिलसिले में जयपुर जाना हुआ था। बारात अगवानी के पहले जब हम कुछ लोग विवाह स्थल का जायजा लेने पहुंचे तो वहां माइक थामे एक मैडम, जो हिंदी चैनल में होने के बावजूद इंग्लिश में बतिया रही थीं, अपने सहयोगी कैमरा-मैन के साथ उपस्थित थीं। हमें देखते ही उनका पहला सवाल यह था कि नोटों के बदलने से आप को जो परेशानी हो रही है, उसके बारे में आप क्या कहना चाहेंगे ?  मेरे मित्र ने कहा यह देश-हित में उठाया गया कदम है और इससे हमें कोई परेशानी नहीं हैं। हम सब प्लान कर के ही चल रहे है। उनके लिए यह एक अप्रत्याशित उत्तर था, क्योंकि उनके आका शादियों के मौसम में इस कदम को मुद्दा बना सरकार के कदम को अनुचित सिद्ध करने में जुटे हुए है ! माइक-धारी महिला ने फिर सवाल उछाला, तो आप इस सारे खर्च का पेमेंट कैसे करेंगे, उसमें तो आपको असुविधा होगी ! मित्र का जवाब था, वह मेरी व्यक्तिगत समस्या है, जिससे पार पाने के लिए मैंने हर संभव इंतजाम कर रखे हैं। जिनको भुगतान करना है वह भी वस्तुस्थिति से अवगत हैं और वे भी पूरा सहयोग कर रहे हैं। 

यहां अपने मन-मुताबिक़ जवाब ना पाने पर माइक और कैमरा दोनों ने साज-सज्जा तथा स्टालों को अपना निशाना बनाना शुरू किया और वहां खड़े स्टाफ से कुछ ना कुछ उगलवाना चाहा पर जब वहां भी उन्हें अपने चैनल के नाम, अपनी भाषा और अपने रोब-दाब से भी मनवांछित फल नहीं मिला, तब उन्होंने बौखला कर तरह-तरह के उल-जलूल उदाहरण और सवाल-जवाब शुरू किए तो मुझसे रहा नहीं गया। मैंने पूरे सौजन्यता के साथ अंग्रेजी में ही उनसे कहा कि क्यों आप हमारे मुंह में अपने शब्द  में डालने की कोशिश कर रही हैं और हिंदी भाषी चैनल के बावजूद यह बीच-बीच में धारा-प्रवाह इंग्लिश क्यूँ ? हर तरफ अपना विरोध देख उनका हत्थे से उखाडना लाजमी था, फिर वैसा ही हुआ जैसा हम अक्सर फिजूल की बहसें ऐसे चैनलों पर देखते-झेलते रहते हैं। टी वी पर तो रिमोट अपने हाथ होता है पर यहां तो साक्षात आमना-सामना था ! उसी सिलसिले में मैंने कहा कि सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि आपलोग किसी की सुनना नहीं चाहते सिर्फ अपनी बात को सही मनवाना चाहते हैं।  आप इसलिए नहीं माइक थामे हैं कि आप सरकार के कदम को गलत साबित करें यह जिम्मेदारी इसलिए दी गयी है कि आप सही छवि लोगों के सामने लाएं नाकि अपनी बनाई हुई तस्वीर !  अगली के हाथ में माइक था वे अपनी आदतानुसार बोले भी जा रही थीं पर उपस्थित लोगों की सहमति मेरे साथ होने के कारण पस्त भी थीं। मैंने कहा कि यदि किसी बीमार व्यक्ति का आपरेशन जरूरी हो तो भी आप विरोध में चिल्लाने लगिएगा कि देखो उस पर कितना अत्याचार हो रहा है उसके शरीर पर चाक़ू चलाया जा रहा है, इत्यादि-इत्यादि, जब कि उस आदमी को बचाने के लिए आपरेशन जरुरी है। यहां तक कि "मरीज" भी चाहता है कि वह ठीक हो, उसके हालात सुधरें, जिसके लिए वह कष्ट सहने को भी राजी है पर आप उसे भड़का रहे हो। इस पर माइक से जवाब आया कि उसके पहले मरीज को एनेस्थेसिया दिया जाता है, दवाएं दी जाती हैं। मैंने कहा वैसे उपाय यहां भी किए गए हैं, आप उन्हें भी तो "हाइलाइट" कीजिए, लोगों को हौसला बनाए रखने में मदद करने की बजाए आप सिर्फ कमियों का रोना रोए जा रहे हो जिससे लोगों में और घबड़ाहट फ़ैल रही है ! पर आप शायद चाहते भी यही हो !! 

बहस का अंत तो होना नहीं था, समय बीत रहा था सारे इंतजाम भी देखने थे, सो वातावरण को बोझिल ना बना, बात ख़त्म कर उन्हें कुछ लेने का आग्रह किया पर वे भी हताशा-वश वहां के विपरीत माहौल से निकलने का मौका तलाश रहे थे सो ज़रा सा इशारा पाते ही जल्दी से खिसक लिए।

आज लगता है कि देश कहीं पीछे छूट गया है। देश-प्रेम की भावना तिरोहित हो चुकी है। अपने ज़रा से हित के लिए, ज़रा सी सहूलियत के लिए बिना भविष्य की सोचे दिवास्वपन दिखलवाने वालों के बहकावे में आ जाते है। हम अपने जमीर का उपयोग करना चाहते ही नहीं। अफवाहें कहीं भी, कभी भी हमें बेवकूफ बना सकती हैं। हमें पकी-पकाई खाने की आदत पड़ चुकी है। हमारी भेड़-चाल ख़त्म नहीं होने वाली, हमारे कंधे मौकापरस्तों की बंदूकों के लिए अलभ्य नहीं होने वाले, झूठ को सौ बार कह-दिखा कर सच बनाने वाले अपनी आदतों से बाज नहीं आने वाले। इतिहास गवाह है कि हमें लतखोरी की आदत पड़ी हुई है, बिना डंडे के हम सुधर नहीं सकते !!

पर सच्चाई यह है कि हममें किसी भी परिस्थिति का सामना करने का माद्दा है। सेना की तो बात ही ना करें उनके समान तो कुछ हो ही नहीं सकता। पता नहीं सृष्टि ने उन्हें किस मिटटी का बनाया है, कौन से जज्बात भरे हैं दिलो-दिमाग में, किस धातु का हौसला घड़ा है कि सिवा देश के उन्हें और कुछ सूझता ही नहीं जबकि उसी देश के कुछ नाशुक्रिए पीछे नहीं रहते उनकी बेकद्री करने को। सेना जैसा ही कुछ जज्बा आज भीतरी "फ्रंट" पर तैनात बैंक कर्मियों ने पेश किया है उसके लिए पूरे देश को उन पर गर्व है। विपरीत परिस्थितियों में, गहरे दवाब में, थकान-भूख-प्यास को भूल उन्होंने दिनों-दिन, घंटे दर घंटे, लोगों की बेकाबू भीड़, उनके गुस्से, उनकी तकरार को सहते हुए खुद को शांत रख जिस कर्मठता के साथ अपने काम को अंजाम दिया है उसके लिए तो तारीफ में शब्द ही कम पड़ जाते हैं। साधूवाद है इन सारे कर्मियों के लिए। पर खेद यहां भी वही है कि उनके प्रयास को उतनी तवज्जो नहीं मिल पा रही जिसके वे हकदार हैं।     

रविवार, 13 नवंबर 2016

भीड़ में सबसे पीछे खड़े का कौन सहारा !

तकरीबन सात-आठ साल से ब्लागिंग की दुनिया में रहने के बावजूद लगता है कि "वृत्तिकता" नहीं आ पायी है। यहां कभी-कभी पढने में या फोटुएं देख के लगता है कि कुछ लोग कितने जागरूक रहते हैं अपने आस-पास के माहौल को लेकर। यहां तो कई बार जान-बूझ कर मोबायल को घर पर छोड़ बाहर निकल जाता हूँ, फिर कुछ अलग सा देख-सुन कर, उस पल को संजो ना पाने का पछतावा भी होता है। वैसे भी आस-पास किसी घटना को सामान्य रूप से ले, भुला दिया जाता है जबकि उसका  वर्तमान के परिवेश से सीधा जुड़ाव होता है। 

यह बात तब फिर एक बार सही साबित हुई जब कल टी वी के किसी न्यूज चैनल पर, नोटों की बंदी पर रिक्शा चालकों, दिहाड़ी पर काम करने वाले मजदूरों, खोमचे वालों आदि के विचार लिए जा रहे थे। तभी मुझे ध्यान आया कि पांच-सात दिन पहले पर्यावरण को लेकर मचे हंगामें की प्रतिक्रिया में दिल्ली सरकार के भी जल्दबाजी में उठाए कुछ कदमों में, भवन निर्माण आदि पर कुछ दिनों के लिए रोक लगा दी गयी थी। उस काम में लगे दिहाड़ी के मजदूरों की परेशानी पर शायद ही किसी ने ध्यान दिया होगा। 

मेरे निवास के सामने ही एक बिल्डर द्वारा बहुमंजली इमारत बनाई जा रही है। उसमें काम करने वाले मजदूरों में एक का अपनी पत्नी और छोटे बच्चे के साथ वहीँ रहना होता है। उन्हीं दिनों एक सुबह घण्टी बजने पर जब श्रीमती जी ने द्वार खोला तो सामने काम करने वाली महिला एक छोटा सा बर्तन हाथ में लिए खड़ी थी, बोली आंटी जी थोड़ा दूध मिलेगा, बच्चा सुबह से भूखा है ! अब चाहे जिस कारण से भी उसने मांगा हो उसे दूध और जो कुछ भी हो सकता था उपलब्ध करवाया गया। फिर उसके सीधे-सरल, बिहार निवासी पति से ऐसे ही सहज भाव से कैसा-क्या है जानकारी ली तो उसने दिहाड़ी पर काम करने वालों की पचासों मुसीबतें गिना दीं। इसी सिलसिले में समय पर ठेकेदार से समय पर कुछ सहायता ना मिलने और जमा-पूँजी को पीछे गांव भेजने के कारण उठी उसकी बेबसी सामने आई। जिसके कारण उसे हमारे पास आना पड़ा था। 

वह तो, किसी प्रकार की जरुरत हो तो बिना झिझक बताने का आश्वासन पा, ढेर सी दुआ देता चला गया। यह तो एक सामने बैठा इंसान था, उस जैसे इस शहर में हजारों होंगे, फिर पूरे देश में ऐसे निरीह लोगों की कितनी संख्या होगी उसका तो सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है !  कौन सोचता हैं उनके बारे में ? कोई सोचता भी है कि नहीं ? उल्टे-सीधे, बड़े-छोटे, सरल-कठोर कानून थोपने से पहले देश के कर्णधार क्या कभी सचमुच ऐसे लोगों का ध्यान रख निर्णय लेते हैं ? या फिर........!!!