शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

प्लास्टिक को पहचानें उस पर दिए गए कोड से

आज प्लास्टिक से बनी वस्तुओं को  बिलकुल नकार दिया जाना भी सम्भव नहीं है। पर इनका उपयोग खूब सोच-समझ कर ही करना चाहिए। इन्हें कभी भी गर्म नहीं करना चाहिए। ज़रा सी टूट-फूट होने के बाद इनका उपयोग नहीं करना चाहिए।इसकी श्रेणियों में 1, 2, 4, 5  को उपयोग के लिए सुरक्षित और 3, 6, 7, खासकर 7 को हानिकारक मान कर उनसे बचना या कम उपयोग करना चाहिए ....... 

एक ज़माना था जब हर तरफ कांच का बोलबाला था। हालांकि टीन के डिब्बों-कनस्तरों का भी चलन था पर दूध, पानी, जूस, ठंडे पेय, खाद्य पदार्थ से लेकर दवाऐं, कास्मेटिक आदि का सामान कांच की बोतलों, बर्नियों, शीशियों में ही अधिकतर पाया जाता था। घरों में रसोई या स्नानागारों में काम आने वाले बड़े कंटेनर भी धातुओं के ही हुआ करते थे। फिर समय बदला। लोगों के आम जीवन में प्लास्टिक ने पदार्पण किया और देखते ही देखते उसने समाज के हर हिस्से पर अपना वर्चस्व कायम कर लिया। इसका सबसे बड़ा कारण इसका मजबूत होने के बावजूद हल्का, लचीला, टिकाऊ, कम टूट-फूट वाला, जंग-मोर्चे से दूर, नमी तथा केमीकल रोधक,  साफ़ करने में आसान और सबसे बड़ी बात सस्ता होना था। आज इसे अपने आस-पास, घर-दफ्तर सभी जगह देखा-पाया जा सकता है। फिर चाहे हमारे खाने-पीने का सामान हो, पहनने-सोने का सामान हो, काम में आने वाला सामान हो, खिलौने, कंप्यूटर, फोन, चम्मच-प्लेट, हमारे दांत, चश्मा तथा उसके लेंस यहां तक कि हमारे शरीर के अंदर धड़कने वाला दिल भी इसी से बनने लगा है। 

पर इसके अनगिनत फायदों के साथ ही इसके कुछ नुक्सान भी हैं। जैसे इसके नष्ट न होने के गुण के कारण यह पर्यावरण के लिए खतरनाक साबित होता है। घटिया प्लास्टिक का उपयोग विभिन्न रोगों और बीमारियों को बुलावा देना है। खासकर यह बच्चों के लिए बहुत हानिकारक होता है। इन्हीं बातों को ध्यान में रख सोसायटी आफ ऑफ द प्लास्टिक इंडस्ट्रीज ने इस वस्तु की ग्रेडिंग कर इसे ग्रेड के अनुसार चिन्हित कर दिया है। इन चिन्हों में घडी की दिशा में मुड़े तीन तीरों से बने त्रिभुज के बीच लिखे गए अंकों से उसके स्तर का पता चल जाता है, जिससे जाना जा सकता है कि इस्तेमाल किया जाने वाला आइटम कितना सुरक्षित है। इन्हें 1 से 7 तक के नम्बर दिए गए हैं जिनसे प्लास्टिक के स्तर के साथ-साथ निम्नलिखित बातों की जानकारी भी मिलती है -

1.  Plastic-recyc-01.svgइस चिन्ह वाला प्लास्टिक शीतल पेय, पानी और द्रव्य रखने की बोतलें, मक्खन और जैम के जार इत्यादि के बनाने में काम में लाया जाता है। यह एक बार में काम में लाने के लिए बेहतर होता है। इसे गर्म नहीं करना चाहिए। काफी समय से काम में ना लाई गयी बोतल या डिब्बा भी खतरनाक हो सकता है। इसको रीसायकल कर फिर अन्य सामान बनाया जा सकता है।  यह पारदर्शी, मजबूत, कठोर, तथा तथा गैस और नमी अवरोधक होता है। इसे पॉलीएथाइलीनटेरेफ्थालेट (Polyethylene terephthalate) PET या PETE के नाम से जाना जाता है। 
2.  Plastic-recyc-02.svgयह ज्यादातर पानी के पाइप, छल्ले, खिलौने,  दूध, जूस और पानी की बोतलें, शैम्पू, प्रसाधन  की बोतलें इत्यादि को बनाने के काम आता है। इसे भी रीसायकल किया जा सकता है। यह अपनी मजबूती, कठोरता, नमी प्रतिरोधक, गैस के आवागमन के लिए सुरक्षित होने के कारण काम में लाया जाता है। इसे हाई-डेन्सिटी पॉलीएथाइलीन, HDPE के नाम से जाना जाता है। 

3. Plastic-recyc-03.svg यह जूस की बोतलें,  फिल्में; पीवीसी पाइप, फ्लोरिंग, साइडिंग, टेबल कवर, इत्यादि  बनाने के काम आता है। यह बहुउद्देशीय, पारदर्शी, आसानी से मिश्रित होने वाला, मज़बूत, तथा कठोर होता है।  इसे  पॉलीविनाइल क्लोराइड PVC के  जाना जाता है। इससे बचाव करना चाहिए। इसको बनाते समय कई हानिकारक पदार्थ भी बन जाते हैं। यह आसानी से रिसायकल भी नहीं होता। 

4.  Plastic-recyc-04.svgयह प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों के बैग, लचीली बोतलों, फिल्मों, डिब्बों या जारों के ढक्कन, ट्यूब आदि के बनाने के काम में लिया जाता है। यह अपनी  मजबूती, कठोरता, लचीलापन, सील करने में आसान, नमी अवरोधकता तथा अपनी आसानी से होने वाली प्रोसेसिंग के लिए जाना जाता है। इसे लो-डेन्सिटी पॉलीएथाइलीन, LDPE के नाम से जानते हैं। यह सुरक्षित पदार्थ है। इसकी रिसाइकिलिंग से थैले वगैरह बनाए जाते हैं। 
5.  Plastic-recyc-05.svg इससे रीसायकल योग्य बर्तन, रसोई में तथा माइक्रोवेव में पकाने योग्य डिस्पोजेबल डिब्बे, बर्तन, खाद्य पदार्थों को रखने के डिब्बे, टब, ऑटो पार्ट्स, इंडस्ट्रीयल काम, डिस्पोजेबल कप, प्लेटें इत्यादि बनाए हैं। यह मजबूती, कठोरता, ऊष्मा, रसायन, ग्रीस, तेल, नमी अवरोधक, बहुउद्देशीय पदार्थ के रूप में जाना जाता है। इसे पॉलीप्रोपाइलीन, PP के नाम से जानते हैं। यह सुरक्षित तो है पर इसको रीसायकल कर लेना चाहिए।  
6.  Plastic-recyc-06.svgइसका प्रयोग अंडों को रखने वाले डिब्बे, सूखे मेवों, मूंगफली इत्यादि की पैकिंग, डिस्पोजेबल कप, ग्लास, प्लेटें, ट्रे, कटलरी, डिब्बे, फर्नीचर को पैक करने के फोम इत्यादि बनाने में होता है। विभिन्न कामों में उपयोग में आने वाला यह पारदर्शी आसानी से गठित हो जाने वाला पदार्थ है।  इसे पॉलीस्टाइरीन, PS के नाम से जाना जाता है। इसे सँभाल कर उपयोग में लाना चाहिए यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। 
7. Plastic-recyc-07.svgइसे ज्यादातर एक्रेलिक, नायलोन और इलेक्ट्रॉनिक आवरण बनाने के काम में लाया जाता है। इसे पॉलिमर के संयोजन से बनाया जाता है। यह सबसे ज्यादा हानिकारक पदार्थ है। इससे बड़े-बड़े पानी के कन्टेनर, केन्स, तेल की टंकियो, डीवीडी, कंप्यूटर केस, आईपैड इत्यादि बनाए जाते हैं। इसे अक्सर पॉलीकार्बोनेट के बदले काम में लिया जाता है। 

आज हर तरफ प्लास्टिक का बोल-बाला है। इन्हें बिलकुल नकार दिया जाना भी सम्भव नहीं है।  इनमें से कुछ पर्यावरण के तथा इंसान के लिए हानिरहित भी हैं। पर अधिकतर हमारे लिए और पर्यावरण के लिए हानिकारक ही हैं। इन्हें कभी भी गर्म नहीं करना चाहिए, जब तक उस पर ऐसा करना हानिरहित न लिखा हो। ज़रा सी टूट-फूट होने के बाद इनका उपयोग नहीं करना चाहिए।  इनका उपयोग भी खूब सोच-समझ कर ही करना चाहिए। इसकी श्रेणियों में 1, 2, 4, 5  को उपयोग के लिए सुरक्षित और 3, 6, 7, खासकर 7 को हानिकारक मान कर उनका कम  उपयोग करना चाहिए। यदि किसी प्लास्टिक की वस्तु पर कोई कोड ना लिखा हो तो उसे ना खरीदना ही बेहतर है।  

संदर्भ अंतरजाल  

सोमवार, 22 अगस्त 2016

खेलों को निष्णात, समर्पित लोगों की जरुरत है !.....ना कि

इस बार के ओलिम्पिक को लेकर खेल संस्थानों ने भी बड़े-बड़े दावे पेश कर हमारी उम्मीदें बढ़ाई हुई थीं। पर कारण कुछ भी हो नतीजों का आशानुरूप ना होना सबको मायूस कर गया। यही मायूसी कुंठा बन कइयों की भड़ास बन गयी। जो कि होना नहीं चाहिए था। पर जब तक खेल से जुड़े, निष्पक्ष, समर्पित लोगों और खिलाड़ियों का जुड़ाव, सलाह या संरक्षण खेलों को प्राप्त नहीं होगा तब तक अपने यहां किसी फेल्प्स, किसी बोल्ट, किसी रिसाको या रूथ का पनपना या उसकी कल्पना करना ही बेमानी होगा....

खेलों का महाकुंभ इतिहास में दर्ज हो गया। पिछले, यानी 2012 के लंदन में हुए ओलिम्पिक में अपनी उपलब्धियों को देखते हुए इस बार सारा देश बहुत ही उत्साहित था। हर कोई पिछली बार से और ज्यादा पदकों की आशा लगाए बैठा था। खेल संस्थानों ने भी बड़े-बड़े दावे पेश कर हमारी उम्मीदें बढ़ाई हुई थीं। पर कारण कुछ भी हो नतीजों का आशानुरूप ना होना सबको मायूस कर गया। यही मायूसी कुंठा बन कइयों की भड़ास बन गयी। जो कि होना नहीं चाहिए था। किसी को भी भूलना नहीं चाहिए कि इतने बड़ी प्रतिस्पर्धा में भाग लेने वाले पर, अपनी कला में पारंगत होने के बावजूद, कितना बड़ा मानसिक दवाब रहता है, जो उनके प्रदर्शन पर प्रभाव डालता है। वह तो कोई-कोई  बिरला खिलाड़ी ही होता है जो अपनी अदम्य इच्छाशक्ति और लौह समान हौसलों से हर विषम परिस्थिति को धत्ता बता अपना लक्ष्य हासिल करने का माद्दा रखता है।   

ऐसे समय जब प्रत्येक भारतवासी के मन में टीस सी है, तो कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता खेल के नतीजों से या लोगों की निराशा से। इन्हें नाहीं खिलाड़ियों पर भड़ास निकालने वाले जानते हैं नाहीं देश के लोगों को उनका नाम मालुम है। ये वे लोग हैं जो येन-केन-प्रकारेण अपने सरपरस्तों, आकाओं या रसूखदार रिश्तेदारों की वजह से सुयोग हथिया वहां का हिस्सा  बन बैठते हैं पर वहां भी अपनी जिम्मेदारियों से बाज आते ही दिखते हैं, नहीं तो क्या कारण था कि ओलिंम्पिक मैराथॉन जैसी कठिनतम स्पर्धा में भाग लेने वाली 'जैशा' को दौड़ के दौरान पानी तक उपलब्ध करवाने के लिए कोई उपस्थित नहीं था ! विषम परिस्थियों और तेज गर्मी में उसने कैसे दौड़ पूरी की होगी वही जानती है ! जबकि इक्के-दुक्के खेल में मिली सफलता में अपनी उपस्थिति दर्शाने को बेताब ऐसे लोगों को नियमों की अवहेलना करने के कारण शर्मिंदा होना पड़ा था। ऐसे ही लोगों की उपस्थिति खिलाड़ियों का मनोबल कमजोर करने में भी कोई कसर नहीं छोडती। पर इनके दब-दबे से आतंकित-आशंकित ना तो मिडिया ही ज्यादा कुछ बोलता है ना हीं खिलाड़ियों को "साफ्ट टार्गेट" मान उन पर तंज कसने वाले लोग ! पर समय के अनुसार अब धीमी-धीमी, कहीं-कहीं, कभी-कभी ही सही आवाज उठने लगी है कि राजनीति और राजनेताओं को खेलों से दूर ही रखा जाए। पर सोने की मुर्गी को कोई भी छोडना नहीं चाहता ! क्रिकेट का उदाहरण हमारे सामने है। जबकि देश भर के सरकारी संस्थानों या सरकारी संरक्षता में चल रहे किसी भी उद्यम का हाल किसी से छिपा नहीं है। इसलिए जब तक खेलों को निष्णात, निष्पक्ष, समर्पित लोगों और खिलाड़ियों का जुड़ाव, सलाह या संरक्षण प्राप्त नहीं होगा तब तक अपने यहां किसी फेल्प्स, किसी बोल्ट, किसी रिसाको या रूथ का पनपना या उसकी कल्पना करना ही बेमानी होगा।   

बुधवार, 17 अगस्त 2016

धर्मस्थलों में जाना दुश्वार होने लगा है !

रानी सती जी के मंदिर से चल जब रात नौ बजे के करीब सालासर पहुंचे तो वहाँ अपार जन-समूह  को ठाठें मारते देख हम सबके होश उड़ गए। कहीं भी रहने की जगह नहीं मिल पा रही थी। इस बार अगस्त की 13-14-15 की एक साथ पड़ी तीन छुट्टियों ने यह सीख तो दे ही दी कि हम सिर्फ तुम्हारे लिए ही नहीं आईं  हैं, हजारों और लोग भी हमारा फ़ायदा उठाने को आतुर हैं ! किसी तरह 'अग्रवाल सेवा सदन' में दो कमरे मिले, हमने प्रभु को शुक्रिया अदा किया और अत्यधिक थके होने के बावजूद, बच्चे भी रात की अंतिम आरती में भाग लेने मंदिर की ओर अग्रसर हो गए। 
मंदिर से पच्चीस-तीस की.मी. पहले प्रवेश द्वार  


वहाँ का हाल भी बेहाल था। रात दस बजे भी अपार भीड़ थी, जिसके कारण अंदर जाने का मार्ग बंद कर दिया गया था। हम निराश हो लौटने ही लगे थे कि एक सज्जन ने मार्ग फिर खुलने की जानकारी दी, शायद प्रभु को हमारे ऊपर तरस आ गया था। आरती समाप्त हो चुकी थी, पर व्यवस्थापकों ने वहां उपस्थित लोगों को जल्दी-जल्दी दर्शन कर लेने का सुयोग प्रदान कर दिया था। निकलते-निकलते  सवा ग्यारह बज गए थे किसी तरह, एक-दूसरे पर लदे लोगों के बीच जो मिला, खा कर करीब बारह बजे जो बिस्तर पर गिरे तो सुबह आठ बजे ही होश आया। सब के आलस मिटाते, सुस्ताते, बतियाते, चाइयाते (चाय इत्यादि), नहाते-धोते करीब ग्यारह बज गए, सवा ग्यारह के आस-पास हम फिर मंदिर में दर्शन हेतु लाइन में लगे हुए थे। 
पंच-मुखी वक्र-गामी मार्ग 




दिनों-दिन, जैसे-जैसे भीड़ बढती जाती है वैसे-वैसे उसे सँभालने के जतन भी मंदिर वाले करते जाते हैं। जब भी कभी जाना होता है, तभी कोई नया बढ़ा हुआ रास्ता देखने को मिलता है। इस बार रास्ते को और लंबा पाया। पहले 'राम सेतु' नामक "फ्लाई ओवर" से गुजर कर पंचमुखी, वक्र-गामी मार्ग पर आना हुआ। इस जगह हजार के ऊपर, लोग समाए हुए थे। हालांकि स्वंयसेवी संस्थाओं द्वारा विशाल कूलरों और पीने के पानी की व्यवस्था की गयी थी, फिर भी गर्मी और उमस के मारे बुरा हाल था। कतार धीरे-धीरे, रुकते-चलते, रेंगते दूसरे हॉल में पहुंची जहां त्रिमुखी वक्र मार्ग हमारा इंतजार कर रहा था। वहां समय बिता एक और 'पल' से होते हुए जब मुख्य द्वार के पास द्विमुखी वक्र मार्ग में फंसे तब पाया कि भारी जेबों वाले, देश के ख़ास कहे जाने वाले, पुलिस और पण्डों की पहचान वालों से पटा एक दूसरे मार्ग का मुहाना भी वहीँ खुल रहा है। खैर धक्का खाते, धकियाते, दर्शन पाते अपने-आप बाहर आते-आते घडी ने दो बजा ही दिए थे। इसीलिए तुरंत ऑटो कर 'चमेली देवी सेवा सदन पहुंचे, इस बार भीड़ के कारण वहां रहना संभव नहीं हो पाया था पर उसका आजमाया हुआ खाना, जाना-पहचाना था। जल्दी इसलिए थी क्योंकि वहां "लंच' दो बजे तक ही उपलब्ध होता है, पर कुछ देर होने के बावजूद भोजन उपलब्ध हो गया। 






हर बार सालासर धाम से करीब चालीस की.मी. दूर डूंगरगढ़ बालाजी के दर्शन हेतु जरूर जाना होता है। पर पिछली बार उधर जाने के बाद समयाभाव के कारण लौटते समय खाटू श्याम जी के दर्शन नहीं हो पाए थे, सो इस बार समय हाथ में रख, चार बजे माँ अंजनी के दर्शनों के बाद हम सब खाटू के लिए रवाना हो गए। सालासर से करीब 85 की.मी. की दूरी पर सीकर जिले में स्थित यह भीम पुत्र बर्बरीक का मंदिर है। जिसकी मान्यता मारवाड़ी समाज सहित पूरे देश में मानी जाती है। शाम को छह बजे जब वहां पहुंचे तो पाया कि वहां भी पैर रखने की जगह नहीं है। भीड़ के कारण गाडी खड़े होने की जगह से मंदिर तक का पांच सौ गज का फासला पैदल तय करने में चालीस मिनट लग गए। मालुम पड़ा कि एकादशी और रविवार का संयोग एक साथ पड़ने के कारण जन-समुद्र उमड़ा पड़ा है। सारी जगहें छान मारीं, कहीं भी आश्रय स्थल उपलब्ध नहीं हुआ। हो भी जाता तो दर्शन दुर्लभ थे, मीलों लंबी कतार में करीब पच्चीस से तीस हजार लोग खड़े थे। हालात तब और पस्त हो गयी जब सुनने में आया कि यह हालात सुबह चार बजे से ही हैं, लोगों के ठठ्ठ के ठठ्ठ आते जा रहे हैं, भीड़ बढती ही जा रही है। आपस में विचार-विमर्श कर बच्चों और साथ के लोगों की सेहत को ध्यान में रख उसी समय दिल्ली वापसी का फैसला पास करवा लिया गया। शाम के साढ़े सात बजे टेम्पो-ट्रेव्हलर ने रवानगी ले, दो बजे के आस-पास वापस हमें घर तक पहुंचा दिया। 

इस यात्रा ने ज्ञान चक्षुओं को खोलते हुए कुछ बातें गाँठ बाँध लेने को कहीं। पहली कि छुट्टियां सिर्फ हमारी ही नहीं होतीं ! दूसरे आप कहीं भी जा रहे हों, भले ही आप वहां से पूरी तरह से परिचित हों फिर भी ताजा जायजा जरूर ले लें !! तीसरे हर देवता का दिन-त्यौहार देख परख कर ही वहां जाने का कार्यक्रम बनाएं, और यदि उसी बीच जाना ही हो तो आने वाली परेशानियों का सामना करने के लिए तैयार हो कर जाएं। सबसे अहम परामर्श, आपकी चाहे हजार इच्छा हो, बिना प्रभु की मर्जी के किसी भी देवस्थान तक नहीं जाया जा सकता है और जब उनकी अनुमति होती है तो कोई भी बाधा वहाँ जा दर्शनों से नहीं रोक पाती। इस बात को मूल मंत्र बना लें।        

मंगलवार, 16 अगस्त 2016

तीन अवकाश और बालाजी धाम की यात्रा

कुछ दिनों पहले इसी ब्लॉग पर लिखा था कि अपनी हजार इच्छा हो, बिना प्रभु की मर्जी के किसी भी देवस्थान तक नहीं जाया जा सकता है और जब उनकी अनुमति होती है तो कोई भी बाधा वहाँ जा दर्शनों से नहीं रोक पाती। यह बात फिर एक बार सत्य साबित हुई जब इस बार 13-14-15 अगस्त को पड़ने वाले तीन अवकाशों का सदुपयोग फिर सालासर बालाजी के दर्शनों को करने का कार्यक्रम बना लिया गया। इस बार दो बच्चों समेत दस सदस्य थे इस लिए कार की बजाए टेम्पो-ट्रैवेलर का इंतजाम किया गया।    

यात्रा के लिए रास्ता चुना गया दिल्ली-बहादुरगढ़-झझ्झर-चर्खीदादरी-लोहारू-झुंझुनू-मुकुंदगढ़-लक्ष्मणगढ़ होते हुए सालासर का। इस रास्ते का पहला फ़ायदा यह है कि इधर से जाने पर करीब 70-80 की. मी. की बचत होती है। दूसरे इस मार्ग पर टोल-टैक्स बहुत कम लगता है। सिर्फ 170 रुपये जबकि राष्ट्रीय राजमार्ग पर करीब सात सौ रुपये चुकाने पड़ते हैं। हाँ यह जरूर है कि इस तरफ से जाने पर करीब चालीस प्रतिशत घटिया सडकों पर सफर करना पड़ता है जिससे यात्रा का समय कुछ बढ़ जाता है। वापसी में सीकर जिले के खाटू में स्थित खाटू श्याम जी के दर्शनों के बाद मुख्य मार्ग, रींगस-माधोपुर-कोटपुतली-नीमराना-भिवाड़ी-गुड़गांव होते हुए दिल्ली लौटना तय हुआ था।

तेरह अगस्त की सुबह साढ़े दस बजे गाडी ने सालासर का रुख कर लिया। रुकते, चलते, खाते-बतियाते अपराह्न साढ़े तीन बजे कार्यक्रमानुसार,   राजस्थान के शेखावटी क्षेत्र के झुंझनु जिले में स्थित करीब चार सौ साल पुराने




रानी सती मन्दिर पहुँचना हो गया था। इस जगह का साफ़-सुथरा, शांत, सुन्दर, पवित्र माहौल सबको बरबस आकर्षित कर लेता है। मंदिर परिसर में ही राम दरबार, गणेश मंदिर, हनुमान मंदिर, तथा शिव जी के मंदिरों के साथ ही 13 सती मंदिर भी बने हुए हैं। मन्दिर के एक बाजू में कुछ गहराई में सीढ़ियों युक्त सुंदर लॉन बना हुआ है जिसमें फौव्वारे लगाए गए हैं। दूसरी तरफ एक बगीचा है जिसमें भगवन शिव की प्रतिमा के साथ कुछ वन्य पशुओं की सजीव सी लगने वाली   मूर्तियां मन मोह लेती हैं। ऐसी मान्यता है   






कि यहां मांगी हुई मुरादें बहुत जल्दी पूरी हो जाती हैं तथा कठिन समय में माँ अपने बच्चों को सहारा जरूर देती हैं। देश में ही नहीं विदेशों में भी इनके अनगिनत भक्त हैं। महाभारत के युद्ध में जब अभीमन्यु वीर गति को प्राप्त होते हैं तब उनकी पत्नी उत्तरा भी उन्हीं के साथ अपने प्राण त्यागना चाहती है। तब भगवान् श्री कृष्ण ने उसे समझाया और वरदान दिया कि वह कलियुग में नारायाणी  रूप में अवतार ले, सती दादी के रूप में विख्यात होगी और जन जन का कल्याण करेगी तथा सारी दुनिया में पूजी जाएगी। उसी वरदान के फलस्वरूवप उत्तरा ने वि. सं. 1638 में कार्तिक शुक्ला नवमीं दिन मंगलवार को डोकवा गाँव में जन्म लिया तथा लगभग 715 वर्ष पूर्व 06.12.1295 को सती हुईं। 




इस संगमरमर से बने मंदिर की विशेषता है कि इसमें किसी पुरुष या महिला की मूर्ति के बदले एक अलौकिक शक्ति की आराधना की जाती है। भारत में सती प्रथा प्रतिबन्धित होने के कारण यहां कई तरह के उत्सवों और मेलों पर रोक होने के बावजूद इस जगह अत्यधिक मान्यता है। अधिकृत रूप में ना सही पर यह आंकलन है कि यहां चढने वाले चढ़ावे का मूल्य  देश के सबसे धनी मंदिर तिरुपति के बालाजी के बराबर है। 

उमस और गर्मी यहां भी काफी थी, वाहन चालक के वाहन में वातानुकुलित अवस्था में बैठे रहने से, सुबह से चल रही गाडी का इंजन काफी गर्म हो गया और उसे सामान्य हालात में लाते-लाते शाम के छह बज गए तब जा कर बालाजी धाम की ओर अग्रसर होना संभव हो पाया। जहां पहुंचते-पहुंचते रात के नौ बज गए थे। रानी सती मंदिर में भी लोग थे पर ज्यादा भीड़-भाड़ महसूस नहीं हो रही थी पर सालासर में तो अपार जन-समूह उमड़ा पड़ा था। सब एक साथ पड़े तीन अवकाशों का कमाल था। कोई होटल, कोई धर्मशाला खाली नहीं था। कहीं भी रहने की जगह नहीं मिल पा रही थी। वह तो दो दिन पहले किया गया फोन सहायता कर गया और मंदिर से करीब एक की.मी. की दूरी पर स्थित अग्रवाल सेवा सदन में दो कमरे मिलने पर हमने प्रभु को शुक्रिया अदा किया और थके होने के बावजूद बच्चे भी रात की अंतिम आरती में भाग लेने मंदिर की ओर अग्रसर हो गए।   
आगे का हाल कल........ 

सोमवार, 15 अगस्त 2016

मन जाना राष्ट्रीय पर्व का

वर्षों तक लोग स्वंय-स्फुर्त हो घरों से निकल आते थे, पूरे साल जैसे इस दिन का इंतजार रहता था। अब लोग इससे जुडे समारोहों में खुद नहीं आते उन्हें बरबस वहां लाया जाता है। दुःख होता है यह देख कर कि  अब इस पर्व को मनाया नहीं बस किसी तरह  निपटाया जाता है !!


तीन साल पहले की यह पोस्ट आज भी वैसी ही सामयिक है ! 

15 अगस्त, वह पावन दिवस, जिस दिन देशवासियों ने एकजुट हो आजादी पाई थी। कितनी खुशी, उत्साह और उमंग थी तब। वर्षों तक लोग स्वंय-स्फुर्त हो घरों से निकल आते थे, पूरे साल जैसे इस दिन का इंतजार रहता था। पर धीरे-धीरे आदर्श, चरित्र, देश प्रेम की भावना का छरण होने के साथ-साथ यह पर्व महज एक अवकाश दिवस के रूप मे परिवर्तित होने पर मजबूर हो गया। इस कारण और इसी के साथ आम जनता का अपने तथाकथित नेताओं से भी मोह भंग होता चला गया।

अब लोग इससे जुडे समारोहों में खुद नहीं आते उन्हें बरबस वहां लाया जाता है। अब इस पर्व को मनाया नहीं निपटाया जाता है। आज हाल यह है कि संस्थाओं में, दफ्तरों में और किसी दिन जाओ न जाओ आज जाना बहुत जरूरी होता है, अपने-आप को देश-भक्त सिद्ध करने के लिए। खासकर विद्यालयों, महाविद्यालयों में जा कर देखें, पाएंगे मन मार कर आए हुए लोगों का जमावड़ा, कागज का तिरंगा थामे बच्चों को भेड़-बकरियों की तरह घेर-घार कर संभाल रही शिक्षिकाएं, साल में दो-तीन बार निकलती गांधीजी की तस्वीर, नियत समय के बाद आ अपनी अहमियत जताते खास लोग। फिर मशीनी तौर पर सब कुछ जैसा होता आ रहा है वैसा ही निपटता चला जाना। झंडोत्तोलन, वंदन, वितरण, फिर दो शब्दों के लिए चार वक्ता, जिनमे से तीन आँग्ल भाषा का उपयोग कर उपस्थित जन-समूह को धन्य करते हैं और लो हो गया सब का फ़र्ज पूरा। कमोबेश यही हाल सब जगह हैं। 

आजादी के शुरु के वर्षों में सारे भारतवासियों में एक जोश था, उमंग थी, जुनून था। प्रभात फ़ेरियां, जनसेवा के कार्य और देश-भक्ति की भावना लोगों में कूट-कूट कर भरी हुई थी। चरित्रवान, ओजस्वी, देश के लिए कुछ कर गुजरने वाले नेताओं से लोगों को प्रेरणा मिलती थी।  यह परंपरा कुछ वर्षों तक तो चली फिर धीरे-धीरे सारी बातें गौण होती चली गयीं। अब वह भावना, वह उत्साह कहीं नही दिखता। लोग नौकरी के ड़र से या और किसी मजबूरी से, गलियाते हुए, खानापूर्ती के लिए इन समारोहों में सम्मिलित होते हैं। ऐसे दिन, वे चाहे गणतंत्र दिवस हो या स्वतंत्रता दिवस स्कूल के बच्चों तक सिमट कर रह गये हैं या फिर हम पुराने रेकार्डों को धो-पौंछ कर, निशानी के तौर पर कुछ घंटों के लिए बजा अपने फ़र्ज की इतिश्री कर लेते हैं। क्या करें जब चारों ओर हताशा, निराशा, वैमनस्य, खून-खराबा, भ्रष्टाचार इस कदर हावी हों तो यह भी कहने में संकोच होता है कि आईए हम सब मिल कर बेहतर भारत के लिए कोई संकल्प लें। फिर भी प्रकृति के नियमानुसार कि जो आरंभ होता है वह खत्म भी होता है तो एक बेहतर समय की आस में सबको इस दिवस की ढेरों शुभकामनाएं। क्योंकि आखिर इस दिवस ने किसी का क्या बिगाड़ा है, इसने तो हमें भरपूर खुश होने का मौका ही दिया है।