शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

सिनेमा घरों में राष्ट्रगान

बात सम्मान की है, यदि कोई जबरदस्ती खड़ा हो भी जाता है पर उसका ध्यान कहीं और होता है तो उसका क्या फ़ायदा ! अभी दो दिन पहले फिल्म देखने जाना हुआ था, शुरू होने के पहले जब राष्ट्रगान बजा तो सब खड़े तो हुए पर दसियों लोग अपने मोबाइल में ही उलझे दिखे। मेरी सामने वाली कतार में भी एक युवक अपने मोबाइल पर झुका हुआ था, गान के दौरान तो मैंने उससे कुछ न कहा, उचित भी नहीं था, पर गान ख़त्म होने पर रहा नहीं गया और सिर्फ यही कहा कि सिर्फ 52 सेकेंड की अवधि का ही होता है नेशनल सांग....

अपने यहां तर्क-वितर्क बहुत होते हैं। हर आदमी हर चीज का विशेषज्ञ बना हुआ है। कोई भी बात हो उसमें कमी खोजना फैशन बन गया है। आए दिन एक विवाद ख़त्म होता नहीं दूसरा शुरू हो जाता है। नयी बहस सिनेमा हॉलों में फिल्म शुरू होने के पहले राष्ट्रध्वज दिखलाने के साथ-साथ राष्ट्रगान बजाते समय उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों पर  कर हुई है। जिस दिन न्यायालय ने सिनेमाघरों में फिल्म के पहले राष्ट्रगान बजाने का नियम लागू किया उसी दिन से कुछ लोगों में असमंजस की स्थिति बन गयी। कुछ जगह इस बात को ले लोगों
में विवाद हो गया कि कहानी के अनुसार यदि फिल्म में राष्ट्रध्वज और गान हो तो खड़े होना है कि नहीं ! बात बढ़ते देख न्यायालय ने फिर आदेश पारित किया कि फिल्म के बीच में बजने वाले गान के दौरान खड़ा होना जरुरी नहीं है। पर बात यहां ख़त्म नहीं हुई हमारे कुछ ज्यादा पढ़े-लिखे लोगों ने, जिनमें सिनेमा घरों के मैनेजर तक हैं, फिल्म के बीच का अर्थ निकाल लिया कि अब राष्ट्र गान मध्यांतर के समय बजेगा ! उन्होंने आपत्ति दर्ज कर दी कि उस समय लोग कुछ खा-पी रहे होते हैं और हॉल के डिलीवरी बॉय भी कुछ न कुछ वितरित करते रहते हैं, इससे फिर अव्यवस्था फ़ैलाने की पूरी गुंजाइश हो सकती है। बिना सोचे-समझे, बिना पूरी जानकारी हासिल किए कुछ भी समझ कर कुछ भी बोल देना हमारी आदत में शुमार हो चुका है। इसमें देश का हर वर्ग शामिल है। 

कुछ वर्षों पहले ऐसे ही फिल्म के खत्म होने पर राष्ट्रगान बजाया जाता था। जिसे लोग अनमने ढंग से सुनते थे। दरवाजों तक आ पहुंचे बाहर निकलने को आतुर दर्शकों को द्वार बंद कर एक तरह से जबरदस्ती गान सुनवाया जाता था। फिर अनचाही परिस्थितियों के कारण उसे बंद कर दिया गया। अब फिर एक आदमी की याचिका पर इसे शुरू किया गया है।

इंसान की फ़ितरत है कि बिना मजबूरी के, वह किसी के कहने या थोपे गए आदेश के चलते, सहज नहीं रहता, जैसे कि अपनी मर्जी से भले ही वह एक जगह घण्टों बैठा रहे पर किसी के कहने पर वह दस मिनट में ही ऊब जाता है। वैसा ही हाल राष्ट्रगान के बजाने का है।  पर क्या किसी में जबरदस्ती राष्ट्र-प्रेम की भावना भरी जा सकती है। यह नहीं कहा सकता कि गान के दौरान खड़ा ना होने वाला वाला इंसान देश विरोधी है पर उसके ऐसा करने पर माहौल तो असहज हो ही जाता है।  

बात सम्मान की है, यदि कोई जबरदस्ती खड़ा हो भी जाता है पर उसका ध्यान कहीं और होता है तो उसका क्या फ़ायदा ! अभी दो दिन पहले फिल्म देखने जाना हुआ था, शुरू होने के पहले जब राष्ट्रगान बजा तो सब खड़े तो हुए पर दसियों लोग अपने मोबाइल में ही उलझे दिखे। मेरी सामने वाली कतार में भी एक युवक अपने मोबाइल पर झुका हुआ था, गान के दौरान तो मैंने उससे कुछ न कहा, उचित भी नहीं था, पर गान ख़त्म होने पर रहा नहीं गया और सिर्फ यही कहा कि सिर्फ 52 सेकेंड की अवधि का होता है नेशनल सांग, उसने तो बात  समझ कर सॉरी कहा, पर सवाल वही रहा कि क्या जबरदस्ती खड़ा करवा कर किसी से सम्मान करवाया जा सकता है ? वह तो दिल से होना चाहिए !  इन सब को मद्दे नज़र रख क्या राष्ट्रगान को सिनेमा हॉल में दिखाए जाने वाले नियम पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए ?

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

इतने अपशब्द तो महाभारत में भी नहीं बोले गए होंगे

हमारे देश में अनेकों भाषाएं बोली जाती हैं। सब का अलग-अलग लहजा और उच्चारण हैं। इसी कारण लाखों लोग अभी भी शुद्ध हिंदी नहीं बोल पाते हैं। उनका तो हम बुरा नहीं मानते। कहना तो नहीं चाहिए पर हमारे कुछ राष्ट्रपति भी कहां साफ़ हिंदी बोल पाते थे। अभी भी कई  कलाकार हैं जिन्होंने जिंदगी फिल्मों में गुजारने के बावजूद भाषा पर काबू नहीं पाया है। पर उनकी फिल्मों का ना कोई बायकॉट हुआ नाहीं उनका विरोध किया गया....

लगता नहीं, कि हमें बोलने की कुछ ज्यादा ही आजादी मिल गयी है। ख़ासकर इस चुनावी माहौल में तो हर हद पार कर दी गयी है। हर मर्यादा तोड़ दी गयी है। नाहीं किसी की उम्र का लिहाज बचा है नाहीं किसी पद की गरिमा। महिलाओं तक की बेइज्जती करने से ये तथाकथित नेता बाज नहीं आए !!!

आजादी के बाद काफी लंबे  समय तक नेताओं ने अपनी गरिमा बनाए रखी, एक दूसरे का मान-सम्मान  करते रहे। एक दूसरे अच्छाइयों की कदर की जाती रही। पर धीरे-धीरे धर्म-जाति-परिवारवाद का समीकरण रंग लाने लगा। राज्यों में येन-केन-प्रकारेण सत्ता का वरण करने के लिए, उल्टे-सीधे, मर्यादाहीन, उसूल विहीन, क्षणभंगुर गठबंधनों का चलन शुरू हो गया। जाहिर है यह मौका बन गया, स्तरहीन, अशिक्षित, असमाजिक तत्वों  का अपने बाहुबल, जातिबल, परिवारबल, संपर्कबल, धनबल के सहारे संकरी गलियों से होते हुए राजनीती में प्रवेश करने का। राज्यों की राजनीती केंद्र में भी पहुंचनी ही थी जिसके साथ ही अनियंत्रित भाषा और आचरण ने भी वहां स्थान बना, आरक्षण प्राप्त कर लिया।

नैतिकता को परछत्ती पर फेंक, किसी की अच्छाई की ओर ना ताकने की कसम खा, शुरू हो गया खोज-खोज कर एक-दूसरे की जानी-अनजानी, कमियों-विफलताओं-दोषों को बढ़ा-चढ़ा, घुमा-फिरा कर उजागर कर जनता के सामने उसकी छवि धूमिल करने का दौर !  किसी को विदेशी बता उसका अपमान किया जाने लगा, किसी की भाषा का मजाक बनाया जाने लगा, किसी के हाव-भाव की खिल्ली उड़ाई जाने लगी, किसी की पारिवारिक स्थिति की सरेआम तौहीन की जाने लगी तो किसी के भूतपूर्व पेशे को ही बहस का मुद्दा बना दिया गया। अब जिस पर हमला हुआ उसके चाटुकारों, चापलूसों ने भी उसका उसी रूप में जवाब दे-दे कर वातावरण में कडुवाहट घोलने से परहेज नहीं किया। सहनशीलता, सहिष्णुता, क्षमाशीलता सब तिरोहित हो गयीं।

हिंदीं को कमोबेश राष्ट्रभाषा का दर्जा मिल ही गया है। पर हमारे देश में अनेकों भाषाएं बोली जाती हैं। सब का अलग-अलग लहजा और उच्चारण हैं। इसी कारण लाखों लोग अभी भी शुद्ध हिंदी नहीं बोल पाते हैं। उनका तो हम बुरा नहीं मानते। कहना तो नहीं चाहिए पर हमारे कुछ राष्ट्रपति भी कहां साफ़ हिंदी बोल पाते थे। अभी भी कई  कलाकार हैं जिन्होंने जिंदगी फिल्मों में गुजारने के बावजूद भाषा पर काबू नहीं पाया है। पर उनकी फिल्मों का ना कोई बायकॉट हुआ नाहीं उनका विरोध किया गया। ऐसे ही किसी की सभा में हुई अफरा-तफरी को मजाक का विषय बनाने में किसी को झिझक नहीं हुई। खुद ऐसे लोग जो जिम्मेदारी के बावजूद किसी ना किसी बहाने अपना राज्य छोड़ दूर-दराज के प्रदेश में छुट्टियां मनाने में नहीं शर्माते, वही विरोधी दल के किसी सदस्य, जिस पर कोई बोझ भी नहीं है, की विदेश यात्रा को गुनाह का रूप देते नहीं हिचकते !

इसी संदर्भ में कम से कम उन तीन बातों का जिक्र जरुरी है जिनका प्रयोग लाक्षणिक रूप से हुआ था। पहली कुछ रकम का लोगों की जेब में आने का जिक्र था जिसका मंतव्य था कि यदि बाहर से सारा धन आ जाए तो इतनी-इतनी रकम हर आदमी के हिस्से आ सकती है इस बात का बतंगड़ बना यह प्रचार होने लगा कि उतनी रकम देने का वादा किया गया था। इसी को नाकामियों का मुद्दा बना दिया गया !  दूसरी बात अपने देश की हर एक प्राणी के प्रति लगाव रखने की थी; कि यदि कुत्ते का बच्चा भी गाडी से कुचल जाए तो हमें तकलीफ होती है इस बात का भी गलत अर्थ लगा लोगों की भावनाओं को भड़काने की कोशिश की जाने लगी। तीसरी स्नानागार से ताल्लुक रखने वाली बात का भी बतंगड़ बना जनता को भरमाने की कुत्सित चेष्टा शुरू कर दी गयी। जबकि असलियत बच्चे-बच्चे को पता है !!

वैसे ही कुछ लोग सिर्फ विरोध करने के लिए ही विरोध करते हुए एक ही जगह लक्ष्य साध अपनी दूकान चलाने में प्रयासरत हैं। कुछ लोग जान-बूझ कर कुछ ख़ास मौकों पर, जैसे अभी चुनाव के माहौल में तनाव पैदा करने वाले विवादास्पद बयान दे सुर्ख़ियों में बने रहना चाहते हैं। इन सब को देखना-समझना चाहिए कि कुछ लोग कुछ देर के लिए ही सब को बेवकूफ बना सकते हैं, सदा के लिए नहीं। अधिकतम लोग समझदार हैं जो इनकी बातों को सुनते तो हैं पर अपना काम सोच-समझ कर करते हैं पर अधिकांश अभी भी अशिक्षा और जागरूकता की कमी के कारण जाति-धर्म के साथ-साथ मुफ्त की चीजों के चक्कर में पड़ अपने हाथ कटवा बैठते हैं। इन्हीं की बदौलत अवसरवादी अपना खेल, खेल जाते हैं। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि अधिकाँश जनता की बदहाली ऐसे ही कारण है क्योंकि ये लोग जानते हैं कि जिस दिन अवाम शिक्षित हो गया वही दिन इनकी आकांक्षाओं का अंतिम दिन होगा।

वैसे भी इतिहास गवाह है कि जब-जब एक ही आदमी को लक्ष्य कर उसको बदनाम करने की कोशिश की गयी है, तब-तब उसी खास इंसान को जनता की सहानुभूति मिली है। दलों का राजनितिक मतभेद हो सकता है, होना भी चाहिए पर व्यक्तिगत आक्षेप करना कतई स्वागत योग्य नहीं है।  

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

वेलेंटाइन दिवस पर वह कहानी, जो प्रेम की पराकाष्ठा है

पहली बार बचपन में जब "उसने कहा था" कहानी को पढने और फिल्म देखने का मौका मिला तो ना कुछ महसूस हुआ नाहीं उसकी गहराई समझ में आई थी, सब सर के ऊपर से गुजर गया था। पढाई के दौरान इस कहानी के कोर्स में होने के कारण फिर बहुत बार इसे पढने का मौका मिला तब जाकर समझ में आया कि कैसे और क्यूं इस एक कहानी से ही गुलेरीजी अमर हो गये........ 

आज वेलेंटाइन दिवस है। पश्चिम से आयातित इस त्यौहार को बाज़ार ने प्रेम दिवस के रूप में भी खूब प्रचारित किया है । जिसने भारतीय युवाओं को भी खूब लुभाया है। सब इसे अपने-अपने अर्थ लगा, अपनी-अपनी समझ के अनुसार, अपने-अपने तरीके से मनाने की होड़ या कोशिश करते हैं। पर कितनों में अपने प्रिय के प्रति सच्चे प्रेम या त्याग की भावना रहती है ?   

वर्षों पहले श्री चंद्रधर शर्मा गुलेरीजी की अमर कहानी "उसने कहा था" उसी प्रेम की पवित्रता और गहराई के कारण खुद और अपने लेखक को अमर कर गयी है। पहली बार बचपन में जब "उसने कहा था" कहानी को पढा और फिर फिल्म भी देखी तो ना कुछ महसूस हुआ था नाहीं उसकी गहराई समझ में आई थी, सब सर के ऊपर से गुजर गया था। पढाई के दौरान इस कहानी के कोर्स में होने के कारण फिर बहुत बार इसे पढने का मौका मिला तब जाकर समझ में आया कि कैसे और क्यूं इस एक कहानी से ही गुलेरीजी अमर हो गये। लगता नहीं कि आज के अधिकांश युवा इससे परीचित होंगे। पहले तो कोर्स वगैरह में भी यह होती थी। पर धीरे-धीरे सब कुछ बदल ही तो रहा है। इस अमर कहानी का सार देने की कोशिश करता हूं। जो बताती है कि "वेलेंटाइन" कैसा होना चाहिए ।   

अमृतसर में अपने मामा के घर आए दस-ग्यारह साल के लहनासिंह का बाज़ार में अक्सर एक सात-आठ साल की लडकी से सामना हो जाता है। ऐसे ही छेड़-छाड़ के चलते लहना उससे पूछता रहता है "तेरी कुड़माई (सगाई)हो गयी" और लड़की "धत्" कह कर भाग जाती है। पर एक दिन वह बालसुलभ खुशी से जवाब देती है "हां, हो गयी। देखता नहीं मेरा यह रेशमी सालू"।

वह तो चली जाती है, पर लहना पर निराशा छा जाती है। दुख और क्रोध एक साथ हावी हो, बहुतों से लड़वा, भिड़वा, गाली खिलवा कर ही उसे घर पहुंचवाते हैं। पच्चीस साल बीत जाते हैं। फौज में लहना सिंह जमादार हो जाता है। उसका अपनी बटालियन के सूबेदार हज़ारा सिंह के साथ अच्छा दोस्ताना है। एक ही तरफ के रहनेवाले हैं। हज़ारा सिंह का बेटा बोधा सिंह भी इनके साथ उसी मोर्चे पर तैनात है। कुछ दिनों पहले छुट्टियों में ये घर गये थे। तभी पहला विश्वयुद्ध शुरु हो जाता है। सबकी छुट्टियां रद्द हो जाती हैं। हज़ारा सिंह खबर भेजता है, लहना सिंह को
कि मेरे घर आ जाना, साथ ही चलेंगे। लहना वहां पहुंचता है तो सूबेदार कहता है कि सूबेदारनी से मिल ले, वह तुझे जानती है। लहना पहले कभी यहां आया नहीं था, चकित रह जाता है कि वह मुझे कैसे जानती होगी। दरवाजे पर जा मत्था टेकता है। आशीष मिलती है। फिर सूबेदारनी पूछती है "पहचाना नहीं?  मैं तो देखते ही पहचान गयी थी....तेरी कुड़माई हो गयी.......धत्.....अमृतसर"

सब याद आ जाता है लहना को। सूबेदारनी रोने लगती है। बताती है कि चार बच्चों में अकेला बोधा बचा है। अब दोनों लाम पर जा रहे हैं। जैसे तुमने एक बार मुझे तांगे के नीचे आने से बचाया था, वैसे ही इन दोनों की रक्षा करना। तुमसे विनती है।

मोर्चे पर बर्फबारी के बीच बोधा सिंह बिमार पड़ जाता है। खंदक में भी पानी भरने लगता है। लहना किसी तरह बोधे को सूखे में सुलाने की कोशिश करता रहता है। अपने गर्म कपड़े भी बहाने से उसे पहना खुद किसी तरह गुजारा करता है। इसी बीच जर्मन धोखे से हज़ारा सिंह को दूसरी जगह भेज खंदक पर कब्जा करने की कोशिश करते हैं पर लहना सिंह की चतुराई से हज़ारा सिंह की जान और खंदक दोनों बच जाते हैं। पर वह खुद बुरी तरह घायल होने पर भी चिकित्सा के लिये बाप-बेटे को पहले भेज देता है, हज़ारा सिंह से यह कहते हुए कि घर चिठ्ठी लिखो तो सूबेदारनी से कह देना उसने जो कहा था मैने पूरा कर दिया है। उनके जाने के बाद वह अपने प्राण त्याग देता है।

यह तो कहानी का सार है। पर बिना इसे खुद पढे इसकी मार्मिकता नहीं समझी जा सकती।  गुलेरीजी के शब्दों मे ही, अमृतसर के तांगेवालों की चाकू से भी तेज धार की जबान, दोनों बच्चों की चुहल, खंदक की असलियत, लड़ाई की विभीषिका, सूबेदारनी की याचिका, लहना की तुरंत-बुद्धि और फिर धीरे-धीरे करीब आती मौत के साये में स्मृति के उभरते चित्र, वह सब बिना पढे महसूस करना मुश्किल है।

यदि कभी भी मौका मिले तो इसी नाम पर बनी पुरानी फिल्म "उसने कहा था" देखने से ना चूकें।  जिसमें स्व. सुनील दत्त और नंदा जी ने काम किया था।

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

तकनीक को सेवक बना कर ही रखें

इसमें कोई शक नहीं कि आधुनिक फोन के अनगिनत लाभ, ढेरों अच्छाइयां, विशेषताएं तथा उपयोग हैं पर साथ ही कुछ बुराइयां भी हैं। सही मायने में यह फोन की भी बुराइयां नहीं हैं हमारी ही गलतियां हैं, जो हम बिना सोचे-समझे उसका अनियंत्रित तरीके से प्रयोग करते रहते हैं। अति तो किसी भी चीज की बुरी होती है फिर चाहे वह अमृत ही क्यों न हो !

आजके युग में जितनी क्रांति, जितनी खोज, संचार-माध्यम में हुई है उतना शायद और किसी भी क्षेत्र में नहीं हो पाया है। यहां तो अभी भी तूफान चल  रहा है। नयी-नयी ईजादें, नयी-नयी तकनीकें, नए-नए उपकरण दुनिया भर के बाज़ारों में तहलका मचा  रहे हैं। उपकरणों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय आज स्मार्ट फोन है जिसका उपयोग
बाल, वृद्ध, नौजवान सभी धड्डले से कर रहे हैं पर जिसका सबसे बड़ा ग्राहक आजका युवा वर्ग है। जो बुरी तरह इसको अपनी लत बना चुका है, दिन-दोपहर-शाम-रात जब देखो, जहां देखो फोन से चिपका नज़र आता है, जाने-अनजाने, बिना इसकी फ़िक्र किए कि यह आदत सेहत और शरीर के लिए अत्यंत हानिकारक है। अब तो डॉक्टरों ने भी यह प्रमाणित कर दिया है कि जहां मोबायल फोन का अनियंत्रित उपयोग कान, गर्दन, हाथो, उँगलियों, कलाइयों और उनके जोड़ों में तरह-तरह की समस्याएं उत्पन्न कर गठिया रोग तक का कारण बन जाता है, वहीँ यह आँखों की रौशनी के लिए भी अत्यंत खतरनाक सिद्ध हो चुका है।  

आजकल देखा गया है कि घरों में बाकी सदस्यों के सो जाने के बाद बच्चे और युवा अंधेरे में भी अपने स्मार्ट फोन का इस्तेमाल करते रहते हैं जिससे शरीर के सबसे नाजुक अंग आँख पर बहुत जोर पड़ता है। लगातार ऐसा होने से वह अपनी देखने की क्षमता खो बैठती है। अभी "जर्नल ऑफ मेडिसिन" पत्रिका में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, दो महिलाओं में ट्रांजिएट स्मार्टफोन ब्लाइंडनेस पाया गया। इस बिमारी में किसी के अंधेरे में लगातार स्मार्टफोन का इस्तेमाल करने पर एक आंख की रौशनी कुछ मिनटों के लिए चली जाती है। यदि आदत ना बदली जाए तो आँख स्थाई तौर पर देखने की शक्ति गंवा देती है।

हमारी आँख का रेटिना बहुत ही संवेदनशील तथा नाजुक अवयव होता है। उजाले से अँधेरे में जाने या फिर अँधेरे से तुरंत प्रकाश में आने पर इसे स्थिति से सामंजस्य बैठाने में कुछ समय लगता है। इसीलिए जब हम
रौशनी से अँधेरे में जाते हैं तो पहले कुछ भी दिखाई नहीं देता पर धीरे-धीरे वातावरण से आँखें अभ्यस्त हो जाती हैं वैसे ही अँधेरे से उजाले में जाने पर आँखें चौधिया जाती हैं जिसके अनुकूलन में समय लगता है। बहुत से लोगों की आदत है कि सुबह उठाते ही वे फोन की ओर लपकते हैं जबकि आँखें अभी प्रकाश की अभ्यस्त नहीं हुई होतीं इससे रेटिना पर जबरदस्त जोर पड़ता है जो आँखों के लिए नुक्सान-दायक होता है। दूसरी ओर पाया गया है कि अधिकतर लोग सोते समय रात के अँधेरे में फोन पर एक ही आँख से नज़र गड़ा उसका प्रयोग करते हैं जिससे एक आँख फोन की तीव्र सफ़ेद रौशनी में तथा दूसरी अँधेरे में होने की वजह से आपस में तारतम्य नहीं बैठा पातीं और क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। 

इसमें कोई शक नहीं कि आधुनिक फोन के अनगिनत लाभ, ढेरों अच्छाइयां, विशेषताएं तथा उपयोग हैं पर साथ ही कुछ बुराइयां भी हैं। सही मायने में यह फोन की भी बुराइयां नहीं हैं हमारी ही गलतियां हैं, जो हम बिना सोचे-समझे उसका अनियंत्रित तरीके से प्रयोग करते रहते हैं। अति तो किसी भी चीज की बुरी होती है फिर चाहे वह अमृत ही क्यों न हो ! इसीलिए जहां तक हो सके इसका संभल कर उपयोग करना चाहिए वहीँ दूसरों को खासकर बच्चों को इसके गुण-दोषों से अवगत कराते रहना चाहिए। वैसे तो इसका जहां तक हो सके काम उपयोग करना चाहिए जो की संभव नजर नहीं आता फिर भी सोने के पहले इस पर अपने काम बीसेक मिनट पहले निपटा लें, सोते समय इसे अपने शरीर से करीब चार फिट दूर रखें, रात को बहुत जरुरी हो तो इसका स्क्रीन "डार्क" कर इसका उपयोग करें और सुबह उठाने के बाद करीब पन्द्रह मिनट बाद ही इसे प्रयोग में लाएं। सदा ध्यान रखें शरीर ही है जिससे दुनिया का उपभोग है यही साथ नहीं देगा तो दुनिया किस काम की !

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

पहले प्रावधान हो फिर विधान हो

सत्तर के दशक में कलकत्ता शहर के लिए एक कानून पारित किया गया था, जिसके तहत यदि कोई मूत्रालय के अलावा कहीं और मूत्र-विसर्जन करते पकड़ा जाता था तो उसे जुर्माना भरना पड़ता था ! शहर को साफ़-सुथरा रखने के लिए उठाया गया था यह कदम, सोच अच्छी थी, पर नियम लागू करते समय किसी ने शहर की आबादी के अनुपात में, ना के बराबर मूत्रालयों की संख्या पर नाहीं सोचा था, नाहीं ध्यान दिया था ! परिणाम, संघर्ष, अराजकता, असंतोष, टकराव !

कई बार लगता है कि जोश में, भावनाओं के अतिरेक में, कुछ कर गुजरने की चाह में, बिना मौजूदा स्थिति का आकलन किए ऐसे नियम पारित कर दिए जाते हैं जिनका तत्काल लागू होना लगभग नामुमकिन होता है। फिर बिना सोचे-समझे "टारगेट" पूरा करने के चक्कर में आम आदमी की पीसाईं शुरू हो जाती है ! इसी संदर्भ में याद आता है, सत्तर के दशक के कलकत्ता शहर के लिए पारित किया गया एक कानून, जिसके तहत यदि कोई मूत्रालय के अलावा कहीं और मूत्र-विसर्जन  करते पकड़ा गया तो उसे जुर्माना भरना पड़ता था ! शहर को साफ़-सुथरा रखने के लिए उठाया गया था यह कदम। सोच अच्छी थी, पर नियम लागू करते समय किसी ने शहर की करीब एक करोड़ की आबादी के अनुपात में नहीं के बराबर मूत्रालयों की संख्या पर नाहीं सोचा था, नाहीं ध्यान दिया था ! यदि उचित व्यवस्था के बाद किसी को दोषी पाया जाता तो बात समझ में आती थी पर यहां तो सिर्फ मनाही लागू कर दी गयी थी ! अंजाम; संघर्ष, अराजकता, असंतोष, टकराव !

आज तकरीबन चालीस वर्षों के ऊपर गुजरने के बावजूद सरकारी ढर्रा वैसा ही है। स्वच्छता अभियान का जोरों शोरों से प्रचार हो रहा है, अच्छा है, साफ़-सफाई के बिना जीवन दूभर हो जाता है; पर क्या सिर्फ बोलने, भाषणों-नारों से ही स्वच्छता तारी हो जाएगी ? एक-दो दिन दस-बीस लोगों के झाड़ू के साथ कैमरे के सामने घूमने से ही जागरूकता आ जाएगी ? क्या हर घर में शौचालय कहने से ही बन जाएगा ?  जिनके घर ही नहीं हैं उनका क्या होगा ? किसी के पास क्या सही आंकड़ा है कि भारत में कितने लोग छत-विहीन हैं और वे जीवन भर गर्मी-बरसात-सर्दी हर मौसम में कहां और कैसे सोते हैं ? उन लोगों के लिए प्रकृति की पुकार का शमन करने के लिए कहां जाने का प्रावधान है ?  सुलभ शौचालय बने जरूर हैं पर एक तो उनकी संख्या पर्याप्त नहीं है दूसरे उसमें जाने का "जुर्माना" वे लोग कैसे देंगे जिनकी रोज की आमदनी ही इतनी नगण्य है कि वह यही सोचता रह जाए कि वह खाने पर खर्च करे या "जाने" पर ! अपनी जिंदगी को देखे कि देश की स्वच्छता को ? और ऐसों की गिनती लाखों में है !  तो बिना इनकी मजबूरी दूर किए कैसे स्वच्छता के सपने को पूरा करने का सोचा भी जा सकता है ?

इसी कड़ी में, आज जो कार्य-व्यवसाय को नगद-विहीन करने की कवायद जोरों-शोरों से लागू करने का अभियान चलाया जा रहा है। उसके लिए बहुत ही मजबूत इंटरनेट व्यवस्था की जरुरत है। पर खेद  की बात है कि वह चाहे B.S.N.L. हो या  #M.T.N.L. दोनों ही अपनी कसौटी पर बूरी तरह नाकाम रहे हैं। चाहे वह नेट की "स्पीड" हो या उसकी उपलब्धता। लोगों की अनगिनत शिकायतों के बावजूद कोई भी सुधार होता नजर नहीं आता। जब वे अभी तक का बोझ नहीं उठा पा रहे तो कैसे कोई यकीन कर ले कि आने वाले दिनों में होने वाली व्यवस्था में ये कंपनियां सुचारू रूप से काम कर पाएंगी। लोगों के दिलों में तो अब यह बात घर करने लग गयी है कि यह अक्षमता दूसरी प्रायवेट कंपनियों के लाभ के लिए आयोजित की जाती है। नहीं तो क्या बात है कि हर तरह की सुविधा और सक्षमता के बावजूद इनका नेटवर्क सबसे गया-बीता है। कड़वा सच तो यही है कि कुछेक कर्मचारियों की लापरवाही या अपने तुच्छ लाभ के लिए उनके द्वारा की गयी अनुचित कार्यवाही के चलते बदनामी तत्कालीन सरकार को ही मिलती है ! क्या इस ओर माननीय #संचारमंत्रीजी ध्यान देंगे !

यह बात सही है कि जनहित में लिए गए निर्णयों को जल्द से जल्द लागू हो जाना चाहिए पर हमारे देश की अंग्रेजों के समय से चली आ रही लाल-फीताशाही में अभी भी बदलाव नहीं आया है। जिसके चलते योजनाओं को लागू होने में वर्षों लग जाते हैं। पर साथ ही यह भी ध्यान रखना लाजिमी होता है कि जो योजना बनाई जा रही है उसके लिए उचित व्यवस्था व संसाधन उपलब्ध हैं भी कि नहीं !!