गुरुवार, २६ नवम्बर २००९

"ताजमहल" नाम है स्वाभिमान, गौरव तथा आस्था का. इसीलिए ठीक एक साल पहले......

"ताज महल" सिर्फ एक होटल ही नहीं है, अब वह स्वाभिमान, गौरव तथा आस्था का प्रतीक बन चुका है। शायद इसीलिए ठीक एक साल पहले...................................

बंबई , रात धीरे-धीरे गहराती जा रही थी। ऐसे में दो भद्र पुरुष बातें करते करते रात के भोजन के लिये पर्क के अपोलो होटल की ओर बढ रहे थे। जब वे होटल के प्रवेश द्वार पर पहुंचे तो द्वारपाल ने उनमें से एक को इंगित करते हुए कहा, महोदय आपके मित्र का स्वागत है, पर मुझे खेद है कि आप अंदर नहीं जा सकते। जिसे मना किया गया था वह थे जमशेदजी टाटा और उन्हें रोकने का कारण था उस होटल में युरोपियन के सिवा और किसी को प्रवेश नहीं देने का प्रावधान।

उसी क्षण जमशेदजी ने निर्णय लिया कि वह अपने इसी शहर में एक ऐसा होटल बनायेंगे जो संसार के सर्वश्रेष्ठ होटलों में से एक होगा। जिसमें किसी तरह की रोक-टोक नहीं होगी। जिसमें आम इंसान भी बिना विदेश गये विदेशी भव्यता का अनुभव कर सकेगा। हालांकि उन्हें इस व्यवसाय का कोई अनुभव नहीं था। पर जो ठान लिया सो ठान लिया। उन्होंने अपोलो बंदर के पास जमीन खरीद कर होटल, जिसका नाम उन्होंने ताजमहल रखा था, का निर्माण शुरु करवा दिया। उन्होंने सोच रखा था कि इस इमारत की हर बात अनोखी होगी। अनोखा रंग, अनोखा ढंग, अनोखी साज-सज्जा, अनोखा कला संग्रह। शुरुआत भी हुई 40 फिट की नींव से, जो उस जमाने में हैरत की बात थी। अंतत: 1903 में सत्रह मेहमानों के साथ होटल "ताजमहल" का विधिवत उद्घाटन संम्पन्न हुआ।
जमशेद जी ने अपने इंजीनियरों को हिदायत दे रखी थी कि होटल का शिल्प ऐसा होना चाहिये कि उसके हर कमरे में समुद्री वायु आराम से परवाज कर सके। साथ ही हर कमरे में रहने वाले को समुद्र के बिल्कुल करीब होने का एहसास हो। सचमुच ताज की खिड़की में खड़े होने पर यही एहसास होता है जैसे हाथ बढा कर सागर को छुआ जा सकता हो। हर कमरे से समुद्र अपनी भव्यता के साथ नज़र आता है। जमशेदजी की दूरदर्शिता इसी से जानी जा सकती है कि उन्होंने भविष्य में सागर की ओर होने वाली भीड़-भाड़ को ध्यान में रख ताज का मुख्य द्वार पीछे की ओर बनवाया था। उनके लिये यह पैसा कमाने का जरिया ना होकर देश की धरोहर का ख्याल ज्यादा था। जहां हर देश वासी बेरोकटोक आ सके। वे जब भी विदेश जाते वहां ताज को ही ध्यान में रख खरीदारी करते। उन्होंने पैसे की परवाह किये बगैर ऐसी-ऐसी चीजें वहां से भारत भेजीं जिनका नाम भी यहां ना सुना गया था। जिनमें एक बिजली का जेनेरेटर भी था। उस समय बंबई में बिजली की रौशनी वाली यह पहली इमारत थी। इसको बाहर से देखने के लिये ही दूर-दूर से लोग आते थे। इसके बनने और शुरु होने के बाद भी बहुत सारी अड़चनों का सामना जमशेद जी को करना पड़ा था। बहुतेरी बार इसकी आमदनी बिल्कुल ना के बराबर हो गयी थी। और कोई होता तो वह इसे बेचने का फैसला कर चुका होता पर यह जमशेदजी ही थे जो इसे भारत का ताज बनाना चाहते थे इसे बेचने का ख्याल उन्हें सपने में भी नहीं आया। उस समय जब संचार व्यवस्था ना के बराबर थी उन्होंने विदेशों के यात्रा एजेंटों से संपर्क बनाये रखा, फिर एक समय ऐसा आया कि विदेश से आने वाले पर्यटक की लिस्ट में यहां ठहरने का कार्यक्रम वरीयता सूची में होने लगा।

विदेशों में आज भारत के दो ताजमहलों की अपनी पहचान है। एक नारी के सम्मान का प्रतीक है तो दूसरा शहर के गौरव का प्रतीक।

आज सौ से ज्यादा उपन्यासों, यात्रा विवरणों आदि में ताज का उल्लेख मिलता है। विश्व की जानी-मानी हस्तियां यहां आकर भारतीय सत्कार का आनंद ले चुकी हैं। सातवें दशक में इसी का एक और नया भाग ‘ताज इंटकांटिनेंटल’ भी बन कर तैयार हो गया था। अब तो ताज की श्रृंखला पूरे देश में फैलती जा रही है।
ये सिर्फ होटल नहीं इंसान की आस्था, स्वाभिमान और देश के गौरव का प्रतीक है। शायद इसीलिये ठीक एक साल पहले.................

बुधवार, २५ नवम्बर २००९

ये सिर्फ होटल नहीं इंसान की आस्था, स्वाभिमान और देश के गौरव का प्रतीक है। शायद इसीलिये ठीक एक साल पहले.................

बंबई , रात धीरे-धीरे गहराती जा रही थी। ऐसे में दो भद्र पुरुष बातें करते करते रात के भोजन के लिये पर्क के अपोलो होटल की ओर बढ रहे थे। जब वे होटल के प्रवेश द्वार पर पहुंचे तो द्वारपाल ने उनमें से एक को इंगित करते हुए कहा, महोदय आपके मित्र का स्वागत है, पर मुझे खेद है कि आप अंदर नहीं जा सकते। जिसे मना किया गया था वह थे जमशेदजी टाटा और उन्हें रोकने का कारण था उस होटल में युरोपियन के सिवा और किसी को प्रवेश नहीं देने का प्रावधान। उसी क्षण जमशेदजी ने निर्णय लिया कि वह अपने इसी शहर में एक ऐसा होटल बनायेंगे जो संसार के सर्वश्रेष्ठ होटलों में से एक होगा। जिसमें किसी तरह की रोक-टोक नहीं होगी। जिसमें आम इंसान भी बिना विदेश गये विदेशी भव्यता का अनुभव कर सकेगा। हालांकि उन्हें इस व्यवसाय का कोई अनुभव नहीं था। पर जो ठान लिया सो ठान लिया। उन्होंने अपोलो बंदर के पास जमीन खरीद कर होटल, जिसका नाम उन्होंने ताजमहल रखा था, का निर्माण शुरु करवा दिया। उन्होंने सोच रखा था कि इस इमारत की हर बात अनोखी होगी। अनोखा रंग, अनोखा ढंग, अनोखी साज-सज्जा, अनोखा कला संग्रह। शुरुआत भी हुई 40 फिट की नींव से, जो उस जमाने में हैरत की बात थी। अंतत: 1903 में सत्रह मेहमानों के साथ होटल "ताजमहल" का विधिवत उद्घाटन संम्पन्न हुआ।
जमशेद जी ने अपने इंजीनियरों को हिदायत दे रखी थी कि होटल का शिल्प ऐसा होना चाहिये कि उसके हर कमरे में समुद्री वायु आराम से परवाज कर सके। साथ ही हर कमरे में रहने वाले को समुद्र के बिल्कुल करीब होने का एहसास हो। सचमुच ताज की खिड़की में खड़े होने पर यही एहसास होता है जैसे हाथ बढा कर सागर को छुआ जा सकता हो। हर कमरे से समुद्र अपनी भव्यता के साथ नज़र आता है। जमशेदजी की दूरदर्शिता इसी से जानी जा सकती है कि उन्होंने भविष्य में सागर की ओर होने वाली भीड़-भाड़ को ध्यान में रख ताज का मुख्य द्वार पीछे की ओर बनवाया था। उनके लिये यह पैसा कमाने का जरिया ना होकर देश की धरोहर का ख्याल ज्यादा था। जहां हर देश वासी बेरोकटोक आ सके। वे जब भी विदेश जाते वहां ताज को ही ध्यान में रख खरीदारी करते। उन्होंने पैसे की परवाह किये बगैर ऐसी-ऐसी चीजें वहां से भारत भेजीं जिनका नाम भी यहां ना सुना गया था। जिनमें एक बिजली का जेनेरेटर भी था। उस समय बंबैइ में बिजली की रौशनी वाली यह पहली इमारत थी। इसको बाहर से देखने के लिये ही दूर-दूर से लोग आते थे। इसके बनने और शुरु होने के बाद भी बहुत सारी अड़चनों का सामना जमशेद जी को करना पड़ा था। बहुतेरी बार इसकी आमदनी बिल्कुल ना के बराबर हो गयी थी। और कोई होता तो वह इसे बेचने का फैसला कर चुका होता पर यह जमशेदजी ही थे जो इसे भारत का ताज बनाना चाहते थे इसे बेचने का ख्याल उन्हें सपने में भी नहीं आया। उस समय जब संचार व्यवस्था ना के बराबर थी उन्होंने विदेशों के यात्रा एजेंटों से संपर्क बनाये रखा, फिर एक समय ऐसा आया कि विदेश से आने वाले पर्यटक की लिस्ट में यहां ठहरने का कार्यक्रम वरीयता सूची में होने लगा। आज सौ से ज्यादा उपन्यासों, यात्रा विवरणों आदि में ताज का उल्लेख मिलता है। विश्व की जानी-मानी हस्तियां यहां आकर भारतीय सत्कार का आनंद ले चुकी हैं। सातवें दशक में इसी का एक और नया भाग ‘ताज इंटकांटिनेंटल’ भी बन कर तैयार हो गया था। अब तो ताज की श्रृंखला पूरे देश में फैलती जा रही है।
ये सिर्फ होटल नहीं इंसान की आस्था, स्वाभिमान और देश के गौरव का प्रतीक है। शायद इसीलिये ठीक एक साल पहले.................

मंगलवार, २४ नवम्बर २००९

ये भी खूब रही :) :) :)

एक कबीले के मुखिया के मर जाने पर उसके शहर से आये बेटे को मुखिया बना दिया गया। ठंड आने के पहले कबीले वाले उसके पास गये और पूछा कि इस बार कैसी ठंड पड़ेगी? कबीले के मुखियों को पीढी दर पीढी से चले आ रहे तजुर्बों से आने वाले मौसम इत्यादि की जानकारी होना आम बात थी। अब जवान मुखिया को इतना तजुर्बा तो था नहीं ना ही उसने इस तरह की बातें अपने बुजुर्गों से सीखी थीं। उसने ऐसे ही कह दिया कि ठीक-ठाक सर्दी पड़ेगी। आप लोग लकड़ियां इकठ्ठी कर लो। कह तो दिया पर फिर भी कुछ अंदाज लेने के लिये वह मौसम विभाग चला गया, वहां उसने पूछा कि इस बार सर्दी कैसी होगी? उन्होंने कहा ठीक-ठाक ही पड़ेगी। लौट कर उसने अपने लोगों से और लकड़यां एकत्र करने को कह दिया। हफ्ते दस दिन बाद फिर अपनी बात सुनिश्चित करने के लिये मुखिया मौसम विभाग गया और पूछा, क्या कहते हैं आप लोग ठंड पड़ेगी ना? वहां से जवाब मिला एकदम पक्की पड़ेगी। लड़के ने वापस आ अपने लोगों को और लकड़ियां एकत्र करने को कह दिया। पर मन ही मन वह अपनी अनभिज्ञता से घबड़ाया हुआ भी था कि कहीं मेरी बात गलत हो गयी तो लोग क्या कहेंगे। सो एक बार फिर वह मौसम विभाग पहुंच गया और बोला, आपकी खबर सर्दी के बारे में पक्की है ना? वहां के अफसर ने जवाब दिया, पक्की? अरे, इस बार रेकार्ड़ तोड़ सर्दी पड़ेगी। युवा मुखिया ने चकित हो पूछा, आप इतने विश्वास के साथ कैसे कह रहे हैं?क्योंकि कबीले वाले पागलों की तरह अंधाधुन लकड़ियां इकठ्ठी किये जा रहे हैं भाई, इससे बड़ा प्रमाण और क्या चाहिये।

सोमवार, २३ नवम्बर २००९

बिना इन्टरनेट के हिंदी लिखने में सहायता करें

आज मुझसे सुश्री नेहा जी, जो अपना ब्लाग शुरु करना चाहती हैं, ने ई मेल द्वारा, बिना इंनटरनेट हिंदी लिख सकने की जानकारी चाही है। मेरी आप सब से गुजारिश है कि ऐसा सबसे सरल तरीका बताने का कष्ट करें, जिसमें सारे के सारे हिंदी के शब्द (संयुक्ताक्षर वगैरह) आसानी से लिखे जा सकें। जिससे हिंदी ब्लाग परिवार में एक और नया सदस्य शामिल हो सके।

रविवार, २२ नवम्बर २००९

अपने में दफन इंसान की भूल की अनोखी सजा भुगतती एक कब्र

मध्य प्रदेश के इटावा-फ़र्रुखाबाद मार्ग पर जुगराम जी का एक प्रसिद्ध मंदिर है। उसी के पास जरा सा आगे जाने पर एक मकबरा है जो अपने नाम और खुद से जुड़ी प्रथा के कारण खासा मशहूर है। इसे 'चुगलखोर के मकबरे' के नाम से जाना जाता है और प्रथा यह है कि यहां से गुजरने वाला हर शख्स इसकी कब्र पर कम से कम पांच जूते मारता है। क्योंकि यहां के लोगों में ऐसी धारणा है कि इसे जूते मार कर आरंभ की गयी यात्रा निर्विघ्न पूरी होती है।
ऐसा क्यों है इसकी कोई निश्चित प्रामाणिकता तो नहीं है पर जैसा यहां के लोग बताते हैं कि बहुत पहले इस विघ्नसंतोषी, सिरफिरे इंसान ने अपने किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के लिये दो राजाओं को आपस में गलत अफवाहें फैला कर लड़वा दिया था। वह तो युद्ध के दौरान ही सच्चाई का पता चल गया और व्यापक जनहानि होने से बच गयी। इसे पकड़ मंगवाया गया और मौत की सजा दे दी गयी। पर ऐसा नीच कृत्य करने वाले को मर कर भी चैन ना मिले इसलिये उसका मकबरा बनवा कर यह फर्मान जारी कर दिया गया कि इधर से हर गुजरने वाला इस कब्र पर पांच जूते मार कर ही आगे जायेगा। जिससे भविष्य में और कोई ऐसी घिनौनी हरकत ना करे।
है ना अनोखी सजा! जो ना जाने कब से दी जा रही है और ना जाने कब तक दी जाती रहेगी।

शनिवार, २१ नवम्बर २००९

कोई भी देश भूगोल में बाद में टूटता है, पर पहले उसे दिमाग में तोड़ा जाता है

करीब बीस साल पहले श्री बालकवि बैरागीजी ने, जो उस समय संसद सदस्य थे, चेताया था कि भाषा के साथ-साथ बोलियों का एक दुराग्रह तैयार किया जा रहा है। इससे सावधान रहने की जरूरत है। यह एक बहुत लंबी मार करने वाली साजिश है, देश तोड़ने की। उन्होंने इस षड़यंत्र की कार्यप्रणाली का भी खुलासा किया था। उनके अनुसार, भारत विरोधी अभियान के तहत उन महानुभावों को, उनके जाने अनजाने, शामिल कर लिया जाता है जो भाषा शास्त्र पर शोध आदि कर रहे होते हैं। उन्हें विदेश भ्रमण करवा, फैलोशिप वगैरह दिलवा कर और उनके लेखों आदि को बड़े पैमाने पर छपवाने का प्रलोभन दिया जाता है। यह काम होता है भारत के विभिन्न अंचलों में बोली जाने वाली आंचलिक बोलियों पर शोध एवं अनुसंधान के नाम पर। हमारे यहां वैसे ही हजारों बोलियां तथा उपबोलियां हैं जिनको लेकर आये दिन आंदोलन खड़े किए जाते रहते हैं। बात बिगड़ती जाती है। इसी को लेकर विदेशी कूटकर्मियों ने भारत के नक्शे में बोलियों के आधार पर सैंकड़ों दरारें ड़ाल दी हैं। बोलियों के अंचलों को रेखांकित कर भारत के टुकड़े नक्शों में कर दिये हैं। पहले भाषा के नाम पर लड़ता झगड़ता देश अब बोलियों के लिये उलझने लगा है। इसके लिये कितना विदेशी पैसा बरसात की तरह बरसाया जा रहा है उसकी कल्पना भी आम आदमी नहीं कर सकता।
पता नहीं हमारी आंख कब खुलेगी। देश का एक बहुत बड़ा तथाकथित बुद्धिवादी वर्ग आंखें बंद किए बैठा है। बोलियों के दायरे बहुत छोटे पर अत्यंत संवेदनशील होते हैं। यह सब सोचा समझा षड़यंत्र है भारत को छोटा और छोटा कर कमजोर करने का। कोई भी देश भूगोल में बाद में टूटता है पर पहले दिमाग में टूटता या तोड़ा जाता है। एक बार दिमाग में टूटन आ जाये तो फिर वह बाहर भी आकार लेना शुरु कर देती है। पर बीस साल पहले चेताने के बावजूद क्या हम चेत पाये हैं।
अपने व्यक्तिगत बैर के बदले को लोग कैसे अलग रंग देते हैं, देखिये भास्कर के श्री राजकुमार केसवानीजी द्वारा दी गयी एक जानकारी के द्वारा :-
1916 में लहौर के एक फोकटिया तथाकथित पत्रकार, लालचंद, को जब एक नाटक का टिकट मुफ्त में ना देकर उपकृत नहीं किया गया तो उन महाशय ने पूरी नाटक मंडली के विरुद्ध विष वमन करना शुरु कर दिया और उसका मुख्य निशाना बनी नाटक की नायिका, मिस गौहर, जो कि नाटक में सीता का किरदार निभा रही थी। लालचंद ने लोगों की भावनाओं को उभाड़ने के लिये लिख मारा कि मुस्लिम औरत का सीता बनना कभी भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। नतीजा लालचंद के मन मुताबिक ही हुआ, थियेटर पर हमला कर जबर्दस्त नुक्सान किया गया। कंपनी के मालिक कवास जी की सदमे से मौत हो गयी।

जब पैसा आता है, तो दिमाग कहाँ चला जाता है ?

पैसा, शोहरत या सत्ता के आते ही उससे मिली ताकत को लोग संभाल नहीं पाते। पता नहीं दिमाग में कैसा "लोचा" आ जाता है कि वह अजीबोगरीब हरकतें करवाने लग जाता है। इस तरह मिले मद को पचा नहीं पाता। शोहरतिये की तो छोड़िये उसके साथ के लगे-बंधे ही अपने आप को दूसरी दुनिया का समझने लगते हैं। उनके और उनके चाहने वालों के बारे में अखबारों में अक्सर कुछ ना कुछ छपता रहता है, वहीं से कुछ "नमूने" देखिये :-
एक मंत्रीजी हवाई दौरे पर थे। एक जगह नीचे उन्हें कुछ लोग नज़र आए तो उन्होंने वहीं अपना हेलीकाप्टर उतरवाने की जिद की। चालक के लाख समझाने पर भी उन पर कोई असर नहीं हुआ, तो सबकी जान जोखिम में डाल खेतों में काप्टर उतारना पड़ा। लदा हुआ इंसान जनता का सेवक जो था।

एक ऐसे ही सेवक के लिये उनके पिच्छलगू हाथी ही ले आये थे, हेलीपैड तक। पायलट पर क्या बीती होगी।

एक बार अपने आराध्य महोदय के लिये उनके चमचों ने हेलीपैड पर कालीन ही बिछा दिया था, कि कहीं प्रभू के पैर गंदे ना हो जायें (मन का क्या है) वह तो चालक ने दूर से देख लिया नहीं तो कालीन ने धरा का भार कुछ हल्का कर ही देना था।

ऐसा नहीं है कि हमारे देश में ही धन मति फेर देता हो, दुनिया भर में ऐसे असंयमियों के किस्से सुने जा सकते हैं।
स्पेन में सागर के सामने खड़े एक भव्य होटल में एक भद्र पुरुष को समुंद्र की आवाज से इतनी परेशानी हुई कि उन्होंने वहां के स्टाफ को बुला उसकी आवाज बंद करवाने का आदेश दे डाला।

स्पेन में ही एक सज्जन को अपने होटल का बिस्तर कुछ ऊंचा लगा तो उन्होंने पलंग के पाये ही कटवाने का हुक्म दे दिया। यह अलग बात है कि प्रबंधन ने शालिनता से ऐसा कर पाने में अपनी असमर्थता जाहिर कर दी।

शुक्रवार, २० नवम्बर २००९

एक पाव भर की रजाई, ठण्ड दूर रखने का हल्का-फुल्का साधन

सर्दी की दस्तक के साथ-साथ गर्म कपड़े, कंबल और रजाईयां भी आल्मारियों से बाहर आने को आतुर हो रहे हैं। रजाई का नाम सुनते ही एक रूई से भरे एक भारी-भरकम कपड़े का ख्याल आ जाता है, जो जाड़ों में ठंड रोकने का आम जरिया होता है। पहाड़ों में तो चार-चार किलो की रजाईयां आम हैं ज्यादा सर्दी या बर्फ पड़ने पर तो बजुर्गों या अशक्त लोगों को दो-दो रजाईयां भी लेनी पड़ती हैं। अब सोचिये इतना भार शरीर पर हो तो नींद में हिलना ड़ुलना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे में कोई पाव भर भार वाली रजाई से ठंड दूर करने की बात करे तो अजीब सा लगेगा। पर पुराने समय में राजा-महाराजाओं के वक्त में राज परिवार के लोग कैसे ठंड से बचाव करते होंगे। ठीक है सर्दी दूर करने के और भी उपाय हैं या थे, पर ओढने के लिये कभी न कभी, कुछ-न कुछ तो चाहिये ही होता होगा। अवध के नवाबों की नजाकत और नफासत तो जमाने भर में मशहूर रही है। उन्हीं के लिये हल्की-फुल्की रजाईयों की ईजाद की गयी। ये खास तरह की रजाईयां, खास तरीकों से, खास कारीगरों द्वारा सिर्फ खास लोगों के लिये बनाई जाती थी। जिनका वजन होता था, सिर्फ एक पाव या उससे भी कम। जी हां एक पाव की रजाई पर कारगर इतनी कि ठंड छू भी ना जाये। धीरे-धीरे इसके फनकारों को जयपुर में आश्रय मिला और आज राजस्थान की ये राजस्थानी रजाईयां दुनिया भर में मशहूर हैं।

इन हल्की रजाईयों को पहले हाथों से बनाया जाता था। जिसमें बहुत ज्यादा मेहनत, समय और लागत आती थी। समय के साथ-साथ बदलाव भी आया। अब इसको बनाने में मशीनों की सहायता ली जाती है। सबसे पहले रुई को बहुत बारीकी से अच्छी तरह साफ किया जाता है। फिर एक खास अंदाज से उसकी धुनाई की जाती है, जिससे रूई का एक-एक रेशा अलग हो जाता है। इसके बाद उन रेशों को व्यव्स्थित किया जाता है फिर उसको बराबर बिछा कर कपड़े में इस तरह भरा जाता है कि उसमें से हवा बिल्कुल भी ना गुजर सके। फिर उसकी सधे हुए हाथों से सिलाई कर दी जाती है। सारा कमाल रूई के रेशों को व्यवस्थित करने और कपड़े में भराई का है जो कुशल करीगरों के ही बस की बात है। रूई जितनी कम होगी रजाई बनाने में उतनी ही मेहनत, समय और लागत बढ जाती है। क्योंकि रूई के रेशों को जमाने में उतना ही वक्त बढ जाता है।
छपाई वाले सूती कपड़े की रजाई सबसे गर्म होती है क्योंकि मलमल के सूती कपड़े से रूई बिल्कुल चिपक जाती है। सिल्क वगैरह की रजाईयां देखने में सुंदर जरूर होती हैं पर उनमें उतनी गर्माहट नही होती। वैसे भी ये कपड़े थोड़े भारी होते हैं जिससे रजाई का भार बढ जाता है।

तो अब जब भी राजस्थान जाना हो तो पाव भर की रजाई की खोजखबर जरूर लिजिएगा।

मंगलवार, १७ नवम्बर २००९

दादा जी, अब भाग लो (:

बहुत बार ऐसा हुआ है कि अकेले बैठे यादों की जुगाली करते अचानक कोई बात याद आ जाती है और बरबस हंसी फूट पड़ती है। ऐसा ही एक वाक्या है जो याद आते ही हंसी ला देता है चेहरे पर। सारा खेल उसमें भाषा का है, हिंदी और बंगला का घालमेल। बहुत बार इच्छा हुई उसे आपस में बांटने की पर उसका मजा थोड़ी बहुत बंगला जानने वाले ले सकते हैं नहीं तो भाषा अमर्यादित सी लगती है। इसी से संकोचवश निर्मल हास्य से वंचित रह जाना पड़ता है। आज भी पूरा लिख ड़ाला था पर फिर आने वाले दिनों पर टाल दिया। उसके बदले यह खानापूर्ती सही -


एक छोटा सा बच्चा एक घर के दरवाजे की घंटी बजाने की काफी देर से कोशिश कर रहा था, पर उसका हाथ घंटी तक नहीं पहुंच पा रहा था। एक बुजुर्ग उधर से निकले और यह सोच कि शायद उसे अंदर जाना है, उसकी सहयता करने के लिये उन्होंने घंटी बजा दी, और बच्चे की तरफ देख बोले, अब ठीक है?
बच्चा बोला, हां, पर अब भाग लो !