मंगलवार, 28 मार्च 2017

हनुमान जी का यह नाम शायद ही आपने सुना होगा

करीब साढ़े छः का समय था, एक आदमी मलिन से टी शर्ट-पैंट पहने, मुंह को कपडे से लपेटे वहां रखी मूर्तियों की आरती जैसा कुछ कर रहा था। काम ख़त्म होने पर मुझे नमस्ते की और मेरे कहने पर अपने चेहरे से कपड़ा हटाया। लगा कि वह नहाया हुआ भी नहीं है

अपने देश में या यूं कहिए कि विश्व भर में हिंदू धर्म के पांच प्रमुख देवों में हनुमान जी का भी नाम है। इन्हें सबसे शक्तिशाली, अमर, अजेय, आशुतोष, विनम्र व दयालु माना जाता है। इनकी लोकप्रियता का कोई  पारावार नहीं है। हिंदू तो हिंदू अन्य धर्मावलंबी भी इन्हें खूब जानते और मानते हैं। पर शायद इनकी विनम्रता और दयालुता का अर्थ कुछ लोगों ने अपनी तरह से परिभाषित कर, अपने लाभ के लिए, देश भर में, दक्षिणी भाग को छोड़ कर, जगह-जगह गली-नुक्कड़-पैदलपथ, पेड़ों के नीचे, दीवारों पर और न जाने कहां-कहां इनके चित्र या मूर्तियां लगा, धर्मभीरु आम जनता को बरगला कर, उनकी भावनाओं को उभाड़, अपनी रोटी सेकनी शुरू कर दी !! 

इस तरह के मंदिरों के तरह-तरह के लोक-लुभावन नाम रखे जाते हैं, जैसे दक्षिण मुखी, सर्व कामना, प्राचीन, बालाजी इत्यादि। आपने भी हनुमान जी के मंदिरों के अलग-अलग नाम सुने होंगे पर मेरा दावा है, मैं जो बताने जा रहा हूँ, वह नाम आपने शायद ही कभी सुना होगा ! नई दिल्ली के जनकपुरी इलाके के सुपर स्पेसियालिटी अस्पताल से दशहरा पार्क होते हुए डिस्ट्रिक सेंटर जाने वाली सड़क के पासंगीपुर मोड़ के कुछ आगे फुटपाथ पर अतिक्रमण कर उस जगह को नाम दिया गया है "श्री ग्रेजुएट बालाजी धाम", जी हाँ, यह नाम है उस जगह का जिसे कुछ वक्त पहले पैदल चलने वालों की कठनाइयों-परेशानियों को दरकिनार कर, पैदल-पथ को अजीबोगरीब तरीके से घेर कर, सिर्फ धनोपार्जन के लिए बनाया गया है। जो इसके रख-रखाव से साफ़ जाहिर होता है। 8 x 3 की तंग सी अंधेरी जगह में एक थड़े के ऊपर करीब दो फुट की हनुमान जी की
मूर्ति स्थापित कर उसकी अर्चना जैसा कुछ करना शुरू कर दिया गया है।


वहां जा कर बात करने की इच्छा होते हुए भी जाना नहीं हो पाता था पर कल शाम को वहां पहुँच ही गया। करीब साढ़े छः का समय था, एक आदमी मलिन से टी-शर्ट, पैंट पहने, मुंह को गंदे से कपडे से लपेटे वहां रखी मूर्तियों की आरती जैसा कुछ कर रहा था। काम ख़त्म होने पर मुझे नमस्ते की और मेरे कहने पर अपने चेहरे से कपड़ा हटाया। लगा कि वह नहाया हुआ भी नहीं है। मैंने सीधा प्रश्न यही किया कि जगह का इस तरह का नाम रखने की कैसे सूझी ? वह कुछ हडबडाया, पर मेरे कहने पर कि मैं विरोध नहीं कर रहा हूँ सिर्फ औचित्य जानना चाहता हूँ, बोला कि मैं तो सिर्फ देख-रेख करता हूँ असल वाले बाबा जी गांव गए हुए हैं। मेरे यह पूछने पर कि आपके इस मंदिर को बनाते समय और नामकरण के समय तो कई लोग होंगे जिन्होंने ऐसे नाम का सुझाव दिया होगा या फिर आपके बाबाजी ग्रेजुएट हैं जिन्होंने कहीं काम ना मिलने पर हनुमान जी की शरण ली है ? पर उस बंदे के पास कोई जवाब नहीं था। मैंने उसे दिलासा दी कि मैं किसी अखबार वगैरह से नहीं हूँ सिर्फ जिज्ञासावश यहां चला आया हूँ, तो चलो यही बताओ कि इस जगह ऐसा


करने की कैसे सूझी ? अब तक वह थोड़ा खुल चुका था, बताया कि यहां वर्षों से रह रहा है। आस-पास की कालोनियों में जो काम मिलता है कर लेता है। साथ की दिवार पर पता नहीं कब-कौन एक दो मूर्तियां रख गया था। जब आने-जाने वाले राहगीरों को यहां रुक कर उन्हें प्रणाम करते देखा तो यहां छत डालने का विचार आया। मेरे पूछने पर कि किसी ने रोका नहीं, तो दृढ़ता से जवाब दिया, सालों से यहां रह रहे हैं, आते हैं 'पैलिटी' वाले, 'पोलिस' वाले, पर हम हटेंगे नहीं ! मैंने पूछा कि लोग आते हैं, चढ़ावा चढ़ता है ? जवाब मिला, मंगल-शनि भीड़  होती है, लोग जुटते हैं, चढ़ावा भी चढ़ता है।  मेरे लिए इतना ही काफी था !

भले आदमी का नाम मालुम है, पर यहां उजागर करने से क्या हासिल ? देश भर में हजारों-लाखों ऐसे मिल जाएंगे जो भगवान को घर मय्यसर करवा रहे हैं !! उन पर वह मेहरबान है तो......... 

शनिवार, 25 मार्च 2017

पेड़ों के नीचे "पवित्र कूड़े" का ढेर

देश के चाहे किसी भी हिस्से में निकल जाइए, शहर हो या क़स्बा, आपको किसी न किसी पेड़ के नीचे हमारे भगवानों की भग्न, बदरंग या पुरानी मुर्तिया, टूटे कांच या फ्रेम में जड़ी देवी-देवताओं की कटी-फटी तस्वीरें, 
पूजा,  हवन इत्यादि से संबंधित वस्तुएं जरूर दिख जाएंगी। कभी बड़े सम्मान के साथ घर ला कर इनकी पूजा-
अर्चना की गयी होगी। इनमें अपने प्रभू या इष्ट की कल्पना की गयी होगी। पर आज गंदगी के माहौल में जानवरों-कीड़े-मकौड़ों के रहमो-करम पर लावारिस पड़ी, धूल फांक रही हैं। क्यों ऐसा होता है या किया जाता है ? धार्मिक प्रवित्ति के होते हुए भी हम क्यों ऐसा करते हैं ? तो इसका एक ही उत्तर दिखता है कि इस बारे में आम इंसान को सही विधि मालुम नहीं है, जब कि धार्मिक पुस्तकों में इसके लिए दिशा-निर्देश उपलब्ध हैं।ऐसी मान्यता है कि भग्न, बेरंग, कटी-फटी  या कुरूप प्रतिमा की घर में पूजा नहीं करनी चाहिए। ऐसा निर्देश है कि खंडित प्रतिमा को बहते जल में या फिर बड़े तालाब में छोड़ देना चाहिए। पर जहां जल ना हो ? वहां किसी पवित्र जगह में उन्हें जमीन में दबा देना चाहिए। अब पवित्र जगह को लेकर असमंजस हो सकता है इसलिए पीपल के वृक्ष के पास की भूमि इस कार्य के लिए उपयुक्त बताई गयी है। पर लोग कष्ट ना कर पीपल के तने के पास ही मूर्तियां रख अपने दायित्व की इतिश्री कर लेते हैं। यह सोचे बिना कि समय के साथ मूर्तियों का और उसके साथ-साथ, आस-पास के पर्यावरण का क्या होगा ! यही हाल फ्रेम में जड़ी तस्वीरों का होता है जिसमें लगा कांच और भी ज्यादा खतरनाक हो जाता है। इसके लिए चाहिए कि पहले लकड़ी और कांच को अलग कर लिया जाए और कागज को जला दिया जाए। जलाना पढ़ कर कुछ अजीब और गलत सा लगता है पर वैसे ही छोड़ दिए जाने की बेकद्री से तो बेहतर ही है। वैसे हिन्दू धर्म के अनुसार अग्नि एक पवित्र तत्व है, इसलिए ऐसी पवित्र वस्तुओं को अग्नि तत्व में मिला देना चाहिए और फिर भस्म होने के बाद बची हुई राख को पीपल की जड़ के आस-पास दबा दें।  

घर में टूटी-फूटी प्रतिमा नहीं रखनी चाहिए उससे अनिष्ट हो सकता है, यह तो हम सोच लेते हैं और डर कर उन्हें बाहर कर देते हैं। यहां दो बातें हैं, आध्यात्मिक र्रूप से पहली यह कि हम बड़ी श्रद्धा-भक्ति से धार्मिक
वस्तुओं में प्रभू की छवि या मौजूदगी का अहसास कर उन्हें घर में स्थापित करते हैं पर खंडित होने पर शंकाग्रस्त हो उन्हें लावारिस रूप में कहीं बाहर रख देते हैं, ऐसा करते हुए हमारी निष्ठा, भक्ति, आस्था सब गायब हो जाती हैं ! घर लाते समय जिसमें हमें भगवान् नज़र आते हैं खण्डित होते ही वह सिर्फ एक मिटटी या धातु का टुकड़ा मात्र रह जाता है ! यदि अनिष्ट का इतना ही डर है तो भी यह तो सुनिश्चित करना बनता ही है ना कि ऐसी वस्तुओं का अनादर ना हो !    

दूसरी बात, धार्मिक पक्ष को छोड़ दें तो भी ऐसी चीजों को बाहर करते समय हम इसका ध्यान नहीं रखते कि जाने-अनजाने कूड़ा-कर्कट बढ़ा कर हम पर्यावरण की क्षति का कारण बन जाते हैं। जिस वृक्ष के नीचे हम ऐसी चीजों का ढेर लगाते हैं धर्मभीरुता के कारण किसी की चाह के बावजूद वहां सफाई नहीं हो पाती। फिर फूल वगैरह की वजह से वहां कीड़े-मकौड़ों-जानवरों की आवक बढ़ जाती है, अच्छी-भली जगह कूड़ा घर में तब्दील हो जाती है जो उस पादप के लिए समय के साथ बहुत ही हानिकारक और खतरनाक साबित होता है।  

इसीलिए अब जब भी कोई ऐसी स्थिति सामने आए तो हमें  इन कुछ जरुरी बातों का ध्यान तो रखना ही चाहिए साथ ही अपने आस-पास के माहौल को भी बिना झिझक, बिना अनदेखा किए जागरूक करने में योगदान करना चाहिए। 

सोमवार, 20 मार्च 2017

पतंजलि, बढ़ता मुनाफा, घटता सेवाभाव

आपकी फ्रेंचाइजी वाले दुकानदार तो आपकी वस्तुओं पर पांच से दस प्रतिशत की छूट दे देते हैं पर आप अपने "मेगा-स्टोर" पर पांच रुपये भी नहीं छोड़ते, ऊपर से थैले के पैसे और धरवा लेते हो यह कैसा स्वदेशी प्रेम है ? अरे भाई ! यदि कोई आपके यहां से सात-आठ सौ, जो आपके यहां से खरीदारी की मामूली रकम है, का सामान लेता है तो आप उसे एक  15-20 रुपये का थैला भी नहीं दे सकते ?   गजब है !!    

बाबा रामदेव, एक ऐसा नाम जिसने भारतीय जन-मानस की नब्ज समझ अपने #पतंजलि ब्रांड के व्यापार को ऐसी ऊचाइयों की ओर अग्रसर कर दिया जो नित नए मानक बनाते हुए आसमान की बुलंदियों से आँखें चार करने को तत्पर है। स्वामी जी ने बहुत नपे-तुले अंदाज से धीरे-धीरे लोगों के दिलो-दिमाग में पैठ बनाई। उनको
मालुम था कि आम भारतीय बाहर से चाहे कितना भी आधुनिक हो जाए, मन में कहीं ना कहीं वह अभी भी देशज जरूर है। साथ ही ये आकलन भी हो चुका था कि आजकल लोग अपने स्वास्थ्य को लेकर बहुत जागरूक रहने लगे हैं, बहुतों का अंग्रेजी दवाओं से मोहभंग हो चुका है, लोग स्वदेशी के नाम को प्रमुखता देने लगे हैं।  इसी से उन्होंने अपने व्यापार के भविष्य का सही अंदाजा लगा लिया। बहुत सोच-समझ कर रण-नीति तैयार की गयी। प्रतिस्पर्द्धा में वर्षों से जड़ें जमाए सिर्फ विदेशी ही नहीं कई स्वदेशी कंपनियां भी मजबूती से सामने खड़ी थीं। लोगों के मन से उनके उत्पादनों से मोहभंग करना और योग गुरु द्वारा बनाई वस्तुओं के प्रति आकर्षण उपजाना बहुत कठिन काम था, पर नामुमकिन नहीं। सबसे पहले टी. वी. पर, फिर चुने हुए शहरों में, फिर देश भर में कक्षाएं लगा कर स्वस्थ रहने के नुस्खे सुझाए गए, योग की महत्ता समझाई गयी, स्वदेशी को अपनाने का आह्वान किया गया। इसके साथ ही रोजमर्रा की कुछ गिनी-चुनी आवश्यक वस्तुओं को बाजार में प्रयोग के तौर पर प्रस्तुत भी कर दिया गया। लोगों ने उन्हें हाथों-हाथ लिया, इससे जाहिर है हौसला अफजाई तो होनी ही थी। सो अब व्यापक रूप से लोगों को विदेशी चीजों द्वारा होने वाले देश और जनता के नुक्सान को मुद्दा बनाने के साथ-साथ बाजार में #पतंजलि उत्पादों की बाढ़ ला दी गयी। फ्रेंचाइजी की जगह अपनी दुकानें खुलने
लगीं फिर उनको स्टोर और फिर मेगा-स्टोर में बदलने का काम शुरू हो गया। कमाई ने सारे रेकॉर्ड तोड़ दिए, स्थापित ब्रांडों की ऐसी-की-तैसी होने लगी। पढने-दिखने-सुनने वाले हर मीडिया पर बाबा रामदेव के सहारे पतंजलि छा गया। हम जैसे लोगों को अच्छा लगाने लगा कि अब विदेशी कंपनियों को नानी याद आएगी और नहीं तो कम से कम उचित मूल्य में सही सामान  मिलेगा !

मेरे जैसे बहुत से लोग विदेशी पर स्वदेशी को हावी होने देने की चाह में इस संस्थान से इसके शैशवास्था से ही जुड़े हुए थे। शुरू-शुरू में जब लोग इनकी वस्तुओं पर संशय जाहिर करते थे तो उन्हें अपना उदाहरण दे इन चीजों का प्रयोग करने को उत्साहित करते थे। पता नहीं कितने विदेशी मुरीदों को इस संस्था से जोड़ने के लिए क्या-क्या कहा, किया गया। पर अब आहिस्ता-आहिस्ता यह बात हम सब के दिलों में घर करने लगी है कि कहीं आँख मूँद कर स्वामी जी का अनुसरण कर बेवकूफी तो नहीं कर रहे। इनके प्राकृतिक, शुद्ध, स्वदेशी के चक्कर में भावनात्मक रूप से लुट तो नहीं रहे। इसका कारण भी सामने है। इनके बहुत सारे उत्पाद आर्डर दे कर दूसरी जगह तैयार किए जाते हैं, उनकी प्रमाणिकता का आकलन सही ढंग से होता भी है कि नहीं ? जितनी भारी संख्या में प्राकृतिक जड़ी-बूटियां बाज़ार में उपलब्ध हैं उतनी खुद प्रकृति भी
उपजा पाती है या नहीं ? सबसे बड़ी और अहम बात यदि संस्था को भारत और उसकी जनता से इतना ही लगाव है तो हर चीज इतनी मंहगी क्यों, कि उसे एक गरीब आदमी छू भी ना सके ? क्या बाबाजी या उनके सहयोगियों ने कभी सर्वे किया है कि उनकी औषधियां कितने सर्वहारा तक पहुँच पाती हैं ? क्या फर्क है इनकी स्वदेशी और दूसरों की विदेशी में जबकी दोनों का उद्देश्य तो एक ही रहा........सिर्फ उपार्जन !!!

अब लोग तरह-तरह के सवाल भी उठाने लगे हैं। किसी भी दूसरी दूकान में आप जाएं, सौदा-सुल्फ लेने के बाद वह दुकानदार कोई झोला-थैली आपको जरूर उपलब्ध करवाता है। जिससे आपको अपना  में आसानी रहे। कहीं-कहीं तो ज्यादा सामान को घर तक पहुंचाने की व्यवस्था भी है। पर #पतंजलि मेगा स्टोर में यदि आप थैला लेंगें तो उसके 25/- अलग से लिए जाते हैं। अब कोई पूछे कि आपकी फ्रेंचाइजी वाले दुकानदार तो आपकी वस्तुओं पर पांच से दस प्रतिशत की छूट दे देते हैं पर आप अपने मेगा-स्टोर पर पांच रुपये भी नहीं छोड़ते, ऊपर से थैले के पैसे और धरवा लेते हो यह कैसा स्वदेशी प्रेम है ? अरे भाई ! यदि कोई आपके यहां से सात-आठ सौ, जो आपके यहां से खरीदारी की मामूली रकम है, का सामान लेता है तो आप उसे एक  20-25 रुपये का थैला भी नहीं दे सकते ?  तो अब क्या धारणा बने लोगों की ?

सोमवार, 13 मार्च 2017

कुछ वाकये सहसा पुरानी कहानिया याद दिला देते है, जैसे हंस और कौवा

सपनों को पूरा करने में कोई बुराई नहीं है। पर उसके लिए अपनी तैयारी, अपनी क्षमता, अपनी औकात का एहसास होना बहुत जरुरी है। सिर्फ किसी को नीचा दिखाने के लिए ईर्ष्या या द्वेष की भावना से उठाया गया कदम कहीं का भी नहीं छोड़ता...... 

बचपन मे सुनी-पढ़ी कहानियां सदा ही सीख से भरी होती थीं। वे कभी भी अप्रसांगिक नहीं हुईँ । कारण भी है उन्हें यूं ही नहीं गढ़ दिया गया था।  उनमें अनुभवों का निचोड़ होता था। ऐसी ही एक कहानी है हंस और कौवे की।

एक बार कुछ हंसों का दल कहीं से उड़ता हुआ आया और अपने गंतव्य पर जाने के पहले एक वृक्ष पर अपनी थकान मिटाने के लिए उतर गया। वहीँ पर एक कौवा भी बैठा उनको आते हुए देख रहा था।  उसने बिना यह जाने कि वे कितनी दूर से आ रहे हैं, कहाँ जा रहे हैं, उनका मजाक उड़ाते हुए कहा कि तुम लोग एक ही तरह से धीमे-धीमे पंख हिला कर उड़ते हो, फिर भी बड़ी जल्दी थक जाते हो ! मुझे देखो मैं पचीसों तरह की कलाबाजियों के साथ तेज उड़ान भरने के बावजूद तरोताजा रहता हूँ। कभी निढाल नहीं होता।  हंसों के सरदार ने उसे समझाया कि तुम एक सिमित दायरे में रहने वाले पक्षी हो तुम्हें ज्यादा उड़ना नहीं पड़ता और अपनी हैसियत से ज्यादा कोशिश करनी भी नहीं चाहिए। पर हमें दूर-दूर तक उड़ान भरनी होती है, इसीलिए प्रकृति ने हमें उसी के अनुसार क्षमता व् पंख दिए हैं, यदि हम भी करतब दिखाने लगें तो अपने गंतव्य तक कभी भी नहीं पहुँच पाएंगे। पर नासमझ, घमंडी कौवा हंसों को नीचा दिखाने और अपने को श्रेष्ठ साबित करने पर तुला रहा। हंसों ने उसका जवाब ना देते हुए कुछ समय बाद फिर अपनी यात्रा शुरू कर दी। उनको जाते देख कौवा भी उनकी उड़ान का मजाक बनाते हुए और अपने कौशल के प्रदर्शन की नादानी दिखाते हुए उनके पीछे  लग गया। कुछ ही समय बाद वे लोग उड़ते हुए जमीनी हद को छोड़ समुद्र के ऊपर पहुँच गए। कौवा ना कभी लगातार इतना उड़ा था ना ही इतनी दूर आया था, परिणामस्वरूप उस पर इतनी थकान हावी हो गयी कि उसे लगने लगा कि वह कभी भी नीचे पानी में गिर कर अपनी जान गंवा सकता था। मौत को सामने देख उसकी सारी हेकड़ी गायब हो गयी,  उसने हंसों से अपने प्राण बचाने की गुहार लगाईं। उसकी दशा देख हंसों को उस पर दया आ गयी और उन सब ने मिल कर किसी तरह उसको वापस उसके क्षेत्र में पहुंचा दिया।  

सपनों को पूरा करने में कोई बुराई नहीं है। पर उसके लिए अपनी तैयारी, अपनी क्षमता, अपनी औकात का एहसास होना बहुत जरुरी है। सिर्फ किसी को नीचा दिखाने के लिए ईर्ष्या या द्वेष की भावना से उठाया गया कदम कहीं का भी नहीं छोड़ता।   

गुरुवार, 9 मार्च 2017

हांडी में पकते चावल के एक दाने से अंदाज

लोगों का कहना है कि ये राजनीती वाले बहुत सक्षम और चतुर होते हैं। कांग्रेस पार्टी को अपने हश्र का अंदाज कुछ ही दिनों में लग गया था इसीलिए कोई भी बड़ा नेता प्रचार में नहीं आया एक-दो जगह प्रियंका को भेज उसे भी वापस बुला  लिया गया क्योंकि नतीजों से ख्याति पर असर पड़ता है। राहुल के बारे में आम ख्याल है की उनको बलि का बकरा बना देती है पार्टी

पिछले दिनों दो बार दिल्ली से लगे उत्तर प्रदेश के दो अलग-अलग इलाकों में जाने का मौका मिला था। चुनावों का समय था तो लगे हाथ कुछ लोगों से उसके परिणाम की जानकारी कुतुहल-वश लेने से खुद को रोका नहीं जा सका। इसे किसी भविष्यवाणी के लिए तो करना नहीं था फिर भी इतना ध्यान जरूर रखा था कि लोग अलग-अलग तबके, उम्र और परिवेश से हों। इस सारे क्रिया-कलाप को ऐसे ही छोड़ दिया था पर जब रोज टी.वी. के चैनलों पर लुटे-पिटे दलों द्वारा भी बढ़-चढ़ कर दावे पेश होते देखे तो सोचा अपनी मेहनत को भी ब्लॉग पर उजागर करते बनता है। भले ही कम ही लोगों से बात-चीत हुई पर कहते हैं ना कि हांडी में पकते चावलों के एक ही दाने से आभास मिल जाता है, पर इसके साथ ही यह भी सच है कि ठेठ यू. पी. और इधर गाजियाबाद, शालीमार गार्डन या नोयडा में जमीन-आसमान का फर्क है फिर भी यहां जो जवाब मिले वे बहुत रोचक थे।

अधिकतर का कहना था कि स्पष्ट बहुमत मुश्किल है। बहुतों का यह मानना था कि भाजपा का बर्चस्व बढ़ेगा और आश्चर्य  नहीं होगा यदि उसकी सरकार बन जाए। भाजपा का प्लस-प्वाइंट मोदी जी हैं। करीब पच्चीस साल बाद केंद्र में उनके बहुमत की सरकार आई जिसने कुछ तो आशा जगाई ही है।   उनकी कार्य-शैली, उनकी मेहनत, उनके खुद को खतरे में डाल कर लिए गए निर्णयों से लोग प्रभावित हैं और उन्हें राज्य की बदहाली को दूर करने में सहायक मानते हैं। जनता में इस बात का भी आक्रोश है कि बाकी के दलों के नेता देश-समाज की भलाई या विकास की बात न कर बात-बेबात सिर्फ मोदी के पीछे पड़े हुए हैं। सपा की "नौटँकी" और उसका कांग्रेस को साथ लेना भाजपा के लिए फायदेमंद होगा। लोगों का कहना कि मौका पाते ही कांग्रेस धत्ता बता जाएगी।  ऐसे लोगों ने जिन्हें अपने इलाके से बाहर जाने की जरुरत नहीं पड़ती, जैसे चायवाला, सब्जीवाला, जूते गांठने वाला आदि उनसे जब विकास के रूप में यमुना हाइवे के बारे में पूछा तो बोले, साहब हमें उससे क्या लेना-देना, वह तो गाडी-घोड़े वालों के लिए है, हमें तो यहां की सडकों से साबका पड़ता है जिस पर ध्यान से ना चलें तो मुंह के बल गिरें.  सायकिल चालकों की सुविधा के लिए बने मार्ग को चुनाव प्रपंच बताया गया क्योंकि इसके पूरा होने क्र पहले ही उसमें टूट-फूट शुरू हो गयी है। सपा के विपरीत जा रही बातों में उनकी आपसी कलह, कुर्सी की चाहत में कांग्रेस से हाथ मिलाना और  नेताजी की बेरुखी रही। फिर भी बहुत से लोगों को अखिलेश भाते हैं। उनका युवा होना, बाहुबलियों-कट्टरपंथियों से दूरी बनाने की कोशिश आम लोगों को हौसला देती है। बसपा को लोग मौका-परस्त पार्टी मानते हैं। उसके वादों पर भी लोगों को भरोसा नहीं रह गया है पर उसका अपना वोट बैंक भी है यह भी मान्यता है। इसलिए उसे छुपा रुस्तम मानते हैं लोग। ये खबरें भी चौंका गयीं थीं कि यू. पी. के बाबूओं ने अचानक बसपा की सरकार में बनी मूर्तियों को साफ कर चमकाना शुरू कर दिया था।  सबसे बुरी हालात कांग्रेस की है। लोगों का कहना है कि ये राजनीती वाले बहुत सक्षम और चतुर होते हैं। कांग्रेस पार्टी को अपने हश्र का अंदाज कुछ ही दिनों में लग गया था इसीलिए कोई भी बड़ा नेता प्रचार में नहीं आया एक-दो जगह प्रियंका को भेज उसे भी वापस बुला  लिया गया क्योंकि नतीजों से ख्याति पर असर पड़ता है। राहुल के बारे में आम ख्याल है की उनको बलि का बकरा बना देती है पार्टी।

तो लब्बो-लुआब यही रहा कि जनता भी कंफ्यूज है पर यदि चावल के एक दाने पर विश्वास करें तो भाजपा की राह प्रशस्त दिख रही है।