मंगलवार, 10 दिसंबर 2019

प्याज बिना स्वाद कहां रे !

इस लिहाज से प्याज को सब्जी रूपी ''बाबा'' भी कहा जा सकता है। जैसे आजकल के फर्जी बाबे, लोगों की मति फेर, उनको अपने वाग्जाल में उलझा कहीं का नहीं छोड़ते; ठीक वैसे ही यह ''प्याजिबाबा'' भी लोगों को स्वाद के मायाजाल में उलझा कर उनका आर्थिक शोषण करने से बाज नहीं आ रहा है। और इधर हम हैं कि सौ-पचास रुपये के लिए अपनी कोमलांगी को उसके सुख से विमुख करने को कतई राजी नहीं हैं...................!   

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ज्ञानी, गुणी, विवेकशील लोग कह गए हैं कि क्या स्साला खाने के लिए जीता है; अरे ! सिर्फ थोड़ा-बहुत जीने के लिए खा लिया कर ! अब उनको क्या बताएं कि दोनों अवस्थाओं में खाना तो खाना ही पडेगा और खाना तभी हितकर होगा जब रसना को रस आएगा। अब यह तीन इंची इंद्रिय बस देखने-कहने को ही छोटी है, कारनामे इसके बड़े-बड़े होते हैं। ये चाहे तो महाभारत करवा दे ! यह चाहे तो घास-पात को अनमोल बनवा दे। बोले तो, पूरी की पूरी मानवजाति इसके इशारों पर नाचती है। भले ही इसके लिए कुछ भी, कोई भी कीमत चुकानी पड़े। 
पढ़े-लिखे को फारसी क्या ! अब देख लीजिए, प्याज बिना खुद को छिलवाए लोगों के आंसू निकलवा रहा है कि नहीं ! किसके कारण ? सिर्फ जीभ के कारण ! जी हाँ, वही प्याज जिसके सेवन के लिए ऋषि-मुनियों ने बहुत पहले ही मनाही कर दी थी। क्योंकि शायद उन्हें इसका अंदाज हो गया था कि यह नामुराद, जिसका ना तो कोई ईमान है ना हीं धर्म ! एक ना एक दिन लोगों की मुसीबत का कारण बनेगा। आज देख लीजिए ! कुछ ही दिनों पहले जिसको कोई दो रुपये किलो तक लेने को तैयार नहीं था ! किसान जिसकी उपज को नष्ट करने पर मजबूर हो गए थे, उसी शैतान की आंत की जुर्रत कुछ ही दिनों में सात सौ गुना उछाल मार आज दो सौ का आंकड़ा छूने की हो रही है। कारण सिर्फ इंसान की वही तीन इंची इंद्री, जिसे बिना प्याज भोजन, भोजन नहीं लगता। वही प्याज जिसे छीलो तो परत दर परत सिर्फ छिलका ही हाथ आता है, यानी निल बटे सन्नाटा ! पर वही सन्नाटा आज ज्वालामुखी का शोर साबित हो रहा है। 
ठीक है कि इसमें कुछ गुण भी जरूर हैं, तो गुण तो रावण में भी थे ! उनको नजरंदाज कर यदि लोग बिना प्याज के खाना बनाने लग जाएं तो इसे दो दिनों में अपनी औकात नजर आ जाए ! पर नहीं ! इसने लोगों की मति ऐसे मार रखी है कि इसके चहेते इसको हासिल करने के लिए सरकार तक उलटने को तैयार हो जाते हैं। इस लिहाज से प्याज को सब्जी रूपी ''बाबा'' भी कहा जा सकता है। जैसे आजकल के फर्जी बाबे, लोगों की मति फेर, उनको अपने वाग्जाल में उलझा कहीं का नहीं छोड़ते; ठीक वैसे ही यह प्याजिबाबा भी लोगों को स्वाद के मायाजाल में उलझा कर उनका आर्थिक शोषण करने से बाज नहीं आ रहा है। और इधर हम हैं कि सौ-पचास रुपये के लिए अपनी कोमलांगी को उसके सुख से विमुख करने को कतई राजी नहीं हैं। देखना है कि यह कांदा और कितने कांड करेगा ! अभी तो आलम यह है कि ''उठाए जा उनके सितम और जिए जा, यूँ ही मुस्कुराए जा और पैसे खर्च किए जा ! (आंसू पिए जा !) 

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2019

"फैंटम" के निवास की याद दिलाती, देहरादून की गुच्चुपानी गुफा

किसी किले जैसी दुर्गम बनावट वाली गहरी प्राकृतिक गुफा में दस मीटर की ऊंचाई से एक झरना गिरते हुए एक अद्भुत दृश्य की रचना करता है। इसे देख कर बचपन में पढ़ी कॉमिक्स में ''फैंटम'' और उसके निवास की याद आ जाती है, बीहड़ का वैसा ही रहस्यमयी वातावरण, उसी से मिलती-जुलती गुफा, वैसा ही झरना..............! 

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गुच्चुपानी ! नाम सुन कर ऐसा लगता है जैसे गुपचुप यानी पानीपुरी के चटपटे पानी की बात हो रही हो। पर यह नाम है देहरादून के प्रसिद्ध पिकनिक स्पॉट का। मसूरी मार्ग पर देहरादून चिड़िया घर के पास, शहर से सात-आठ की.मी. की दूरी पर स्थित इस 650 मीटर, किले जैसी बनावट वाली गहरी प्राकृतिक गुफा में दस मीटर की ऊंचाई से एक झरना गिरते हुए एक अद्भुत दृश्य की रचना करता है। इसे देख कर बचपन में पढ़ी कॉमिक्स में ''फैंटम'' और उसके निवास की याद आ जाती है। इस जगह प्रकृति का एक अनोखा कारनामा भी घटित होता है जिसके तहत पानी की एक लहर उठती है और फिर गायब हो कुछ दूर जा कर फिर दिखने लगती है शायद इसी वजह से इसका नाम गुपचुप पानी पड़ा होगा जो समय के साथ बदल गुच्चुपानी हो गया होगा।



अंग्रेजों के समय में लुटेरे शासन से बचने के लिए इस जगह को खुद और अपने लूट के सामान को छिपाने के काम में लाते थे। इसके रास्तों का खतरनाक और बीहड़ होने के कारण वे पुलिस से बच निकलने में कामयाब हो जाते थे। इसीलिए इसे गुच्चुपानी के अलावा रॉबर्स केव यानी डाकुओं की गुफा के नाम से भी जाना जाता है। यह आज भी उतनी ही रहस्यमय है जितनी तब थी पर अब यह एक पर्यटन स्थल का रूप ले चुकी है जहां सैंकड़ों लोग रोज तफरीह करने आते हैं।





गाड़ियों के स्टैंड के पास पानी की धारा के साथ ही सीढ़ियों के साथ एक चबूतरा सा बना हुआ है जिसके आगे पानी में जूते ले जाने की मनाही है। वहीं से पानी में होते हुए करीब सौ मीटर की दूरी पर गुफा का प्रवेश मार्ग है। दूर से यह अहसास होता है कि सामने की पहाड़ियां जुडी हुई हैं, जबकि ऐसा नहीं है। उन्हीं के बीच से निकल उस झरने के अद्भुत दृश्य के दर्शन होते हैं। पानी में चलते हुए सावधानी आवश्यक है। छोटे-छोटे पत्थर के टुकड़े, फिसलन और जलीय जंतुओं का ध्यान रख कर बिना जल्दीबाजी के आगे बढ़ना ही ठीक रहता है। 



धीरे-धीरे यहां भी व्यवसायिकता अपने पैर पसारने लगी है जिसके तहत खाने-पीने की दुकानों के साथ-साथ किराए पर स्लीपर और कपडे भी मिलने लगे हैं। और तो और गीले कपडे बदलने के लिए ''बूथ'' जैसी जगहें भी किराए पर दी जाने लगी हैं। डर यही है कि कहीं सहस्त्र धारा की तरह ही इस जगह का प्राकृतिक सौंदर्य भी कहीं नष्ट ना कर दिया जाए।        

गुरुवार, 5 दिसंबर 2019

कहनी है इक बात हमें इस देश के पहरेदारों से

खालसा पंथ में दिक्षित लोग जात-पांत के भेदभाव से दूर, आत्मज्ञानी, सरल चित्त, समाजसेवी होने के साथ-साथ किसी के बहकावे में ना आने वाले हैं ! वे जानते हैं कि हिंदू-सिख एक ही माँ की संतानें हैं ! एक ही शरीर के अंग हैं ! एक ही परिवार के सदस्य हैं ! सो यहां किसी की दाल गल नहीं रही थी ! पर भारत को  खंड-खंड करने का स्वप्न देखने लोग भी जानते हैं कि धर्म के नाम पर हम कुछ जल्दी ही भावुक हो जाते हैं...........................!

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हिंदुस्तान ! हिंदुओं के रहने का स्थान। संपंन्न, शांतिप्रिय, जो है उसी में खुश रहने वाले लोगों का देश। कई आए, कई गए ! कुछ अपना मतलब सिद्ध कर लौट गए कुछ यहीं के हो कर रह गए। दुनिया में मंदी का दौर आया तो बाहर के देशों के लोगों की गिद्ध दृष्टि इस सोने की चिड़िया कहलाने वाले देश पर पड़ी। बहुतेरे आए पर अंग्रेजों ने अपनी कुटिलता से बाकी अतिक्रमणकारियों को हाशिए पर धकेल दिया। पर सिर्फ चार हजार अंग्रेजों के द्वारा इतनी बड़ी आबादी पर काबू पाना आसान नहीं था। इसीलिए षड़यन्त्र पूर्वक धर्म के नाम पर फूट फैला कर आपसी नफरत को जन्म दिया ! फिर एक से दूसरे को बचाने के नाम पर संरक्षण देने के बहाने उन्हें वश में किया ! अपनी शर्तें रखीं और धीरे-धीरे अपने शिकजे को जकड़ते चले गए। यहां तक की जाते-जाते भी उसी के सहारे देश के दो टुकड़े तो कर ही गए साथ ही अपनी कुटिल बुद्धि से देश को और भी गारत करने के लिए जाति, भाषा, ऊँच-नीच, अमीर-गरीब जैसे मुद्दों द्वारा फूट डाल राज करने की नीतियां हमारे राजनेताओं को विरासत में दे गए। जिससे उपजे विद्वेष का परिणाम आज सबके सामने है।

कभी सोच के देखा जाए तो ऐसा क्या हुआ जो देश की आजादी के बाद से ही हिंदुओं, खासकर ब्राह्मणों के खिलाफ दलित मोर्चा खोला गया ! उसके पहले हजार साल तक ऐसी बात क्यों नहीं उठी ? क्या इन्हीं तीस-चालीस सालों में ही ब्राह्मणों के द्वारा ज्यादतियां हुईं ? जबकी इन्हीं ब्राह्मणों की वजह से ही ईसाईयों या मुस्लिमों द्वारा धर्मांतरण सफल नहीं हो पाया था ! नहीं तो किसी भी विधर्मी शासक ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। जब यह देखा गया कि बाकी हिंदू जब तक ब्राह्मणों के संपर्क में रहेंगे तब तक उनको बहकाया नहीं जा सकता, तो इसीलिए जात-पांत का चक्रव्यूह रचा गया, पैसों का लालच और सम्मान की हड्डी फेंकी गयी ! यह दांव कुछ हद तक सफल रहा और समाज में विद्वेष की खाई गहरा गयी। वैसे सच तो यह है कि ब्राह्मण या मनुवाढ तो सिर्फ बहाना ही है, असल में हिंदुओं को बांट-काट कर किसी भी तरह सत्ता हासिल करना मकसद है।  

विडंबना ही रही कि पहले हिंदू मुस्लिम के बीच द्वेष के बीज बोए गए। फिर द्रविड़-आर्य का खेल खेला गया। उन्हें एक-दूसरे का दुश्मन जैसा बना दिया गया। पर इससे कइयों का मकसद सिद्ध नहीं हो पाया। सत्ता पाने की लालसा में कुकुरमुत्तों की तरह नए-नए छत्रप उगते गए और समाज को जाति, भाषा, क्षेत्र के हिसाब से बांट कर अपना उल्लू सीधा करते चले गए। गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा से त्रस्त लोगों को कभी मनु, कभी हिंदू, कभी ब्राह्मण, कभी दलित जैसे निरर्थक जुमलों में उलझाए रखने में ही उनकी बादशाहत जो कायम रहने वाली थी। और चूँकि ब्राह्मण समाज की नींव की तरह थे सो पहले उन्हीं पर हमला किया गया। उन पर इल्जाम लगाने वाले तथाकथित समाजसेवी और अपने आप को बुद्धिजीवी कहलाने वालों को क्यों दलितों के मसिहाओं की कारस्तानियां नजर नहीं आतीं ? क्या किसी एक भी दलित नेता के किसी सर्वहारा परिवार को सहारा दिया है ? परिवार को तो जाने दें किसी बच्चे के भविष्य को संवारने का जिम्मा लिया है ?

अब तक पडोसी या घर के ही कुटिल लोगों की लाख कोशिशों के बावजूद हिंदुओं और सिखों में दरार नहीं डाली जा सकी थी। इसके कुछ मुख्य कारण भी थे ! जैसे सिख धर्म का इतिहास अभी नया-नया होने के कारण उसके बारे में जानने और बताने वाले बहुत से लोग समाज को सही जानकारी देते आए थे। गुरु साहिबान की वाणियों में ऋषि-मुनियों की बातें समाहित थीं। ऐसे सैंकड़ों हिंदू घर थे जिन्होंने अपने एक पुत्र को खालसा पंथ की दीक्षा दिलवाई थी। फिर इस पंथ में दिक्षित लोग जात-पांत के भेदभाव से दूर, आत्मज्ञानी, सरल चित्त, समाजसेवी होने के साथ-साथ किसी के बहकावे में ना आने वाले थे। वे जानते थे कि हिंदू-सिख एक ही माँ की संतानें हैं ! एक ही शरीर के अंग हैं ! एक ही परिवार के सदस्य हैं ! इन्हीं सच्चाइयों के कारण यहां किसी की दाल गल नहीं रही थी। पर विरोधी ताकतें भी चुप नहीं बैठीं थीं ! धीरे-धीरे उन्होंने जहर उगलना जारी रखा ! जिसके तहत दोनों धर्मों को जुदा जताने की साजिश शुरू हो गयी। नयी सिख पीढ़ी को इतिहास की गलत जानकारी दे बहकाने की कोशिश की जाने लगी। बार-बार यह फैलाया जाता रहा कि सिखों ने हिंदुओं की रक्षा की ! पर ज्ञातव्य है कि खालसा पंथ की स्थापना के समय ब्राह्मण, क्षत्रिय ही आगे आए थे। यह खुला सत्य है कि हर  परिवार ने अपना एक बेटा खालसा फौज के लिए दिया था। एक ओर जहां मराठे मुगलों से लड़ रहे थे वहीं राजपूतों और ब्राह्मणों ने भी मुग़ल साम्राज्य की नाक में दम कर रखा था। जब पहली खालसा फौज बनी तो उसका नेतृत्व भाई प्राग दास जी, जो एक ब्राह्मण थे, उनके हाथों में था। उनके बाद उनके बेटे भाई मोहन दास जी ने कमान सम्हाली। उनके अलावा सती दास जी, मति दास जी, दयाल दास जी जैसे ब्राह्मण वीरों ने गुरु जी की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे डाली। इतना ही नहीं गुरु जी को शस्त्रों की शिक्षा देने वाले भी पंडित कृपा दत्त जी जैसा योद्धा पंजाब में दुसरा नहीं हुआ। एक बैरागी ब्राह्मण लक्ष्मण दास और उनके किशोर पुत्र अजय ने सरहिंद में गुरु परिवार की रक्षा के लिए दुश्मनों से लोहा लिया और चप्पड़ चिड़ी की लड़ाई में विजय प्राप्त की। यही लक्ष्मण दास आगे चल कर बंदा बहादुर कहलाए।

कहने का तात्पर्य यही है कि भारत को खंड-खंड करने का स्वप्न देखने वालों से हमें होशियार रहने की जरुरत है। किसी के प्रलोभन, दरियादिली या झूठी सहानुभूति से भ्रमित न होकर अपने देश और समाज के लिए ही अपने आप को सजग रखना है। फिर चाहे वह पाकिस्तान द्वारा किसी धर्मस्थली तक जाने की इजाजत दे बहलाने की मंशा हो या फिर चीन द्वारा उसके यहां बेहतर व्यापार का प्रलोभन ! क्योंकि वे लोग भी जानते हैं कि धर्म के नाम पर हम कुछ जल्दी ही भावुक हो जाते हैं। 

मंगलवार, 3 दिसंबर 2019

वन अनुसंधान संस्थान, देहरादून का अप्रतिम, बेजोड़ भवन

हमारे घटते प्राकृतिक संसाधनों, बढ़ते प्रदूषण, कम होती हरियाली और बढ़ते कंक्रीट के जंगलों का मुख्य कारण बेलगाम बढ़ती आबादी ही है। लोग बढ़ेंगे तो उनके लिए जगह भी चाहिए ! रोटी-पानी भी चाहिए ! गाडी-घोडा भी चाहिए ! और यह सब चाहिए तो फिर उपरोक्त कमियां तो सामने आएंगी ही ! पहले बड़े शहरों में ही दवाब नजर आता था, पर अब तो देश के छोटे शहर-कस्बे भी अछूते नहीं बचे हैं। मैदानों को तो छोड़ें, पर्वतीय इलाके भी अपनी नैसर्गिक सुंदरता खोने लगे हैं................!  

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पिछले दिनों चिर लंबित लाखामंडल की यात्रा का मौका बन पाया तो ''बेस'' देहरादून को ही ठहराया। जब वहां रुकना था तो लाजिमी था कि शहर को भी देखा-परखा जाए ! पर कभी अपने सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध यह अर्ध-पहाड़ी शहर भी व्यावसायिकता के बाज़ार के लौह शिकंजों में जकड़ता जा रहा है। हर वह दर्शनीय स्थल जिसे देखने की अभिलाषा लिए पर्यटक यहां पहुंचते हैं उन्हें घोर निराशा ही होती है ! फिर चाहे वह सहस्त्र धारा हो, चाहे गुच्चूपानी हो या प्रकाशेश्वर मंदिर ! हर जगह अतिक्रमण और गंदगी का बोलबाला ! शहर के मर्म-स्थल घंटाघर या पल्टन बाजार की भीड़-भाड़, प्रदूषण, अफरा-तफरी, बेकाबू यातायात का जिक्र नाहीं किया जाए तो भला ! ऐसे में भी अभी वहां एक-दो जगहें ऐसी हैं, जहां जा कर दिल को सकून मिलता है। जिनमें एक धर्मस्थली, टपकेश्वर महादेव मंदिर और दूसरी कर्मस्थली, वन विभाग का रिसर्च इंस्टीट्यूट प्रमुख हैं। आज पहले FRI याने भारतीय वन अनुसंधान संस्थान की बात -



चांदबाग, आज जहां दून स्कुल है, वहां 1878 में अंग्रेजों द्वारा स्थापित ब्रिटिश इंपीरियल फॉरेस्ट स्कूल को 1906 में इंपीरियल फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट का रूप प्रदान किया गया था। फिर 1923 में आज के विशाल भूखंड पर सी.जी. ब्लूमफील्ड द्वारा निर्मित एक नई ईमारत में 1929 में इसका स्थानांतरण कर दिया गया। जिसका उद्घाटन उस समय के वायसराय लॉर्ड इरविन द्वारा किया गया था। शहर के ह्रदय-स्थल से करीब सात की.मी. की दूरी पर देहरादून-चकराता मार्ग पर यह ग्रीको-रोमन वास्तुकला की शैली वाला भव्य, सुंदर, शानदार, अप्रतिम, बेजोड़ भवन अपना सर उठाए बिना प्रयास ही पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। इसमें एक बॉटनिकल म्यूजियम भी है तरह-तरह के पेड़-पौधों की जानकारी प्रदान करता है। इसके लिए अलग से प्रवेश शुल्क लिया जाता है।



2000 एकड़ में फैला एफ.आर.आई. में 7 संग्रहालय और तिब्बत से लेकर सिंगापुर तक के तरह-तरह के पेड़-पौधे यहां पर संग्रहित हैं। इसका मुख्य भवन राष्ट्रीय विरासत घोषित किया जा चुका है। सबसे बड़े ईंटों से बने इस भवन का नाम एक बार गिनीज बुक में भी दर्ज हो चुका है। वन शोध के क्षेत्र में प्रसिद्ध, एशिया में अपनी तरह के इकलौते संस्थान के रूप में यह दुनिया भर में प्रख्यात है। इसीलिए इसे देहरादून की पहचान और गौरव के रूप में देखा जाता है। देहरादून आने वाला शायद ही कोई पर्यटक हो जो इसे देखने ना आता हो। हर रोज यहां सैंकड़ों दर्शकों का तांता लगा रहता है। उनकी सुविधा के लिए एक कैंटीन तथा उत्तराखंड के लिबासों की बिक्री के लिए एक छोटा सा शो रूम भी यहां उपलब्ध है।     

बुधवार, 20 नवंबर 2019

कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमती ने...! कौन थी ये भानुमती ?

भानुमती ! कहीं की ईंट कहीं के रोडे को इकठ्ठा कर अपना कुनबा बना लेने वाली भानुमती ! किसी जादुयी पिटारे की स्वामिनी भानुमति ! दुर्योधन, कर्ण तथा अर्जुन के साथ अनोखे सम्बन्ध बनाने वाली भानुमति ! कौन थी ये महिला, जिसके नाम के मुहावरे उससे ज्यादा प्रसिद्ध हैं ? उसके बारे में विस्तार से जानने के लिए महाभारत काल में ताक-झांक करनी पड़ेगी, जहां उसके बारे में अच्छी-खासी जानकारी उपलब्ध है.......! 

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प्राचीन काल में भारत के महाजनपदों में से एक था कंबोज। जिसका क्षेत्र आधुनिक पश्चिमी पाकिस्तान और अफगानिस्तान से मिलता था। उस समय कंबोज पर राजा चन्द्रवर्मा का राज था। उनकी एक पुत्री थी जिसका नाम था भानुमती। उसके रूप और गुणों के सामने स्वर्ग की अप्सराएं भी कहीं नहीं ठहरती थीं। उसके विवाह योग्य होने पर राजा चंद्र्वर्मा ने भानुमती के विवाह के लिए स्वयंबर का आयोजन किया। भानुमती ना सिर्फ बहुत रूपवान थी, अत्यंत बुद्धिमती होने के साथ-साथ वह शारीरिक रूप से भी अति बलिष्ठ थी। इन्हीं गुणों की ख्याति सुन उसके स्वयंबर में दुर्योधन, कर्ण, जरासंध, शिशुपाल जैसे पराक्रमी, वीर और ख्यातिप्रद राजा उससे विवाह की अभिलाषा लेकर आये थे।

जब स्वयंबर स्थल पर भानुमती पूरे श्रृंगार के साथ आई तो वहां उपस्थित सभी राजाओं के मुंह खुले के खुले रह गए। ऐसा अप्रितम सौन्दर्य ना किसी ने देखा था ना किसी ने सोचा था। जब दुर्योधन की नज़र भानुमती पर पड़ी तो उसका मन मचल उठा और उसने ठान लिया कि भानुमती से वही विवाह करेगा। परंतु भानुमती को दुर्योधन पसंद नहीं था। इसीलिए वह वरमाला ले उससे आगे बढ़ गयी। यह देख दुर्योधन अत्यंत क्रोधित हो गया और भानुमती को पकड कर जबरन उससे माला अपने गले में डलवा ली। वहां उपस्थित बाकी राजाओं में आक्रोश फ़ैल गया तथा उन्होंने इस बात का विरोध किया तो दुर्योधन ने सभी योद्धाओं को कर्ण से युद्ध करने की चुनौती दे डाली ! कुछ ने युद्ध की चुनौती स्वीकार की भी तो उन्हें कर्ण ने पलक झपकते ही हरा दिया। उसके इस शौर्य से भानुमती भी बहुत प्रभावित हुई। इसी कारण विवाहोपरांत हस्तिनापुर आने पर उसे कर्ण के साथ समय व्यतीत करना बहुत भाता था। 

भानुमती को हस्तिनापुर ले आने के बाद दुर्योधन ने भानुमती के अपहरण को यह कह कर, अप ने आप को सही ठहराया, कि भीष्म पितामह भी अपने सौतेले भाइयों के लिए अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका का हरण करके ले आए थे। इस तर्क से भानुमती भी मान गई और दोनों ने विवाह कर लिया। इनके लक्ष्मण तथा लक्ष्मणा नामक एक पुत्र तथा एक पुत्री हुई। कालांतर से लक्ष्मणा ने कृष्ण पुत्र साम्ब से भाग कर विवाह कर लिया और लक्ष्मण युद्ध में अभिमन्यु द्वारा मारा गया। फिर भी  भानुमती ने युद्ध में दुर्योधन की मृत्यु के बाद अर्जुन से विवाह कर लिया था। 

भानुमती ! जिसने दुर्योधन को पति नहीं चुनना चाहा था ! स्वयंबर के समय वह किसी और को वरमाला पहनाना चाहती थी ! पर उसे मजबूरन दुर्योधन से ब्याह रचाना पड़ा ! भले ही बाद में वह राजी हो गयी हो ! स्वयंबर के वक्त हुए युद्ध में वह कर्ण से भी प्रभावित थी ! हस्तिनापुर आने के बाद उसे कर्ण के साथ समय व्यतीत करना पसंद था ! फिर महाभारत युद्ध के पश्चात दुर्योधन की मृत्यु के उपरांत उसने अर्जुन से विवाह कर लिया ! समय, परिस्थियों और मौकापरस्ती के चलते, समयानुसार अपना मतलब सिद्ध करते रहने और दुर्योधन, कर्ण, अर्जुन के साथ अनोखे सम्बन्ध बना बार-बार अपने अलग-अलग कुनबे गढने की वजह से ही शायद यह कहावत चलन में आई - 
''कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमती ने कुनबा जोड़ा'' !

शुक्रवार, 15 नवंबर 2019

देहरादून का प्रकाशेश्वर महादेव मंदिर, जहां किसी भी तरह के चढ़ावे या दान की मनाही है

मंदिर में चढ़ावा तो प्रतिबंधित है, तो लगता है कि शायद आय की आपूर्ति के लिए संबंधित लोगों का सारा ध्यान मंदिर के बाहर और अंदर की दुकानों की बिक्री पर केंद्रित हो गया है ! नहीं तो चारों ओर फैलती गंदगी पर ध्यान न जाए ये तो असंभव सा ही है। इसके साथ ही एक और विडंबना भी दिखी कि दर्शनार्थ आने वाले भगत और श्रद्धालुगण सिर्फ किसी तरह कूड़े-पानी-गंदगी से बचते हुए अंदर जाने की जुगत में ही रहते हैं इस परेशानी को नजरंदाज करते हुए ! कभी-कभी मन में आता है कि क्या हमारे धर्मस्थलों की नियति ही है गंदा रहना ...............?

#हिन्दी_ब्लागिंग 
देहरादून दूसरा दिन ! जैसा की तय किया गया था, सुबह साढ़े नौ बजते-बजते शहर भ्रमण का दौर शुरू हो गया। सबसे पहले मसूरी रोड पर, घंटाघर से करीब बारह कि.मी. दूर. कुठाल गेट के पास सड़क के किनारे स्थित #प्रकाशेश्वर_महादेव_मंदिर पर रुकना हुआ। भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर देहरादून के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में से एक है। हर रोज मंदिर को फूलों से सजाया जाता है। स्फटिक का शिवलिंग यहां का मुख्य आकर्षण है। यह एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां किसी भी तरह के चढ़ावे या दान की मनाही है। लाल और नारंगी  रंगों से सजे इस मंदिर की छत पर शिव जी के त्रिशूल सजे हुए हैं। मंदिर की दीवारों को लाल और नारंगी रंग में चित्रित किया गया है। आने वाले श्रद्धालुओं को दिन भर खीर का प्रसाद मिलता है। किसी शिव भक्त के द्वारा निर्मित इस मंदिर का इतिहास फिलहाल अज्ञात है। हालांकि मुख्य द्वार पर बंगला भाषा में सूचना पट पर एक "फरमान" जरूर लिखा हुआ है जिसमें किसी भी तरह के चढावे की मनाही का निर्देश दिया गया है। 

मंदिर के अंदर किसी पूजा सामग्री या मिठाई वगैरह की दूकान नहीं है। अलबत्ता मोती-रत्नों-रुद्राक्ष-माला वगैरह की बिक्री के लिए खासी बड़ी जगह घेर कर बिक्री की जाती है। उसी तरह मंदिर के प्रवेश द्वार के साथ ही खाने-पीने की दूकान खोल दी गयी है। वहीं एक बात और महसूस हुई कि मंदिर से जुड़े अधिकांश लोग तनावग्रस्त से लगे बाहर की दूकान पर उपस्थित सज्जन तो जैसे ग्राहकों पर एहसान सा कर रहे थे। सच कहूं तो किसी धर्मस्थल के अंदर जाते समय जो एक श्रद्धा की भावना उपजती उसका यहां तनिक अभाव सा लगा ! 

इस प्रसिद्ध मंदिर को देखने की लालसा लिए जैसे ही मंदिर के मुख्य द्वार के सामने उतरे वैसे ही मन खिन्नता से भर उठा। मुख्य द्वार के सामने ही दो बड़े-बड़े ऊपर तक कूड़े से भरे कूड़ा पात्र रखे हुए थे ! जिनके पूरे भरे होने की वजह से कूड़ा निकल-निकल कर मंदिर के अंदर-बाहर गंदगी फैला रहा था। मंदिर के अंदर भी एक कूड़ादान रखा हुआ था ! ऊपर से रही-सही कसर वहां घूमते बंदर पूरी कर रहे थे। दरवाजे पर ही एक नल भी लगा हुआ था जिसकी वजह से जूते उतारने की जगह भी गीली थी। कूड़ा और पानी दोनों मिल कर गंदगी का कहर ढा रहे थे। जबकि मंदिर के सामने जहां गाड़ियां खड़ी होती हैं वहां अफरात जगह है। वैसे भी मंदिर की काफी बड़ी जगह है, कूड़ेदान कहीं और भी बिना परेशानी रखे जा सकते हैं। 


उस समय तो संकोचवश किसी से कुछ नहीं कहा पर लौटते समय रहा ना गया ! श्रीमती जी की भी इच्छा थी एक बार और दर्शन करने की ! सो इस बार पुजारी जी से अति नम्रता से अपने मन की बात कही ! पहले तो वे मेरा मुंह ही देखते रह गए ! फिर उन्होंने सारा इल्जाम बंदरों पर थोप दिया ! जिस पर मैंने कहा कि चूँकि कूड़ादान ठीक दरवाजे पर मंदिर के सामने है तो बंदर तो आऐंगे ही और वे यहीं गंदगी फैलाएंगे, इसमें जानवरो का क्या कसूर है ? कूड़ादान को ही कहीं और रखा जाए तो ही बात बनेगी। मेरी बात कुछ समझ में आने पर उन्होंने मुझे प्रबंधक से बात करने को कहा। ये महोदय भी कुछ असमंजस में घिर गए ! बोले इस ओर ध्यान ही नहीं गया ! फिर आपकी बात पर जरूर कार्यवाही करेंगे, ये आश्वासन जरूर दिया। 


ये सब देख यही लगता है कि मंदिर में चढ़ावा तो प्रतिबंधित है, तो आय की आपूर्ति के लिए संबंधित लोगों का सारा ध्यान मंदिर के बाहर और अंदर की दुकानों की बिक्री पर केंद्रित हो गया है ! नहीं तो इतनी बड़ी बात पर ध्यान न जाए ये तो असंभव सा ही है। इसके साथ ही एक और विडंबना भी दिखी कि दर्शनार्थ आने वाले भगत और श्रद्धालुगण सिर्फ किसी तरह कूड़े-पानी-गंदगी से बचते हुए अंदर जाने की जुगत में ही रहते हैं इस परेशानी को नजरंदाज करते हुए ! कभी-कभी मन में आता है कि क्या हमारे धर्मस्थलों की नियति ही है गंदा रहना ? 

गुरुवार, 14 नवंबर 2019

दिल्ली-देहरादून-लाखामंडल

दिनों-दिन बढ़ती आबादी का बोझ महानगरों से निकल अब छोटे शहरों को भी अपने चंगुल में लेने लगा है। पहाड़ की गोद में  बसा सुंदर प्यारा सा शहर देहरादून भी इसकी चपेट में आ चुका है। आबादी के साथ ही बढ़ते निर्माण, धुंआ उगलते बेलगाम वाहन, बेतरतीब यातायात,  घटती हरियाली, उड़ती धूल यहां भी लोगों को मास्क लगाने को मजबूर कर रहे हैं ............!

#हिन्दी_ब्लागिंग
लाखामंडल :- यहां जाने की इच्छा एक लंबे अरसे के बाद इस बार नवम्बर में जा कर पूरी हुई। जब किसी तरह आठ से बारह नवम्बर का समय दायित्वों-परिस्थितियों से समझौता कर निकाला गया। पूरा खाका और ताना-बाना फिट कर आठ की सुबह देहरादून शताब्दी की सीट पर जा जमे। साथ में श्रीमती जी और बड़े बेटे चेतन का साथ भी था। देहरादून के होटल में चार दिनों की बुकिंग की जा चुकी थी। पर पहले दिन ही जब मित्र दीक्षित जी को हमारे वहां होने का पता चला तो उन दोनों द्वारा आग्रह युक्त इतना स्नेहिल दवाब पड़ा कि लाख झिझक और संकोच के बावजूद अगले दिन शहर से दूर साफ़-सुथरे वातावरण में उनके बड़े से, 5BHK एपार्टमेंट की चाबी लेने को बाध्य हो गए। पर शर्त यह रही कि हमारा सिर्फ और सिर्फ रहना ही होगा। उनका अपना दूसरा फ़्लैट भी उसी परिसर में बगल में ही था। 

घर की छत से नजर आता विहंगम दृश्य 
पहला दिन :- होटल स्टेशन के पास ही था। आठ की दोपहर बाद का समय भीड़-भाड़ वाले पलटन बाजार की गश्त, घडी मीनार की छाया में हलकी-फुलकी उदर पूजा करते और अगले दिनों का कार्यक्रम तय करने तथा टैक्सी वगैरह के इंतजाम में ही निकल गया। आज की रेल यात्रा की थकान को देखते हुए यह तय रहा कि दूसरे दिन यानि नौ को देहरादून का कम थकाने वाला भ्रमण कर दस को लाखामंडल की ओर निकला जाए, क्योंकि वहां की करीब सवा सौ कि.मी. की दूरी तक आने-जाने में आठ घंटे तथा वहां तक़रीबन दो घंटे यानी कुल दस-ग्यारह घंटों के लिए तारो-ताजा होना बेहद जरुरी था। इसी यात्राक्रम को ध्यान में रख वाहन उपलब्ध करवाने वालों से जानकारी हासिल की और दो दिनों के लिए अपनी आवश्यकताएं बता घूमने की जिम्मेदारी एक को सौंप दी। 
पलटन बाजार 
वही भीड़-भाड़ वही अफरा-तफरी 

पलटन बाजार, 1820 में अंग्रेजों को देहरादून में जब अपनी छावनी स्थापित करने की जरुरत महसूस हुई तो उन्होंने  ब्रिटिश सेना की एक टुकड़ी को यहां ला तैनात किया। अब जब लोग आ बसे तो उनकी रोजमर्रा की जरूरतों की आपूर्ति के लिए दुकानों की भी आवश्यकता पड़ी। इस तरह एक बाजार अस्तित्व में आया, जहां सेना, जिसे पलटन कहते थे, के जवान ही अधिकतर खरीदारी किया करते थे, इसलिए उस बाजार का नाम पलटन बाजार पड़ा जो आज भी उसी नाम से प्रसिद्ध है। यह यहां का सर्वाधिक पुराना और व्यस्त बाजार है। स्थाई निवासियों तथा पर्यटकों सबकी खरीदारी करने के लिए पहली पसंद तो है ही इसके साथ ही युवाओं के लिए यह मौज और समय बिताने की जगह की रूप में भी जाना जाता है। आज इस बाजार में फल, सब्जियां, सभी प्रकार के कपड़े, तैयार वस्त्र, जूते और घर में प्रतिदिन काम आने वाली प्रत्येक वस्तु सहज उपलब्ध हैं।
घंटाघर :- यह देहरादून की सबसे व्यस्त राजपुर रोड के मुहाने पर स्थित है और यहाँ की प्रमुख व्यवसायिक गतिविधियों का केन्द्र है। ईंटों और पत्थरों से निर्मित इस षट्कोणीय ईमारत का निर्माण अंग्रेजों ने करवाया था। जिसके शीर्ष के हर मुख पर छः घड़ियां लगी हुई हैं। इसके हर पहलू में एक दरवाजा बना हुआ है जिसके अंदर की सीढ़ियां ऊपर तक जाती हैं जहां अर्द्ध वृताकार खिड़कियां बनी हुई हैं। देहरादून का यह घंटाघर नगर की सबसे सौन्दर्यपूर्ण संरचना तो है ही इसका षट्कोणनुमा ढाँचा एशिया में भी अपने प्रकार का विरला ही है।
इधर से निश्चिन्त हो होटल लौटे ही थे कि क्षमा जी का फोन आ गया और जैसा पहले बता चुका हूँ उनका आग्रह टाला नहीं जा सका। दूसरे दिन सुबह कुछ तामझाम के बाद होटल की बुकिंग निरस्त कर, गाडी वहीं बुला, सामान को उनके घर छोड़ते हुए देहरादून से परिचित होने निकल पड़े।

@दूसरा दिन - देहरादून के दर्शनीय स्थल 

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