मंगलवार, 20 अगस्त 2019

राजस्थान का लोहार्गल धाम, जहां पांडवों के हथियार गले थे

महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था, पर पांडव अपने भाई बंधुओं और अन्य स्वजनों की हत्या करने के पाप से अत्यंत व्यथित थे। उन्हें दुःखी तथा पश्चाताप की अग्नि में जलते देख श्री कृष्ण जी ने उन्हें पाप मुक्ति के लिए विभिन्न तीर्थ स्थलों के तीर्थाटन की सलाह दी तथा यह भी बतलाया कि जिस तीर्थ में तुम्हारे हथियार पानी में गल जायेंगे वहीं तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा। घूमते-घूमते पांडव लोहार्गल आये तथा जैसे ही उन्होंने यहां के सूर्यकुंड़ में स्नान किया उनके सारे हथियार पानी में गल गये। उन्होंने इस स्थान की महिमा को समझ इसे तीर्थ-राज की उपाधी से विभूषित किया। फिर शिव जी की आराधना कर मोक्ष की प्राप्ति की

#हिन्दी_ब्लागिंग 

लोहार्गल राजस्थान में शेखावटी इलाके की नवलगढ़ तहसील में, झुंझुनू शहर से तकरीबन 70 कि.मी. और उदयपुरवाटी से करीब दस कि.मी. की दूरी पर आड़ावल पर्वत की घाटी में स्थित है। लोहार्गल का अर्थ है, वह स्थान जहां लोहा गल जाए। पुराणों में भी इस स्थान का जिक्र मिलता है। अरावली पर्वत शाखाओं की सबसे ऊँची 1050 मी. की चोटी की तलहटी में स्थित इस जगह को स्थानीय लोग ''लुहागरजी'' के नाम से भी पुकारते हैं। पहले यहां सिर्फ साधू-संत ही रहा करते थे, पर अब यहां कई परिवार बस गए हैं। जो मुख्यतः अचार के व्यवसाय से जुड़े हैं। मुख्य मार्ग से करीब पांच-छह कि.मी. की चढ़ाई नुमा दूरी पर कुंड के पास तरह-तरह के अचारों से सजी बीसीओं दुकानें स्थित हैं जिनकी अचारी खुशबू से सारा इलाका महकता रहता है। 
लोहार्गल से भगवान परशुराम का भी नाम जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि क्षत्रियों के संहार के पश्चात क्रोध शांत होने पर जब उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ तो पश्चाताप स्वरुप उन्होंने यहां यज्ञ किया तथा नरसंहार के पाप से मुक्ति पाई थी। यहां एक विशाल बावड़ी भी है जिसका निर्माण महात्मा चेतनदास जी ने करवाया था। यह राजस्थान की बड़ी बावड़ियों में से एक है। पास ही पहाड़ी पर एक प्राचीन सूर्य मंदिर बना हुआ है। इसके साथ ही वनखण्डी जी का मंदिर है। कुण्ड के पास ही प्राचीन शिव तथा हनुमान मंदिर तथा पांडव गुफा भी स्थित है। इनके अलावा चार सौ सीढ़ियां चढने पर मालकेतु जी के दर्शन भी किए जा सकते हैं। 

यहां के प्राचीन सूर्य मंदिर के पीछे भी एक अनोखी कथा प्रचलित है। प्राचीन काल में काशी में सूर्यभान नामक राजा हुए थे, जिन्हें वृद्धावस्था में अपंग लड़की के रूप में एक संतान हुई। राजा ने तमाम ज्योतिर्विदों से उसके बारे में जानकारी हासिल की तो पता चला कि पूर्व के जन्म में वह लड़की मर्कटी थी, जो शिकारी के हाथों मारी गई थी। शिकारी उस मृत बंदरिया को एक बरगद के पेड़ पर लटका कर चला गया था। अभक्ष्य होने के कारण उसका बाकी शरीर तो हवा और धूप से सूख कर लोहार्गल धाम के पवित्र जलकुंड में गिर गया पर उसका एक हाथ वहीं पेड़ पर अटका रह गया था। इसीलिए पुनर्जन्म में इसे ऐसे हस्त-विहीन शरीर की प्राप्ति हुई। इस व्याधि के परिमार्जन हेतु उन्होंने राजा को उपाय सुझाया कि यदि आप उस हाथ को भी ला कर कुंड के पवित्र जल में डाल दें तो इस बच्ची का अंपगत्व समाप्त हो जाएगा। राजा तुरंत लोहार्गल आए तथा उस बरगद की शाखा से बंदरिया के हाथ को जलकुंड में डाल दिया। जिससे उनकी पुत्री का हाथ स्वतः ही ठीक हो गया। इस चमत्कार से प्रभावित हो राजा ने यहां पर सूर्य मंदिर व सूर्यकुंड का निर्माण करवा कर इस तीर्थ को भव्य रूप दिया।
एक यह भी मान्यता है, भगवान विष्णु के चमत्कार से प्राचीन काल में पहाड़ों से एक जल धारा निकली थी जिसका पानी अनवरत बह कर सूर्यकुंड में जाता रहता है। इस प्राचीन, धार्मिक, ऐतिहासिक स्थल के प्रति लोगों में अटूट आस्था है। लोगों का यहां वर्ष भर आना-जाना लगा रहता है। माघ मास की सप्तमी को सूर्यसप्तमी महोत्सव मनाया जाता है। श्रावण मास में भक्तजन यहां के सूर्यकुंड से जल भर कर कांवड़ उठाते हैं। जिसमें सूर्य नारायण की शोभायात्रा के अलावा सत्संग प्रवचन के साथ विशाल भंडारे का आयोजन भी किया जाता है।हज़ारों नर-नारी यहां आ कुंड में स्नान कर पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं।  

लोहार्गल एक प्राचीन, धार्मिक व ऐतिहासिक स्थल जरूर है, लोगों की इसके प्रति अटूट आस्था भी है, भक्तों का यहां आना-जाना भी लगा रहता है, फिर भी इस क्षेत्र की हालत अत्यंत सोचनीय है। सरकार की ओर से पूर्णतया उपेक्षित इस जगह पर प्राथमिक सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं। चारों ओर गंदगी का आलम है। पशु-मवेशी खुले आम घूमते रहते हैं। सड़कों की हालत दयनीय है। नियमित बस सेवा भी उपलब्ध नहीं है। रहने खाने का भी कोई माकूल इंतजाम नहीं है। यदि इस ओर थोड़ा सा भी ध्यान पर्यटन विभाग दे तो यहां देशी-विदेशी पर्यटकों का आना शुरु हो सकता है।

मंगलवार, 13 अगस्त 2019

दुग्धाभिषेक का विरोध फैशन में शुमार हो गया है

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विगत कुछ सालों से शिवरात्रि के अवसर पर शिवलिंग के दुग्धाभिषेक का विरोध फैशन में शुमार हो गया है। उतना तो दूध भी नहीं चढ़ता होगा जितनी प्रवचनों की बरसात शुरू हो जाती है ! खासकर फेसबुक तो इस नूरा कुश्ती का अखाड़ा बन जाता है। जहां वाह-वाही और लाइक की चाहत में अपने-आप को प्रगतिशील, विद्वान और श्रेष्ठता की भावना से ग्रसित लोग अपने ''कुछ'' भी विचार रखने लगते हैं। ठीक है, आप अपनी सोच के मालिक हो, आपको पूरा हक़ है कि आपको जो सही लगता है उसका पालन करें। पर इसका मतलब यह नहीं कि आप दूसरों को कमतर समझें, उनको कोसें, उनकी आस्था का मजाक उड़ाएं या उन्हें नीचा दिखाने का प्रयास करें ! 

अभी एक माननीय ने इसी मौके पर कह डाला कि यदि आप दुग्धाभिषेक करते हैं तो यह पाखंड है, शिवभक्ति नहीं !! अब विरोध तो होना ही था ! जिससे विचलित हो गलती का परिमार्जन करने के लिए पोस्ट को विस्तार दे दिया गया कि यह क्रूरता है कि देश के कुपोषित, इंसान-गाय-भैंसों के बच्चों को नजरंदाज कर दूध को नालियों में बहा दिया जाए ! फिर उपाय भी सुझाया कि यदि असली शिवभक्त हैं तो गाय को पाल, उसके बछड़े को उसका हक़ दे बाकी बचे दूध का जो करना है करिए ! गोया कि यदि आप अपनी गाय के दूध से दुग्धाभिषेक करते हैं तो वह जायज है बनिस्पत डेयरियों से लिए गए दूध के !! एक बात और ये जो बार-बार गरीबों के बच्चे कह-कह कर उन निरीह लोगों को और निरीह बना उन पर तरस जताया जाता है उसे किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जाना चाहिए ! वे गरीब जरूर हैं पर किसी की एक दिन की सहायता के मोहताज नहीं हैं। एक दिन उनको ऐसा दूध दे कर आप उनका भला नहीं, उन पर एहसान जताते हो। 

आज यहां पहले कभी सार्वजनिक न किए गए कुछ प्रसंगों का उल्लेख करना जरुरी हो गया है। मुझे मंदिरों की भीड़-भाड़ तथा वहां के रवैये से ताल-मेल न बैठा पाने की वजह से घर पर ही यथा संभव परम पिता से बात कर लेना ज्यादा सकून देता है। पर कभी-कभी परिवार की ख़ुशी बनाए रखने के लिए उनकी बात रखनी ही पड़ती है। ऐसे ही किसी एक मौके पर रायपुर के एक शिव मंदिर के बाहर ठीक प्रवेश द्वार को घेर कर किसी ने गणेश जी की बड़ी सी रंगोली बना दी थी। लोग वहीं अपने चप्पलें, जूते उतार उस पर से होते हुए अंदर आ-जा रहे थे। आस्तिक मन दुविधाग्रस्त हो गया ! पर यह सब भी कुछ ठीक नहीं लग रहा था ! तो जो होगा देखा जाएगा सोच मंदिर के पिछवाड़े में स्थित कुँए से पानी ला, रंगोली धो, जगह साफ़ कर दी। बवाल तो मचना ही था ! लोग इकठ्ठा हो गए ! तरह-तरह के सवाल उछलने लगे ! सारी वस्तु-स्थिति समझानी पड़ी। वह तस्वीर मंदिर के पुजारी के किसी रिश्तेदार की बेटी ने बनाई थी, जिसकी कला को प्रशंसित करवाने के लिए उस गलत जगह का चुनाव कर लिया गया था जिससे ज्यादा से ज्यादा ''लाइक'' मिल सकें। बात समझने पर लोगों ने मुझे धन्यवाद तो दिया ही बिटिया के पिताजी की भी क्लास ले ली गयी।  
इसी तरह एक बार शिवरात्रि पर वही मंदिर ठसाठस भरा हुआ था। लोग (भक्त) शिवलिंग पर बेलपत्र, आक के फूल, भांग के पत्ते, धतूरे का कांटे युक्त फल और ना जाने क्या-क्या चढ़ा रहे थे ! धूप-अगर का धुंआ भरा पड़ा था ! मैंने श्रीमती जी को इंगित कर कह दिया कि बेचारे प्रभु को तो सांस लेना मुश्किल हो रहा होगा। बगल में ही पंडित जी खड़े थे उन्होंने मेरी तरफ देखा और फिर जाने क्या सोच सारा ताम-झाम शिव लिंग पर से हटा, जगह को भी साफ़ कर दिया ! मैं गर्भ-गृह से बाहर आ बैठ गया था पर सुखद संतोष हुआ कि कुछ-कुछ अंतराल पर शिवलिंग की सफाई शुरू हो चुकी थी। 
इसके ठीक दूसरे साल मेरे एक परिचित द्वारा शिव जी का दुग्धाभिषेक किया जाना था उसी मंदिर में। मंदिर कुछ पुराना था। अब तक वहां संपन्न जलाभिषेक या दुग्धाभिषेक का द्रव्य नाली से हो कर पीछे एक छोटी सी कच्ची जगह, जहां मंदिर की थोड़ी-बहुत साग-सब्जी उगाई जाती थी, चला जाता था। पूजा के एक दिन पहले मैंने पंडित जी से निवेदन कर, अभिषेक के बाद दूध का कुछ सदुपयोग हो सके इसके बारे में विचार करने को कहा ! उन्होंने बताया कि जिसने शिवलिंग पर दूध अर्पित कर पूजा की है उसको छोड़ कोई भी उस दूध को प्रसाद स्वरुप ग्रहण कर सकता है। दूसरे दिन छोटी-मोटी व्यवस्था के तहत साफ़-सफाई का पूरा इंतजाम कर, अभिषेक के पश्चात कपडे से छान कर उस दूध को एक बाल्टी में एकत्रित कर लिया गया जिसे पूजोपरांत प्रसाद स्वरूप सभी उपस्थित जनों में वितरित कर दिया गया।

इसीलिए यदि आप को किसी रूढ़िवादी चीज या निर्रथक परंपरा पर आपत्ति है तो उसे लोगों के सामने लाइए, समझाइये, उसके बारे में पूरी तरह जानकारी दीजिए, उसका सही उपयोग बताइये ! ये नहीं कि अपने आप को चतुर, बुद्धिमान या प्रगतिशील मानते हुए दूसरों को बेवकूफ, ढोंगी या अंधविश्वासी कह उनका निरादर कीजिए या उनका मजाक बनाइये ! हो सकता है कि आपका ही दृष्टिकोण गलत हो ! आज तक आप भी अपनी नकारात्मक सोच के कारण उसका महत्व नहीं समझ पाए हों !!

सोमवार, 12 अगस्त 2019

शिव मंदिर, जटोली का

हिमाचल के सोलन जिले के जटोली इलाके में स्थित है,भगवान शिव का एक अनूठा मंदिर ! यह मान्यता  चली आ रही है कि पौराणिक समय में भगवान शिव यहां आए थे और कुछ समय यहां रह कर उन्होंने विश्राम किया था। उस समय उन्होंने अपनी जटाएं भी खोल रखी थीं जो उन्मुक्त हो लहराती रहती थीं। इसीलिए उन जटाओं पर इस जगह का नाम जटोली के रूप में विख्यात हुआ .............! 
सावन के पावन समय पर विशेष !

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हिमालय को सदा देवभूमि माना जाता रहा है। ऐसा अटूट विश्वास है कि यहां कण-कण में भोले भंडारी का वास है। इसीलिए इस क्षेत्र में विश्व विख्यात शिव धाम तो हैं ही उनके साथ-साथ और भी, लोगों की आस्था के प्रतीक, हजारों शिव मंदिर विद्यमान हैं। इनमें से कुछ ऐसे भी हैं, जो अपने आप में विशेष होते हुए भी अभी देश के दूसरे हिस्सों में उतना प्रख्यात नहीं हो पाए हैं ! ऐसा ही एक मंदिर है, हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले में स्थित जटोली का दक्षिण-द्रविड़ शैली में निर्मित शिव मंदिर। इसके 111 फीट ऊँचे गुंबद पर अभी हाल ही में 11 फुट लंबा स्वर्ण कलश चढ़ाया गया है। इससे मंदिर की ऊंचाई करीब 122 फुट तक हो गयी है। इसी कारण इसे एशिया का सबसे ऊंचा मंदिर माना जाता है। शिल्प-कला के इस बेजोड़ भवन को बनाने में करीब 39 साल का समय लगा है। अभी भी कुछ ना कुछ निर्माण चल ही रहा है। जल्द ही यहां17 लाख रुपए की लागत के स्फटिक शिवलिंग की स्थापना और प्राण प्रतिष्ठा की जाने की योजना है।

सोलन-राजगढ़ मार्ग पर सोलन शहर से 7 किलोमीटर की दूरी पर एक स्थान पड़ता है, जटोली ! वहीं से मंदिर तक छोटे वाहनों के आवागमन के लिए सड़क बनी हुई है, जो तक़रीबन समुद्रतल से 1320 मीटर की ऊंचाई पर बने इस शिव मंदिर तक पहुंचाती है। वहां से सौ सीढ़ियां चढ़, मंदिर के मंडप से मुख्यद्वार तक जा, भीतर गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग के दर्शन किये जाते हैं। भीतर स्फटिक मणि शिवलिंग के साथ शिव और पार्वती जी की मूर्तियाँ भी स्थापित की गई है | मंदिर के शिखर पर चार किलो सोने का 11 फुट लम्बा कलश मंदिर के सौदर्य में चार चाँद लगाता  हुआ दिखता है। मंदिर के प्रवेश द्वार के ऊपर गणेश जी तथा शेष नाग की प्रतिमाएं बनी हुई हैं, जिन्हें पीले और हरे रंग के कलशों से सुशोभित किया गया है। मंदिर के प्राँगण में जगह-जगह अन्य देवी-देवताओं की कलात्मक प्रतिमाओं के साथ-साथ कई त्रिशूल भी लगे मिलते हैं। मंदिर के पीछे का भाग अन्य भागों से ऊँचा है। मंदिर के उतरी छोर पर प्राकृतिक जलस्त्रोत है जिसके जल को औषधीय तत्वों से पूर्ण अति निर्मल और पवित्र माना जाता है। इसके बारे में कहा जाता है कि बहुत पहले कहीं से घूमते-घामते एक साधू महाराज यहां आ कर गुफा में रहने लगे। स्थानीय लोग एक बार उनकी परीक्षा लेने के लिए  लिए गुफा के आसपास छिप गये लेकिन थोड़ी देर बाद उन्हें गुफा से एक अजगर कि हुंकार सुनाई दी जिसके कारण वे डर गये और अपनी रक्षा हेतु उनसे अपनी  भूल के लिए क्षमा याचना की।  उस साधू ने कई सालो तक यहाँ तप किया। उस समय जटोली में पानी की बहुत तंगी थी ! कहते हैं उसी साधू ने अपने चिमटे को धरती पर मारकर पानी की यही निर्मल धारा निकाली थी जो कभी सूखती नहीं है। 

 यह मान्यता चली आ रही है कि पौराणिक समय में भगवान शिव यहां आए थे और कुछ समय यहां रह कर उन्होंने विश्राम किया था। उस समय उन्होंने अपनी जटाएं भी खोल रखी थीं जो उन्मुक्त हो लहराती रहती थी। इसीलिए उन जटाओं पर इस जगह का नाम जटोली के रूप में विख्यात हुआ। इस मंदिर के निर्माण और परिकल्पना के पीछे स्वामी कृष्णानंद परमहंस जी का उद्यम है। उनके मार्गदर्शन और दिशा-निर्देश पर ही जटोली शिव मंदिर का निर्माण शुरू हुआ। जिन्होंने इसका शिलान्यास वर्ष 1974 में किया था, पर जिसका निर्माण कार्य वर्ष 1983 में जाकर आरम्भ हो पाया। जो 39 वर्षो कि लम्बी अवधि के पश्चात 24  जनवरी, 2013 को स्फटिक शिवलिंग स्थापित होने पर पूर्ण हुआ।  मन्दिर निर्माण पर करोडो रूपए व्यय हुए जिनका इंतजाम प्रभु भगतों और आस्थावानों के सहयोग से ही संभव हो सका। मंदिर में, 1983 में ब्रह्मलीन हुए स्वामी कृष्णानंद की गुफा भी स्थित है, जहां बैठ कर वे शिव आराधना किया करते थे।
महाशिव रात्रि के पावन पर्व पर यहां मंदिर कमिटी की ओर से भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है, जो सारी-सारी रात चलता है। इसके साथ ही विशाल भंडारा भी होता है। दूर-दूर से श्रद्धालुगण यहां आ पूजा-अर्चना कर अपनी मनोकामना की पूर्ती की प्रार्थना करते हैं। देश के किसी भी कोने से यहां दिल्ली या चंडीगढ़ होते हुए आराम से पहुंचा जा सकता है। 

गुरुवार, 8 अगस्त 2019

एक बोध कथा का एक्सटेंशन


क्या किया जाए कुछ समझ नहीं आ रहा था। रास्ते से गुजरने वाले वाहनों से गाडी को ''टो'' करने की गुजारिश की गयी पर एक तो बैल गाडी, ऊपर से पुरानी, कोई भी साथ ले चलने को राजी नहीं हुआ ! इनको नकारा देख, साथ के संगी-साथी भी एक-एक कर, जिसको जहां, जैसे, जो सुविधा मिली उसे ले, इनको छोड़ आगे बढ़ गए। अब काफिले में वो ही मजबूर लोग रह गए जिनका व्यापारी को छोड़ और कोई ठौर-ठिकाना या उपार्जन का अन्य साधन नहीं था। सूरते हाल यह था कि मालिक खड़े हो, आँखों पर हाथ रखे दूर-दूर तक नजर दौड़ा रहा था कि कोई घोड़ा-गदहा-टट्टू दिख जाए जिससे गाडी आगे रेंग सके..................!

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एक बार कारोबार में अत्यंत नुक्सान होने की वजह से अपना सब कुछ गंवा बैठे एक बड़े व्यापारी ने, मजबूरी में दूसरे ठाँव, अपने जान-पहचान के लोगों के पास जा कर भाग्य आजमाने निश्चय किया। प्रस्थान वाले दिन अपना बचा-खुचा सामान एक बैल गाडी पर लाद, अपने परिवार, सेवकों और अपने पर आश्रित कुछ लोगों के साथ उसने अपनी यात्रा शुरू की। इनके साथ इनके दो-तीन पालतु कुत्ते भी थे।

रुकते-चलते जब दोपहर सर पर चढ़ आई तो मालिक ने कुत्तों को धूप से बचाने के लिए उन्हें बैल गाडी के नीचे छाया में कर दिया। ा नीचे छाया में चलते हुए कुत्तों को यह लगा कि मालिक ने गाडी की सारी जिम्मेदारी उन्हें सौंप दी है और अब वे ही गाडी को चला रहे हैं। ऐसा ख्याल आते ही वे फूल कर कुप्पा हो गए ! अचानक मिले इस तथाकथित सम्मान से गर्वित हो उनका सारा शरीर तन गया और वे ऐंठ कर गाडी के नीचे चलने लगे।

शाम के बाद जब अंधियारा घिरने लगा तो काफिले को रोक दिया गया। सब अपनी थकान दूर करने और भोजन=पानी का इंतजाम करने में जुट गए। बैलों को भी गाडी से खोल कुछ दूर बांध, चारा-पानी दे दिया गया। इसी बीच अंगड़ाइयां लेते कुत्ते भी गाडी के नीचे से बाहर आ इधर-उधर घूमने लगे। अचानक उन्होंने कुछ दूरी पर बैलों को चारा-पानी खाते देखा तो इनका पारा चढ़ गया कि सारे रास्ते गाडी हम ढ़ोते आए और मजा ये कर रहे हैं। बस फिर क्या था ! दोनों-तीनों लपक कर बैलों के पास पहुंचे और लगे भौंक-भौंक कर अपना गुस्सा जताने ! पहले तो कुछ देर बैल शांत रहे पर आखिर उनको भी तैश आ गया और उन्होंने फुंफकार कर जोर से अपना सर इनकी तरफ घुमाया, कुत्ते तो खैर बच लिए पर बैलों के जोर के झटके से उनका पगहा टूट गया ! बंधन से आजाद होते ही दोनों बैल ये गए वो गए ! और हमारे वीर श्वान पुत्र अपनी जीत के घमंड में इतराते वापस आ गए।

सुबह हुई। जब नित्य-कर्मों से फारिग हो चलने का समय आया, तो बैल गायब ! सब परेशान ! चारों ओर तलाशा गया पर कहीं कोई सुराग नहीं ! खोज-खाज कर सब जने हार-थक कर बैठ गए ! क्या किया जाए कुछ समझ नहीं आ रहा था। रास्ते से गुजरने वाले वाहनों से गाडी को ''टो'' करने की गुजारिश की गयी पर एक तो बैल गाडी, ऊपर से पुरानी, कोई भी साथ ले चलने को राजी नहीं हुआ। कुत्तों को समझ नहीं आ रहा था कि परेशानी क्या है वे गाडी के नीचे खड़े थे उसे ले चलने के लिए ! मालिक ने जब उन्हें नीचे छिपते देखा तो उसे उनका रात का भौंकना भी याद आ गया ! वह समझ गया कि बैल इनके परेशान करने की वजह से ही भागे हैं ! उसने इनको पकड़ा और उसी चाबुक से, जिससे बैलों को हांका जाता था, वो छितरैल की, वह छितरैल की, कि तीनों की भौं-भौं, क्याऊं-क्याऊं में बदल गयी और तो और अब वे बैठने के लायक भी नहीं रहे !

इधर चलने की कोई सूरत नजर ना आने पर, इनको नकारा देख, साथ के संगी-साथी भी एक-एक कर, जिसको जहां, जैसे, जो सुविधा मिली उसे ले, इनको छोड़ आगे बढ़ गए। अब काफिले में वो ही मजबूर लोग रह गए जिनका व्यापारी को छोड़ और कोई ठौर-ठिकाना या उपार्जन का अन्य साधन नहीं था। सूरते हाल यह था कि मालिक खड़े हो, आँखों पर हाथ रखे दूर-दूर तक नजर दौड़ा रहा था कि कोई घोड़ा-गदहा-टट्टू दिख जाए जिससे गाडी आगे रेंग सके ! साथ के लोग इसलिए खड़े थे क्योंकि मालिक खड़ा था और कुत्ते इसलिए क्योंकि वे तो बैठने से ही मजबूर थे !

शुक्रवार, 2 अगस्त 2019

मिलना ''मैं गाय जैसे'' (मैग्सेसे) पुरस्कार का

''भैया; बताइये ना ! भले ही उतना समझ ना पाएं पर गर्व से अपना छाती तो फुल्लइये सकते हैं  ! ई तो हमरे देशो के लिए गर्व का बात जो है।'' 
चैतू मुंह बाए सब सुनता रहा ! कुछ देर बाद उसने पूछा , ''तो भैया ! जो आज सब नाच रहा है, ई लोग भी तो इसी देश का आदमी है ! तो ई लोग तब काहे नहीं खुस हुआ ?

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सुबह -सुबह चाय वगैरह से निपटा ही था कि ठाकुर जी की रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं की दूकान से घर-पहुँच सेवा के तहत उनका सहायक चैतू कुछ सामान पहुंचाने आ गया। सामान रखने के बाद जाते समय मेरे पास आ खड़ा हुआ। मैंने उसे देखा और पूछा ''क्यों चैतू कैसे हो ?''

''ठीक हूँ भईया ! आपसे एकठो बात पूछना था !''

''बोलो ! क्या बात है ?''
   
''भैया, ये ''मैं गाय जैसे'' पुरस्कार क्या होता है ?

मेरा एक बार तो चौंकना स्वाभाविक था, पर इतने दिनों से चैतू को जानने, उससे बतियाते रहने के कारण जल्दी ही समझ में आ गया उसका प्रश्न !

फिर भी पूछ लिया "कहां देखा यह सब ?"

"फेसबुक पर। बहुते लोग एकर बारे में बतिया रहा है।"

''अरे बुड़बक ! वो मैग्सेसे पुरस्कार है ! जो हमारे एक पत्रकार को मिला है। फिलीपींस देश का नाम सुने हो ? वहीं से इसका विजेता चुना जाता है।''

''अरे वाह भईया जी ! बहार का देश हमरे आदमी को समानित किया ! ई तो बहुते अच्छा बात है। ई का बहुत बड़ा इनाम होता है ?''

"हाँ, भाई ! एशिया के लोगों और वहां की संस्थाओं को बढ़िया और उल्लेखनीय काम करने पर उन्हें  इस इनाम के लिए चुना जाता है। दुनिया का सबसे प्रसिद्ध नोबेल पुरुस्कार सुने हो ? समझो, यह एशिया का नोबेल पुरस्कार की तरह है। इसका मिलना हम सबके लिए बड़े गर्व की बात है।''

''तभिएं !! हरदम दुखी और गरियाने वाला लोग भी आज बहुते खुस नज़र आ रहा है। बद्धियो दे रहा है सबको। अच्छा भैया; का पहले भी ऐसा पुरूस्कार हम लोगन को मिला है ?''

''अरे, बहुत बार। हमारे देश में गुणी, ज्ञानी, प्रतिभाशाली लोगों की कोई कमी नहीं है। हमें दुनिया भर के तरह-तरह के सम्मान मिलते रहे हैं। अभी तो हमारे एक ही माननीय को दसियों देश अपना सबसे बड़ा पुरूस्कार दे चुके हैं।'' 

''दसियों ? कऊन-कऊन सा ?"

''अरे, तुम अपना नाम तो बोल नहीं पाते ! वह सब कहां समझोगे !''

''नहीं भैया; बताइये ना ! भले ही बोल ना पाएं पर छाती तो फुल्लइये सकते हैं ! ई तो हमरे देशो के लिए गर्व का बात जो है।''

मजबूरन उसे बताना पड़ा कि बहुत कम समय में हमारे देश के एक ही आदमी को दुनिया के अलग-अलग देशों ने अपने-अपने सर्वोच्च पुरुस्कारों, जैसे, *जायेद मैडल पुरुस्कार, *फिलिप कोटलर पुरूस्कार, *सियोल शांति पुरूस्कार, *चैंपियंस ऑफ द अर्थ पुरुस्कार, *सेंट एंड्रूयज़ पुरूस्कार, *फिलिस्तीन ग्रैंड कॉलर पुरूस्कार, *आमिर अमानुल्लाह खान पुरूस्कार, *किंग अब्दुल सैश पुरूस्कार इत्यादि इत्यादि, से नवाजा है ! कई पुरूस्कार तो पहली बार किसी भारतीय को मिले हैं।  यह भी एक रेकॉर्ड ही है !'' 

चैतू मुंह बाए यह सब सुन रहा था ! कुछ देर बाद उसने पूछा ''तो भैया ! जो आज सब नाच रहा है, ई लोग भी तो इसी देश का आदमी है ! तो ई लोग तब काहे नहीं खुस हुआ ?''

अब मेरी बारी थी चैतू का मुंह तकने की !     

गुरुवार, 25 जुलाई 2019

आज भी चल रही है 'एक 'घोड़ा ट्रेन''

यह गाडी इतनी सुविधाजनक और लोकप्रिय हो गयी कि हर कोई इसकी सवारी करने लगा। इसलिए एक की बजाए दो गाड़ियां चलने लगीं। आमने-सामने आ जाने पर पड़ने वाली मुश्किल का आसान सा हल निकाल लिया गया। जब बीच रास्ते में दो गाड़ियां मिलतीं तो ''मुसाफिर'' ट्रालियों को बदल लेते ! गाड़ीवान भी अपने-अपने घोड़ों का रुख दूसरी तरफ कर विपरीत दिशा में अग्रसर हो जाते ...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग
वर्तमान समय में घोड़े द्वारा खींचे जाने वाले वाहन "इक्का, तांगा या बग्गी" बीते दिनों की बात हो चुके हैं। यदि गाहे-बगाहे कहीं दीखते भी हैं तो मनोरंजन, तफरीह या शादी-ब्याह में ! लेकिन यह जान कर आश्चर्य होगा कि हमारे पड़ोसी मुल्क यानी पाकिस्तान में अभी भी लाहौर से करीब सौ की.मी. दूर, घोड़े की सहायता से एक परिवहन सेवा चलाई जा रही है। इस ''सुविधा'' को हॉर्स ट्रेन या घोडा रेल के नाम से जाना जाता है। जो रेल की तर्ज पर पटरियों पर तकरीबन तीन की.मी. तक चल, लोगों को अपने गंतव्य तक पहुंचाती है। इस घोडा-रेल की शुरुआत करीब 100 साल पहले जाने-माने व्यवसायी सर गंगाराम ने की थी | आजकल इसका वीडियो सोशल मीडिया पर काफी देखा और पसंद किया जा रहा है। इसका प्रसारण पाकिस्तान टी.वी. पर अनेकों बार हो चुका है, जिसके फलस्वरूप बाहर से इसे देखने आने वालों का तांता गंगापुर में लगा ही रहता है।
https://youtu.be/9uMhbzNUdlU


राय बहादुर सर गंगाराम  एक प्रसिद्ध इंजिनियर उद्यमी, और साहित्यकार थे।  अपने कपडे के व्यवसाय से लाहौर शहर को हर क्षेत्र में व्यापक सहयोग देने, उसे संवारने, उसे समृद्ध बनाने के अपने उपक्रम के कारण उन्हें ''आधुनिक लाहौर के पिता'' का उपनाम दिया गया था।  दिल्ली में भी अस्पतालों की कमी को देखते हुए 1951 में उनकी याद में एक सर्व-सुविधा युक्त अस्पताल बनाया गया, जिसे गंगाराम हॉस्पिटल के नाम से जाना जाता है। 
  
वे एक बेहतरीन इंजिनियर तो थे ही ! जब उन्होंने अपने क्षेत्र में लोगों को आवागमन की असुविधाओं से जूझते देखा तो उनके दिमाग में एक अनोखी और अद्वितीय परिवहन योजना ने जन्म लिया। वह थी, आज भी चल रही अनोखी घोड़ा ट्रेन सुविधा ! जिला लीलपुर (अब फैसलाबाद) की तहसील जारनवाला में, अपने गांव गंगापुर से बुकियाना रेलवे स्टेशन (लाहौर-जारनवाला रेलवे लाइन पर) तक उन्होंने दो फिट चौड़े रास्ते पर लकड़ी के तख्ते बिछवा कर उस पटरियां लगवा दीं। फिर एक ठेले जैसी ट्रॉली में, पटरी पर चल सकने लायक चक्के फिट कर उसे ट्रैक पर रखवा दिया ! इंजिन की जगह घोड़े का इस्तेमाल किया गया और इस तरह शुरू हो गयी दुनिया की अजीबोगरीब, इकलौती घोडा रेल। पटरियों पर चलने के कारण घोड़े को कम जोर लगाना पड़ता था और सड़क के तांगे वगैरह की बनिस्पत इस ठेले पर एक बार में ज्यादा लोग सफर कर सकते थे। घोड़े को ठोकर इत्यादि से बचाने के लिए तख्तों पर मिटटी डाल उसे अच्छी तरह समतल कर दिया गया था। फिर एक सोसायटी बना इसकी सारी जिम्मेदारी उसे सौंप दी गयी, जो नाम मात्र का शुल्क ले इसकी सेवा लोगों को उपलब्ध करवाने लगी। स्थानीय लोगों में यह अनोखी सवारी के नाम से मशहूर हो गयी।  

यह गाडी इतनी सुविधाजनक और लोकप्रिय हो गयी कि हर कोई इसकी सवारी करने लगा। इसलिए एक की बजाए दो गाड़ियां चलने लगीं। आमने-सामने आ जाने पर पड़ने वाली मुश्किल का आसान सा हल निकाल लिया गया। जब बीच रास्ते में दो गाड़ियां मिलतीं तो ''मुसाफिर'' ट्रालियों को बदल लेते। चालक भी अपने-अपने घोड़ों का रुख दूसरी तरफ कर विपरीत दिशा में अग्रसर हो जाते। आजादी के बाद भी सालों इसका चलना बदस्तूर जारी रहा। पर 1980 के दशक में कुछ कारणों से इसे बंद करना पड़ गया था ! पर चूंकि यह अपनी तरह का एक अनोखा अजूबा था इसलिए 2010 में फैसलाबाद जिला प्राधिकरणों ने सांस्कृतिक विरासत का रूप दे कर इसे फिर से शुरू करवा दिया। भले ही इसके बारे में ज्यादा लोग ना जानते हों पर यह आधुनिक युग का एक अजूबा तो जरूर ही है ! 

मंगलवार, 23 जुलाई 2019

नदी का ख्वाब

हमारे यहां तो आस्था, प्रेम, विश्वास की पराकाष्ठा रही है ! प्रेम इतना कि हर जीव-जंतु से अपनत्व बना लिया ! आदर इतना कि पत्थर को भी पूजनीय बना दिया ! ममता इतनी कि नदियों को माँ मान लिया ! जल, वायु, ऋतुओं यहां तक कि राग-रागिनियों तक को एक इंसानी रूप दे दिया गया ! शायद इसलिए कि एक आम आदमी को भी सहूलियत रहे, समझने में, ध्यान लगाने और मन को एकाग्र करने में। उसी आकार वाली बात को लेकर एक कल्पना जगी कि जब इन सब को इंसान का रूप मिला है  तो शायद उसके गुण भी प्राप्त हुए होंगे ! इसी सोच का नतीजा है, नदी का ख्वाब ! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 
अभी रात का धुंधलका पूरी तरह छंटा नहीं था ! वैसे में ही सूखी नदी के प्रवाह क्षेत्र के किनारे खड़े बूढ़े बरगद ने देखा कि रोज एक परित्यक्ता, बीमार, मरियल सी घिसटती, रेंगती, ठिठकती धार जो कभी रास्ते के पत्थरों के अवरोध से रूकती-चलती मजबूरन सी आगे बढ़ती थी, आज जैसे बाधा रहित, उमंग भरी, प्रफुल्लित सी हो, किसी नागिन की तरह तेजी से सरसराती हुई दौड़ी जा रही है ! बरगद से रहा नहीं गया, उसने जोर से पूछा, ''क्यों बहिनी, आज तो बड़ी खुश नज़र आ रही हो !''

''हाँ, दद्दा ! सुबह भोर के तारे के जाने के पहले, मैंने स्वप्न देखा कि मैं पानी से लबालब भरी हुई हूँ ! इस छोर से उस छोर तक सिर्फ मैं ही मैं हूँ ! फिर से जीवन दायिनी नदी बन गयी हूँ ! सारे अवरोध ख़त्म हो चुके हैं और मैं दोनों तटों का हाथ थामे दौड़ी जा रही हूँ, दौड़ी जा रही हूँ ! उसके बाद से ही सब कुछ अच्छा और बदला-बदला सा लग रहा है !

बरगद मुस्कुरा उठा ! उसने अपनी फुनगी ऊपर उठा हवा को सूँघा और समझ गया सावन जो आ गया है !

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