बुधवार, 7 अगस्त 2024

एक हैं रामचेत, सुल्तानपुर वाले

अब बात साइड इफेक्ट की ! इस मुलाकात के बाद रामचेत जी सुर्खियों में आ गए ! आना ही था ! दूकान पर लोग पहुंचने लगे ! दूर-दूर से फोन आने लगे ! अपने गांव-खेड़े में उनकी इज्जत बढ़ गई ! मीडिया उनके इंटरव्यू के लिए समय लेने लगा ! वे खुश हैं, गदगद हैं ! उनके साथ-साथ उस पुरानी चप्पल के भी भाग खुल गए ! देश-परदेस में उसकी फोटो ''वायरल'' हो गई ! खबरें हैं कि उसकी कीमत भी लगने लगी है ! कौन लगा रहा है इसकी जानकारी गोपनीय है ! ज्ञातव्य है कि कुछ सालों पहले ऐसे ही किसी पेंटिंग की भी दो करोड़ की  बोली लगी थी ! किसी को फुरसत नहीं है कि पूछे कि साहब उत्तर प्रदेश की उस गरीब महिला कलावती का आजकल क्या हाल है, जिसका पहली बार आपने मनरेगा मजदूर बन, मिटटी का टोकरा उठा कर आपने फोटुएं खिंचवाईं थी...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

पिछले कई दिनों से राहुल गांधी के तरह-तरह के अवतार देश के सामने लाए जा रहे हैं ! कभी खेत में किसानों के साथ, कभी रेलवे कुलियों के साथ, कभी किसी मेकेनिक के साथ, कभी बढ़ई के साथ, कभी रेलवे के स्टाफ के साथ और कभी किसी जूते गांठने वाले की गुमटी पर ! विरोधियों द्वारा इसका काफी मजाक बनाया गया ! काफी ट्रोलिंग हुई ! उनके व्यक्तित्व पर भी सवाल उछाले गए ! पर शायद इन ड्रामों के सीधे-सरल आमजन पर पड़ने वाले प्रभाव पर किसी ने ध्यान नहीं दिया ! जो सुलतानपुर एपिसोड के बाद अचानक सामने आया है ! जिसमें रामचेत ने अपने पूरे गांव के साथ उनको वोट देने की बात की है ! इससे तो यही लगता है कि बहुत सावधानी से डूब कर पानी पिया जा रहा है ! यानी ऐड़ा बन कर नहीं, ऐड़ा बना कर पेड़ा खाया जा रहा है !     
हुनर 
पिछले दिनों 26 जुलाई को अपने एक केस के सिलसिले में यू.पी. के सुल्तानपुर के कोर्ट में पेशी के बाद लौटते समय राहुल गांधी का काफिला अचानक कूरेभार क्षेत्र के विधायक नगर के मुख्य मार्ग पर स्थित राम चेत मोची की छोटी सी गुमटीनुमा जूतों की दुकान पर रुकता है ! राहुल जी अपने दल-बल के साथ गाड़ी से उतर कर दुकान में विराजमान हो जाते हैं ! वहीं रामचेत जी से बातचीत होती है ! एक पुरानी चप्पल उठा, उसकी गठाई तथा एक जूते में सोल चिपकाया जाता है ! काफिला करीब आधा घंटा वहां गुजार, मदद का वादा कर आगे रवाना हो जाता है ! वादे के अनुसार रामचेत जी को एक मशीन भी भेजी जाती है, हालांकि बिजली ना होने की वजह से फिलहाल वह काम नहीं कर रही ! रामचेत जी भी रिटर्न गिफ्ट के रूप में अपने हाथ से बनाए दो जूते उन्हें भिजवाते हैं ! अच्छा रहा सब कुछ ! बहुत अच्छा ! 
रामचेत जी 
अब बात साइड इफेक्ट की ! इस मुलाकात के बाद रामचेत जी सुर्खियों में आ गए ! आना ही था ! दूकान पर लोग पहुंचने लगे ! फोन आने लगे ! अपने गांव-खेड़े में उनकी इज्जत बढ़ गई ! मीडिया उनके इंटरव्यू के लिए समय लेने लगा ! वे गदगद हैं ! इनके साथ-साथ उस चप्पल के भी भाग खुल गए ! देश-परदेस में उसकी फोटो ''वायरल'' हो गई ! खबरें हैं कि उसकी कीमत भी लगने लगी है ! कौन लगा रहा है, इसकी जानकारी गोपनीय है ! ज्ञातव्य है कि कुछ सालों पहले ऐसे ही किसी पेंटिंग की भी दो करोड़ की बोली लगाई गई थी ! पर अभी तो 40-45 साल से तंगहाली और गुरबत की अवस्था में रहने वाले, इस घटना से उस स्थिति में कोई खास बदलाव ना आने के बावजूद, रामचेत जी अभी इस लाइम-लाइट का मजा ले रहे हैं !
सिलाई मशीन 
इसमें सियासत क्या हुई ! एक लोकल चैनल के साक्षात्कार में जब रामचेत जी से राहुल जी के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बताया कि उन्हें पहली बार देखा है। पोस्टरों में चेहरा देखा होने की वजह से पहचान गए ! उनके अनुसार वे बहुत ही नेकदिल, दयालु और सज्जन इंसान हैं ! वे अपने वादे के भी पक्के हैं ! मैं छोटी जाति का हूँ (उन्होंने अपनी जाति भी बताई ) आजतक किसी छोट-मोटे नेता तक ने कभी मेरी दूकान की तरफ रुख नहीं किया पर आज देश का इतना बड़ा नेता आ कर मेरे पास बैठा ! मेरे से बात की ! मेरा हाल-चाल जाना ! यह उनकी महानता है ! उनका बड़प्पन है ! मैं धन्य हो गया ! 
लखटकिया चप्पल 
जब एक पत्रकार ने उनसे पूछा गया कि आप वोट किसको देंगे तो बिना एक क्षण लगाए, सीधे-सरल रामचेत जी ने राहुल गांधी का ही नाम तो लिया ही, विश्वास के साथ यह भी कहा कि मैं तो क्या सारा गांव उन्हीं को वोट देगा। देश का नेता ऐसा ही मिलनसार, भलामानुष, गरीबों का ध्यान रखने वाला होना चाहिए ! यही बात गौर करने वाली है कि राहुल का कहीं भी रुकना, किसी से भी मिलना, उसके काम में दिलचस्पी दिखाना, उससे बात करना, क्या यह सब स्वतःस्फूर्त है या सब कुछ किसी स्क्रिप्ट के तहत, एक दीर्घ कालीन योजना को ध्यान में रख कर किया जा रहा है ? खोजबीन तो यही बताती है कि यह सब एक सोची समझी रणनीति के तहत, सर्वे कर, पूरी स्क्रिप्ट बना, उचित कलाकार को चुन, पहले से पूरी बिसात बिछा कर घटना को अंजाम दिया जाता है ! 
असर क्या है ? समाज के उन गरीब मजदूर, मेकेनिक, कारपेंटर, कुली, मोची, जिनसे कोई ढंग से बात भी नहीं करता उनके मन पर इन सब बातों से बड़ा गहरा असर पड़ता है ! ऐसे अत्यंत पिछड़े, समाज के अंतिम छोर पर खड़े इंसान को जब ऐसी हमदर्दी, ऐसा सम्मान, ऐसी इज्जत मिलती है, जिसकी उसने सपने में भी कल्पना ना की हो, जब अचानक वह अपने आप का कद अपने लोगों में बढ़ा पाता है तो निहाल हो, गर्व सा महसूस करने लगता है और इस बात को चारों ओर ज्यादा से ज्यादा प्रचारित-प्रसारित  करने में वह कोई कोर-कसर नहीं छोड़ता ! वह सबको बताता है कि देखो इतना बड़ा आदमी, देश का नेता, कितना रहम दिल है, जो हमारी खोज-खबर ले रहा है ! हमारा इतना ख्याल रख रहा है ! जहां देश के बड़े-बड़े लोग नहीं जा सकते वहां हमें ले जा कर बैठाता है ! हमारा सुख-दुःख पूछता है ! यदि यह सत्ता में आ गया तो सारे गरीबों का कल्याण  हो जाएगा ! उसकी यह बात वह काम कर जाती है जो किसी नेता की दस-बीस हजार की सभा में दिया गया भाषण भी नहीं कर पाता ! 
फोटो सेशन 
उसको इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि सामने वाला किस लिए ऐसा कर रहा है ! उसका आचरण क्या है ! वो जो कर रहा है वह नाटक है या सच्चाई ! उसे सिर्फ इतना पता होता है कि उस इंसान के कारण उसकी जिंदगी में एक सुखद बदलाव आया है और मैं उसी का साथ दूँगा ! अपने परिवार की चिंता से ग्रस्त जिंदगी के थपेड़ों से जूझते ऐसे लोगों को फुर्सत ही कहां मिलती है कि वे आस-पास घटित हो रहे वाकयों पर ध्यान दे सकें ? नहीं तो इनमें से कोई तो पूछता कि साहब उत्तर प्रदेश की उस गरीब महिला कलावती का क्या हाल है, जिसका पहली बार मनरेगा मजदूर बन, मिटटी का टोकरा उठा कर आपने फोटुएं खिंचवाईं थीं ? 

गरीबों के मनोविज्ञान को, लोगों की इसी कमजोर रग को, राहुल जी की सलाहकार समिति ने समझ, अपना चक्रव्यूह उसी के अनुसार रच डाला है ! बाकी का काम तो उनके साथ चलते निर्देशकों, स्क्रिप्ट लेखकों और कैमरों ने पूरा कर ही दिया है ! एक बात और कि इस तरह के सारे नाटकों का श्रेय उनके निदेशक को जाता है, कलाकार रूपी राहुल जी तो पूरी तरह, सपूर्णतया निर्देशक के नायक हैं, जो उसने कहा अक्षरशः वैसा ही निभा दिया !   

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

शुक्रवार, 2 अगस्त 2024

ना वैसे सिंहासन रहे नाहीं वैसे आरूढ़ होने वाले

शायद यह उस प्राचीन सिंहासन की पुतलियों का ही श्राप हो, जिससे गलत तरीके से उसे हासिल कर उस पर बैठते ही बैठने वाले पर कोई आसुरी शक्ति हावी हो जाती है ! जिससे वह सच को छोड़ झूठ का पक्ष लेने लगता है ! सच्चाई सामने होते हुए भी वह अपनी आँखें बंद कर झूठ को सही ठहराने लगता है ! अपने हित, अपने पद, अपने भविष्य, अपने परिवार, अपनी सुरक्षा को मद्देनजर रख कर वह अपना फैसला गढ़ने लगता लगता है ! भले ही इसके लिए उसकी चारों ओर से लानत-मलानत हो रही हो..............! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

किसी समय राजाओं के सिंहासन, न्यायाधीश की कुर्सी या पंचायतों के आसन की बहुत गरिमा होती थी। उस पर बैठने वाले का व्यवहार पानी में तेल की बूंद के समान रहा करता था। उसके लिए न्याय सर्वोपरी होता था। उस स्थान को पाने के लिए उसके योग्य बनना पड़ता था। समय बदला, उसके साथ ही हर चीज में बदलाव आया। पुराने किस्से-कहानियों में वर्णित घटनाएं कपोलकल्पित सी लगने लगीं। प्राचीन ग्रंथों को छोड़ दें तो 70-80 साल पहले की कथाओं को भी पढने से लोग आश्चर्यचकित होते हैं कि कहीं ऐसा भी हो सकता था ?
सिंहासन 
हमारे साहित्य ग्रंथों में राजा विक्रमादित्य का जितना बखान उनकी वीरता, न्याय प्रियता, उनके ज्ञान, चारित्रिक विशेषता, गुण ग्राहकता के लिए हुआ है, वह शायद ही किसी और सम्राट या नायक के लिए हुआ हो। कहते हैं कि उनके पराक्रम, शौर्य, न्यायप्रियता, कला-मर्मज्ञता तथा दानशीलता से प्रसन्न होकर देवराज इंद्र ने उन्हें एक दिव्य रत्नजड़ित स्वर्णिम सिंहासन उपहार में दिया था ! इसमें 32 पुत्तलिकाएं यानी पुतलियां लगी हुई थीं ! उसी पर बैठ कर वे न्याय किया करते थे। उस आसन के उपर तक पहुंचने के लिए बत्तीस सीढियां चढ़नी पड़ती थीं। हर सीढ़ी की रखवाली एक-एक पुतली करती थी, जिससे कोई अयोग्य उस पर आसनारूढ ना हो जाए !  
न्याय का हथौड़ा 
विक्रम ने राज-पाट छोड़ते वक्त उस सिंहासन को भूमि में गड़वा दिया था कि कहीं इसका दुरूपयोग ना हो ! कालांतर में जब राजा भोज ने शासन संभाला और उन्हें इस बात का पता चला तो उन्होंने उसे जमीन से निकलवा, उस पर बैठ कर राज करने का निश्चय किया। शुभ मुहुर्त में जब उन्होंने उस पर पहला कदम रखा, तब उस पायदान की रक्षक पुतली ने उन्हें राजा विक्रम से जुड़ी एक कथा सुनाई और पूछा कि राजन, क्या आप अपने को इस सिंहासन के योग्य पाते हैं ? राजा भोज ने विचार कर कहा, नहीं ! फिर उन्होंने उस लायक बनने के लिए साधना की, अपने को उस योग्य बनाया। इस तरह उन्होंने बत्तीस पुतलियों को संतुष्ट कर अपने आप को उस सिंहासन के लायक बना, उस को ग्रहण किया, यह नहीं कि अपने रसूख का दुरूपयोग कर जबरन उसे हासिल कर लिया हो ! 
सर्वोच्च 
यह तो पुरानी बात हो गई। पर हमारे समय के दिग्गज कथाकारों की कहानियों के पंचपरमेश्वर या और भी धर्माधिकारियों के किस्से मशहूर हैं, जो अपनी बुद्धिमत्ता, कुशाग्रता तथा लियाकत से यह सम्मान पाते थे ! इन गरिमामय आसनों पर बैठने के पश्चात, किसी भी प्रकार का भेदभाव, दवाब या पक्षपात ना कर न्याय और सिर्फ न्याय किया करते थे, चाहे उनके सामने कोई भी वादी-प्रतिवादी खड़ा हो ! इसीलिए लोगों को उन पर अटूट विश्वास होता था और वे आदर के पात्र बने रहते थे ! 
न्यायस्थल 
पर अब समय बहुत कुछ बदल चुका है ! दुनिया के हर क्षेत्र की तरह न्याय का यह पावन स्थल भी बुराइयों से अछूता नहीं रह गया है ! कुछ लोगों द्वारा इसे हासिल करने के लिए साम-दाम-दंड़-भेद हर तरह की नीति अपनाई जाने लगी है। योग्यता या काबिलियत ठगी सी रह जाती हैं, इस प्रकार के उपक्रमों को देख कर ! इसी कारण लोगों का विश्वास भी ऐसी प्रणाली से तिरोहित होने लगा है ! लोग हर फैसले को शक की निगाह से देखने लगे हैं !
कोर्ट रूम 
शायद यह उस प्राचीन सिंहासन की पुतलियों का ही श्राप हो, जिससे गलत तरीके से उसे हासिल कर उस पर बैठते ही बैठने वाले पर कोई आसुरी शक्ति हावी हो जाती है ! जिससे वह सच को छोड़ झूठ का पक्ष लेने लगता है ! सच्चाई सामने होते हुए भी वह अपनी आँखें बंद कर झूठ को सही ठहराने लगता है ! अपने हित, अपने पद, अपने भविष्य, अपने परिवार, अपनी सुरक्षा को मद्देनजर रख कर वह अपना फैसला गढ़ने लगता लगता है ! अपनी गलत बातों का विरोध करने वाला उसे अपना कट्टर दुश्मन लगने लगता है। उस आसन पर बैठ सत्ता हासिल होते ही वह अपने आप को खुदा समझने लगता है !
विश्वास 
पर संतोष की बात है कि ऐसे लोग मुठ्ठी भर के ही हैं ! ऐसा भी नहीं है कि यह क्षेत्र पूरी तरह से निराशा का पर्याय बन गया हो ! अभी भी अधिकांश कर्मठ लोग बिना किसी भय, लोभ, दवाब के अपने काम को सही ढंग से अंजाम देते आ रहे हैं ! जबकि उनको सदा जान-माल का खतरा बना रहता है ! पर उनका विवेक, उनका अंतर्मन, उनका आत्म विश्वास, उनकी निष्ठा उन्हें पथभ्रष्ट नहीं होने देती, भले ही उनके सामने कितना भी दुर्दांत अपराधी क्यों ना खड़ा हो ! इसीलिए सेवानिवृति के पश्चात भी उनकी गरिमा, उनका सम्मान, उनकी प्रतिष्ठा बनी रहती है ! पर वही बात है कि ओछे लोगों की हरकत आजकल ज्यादा प्रचार पाती है और कर्तव्यनिष्ट लोग गुमनामी की धुंध में अलक्षित से रह जाते हैं ! 

शनिवार, 20 जुलाई 2024

सुखदाई सावन के साथी, कुछ दुखदाई पाहुन

बरखा रानी ने धरती पर अपने कदम रख दिए हैं। मौसम सुहाना होने लगा है। इसकी धुन पर सब अपने में मस्त हैं। पर शरीर साफ सुन पा रहा है, बरसात के साथ आने वाली बिमारियों की भी पदचाप। इसी आवाज को हम सब को भी सुन स्वस्थ रहते हुए स्वस्थ रहने की प्रकृया शुरु कर देनी चाहिए। क्योंकि बिमार होने के बाद स्वस्थ होने से अच्छा है कि बिमारी से बचने का पहले ही इंतजाम कर स्वस्थ रह कर इस ऋतु का आनंद लिया जाए.........!!


#हिन्दी_ब्लागिंग 

इस बार गर्मी ने कुछ ज्यादा ही लंबी मेहमाननवाजी  करवा ली। जाने के समय भी बिस्तर बांधने में अच्छा खासा समय ले लिया। वो तो भला हो इंद्र देवता का जिनकी इजाजत से बरखा रानी ने धरती पर अपने कदम रखे। मौसम सुहाना होने लगा। पेड़-पौधों ने धुल कर राहत की सांस ली। किसानों की जान में जान आई। कवियों को नई कविताएं सूझने लगीं। हम जैसों को भी चाय के साथ पकौड़ियों की तलब लगने लगी। सब अपने में मस्त थे पर शरीर साफ सुन पा रहा था बरसात के साथ आने वाली बिमारियों की पदचाप। इसी आवाज को हम सब को भी सुन, संभल जाना चाहिए। स्वस्थ रहते हुए ही स्वस्थ रहने की प्रकृया शुरु कर देनी चाहिए। क्योंकि बिमार होने के बाद स्वस्थ होने से अच्छा है कि बिमारी से बचने का पहले ही इंतजाम कर लिया जाए ! 
नभ से अमृत की फुहार 
इस मौसम में जठराग्नि मंद पड़ जाती है। सर्दी, खांसी, फ्लू, डायरिया, डिसेंट्री, जोड़ों का दर्द और न जाने क्या-क्या, अपने-अपने ढोल-मंजीरे ले शरीर के द्वार पर दस्तक देने लगते हैं। वैसे तो अधिकांश लोग अपना ख्याल रखना जानते हैं, फिर भी हिदायतें सामने दिखती रहें तो और भी आसानी हो जाती है, क्योंकि उनके प्रयोग से लाभ ही होता है नुक्सान कुछ भी नहीं है ! मेरे एक मित्र मधुसूदन जी वैद्य हैं। वर्षों से बिना किसी अपेक्षा के लोगों का हितचिंतन करते आ रहे हैं। उन्हीं के परामर्श को साझा कर रहा हूँ  :-
सावधानी की अपेक्षा 
* इस मौसम में जठराग्नि मंद पड़ जाती है। इसलिए रोज एक चम्मच अदरक और शहद की बराबर मात्रा सुबह लेने से फायदा रहता है।

* खांसी-जुकाम में एक चम्मच हल्दी और शहद गर्म पानी के साथ लेने से राहत मिलती है।

* इस मौसम में दूध, दही, फलों के रस, हरी पत्तियों वाली सब्जियों का प्रयोग कम कर दें।

* इस मौसम में ज्यादातर बीमारियां दूषित जल से ही होती हैं ! तो ऐसे में पानी का उपयोग करते समय अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए ! पीने के लिए गुनगुना पानी सर्वोत्तम होता है !

* आज कल तो हर घर में पानी के फिल्टर का प्रयोग होता है। पर वह ज्यादातर पीने के पानी को साफ करने के काम में ही लिया जाता है। दूसरे कामों के लिए भंड़ारित किए हुए पानी को वैसे ही प्रयोग में ले आया जाता है। ऐसे पानी में एक फिटकरी के टुकड़े को कुछ देर घुमा कर छोड़ दें। कुछ ही देर में पानी की गंदगी नीचे बैठ जाएगी और वह उपयोग के लिए सुरक्षित हो जाएगा। 

* नीम की पत्तियों को उबाल कर उस पानी को अपने नहाने के पानी में मिला कर स्नान करें। इसमें झंझट लगता हो तो पानी में डेटाल जैसा कोई एंटीसेप्टिक मिला कर नहाएं। बरसात में भीगने से बचें, मजबूरी में शरीर गीला हो ही जाए तो जितनी जल्दी हो उसे सुखाने की जुगत करें।
 
* तुलसी का पौधा अमूमन हर घर में होता ही है। इस की पत्तियां जलजनित रोगों से लड़ने में बहुत सहायक होती हैं। इसकी 8-10 पत्तियां रोज चबा लेने से बहुत सी बिमारियों से बचा जा सकता है। घर में पीने के पानी में इसकी आठ-दस पत्तियां डाल दें, ये बखूबी आपकी हिफाजत करेंगी.  

* खाने के बाद यदि पेट में भारीपन का एहसास हो तो एक चम्मच जीरा या अजवायन पानी के साथ निगल लें। आधे घंटे के अंदर ही राहत मिल जाएगी। शरीर को सजग बनाए रखने के लिए घर पर ही हल्का-फुल्का व्यायाम जरूर करते रहें !           

* इस मौसम में अचार, तले हुए व्यंजन, मसालेदार खाद्य पदार्थों का कम से कम उपयोग के साथ-साथ बाहर के खान-पान से भी जहां तक हो सके दूरी बनाए रखनी चाहिए ! साथ ही ज्यादा देर के कटे फल, सलाद और बासी भोजन का उपयोग ना ही करें तो बेहतर है।
उल्लास 
सीधी सी बात है ! पावस के इस सुहाने मौसम के अलावा भी ऋतु कोई भी क्यों ना हो, मौसम कैसा भी क्यों न हो,  यदि हमें उसका आनंद लेना है तो हम स्वस्थ रह कर ही ऐसा कर सकते हैं और खुद को स्वस्थ कौन नहीं रखना चाहता ! वैसे यह कोई बहुत मुश्किल काम भी नहीं है ! बस, जरा सी सावधानी और जरा सा परहेज ही तो अपनाना है !

@फोटो अंतर्जाल के सौजन्य से 

शुक्रवार, 5 जुलाई 2024

"माले मुफ्त का" ऐंटी रिएक्शन

नासूर बनते इस घाव का उपचार बहुत सोच-समझ कर, बड़ी सूझ-बूझ और सतर्कता से तुरंत करना बेहद जरुरी है नहीं तो जाति, धर्म, आरक्षण के कारण बंटते देश-समाज की सिरदर्दी बढ़ाने के लिए एक और जमात सदा के लिए आ खड़ी होगी ! जिसके मुंह में मुफ्तखोरी का खून लग चुका होगा ! आज देश की हालत और समय का तकाजा है कि मुफ्त में मछली देने के बजाय मछली पकड़ना सिखाया जाए, ताकि अपने पैरों पर खड़ा हुआ जा सके ! आबादी के परमाणु बम पर बैठे देश को मुफ्तखोरों, निठठ्लों, परजीवियों की नहीं कर्म-वीरों की जरुरत है..................!     
#हिन्दी_ब्लागिंग 
दृश्य एक :- आठ एकड़ की खेती लायक जमीन के मालिक श्री अमर सिंह जी अपनी सेहत ठीक न होने के कारण, खेत में काम करने के लिए किसी सहायक के न मिलने से परेशान थे।  एक दिन उन्हें अपना पुराना कामदार दिखाई पड़ा तो उन्होंने उसे फिर काम पर रखना चाहा तो उसने साफ मना कर कहा कि वह अब बेगार नहीं करता। एक ही गांव के होने के कारण साहू जी जानते थे कि वह दिन भर निठ्ठला घूमता है, नशे का भी आदी है. पर कर क्या सकते थे. एक दो साल के बाद तंग आकर मजबूरी में उन्होंने दुखी मन से अपनी आधी जमीन एक बिल्डर को बेच डाली। अब वहां गेहूं की जगह कंक्रीट की फसल उगेगी !                 

दृश्य दो :- शहर के करीब रहने वाले श्री गोविंद पटेल जी को अपने घर में बरसात का पानी इकट्ठा होने के कारण उसकी निकासी के लिए एक पांच-सात फुट की छोटी नाली निकलवानी थी। पर इस छोटे से काम  को करने के लिए कोई तैयार नहीं हो रहा था। किसी तरह एक पलम्बर राजी हुआ, उतने से काम के लिए उसने हजार रुपयों की मांग की, ले-दे कर नौ सौ रुपये पर राजी हुआ, जबकि सारा काम बेढंगे तरीके से उसके सहयोगी एक किशोर ने किया। सिमित आय वाले पटेल जी कसमसा कर रह गए !  

तीसरा दृश्य :- शर्मा जी के फ्लैट के बाहर के पाइप में दीवाल में उगे एक पौधे ने किसी तरह पाइप के अंदर जगह बना उसे पूरी तरह  "चोक"  कर दिया। नतीजतन ऊपर के फ्लैट के साथ-साथ अपना पानी भी घर के अंदर बहने लगा ! दस फुट की ऊंचाई पर के पाइप के जोड़ को खोल कर साफ करने के लिएन कोई पलम्बर मिल रहा था ना हीं कोई सफाई कर्मचारी ! बड़ी मुश्किल से पांच सौ रुपये दे कर तथा साथ लग कर यह 15 - 20 मिनट का काम करवाया जा सका ! मजबूरी जो थी !  

चौथा दृश्य :- मिश्रा जी को दूध-दही का शौक है।  सो घर पर सदा एक-दो दुधारू पशु बंधे रहते थे। अब मजबूरन सबको हटा, बाजार का मिश्रित दूध लेना पड़ रहा है ! कारण पशुओं के रख-रखाव, दाना-पानी, साफ-सफाई के लिए किसी सहायक का उपलब्ध न हो पाना था ! मजबूरन ऐसे लोगों को या तो ब्रांडेड कंपनियों के उत्पाद खरीदने होंगे या फिर डेयरी वालों के रहमो-करम पर अपना स्वास्थ्य गिरवी रखना होगा !  

पांचवां दृश्य :-  एक गांव में एक कौतुक दिखाने वाला आया ! खेल दिखाने के बाद जब उसे कुछ लोग धान देने लगे तो वह ऐसे बिदका जैसे सांड को लहराता लाल कपड़ा दिखा दिया हो ! कुछ नाराज सा हो बोला, मुझे सिर्फ पैसे चाहिए !  धान कितना चाहिए मुझसे ले लो ! धान की उसको क्या कमी, सरकार भर-भर तसले हर महीने घर जो पहुंचा रही है !

इन सारे दृश्यों में एक वजह कॉमन है ! वह है, काम करने वालों की कमी और दूसरों की मजबूरी का फायदा उठाने की प्रवृत्ति और यह बिमारी हमारे नेता-गण ही लाए हैं ! जिन्होंने अपना वोट बैंक पुख्ता करने की लालसा में तरह-तरह के स्वाद की रेवड़ियां जगह-जगह बांटी हैं ! ये सरकारों द्वारा लाई जा रही खुशहाली की तस्वीर नहीं है, यह है मुफ्तखोरी के कारण उपजी जहालत और काम न करने की प्रवृत्ति की ! कुछ लोगों को ये बातें गरीब विरोधी लगेंगी, पर कड़वी सच्चाई है कि मुफ्तखोरी ने आज समाज में निष्क्रिय लोगों का एक अलग तबका बना दिया है ! ! इससे भी भयावह सच्चाई यह है कि अब चाह कर भी ऐसी स्कीमों को तुरंत बंद नहीं किया जा सकता ! क्योंकि जैसे ही ऐसा कोई कदम उठेगा, देश को अस्थिर करने की ताक में बैठी देसी-विदेशी ताकतें, उसका जबरदस्त विरोध करवा अराजकता फैलाने की कोशिश शुरू करवा देंगी !    

हालांकि कुछ ऐसी योजनाओं और उन्हें लागू करने वालों की मंशा समाज के निचले वर्ग की बेहतरी चाहने की ही रही होगी, जैसे कोरोना के दौरान मुफ्त का राशन ! पर महामारी के बाद उसे बंद कर देना चाहिए था ! क्योंकि उसका बोझ भी तो समाज का एक वर्ग ही उठा रहा है ! उस पर सचमुच के गरीब और बने या बनाए हुए ग़रीबों में जमीन-आसमान का फर्क होता है और ऐसी योजनाओं का सर्वाधिक लाभ उन्हीं बने हुए ग़रीबों द्वारा उठाया जाता है, जिन्हें बिना हाथ-पैर हिलाए हराम की खाने की आदत पड़ चुकी होती है ! समाज के ऐसे ही परजीवियों और उनके आकाओं के कारण अच्छी योजनाएं भी अपने लक्ष्य तक न पहुंच आलोचनाओं का शिकार हो अप्रियता को प्राप्त हो जाती हैं।  

नासूर बनते इस घाव का उपचार बहुत सोच-समझ कर, बड़ी सूझ-बूझ और सतर्कता से तुरंत करना बेहद जरुरी है नहीं तो जाति, धर्म, आरक्षण के कारण बंटते देश-समाज की सिरदर्दी बढ़ाने के लिए एक और जमात सदा के लिए आ खड़ी होगी ! जिसके मुंह में मुफ्तखोरी का खून लग चुका होगा ! आज देश की हालत और समय का तकाजा है कि मुफ्त में मछली देने के बजाय मछली पकड़ना सिखाया जाए, ताकि अपने पैरों पर खड़ा हुआ जा सके ! आबादी के परमाणु बम पर बैठे देश को मुफ्तखोरों, परजीवियों की नहीं कर्म-वीरों की जरुरत है !

सोमवार, 1 जुलाई 2024

अपलाप छिछलेपन को दर्शाता है

इतिहास बार-बार समझाता, चेताता आया है कि दुर्वचन आम इंसान को कभी भी रास नहीं आते, चाहे वे किसी के भी मुखारविंद से निकले हों ! कोफ्त होती है उसे ऐसे वचनों से ! एक अलगाव सा महसूसने लगता है वह उस व्यक्ति या संस्था विशेष से ! चाहे कितना भी बड़ा व्यक्तित्व हो, उसकी छवि धूमिल ही होती है ऐसे अपलाप से ! अग्निमुख यह बात क्यों नहीं समझ पाते, आश्चर्य ही है.............!  

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कहावत है कि यथा राजा तथा प्रजा।  पर समय बदल गया है और इसके साथ-साथ हर चीज में बदलाव आ गया है। कहावतें भी उलट गई हैं। अब यथा प्रजा तथा राजा हो गया है। जिस तरह से दिनों-दिन प्रजा में असहिष्णुता, असंयमितता, अमर्यादितता तथा विवेक-हीनता बढ़ रही है, उसी तरह के वैसे ही गुण लिए जनता से उठ कर सत्ता पर काबिज होने वाले नेता यानी आधुनिक राजा हो गए हैं।  

अपलाप 
वर्षों से गुणीजन सीख देते आए हैं कि जबान पर काबू रखना चाहिए। पर अब समय बदल  गया है। जबान की मिठास धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। खासकर राजनीति के पंक में लिथड़े अवसरवादी और महत्वाकांक्षी लोगों ने तुरंत खबरों में छाने और खुद को अपने दल की अग्रिम पंक्ति में स्थापित करने के लिए यह रास्ता अख्तियार कर लिया है ! इसका फायदा यह है कि एक ही झटके में उस गुमनाम-अनजान अग्नि-मुख का नाम हरेक की जुबान पर आ जाता है ! रातों-रात वह खबरों में छा अपनी पहचान बना लेता है। कुछ हाय-तौबा मचती है, पर वह टिकाऊ नहीं होती। अगला हंसते-हंसते माफी-वाफी मांग उस दल की जरुरत बन जाता है। 
कोई कम नहीं 
यह सोचने की बात है कि इस तरह की अनर्गल टिप्पणियों की निंदा या भर्त्सना होने के बावजूद लोग क्यों जोखिम मोल लेते हैं। समझ में तो यही आता है कि यह सब सोची समझी राजनीति के तहत ही खेला गया खेल होता है। इस खेल में ना कोई किसी का स्थाई दोस्त होता है ना हीं दुश्मन। सिर्फ और सिर्फ अपने भले के लिए यह खेल खेला जाता है। इसके साथ ही यह भी सच है कि ऐसे लोगों में गहराई नहीं होती, अपने काम की पूरी समझ नहीं होती इन्हीं कमजोरियों को छुपाने के लिए ये अमर्यादित व्यवहार करते हैं। इसका साक्ष्य तो सारा देश और जनता समय-समय पर देखती ही रही है !
बकवास की आजादी 
कभी-कभी नक्कारखाने से तूती की आवाज उठती भी है कि क्या सियासतदारों की कोई मर्यादा नहीं होनी चाहिए ? क्या देश की बागडोर संभालने वालों की लियाकत का कोई मापदंड नहीं होना चाहिए ? जबकि किसी पद पर नियुक्ति के पहले, वर्षों का अनुभव होने के बावजूद, संस्थाएं नए कर्मचारी को कुछ दिनों का प्रशिक्षण देती हैं, नई नियुक्ति के पहले नौकरी पाने वाले को प्रशिक्षण-काल पूरा करना होता है। शिक्षक चाहे जब से पढ़ा रहा हो उसे भी एक खास कोर्स करने के बाद ही पूर्ण माना जाता है। अपवाद को छोड़ दें तो किसी भी संस्था में ज्यादातर लोग निचले स्तर से शुरू कर ही उसके उच्चतम पद पर पहुंचते हैं। तो फिर राजनीति में ही क्यों अधकचरे, अप्रशिक्षित, अनुभवहीन लोगों को थाली में परोस कर मौके दे दिए जाते हैं और इसमें कोई भी दल या पार्टी ना तो पीछे है, ना हीं किसी को परहेज है ! कम से कम उन्हें संयम की, मर्यादा की, नैतिकता की, मृदु भाषिता की सीख तो दी ही जा सकती है ! पर ऐसा करे कौन ? आज तो यह रोग देश के हर छोटे-बड़े नेता को लग चुका है ! 

यह
जग जाहिर है कि किसी के कटु वचनों पर उनके द्वारा पालित लोग तो ताली बजा सकते हैं, पर आम जनता को ऐसे शब्द और उनको उवाचने वाला नागवार ही गुजरते हैं ! बड़े और अनुभवी नेताओं को ऐसे लोगों की औकात पता भी होती है, पर चाह कर भी वे ऐसे लोगों को रोक नहीं पाते, क्योंकि अपने किसी न किसी स्वार्थ के तहत इन लोगों को झेलना उनकी मजबूरी बन जाती है और यही बात ऐसे लोगों की जमात बढ़ते जाने का कारण बनती जा रही है, ऐसे लोगों का ना कोई विवेक होता है ना हीं कोई विचारधारा, इन्हें सिर्फ अपने हित को साधना होता है जो जहां सधता दीखता है ये उसी के हो जाते हैं !   

इतिहास बार-बार समझाता, चेताता आया है कि दुर्वचन आम इंसान को कभी भी रास नहीं आते, चाहे वे किसी के भी मुखारविंद से निकले हों ! कोफ्त होती है उसे ऐसे वचनों से ! एक अलगाव सा महसूसने लगता है वह उस व्यक्ति या संस्था विशेष से ! चाहे कितना भी बड़ा व्यक्तित्व हो, उसकी छवि धूमिल ही होती है ऐसे अपलाप से ! अग्निमुख यह बात क्यों नहीं समझ पाते, आश्चर्य ही है ! 

सोमवार, 24 जून 2024

घोटाला ऑगस्टा वेस्टलैंड का, यह चॉपर किस-किस को चॉप करेगा

बात खुली तो मिशेल छिपते-छिपाते दुबई पहुंच गया पर उसका दुर्भाग्य कि वहां वह पकड़ा गया और जेल भेज दिया गया ! भारत सरकार ने काफी कोशिशें कीं पर यूएई ने उसे  भारत को नहीं सौंपा ! पर विधि का विधान ! यूएई के अमीर की बेटी भारत में पकड़ी जाती है उसे उसके अभिभावकों को सौंपा जाता है और उसके कुछ दिनों के बाद ही मिशेल प्रत्यर्पित हो भारत की जेल में पहुंच जाता है............!! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

1) फरवरी 2018 की एक अंधेरी रात ! घुप्प अंधेरा ! ठीक वैसा ही जिसमें कहते हैं कि हाथ को हाथ भी सुझाई नहीं देता ! ऐसे में अरब सागर में एक छोटा सा यॉट तेजी से गोवा की तरफ बढ़ रहा था ! नौका में भी पूर्णतया अंधकार था, सिर्फ मशीन रूम में बाहर से नजर ना आने वाली, यंत्रों की हलकी सी रौशनी चमक रही थी ! इसी के एक केबिन में दो युवतियां किसी आसन्न संकट की आशंका से ग्रसित सहमी हुई बैठी हुई थीं ! तभी अचानक तट से तकरीबन 30 मील पहले तीन भारतीय और दो अमीराती युद्धक पोतों ने इन्हें घेर लिया ! तलाशी ली गई ! दोनों युवतियों और चालक दल को हिरासत में ले, अमीराती सैन्य-बल अपने साथ वापस दुबई ले गया ! दोनों युवतियों में से एक थी अमीरात के अमीर शेख मुहम्मद बिन राशिद की बेटी शेखा लतीफा, जो अपने पिता के कठोर अनुशासन के बंधन से मुक्त होने के लिए घर से भाग रही थी तथा दूसरी थी उसकी मार्शल आर्ट ट्रेनर टीना, जो स काम में लतीफा की सहायता कर रही थी ! 

लतीफा और टीना 
2) दिसंबर 2018 की एक रात ! दिल्ली हवाई अड्डा ! समय दस बज कर चालीस मिनट ! इस कोने की हवाई पट्टी पर सघन सुरक्षा व्यवस्था के बीच एक विशेष विमान आ कर रुकता है ! कुछ समय पश्चात उसमें से सेना के दो जवान एक तीसरे शख्स को ले कर बाहर आते हैं ! उस शख्स के हाथों में हथकड़ी और आँखों पर पट्टी बंधी होती है ! उतरते ही उसे हिरासत में ले लिया जाता है ! यह शख्स था क्रिश्चियन मिशेल, जिसकी भारत सरकार को 2004 के अगस्ता हेलीकाप्टर घोटाले में वर्षों से तलाश थी ! इसे दुबई से प्रत्यर्पित कर भारत लाया गया था ! 

क्रिश्चियन मिशेल 
3) वर्ष 2004, ऑगस्टा वेस्टलैंड नामक एक विमानन कंपनी से भारत सरकार द्वारा अपने वीवीआई लोगों के लिए बारह AW101 मॉडल के हेलिकॉप्टर खरीदने के सौदे की बातचीत शुरुआत हुई थी। ऑगस्टा वेस्टलैंड, एक ब्रिटिश कंपनी है जो इटली की एक कंपनी फिनमैकेनिका की सहायक है ! ये कंपनियां हेलीकाप्टर बनाती हैं। पर जिस सरकार के साथ खरीददारी की बातचीत शुरू हुई थी वह सत्तारूढ़ दल राजनितिक उठापटक का शिकार हो गया ! फिर नई सरकार आई कांग्रेस की ! पर उसके साथ सौदा पूरा होते-होते इटली में यह आरोप लगा कि इस सौदे के लिए रिश्वत दी और ली गई है ! 
ऑगस्टा वेस्टलैंड 
4) जून 2024, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी G7 समिट में पहुंचते हैं और वहां इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी के द्वारा उनका हार्दिक स्वागत होता देख भारत के विपक्ष में खलबली मच जाती है ! हालांकि वहां दुनिया के हर बड़े नेता से मोदी की मुलाकात दोस्ताना माहौल में हुई पर हमारे घरेलू नेताओं की नजर मेलोनी-मोदी केमेस्ट्री पर ज्यादा रही जिससे उनकी फिजिक्स प्रभावित होती चली गई !  
G7 सम्मेलन 
दुनिया में रोज ही अनेकानेक घटनाएं घटती हैं, तरह-तरह वाकए होते हैं, इंसान देखता है भूल जाता है ! पर कभी-कभी बीसियों साल पुराने लिंक भी कुछ इस तरह जुड़ते हैं कि सब कुछ किसी फिल्म की तरह सामने घटता दिखाई पड़ने लग जाता है ! तो 2004 के सौदे को अमली जामा पहनाने के लिए फिनमैकानिका कंपनी ने एक बिचौलिया बनाया जिससे उस समय की सरकार के रसूखमंद लोगों से मिल उन्हें खुश कर इस सौदे को पूरा किया जा सके ! उस बिचौलिए या दलाल का नाम था, क्रिश्चियन मिशेल !

बात खुली तो मिशेल छिपते-छिपाते दुबई पहुंच गया पर उसका दुर्भाग्य कि वहां वह पकड़ा गया और जेल भेज दिया गया ! भारत सरकार ने काफी कोशिशें कीं पर यूएई ने उसे  भारत को नहीं सौंपा ! पर विधि का विधान ! यूएई के अमीर की बेटी भारत में पकड़ी जाती है उसे उसके अभिभावकों को सौंपा जाता है और उसके कुछ दिनों के बाद ही मिशेल प्रत्यर्पित हो भारत की जेल में पहुंच जाता है ! अब ताड़ने वालों ने इन दोनों घटनाओं का भी संबंध स्थापित कर दिया ! हो भी सकता है !

मिशेल को छुड़वाने के लिए उसके पक्ष में देश-विदेश से तरह-तरह की दलीलें, पैंतरे, दवाब, चालें, क्या-क्या नहीं किया गया ! अभी G7 की बैठक के पूर्व उसके द्वारा इंग्लैंड के प्रधान मंत्री को एक पत्र भिजवाया जिसमें मिशेल द्वारा उन पर एक हास्यास्पद आरोप लगाया है कि मैं ब्रिटिश नागरिक हूँ और आपको मुझे छुड़वाना चाहिए पर आप जानबूझ कर ऐसा नहीं कर रहे, क्योंकि आपका और आपकी पत्नी का सर्वाधिक धन इनफ़ोसिस के शेयरों में लगा हुआ है और आपको डर है कि मेरा पक्ष लेने पर मोदी इनफ़ोसिस पर कार्यवाही कर उसके शेयरों की कीमत गिरवा देंगे और आप अपना सब कुछ खो देंगे ! फिलहाल पांच वर्षों से वह अभी तो तिहाड़ का ही मेहमान है।  

उधर फिनमैकेनिका के अधिकारीयों को दोषी पाया गया और उन्हें सजा हो गई ! यह बात 2013 की है ! इस बात के भारत पहुंचते ही हड़कंप मच गया, कांग्रेस सरकार ने आनन-फानन में डील को रद्द कर दिया, जिससे मामला दब जाए ! पर विपक्ष ने दवाब डाला कि इटली की अदालत के अनुसार यहां कुछ लोगों को रिश्वत दी गई है तो उन लोगों के नाम उजागर होने चाहिऐं ! जब दवाब बढ़ा तो उस समय के रक्षा मंत्री श्री ऐ.के.अंटोनी ने मामला सीबीआई के हवाले कर दिया ! उनको लगा था कि 2014 के चुनावों में उनकी सरकार वापस तो आ ही रही है ! मामला मैनेज कर लिया जाएगा ! पर हो गया उल्टा ! उनकी सरकार तो चली गई पर सीबीआई का आदेश बना रहा !

पर इस मामले की सबसे बड़ी दिक्कत यह है लाभभोगियों के नाम की लिस्ट नहीं मिल रही ! जो दो जगहों से उपलब्ध हो सकती है ! एक तो ब्रिटेन के SFO (Serious Fraud Investigation) या फिर इटली के कोर्ट से ! तो अभी G7 के मेंबर ना होते हुए भी मोदी जी का वहां जाना, सुनक तथा खासकर मेलोनी से मिलना, यह सब यहां कांग्रेस के लोगों की बेचैनी का सबब बन गया है ! इसीलिए मोदी जी की इस यात्रा पर बेतुके सवाल, खासकर इस पार्टी द्वारा उठाए जा रहे हैं ! ऊपर से प्रधान मंत्री का तीसरी बार आने पर भ्रष्टाचार के खिलाफ का अभियान और भी तेज होगा, वाला बयान इन लोगों की नींद उड़ाए हुए है ! 

अब समय के झोले में क्या-क्या है और वह कब-कब, क्या निकालेगा, यह तो समय ही बता सकता है ! क्या बाहर आएगा, क्या पता चलेगा यह किसी को भी पता नहीं है ! क्या यह दूसरा बोफोर्स तो नहीं बन जाएगा ! हम-आप तो सिर्फ समय के उस वक्त का इंतजार ही कर सकते हैं !

--आभार अंतर्जाल 

शुक्रवार, 14 जून 2024

शापित है हमारा मध्यम वर्ग, ऐसा क्यूँ ? कोई तो जवाब दे

मध्यम वर्ग गर्व महसूस करता है जब वह सुनता है कि उसके देश में कोई भूखा नहीं सोता, करोड़ों लोगों को मुफ्त में राशन दिया जाता है ! पर जब वह अपने लिए निर्धारित आटे-दाल का भाव सुनता है तो सर पीट लेता है ! इस वर्ग को कभी कोई आपत्ति नहीं हुई, बल्कि वह खुश होता है जब इसे स्कूलों में गरीब बच्चों को मुफ्त में पौष्टिक आहार मिलने की बात पता चलती है ! पर उस पर दूसरे दिन सुबह ही गाज गिर जाती है, जब उसे अपने बच्चे के दूध की कीमतें बढ़ी हुई मिलती हैं ! पेट्रोल की बढ़ती कीमतों पर वह सरकार के अनुरोध पर बस या मेट्रो से अपने काम पर जाना तय करता है, तो पाता है कि उसकी चुनी सरकार ने इन साधनों का किराया बढ़ा दिया है ! तथाकथित गरीबों को लुभाने के लिए सरकारें मुफ्त धार्मिक यात्राओं का इंतजाम करती रहती हैं, पर क्या करे ये दुखिया वर्ग ! जो अपने माता-पिता को चाहते हुए भी किसी यात्रा पर भेजने के पहले सौ बार सोचता है, क्योंकि इसके बुजुर्गों को मिलने वाली कुछ प्रतिशत छूट सरकार वापस ले चुकी होती है.............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

पृथ्वी का मानचित्र देखने पर हमें क्षैतिज तथा एक दूसरे के सामानांतर रेखाओं का एक जाल सा नजर आता है। इन काल्पनिक रेखाओं को अक्षांश और देशांतर रेखाएं कहा जाता है। पृथ्वी के विभिन्न जलवायु क्षेत्र के निर्धारण, तापमान, मौसम का आकलन आदि में इन रेखाओं का काफी योगदान रहता है। ये वैज्ञानिकों द्वारा जमीन के धरातल पर खींची गई काल्पनिक रेखाएं हैं ! जिनके अगल-बगल या इस पार और उस पार लोग रहते हैं। 

उन रेखाओं की तर्ज पर एक काल्पनिक रेखा हमारे देश में राजनैतिक नेताओं द्वारा भी बनाई गई है। जिसे गरीबी की रेखा कहा जाता है। इसकी खासियत यह है कि यह धरातल पर नहीं बल्कि हवा में खींची गई है, इसीलिए इसके आर-पार नहीं, बल्कि ऊपर-नीचे आबादी रहती है ! इसके ऊपर रहने वालों को अमीर और नीचे वालों को गरीब माना जाता है ! उच्च वर्ग इसके दायरे में नहीं आता ! इस रेखा का एक खास गुण है कि इसे सरकारों की सहूलियतानुसार ऊपर-नीचे किया जा सकता है ! जिससे नेताओं द्वारा चुनावों के दौरान तरह-तरह के प्रलोभनों, हथकंडों, आश्वासनों तथा  रियायतों से जनता को लुभा, अपने उल्लू को टेढ़ा होने से बचाया जा सके ! 

इस रेखा के नीचे रहने वाले लोग अत्यंत भाग्यशाली और सरकारों के बहुत प्रिय होते हैं। देश में किसी भी दल की सरकार बने, इन लोगों की सदा पौ-बारह रहती है। उधर आम भारतीय जनता जिसे देश का मध्यम वर्ग कहा जाता है, वह भी सदा से बड़े दिल वाला, दयालु, परोपकारी व  भावुक रहा है ! दूसरों के दुःख से पसीज जाता है ! इसीलिए ''इसको'' बार-बार ''उनकी'' याद दिलाई जाती है, लगातार ''उनकी'' तथाकथित दुर्दशा से अवगत कराया जाता है ! ''ये'' भी द्रवित हो जैसे-तैसे उनके लिए अपनी जेब ढीली करते रहते हैं और ऐसा वर्षों से चला आ रहा है !  

पर ऐसा कब तक चलता ! दिनोंदिन की बढ़ती मंहगाई, स्थिर आमदनी, नौकरियों की कमी, छंटनी इन सबने इन्हें कुछ परेशान सा कर दिया ! इसने देखा कि यदि एक दल किसी खास जाति-धर्म का हिमायती है, उसी के बारे में सोचता है, तो दूसरा दल भी उसी की राह पर चल रहा है ! वह भी एक खास वर्ग की ही ज्यादा चिंता करता है ! उन्हीं को ध्यान में रख, ज्यादातर योजनाएं बनाई जाती हैं ! देश की संपदाओं का लाभ सबसे पहले उन्हीं को दिया जाता है और रेखा के ऊपर रहने वाला, भले ही वह तिल भर ही ऊपर हो,  वर्ग सदा से ठगा जाता रहा है !  

कभी ना कभी तो तिलमिलाहट होनी ही थी ! जब रेखा के ऊपर वाला समूह यह देखता है कि फलाने-फलाने को तो टैक्स से छूट दे दी जाती है पर मेरी कमाई के हाथ में आने के पहले ही उसमें कटौती हो जाती है ! उस मनहूस रेखा से तिल भर की ऊंचाई, उसको जी.एस.टी. और इनकम टैक्स के इंस्पेक्टरों का निशाना बनवा देती है, जबकि उधर वाले को अपनी आमदनी का कोई हिसाब-किताब ही नहीं रखना पड़ता ! मेरी पीढ़ी दर पीढ़ी किराए के मकान बदलते-बदलते ही कालकल्वित हो जाती है पर उधर के भाग्यशाली लोगों के सदस्यों को सरकारें चुन-चुन कर घर आवंटित कर गंगा नहाती रहती हैं ! मेरा बच्चा दिन-रात एक कर अच्छे नंबर लाता है पर उधर पास लायक अंक ना होने पर भी दाखिला मिल जाता है ! मुझे अपनी लियाकत होने के बावजूद तरक्की नहीं मिलती पर उधर तरक्की पर तरक्की पा कर भी लियाकत सिद्ध नहीं कर पाता ! मेरा सारा बजट राशन-किराए में ही खप जाता है, उधर किसी का मुफ्त, मुफ्त और मुफ्त पा कर भी पेट नहीं भरता !  

वही मध्यम वर्ग गर्व महसूस करता है जब वह सुनता है कि उसके देश में कोई भूखा नहीं सोता करोड़ों लोगों को मुफ्त में राशन दिया जाता है ! पर जब वह अपने लिए निर्धारित आटे-दाल का भाव सुन सर पीट लेता है ! इस वर्ग को कभी कोई आपत्ति नहीं हुई, बल्कि वह खुश होता है जब स्कूलों में गरीब बच्चों को मुफ्त में पौष्टिक आहार मिलने की बात सुनता है, पर उस पर दूसरे दिन सुबह ही गाज गिरती है जब उसे अपने बच्चे के दूध की कीमतें बढ़ी हुई मिलती है ! पेट्रोल की बढ़ती कीमतों पर वह सरकार के अनुरोध पर बस या मेट्रो से अपने काम पर जाना तय करता है तो पाता है कि उसकी चुनी सरकार ने इन साधनों का किराया बढ़ा दिया है ! तथाकथित गरीबों के लिए सरकारें मुफ्त धार्मिक यात्राओं का इंतजाम करती रहती हैं, पर क्या करे ये दुखिया वर्ग, जो अपने माता-पिता को चाहते हुए भी किसी यात्रा पर भेजने के पहले सौ बार सोचता है, क्योंकि बुजुर्गों को मिलने वाली कुछ प्रतिशत छूट भी सरकार वापस ले चुकी होती है ! जबकि यह विडंबना ही तो है कि सारे लाखों-करोड़ों की संपत्ति के स्वामी इन नेताओं के लिए हर सुविधा नि:शुल्क होती है ! यहां तक कि कई तो दो-दो पेंशन तक लेने से नहीं शर्माते ! 

अब तो ऐसा लगता है कि देश की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ की हड्डी जैसा यह मध्यम वर्ग एक तरह से शापित ही है ! कहां तक गिनाई जाएं इनकी मुसीबतें ! इनकी परेशानियां गिनने लगें तो ग्रंथ बन जाएगा ! टैक्स पर टैक्स पर टैक्स देने वाला, छूट पर छूट पर छूट को लेने वाले को सिर्फ देखता रहता है ! वह सोचता रह जाता है कि  क्या खता है मेरी ! सबको दे-दे कर भी मैं ही क्यूँ भुगतने पर विवश हूँ ? व्यक्ति-समाज-देश क्या इनका जिम्मा सिर्फ मेरा है ? गन्ने की तरह पेर-पेर कर मेरा सारा रस निकाल, मुझे क्यों इस तरह उपेक्षित छोड़ दिया जाता है ? फिर आपदा-विपदा-मुसीबत पड़ने पर सबसे पहले याद भी मुझी को किया जाता है ! 

रियायतें, सहूलियतें जाति-धर्म या किसी विशेष ही को क्यों ? क्यों नहीं यह जरूरतमंदों की पहचान कर या जिन्हें इस सबकी सचमुच जरुरत है, उन्हें दी जातीं ? बहुत सारे, अनगिनत ऐसे लोग हैं, जिन्होंने सरकारी नौकरी नहीं की ! उनको कोई पेंशन नहीं मिलती ! वे आर्थिक तौर असुरक्षित हैं ! ऐसे ही अनेकों लोग जिन्हें आज आर्थिक-मानवीय सहायता की, सरकारी सुरक्षा की अत्यंत ही आवश्यकता है पर वे इन रेखाओं के दायरे में नहीं आते और घुट-घुट कर तरस-तरस कर जीने को मजबूर हैं ! उनका ख्याल कौन रखेगा ? उनकी चिंता कौन करेगा ? वोट तो वे भी देते हैं !

क्यूँ ? ऐसा क्यूँ ? कोई तो जवाब दे........!      

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