यह टाइल वाली बात एक मनोवैज्ञानिक समस्या है, जिसे ''मिसिंग टाइल सिंड्रोम'' नाम दिया गया है और जो कमोबेस तकरीबन हर इंसान में मौजूद होती है ! किसी चीज की ''मिसिंग'' पर ही हमारा ध्यान जाना, हमारी जिंदगी के दुःख का सबसे बड़ा कारण है ! जो हमारे पास है, उससे हम उतना खुश नहीं होते जितना कि जो हमारे पास नहीं है उसके लिए दुखी होते हैं
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
शुक्रवार, 23 सितंबर 2022
मिसिंग टाइल सिंड्रोम, जो पास नहीं है उसका दुःख
रविवार, 18 सितंबर 2022
चीते आ गए, स्वागत है
छाता प्रजाति जीवों की उन विशेष श्रेणी को कहा जाता है, जिनके संरक्षण से धरती की अन्य प्रजातियों को भी संरक्षित कर पर्यावरण को संतुलित करने में सहायता मिलती है ! इनमें पशु और पक्षी दोनों ही सामान रूप से सम्मिलित होते हैं ! ये संरक्षण क्षेत्रों के आकार, संरचना और पारिस्थितिक तंत्र को बचाए रखने में भी मदद करते हैं। ये भले ही अप्रत्यक्ष रूप से ही सही, अन्य जीवों को रहत पहुंचते हैं, इसीलिए इन्हें छाता या अंब्रेला प्रजाति कहा जाता है .......!
#हिन्दी_ब्लागिंग
हमारे यहां एक प्रथा कुछ वर्षों से काफी चलन में है, वह है विरोध ! सरकार द्वारा कुछ भी हो रहा हो या किया जाए तुरंत एक खास पूर्वाग्रही, कुंठित, विघ्नसंतोषी तबका उसके विरोध में चिल्ल-पों मचाना शुरू कर देता है ! उस काम के औचित्य पर, उसके प्रयोजन पर, उसके परिणाम पर सवाल उठाने आरंभ कर दिए जाते हैं ! भले ही वह काम देश के या लोगों के हित में ही क्यों ना हो ! अभी देश की ग्रासलैंड इकोलॉजी को सुधारने के लिए विलुप्त हो चुके चीतों के पुनर्स्थापन की योजना के तहत नामीबिया से आठ चीते, जिनमें पांच मादा तथा तीन नर हैं, लाए गए ! इस पर उनको लाने और जगह विशेष में बसाने पर भी ऐसे लोगों को राजनीती नजर आने लगी ! जबकि यह पर्यावरण के लिए बहुत आवश्यक था !
किसी भी देश से दूसरे देश में जीवों को लाने ले जाने के IUCN (International Union for Conservation of Nature) के कुछ नियम हैं, जिनका पालन करना जरुरी होता है ! उसी के तहत चीतों के लिए पांच राज्यों के 10 जगहों को तय किया गया था ! जो सात अलग-अलग तरह के लैंडस्केप पर मौजूद हैं. छत्तीसगढ़ में गुरु घासीदास नेशनल पार्क ! गुजरात में बन्नी ग्रासलैंड्स ! मध्यप्रदेश में डुबरी वाइल्डलाइफ सेंचुरी, संजय नेशनल पार्क, बागडारा वाइल्डलाइफ सेंचुरी, नॉराडेही वाइल्डलाइफ सेंचुरी और कूनो नेशनल पार्क ! राजस्थान में डेजर्ट नेशनल पार्क वाइल्डलाइफ सेंचुरी और शाहगढ़ ग्रासलैंड्स और उत्तर प्रदेश की कैमूर वाइल्डलाइफ सेंचुरी !
फिर काफी सोच-विचार मश्शकत के बाद राजस्थान के मुकुंदारा हिल्स टाइगर रिजर्व, शेरगढ़ वाइल्डलाइफ सेंचुरी और भैंसरोर गढ़ वाइल्डलाइफ सेंचुरी तथा मध्यप्रदेश की गांधी सागर वाइल्डलाइफ सेंचुरी, माधव नेशनल पार्क को भी आजमाया गया ! पर अंत में हर दृष्टिकोण से श्योपुर स्थित कूनो नॅशनल पार्क ही हर कसौटी पर खरा उतरा ! जहां स्पेशल हवाई जहाज से, विशेष व्यवस्था और निगरानी के तहत नए मेहमानों को ला कर, प्रधान मंत्री मोदी जी द्वारा उनके इस नए आवास में छोड़ा गया !
चीते का हमारे संस्कृत ग्रंथों में चित्रक यानी चित्तीदार के रूप में विवरण मिलता है ! नवपाषाण युग की गुफाओं में भी इनके चित्र मिलते हैं ! आशा है, करीब सत्तर साल बाद आए, दुनिया के सबसे तेज धावक, हमारे इन नए मेहमानों को यहां स्थाई निवासी बनने, रहने, पनपने में कोई अड़चन नहीं आएगी ! उनका परिवार फलेगा-फूलेगा ! इसके साथ ही इस इलाके में पर्यटन बढ़ेगा ! लोग चीतों को देखने आएंगे ! जिससे राज्य और देश को भी फायदा होगा !
@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से, आभार
मंगलवार, 6 सितंबर 2022
प्लास्टिक को पहचानें उस पर दिए गए कोड से
आज प्लास्टिक को बिलकुल नकार दिया जाना सम्भव नहीं है। हालंकि इनमें से कुछ पर्यावरण के तथा इंसान के लिए हानिरहित भी हैं। पर अधिकतर हमारे लिए हानिकारक ही हैं। इन्हें कभी भी गर्म नहीं करना चाहिए, जब तक उस पर ऐसा करना हानिरहित न लिखा हो। ज़रा सी टूट-फूट होते ही इन्हें प्रयोग से बाहर कर देना ही उचित है ! वैसे भी प्लास्टिक का उपयोग खूब सोच-समझ कर ही करना चाहिए। इसकी श्रेणियों में क्रमांक 1, 2, 4, 5 को उपयोग के लिए सुरक्षित और 3, 6, 7, खासकर 7 को हानिकारक मान कर उनका कम ही काम में लाया जाना उचित है .......!
#हिन्दी_ब्लागिंग
सोमवार, 29 अगस्त 2022
तेरह साल के भ्रष्टाचार को तेरह सेकेंड में खत्म किया जा सकता है, दृढ इच्छाशक्ति होनी चाहिए
अब उन डाक्टरों पर भी नकेल कसी जानी चाहिए जो शिकंजे में फंसे अपने आकाओं को बताते हैं कि कोर्ट के कितनी दूर जाने पर उनको हार्ट अटैक आएगा या कितने दिन पूछ-ताछ पर उनकी यादाश्त चली जाएगी ! उन सी.ए. और आर्थिक सलाहकारों से भी पूछ-ताछ होनी चाहिए जो अपने सरपरस्तों के काले धन के अंबार को ठिकाने लगाने में सहायता करते हैं ! उन वकीलों से भी जिरह होनी चाहिए जो एक पेशी के दसियों लाख की रकम ले, जान-बूझ कर देश द्रोहियों, हत्यारों, कुकर्मियों, जालसाजों, भ्रष्टाचारियों के लिए झूठ को सच का जामा पहन कानून की पतली गलियों से बचा निकाल ले जाते हैं ! उन पुलिस और कलेक्टर को भी जिम्मेदार मान उन पर कार्यवाही होनी चाहिए, जिनके क्षेत्र में दंगे-फसाद या कोई भी गंभीर गैर कानूनी हरकतें होती हैं ..........!!
आखिर दिल्ली के बेहद नजदीक, उत्तर प्रदेश के नोएडा के सेक्टर 93-A में, 102 मीटर ऊँचे, दबंगई, भ्रष्टाचार, रसूख, धनबल के प्रतीक जुड़वां टॉवरों को जमींदोज कर ही दिया गया ! संरचना में दो जुड़वां टॉवर बने हुए थे, जिनमें एक की ऊंचाई 102 मीटर और दूसरे की 95 मीटर थी ! 32 मंजिला इस इमारत को बनाने में करीब तेरह साल का समय, सैंकड़ों कर्मियों का योगदान तथा तकरीबन 300 करोड़ रुपये खर्च हुए थे ! केस वगैरह ना होते तो आज इसकी कीमत 1000 करोड़ के आस-पास होती !
![]() |
| नोएडा के जुड़वां स्तूप |
ऐसा कहा जा रहा है कि इन स्तूपों को गिराना भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ा संदेश है ! अच्छी बात है ! इसके साथ ही यह भी आभास मिल रहा है कि दृढ इच्छाशक्ति हो तो तेरह साल के भ्रष्टाचार को तेरह सेकेंड में खत्म किया जा सकता है ! पर क्या सिर्फ विष-वृक्ष का तना काट देने से समस्या का निदान हो जाएगा ? जितना ऊँचा यह टॉवर था उससे कहीं गहरी हैं, दुराचरण की जड़ें हमारे देश में ! आज इतने छापे पड़ रहे हैं ! इतनी धर-पकड़ हो रही है ! आरोपियों के घरों से रद्दी कागजों के ढेर की तरह नोटों के टीले बरामद हो रहे हैं ! पर ना लालच खत्म होता दिखता है, नाहीं कहीं कानून का डर काबिज होता नजर आ रहा है !
आज एक रोजगार से परेशान आम इंसान कहीं एक ठेला लगा ले तो दिन भर में मक्खियों की तरह निगम वाले, पुलिस वाले, सड़क वाले, कार्पोरेशन वाले और ना जाने कौन-कौन अपना रौब गाँठ कर उसको एक मिनट टिकने नहीं देंगे ! क्योंकि वह समाज की सबसे पिछली कतार में खड़ा होने वाला एक अशक्त, बेसहारा, जीव मात्र है ! और इधर तेरह साल तक एक निर्माण होता रहा और उन्हीं रौबीले कारिंदों को ना कुछ दिखाई दिया और ना ही सुझाई ! सुना तो यह जा रहा है कि कोर्ट के निर्देश के बावजूद बिना किसी खौफ के काम जारी रहा ! किसका इतना सशक्त वरदहस्त निर्माता के सर पर था कि वह कानून को भी धत्ता बताता चला गया ! अब इमारत तो गिर गई ! गिरते-गिरते भी तीस करोड़ की चपत लगा गई ! उसके साथ ही उसमें खर्च हुए देश के संसाधन, पैसे, समय और जनबल भी धूल-धूएं-मलबे में बदल कर रह गए ! पता नहीं निर्माता कंपनी का क्या हुआ ! यह भी नहीं पता कि इस सजा से लोग सबक लेंगे भी कि नहीं ! क्योंकि नियम-कानून पर अपराध भारी पड़ता दिखता है ! लोग बिना किसी डर-भय के अनैतिक कार्य करते चले जा रहे हैं !
आज यदि देश-समाज-लोगों में कानून का रौब, खौफ, दहशत तारी करना है तो जड़ों पर प्रहार को करना होगा ! उस खाद-पानी का परिमार्जन करना होगा जो भ्रष्टाचार को पल्ल्वित-पुष्पित होने में सहायक होते हैं ! अपराधियों के साथ ही उन डाक्टरों पर भी नकेल कसी जानी चाहिए जो शिकंजे में फंसे अपने आकाओं को बताते हैं कि कोर्ट के कितनी दूर जाने पर उनको हार्ट अटैक आएगा या कितने दिन पूछ-ताछ पर उनकी यादाश्त चली जाएगी ! उन सी. ए. और आर्थिक सलाहकारों से भी पूछ-ताछ होनी चाहिए जो अपने सरपरस्तों के काले धन के अंबार को ठिकाने लगाने में सहायता करते हैं ! उन वकीलों से भी जिरह होनी चाहिए जो एक पेशी के दसियों लाख की रकम ले, जान-बूझ कर देश द्रोहियों, हत्यारों, कुकर्मियों, जालसाजों, भ्रष्टाचारियों के लिए झूठ को सच का जामा पहना कानून की पतली गलियों से बचा निकाल ले जाते हैं ! कहते हैं कि यदि पुलिस चाहे तो किसी आम नागरिक के घर से कोई झाड़ू तक नहीं चुरा सकता ! तो क्यों नहीं घटना ग्रस्त इलाके का जिम्मेदार वहाँ के कोतवाल को माना जाता ! यदि सरकार विधान बना दे कि किसी भी घटना की जिम्मेदारी वहाँ के थाने और उसके स्टाफ की होगी तो क्या मजाल है कि अपराधी तो क्या चिड़िया भी पर मार जाए या इस तरह देश के संसाधनों और पैसे की बर्बादी हो जाए !
माना यह सब कहना-सुनना बहुत आसान है, पर इसको कार्यान्वित करना जरा मुश्किल तो है, पर नामुमकिन कतई नहीं है ! सिर्फ देश प्रेम की भावना और दृढ इच्छाशक्ति की जरुरत है ! कोई ना कोई रास्ता जरूर निकलेगा, निकालना ही होगा जिससे अपराधियों के मन में खौफ जगह बना सके ! कुछ भी गलत करने के पहले उसे दस बार सोचना पड़े ! उसे भविष्य के महलों के ख्वाब से पहले वर्तमान की जेल की सलाखें नजर आएं ! जेल जाते-आते महानुभाव हाथ उठा विजय चिन्ह ना बना सर झुका कर हमारे सामने से निकलें ! उनके वंशधर हिम्मत ना कर सकें कभी सत्ता की कुर्सी की तरफ आँख उठा देखने की ! इसके लिए धर्म-भाषा-जाति से ऊपर उठ कुछ बदलाव तो हमें भी अपने में लाने होंगे ! गलत बातें होते देख मन ही मन कुढ़ने की बजाए आक्रोश तथा विरोध तो जाहिर करना ही होगा ! नहीं तो ऐसे ही निर्माण गिर-गिर कर फिर-फिर बनते रहेंगे !
रविवार, 28 अगस्त 2022
माउजर, जिसने अंत तक चंद्रशेखर आजाद का साथ दिया
![]() |
| चंद्रशेखर आजाद की माउजर |
![]() |
| काकोरी काण्ड में प्रयुक्त माउजर |
विडंबना है कि किस्मत से, छींका टूटने से जब हमारी झोली में आजादी आ ही गिरी तो उसका सारा श्रेय, बिना किसी हिचक, बिना किसी अपराधबोध के, बिना किसी शर्म के हमने खुद को ही देते हुए बड़ी सरलता से उन सैकड़ों हजारों वीरों के उत्सर्ग को, उनके समर्पण को, उनकी देशप्रेम की मिसाल को भुलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी
![]() |
| माउजर और उसका खोल |
![]() |
| श्री शचीन्द्रनाथ बक्शी |
![]() |
| काकोरी स्टेशन |
शनिवार, 20 अगस्त 2022
वामनराव बलिराम लाखे
उन दिनों स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े क्रांतिकारियों की गोपनीयता के चलते उनको उनके नाम से नहीं, बल्कि एक अलग उपनाम या कोड से पहचाना जाता था ! ऐसे में कुछ लोग अपने उपनाम से ही प्रसिद्ध हो उसी नाम से जाने लग गए थे ! 1930 में जब महात्मा गाँधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत की तो छत्तीसग़ढ के रायपुर जिले में उसकी बागडोर वामनराव लाखे, महंत लक्ष्मीनारायण दास, ठाकुर प्यारेलाल सिंह, शिवदास डागा और मौलाना रऊफ ने संभाली ! प्रचलन के तहत इन पाँचों को पांच पांडव के नाम से जाना जाने लगा, जिनमें वामनराव जी को युधिष्ठिर के रूप में जाना जाता था...........!
#हिन्दी_ब्लागिंग
सन 1857 की असफल जन-क्रांति के बावजूद, देश की जनता आजादी पाने के लिए सदा प्रयास रत रही थी ! इस मुहीम के यज्ञ में हजारों-हजार आजादी के परवानों की बिना किसी अपेक्षा के आहुतियां पड़नी बदस्तूर जारी थीं ! पर दुःख इस बात का है कि गुलामी से मुक्ति मिलते ही हम अपने कर्म-कांडों में ऐसे उलझे कि उन शूरवीरों को भूलाते चले गए ! आज हालत यह है कि नई पीढ़ी से यदि देश पर न्योछावर हुए वीरों के नाम पूछे जाएं, तो शायद हाथों की उंगलियां ज्यादा पड़ जाएंगी ! हालत तो ऐसी भी है कि लोगों को अपने ही शहर में स्थित किसी स्मारक का नाम, जो किसी क्रांतिवीर के नाम पर हो, तो पता होता है, पर उसके इतिहास के बारे में कोई जानकारी नहीं होती ! हर राज्य में ऐसे अनगिनत उदाहरण मिल जाएंगे ! हर राज्य पर काबिज राजनैतिक दल का, चाहे वह किसी भी विचारधारा से संबंधित हो, फर्ज बनता है कि वह अतीत की धुंध में खो गए उन महानायकों का परिचय वर्तमान पीढ़ी से करवाए ! उन्हें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि वे जो कुछ भी आज है वो उन्हीं की बदौलत हैं !
![]() |
| वामनराव बलिराम जी लाखे |
उन दिनों स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े क्रांतिकारियों की गोपनीयता के चलते उनको उनके नाम से नहीं, बल्कि एक अलग उपनाम या कोड से पहचाना जाता था ! ऐसे में कुछ लोग अपने उपनाम से ही प्रसिद्ध हो उसी नाम से जाने लग गए थे ! 1930 में जब महात्मा गाँधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत की तो छत्तीसग़ढ के रायपुर जिले में उसकी बागडोर वामनराव लाखे, महंत लक्ष्मीनारायण दास, ठाकुर प्यारेलाल सिंह, शिवदास डागा और मौलाना रऊफ ने संभाली ! प्रचलन के तहत इन पाँचों को पांच पांडव के नाम से जाना जाने लगा ! सबसे बड़े और सामाजिक कार्यों में अग्रणी होने के कारण वामनराव जी, जिनका पूरा नाम वामनराव बलिराम लाखे था, को युधिष्ठिर भी कहा जाने लगा था ! जिनका जन्म दिन सितम्बर महीने में पड़ता है ! आज उन्हीं के बारे में संक्षिप्त जानकारी !
श्री वामनराव बलिराम लाखे का जन्म 17 सितम्बर, 1872 को रायपुर, छत्तीसगढ़ में हुआ था। उनके पिता पंडित बलिराम गोविंदराव लाखे जी ने अपने कठोर परिश्रम से अपने परिवार की माली हालत सुधारी थी ! जब वामनराव जी का जन्म हुआ, उस समय तक उनके परिवार की गणना रायपुर क्षेत्र के समृद्ध घरानों में होने लगी थी। रायपुर से मैट्रिक पास करने और जानकी बाई जी से विवाहोपरांत वामनराव जी ने नागपुर से कानून की परीक्षा पास कर वापस रायपुर आ सार्वजनिक, सामाजिक व राजनीतिक कार्यों के साथ ही वकालत भी करनी शुरू की ! पर उनका उद्देश्य पैसे का अर्जन ना हो कर जन-साधारण की सेवा ही था, जिसमें उनकी पत्नी ने भी हमेशा उनका साथ दिया था।
वामनराव जी ने उस दौरान लोगों को जागरूक करने हेतु आंदोलनों के अलावा पत्रकारिता का भी सहारा लेते हुए माधवराव सप्रे जी, जो उनके स्कूल के साथी थे, के सहयोग से "छत्तीसगढ़ मित्र", जो इस क्षेत्र की पहली पत्रिका थी, के प्रकाशन के द्वारा राष्ट्रिय चेतना का विकास करते हुए युवाओं को एक नई दिशा प्रदान की थी
श्री वामनराव बलिराम लाखे जी की निर्भीकता अनुकरणीय है ! एक सभा में उन्होंने अंग्रेजी शासन को गुण्डों का राज कह दिया था जिसके फलस्वरूप उन्हें एक साल की सजा और 3000 रुपये जुर्माना हुआ था ! 1941 में रायपुर के पास सिमगा में सत्याग्रह करते हुए गिरफ्तार कर चार महीनों के लिए नागपुर जेल भेज दिया गया था ! उस वक्त उनकी उम्र 70 वर्ष की थी ! इसके छह साल बाद जब देश आजाद हुआ तो उन्होंने 15 अगस्त को रायपुर के गाँधी चौक में तिरंगा फहराया !
![]() |
| वामनराव लाखे स्कूल, रायपुर |
![]() |
| स्कूल का अंदरूनी भाग |
जय हिंद -
@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से
बुधवार, 17 अगस्त 2022
हमें अपने बचपन को बचाए रखना है
हमारे विद्वान ऋषि-मुनियों ने अपने ग्रंथों में शिक्षा देते समय मानवता पर, इंसानियत पर जोर दिया है ! यदि इंसान इंसानियत ना छोड़े, मानव; महामानव बनने की लालसा में मानवता से दूर ना चला जाए, तो इस धरा पर कभी भी शांति, सौहार्द, परोपकार का माहौल खत्म ना हो ! ना किसी युद्ध की आशंका हो ! ना प्रकृति के दोहन या उससे छेड़-छाड़ की गुंजाइश बचे ! नाहीं कायनात को अपना रौद्र रूप धारण करने की जरुरत हो..........!
#हिन्दी_ब्लागिंग
अब तो साफ लगने लग गया है कि प्रकृति हमसे रुष्ट हो चुकी है ! खफा तो बहुत पहले से ही थी, जिसका समय-समय पर एहसास भी दिलाती रही है ! पर अपने दर्प में चूर हमने कभी उसकी चेतावनियों पर ध्यान ही नहीं दिया ! इस धरा पर, प्रकृति पर लगातार बिना किसी अपराधबोध के जुल्म ढाते रहे ! उसके दिए अनमोल संसाधनों का शोषण करते रहे ! पर हर चीज की एक हद होती है ! आखिर कायनात ने भी हमें सबक सिखाने की ठान ही ली ! दुनिया भर में मौसम बदलने शुरू हो गए हैं ! कहीं अति वृष्टि, तो कहीं भयंकर सूखा ! कहीं पहाड़ दरक गए तो कहीं बादल फट गए ! कही बाढ़ ने कहर ढा दिया ! जहां सदियों से लोगों ने 25-30 से ऊपर तापमान ना देखा हो वहां पारा 45 के ऊपर जा टिका है ! पहाड़ों में जहां कभी घरों की छत में पंखा टांगने के हुक की जरुरत महसूस नहीं हुई, वहां कूलर बिकने शुरू हो गए हैं ! सागरों ने अपना अलग रौद्र रूप धारण कर लिया है ! पर बाज हम फिर भी नहीं आ रहे !
![]() |
| बाढ़ की विभीषिका |
![]() |
| गर्मी से दरकी जमीन |
![]() |
| ढहते पहाड़ |
विशिष्ट पोस्ट
जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया
अनेकों बार Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...
-
कल रात अपने एक राजस्थानी मित्र के चिरंजीव की शादी में जाना हुआ था। बातों ही बातों में पता चला कि राजस्थानी भाषा में पति और पत्नी के लिए अलग...
-
शहद, एक हल्का पीलापन लिये हुए बादामी रंग का गाढ़ा तरल पदार्थ है। वैसे इसका रंग-रूप, इसके छत्ते के लगने वाली जगह और आस-पास के फूलों पर ज्याद...
-
आज हम एक कोहेनूर का जिक्र होते ही भावनाओं में खो जाते हैं। तख्ते ताऊस में तो वैसे सैंकड़ों हीरे जड़े हुए थे। हीरे-जवाहरात तो अपनी जगह, उस ...
-
चलती गाड़ी में अपने शरीर का कोई अंग बाहर न निकालें :) 1, ट्रेन में बैठे श्रीमान जी काफी परेशान थे। बार-बार कसमसा कर पहलू बदल रहे थे। चेहरे...
-
युवक अपने बच्चे को हिंदी वर्णमाला के अक्षरों से परिचित करवा रहा था। आजकल के अंग्रेजियत के समय में यह एक दुर्लभ वार्तालाप था सो मेरा स...
-
कहते हैं कि विधि का लेख मिटाए नहीं मिटता। कितनों ने कितनी तरह की कोशीशें की पर हुआ वही जो निर्धारित था। राजा लायस और उसकी पत्नी जोकास्टा। ...
-
हनुमान जी के चिरंजीवी होने के रहस्य पर से पर्दा उठाने के लिए पिदुरु के आदिवासियों की हनु पुस्तिका आजकल " सेतु एशिया" नामक...
-
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा। हमारे तिरंगे के सम्मान में लिखा गया यह गीत जब भी सुनाई देता है, रोम-रोम पुल्कित हो जाता ...
-
"बिजली का तेल" यह क्या होता है ? मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि बिजली के ट्रांस्फार्मरों में जो तेल डाला जाता है वह लगातार ...
-
अपनी एक पुरानी डायरी मे यह रोचक प्रसंग मिला, कैसा रहा बताइयेगा :- काफी पुरानी बात है। अंग्रेजों का बोलबाला सारे संसार में क्यूं है? क्य...

.jpg)
.jpg)
.jpg)


.jpg)
.jpg)


.jpg)
.jpg)

.jpg)
.jpg)
.jpg)

.jpg)
.jpg)
.jpg)

.jpg)

.jpg)
.jpg)

.jpg)
.jpg)
.jpg)
.jpg)