सोमवार, 29 अगस्त 2022

तेरह साल के भ्रष्टाचार को तेरह सेकेंड में खत्म किया जा सकता है, दृढ इच्छाशक्ति होनी चाहिए

अब उन डाक्टरों पर भी नकेल कसी जानी चाहिए जो शिकंजे में फंसे अपने आकाओं को बताते हैं कि कोर्ट के कितनी दूर जाने पर उनको हार्ट अटैक आएगा या कितने दिन पूछ-ताछ पर उनकी यादाश्त चली जाएगी ! उन सी.ए. और आर्थिक सलाहकारों से भी पूछ-ताछ होनी चाहिए जो अपने सरपरस्तों के काले धन के अंबार को ठिकाने लगाने में सहायता करते हैं ! उन वकीलों से भी जिरह होनी चाहिए जो एक पेशी के दसियों लाख की रकम ले, जान-बूझ कर देश द्रोहियों, हत्यारों, कुकर्मियों, जालसाजों, भ्रष्टाचारियों के लिए झूठ को सच का जामा पहन  कानून की पतली गलियों से बचा निकाल ले जाते हैं ! उन पुलिस और कलेक्टर को भी जिम्मेदार मान उन पर कार्यवाही होनी चाहिए, जिनके क्षेत्र में  दंगे-फसाद या कोई भी गंभीर गैर कानूनी हरकतें होती हैं ..........!!         

आखिर दिल्ली के बेहद नजदीक, उत्तर प्रदेश के नोएडा के सेक्टर 93-A  में, 102 मीटर ऊँचे, दबंगई, भ्रष्टाचार, रसूख, धनबल के प्रतीक जुड़वां टॉवरों को जमींदोज कर ही दिया गया ! संरचना में दो जुड़वां टॉवर बने हुए थे, जिनमें एक की ऊंचाई 102 मीटर और दूसरे की 95 मीटर थी ! 32 मंजिला इस इमारत को बनाने में करीब तेरह साल का समय, सैंकड़ों कर्मियों का योगदान तथा तकरीबन 300 करोड़ रुपये खर्च हुए थे ! केस वगैरह ना होते तो आज इसकी कीमत 1000 करोड़ के आस-पास होती !  

नोएडा के जुड़वां स्तूप 

ऐसा कहा जा रहा है कि इन स्तूपों को गिराना भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ा संदेश है ! अच्छी बात है ! इसके साथ ही यह भी आभास मिल रहा है कि दृढ इच्छाशक्ति हो तो तेरह साल के भ्रष्टाचार को तेरह सेकेंड में खत्म किया जा सकता है ! पर क्या सिर्फ विष-वृक्ष का तना काट देने से समस्या का निदान हो जाएगा ? जितना ऊँचा यह टॉवर था उससे कहीं गहरी हैं, दुराचरण की जड़ें हमारे देश में ! आज इतने छापे पड़ रहे हैं ! इतनी धर-पकड़ हो रही है ! आरोपियों के घरों से रद्दी कागजों के ढेर की तरह नोटों के टीले बरामद हो रहे हैं ! पर ना लालच खत्म होता दिखता है, नाहीं कहीं कानून का डर काबिज होता नजर आ रहा है !  

आज एक रोजगार से परेशान आम इंसान कहीं एक ठेला लगा ले तो दिन भर में मक्खियों की तरह निगम वाले, पुलिस वाले, सड़क वाले, कार्पोरेशन वाले और ना जाने कौन-कौन अपना रौब गाँठ कर उसको एक मिनट टिकने नहीं देंगे ! क्योंकि वह समाज की सबसे पिछली कतार में खड़ा होने वाला एक अशक्त, बेसहारा, जीव मात्र है ! और इधर तेरह साल तक एक निर्माण होता रहा और उन्हीं रौबीले कारिंदों को ना कुछ दिखाई दिया और ना ही सुझाई ! सुना तो यह जा रहा है कि कोर्ट के निर्देश के बावजूद बिना किसी खौफ के काम जारी रहा ! किसका इतना सशक्त वरदहस्त निर्माता के सर पर था कि वह कानून को भी धत्ता बताता चला गया ! अब इमारत तो गिर गई ! गिरते-गिरते भी तीस करोड़ की चपत लगा गई ! उसके साथ ही उसमें खर्च हुए देश के संसाधन, पैसे, समय और जनबल भी धूल-धूएं-मलबे में बदल कर रह गए ! पता नहीं निर्माता कंपनी का क्या हुआ ! यह भी नहीं पता कि इस सजा से लोग सबक लेंगे भी कि नहीं ! क्योंकि नियम-कानून पर अपराध भारी पड़ता दिखता है ! लोग बिना किसी डर-भय के अनैतिक कार्य करते चले जा रहे हैं ! 

आज यदि देश-समाज-लोगों में कानून का रौब, खौफ, दहशत तारी करना है तो जड़ों पर प्रहार को करना होगा ! उस खाद-पानी का परिमार्जन करना होगा जो भ्रष्टाचार को पल्ल्वित-पुष्पित होने में सहायक होते हैं ! अपराधियों के साथ ही उन डाक्टरों पर भी नकेल कसी जानी चाहिए जो शिकंजे में फंसे अपने आकाओं को बताते हैं कि कोर्ट के कितनी दूर जाने पर उनको हार्ट अटैक आएगा या कितने दिन पूछ-ताछ पर उनकी यादाश्त चली जाएगी ! उन सी. ए. और आर्थिक सलाहकारों से भी पूछ-ताछ होनी चाहिए जो अपने सरपरस्तों के काले धन के अंबार को ठिकाने लगाने में सहायता करते हैं ! उन वकीलों से भी जिरह होनी चाहिए जो एक पेशी के दसियों लाख की रकम ले, जान-बूझ कर देश द्रोहियों, हत्यारों, कुकर्मियों, जालसाजों, भ्रष्टाचारियों के लिए झूठ को सच का जामा पहना कानून की पतली गलियों से बचा निकाल ले जाते हैं ! कहते हैं कि यदि पुलिस चाहे तो किसी आम नागरिक के घर से कोई झाड़ू तक नहीं चुरा सकता ! तो क्यों नहीं घटना ग्रस्त इलाके का जिम्मेदार वहाँ के कोतवाल को माना जाता ! यदि सरकार विधान बना दे कि किसी भी घटना की जिम्मेदारी वहाँ के थाने और उसके स्टाफ की होगी तो क्या मजाल है कि अपराधी तो क्या चिड़िया भी पर मार जाए या इस तरह देश के संसाधनों और पैसे की बर्बादी हो जाए ! 

माना यह सब कहना-सुनना बहुत आसान है, पर इसको कार्यान्वित करना जरा मुश्किल तो है, पर नामुमकिन कतई नहीं है ! सिर्फ देश प्रेम की भावना और दृढ इच्छाशक्ति की जरुरत है ! कोई ना कोई रास्ता जरूर निकलेगा, निकालना ही होगा जिससे अपराधियों के मन में खौफ जगह बना सके ! कुछ भी गलत करने के पहले उसे दस बार सोचना पड़े ! उसे भविष्य के महलों के ख्वाब से पहले वर्तमान की जेल की सलाखें नजर आएं ! जेल जाते-आते महानुभाव हाथ उठा विजय चिन्ह ना बना सर झुका कर हमारे सामने से निकलें ! उनके वंशधर हिम्मत ना कर सकें कभी सत्ता की कुर्सी की तरफ आँख उठा देखने की ! इसके लिए धर्म-भाषा-जाति से ऊपर उठ कुछ बदलाव तो हमें भी अपने में लाने होंगे ! गलत बातें होते देख मन ही मन कुढ़ने की बजाए आक्रोश तथा विरोध तो जाहिर करना ही होगा ! नहीं तो ऐसे ही निर्माण गिर-गिर कर फिर-फिर बनते रहेंगे !

16 टिप्‍पणियां:

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना  ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" मंगलवार 30 अगस्त 2022 को साझा की गयी है....
पाँच लिंकों का आनन्द पर
आप भी आइएगा....धन्यवाद!

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

यशोदा जी
सम्मिलित करने हेतु अनेकानेक धन्यवाद 🙏🏻

Kamini Sinha ने कहा…

सादर नमस्कार ,

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (30-8-22} को "वीरानियों में सिमटी धरती"(चर्चा अंक 4537) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
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कामिनी सिन्हा

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

कामिनी जी
रचना को मान देने हेतु अनेकानेक धन्यवाद 🙏🏻

Jyoti Dehliwal ने कहा…

गगन भाई, यहीं तो विडम्बना है कि हम इस बात की खुशी मन रहे है कि करोड़ो के भ्रष्टाचार की इमारत जमींदोस्त हो गई। लेकिन उन बिल्डरों या संबन्धित अधिकारियों का क्या हुआ जिन्होंने ये कार्य किया? उन 900 परिवारों की असुविधा उनको हुई परेशानी का क्या जो उस इमारत में रहते थे? ऐसे कई सवाल है जिनके कोई जवाब नहीं है।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

ज्योति जी
कोई और विकल्प भी खोजा जा सकता था ! पर जरूर कोई अड़चन होगी ! तरह साल तो इसी में लग गए थे ! एक हजार करोड़ की राशि, देश के संसाधन, समय, श्रमशक्ति सब सेकेंडों में धुंए और धूल के गुबार में बदल के रह गए पर साथ ही यह संदेश भी जरूर गया कि बस अब और नहीं ! पर दूसरी ओर रोज ही किसी न किसी कदाचारी के यहां से, कागज की रद्दी की तरह नोटों का अंबार हासिल हो रहा है ! जिससे लगता है कि रसूखदारों ने कानून व्यवस्था को खेल समझ रखा है ! चाणक्य के पैर में जब काँटा चुभा तो उन्होंने सबसे पहले जड़ को ख़त्म किया ! उसी तरह अपराधियों के सलाहकारों पर पहले गाज गिरनी चाहिए !

कविता रावत ने कहा…

तेरह साल से शासन-प्रशासन आँख मूंदें रखा. समय से नींद क्यों नहीं खुलती इनकी ..

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

कविता जी
वही तो, जिन्होंने आंखों पर नोटों की पट्टी बाँध रखी थी, सवाल उनसे भी होने चाहिएं और जरूर होने चाहिए

रेणु ने कहा…

गगन जी,इस मर्मांतक प्रकरण ने देश को सोचने पर मजबूर कर दिया कि ये सही है या वो सही।ये भ्रष्टाचार का भवन एक दिन में तो बनकर तैयार नहीं हुआ।इसकी बुनियाद रखने के दिन से ही में कई घूसखोरो की चाँदी हुई होगी।बिल्डर की अपनी मजबूरियाँ होती होगी। इमारतें बनाने में किस-किस कीजेब गर्म होती है ये सबको पता है।तेरह वर्ष में बस जुबानी जंग चली।और इतने दिनों में इमारत पूरी तरह से और भी उँचाई तक पहुँच गयीं।अब इसे मिटाकर न्यायपालिका और प्रशासन अपनी पीठ थपथपा रहे।जरुरी है सभी तथ्यों की पड़ताल और हर दोषी के खिलाफ कार्रवाई।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

रेणु जी
पूरी तरह सहमत! सब चलता है वाली मानसिकता खत्म होनी ही चाहिए..! कानून का खौफ हर कदाचारी के मन में पैबस्त होना जरूरी है

संजय भास्‍कर ने कहा…

कोई और विकल्प भी खोजा जा सकता था

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

संजय जी
हो सकता है कोई अडचन आ रही हो, जमीन उन्हीं ठेकेदारों की है

रंजू भाटिया ने कहा…

अब यह डर बना रहे तो कामयाबी है।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

रंजू जी
जरूरी भी है

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

व्यवस्था जब तक नहीं बदली जाएगी कुछ नहीं बदलने वाला । सार्थक लेख ।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

संगीता जी
बिलकुल सही बात!शुरुआत हमें खुद से ही करनी होगी

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