मंगलवार, 16 नवंबर 2021

न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी ! ऐसा क्यों ?

ऐसा भी हो सकता है कि पेमेंट को ले कर मामला फंस गया हो ! वहां ग्रामीण भाई कुछ नगद और कुछ राशन वगैरह दे कर आयोजन करवाना चाहते हों, पर राधा के सचिव ने पूरा कैश लेना चाहा हो ! बात बनते ना देख उसने इतने तेल की डिमांड रख दी हो, जो पूरे गांव के भी बस की बात ना हो ! वैसे किस तेल की फर्माईश की गई थी, इसका भी पता नहीं चल पाया है......!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कुछ अजीब सा नहीं लगता ! नाच और तेल का आपस में क्या संबंध ! फिर यह कैसी शर्त ! नौ मन तेल तो नहीं, पर दिमाग का तेल निकालने के बाद कुछ ऐसा समझ में आया कि हो सकता है कि ये राधा जी कोई बड़ी जानी-मानी डांसिंग स्टार होंगी और किसी अप्रख्यात जगह से उन्हें बुलावा आया होगा। शायद उस जगह अभी तक बिजली नहीं पहुंची हो और वहां सारा कार्यक्रम मशाल वगैरह की रोशनी में संम्पन्न होना हो। इस बात का पता राधा एण्ड पार्टी को वेन्यू पहुंच कर लगा हो और अपनी प्रतिष्ठा के अनुकूल किसी चीज ना पा कर आर्टिस्टों का मूड उखड़ गया हो ! किसी भी तरह के बखेड़े से बचने के लिए ऐसी शर्त रख दी गई हो, जिसे तत्काल पूरा कर पाना गांव वालों के बस की बात ना हो ! पर फिर यह सवाल उठता है कि नौ मन तेल ही क्यूं ? राउंड फिगर में दस या पंद्रह मन क्यों नहीं ? तो हो सकता है कि यह आंकड़ा काफी दर-मोलाई के बाद फिक्स हुआ हो !

ऐसा भी हो सकता है कि पेमेंट को ले कर मामला फंस गया हो। वहां ग्रामीण भाई कुछ नगद और कुछ राशन वगैरह दे कर आयोजन करवाना चाहते हों पर राधा के सचिव वगैरह ने पूरा कैश लेना चाहा हो। बात बनते ना देख उसने इतने तेल की डिमांड रख दी हो, जो पूरे गांव के भी बस की बात ना हो !

ऐसे में मुहावरे का लब्बो-लुआब यही निकलता है कि एक ख्यातनाम ड़ांसिंग स्टार अपने आरकेस्ट्रा के साथ किसी छोटे से गांव में अपना प्रोग्राम देने पहुंचीं। उन दिनों मैनेजमेंट गुरु जैसी कोई चीज तो होती नहीं थी सो गांव वालों ने अपने हिसाब से प्रबंध कर लिया था और यह व्यवस्था "राधा एण्ड कंपनी" को रास नहीं आई। पर उन लोगों ने गांव वालों को डायरेक्ट मना करने की बजाय अपनी एण्ड-बैण्ड शर्त रख दी होगी। जो उस हालात और वहां के लोगों के लिये पूरा करना नामुमकिन होगा। इस तरह वे जनता के आक्रोश और अपनी बदनामी दोनों से बचने में सफल हो गए होंगे।

वैसे किस तेल की फर्माईश की गई थी, इसका भी पता नहीं चल पाया है ! पर इस घटना के बाद इस तरह के समारोह करवाने वाले अन्य व्यवस्थाओं के साथ-साथ नौ-दस मन तेल का भी इंतजाम कर रखने लग गए होंगे ! क्योंकि फिर कभी राधा जी और तेल के नए आंकड़ों की खबर सुनने में नहीं आई है !
इस बारे में नई जानकारियों का स्वागत है ! 

गुरुवार, 11 नवंबर 2021

मूल से अधिक प्यारा ब्याज, ऐसा क्यों

जो लोग अपने बच्चों के बचपन के क्रिया-कलापों को पास से देखने से किसी भी कारणवश वंचित रह जाते हैं, उनके लिए अपने नाती-पोते-पोतियों की गतिविधियों को देख पाना किसी दैवीय वरदान से कम नहीं होता ! यही वह अलौकिक सुख है, जिसकी खातिर उनका प्रेम, उनका स्नेह, उनका वात्सल्य, सब अपनी इस पीढ़ी पर न्योछावर हो जाता है ! फिर से जीवन के प्रति लगाव महसूस होने लगता है। शायद प्रकृति के अस्तित्व को बनाए रखने, मानव  जाति को बचाए रखने, कायनात को चलाए रखने के लिए ही परम पिता ने इस मोह की माया को रचा हो............!    

#हिन्दी_ब्लागिंग 

किसी इंसान के दादा-दादी बनने पर उनके अपने नाती-पोते-पोतियों से स्नेह-अनुराग को लेकर, ज्यादातर उत्तर भारत में प्रचलित एक कहावत है कि ''मूल से ब्याज ज्यादा प्यारा होता है।'' इसका कतई यह मतलब नहीं है कि उसे अपने बच्चों से लगाव नहीं होता ! पर काम का बोझ, पारिवारिक दायित्व व जिम्मेदारियां, जीवन में कुछ कर गुजरने की ख्वाहिशें, चाहते हुए भी, उसे इतना समय ही नहीं देतीं कि वह प्रभु-प्रदत्त इस नियामत के बढ़ने-फलने-फूलने का पूरा आनंद उठा सके। पर अपनी इस तीसरी पीढ़ी तक पहुंचते-पहुंचते वह काफी हद तक दायित्वमुक्त हो चुका होता है। काफी कुछ हासिल कर चुका होता है ! पहले की तरह जीवन में आपाधापी नहीं रह जाती ! सो अफरात समय भी उपलब्ध रहता है। इसी से जब वह प्रभु की इस अद्भुत, अप्रतिम, सर्वोत्तम कृति को शिशु रूप में अठखेलियां करते देखता है, जो वह अपने समय में नहीं देख पाया थाा, तो वह अचंभित, मुग्ध व चित्रलिखित सा हो मोह में बंध कर रह जाता है। 

सुबह जब वह चेहरे पर मुस्कान लिए, डगमगा के चलती हुई, अपनी भाषा में कुछ बतियाती आती है तो लगता है जैसे प्रभु की कृपा साक्षात सामने आ खड़ी हुई हो 

कहा जाता है कि बच्चे प्रभु का रूप होते हैं ! पर प्रभु को भी इस धरा को, प्रकृति को, सृष्टि को बचाने के लिए कई युक्तियों तथा नाना प्रकार के हथकंडों का सहारा लेना पड़ा था ! पर निश्छल व मासूम शैशव, चाहे वह किसी भी प्रजाति का हो, छल-बल, ईर्ष्या-द्वेष, तेरा-मेरा सबसे परे होता है, इसीलिए वह सबसे अलग होता है, सर्वोपरि होता है। भगवान को तो फिर भी इंसान को चिंतामुक्त करने में कुछ समय लग जाता होगा, पर घर में कैसा भी वातावरण हो, तनाव हो, शिशु की एक किलकारी सबको उसी क्षण तनावमुक्त कर देती है। गोद में आते ही उसकी एक मुस्कान बड़े से बड़े अवसाद को तिरोहित करने की क्षमता रखती है। उसकी बाल सुलभ हरकतें, अठखेलियां, जिज्ञासु तथा बड़ों की नक़ल करने की प्रवृति, किसी को भी मंत्रमुग्ध करने के लिए काफी होती हैं। उसकी अपने आस-पास की चीजों से तालमेल बैठाने की सफल-असफल कोशिशें कठोर से कठोर चहरे पर भी मुस्कान की रेख खिंच देने में कामयाब रहती हैं। 

इसीलिए वे या वैसे लोग जो अपने बच्चों के बचपन के क्रिया-कलापों को पास से देखने से किसी भी कारणवश वंचित रह गए थे, उनके लिए तो अपने पौत्र-पौत्रियों की गतिविधियों को देख पाना किसी दैवीय वरदान से कम नहीं होता ! यही वह अलौकिक सुख है जिसकी खातिर उनका प्रेम, उनका स्नेह, उनका वात्सल्य, सब अपनी इस पीढ़ी पर न्योछावर हो जाता है। फिर से जीवन के प्रति लगाव महसूस होने लगता है। शायद प्रकृति के अस्तित्व को बनाए रखने, मानव  जाति को बचाए रखने, कायनात को चलाए रखने के लिए ही माया ने इस मोह को रचा हो !   

मैं भी उसी श्रेणी से संबद्धित हूँ, इसीलिए यह कह पा रहा हूँ ! अपनी डेढ़ वर्ष की पौत्री की बाल चेष्टाओं, उसकी गतिविधियों, उसकी मासूमियत भरी हरकतें देख यह अहसास होता है कि जिंदगी की जद्दोजहद में क्या कुछ खो दिया था ! किस नियामत से वंचित रह गया था ! उपलब्धियों की चाहत में कितना कुछ अनुपलब्ध रह गया था ! पर आज दिल की गहराइयों से प्रभु का शुक्रगुजार हूँ कि समय रहते उन्होंने मुझे इस दैवीय सुख से परिचित करवा दिया ! सुबह जब वह चेहरे पर मुस्कान लिए, डगमगा के चलती हुई, अपनी भाषा में कुछ बतियाती आती है तो लगता है जैसे प्रभु की कृपा साक्षात सामने आ खड़ी हुई हो ! पर इसके साथ ही कभी-कभी एक अजीब सी ,बेचैनी, एक अलग सा भाव, कुछ खो जाने का डर भी महसूसने लगता हूँ ! क्योंकि यह तुतलाती जुबां, डगमगाती चाल, अठखेलियां, मासूम हरकतें समय के चंगुल से कहाँ बच पाएंगी ! फिर वही पाठ्यक्रमों का बोझ, स्कूलों की थकान भरी बंदिशें, दुनियावी प्रतिस्पर्द्धा और ना जाने क्या-क्या हावी होती चले जाएंगे ! पर कुछ किया भी तो नहीं जा सकता जग की इस रीत के विपरीत...............!! 

जी तो करता है कि इसकी मासूमियत, निश्छलता, भोलापन यूँ ही बने रहें ! इसी तरह अपनी तोतली भाषा में हमसे बतियाती रहे ! इसी तरह सुबह डगमगाती हुई आ गोद में चढने की जिद करती रहे ! यूँ ही इसकी किलकारियों से घर गुंजायमान रहे ! पर समय.....! किसका वश चल पाया है उस पर ! इसीलिए कोशिश करता हूँ कि इन पलों को बाँध के रख लूँ ! या फिर जितना ज्यादा हो सके, समेटता ही चला जाऊं, समेटता ही चला जाऊं, और सहेज के रख लूँ दिलो-दिमाग के किसी बहुत ही सुरक्षित कोने में, धरोहर बना कर ! 

शुक्रवार, 5 नवंबर 2021

नरक चतुर्दशी, नरकासुर वध

समर के दौरान प्रभु लीला के तहत एक बाण श्री कृष्ण जी की बांह को छू गया ! जिससे क्रुद्ध हो सत्यभामा ने, जो खुद भी युद्ध में पारंगत थीं, अस्त्र उठा कर नरकासुर पर प्रहार कर उसका वध कर डाला ! लेकिन मरते हुए, नरकासुर ने अपनी माँ से वरदान मांगा कि संसार उसे दुर्भाव से नहीं बल्कि खुशी से याद करे और हर साल उसकी मृत्यु के दिन पर उत्सव मनाया जाए। उसी वरदान के तहत दिवाली के एक दिन पहले नरक चतुर्दशी का समारोह मनाया जाता है..............!

#हिन्दी_ब्लागिंग  

इंसान के लिए जो बात या घटना अप्रत्याशित, असंभावित या आकस्मिक होती है वही बात जगत रचयिता के विधि लेखन का पूर्वनियोजित हिस्सा होती है ! हमारी पृथ्वी की गोलाई की तरह ही यहां पर घटने वाली हर बातें, विषय, घटनाएं, वाकये सब सुनियोजित हो किसी ना किसी तरह, गोल-गोल एक दूसरे से जुड़े होते हैं। इंसान जिस घटना पर अवाक रह जाता है वह वर्षों पहले नियंता द्वारा रची जा चुकी होती है !

अब नरकासुर की ही बात लें, जिसे ब्रह्मा जी द्वारा वरदान मिला हुआ था कि उसका अंत उसकी माँ के ही हाथों होगा ! अब अपने बच्चे को कौन माँ मार सकती है ! इसी से निश्चिंत हो नरकासुर यानी भौमासुर ने सत्ता और ताकत के नशे में चूर हो, सभी राजाओं और देवताओं को तो पराजित किया ही, इंद्र को हरा कर अमरावती पर भी अपना कब्जा कर लिया। उसने देवताओं की माता अदिती की बालियां चुराने और 16000 राजकुमारियों का अपहरण करने तक की धृष्टता कर डाली ! उस समय वह प्राग्ज्योतिष यानी कामरूप नगर का राजा था ! इस जगह ब्रह्मा जी ने नक्षत्रों का निर्माण किया था, इसीलिए यह प्राक् (प्राचीन या पूर्व) और ज्योतिष (नक्षत्र) कहलाती थी, जो आज असम के गुवाहाटी के नाम से जानी जाती है। 

कथा लेखक को तो अपनी कहानी का हर पहलू ज्ञात होता है पर पढ़ने-सुनने वाले को उसके उतार-चढ़ाव का कुछ भी अंदाजा नहीं होता ! जब नरकासुर को उसकी तपस्या के एवज में वरदान दिया गया था, तभी साथ ही उसके अंत की भी व्यवस्था कर दी गई थी ! पर कथानक इतना सीधा-सपाट नहीं था ! पेच ओ खम से भरा हुआ था ! कई तरह के उतार-चढ़ाव थे ! तरह-तरह की विषम परिस्थितियों का समावेश था। कथा में माँ-बेटे के संघर्ष के द्वारा इंसान को समझाने की कोशिश है कि पृथ्वी ही हमारी माता है ! वही हमारा पोषण करती है ! हमें जीवनयापन में सहयोग करती है ! इसलिए हमें उस पर अपना अधिकार या स्वामित्व नहीं जताना चाहिए ! बल्कि उसके आदर-सम्मान के साथ ही उसके संरक्षण की जिम्मेदारी भी मानवता की ही बनती है !     

नरकासुर कोई मामूली या साधारण राक्षस नहीं था। वह श्री विष्णु और भू देवी का पुत्र था। पुराणों में विवरण है कि एक बार राक्षस हिरण्याक्ष ने पृथ्वी देवी का अपहरण कर उन्हें समुद्र तल में ले जा कर कैद कर लिया था। तब विष्णु जी ने वराह का अवतार ले उनका उद्धार किया था ! सागर तल से ऊपर आने के दौरान उन दोनों के संयोग से भौमासुर का जन्म हुआ था ! देवी ने तभी से विष्णु जी को अपना पति मान लिया था ! समय के साथ पृथ्वी देवी के एक अवतार ने सत्यभामा के रूप में राजा सत्राजित के घर जन्म लिया। स्यमंतक मणि को ले कर काफी जद्दोजहद हुई ! इसी के लिए श्री कृष्ण को जामवंत जी की बेटी जामवंती से विवाह भी करना पड़ा ! पर अंततोगत्वा उनका विवाह सत्यभामा से भी हुआ, जो होना ही था !

इधर जब नरकासुर का अत्याचार बहुत बढ़ गया तो देवता व ऋषि-मुनियों ने भगवान श्रीकृष्ण की शरण में जा उनसे नराकासुर से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की ! चूँकि नरकासुर को अपनी माँ के हाथों ही मरना था, इसलिए प्रभु ने अपनी पत्नी सत्यभामा को भी, जो पृथ्वी का अवतार थीं, युद्ध में साथ ले लिया ! समर के दौरान प्रभु लीला के तहत एक बाण श्री कृष्ण जी की बांह को छू गया ! जिससे क्रुद्ध हो सत्यभामा ने, जो खुद भी युद्ध में पारंगत थीं, अस्त्र उठा कर नरकासुर पर प्रहार कर उसका वध कर डाला ! लेकिन मरते हुए, नरकासुर ने अपनी माँ से वरदान मांगा कि संसार उसे दुर्भाव से नहीं बल्कि खुशी से याद करे और हर साल उसकी मृत्यु के दिन पर उत्सव मनाया जाए। उसी वरदान के तहत दिवाली के एक दिन पहले नरक चतुर्दशी का समारोह मनाया जाता है !
उत्तर भारत में नरक चतुर्दशी को "छोटी दिवाली" के रूप में मनाया जाता है, लेकिन दक्षिण भारत में नरक चतुर्दशी, दीपावली पर्व का मुख्य त्योहार है। पर जहां उत्तर भारतीय अवाम, सीता जी के साथ श्री राम की वापसी का जश्न मनाता है, वहीं दक्षिण भारतीय नागरिक नरकासुर वध के उपलक्ष्य में उत्सव मनाते हैं। बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न और मनाने की  शैली एक होने के बावजूद दिन अलग-अलग होते हैं !

श्रीकृष्ण जी ने कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को नरकासुर का वध कर देवताओं व संतों को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई थी ! उसी की खुशी में दूसरे दिन अर्थात कार्तिक मास की अमावस्या को लोगों ने अपने घरों में दीए जलाए, आतिशबाजी की, खुशियां मनाईं ! तभी से नरक चतुर्दशी पर दीपावली का त्योहार मनाया जाने लगा। 

सोमवार, 1 नवंबर 2021

मैं छत्तीसगढ हूं

 मेरे नाम में आंकड़े जरूर  "36"  के हैं पर प्रेम से भरे मेरे मन की यही इच्छा है कि मैं सारे देश में एक ऐसे आदर्श प्रदेश के रूप में जाना जाऊं,  जहां किसी के साथ भेद-भाव नहीं बरता जाता हो, जहां किसी को अपने परिवार को पालने में बेकार की जद्दोजहद नहीं करनी पडती हो, जहां के लोग सारे देशवासियों को अपने परिवार का सदस्य समझें।  जहां कोई भूखा न सोता हो, जहां तन ढकने के लिए कपडे और सर छुपाने के लिए छत सब को मुहैय्या हो। मेरा यह सपना दुर्लभ भी नहीं है। यहां के रहवासी हर बात में सक्षम हैं। यूंही उन्हें  #छत्तीसगढ़िया_सबले_बढ़िया का खिताब हासिल नहीं हुआ है .....................................


#हिन्दी_ब्लागिंग
 

मैं #छत्तीसगढ हूं ! आज एक नवम्बर है । 21 साल के एक ऐसे सक्षम, कर्मठ, स्वाबलंबी, युवा की जन्मतिथि ! जो सदा कुछ कर गुजरने, सपनों को हकीकत में बदलने तथा देश के प्रति समर्पित रहने को प्रतिबद्ध है ! आज सुबह से ही आपकी शुभकामनाएं, प्रेम भरे संदेश और भावनाओं से पगी बधाईयां पा कर अभिभूत हूं। मुझे याद रहे ना रहे पर आप सब को हमेशा मेरा जन्मदिन याद रहता है ! यह मेरा सौभाग्य है। किसी देश या राज्य के लिए 20-21 साल समय का बहुत बड़ा काल-खंड नहीं होता। पर मुझे संवारने-संभालने, मेरे रख-रखाव, मुझे दिशा देने वालों ने इतने कम समय में ही मेरी पहचान देश में ही नहीं, विदेशों में भी बना कर एक मिसाल कायम कर दी है। मुझे इससे कोई मतलब नहीं है कि मेरी बागडोर किस पार्टी के हाथ में है ! मेरी यही कामना रहती है, जो भी यहां की जनता की इच्छा से राज संभालता है उसका लक्ष्य एक ही होना चाहिए कि छत्तीसगढ के वासी अमन-चैन के साथ, एक दूसरे के सुख-दुख के साथी बन, बिना किसी डर, भय, चिंता या अभाव के अपना जीवन यापन कर सकें। मेरा सारा प्रेम, लगाव, जुडाव सिर्फ और सिर्फ यहां के बाशिंदों के साथ ही है। 
मैं 


वन-संपदा, खनिज, धन-धान्य से परिपूर्ण मेरी रत्नगर्भा धरती का इतिहास दक्षिण-कौशल के नाम से रामायण और महाभारत काल में भी जाना जाता रहा है। वैसे यहां एक लंबे समय तक कल्चुरी राज्यवंश का आधिपत्य रहा है। पर मध्य प्रदेश परिवार से जुडे रहने के कारण मेरी स्वतंत्र छवि नहीं बन पाई थी और देश के दूसरे हिस्सों के लोग मेरे बारे में बहुत कम जानकारी रखते थे। आप को भी याद ही होगा जब मुझे मध्य प्रदेश से अलग अपनी पहचान मिली थी तो देश के दूसरे भाग में रहने वाले लोगों को मेरे बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी ! जिसके कारण देश के विभिन्न हिस्सों में मेरे प्रति कई तरह की भ्रांतियां पनपी हुई थीं ! दूसरे प्रांतों के लोग मुझे एक पिछड़ा प्रदेश और यहां के आदिवासियों के बारे में अधकचरी जानकारी रखते थे । इस धारणा को बदलने में समय तो लगा, मेहनत करनी पड़ी, जितने भी साधन उपलब्ध थे उनका उचित प्रयोग किया गया, धीरे-धीरे तस्वीर बदलने लगी जिसका उल्लेख यहां से बाहर जाने वालों से या बाहर से यहां घूमने आने वाले लोगों की जुबानी देशवासियों में होने लगा।अब यहां से बाहर जाने वालों से या बाहर से यहां घूमने आने वाले लोगों को मुझे देखने-समझने का मौका मिलता है तो उनकी आंखें खुली की खुली रह जाती हैं। उन्हें विश्वास ही नहीं होता कि परिपक्वता के द्वार पर खड़ा मैं, इतने कम समय में, सीमित साधनों के और ढेरों अडचनों के बावजूद इतनी तरक्की कर पाया हूं। वे मुझे देश के सैंकडों शहरों से बीस पाते हैं। मुझे संवारने-संभालने, मेरे रख-रखाव, मुझे दिशा देने वालों ने इतने कम समय में ही मेरी पहचान देश ही नहीं विदेशों में भी बना कर एक मिसाल कायम कर दी है।


इतना सब होने के बावजूद कईयों की जिज्ञासा होती है मेरी पहचान बनने के पहले का इतिहास जानने की ! मैं क्या था ? कैसा था ? कौन था ? तो उन सब को नम्रता पूर्वक यही कहना चाहता हूं कि जैसा था वैसा हूं ! यहीं था ! यहीं हूं। फिर भी सभी की उत्सुकता शांत करने के लिए कुछ जानकारी बांट ही लेता हूं। सैंकडों सालों से मेरा विवरण इतिहास में मिलता रहा है। मुझे दक्षिणी कोसल के रूप में जाना जाता रहा है। रामायण काल में मैं माता कौशल्या की भूमि के रूप में ख्यात था। मेरा परम सौभाग्य है कि मैं किसी भी तरह ही सही, प्रभू राम के नाम से जुडा रह पाया। कालांतर से नाम बदलते रहे, अभी की वर्तमान संज्ञा "छत्तीसगढ" के बारे में विद्वानों की अलग-अलग राय है। कुछ लोग इसका कारण उन 36 किलों को मानते हैं जो मेरे अलग-अलग हिस्सों में कभी रहे थे, पर आज उनके अवशेष नहीं मिलते। कुछ जानकारों का मानना है कि यह नाम कल्चुरी राजवंश के चेडीसगढ़ का ही अपभ्रंश है।



भारतीय गणराज्य में 31 अक्टूबर 1999 तक मैं मध्य प्रदेश के ही एक हिस्से के रूप में जाना जाता था। पर अपने लोगों के हित में, उनके समग्र विकास हेतु मुझे  अलग राज्य का दर्जा प्राप्त हो गया। इस मुद्दे पर मंथन तो 1970 से ही शुरु हो गया था ! पर गंभीर रूप से इस पर विचार 1990 के दशक में ही शुरु हो पाया ! जिसका प्रचार 1996 और 1998 के चुनावों में अपने शिखर पर रहा ! जिसके चलते अगस्त 2000 में मेरे निर्माण का रास्ता साफ हो सका। इस ऐतिहासिक घटना का सबसे उज्जवल पक्ष यह था कि इस मांग और निर्माण के तहत किसी भी प्रकार के दंगे-फसाद, विरोधी रैलियों या उपद्रव इत्यादि के लिए कोई जगह नहीं थी। हर काम शांति, सद्भावना, आपसी समझ और गौरव पूर्ण तरीके से संपन्न हुआ। इसका सारा श्रेय यहां के अमन-पसंद, भोले-भाले, शांति-प्रिय लोगों को जाता है जिन पर मुझे गर्व है। 



आज मेरे सारे कार्यों का संचालन मेरी "राजधानी रायपुर" से संचालित होता है। समय के साथ इस शहर में तो बदलाव आया ही है पर राजधानी होने के कारण बढ़ती, लोगों की आवाजाही, नए कार्यालय, मंत्रिमंडलों के काम-काज की अधिकता इत्यादि को देखते हुए नए रायपुर का निर्माण भी किया गया है। अभी की राजधानी रायपुर से करीब बीस की. मी. की दूरी पर यह मलेशिया के "हाई-टेक" शहर पुत्रजया की तरह निर्माणाधीन है। जिसके पूर्ण होने पर मैं गांधीनगर, चंडीगढ़ और भुवनेश्वर जैसे व्यवस्थित और पूरी तरह प्लान किए गए शहरों की श्रेणी में शामिल हो जाऊंगा।



मुझे कभी भी ना तो राजनीति से कोई खास लगाव रहा है नाहीं ऐसे दलों से। मेरा सारा प्रेम, लगाव, जुडाव सिर्फ और सिर्फ यहां के बाशिंदों के साथ ही है। कोई भी राजनीतिक दल आए, मेरी बागडोर किसी भी पार्टी के हाथ में हो उसका लक्ष्य एक ही होना चाहिए कि छत्तीसगढ के वासी अमन-चैन के साथ, एक दूसरे के सुख-दुख के साथी बन, यहां बिना किसी डर, भय, चिंता या अभाव के अपना जीवन यापन कर सकें। मेरे नाम में आंकड़े जरूर "36" के हैं पर प्रेम भरे मेरे मन की यही इच्छा है  कि मैं सारे देश में एक ऐसे आदर्श प्रदेश के रूप में जाना जाऊं, जो देश के किसी भी कोने से आने वाले देशवासी का स्वागत खुले मन और बढे हाथों से करने को तत्पर रहता है। जहां किसी के साथ भेद-भाव ना बरता जाता, जहां किसी को अपने परिवार को पालने में बेकार की जद्दोजहद नहीं करनी पडती, जहां के लोग सारे देशवासियों को अपने परिवार का समझ, हर समय, हर तरह की सहायता प्रदान करने को तत्पर रहते हैं। जहां कोई भूखा नहीं सोता, जहां तन ढकने के लिए कपडे और सर छुपाने के लिए छत मुहैय्या करवाने में वहां के जन-प्रतिनिधि सदा तत्पर रहते हैं। मेरा यह सपना कोई बहुत दुर्लभ भी नहीं है क्योंकि यहां के रहवासी हर बात में सक्षम हैं। यूंही उन्हें "छत्तीसगढिया सबसे बढिया" का खिताब हासिल नहीं हुआ है।  



मेरे साथ ही भारत में अन्य दो राज्यों, उत्तराखंड तथा झारखंड भी अस्तित्व में आए हैं और उन्नति के मार्ग पर अग्रसर हैं। मेरी तरफ से आप उनको भी अपनी शुभकामनाएं प्रेषित करें, मुझे अच्छा लगेगा।  फिर एक बार आप सबको धन्यवाद देते हुए मेरी एक ही इच्छा है कि मेरे प्रदेश वासियों के साथ ही मेरे देशवासी भी असहिष्णुता छोड़ एक साथ प्रेम, प्यार और भाईचारे के साथ रहें।  हमारा देश उन्नति करे, विश्व में हम सिरमौर हों।
जयहिंद। जय छत्तीसगढ़ !  

@सभी चित्र अंतर्जाल से साभार  

मंगलवार, 26 अक्टूबर 2021

जूते भी OTP मांगने लगे हैं

हालात के चलते कहीं भी आना-जाना न होने के कारण, इन तक़रीबन दो सालों से जूते-मौजे की जहमत से बचने के लिए चप्पल-सैंडल से ही काम चलता रहा है ! पर जब खेल का मौका मिला तो उससे संबंधित जूतों की खोज-खबर ली गई ! एक ने तो पहचानने से ही साफ इंकार कर दिया ! दूसरे को आजमाया तो उसने छूते ही OTP मांग लिया ! किसी तरह उसको समझा-बुझा कर पैरों में फंसा तो लिया पर पार्क से लौटते-लौटते उसने आपे से बाहर हो ''सुसाइड'' ही कर डाला ! अब इतनी भी क्या नाराजगी हो गई, पता नहीं ! शायद इतने दिनों की उपेक्षा उसे ऐसा कदम उठाने पर मजबूर कर गई............!

#हिन्दी_ब्लागिंग     

कोरोना की महामारी से दुनिया भर में, रहने-सहने, चलने-फिरने, उठने-बैठने,खाने-पीने यानी हर क्रिया-कलाप में बदलाव महसूसा जा रहा है ! लोग इन सब बातों के साथ-साथ अपनी सेहत को लेकर भी काफी संजीदा हो गए हैं ! इनकी तंदरुस्ती बनाए रखने के चक्कर में पार्कों को अपनी सेहत की फिक्र होने लगी है ! रात को तो इन्हें कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन करना ही होता है, सुबह शाम लोग यहां आ कर पता नहीं कैसी-कैसी हरकतें कर कौन-कौन सी गैसें माहौल में घोलने लगे हैं ! फिर भी पादप परिवार इन्हें स्वस्थ रखने के लिए कटिबद्ध है ! 

अपना तो शुरू से ही नागा-बेनागा शरीर को उसके कर्मों की याद दिलाए रखने के लिए उसे ''हिलाते-डुलाते'' रखने का प्रयत्न रहा है ! और कुछ नहीं तो शाम को पार्क, नहीं तो छत और नहीं तो आंगन में ही कदम-ताल कर उसके आंकड़ों से संतुष्टि का भाव बनाए रखने की कोशिश रही है। पर जग जाहिर है कि ऐसे कामों में मन भटकाता बहुत है, तो उसको बहलाए रखने के लिए घूमने की जगहों में कुछ-कुछ अंतराल के बाद बदलाव करते रहना पड़ता है ! पर किसी भी जगह में सुस्ताने हेतु पहली ही बार में एक ही जगह को पसंदीदा बना डालता हूँ, पता नहीं क्यों ! आदत सी है !

रैकेट तो थाम लिया, पर एक तो आँखों पर पड़ती पार्क की चमकीली रौशनी और करीब बीस सालों से खेल से बनी हुई दूरी के कारण रैकेट का 9''x7'' का अंडाकार शेप का जाल ''चिरई'' को छू ही नहीं पा रहा था

ऐसे ही एक नई जगह में अपनी रुटीन पूरी कर, पसीना सूखने के इंतजार में बैठने के लिए, पार्क की ''हाई -मास्ट'' की रौशनी में अपनी एक पसंदीदा बेंच चुन ली थी। उसी के पास कुछ लोग बैडमिंटन भी खेलते रहते थे। एक दिन वहीं बैठा उनका खेल भी देख रहा था तो उन्हीं में से एक ने मुझे आवाज दी, ''आइए, बैडमिंटन खेलते हैं'' ! ना करने का कोई कारण ही नहीं था, सो जा कर रैकेट थाम लिया !

अब रैकेट तो थाम लिया, पर एक तो आँखों पर पड़ती पार्क की चमकीली रौशनी और करीब बीस सालों से खेल से बनी हुई दूरी के कारण रैकेट का 9''x7'' का अंडाकार शेप का जाल ''चिरई'' को छू ही नहीं पा रहा था ! साथ वाले भी सोच रहे होंगे, किस नौसिखिए को बुला लिया ! पर कहते हैं ना, स्विमिंग, सायकिलिंग का गुर कभी भूलता नहीं हैं ! वैसे ही यदि कोई भी खेल वर्षों खेला गया हो तो उसकी आदत शरीर में कहीं न कहीं पैबस्त हो रह ही जाती है ! खंगालना पड़ता है, सामने लाने के लिए ! सो पांच-दस मिनट बाद शरीर को भी याद आ गया होगा और खेल में लय बनने लगी ! 

अब क्या है कि हालात के चलते कहीं भी आना-जाना न होने के कारण, इन तक़रीबन दो सालों से जूते-मौजे की जहमत से बचने के लिए चप्पल-सैंडल से ही काम चलता रहा है ! पर जब खेल का मौका मिला तो उससे संबंधित जूतों की खोज-खबर ली गई ! एक ने तो पहचानने से ही साफ इंकार कर दिया ! दूसरे को आजमाया तो उसने छूते ही OTP मांग लिया ! किसी तरह उसको समझा-बुझा कर पैरों में फंसा तो लिया पर पार्क से लौटते-लौटते उसने आपे से बाहर हो ''सुसाइड'' ही कर डाला ! अब इतनी भी क्या नाराजगी हो गई, पता नहीं ! शायद इतने दिनों की उपेक्षा उसे ऐसा कदम उठाने पर मजबूर कर गई !

हमारे ऋषि-मुनियों-ज्ञानियों ने चीजों की कद्र करने के लिए जो समझाया है कि कण-कण में भगवान होता है, उसका सीधा सा एक अर्थ यह भी है कि हर चीज की अपनी महत्ता है ! एक तरह से उनमें भी जान होती है, जान के होने का मतलब यह नहीं कि उसका सांस लेना आवश्यक हो ! उसकी अपनी उपादेयता होती है ! कोई भी चीज प्रभु द्वारा निष्प्रयोजन नहीं बनाई गई है ! इस घटे क्रिया-कलाप से भी यह बात तो सिद्ध हो ही जाती है। इसलिए जीवन में किसी की भी उपेक्षा ना करें ! जहां तक हो अपने आस-पास के हर जीव-निर्जीव का ख्याल रखें ! जरुरत और सक्षमतानुसार सभी की सहायता करें ! जहां तक हो सके दूसरों को क्षमा करने की कोशिश करें ! 

शनिवार, 23 अक्टूबर 2021

करवाचौथ, बाजार तथा विघ्नसंतोषियों के निशाने पर

करवाचौथ के व्रत पर सवाल उठाने वाले मूढ़मतियों ने शायद छठ पूजा का नाम नहीं सुना होगा ! जो लिंग-विशिष्ट त्यौहार नहीं है। जिसके चार दिनों तक चलने वाले अनुष्ठान बेहद कठोर  होते हैं और नर-नारी अबाल-वृद्ध सभी के द्वारा श्रद्धा से मनाए जाते हैं। शायद व्रत का विरोध करने वालों को इसका अर्थ सिर्फ भोजन ना करना ही मालुम है। जब कि व्रत अपने प्रियजनों को सुरक्षित रखने, उनकी अनिष्ट से रक्षा करने की मंशा का सांकेतिक रूप भर है। ऐसे लोग एक तरह से अपनी नासमझी से महिलाओं की भावनाओं को कमतर आंक उनका अपमान ही करते हैं और जाने-अनजाने महिला और पुरुष के बीच गलतफहमी की खाई को और गहरा करने में सहायक होते हैं ! वैसे देखा जाए तो पुरुष द्वारा घर-परिवार की देख-भाल, भरण-पोषण भी एक तरह का व्रत ही तो है जो वह आजीवन निभाता है............!   

#हिन्दी_ब्लागिंग

करवा चौथ ! वर्षों से सीधे-साधे तरीके, बिना किसी ताम-झाम, बिना कुछ या ज्यादा खर्च किए सादगी से मनाया जाता आ रहा, पति-पत्नी के कोमल रिश्तों के प्रेम का प्रतीक, एक मासूम सा छोटा सा उत्सव ! पर समय के साथ-साथ इस पर भी बाजार की गिद्ध-दृष्टि लग गई ! शुरुआत भी उसी जगह, सिनेमा से हुई जहां से आज तक अधिकांश बुराइयां पनपती रही हैं ! पर संक्रामक्ता प्रदान की टी.वी.सीरियलों ने ! उनके अनगढ़, विषय-वस्तु से अनजान, गुगलई ज्ञानी निर्माता-निर्देशकों ने तो बंटाधार ही कर डाला ! इस दिन को ले कर, ऐसा ताम-झाम, ऐसी रौनक, ऐसे-ऐसे तमाशे और ऐसी-ऐसी तस्वीरें पेश की गयीं कि जो त्यौहार एक सीधी-साधी गृहणी अकेले या अपने कुछ रिश्तेदारों के साथ, सरलता व सादगी से मना लेती थी, वह भी दिखावे की चकाचौंध से भ्रमित हो बाजार के झांसे में आ गई। 

पहले की तरह अब महिलाएं घर के अंदर तक ही सिमित नहीं रह गई हैं। पर इससे उनके अंदर के प्रेमिल भाव, करुणा, त्याग, स्नेह, परिवार की मंगलकामना जैसे भाव खत्म नहीं हुए हैं ! और जब तक प्रकृति-प्रदत्त ऐसे गुण विद्यमान रहेंगे, तब तक कोई भी षड्यंत्र, कुचक्र या साजिश हमारी आस्था, हमारे विश्वास, हमारी परंपराओं का कुछ भी नहीं बिगाड़ पाएंगे

अब बाजार तो ठहरा बाजार ! उसे तो सिर्फ अपने लाभ से मतलब होता है। बस उसने महिलाओं की दशा को भांपा और उनकी भावनाओं को ''कैश'' करना शुरू कर दिया। देखते-देखते साधारण सी चूडी, बिंदी, टिकली, धागे सब "डिजायनर" होते चले गए। दो-तीन-पांच रुपये की चीजों की कीमत 100-150-200 रुपये हो गई। अब सीधी-सादी प्लेट या थाली से काम नहीं चलता, उसे सजाने की अच्छी खासी कीमत वसूली जाने लगी ! कुछ घरानों में छननी से चांद को देखने की प्रथा घर में उपलब्ध छननी से पूरी कर ली जाती थी पर अब उसे भी बाजार ने साज-संवार, दस गुनी कीमत कर, आधुनिक रूप दे, महिलाओं के लिए आवश्यक बना डाला। चाहे फिर वह साल भर या सदा के लिए उपेक्षित घर के किसी कोने में ही पडी रहे। पहले शगन के तौर पर हाथों में मेंहदी खुद ही लगा ली जाती थी या आस-पडोस की महिलाएं एक-दूसरे की सहायता कर देती थीं, पर आज यह लाखों का व्यापार बन चुका है। उसे भी पैशन और फैशन बना दिया गया है ! कल के एक घरेलू, आत्म केन्द्रित, सरल,मासूम से उत्सव, एक आस्था, को खिलवाड का रूप दे दिया गया। करोड़ों की आमदनी का जरिया बना दिया गया !    

यह तो रही बाजार की लिप्सा की बात ! यह व्रत-त्यौहार हमारे देश में प्राचीन काल से चले आ रहे हैं, जब महिलाएं घर संभालती थीं और पुरुषों पर उपार्जन की जिम्मेवारी होती थी। पर कुछ लोग देश में ऐसे भी हैं जिन्हें पारंपरिक त्यौहारों, उत्सवों या मान्यताओं से सख्त ''एलर्जी'' है ! कुछ तथाकथित आधुनिक नर-नारियों द्वारा विदेशी पंथों, विचारधाराओं तथा षड्यंत्रों के तहत सिर्फ अपने फायदे के लिए सदा तीज-त्यौहारों पर जहर उगला जाता है। उसी के तहत आज करवा चौथ को भी पिछडे तथा दकियानूसी त्यौहार की संज्ञा दे दी गयी है। इल्जाम यह भी लगाया जाता है कि पुरुष प्रधान समाज द्वारा महिलाओं को दोयम दर्जा देने की साजिश के तहत ही ऐसे उत्सव बनाए गए हैं ! जबकि सच्चाई यह है कि सदियों से घर की महिलाएं ही अपनी बच्चियों को ऐसे आयोजनों की जानकारी देती आ रही हैं ! मेरे ख्याल से तो कोई पुरुष जबरदस्ती अपनी पत्नी को दिन भर भूखा रहने को नहीं कहता होगा ! कहना भी नहीं चाहिए !    

आयातित कल्चर, विदेशी सोच तथा तथाकथित आधुनिकता के हिमायती कुछ लोगों को महिलाओं का दिन भर उपवासित रहना उनका उत्पीडन लगता है। अक्सर उनका सवाल रहता है कि पुरुष क्यों नहीं अपनी पत्नी के लिए व्रत रखते ? करवाचौथ के व्रत पर सवाल उठाने वाले मूढ़मतियों ने शायद छठ पूजा का नाम नहीं सुना होगा ! जो लिंग-विशिष्ट त्यौहार नहीं है। जिसके चार दिनों तक चलने वाले अनुष्ठान बेहद कठोर  होते हैं फिर भी नर-नारी अबाल-वृद्ध सभी के द्वारा पूरी श्रद्धा और आस्था से मनाए जाते हैं। 

व्रत का विरोध करने वालों को इसका अर्थ सिर्फ भोजन ना करना ही मालुम है। जब कि व्रत अपने प्रियजनों को सुरक्षित रखने, उनकी अनिष्ट से रक्षा करने की मंशा का सांकेतिक रूप भर है। ऐसे लोग एक तरह से अपनी नासमझी से महिलाओं की प्रेम, समर्पण, चाहत जैसी भावनाओं को कमतर आंक उनका अपमान ही करते हैं और जाने-अनजाने महिला और पुरुष के बीच गलतफहमी की खाई को और गहरा करने में सहायक होते हैं ! वैसे देखा जाए तो पुरुष द्वारा घर-परिवार की देख-भाल, भरण-पोषण भी एक तरह का व्रत ही तो है जो वह आजीवन निभाता है, पर इस बात का प्रचार करने या सामने लाने से विघ्नसंतोषियों को उनके कुचक्र को, उनके षड्यंत्र को कोई फायदा नहीं बल्कि नुक्सान ही है, इसलिए इस पर सदा चुप्पी बनाए रखी जाती है ! 

आज समय बदल गया है ! पहले की तरह अब महिलाएं घर के अंदर तक ही सिमित नहीं रह गई हैं। पर इससे उनके अंदर के प्रेमिल भाव, करुणा, त्याग, स्नेह, परिवार की मंगलकामना जैसे भाव खत्म नहीं हुए हैं ! और जब तक प्रकृति-प्रदत्त ऐसे गुण विद्यमान रहेंगे, तब तक कोई भी षड्यंत्र, कुचक्र या साजिश हमारी आस्था, हमारे विश्वास, हमारी परंपराओं का कुछ भी नहीं बिगाड़ पाएंगे !

मंगलवार, 19 अक्टूबर 2021

गिलहरी का पुल

फिर वह दिन भी आ गया जब पुल बन कर तैयार हो गया। उस दिन उससे जुड़े सारे लोग बहुत खुश थे। तभी एक महिला मजदूर सावित्री की नजर पुल की मुंडेर पर निश्चेष्ट पड़ी उस गिलहरी पर पड़ी, जिसने महिनों उन सब का दिल बहलाया था। उसे हिला-ड़ुला कर देखा गया, पर उस नन्हें जीव के प्राण पखेरु उड़ चुके थे। यह विड़ंबना ही थी कि जिस दिन पुल बन कर तैयार हुआ उसी दिन उस गिलहरी ने अपने प्राण त्याग दिए ..................!


#हिन्दी_ब्लागिंग 


हजारों साल पहले, त्रेतायुग में जब राम जी की सेना लंका पर चढ़ाई के लिए सागर पर सेतु बना रही थी, कहते हैं तब एक छोटी सी गिलहरी ने भी अपनी तरफ से जितना बन पडा था योगदान कर प्रभू का स्नेह प्राप्त किया था। शायद उस गिलहरी की  वंश-परंपरा अभी तक चली आ रही है ! क्योंकि फिर उसी देश में, एक गिलहरी ने फिर एक पुल के निर्माण में सहयोग किया था ! लोगों का प्यार भी उसे भरपूर मिला पर अफ़सोस जिंदगी नहीं मिल पाई !

अंग्रेजों के जमाने की बात है। दिल्ली-कलकत्ता मार्ग पर इटावा शहर के नौरंगाबाद इलाके के एक नाले पर एक पुल का निर्माण हो रहा था। पचासों मजदूरों के साथ-साथ बहुत सारे सर्वेक्षक, ओवरसियर, इंजिनीयर तथा सुपरवाईजर अपने-अपने काम पर जुटे, समय पर कार्य पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे थे। जाहिर है भोजनावकाश के दौरान, इतने लोगों के कलेवे-नाश्ते के अन्नकण यहां-वहां बिखर ही जाते थे ! उन्हीं को अपना भोजन बनाने के लिए कहीं से एक गिलहरी वहां रोज आने लगी !   
यह छोटी सी समाधी पुल की मुंड़ेर पर बनी हुई है, इसिलिये इस पुल का नाम भी गिलहरी का पुल पड़ गया। आस-पास के लोग कभी-कभी इस पर दिया-बत्ती कर जाते हैं
शुरु-शुरु में तो वह काफी ड़री-ड़री और सावधान रहती थी ! जरा सा भी किसी के पास आने या आहट होते ही झट से किसी सुरक्षित स्थान पर जा छुपती थी। पर धीरे-धीरे वह वहां के वातावरण से हिलमिल गई। उसको समझ आ गया कि इन मानवों से उसे कोई खतरा नहीं है। कुछ ही दिनों में वह काम में लगे मजदुरों से इतनी हिल-मिल गई कि अब बिना किसी डर के उनके पास ही दौड़ती-घूमती रहने लगी। उनके हाथ से खाना भी लेने लग गई ! उसकी हरकतों और तरह-तरह की आवाजों से काम करने वालों का भी मनोरंजन तो होता ही था साथ ही इस जीवित खिलौने की अठखेलियों से कुछ हद तक उनका काम का तनाव भी दूर रहने लगा था। वे भी रोज की एकरसता से आने वाली सुस्ती से मुक्त हो काम करने लगे थे ! 
फिर वह दिन भी आ गया जब पुल बन कर तैयार हो गया। उस दिन उससे जुड़े सारे लोग बहुत खुश थे। तभी एक महिला मजदूर सावित्री की नजर पुल की मुंडेर पर निश्चेष्ट पड़ी उस गिलहरी पर पड़ी, जिसने महिनों उन सब का दिल बहलाया था। उसे हिला-ड़ुला कर देखा गया पर उस नन्हें जीव के प्राण पखेरु उड़ चुके थे। यह विड़ंबना ही थी कि जिस दिन पुल बन कर तैयार हुआ उसी दिन उस गिलहरी ने अपने प्राण त्याग दिये। उपस्थित सारे लोग उदासी से घिर गये। कुछ मजदुरों ने वहीं उस गिलहरी की समाधी बना दी। जो आज भी देखी जा सकती है। यह छोटी सी समाधी पुल की मुंड़ेर पर बनी हुई है, इसिलिये इस पुल का नाम भी गिलहरी का पुल पड़ गया। आस-पास के लोग कभी-कभी इस पर दिया-बत्ती कर जाते हैं।

@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

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