राजधानी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
राजधानी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

बिना राजधानी वाला दुनिया का इकलौता देश

नाउरू की अपनी कोई राजधानी नहीं है, उसका सारा प्रशासनिक काम यहां के यारेन (Yaren) नाम के कस्बे से संचालित होता है ! उसे ही प्रशासनिक केंद्र माना जाता है। कुछ जिलों में विभक्त इस कस्बे में संसद भवन, हवाई अड्डा, सरकारी कार्यालय और विदेशी दूतावास मौजूद हैं। इसीलिए इस कस्बे को इस देश का “डि फैक्टो कैपिटल” कहा जाता है। यह अनोखी व्यवस्था नाउरू के छोटे आकार, प्रशासनिक सुविधा और उसकी अपनी अलग पहचान को दर्शाती है...............!

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

रा जधानी किसी भी देश, प्रदेश या राज्य का प्रमुख शहर तथा राजनीतिक केंद्र होता है। यह विशेष दर्जा उसे उस देश के संविधान द्वारा प्रदत्त किया जाता है। यह एक ऐसा शहर होता है, जहां केंद्र सरकार के सारे दफ्तर होते हैं और जहां से सरकार चलती है, कानून बनते हैं, कानून और संविधान का निर्धारण किया जाता है और देश की दिशा तय होती है। आज दुनिया में करीब 195 देश हैं। हर देश की अपनी राजधानी है। लेकिन इसी दुनिया में एक देश ऐसा भी है, जिसकी कोई राजधानी नहीं है, फिर भी वह संयुक्त राष्ट्र का सदस्य है। उसका अपना संविधान है, अपना झंडा है और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी मौजूदगी भी है। इस देश का नाम है नाउरू (Nauru). 

नाउरू 
द्वीपीय देश 
कभी प्लीजेंट-आइलैंड के नाम से जाना जाने वाला नाउरू, दुनिया का अकेला ऐसा देश है जिसकी कोई आधिकारिक राजधानी नहीं है। यह द्वीपीय देश दक्षिणी प्रशांत महासागर में स्थित है। जहां इसके 21 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में सिर्फ दस हजार की आबादी रहती है ! जो इसे दुनिया का क्षेत्रफल के हिसाब से तीसरा और आबादी के हिसाब से दूसरा सबसे छोटा स्वतंत्र गणराज्य बनाती है ! अपने छोटे से क्षेत्र के बावजूद यह किसी भी महाद्वीप से जुड़ा हुआ नहीं है।  इसका निकटतम पड़ोसी बनाबा द्वीप है जो इससे तकरीबन तीन सौ किमी दूर है ! 

प्राकृतिक सौंदर्य 

ना उरू की अपनी कोई राजधानी नहीं है, उसका सारा प्रशासनिक काम यहां के यारेन (Yaren) नाम के कस्बे से संचालित होता है ! उसे ही प्रशासनिक केंद्र माना जाता है। कुछ जिलों में विभक्त इस कस्बे में संसद भवन, हवाई अड्डा, सरकारी कार्यालय और विदेशी दूतावास मौजूद हैं। इसीलिए इस कस्बे को इस देश का “डि फैक्टो कैपिटल” कहा जाता है। यह अनोखी व्यवस्था नाउरू के छोटे आकार, प्रशासनिक सुविधा और उसकी अपनी अलग पहचान को दर्शाती है। 


हवाई पट्टी 

ना उरू की अर्थ व्यवस्था को संभालने वाले खनिज पदार्थ लगभग समाप्त हो चुके हैं। इस छोटे से देश में जहां सिर्फ दो घंटे में सारा क्षेत्र नाप लिया जा सकता है ! जहां खूबसूरत समुद्री तट और शांत वातावरण भी है ! पर घूमने के लिए ज्यादा जगहें ना होने के कारण यहां पर्यटन विकसित नहीं हो पाया है ! इसीलिए यहां के वाशिंदों की जीविका नारियल की उपज और समुद्री मछलियों के सहारे ही चलती है ! आर्थिक रूप से यह ऑस्ट्रेलिया पर निर्भर है और उसका संरक्षण इसे प्राप्त है ! इसकी आधिकारिक मुद्रा भी आस्ट्रेलियाई डॉलर ही है। वैसे अपने अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से यह बाकी दुनिया से भी जुड़ा हुआ है। 


संतुष्ट, खुशहाल जिंदगी  

छोटे-बड़े द्वीपों से मिलकर बने नाउरू की खासियत यह है कि अपनी बेहद छोटी आबादी के बावजूद इसने अपने प्रमुख खेल वेटलिफ्टिंग के जरिए ओलंपिक, कॉमनवेल्थ और दूसरे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सिर्फ अपनी उपस्थिति ही दर्ज नहीं करवाई, बल्कि वहां पदक भी जीते हैं। जो यहां के नागरिकों के लिए गर्व का विषय है !


देश का गौरव 
नाउरू का अपनी राजधानी ना बनाने का सिर्फ एक ही कारण है, उसका छोटा आकार ! सिर्फ 21 वर्ग किलोमीटर की जमीन पर बसी हुई उसकी आबादी, बस्तियां और उनकी दूरियां एक-दूसरे में जैसे घुलमिल सी गई हैं। इसीलिए एक अलग राजधानी जैसा शहर बनाने की कभी जरूरत ही महसूस नहीं की गई। वैसे यह देश इस बात का प्रमाण है कि किसी भी देश के नागरिकों की जिजीविषा ही देश को स्थाईत्व प्रदान करती है ! यदि वहां के लोगों का हौसला बुलंद हो, तो देश की आबादी या उसका क्षेत्रफल कोई मायने नहीं रखता ! 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 🙏

सोमवार, 1 नवंबर 2021

मैं छत्तीसगढ हूं

 मेरे नाम में आंकड़े जरूर  "36"  के हैं पर प्रेम से भरे मेरे मन की यही इच्छा है कि मैं सारे देश में एक ऐसे आदर्श प्रदेश के रूप में जाना जाऊं,  जहां किसी के साथ भेद-भाव नहीं बरता जाता हो, जहां किसी को अपने परिवार को पालने में बेकार की जद्दोजहद नहीं करनी पडती हो, जहां के लोग सारे देशवासियों को अपने परिवार का सदस्य समझें।  जहां कोई भूखा न सोता हो, जहां तन ढकने के लिए कपडे और सर छुपाने के लिए छत सब को मुहैय्या हो। मेरा यह सपना दुर्लभ भी नहीं है। यहां के रहवासी हर बात में सक्षम हैं। यूंही उन्हें  #छत्तीसगढ़िया_सबले_बढ़िया का खिताब हासिल नहीं हुआ है .....................................


#हिन्दी_ब्लागिंग
 

मैं #छत्तीसगढ हूं ! आज एक नवम्बर है । 21 साल के एक ऐसे सक्षम, कर्मठ, स्वाबलंबी, युवा की जन्मतिथि ! जो सदा कुछ कर गुजरने, सपनों को हकीकत में बदलने तथा देश के प्रति समर्पित रहने को प्रतिबद्ध है ! आज सुबह से ही आपकी शुभकामनाएं, प्रेम भरे संदेश और भावनाओं से पगी बधाईयां पा कर अभिभूत हूं। मुझे याद रहे ना रहे पर आप सब को हमेशा मेरा जन्मदिन याद रहता है ! यह मेरा सौभाग्य है। किसी देश या राज्य के लिए 20-21 साल समय का बहुत बड़ा काल-खंड नहीं होता। पर मुझे संवारने-संभालने, मेरे रख-रखाव, मुझे दिशा देने वालों ने इतने कम समय में ही मेरी पहचान देश में ही नहीं, विदेशों में भी बना कर एक मिसाल कायम कर दी है। मुझे इससे कोई मतलब नहीं है कि मेरी बागडोर किस पार्टी के हाथ में है ! मेरी यही कामना रहती है, जो भी यहां की जनता की इच्छा से राज संभालता है उसका लक्ष्य एक ही होना चाहिए कि छत्तीसगढ के वासी अमन-चैन के साथ, एक दूसरे के सुख-दुख के साथी बन, बिना किसी डर, भय, चिंता या अभाव के अपना जीवन यापन कर सकें। मेरा सारा प्रेम, लगाव, जुडाव सिर्फ और सिर्फ यहां के बाशिंदों के साथ ही है। 
मैं 


वन-संपदा, खनिज, धन-धान्य से परिपूर्ण मेरी रत्नगर्भा धरती का इतिहास दक्षिण-कौशल के नाम से रामायण और महाभारत काल में भी जाना जाता रहा है। वैसे यहां एक लंबे समय तक कल्चुरी राज्यवंश का आधिपत्य रहा है। पर मध्य प्रदेश परिवार से जुडे रहने के कारण मेरी स्वतंत्र छवि नहीं बन पाई थी और देश के दूसरे हिस्सों के लोग मेरे बारे में बहुत कम जानकारी रखते थे। आप को भी याद ही होगा जब मुझे मध्य प्रदेश से अलग अपनी पहचान मिली थी तो देश के दूसरे भाग में रहने वाले लोगों को मेरे बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी ! जिसके कारण देश के विभिन्न हिस्सों में मेरे प्रति कई तरह की भ्रांतियां पनपी हुई थीं ! दूसरे प्रांतों के लोग मुझे एक पिछड़ा प्रदेश और यहां के आदिवासियों के बारे में अधकचरी जानकारी रखते थे । इस धारणा को बदलने में समय तो लगा, मेहनत करनी पड़ी, जितने भी साधन उपलब्ध थे उनका उचित प्रयोग किया गया, धीरे-धीरे तस्वीर बदलने लगी जिसका उल्लेख यहां से बाहर जाने वालों से या बाहर से यहां घूमने आने वाले लोगों की जुबानी देशवासियों में होने लगा।अब यहां से बाहर जाने वालों से या बाहर से यहां घूमने आने वाले लोगों को मुझे देखने-समझने का मौका मिलता है तो उनकी आंखें खुली की खुली रह जाती हैं। उन्हें विश्वास ही नहीं होता कि परिपक्वता के द्वार पर खड़ा मैं, इतने कम समय में, सीमित साधनों के और ढेरों अडचनों के बावजूद इतनी तरक्की कर पाया हूं। वे मुझे देश के सैंकडों शहरों से बीस पाते हैं। मुझे संवारने-संभालने, मेरे रख-रखाव, मुझे दिशा देने वालों ने इतने कम समय में ही मेरी पहचान देश ही नहीं विदेशों में भी बना कर एक मिसाल कायम कर दी है।


इतना सब होने के बावजूद कईयों की जिज्ञासा होती है मेरी पहचान बनने के पहले का इतिहास जानने की ! मैं क्या था ? कैसा था ? कौन था ? तो उन सब को नम्रता पूर्वक यही कहना चाहता हूं कि जैसा था वैसा हूं ! यहीं था ! यहीं हूं। फिर भी सभी की उत्सुकता शांत करने के लिए कुछ जानकारी बांट ही लेता हूं। सैंकडों सालों से मेरा विवरण इतिहास में मिलता रहा है। मुझे दक्षिणी कोसल के रूप में जाना जाता रहा है। रामायण काल में मैं माता कौशल्या की भूमि के रूप में ख्यात था। मेरा परम सौभाग्य है कि मैं किसी भी तरह ही सही, प्रभू राम के नाम से जुडा रह पाया। कालांतर से नाम बदलते रहे, अभी की वर्तमान संज्ञा "छत्तीसगढ" के बारे में विद्वानों की अलग-अलग राय है। कुछ लोग इसका कारण उन 36 किलों को मानते हैं जो मेरे अलग-अलग हिस्सों में कभी रहे थे, पर आज उनके अवशेष नहीं मिलते। कुछ जानकारों का मानना है कि यह नाम कल्चुरी राजवंश के चेडीसगढ़ का ही अपभ्रंश है।



भारतीय गणराज्य में 31 अक्टूबर 1999 तक मैं मध्य प्रदेश के ही एक हिस्से के रूप में जाना जाता था। पर अपने लोगों के हित में, उनके समग्र विकास हेतु मुझे  अलग राज्य का दर्जा प्राप्त हो गया। इस मुद्दे पर मंथन तो 1970 से ही शुरु हो गया था ! पर गंभीर रूप से इस पर विचार 1990 के दशक में ही शुरु हो पाया ! जिसका प्रचार 1996 और 1998 के चुनावों में अपने शिखर पर रहा ! जिसके चलते अगस्त 2000 में मेरे निर्माण का रास्ता साफ हो सका। इस ऐतिहासिक घटना का सबसे उज्जवल पक्ष यह था कि इस मांग और निर्माण के तहत किसी भी प्रकार के दंगे-फसाद, विरोधी रैलियों या उपद्रव इत्यादि के लिए कोई जगह नहीं थी। हर काम शांति, सद्भावना, आपसी समझ और गौरव पूर्ण तरीके से संपन्न हुआ। इसका सारा श्रेय यहां के अमन-पसंद, भोले-भाले, शांति-प्रिय लोगों को जाता है जिन पर मुझे गर्व है। 



आज मेरे सारे कार्यों का संचालन मेरी "राजधानी रायपुर" से संचालित होता है। समय के साथ इस शहर में तो बदलाव आया ही है पर राजधानी होने के कारण बढ़ती, लोगों की आवाजाही, नए कार्यालय, मंत्रिमंडलों के काम-काज की अधिकता इत्यादि को देखते हुए नए रायपुर का निर्माण भी किया गया है। अभी की राजधानी रायपुर से करीब बीस की. मी. की दूरी पर यह मलेशिया के "हाई-टेक" शहर पुत्रजया की तरह निर्माणाधीन है। जिसके पूर्ण होने पर मैं गांधीनगर, चंडीगढ़ और भुवनेश्वर जैसे व्यवस्थित और पूरी तरह प्लान किए गए शहरों की श्रेणी में शामिल हो जाऊंगा।



मुझे कभी भी ना तो राजनीति से कोई खास लगाव रहा है नाहीं ऐसे दलों से। मेरा सारा प्रेम, लगाव, जुडाव सिर्फ और सिर्फ यहां के बाशिंदों के साथ ही है। कोई भी राजनीतिक दल आए, मेरी बागडोर किसी भी पार्टी के हाथ में हो उसका लक्ष्य एक ही होना चाहिए कि छत्तीसगढ के वासी अमन-चैन के साथ, एक दूसरे के सुख-दुख के साथी बन, यहां बिना किसी डर, भय, चिंता या अभाव के अपना जीवन यापन कर सकें। मेरे नाम में आंकड़े जरूर "36" के हैं पर प्रेम भरे मेरे मन की यही इच्छा है  कि मैं सारे देश में एक ऐसे आदर्श प्रदेश के रूप में जाना जाऊं, जो देश के किसी भी कोने से आने वाले देशवासी का स्वागत खुले मन और बढे हाथों से करने को तत्पर रहता है। जहां किसी के साथ भेद-भाव ना बरता जाता, जहां किसी को अपने परिवार को पालने में बेकार की जद्दोजहद नहीं करनी पडती, जहां के लोग सारे देशवासियों को अपने परिवार का समझ, हर समय, हर तरह की सहायता प्रदान करने को तत्पर रहते हैं। जहां कोई भूखा नहीं सोता, जहां तन ढकने के लिए कपडे और सर छुपाने के लिए छत मुहैय्या करवाने में वहां के जन-प्रतिनिधि सदा तत्पर रहते हैं। मेरा यह सपना कोई बहुत दुर्लभ भी नहीं है क्योंकि यहां के रहवासी हर बात में सक्षम हैं। यूंही उन्हें "छत्तीसगढिया सबसे बढिया" का खिताब हासिल नहीं हुआ है।  



मेरे साथ ही भारत में अन्य दो राज्यों, उत्तराखंड तथा झारखंड भी अस्तित्व में आए हैं और उन्नति के मार्ग पर अग्रसर हैं। मेरी तरफ से आप उनको भी अपनी शुभकामनाएं प्रेषित करें, मुझे अच्छा लगेगा।  फिर एक बार आप सबको धन्यवाद देते हुए मेरी एक ही इच्छा है कि मेरे प्रदेश वासियों के साथ ही मेरे देशवासी भी असहिष्णुता छोड़ एक साथ प्रेम, प्यार और भाईचारे के साथ रहें।  हमारा देश उन्नति करे, विश्व में हम सिरमौर हों।
जयहिंद। जय छत्तीसगढ़ !  

@सभी चित्र अंतर्जाल से साभार  

विशिष्ट पोस्ट

बिना राजधानी वाला दुनिया का इकलौता देश

ना उरू की अपनी कोई राजधानी नहीं है, उसका सारा प्रशासनिक काम यहां के यारेन (Yaren) नाम के कस्बे से संचालित होता है ! उसे ही प्रशासनिक केंद्र ...