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सोमवार, 1 नवंबर 2021

मैं छत्तीसगढ हूं

 मेरे नाम में आंकड़े जरूर  "36"  के हैं पर प्रेम से भरे मेरे मन की यही इच्छा है कि मैं सारे देश में एक ऐसे आदर्श प्रदेश के रूप में जाना जाऊं,  जहां किसी के साथ भेद-भाव नहीं बरता जाता हो, जहां किसी को अपने परिवार को पालने में बेकार की जद्दोजहद नहीं करनी पडती हो, जहां के लोग सारे देशवासियों को अपने परिवार का सदस्य समझें।  जहां कोई भूखा न सोता हो, जहां तन ढकने के लिए कपडे और सर छुपाने के लिए छत सब को मुहैय्या हो। मेरा यह सपना दुर्लभ भी नहीं है। यहां के रहवासी हर बात में सक्षम हैं। यूंही उन्हें  #छत्तीसगढ़िया_सबले_बढ़िया का खिताब हासिल नहीं हुआ है .....................................


#हिन्दी_ब्लागिंग
 

मैं #छत्तीसगढ हूं ! आज एक नवम्बर है । 21 साल के एक ऐसे सक्षम, कर्मठ, स्वाबलंबी, युवा की जन्मतिथि ! जो सदा कुछ कर गुजरने, सपनों को हकीकत में बदलने तथा देश के प्रति समर्पित रहने को प्रतिबद्ध है ! आज सुबह से ही आपकी शुभकामनाएं, प्रेम भरे संदेश और भावनाओं से पगी बधाईयां पा कर अभिभूत हूं। मुझे याद रहे ना रहे पर आप सब को हमेशा मेरा जन्मदिन याद रहता है ! यह मेरा सौभाग्य है। किसी देश या राज्य के लिए 20-21 साल समय का बहुत बड़ा काल-खंड नहीं होता। पर मुझे संवारने-संभालने, मेरे रख-रखाव, मुझे दिशा देने वालों ने इतने कम समय में ही मेरी पहचान देश में ही नहीं, विदेशों में भी बना कर एक मिसाल कायम कर दी है। मुझे इससे कोई मतलब नहीं है कि मेरी बागडोर किस पार्टी के हाथ में है ! मेरी यही कामना रहती है, जो भी यहां की जनता की इच्छा से राज संभालता है उसका लक्ष्य एक ही होना चाहिए कि छत्तीसगढ के वासी अमन-चैन के साथ, एक दूसरे के सुख-दुख के साथी बन, बिना किसी डर, भय, चिंता या अभाव के अपना जीवन यापन कर सकें। मेरा सारा प्रेम, लगाव, जुडाव सिर्फ और सिर्फ यहां के बाशिंदों के साथ ही है। 
मैं 


वन-संपदा, खनिज, धन-धान्य से परिपूर्ण मेरी रत्नगर्भा धरती का इतिहास दक्षिण-कौशल के नाम से रामायण और महाभारत काल में भी जाना जाता रहा है। वैसे यहां एक लंबे समय तक कल्चुरी राज्यवंश का आधिपत्य रहा है। पर मध्य प्रदेश परिवार से जुडे रहने के कारण मेरी स्वतंत्र छवि नहीं बन पाई थी और देश के दूसरे हिस्सों के लोग मेरे बारे में बहुत कम जानकारी रखते थे। आप को भी याद ही होगा जब मुझे मध्य प्रदेश से अलग अपनी पहचान मिली थी तो देश के दूसरे भाग में रहने वाले लोगों को मेरे बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी ! जिसके कारण देश के विभिन्न हिस्सों में मेरे प्रति कई तरह की भ्रांतियां पनपी हुई थीं ! दूसरे प्रांतों के लोग मुझे एक पिछड़ा प्रदेश और यहां के आदिवासियों के बारे में अधकचरी जानकारी रखते थे । इस धारणा को बदलने में समय तो लगा, मेहनत करनी पड़ी, जितने भी साधन उपलब्ध थे उनका उचित प्रयोग किया गया, धीरे-धीरे तस्वीर बदलने लगी जिसका उल्लेख यहां से बाहर जाने वालों से या बाहर से यहां घूमने आने वाले लोगों की जुबानी देशवासियों में होने लगा।अब यहां से बाहर जाने वालों से या बाहर से यहां घूमने आने वाले लोगों को मुझे देखने-समझने का मौका मिलता है तो उनकी आंखें खुली की खुली रह जाती हैं। उन्हें विश्वास ही नहीं होता कि परिपक्वता के द्वार पर खड़ा मैं, इतने कम समय में, सीमित साधनों के और ढेरों अडचनों के बावजूद इतनी तरक्की कर पाया हूं। वे मुझे देश के सैंकडों शहरों से बीस पाते हैं। मुझे संवारने-संभालने, मेरे रख-रखाव, मुझे दिशा देने वालों ने इतने कम समय में ही मेरी पहचान देश ही नहीं विदेशों में भी बना कर एक मिसाल कायम कर दी है।


इतना सब होने के बावजूद कईयों की जिज्ञासा होती है मेरी पहचान बनने के पहले का इतिहास जानने की ! मैं क्या था ? कैसा था ? कौन था ? तो उन सब को नम्रता पूर्वक यही कहना चाहता हूं कि जैसा था वैसा हूं ! यहीं था ! यहीं हूं। फिर भी सभी की उत्सुकता शांत करने के लिए कुछ जानकारी बांट ही लेता हूं। सैंकडों सालों से मेरा विवरण इतिहास में मिलता रहा है। मुझे दक्षिणी कोसल के रूप में जाना जाता रहा है। रामायण काल में मैं माता कौशल्या की भूमि के रूप में ख्यात था। मेरा परम सौभाग्य है कि मैं किसी भी तरह ही सही, प्रभू राम के नाम से जुडा रह पाया। कालांतर से नाम बदलते रहे, अभी की वर्तमान संज्ञा "छत्तीसगढ" के बारे में विद्वानों की अलग-अलग राय है। कुछ लोग इसका कारण उन 36 किलों को मानते हैं जो मेरे अलग-अलग हिस्सों में कभी रहे थे, पर आज उनके अवशेष नहीं मिलते। कुछ जानकारों का मानना है कि यह नाम कल्चुरी राजवंश के चेडीसगढ़ का ही अपभ्रंश है।



भारतीय गणराज्य में 31 अक्टूबर 1999 तक मैं मध्य प्रदेश के ही एक हिस्से के रूप में जाना जाता था। पर अपने लोगों के हित में, उनके समग्र विकास हेतु मुझे  अलग राज्य का दर्जा प्राप्त हो गया। इस मुद्दे पर मंथन तो 1970 से ही शुरु हो गया था ! पर गंभीर रूप से इस पर विचार 1990 के दशक में ही शुरु हो पाया ! जिसका प्रचार 1996 और 1998 के चुनावों में अपने शिखर पर रहा ! जिसके चलते अगस्त 2000 में मेरे निर्माण का रास्ता साफ हो सका। इस ऐतिहासिक घटना का सबसे उज्जवल पक्ष यह था कि इस मांग और निर्माण के तहत किसी भी प्रकार के दंगे-फसाद, विरोधी रैलियों या उपद्रव इत्यादि के लिए कोई जगह नहीं थी। हर काम शांति, सद्भावना, आपसी समझ और गौरव पूर्ण तरीके से संपन्न हुआ। इसका सारा श्रेय यहां के अमन-पसंद, भोले-भाले, शांति-प्रिय लोगों को जाता है जिन पर मुझे गर्व है। 



आज मेरे सारे कार्यों का संचालन मेरी "राजधानी रायपुर" से संचालित होता है। समय के साथ इस शहर में तो बदलाव आया ही है पर राजधानी होने के कारण बढ़ती, लोगों की आवाजाही, नए कार्यालय, मंत्रिमंडलों के काम-काज की अधिकता इत्यादि को देखते हुए नए रायपुर का निर्माण भी किया गया है। अभी की राजधानी रायपुर से करीब बीस की. मी. की दूरी पर यह मलेशिया के "हाई-टेक" शहर पुत्रजया की तरह निर्माणाधीन है। जिसके पूर्ण होने पर मैं गांधीनगर, चंडीगढ़ और भुवनेश्वर जैसे व्यवस्थित और पूरी तरह प्लान किए गए शहरों की श्रेणी में शामिल हो जाऊंगा।



मुझे कभी भी ना तो राजनीति से कोई खास लगाव रहा है नाहीं ऐसे दलों से। मेरा सारा प्रेम, लगाव, जुडाव सिर्फ और सिर्फ यहां के बाशिंदों के साथ ही है। कोई भी राजनीतिक दल आए, मेरी बागडोर किसी भी पार्टी के हाथ में हो उसका लक्ष्य एक ही होना चाहिए कि छत्तीसगढ के वासी अमन-चैन के साथ, एक दूसरे के सुख-दुख के साथी बन, यहां बिना किसी डर, भय, चिंता या अभाव के अपना जीवन यापन कर सकें। मेरे नाम में आंकड़े जरूर "36" के हैं पर प्रेम भरे मेरे मन की यही इच्छा है  कि मैं सारे देश में एक ऐसे आदर्श प्रदेश के रूप में जाना जाऊं, जो देश के किसी भी कोने से आने वाले देशवासी का स्वागत खुले मन और बढे हाथों से करने को तत्पर रहता है। जहां किसी के साथ भेद-भाव ना बरता जाता, जहां किसी को अपने परिवार को पालने में बेकार की जद्दोजहद नहीं करनी पडती, जहां के लोग सारे देशवासियों को अपने परिवार का समझ, हर समय, हर तरह की सहायता प्रदान करने को तत्पर रहते हैं। जहां कोई भूखा नहीं सोता, जहां तन ढकने के लिए कपडे और सर छुपाने के लिए छत मुहैय्या करवाने में वहां के जन-प्रतिनिधि सदा तत्पर रहते हैं। मेरा यह सपना कोई बहुत दुर्लभ भी नहीं है क्योंकि यहां के रहवासी हर बात में सक्षम हैं। यूंही उन्हें "छत्तीसगढिया सबसे बढिया" का खिताब हासिल नहीं हुआ है।  



मेरे साथ ही भारत में अन्य दो राज्यों, उत्तराखंड तथा झारखंड भी अस्तित्व में आए हैं और उन्नति के मार्ग पर अग्रसर हैं। मेरी तरफ से आप उनको भी अपनी शुभकामनाएं प्रेषित करें, मुझे अच्छा लगेगा।  फिर एक बार आप सबको धन्यवाद देते हुए मेरी एक ही इच्छा है कि मेरे प्रदेश वासियों के साथ ही मेरे देशवासी भी असहिष्णुता छोड़ एक साथ प्रेम, प्यार और भाईचारे के साथ रहें।  हमारा देश उन्नति करे, विश्व में हम सिरमौर हों।
जयहिंद। जय छत्तीसगढ़ !  

@सभी चित्र अंतर्जाल से साभार  

शनिवार, 9 अक्टूबर 2021

क्या हम लार्वा से कोकून हो गए हैं

हमारे लिए सब कुछ मात्र एक मामूली सी खबर बन कर रह जाता है ! पढ़ी-देखी और ''च्च..च्च'' कर पेज या चैनल बदल दिया ! क्यों नहीं दहलते हम कश्मीर में दो दिनों के अंदर पांच हत्याओं पर ? क्यों अब हमारे घरों में मोमबत्तियां ढूंढे नहीं मिलती ? क्यों अब हमारे ''एवार्ड'' वापस होने के लिए नहीं मचलते ? क्यों हम काले कपडे पहन मौन जुलुस नहीं निकालते ? क्यों और कैसे हम अचानक सहिष्णु बन गए ? वह भी ऐसे लोगों की नृशंस हत्या पर, जो समाज कल्याण या फिर निर्भयता के प्रतीक बने हुए थे..........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
एक समय था जब हम अपने सर्व धर्म समभाव, विविधता में एकता, अपने भाईचारे इत्यादि का बड़े गर्व से बखान किया करते थे ! जरा सी हिंसा-विद्वेष होता तो पूरे देश में चिंता की लहर दौड़ जाया करती थी ! अमन-चैन के लिए प्रार्थनाएं होने लगती थीं। पर धीरे-धीरे (कारण कुछ भी हो) वही विशेषताएं हमारी कमजोरियां बनती चली गईं ! समभाव-एकता-भाईचारा सब तिरोहित होते चले गए ! संवेदनाएं जैसे ख़त्म ही हो गईं ! हम सब अलग-अलग जात-पांत-भाषा-धर्म के विभिन्न खांचों में फिट हो गए और उनको खल, चंट व अधम लोगों की रहनुमाई में छोड़ दिया ! अब खांचा विशेष से संबंधित बातों से ही हमारा मतलब रह गया ! इसीलिए मौकापरस्त मीडिया हमें उद्वेलित करने के लिए अब अपनी खबरों में किसी खांचा विशेष के इंसान की मौत या उस पर हुई ज्यादति के साथ उस इंसान के धर्म-जात-पांत का उल्लेख  भी प्रमुखता से करने लगा !  

ऐसा लगने लगा है कि जैसे हम में से अधिकांश लोग कोकूनधारी हो गए हैं ! संवेदनहीन, उदासीन, निर्लिप्त ! अपने आस-पास के माहौल, दीन-दुनिया से परे अपने खोल में सिमटे हुए ! कितनी भी बड़ी घटना हो, वारदात हो, नृशंसकता हो हमें कुछ नहीं व्याप्कता ! हमें फर्क नहीं पड़ता जब बंगाल में प्रतिशोध के तहत निर्दोष और मासूम लोग जान गंवा देते हैं ! हमें तो उस बारूद की तेज गंध भी महसूस नहीं होती जो इधर अचानक कश्मीर की हवा को गंधाने लगी है ! हमने कभी इस ओर ध्यान ही नहीं दिया कि देश-समाज-आम इंसान के लिए कभी, कुछ भी न करने वाला, कैसे अपने सूबे के बाहर जा कर सियासतदारी कर रहा है ! हम  यह भी नहीं पता कि झूठ के पैर होते हैं कि नहीं ! हम तो इन तन-धारी झूठों के दिखाए दिवास्वपनों में यूं गाफिल हैं कि हमारा ध्यान कभी उनके पैरों की तरफ जाता ही नहीं !  

हमारे लिए सब कुछ मात्र एक मामूली सी खबर बन कर रह जाता है ! पढ़ी-देखी और ''च्च..च्च'' कर पेज या चैनल बदल दिया ! क्यों नहीं दहलते हम कश्मीर में दो दिनों के अंदर पांच हत्याओं पर ? क्यों अब हमारे घरों में मोमबत्तियां ढूंढे नहीं मिलती ? क्यों अब हमारे ''एवार्ड'' वापस होने के लिए नहीं मचलते ? क्यों हम काले कपडे पहन मौन जुलुस नहीं निकालते ? क्यों और कैसे हम अचानक सहिष्णु बन गए ? वह भी ऐसे लोगों की नृशंस ह्त्या पर जो समाज कल्याण या फिर निर्भयता के प्रतीक बने हुए थे ! वैसे हम अपने कोकून में तब भी कहां कसमसाए थे, जब तीसियों साल पहले लाखों लोगों को दरबदर कर दिया गया था।

धर्म-जात-पांत पर सियासत करने वाला कोई एक, सिर्फ एक, अपने को बंदा समझने वाला, हिम्मत है तो सामने आ कर यह बताए कि उन बेगुनाह, निर्दोष, परहितैषी दोनों अध्यापकों सुपिंदर कौर और दीपक चंद को क्यों और किसलिए मारा गया ! वह नेक महिला तो अपनी तनख्वाह का एक बड़ा हिस्सा बिना किसी भेदभाव के, जरूरतमंद बच्चों के भविष्य को संवारने में खर्च कर डालती थी ! इतना ही नहीं, खुद और अपने परिवार की आर्थिक तंगी के बावजूद उसने धर्म-जात-पांत के संकीर्ण नजरिए से ऊपर उठ, एक मुस्लिम बालिका को गोद ले, उसकी सारी जिम्मेदारी उठाने के बावजूद, उसे एक मुस्लिम परिवार में ही रखा था, जिससे कि बच्ची को अपने धर्म की भी पूरी शिक्षा मिल सके !  उधर दीपक चंद अपनी सैलरी से मदरसों की मदद करते रहते थे ! कितने लोग जानते हैं इन दोनों को और इनके नेक कर्मों को, उनकी इंसानियत को, उनकी परोपकार की भावना को, उनके त्याग को ! चुपचाप बिना किसी अपेक्षा और भेदभाव के दूसरों का भला करने के बदले में उन्हें क्या सिला मिला.............!!
 
हम जैसे आम इंसानों को पता नहीं चलता कि सरकार अंदर ही अंदर क्या कर रही है ! खुलासा होना भी नहीं चाहिए ! कर ही रही होगी कुछ ना कुछ ! चुप तो नहीं ही बैठी होगी ! पर अवाम में बहुत आक्रोश है ! उसे तुरंत कार्यवाही होते देखनी है ! अब हर देशवासी यही चाहता है कि आर-पार हो ही जाए ! बहुत हो गया ! अब तो ''शठे शाठ्यम समाचरेत'' के साथ ही ''धर्मसंस्थापनार्थ हि प्रतिज्ञैषा ममाव्यया'' का वक्त भी आ गया है ! इसके तहत बाहरी शत्रु को तो नष्ट करना ही है भीतरघातियों, चाहे वे कितने बड़े रसूखदार हों, को भी नहीं बक्शना है ! फिर चाहे कितनी भी मोमबत्तियां जलें, कितने भी काले कपडे पहने जाएं, कितने भी एवार्ड वापस हों, कितने भी घड़ियाली आंसू बहें ! कोई फ़िक्र नहीं ! क्योंकि प्रभु भी यही कहते हैं कि ''भय बिनु होइ न प्रीति !'' एक बार धर्म की स्थापना के साथ ही भय की भी स्थापना होना बहुत जरुरी हो गया है, वह भी बिना और किसी तरह के विलंब के !

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