शनिवार, 23 अक्तूबर 2021

करवाचौथ, बाजार तथा विघ्नसंतोषियों के निशाने पर

करवाचौथ के व्रत पर सवाल उठाने वाले मूढ़मतियों ने शायद छठ पूजा का नाम नहीं सुना होगा ! जो लिंग-विशिष्ट त्यौहार नहीं है। जिसके चार दिनों तक चलने वाले अनुष्ठान बेहद कठोर  होते हैं और नर-नारी अबाल-वृद्ध सभी के द्वारा श्रद्धा से मनाए जाते हैं। शायद व्रत का विरोध करने वालों को इसका अर्थ सिर्फ भोजन ना करना ही मालुम है। जब कि व्रत अपने प्रियजनों को सुरक्षित रखने, उनकी अनिष्ट से रक्षा करने की मंशा का सांकेतिक रूप भर है। ऐसे लोग एक तरह से अपनी नासमझी से महिलाओं की भावनाओं को कमतर आंक उनका अपमान ही करते हैं और जाने-अनजाने महिला और पुरुष के बीच गलतफहमी की खाई को और गहरा करने में सहायक होते हैं ! वैसे देखा जाए तो पुरुष द्वारा घर-परिवार की देख-भाल, भरण-पोषण भी एक तरह का व्रत ही तो है जो वह आजीवन निभाता है............!   

#हिन्दी_ब्लागिंग

करवा चौथ ! वर्षों से सीधे-साधे तरीके, बिना किसी ताम-झाम, बिना कुछ या ज्यादा खर्च किए सादगी से मनाया जाता आ रहा, पति-पत्नी के कोमल रिश्तों के प्रेम का प्रतीक, एक मासूम सा छोटा सा उत्सव ! पर समय के साथ-साथ इस पर भी बाजार की गिद्ध-दृष्टि लग गई ! शुरुआत भी उसी जगह, सिनेमा से हुई जहां से आज तक अधिकांश बुराइयां पनपती रही हैं ! पर संक्रामक्ता प्रदान की टी.वी.सीरियलों ने ! उनके अनगढ़, विषय-वस्तु से अनजान, गुगलई ज्ञानी निर्माता-निर्देशकों ने तो बंटाधार ही कर डाला ! इस दिन को ले कर, ऐसा ताम-झाम, ऐसी रौनक, ऐसे-ऐसे तमाशे और ऐसी-ऐसी तस्वीरें पेश की गयीं कि जो त्यौहार एक सीधी-साधी गृहणी अकेले या अपने कुछ रिश्तेदारों के साथ, सरलता व सादगी से मना लेती थी, वह भी दिखावे की चकाचौंध से भ्रमित हो बाजार के झांसे में आ गई। 

पहले की तरह अब महिलाएं घर के अंदर तक ही सिमित नहीं रह गई हैं। पर इससे उनके अंदर के प्रेमिल भाव, करुणा, त्याग, स्नेह, परिवार की मंगलकामना जैसे भाव खत्म नहीं हुए हैं ! और जब तक प्रकृति-प्रदत्त ऐसे गुण विद्यमान रहेंगे, तब तक कोई भी षड्यंत्र, कुचक्र या साजिश हमारी आस्था, हमारे विश्वास, हमारी परंपराओं का कुछ भी नहीं बिगाड़ पाएंगे

अब बाजार तो ठहरा बाजार ! उसे तो सिर्फ अपने लाभ से मतलब होता है। बस उसने महिलाओं की दशा को भांपा और उनकी भावनाओं को ''कैश'' करना शुरू कर दिया। देखते-देखते साधारण सी चूडी, बिंदी, टिकली, धागे सब "डिजायनर" होते चले गए। दो-तीन-पांच रुपये की चीजों की कीमत 100-150-200 रुपये हो गई। अब सीधी-सादी प्लेट या थाली से काम नहीं चलता, उसे सजाने की अच्छी खासी कीमत वसूली जाने लगी ! कुछ घरानों में छननी से चांद को देखने की प्रथा घर में उपलब्ध छननी से पूरी कर ली जाती थी पर अब उसे भी बाजार ने साज-संवार, दस गुनी कीमत कर, आधुनिक रूप दे, महिलाओं के लिए आवश्यक बना डाला। चाहे फिर वह साल भर या सदा के लिए उपेक्षित घर के किसी कोने में ही पडी रहे। पहले शगन के तौर पर हाथों में मेंहदी खुद ही लगा ली जाती थी या आस-पडोस की महिलाएं एक-दूसरे की सहायता कर देती थीं, पर आज यह लाखों का व्यापार बन चुका है। उसे भी पैशन और फैशन बना दिया गया है ! कल के एक घरेलू, आत्म केन्द्रित, सरल,मासूम से उत्सव, एक आस्था, को खिलवाड का रूप दे दिया गया। करोड़ों की आमदनी का जरिया बना दिया गया !    

यह तो रही बाजार की लिप्सा की बात ! यह व्रत-त्यौहार हमारे देश में प्राचीन काल से चले आ रहे हैं, जब महिलाएं घर संभालती थीं और पुरुषों पर उपार्जन की जिम्मेवारी होती थी। पर कुछ लोग देश में ऐसे भी हैं जिन्हें पारंपरिक त्यौहारों, उत्सवों या मान्यताओं से सख्त ''एलर्जी'' है ! कुछ तथाकथित आधुनिक नर-नारियों द्वारा विदेशी पंथों, विचारधाराओं तथा षड्यंत्रों के तहत सिर्फ अपने फायदे के लिए सदा तीज-त्यौहारों पर जहर उगला जाता है। उसी के तहत आज करवा चौथ को भी पिछडे तथा दकियानूसी त्यौहार की संज्ञा दे दी गयी है। इल्जाम यह भी लगाया जाता है कि पुरुष प्रधान समाज द्वारा महिलाओं को दोयम दर्जा देने की साजिश के तहत ही ऐसे उत्सव बनाए गए हैं ! जबकि सच्चाई यह है कि सदियों से घर की महिलाएं ही अपनी बच्चियों को ऐसे आयोजनों की जानकारी देती आ रही हैं ! मेरे ख्याल से तो कोई पुरुष जबरदस्ती अपनी पत्नी को दिन भर भूखा रहने को नहीं कहता होगा ! कहना भी नहीं चाहिए !    

आयातित कल्चर, विदेशी सोच तथा तथाकथित आधुनिकता के हिमायती कुछ लोगों को महिलाओं का दिन भर उपवासित रहना उनका उत्पीडन लगता है। अक्सर उनका सवाल रहता है कि पुरुष क्यों नहीं अपनी पत्नी के लिए व्रत रखते ? करवाचौथ के व्रत पर सवाल उठाने वाले मूढ़मतियों ने शायद छठ पूजा का नाम नहीं सुना होगा ! जो लिंग-विशिष्ट त्यौहार नहीं है। जिसके चार दिनों तक चलने वाले अनुष्ठान बेहद कठोर  होते हैं फिर भी नर-नारी अबाल-वृद्ध सभी के द्वारा पूरी श्रद्धा और आस्था से मनाए जाते हैं। 

व्रत का विरोध करने वालों को इसका अर्थ सिर्फ भोजन ना करना ही मालुम है। जब कि व्रत अपने प्रियजनों को सुरक्षित रखने, उनकी अनिष्ट से रक्षा करने की मंशा का सांकेतिक रूप भर है। ऐसे लोग एक तरह से अपनी नासमझी से महिलाओं की प्रेम, समर्पण, चाहत जैसी भावनाओं को कमतर आंक उनका अपमान ही करते हैं और जाने-अनजाने महिला और पुरुष के बीच गलतफहमी की खाई को और गहरा करने में सहायक होते हैं ! वैसे देखा जाए तो पुरुष द्वारा घर-परिवार की देख-भाल, भरण-पोषण भी एक तरह का व्रत ही तो है जो वह आजीवन निभाता है, पर इस बात का प्रचार करने या सामने लाने से विघ्नसंतोषियों को उनके कुचक्र को, उनके षड्यंत्र को कोई फायदा नहीं बल्कि नुक्सान ही है, इसलिए इस पर सदा चुप्पी बनाए रखी जाती है ! 

आज समय बदल गया है ! पहले की तरह अब महिलाएं घर के अंदर तक ही सिमित नहीं रह गई हैं। पर इससे उनके अंदर के प्रेमिल भाव, करुणा, त्याग, स्नेह, परिवार की मंगलकामना जैसे भाव खत्म नहीं हुए हैं ! और जब तक प्रकृति-प्रदत्त ऐसे गुण विद्यमान रहेंगे, तब तक कोई भी षड्यंत्र, कुचक्र या साजिश हमारी आस्था, हमारे विश्वास, हमारी परंपराओं का कुछ भी नहीं बिगाड़ पाएंगे !

16 टिप्‍पणियां:

Sweta sinha ने कहा…

जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना रविवार २४ अक्टूबर २०२१ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

श्वेता जी
सम्मिलित कर मान देने हेतु अनेकानेक धन्यवाद

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुन्दर हमेशा की तरह कुछ अलग

Onkar ने कहा…

बहुत सुन्दर

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

सुशील जी
स्नेह बना रहे

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

हार्दिक आभार, ओंकार जी

ज्योति-कलश ने कहा…

चिंतनपरक सुन्दर सृजन

Kadam Sharma ने कहा…

सच्चाई उजागर करता लेख

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

ज्योति जी
हार्दिक आभार

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

कदम जी
अनेकानेक धन्यवाद

Jyoti Dehliwal ने कहा…

गगन भाई,बाजार ने हर त्यौहार का बाजारीकरण कर दिया है। यह हमारे ऊपर है कि हम इनके झांसे में आने से खुद को कितना रोक पाते है। विचारणीय लेख।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आज बाज़ारीकरण कर सभी त्योहारों को लोगों ने कटघरे में खड़ा कर दिया है ।
सार्थक लेख ।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

ज्योति जी
सही बात है पर इस इंद्रजाल से बचना बहुत ही मुश्किल है

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

संगीता जी
इसिलिए श्रद्धा, आस्था जैसी भावनाएं तिरोहित होती जा रही हैं, दिखावा बढता जा रहा है

Jigyasa Singh ने कहा…

बिल्कुल सार्थक संदर्भ उठाया है आपने गगन जी, दिखावे के लिए लोग कुछ भी करने को तैयार हैं, उसी तरह बाजार भी कुछ भी बेचने को तैयार है,सामयिक लेखन के लिए आपका बहुत बहुत आभार ।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

जिज्ञासा जी
ब्लॉग पर आपका सदा स्वागत है

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कभी ध्यान गया है किसी मंदिर में लगे किसी अभागे वृक्ष की तरफ ? उसके तने या जड़ के पास अपनी मन्नत पूरी करने के लिए दीया जला-जला कर उसकी लकड़ी को...