pub-3648900737756323 कुछ अलग सा: सिनेमा
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रविवार, 12 अप्रैल 2026

आशा ताई भी अलविदा कह गयीं 😢

भारतीय सिनेमा के संगीत के स्वर्ण काल का आखिरी रौशन चिराग, देश की सबसे पसंदीदा, लोकप्रिय, चहेती, पार्श्वगायिका आशा ताई ! कल ही उनके हृदयाघात की खबर आई थी ! आज वे देश के सभी संगीत प्रेमियों को गम में डूबा छोड़, अलविदा कह गयीं ! एक युग का अंत ! किसी भी दिवंगत के लिए सदा कहा जाता है कि प्रभु उसकी आत्मा को शांति प्रदान करें, पर ऐसी विभूतियां जब परमपिता के पास वापस पहुंचती होंगी तो मेरा यह विश्वास है कि उनकी उपस्थिति से देवलोक को ही एक दैवीय शांति और उनकी उपस्थिति का सुखद एहसास होता होगा ! ........अश्रुपूरित श्रद्धांजलि  🙏🙏

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

भारतीय फिल्मों का यदि उनके संगीत के नजरिए से आकलन किया जाए तो 1950 से लेकर तकरीबन 1980 तक का समय स्वर्णिम काल रहा। एक से एक बढ़ कर दिग्गज संगीत निदेशक, लेखक, गायक कलाकार इस समय में हुए ! किसी की किसी से कोई तुलना नहीं ! सबकी अपनी-अपनी खासियत, सबका अपना-अपना अलग अंदाज, सबकी अपनी-अपनी विशेषता ! परंतु एक-दूसरे से अलग अंदाज रखते हुए भी एक-दूसरे के पूरक ! हर दिल अजीज ! खुली किताब ! उनके बारे में इतना सब जाना जाता है कि अलग से और कुछ भी कहने, लिखने, बताने के लिए कुछ भी नया नहीं है !

सदा याद रहेंगी 

पर क्या समय ने कभी किसी को बक्शा है ?  एक-एक कर सभी इस लोक में अपना कर्म पूरा कर विधाता के चरणों में जा विराजे ! आज आशा जी भी वहां अपनी बहनों, भाइयों, साथी कलाकारों के पास अपने निर्धारित स्थान पर जा विराजीं ! वे सब भले ही भौतिक शरीर के साथ हमारे बीच ना हों, पर उनकी कला की उपस्थिति, समय को भी मात देते हुए सदा-सदा के लिए हमारे बीच बनी रहेगी !

किसी भी दिवंगत के लिए सदा कहा जाता है कि प्रभु उसकी आत्मा को शांति प्रदान करें, पर ऐसी विभूतियां जब परमपिता के पास वापस पहुंचती होंगी तो मेरा यह विश्वास है कि उनकी उपस्थिति से देवलोक को ही एक दैवीय शांति और उनकी उपस्थिति का सुखद एहसास होता होगा ! 

प्रभु भूलोक पर हृदयनाथ जी, उषा जी सहित उनके परिवार, उनके परिजनों को इस दुखद घड़ी को सहन करने हेतु संबल प्रदान करें !

ॐ शांति 🙏

शनिवार, 23 अक्टूबर 2021

करवाचौथ, बाजार तथा विघ्नसंतोषियों के निशाने पर

करवाचौथ के व्रत पर सवाल उठाने वाले मूढ़मतियों ने शायद छठ पूजा का नाम नहीं सुना होगा ! जो लिंग-विशिष्ट त्यौहार नहीं है। जिसके चार दिनों तक चलने वाले अनुष्ठान बेहद कठोर  होते हैं और नर-नारी अबाल-वृद्ध सभी के द्वारा श्रद्धा से मनाए जाते हैं। शायद व्रत का विरोध करने वालों को इसका अर्थ सिर्फ भोजन ना करना ही मालुम है। जब कि व्रत अपने प्रियजनों को सुरक्षित रखने, उनकी अनिष्ट से रक्षा करने की मंशा का सांकेतिक रूप भर है। ऐसे लोग एक तरह से अपनी नासमझी से महिलाओं की भावनाओं को कमतर आंक उनका अपमान ही करते हैं और जाने-अनजाने महिला और पुरुष के बीच गलतफहमी की खाई को और गहरा करने में सहायक होते हैं ! वैसे देखा जाए तो पुरुष द्वारा घर-परिवार की देख-भाल, भरण-पोषण भी एक तरह का व्रत ही तो है जो वह आजीवन निभाता है............!   

#हिन्दी_ब्लागिंग

करवा चौथ ! वर्षों से सीधे-साधे तरीके, बिना किसी ताम-झाम, बिना कुछ या ज्यादा खर्च किए सादगी से मनाया जाता आ रहा, पति-पत्नी के कोमल रिश्तों के प्रेम का प्रतीक, एक मासूम सा छोटा सा उत्सव ! पर समय के साथ-साथ इस पर भी बाजार की गिद्ध-दृष्टि लग गई ! शुरुआत भी उसी जगह, सिनेमा से हुई जहां से आज तक अधिकांश बुराइयां पनपती रही हैं ! पर संक्रामक्ता प्रदान की टी.वी.सीरियलों ने ! उनके अनगढ़, विषय-वस्तु से अनजान, गुगलई ज्ञानी निर्माता-निर्देशकों ने तो बंटाधार ही कर डाला ! इस दिन को ले कर, ऐसा ताम-झाम, ऐसी रौनक, ऐसे-ऐसे तमाशे और ऐसी-ऐसी तस्वीरें पेश की गयीं कि जो त्यौहार एक सीधी-साधी गृहणी अकेले या अपने कुछ रिश्तेदारों के साथ, सरलता व सादगी से मना लेती थी, वह भी दिखावे की चकाचौंध से भ्रमित हो बाजार के झांसे में आ गई। 

पहले की तरह अब महिलाएं घर के अंदर तक ही सिमित नहीं रह गई हैं। पर इससे उनके अंदर के प्रेमिल भाव, करुणा, त्याग, स्नेह, परिवार की मंगलकामना जैसे भाव खत्म नहीं हुए हैं ! और जब तक प्रकृति-प्रदत्त ऐसे गुण विद्यमान रहेंगे, तब तक कोई भी षड्यंत्र, कुचक्र या साजिश हमारी आस्था, हमारे विश्वास, हमारी परंपराओं का कुछ भी नहीं बिगाड़ पाएंगे

अब बाजार तो ठहरा बाजार ! उसे तो सिर्फ अपने लाभ से मतलब होता है। बस उसने महिलाओं की दशा को भांपा और उनकी भावनाओं को ''कैश'' करना शुरू कर दिया। देखते-देखते साधारण सी चूडी, बिंदी, टिकली, धागे सब "डिजायनर" होते चले गए। दो-तीन-पांच रुपये की चीजों की कीमत 100-150-200 रुपये हो गई। अब सीधी-सादी प्लेट या थाली से काम नहीं चलता, उसे सजाने की अच्छी खासी कीमत वसूली जाने लगी ! कुछ घरानों में छननी से चांद को देखने की प्रथा घर में उपलब्ध छननी से पूरी कर ली जाती थी पर अब उसे भी बाजार ने साज-संवार, दस गुनी कीमत कर, आधुनिक रूप दे, महिलाओं के लिए आवश्यक बना डाला। चाहे फिर वह साल भर या सदा के लिए उपेक्षित घर के किसी कोने में ही पडी रहे। पहले शगन के तौर पर हाथों में मेंहदी खुद ही लगा ली जाती थी या आस-पडोस की महिलाएं एक-दूसरे की सहायता कर देती थीं, पर आज यह लाखों का व्यापार बन चुका है। उसे भी पैशन और फैशन बना दिया गया है ! कल के एक घरेलू, आत्म केन्द्रित, सरल,मासूम से उत्सव, एक आस्था, को खिलवाड का रूप दे दिया गया। करोड़ों की आमदनी का जरिया बना दिया गया !    

यह तो रही बाजार की लिप्सा की बात ! यह व्रत-त्यौहार हमारे देश में प्राचीन काल से चले आ रहे हैं, जब महिलाएं घर संभालती थीं और पुरुषों पर उपार्जन की जिम्मेवारी होती थी। पर कुछ लोग देश में ऐसे भी हैं जिन्हें पारंपरिक त्यौहारों, उत्सवों या मान्यताओं से सख्त ''एलर्जी'' है ! कुछ तथाकथित आधुनिक नर-नारियों द्वारा विदेशी पंथों, विचारधाराओं तथा षड्यंत्रों के तहत सिर्फ अपने फायदे के लिए सदा तीज-त्यौहारों पर जहर उगला जाता है। उसी के तहत आज करवा चौथ को भी पिछडे तथा दकियानूसी त्यौहार की संज्ञा दे दी गयी है। इल्जाम यह भी लगाया जाता है कि पुरुष प्रधान समाज द्वारा महिलाओं को दोयम दर्जा देने की साजिश के तहत ही ऐसे उत्सव बनाए गए हैं ! जबकि सच्चाई यह है कि सदियों से घर की महिलाएं ही अपनी बच्चियों को ऐसे आयोजनों की जानकारी देती आ रही हैं ! मेरे ख्याल से तो कोई पुरुष जबरदस्ती अपनी पत्नी को दिन भर भूखा रहने को नहीं कहता होगा ! कहना भी नहीं चाहिए !    

आयातित कल्चर, विदेशी सोच तथा तथाकथित आधुनिकता के हिमायती कुछ लोगों को महिलाओं का दिन भर उपवासित रहना उनका उत्पीडन लगता है। अक्सर उनका सवाल रहता है कि पुरुष क्यों नहीं अपनी पत्नी के लिए व्रत रखते ? करवाचौथ के व्रत पर सवाल उठाने वाले मूढ़मतियों ने शायद छठ पूजा का नाम नहीं सुना होगा ! जो लिंग-विशिष्ट त्यौहार नहीं है। जिसके चार दिनों तक चलने वाले अनुष्ठान बेहद कठोर  होते हैं फिर भी नर-नारी अबाल-वृद्ध सभी के द्वारा पूरी श्रद्धा और आस्था से मनाए जाते हैं। 

व्रत का विरोध करने वालों को इसका अर्थ सिर्फ भोजन ना करना ही मालुम है। जब कि व्रत अपने प्रियजनों को सुरक्षित रखने, उनकी अनिष्ट से रक्षा करने की मंशा का सांकेतिक रूप भर है। ऐसे लोग एक तरह से अपनी नासमझी से महिलाओं की प्रेम, समर्पण, चाहत जैसी भावनाओं को कमतर आंक उनका अपमान ही करते हैं और जाने-अनजाने महिला और पुरुष के बीच गलतफहमी की खाई को और गहरा करने में सहायक होते हैं ! वैसे देखा जाए तो पुरुष द्वारा घर-परिवार की देख-भाल, भरण-पोषण भी एक तरह का व्रत ही तो है जो वह आजीवन निभाता है, पर इस बात का प्रचार करने या सामने लाने से विघ्नसंतोषियों को उनके कुचक्र को, उनके षड्यंत्र को कोई फायदा नहीं बल्कि नुक्सान ही है, इसलिए इस पर सदा चुप्पी बनाए रखी जाती है ! 

आज समय बदल गया है ! पहले की तरह अब महिलाएं घर के अंदर तक ही सिमित नहीं रह गई हैं। पर इससे उनके अंदर के प्रेमिल भाव, करुणा, त्याग, स्नेह, परिवार की मंगलकामना जैसे भाव खत्म नहीं हुए हैं ! और जब तक प्रकृति-प्रदत्त ऐसे गुण विद्यमान रहेंगे, तब तक कोई भी षड्यंत्र, कुचक्र या साजिश हमारी आस्था, हमारे विश्वास, हमारी परंपराओं का कुछ भी नहीं बिगाड़ पाएंगे !

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