गुरुवार, 7 अक्तूबर 2021

उपादेयता, इंसान की

हर कोई यही चाहता है कि जब तक जिंदगी है वह स्वावलंबी बना रहे ! पटाक्षेप होने तक चलायमान स्थिति में रह सके ! सच भी है, जब तक इंसान क्रियाशील रहता है उसका शरीर भी साथ देता रहता है ! उम्र को सिर्फ एक अंक मानने वाले ज्यादा देर तक गतिशील बने रहते हैं ! पर इसके बावजूद इंसान अब इंसान ना रह कर मशीन बना दिया गया है ! जब तक काम करती है, बढ़िया ! अन्यथा उठा कर "स्क्रैप" में फेंक दो ! देश में यूँही नहीं सैंकड़ों की तादाद में वृद्धाश्रम खुलते जा रहे हैं ! वह भी वहां, जहां बचपन से ही माँ-बाप को भगवान का दर्जा देने की सीख दी जाती है ! वहां इन तनहा इंसानों को डोलते देख रूह कांप जाती है .............!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

इस दुनिया में हर चीज की अपनी उपादेयता यानी उपयुक्तता या प्रयोज्यता है ! प्रकृति ने कोई भी वस्तु बिना किसी कारण नहीं बनाई है। सिर्फ मनुष्य की दृष्टि से ना देखा जाए तो हर जीव-जंतु, लता-गुल्म, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे का अपना महत्व है। एक दूसरे पर निर्भरता है। जरुरत है सभी को सभी की। पर इसके साथ ही जैसे ही किसी जड़ या चेतन की उपयोगिता खत्म होने को होती है या हो जाती है तो प्रकृति स्वयमेव ही उसे चुपचाप, धीरे से मिटा देती है, दूसरों पर भार नहीं बनने देती ! पर मनुष्य पर ऐसा नियम लागू नहीं होता ! वह लाचार, निश्चेष्ट, कमजोर, रोगी, पराश्रित होने के बावजूद दुनिया में बना रहता है ! ऐसी अवस्था में कभी न कभी, किसी न किसी दिन वह एक बोझ के रूप में परिणित हो, उपेक्षित सा दूसरों की दया-माया पर निर्भर हो कर रह  जाता है ! किसी द्वेष भाव या पूर्वाग्रह के चलते मैं ऐसा नहीं कह रहा हूँ ! यह प्रकृति का नियम है, सो है !   

हर कोई यही चाहता है कि जब तक जिंदगी है वह स्वावलंबी बना रहे ! पटाक्षेप होने तक चलायमान स्थिति में रह सके ! सच भी है, जब तक इंसान क्रियाशील रहता है शरीर भी साथ देता रहता है ! उम्र को सिर्फ एक अंक मानने वाले ज्यादा देर तक गतिशील बने रहते हैं ! इसीलिए बहुतेरे लोग नियमों के अनुसार सेवानिवृति पा जाने के बावजूद व्यस्त रहने का कोई न कोई जरिया खोज, खुद की उपायदेयता बनाए रखने के साथ-साथ  कुछ हद तक दूसरों को भी चिंता मुक्त रहने में मदद ही करते हैं ! ऐसे लोग अपने जीवन-संचित अनुभवों, दक्षता, विशेषज्ञता, का लाभ वर्तमान पीढ़ी को दे समाज-देश-जगत का उपकार ही करते हैं !  

पर यह सब कहना-सुनना जितना अच्छा और आसान लगता है उतना है नहीं ! उम्र बढ़ने के साथ-साथ कार्यक्षमता प्रभावित होती ही है ! फिर हारी-बिमारी, आर्थिक परिस्थितियां, घरेलू वातावरण, मनुष्य को बहुत कुछ सह, लाचार होने को मजबूर कर देते हैं ! बदलते परिवेश, पश्चिमी जीवन शैली, जीवनोपार्जन में कठिनाइयां, हर क्षेत्र में गलाकाट स्पर्धाएं, असहिष्णुता, बढ़ते तनाव, इन सब के कारण मानवोचित कोमल भावनाएं, सहज स्नेहिल भाव, परोपकारिता, स्नेह, त्याग, दयालुता सब समय के साथ-साथ तिरोहित होती चली जा रही हैं ! इनके स्थान पर कलह, क्लेश, वैमनस्य, ईर्ष्या, द्वेष, कुंठा मानव का स्वभाव बनते चले जा रहे हैं ! इंसान अब इंसान ना रह कर मशीन बना दिया गया है ! जब तक काम करती है, बढ़िया ! अन्यथा उठा कर "स्क्रैप" में फेंक दो ! देश में यूँही नहीं सैंकड़ों की तादाद में वृद्धाश्रम खुलते जा रहे हैं ! वह भी वहां, जहां बचपन से ही माँ-बाप को भगवान का दर्जा देने की सीख दी जाती है ! वहां इन तनहा इंसानों को डोलते देख रूह कांप जाती है ! क्या हासिल है, ऐसे जीने से ! इनके सर पर तो फिर भी छत है ! उन लाखों लोगों का क्या, जो घिसट-घिसट कर अपनी जिंदगी के दिन पूरे करते हैं ! 

सीधी सी बात हो  गई है ! जिससे कोई फ़ायदा नहीं उसका कोई मोल नहीं ! तुम्हारी कोई उपादेयता है तो बने रहो नहीं तो तुम अपनी जिम्मेदारी खुद हो ! इन बदलावों का सबसे बड़ा असर उम्रदराज व अवकाशप्राप्त लोगों पर साफ़ दिखना शुरू हो चुका है ! उनकी तमाम सेवाओं, मेहनत, समर्पण को सिरे से भुला दिया जाता है ! उन्हें सम्मान तभी मिलता है, जब उनके पिछवाड़े अभी भी कोई ''कुर्सी'' हो या फिर माथे पर कोई तमगा चिपका हो ! जरा सा गौर करेंगे तो सैलून में, मॉल में, हाट-बाजार में दसियों उदाहरण मिल जाएंगें जहां इन्हें "फॉर ग्रांटेड" ले लिया जाता है ! 

ऐसे लोगों से मेरा कोई द्वेष नहीं है ना ही कोई पूर्वाग्रह है ! मुझे सदा उनसे हमदर्दी और सहानुभूति रही है ! दुःख होता है उनकी विषमताओं को देख कर ! कई-कई बार कुछ देर के लिए एक ऐसी ही जगह जा उनके सूनेपन को कम करने की कोशिश करता रहा ! पर इस सबसे उनके दुःख को ख़त्म तो नहीं किया जा सकता था ! उलटे खुद का मन अवसाद से भर जाता था, वहां से लौटते हुए ! इस अवस्था में, जीवन के इस पड़ाव पर उन्हें किसी उपहार या अन्य किसी भौतिक सामग्री की चाह नहीं होती, उन्हें जरुरत होती है प्यार की, स्नेह की, अपनेपन की, किसी के साथ की, जो उन्हें कभी नहीं मिल पाता ! इसीलिए मेरी प्रकृति से शिकायत है कि क्यों नहीं उसने कुछ ऐसा सिस्टम बनाया, जिससे दूसरे जीव-जंतुओं, पेड़-पौधों, लता-गुल्मों की तरह ऐसे लोगों की भी इस जहां से अपनी पारी खेलने के पश्चात सम्मान से विदाई हो सकती।     

14 टिप्‍पणियां:

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन  में" आज गुरुवार 07 अक्टूबर 2021 शाम 3.00 बजे साझा की गई है....  "सांध्य दैनिक मुखरित मौन  में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

यशोदा जी
सम्मिलित करने हेतु अनेकानेक धन्यवाद

कविता रावत ने कहा…

सच कहा आपने
दुख दूर करने की मंशा से दो चार घडी क्‍या बैठ लेते हैं तो स्‍वयं का मन दुखी हो उठता है, एक संवेदनशील इंसान के लिए यह कतई संभव नहीं है कि वह बहुत देर तक किसी के दुख को देखकर अन्‍य लोगों की तरह आंखे मूंद आगे बढ् जाए
मर्मस्‍पर्शी आज का कटु सत्‍य

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

कविता जी
चाह कर भी किसी की बेहतरी के लिए कुछ न कर पाने की मजबूरी और दुखी कर जाती है। पर यह भी एक तरह से श्मशान वैराग्य की तरह ही है। कुछ देर बाद प्रकृति फिर अपने मायाजाल में उलझा लेती है

Sweta sinha ने कहा…

जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार ८ अक्टूबर २०२१ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।

Jigyasa Singh ने कहा…

यथार्थ का मर्मस्पर्शी वर्णन किया है आपने गगन जी ।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

श्वेता जी
मान देने हेतु अनेकानेक धन्यवाद

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

जिज्ञासा जी
जिंदगी के आखिरी सफर के इंतजार में बैठे राहगीरों की हालत अवर्चनीय हो जाती है

Manisha Goswami ने कहा…

यथार्थ को बयां करता हुआ बहुत ही उम्दा लेख एक एक बात सत्य है!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

हर एक कि कीमत तभी तक है जब तक कि उपादेयता है । सारगर्भित लेख ।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

मनीषा जी
बहुतेरे इंसानों को तो ऐसी-ऐसी जगह और परिस्थितियों में दिन काटने पड़ते हैं, जहां लोगों के पालतू जानवर खड़ा होना भी पसंद ना करें

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

संगीता जी
सारा संसार बाजार बन गया है और इंसान वस्तु

रेणु ने कहा…

समाज का कटु सत्य उद्घाटित करता लेख। जो आज उम्र अथवा धन इत्यादि के गर्व-दर्प में आकंठ लीन हो दूसरों को अनदेखा कर रहे हैं, उन्हें अपना हश्र नही पता। प्रकृति की गति गोलाई में है।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…


रेणु जी
बिलकुल सही बात। पूरी तरह सहमत

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