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रविवार, 12 जुलाई 2026

यूपी का रहस्यमयी मेंढक मंदिर

ओयल कस्बे में स्थित लगभग 200 साल पुराने नर्मदेश्वर महादेव मंदिर को सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, इसके साथ ही यहां एक और आश्चर्यजनक बात यह भी है कि जहां हर शिवालय में नंदी बाबा बैठे हुए मिलते हैं वहीं वे यहां खड़ी मुद्रा में दिखाई देते हैं ! वैसे उज्जैन के संदीपनी आश्रम में स्थित शिव मंदिर के नंदी देव भी इसी मुद्रा में स्थित हैं.....................!  

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

''अरे भाई निकल के आ घर से, आ  घर से ! दुनिया की रौनक देख फिर से, देख ले फिर से !'' किशोर कुमार द्वारा गाया गया यह गाना उन्हीं की फिल्म नई दिल्ली का है ! उस समय फिल्म के अनुसार गीत का आशय भले ही कुछ और रहा हो, पर ''दुनिया की रौनक के बदले देश की रौनक'' जैसे थोड़े से बदलाव के साथ यदि इसे पर्यटन से जोड़ दें तो यह आज भी मौजूं है ! अपने देश के हर क्षेत्र में ऐसे-ऐसे अनूठे, अनोखे दर्शनीय स्थल, पूजास्थान, विलक्षण वास्तु निर्माण उपलब्ध हैं कि उनको देखने के लिए जीवन कम पड़ जाए !
विचित्र 
ऐसी ही एक जगह है, उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले से करीब 12 किमी की दूरी पर ओयल कस्बे में स्थित अनूठी वास्तु-कला से निर्मित नर्मदेश्वर महादेव मंदिर ! आम धारणा और मान्यता है कि शिवजी का वाहन नंदी है, पर यहां वे एक विशाल मेंढक की आकृति वाले चबूतरे पर विराजमान हैं, इसीलिए इसे 'मेंढक मंदिर' भी कहा जाता है। इस मंदिर का निर्माण ओयल रियासत के राजा बख्श सिंह ने 1860 से 1870 की अवधि में करवाया था। 
विलक्षण 
लोकमत है कि एक बार राजा बख्श सिंह के राज में भयंकर सूखा पड़ा था। राजा भगवान शिव के परम भक्त थे। उन्होंने उस विपदा से उबरने और अपने क्षेत्र की रक्षा हेतु, पंडितों की सलाह पर "मंडूक तंत्र" के आधार पर इस मंदिर का निर्माण मेंढक के आकार में करवाया था। इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग नर्मदा नदी से लाया गया था, जिसे लेकर यह मान्यता है कि यह शिवलिंग दिन में 3 बार अपना रंग बदलता है।
नर्मदेश्वर 
एक अन्य मान्यता के अनुसार यहां के राजा ने पुत्र प्राप्ति के लिए मेंढक की बलि दी थी, क्योंकि मेंढक को प्रजनन का प्रतीक माना जाता है ! उसी 'मेंढक बलिदान' को श्रद्धांजलि स्वरूप यह मंदिर तंत्रवाद पर आधारित एक तांत्रिक यंत्र की तरह बनवाया गया था । जिसका मुख्य द्वार पूर्व की ओर तथा दूसरा द्वार दक्षिण दिशा की ओर खुलता है ! मंदिर में एक कुआं है, जिसका पानी जमीन से ऊपर रहता है। मंदिर की अनोखी बनावट वर्षों से लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है ! 
अद्भुत 
अनूठा 
ओयल कस्बे में स्थित लगभग 200 साल पुराने नर्मदेश्वर महादेव मंदिर को सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, इसके साथ ही यहां एक और आश्चर्यजनक बात यह भी है कि जहां हर शिवालय में नंदी बाबा बैठे हुए मिलते हैं वहीं कुछेक मंदिरों में वे खड़ी मुद्रा में भी दिखाई देते हैं ! यहां भी वे उज्जैन के संदीपनी आश्रम में स्थित शिव मंदिर के नंदी देव की तरह खड़ी मुद्रा में हैं ! 


संदीपनी आश्रम
मेंढक मंदिर लखनऊ से 135 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां पहुंचने के लिए लखीमपुर जाना होता है, जहां से ओयल की दूरी 11 किलोमीटर है। लखीमपुर से स्थानीय बस या टैक्सी के जरिए मंदिर पहुंचा जा सकता है ! यहां से सबसे नजदीकी एयरपोर्ट और रेलवे स्टेशन लखनऊ है। 

@अंतर्जाल का हार्दिक आभार 🙏

मंगलवार, 19 अक्टूबर 2021

गिलहरी का पुल

फिर वह दिन भी आ गया जब पुल बन कर तैयार हो गया। उस दिन उससे जुड़े सारे लोग बहुत खुश थे। तभी एक महिला मजदूर सावित्री की नजर पुल की मुंडेर पर निश्चेष्ट पड़ी उस गिलहरी पर पड़ी, जिसने महिनों उन सब का दिल बहलाया था। उसे हिला-ड़ुला कर देखा गया, पर उस नन्हें जीव के प्राण पखेरु उड़ चुके थे। यह विड़ंबना ही थी कि जिस दिन पुल बन कर तैयार हुआ उसी दिन उस गिलहरी ने अपने प्राण त्याग दिए ..................!


#हिन्दी_ब्लागिंग 


हजारों साल पहले, त्रेतायुग में जब राम जी की सेना लंका पर चढ़ाई के लिए सागर पर सेतु बना रही थी, कहते हैं तब एक छोटी सी गिलहरी ने भी अपनी तरफ से जितना बन पडा था योगदान कर प्रभू का स्नेह प्राप्त किया था। शायद उस गिलहरी की  वंश-परंपरा अभी तक चली आ रही है ! क्योंकि फिर उसी देश में, एक गिलहरी ने फिर एक पुल के निर्माण में सहयोग किया था ! लोगों का प्यार भी उसे भरपूर मिला पर अफ़सोस जिंदगी नहीं मिल पाई !

अंग्रेजों के जमाने की बात है। दिल्ली-कलकत्ता मार्ग पर इटावा शहर के नौरंगाबाद इलाके के एक नाले पर एक पुल का निर्माण हो रहा था। पचासों मजदूरों के साथ-साथ बहुत सारे सर्वेक्षक, ओवरसियर, इंजिनीयर तथा सुपरवाईजर अपने-अपने काम पर जुटे, समय पर कार्य पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे थे। जाहिर है भोजनावकाश के दौरान, इतने लोगों के कलेवे-नाश्ते के अन्नकण यहां-वहां बिखर ही जाते थे ! उन्हीं को अपना भोजन बनाने के लिए कहीं से एक गिलहरी वहां रोज आने लगी !   
यह छोटी सी समाधी पुल की मुंड़ेर पर बनी हुई है, इसिलिये इस पुल का नाम भी गिलहरी का पुल पड़ गया। आस-पास के लोग कभी-कभी इस पर दिया-बत्ती कर जाते हैं
शुरु-शुरु में तो वह काफी ड़री-ड़री और सावधान रहती थी ! जरा सा भी किसी के पास आने या आहट होते ही झट से किसी सुरक्षित स्थान पर जा छुपती थी। पर धीरे-धीरे वह वहां के वातावरण से हिलमिल गई। उसको समझ आ गया कि इन मानवों से उसे कोई खतरा नहीं है। कुछ ही दिनों में वह काम में लगे मजदुरों से इतनी हिल-मिल गई कि अब बिना किसी डर के उनके पास ही दौड़ती-घूमती रहने लगी। उनके हाथ से खाना भी लेने लग गई ! उसकी हरकतों और तरह-तरह की आवाजों से काम करने वालों का भी मनोरंजन तो होता ही था साथ ही इस जीवित खिलौने की अठखेलियों से कुछ हद तक उनका काम का तनाव भी दूर रहने लगा था। वे भी रोज की एकरसता से आने वाली सुस्ती से मुक्त हो काम करने लगे थे ! 
फिर वह दिन भी आ गया जब पुल बन कर तैयार हो गया। उस दिन उससे जुड़े सारे लोग बहुत खुश थे। तभी एक महिला मजदूर सावित्री की नजर पुल की मुंडेर पर निश्चेष्ट पड़ी उस गिलहरी पर पड़ी, जिसने महिनों उन सब का दिल बहलाया था। उसे हिला-ड़ुला कर देखा गया पर उस नन्हें जीव के प्राण पखेरु उड़ चुके थे। यह विड़ंबना ही थी कि जिस दिन पुल बन कर तैयार हुआ उसी दिन उस गिलहरी ने अपने प्राण त्याग दिये। उपस्थित सारे लोग उदासी से घिर गये। कुछ मजदुरों ने वहीं उस गिलहरी की समाधी बना दी। जो आज भी देखी जा सकती है। यह छोटी सी समाधी पुल की मुंड़ेर पर बनी हुई है, इसिलिये इस पुल का नाम भी गिलहरी का पुल पड़ गया। आस-पास के लोग कभी-कभी इस पर दिया-बत्ती कर जाते हैं।

@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

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