pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शनिवार, 20 मार्च 2021

कोटद्वार के सिद्धबली हनुमान

हनुमान जी यहां आने वाले आने वाले अपने सारे भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। इसीलिए यहां हर धर्म के लोग अपनी इच्छापूर्ति के लिए दूर-दूर से आते रहते हैं। मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु मंदिर परिसर में भंडारा आयोजित कर प्रभु को अपना आभार व्यक्त करते हैं। लोगों की श्रद्धा का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां  होने वाले विशेष भंडारों की बुकिंग फिलहाल 2025 तक के लिए बुक हो चुकी है..........!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

सिद्धबली हनुमान जी का मंदिर, उत्तराखंड के कोटद्वार नगर के दर्शनीय स्थलों में  एक प्रमुख देव स्थान है। जो मुख्य नगर से करीब तीन किमी की दूरी पर खोह नदी के किनारे,नजीबाबाद-बुआखाल राष्ट्रीय राजमार्ग पर  लगभग 135 फुट की ऊंचाई पर एक पहाड़ी टीले पर स्थित है। इस ऊंचाई से चारों ओर का नैसर्गिक दृश्य निहारना अपने आप में एक अलौकिक अनुभव प्रदान करता है। ऐसी दृढ मान्यता है कि हनुमान जी यहां आने वाले आने वाले अपने सारे भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। इसीलिए यहां हर धर्म के लोग अपनी इच्छापूर्ति के लिए दूर-दूर से आते रहते हैं। मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु मंदिर परिसर में भंडारा आयोजित कर प्रभु को अपना आभार व्यक्त करते हैं। लोगों की श्रद्धा का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां  होने वाले विशेष भंडारों की बुकिंग फिलहाल 2025 तक के लिए बुक हो चुकी है। 





सड़क से लगे प्रवेश द्वार से 158 सीढ़ियां चढ़ कर मुख्य मंदिर तक पहुंचा जाता हैं। वहां  सफ़ेद संगमरमर की बेहद आकर्षक प्रतिमा स्थापित है। पूरा परिसर बेहद साफ़-सुथरा और मनभावन है।  मंदिर  से कुछ ही नीचे शिव जी और शनिदेव विराजमान हैं। मंदिर से  तक़रीबन आधी दूर पहले भक्तों द्वारा भंडारा करने की सुन्दर व्यवस्था है। ऊपर प्रकृति के साए में मंदिर का वातावरण इतना मनोहर-शांत व मनमोहक है कि वहां से वापस लौटने की इच्छा ही नहीं होती। बहुत कम जगहों पर ऐसा अहसास होता है। 




नाथ परंपरा की धारणाओं के अनुसार गुरु गोरखनाथ एवं उनके शिष्यों ने यहां लम्बे समय तक तपस्या की, जो की बाद में ‘सिद्ध’ नाम से प्रसिद्द हुए। जानकारों के अनुसार 14वीं शताब्दी में प्रख्यात संत सिधवा ने भी इसी जगह आ कर साधना की थी, जिन्हें सिद्ध के रूप  में पूजा जाता है। मंदिर की  स्थापना के बारे  में यह बताया जाता है कि इस स्थान पर तप साधना करने के बाद सिद्ध बाबा को हनुमान जी की  सिद्धि प्राप्त हुई थी।  उसके  उपरांत सिद्ध बाबा ने  यहां बजरंगबली की एक  विशाल मूर्ति का   निर्माण करवाया था, तबसे इस जगह का नाम सिद्धबली पड़ गया। 

 

सिद्ध बाबा की समाधी और शिव मंदिर  


इस बारे में एक और भी कहानी प्रचलित है, जिसके अनुसार अंग्रेजों के समय एक मुस्लिम अधिकारी अपने घोड़े पर सवार जब यहां पहुंचे तो भावशून्य हो गए ! उसी अवस्था में उन्हें भान हुआ कि सिद्ध बाबा की समाधि पर हनुमान जी के मंदिर की स्थापना की जाए ! सजग होने पर उन्होंने स्थानीय लोगों से इस बात की चर्चा की और फिर इस मंदिर का निर्माण हुआ। जिसे धीरे-धीरे भक्तों और श्रद्धालुओं की आस्था ने यह भव्य स्वरुप प्रदान करवाया। 



हनुमानजी हमारे सर्वप्रिय पांच देवताओं में से एक हैं। तत्काल प्रसन्न होने और अभय प्रदायी होने के कारण ये अबालवृद्ध सभी में अत्यंत लोकप्रिय हैं। संसार भर में इनके भक्त इनका स्मरण कर सुख-शांति पाते हैं।इनके मंदिर विश्व भर में स्थापित हैं, जहां एक से बढ़ कर एक प्रतिमाएं स्थापित हैं। पर कुछ कम जाना जाने वाले इस सिद्धबली की मूर्ति भी अद्भुत है। मौका मिले तो दर्शन करने जरूर आना चाहिए।   

मंगलवार, 16 मार्च 2021

एक दर्शनीय स्थल, कोटद्वार

दर्शनीय स्थानों में सबसे महत्वपूर्ण कण्व ऋषि का आश्रम है जो पहाड़ की तलहटी में, शहर से करीब 35 किमी की दूरी पर स्थित है। यही वह जगह है जहां शकुंतला-दुष्यंत के यशस्वी पुत्र भरत का जन्म और शैशव काल बीता था। जिनके नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा। सुनसान-बियाबान में यह शांत जगह सकून प्रदायी तो है पर भीतर ही भीतर कुछ विवाद समेटे, बहुत ही ज्यादा देखरेख की मांग भी करती है.............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

जीवन में कभी-कभी कुछ ऐसा घट जाता है, जिसकी पहले दूर-दूर तक संभावना होती नहीं लगती। शायद इस लिए भी इसे अनिश्चित कहा गया है। कुछ ऐसा ही हुआ जब विभिन्न परिस्थितियों के चलते उत्तराखंड के एक शांत से शहर कोटद्वार जाने का मौका हासिल हो गया। यह उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे गढ़वाल मंडल के पौड़ी जिले का खोह नदी के तट पर बसा, प्रमुख नगर है। इतिहास में इसका उल्लेख 'खोहद्वार' के रूप में उपलब्ध है। इसे गढ़वाल का प्रवेशद्वार भी कहा जाता है। यहां करीब 150000 लोगों की बसाहट है। 



झंडा चौक, कोटद्वार 

देश भर से रेल द्वारा जुड़े, कोटद्वार की भौगोलिक स्थिति कुछ ऐसी है कि यहां से कुछ धार्मिक व पर्यटन के विश्वप्रसिद्ध स्थल बहुत नजदीक पड़ते हैं। जैसे हरिद्वार और ऋषिकेश यहां से लगभग 70 से 90 किमी की दूरी पर पश्चिम की ओर, कॉर्बेट नेशनल पार्क करीब 150 किमी दूर पूर्व की ओर, तक़रीबन 40 किमी उत्तर-पूर्व में लैंसडाउन, जहां प्राकृतिक गोद में गढ़वाल राइफल्स का रेजिमेंटल सेंटर है तथा करीब 85 किमी पूर्व में रामगंगा नदी पर बना दर्शनीय कालागढ़ बाँध स्थित है। वहीं बद्रीनाथ और केदारनाथ धाम के लिये भी सीधी बस और टैक्सी सेवा उपलब्ध है। उतनी ही आसानी से पौड़ी, श्रीनगर, रुद्रप्रयाग भी जाया जा सकता है। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून यहां से करीब सवा सौ किमी है। जबकि देश की राजधानी दिल्ली की दूरी तकरीबन सवा दो सौ किमी  पड़ती है।  

दुष्यंत-शकुंतला विवाह स्थली 


दर्शनीय स्थानों में सबसे महत्वपूर्ण कण्व ऋषि का आश्रम है जो पहाड़ की तलहटी में, शहर से करीब 13-14 किमी की दूरी पर स्थित है। यही वह जगह है जहां शकुंतला-दुष्यंत के यशस्वी पुत्र भरत का जन्म और शैशव काल बीता था। जिनके नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा। सुनसान-बियाबान में यह शांत जगह सकून प्रदायी तो है पर भीतर ही भीतर कुछ विवाद समेटे, बहुत ही ज्यादा देखरेख की मांग भी करती है। 

                                

सिद्धबली हनुमान जी 
नगर के पास ही स्थित हनुमान जी का सिद्धबली मंदिर भी एक प्रख्यात आस्था स्थली है। जहां श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है।


अन्य प्रमुख दर्शनीय स्थलों में दुर्गा देवी मंदिर जो कोटद्वार से लगभग 9 किलोमीटर दूर खोह नदी के तट पर तथा शक्ति पीठ, सुखरी देवी मंदिर दर्शनीय स्थान हैं।

उधर पहाड़ की एक चोटी चर्कान्य शिखर के रूप में जानी जाती है इसी स्थान पर महर्षि चरक ने निघुंट नामक ग्रन्थ की रचना की थी। जिसमें हिमालय की गोद में छुपी दैवीय, अनमोल औषधीय जड़ी-बूटी तथा पौधों के बारे में बहुमूल्य जानकारियां संग्रहित की गई थीं। अब जहां अंग्रेज रहे हों और वहां  चर्च ना हो, ऐसा तो हो ही नहीं सकता; उसी प्रथा के अनुसार यहां भी एक सुंदर दर्शनीय सेंत जोसेफ चर्च बना हुआ है। जो शिल्प कला का बेहतरीन नमूना है। 

हमारा देश ऐसी असंख्य जगहों से भरा पड़ा है जो अपने आप  में हर दृष्टि से समृद्ध, मनोभावन, ऐतिहासिक और धार्मिक जानकारियों का खजाना समेटे हैं ! जरुरत है तो सिर्फ अन्वेषण की !!

गुरुवार, 11 मार्च 2021

लॉक-डाउन के मेरे मासूम साथी

आश्चर्य इस बात का रहा कि ये सारे पक्षी जोड़े में ही आते हैं और पाबंद इतने कि कभी-कभार छोड़, किसी ने भी कभी भी दूसरी प्रजाति के साथ छीना-झपटी का मौका नहीं आने दिया ! एक दूसरे में दखलंदाजी नहीं की ! जैसे जंगल में सरोवर का पानी पीने जानवर क्रम से आते हैं ठीक वैसे ही, बिना दूसरे को हैरान-परेशान किए। उनके आने से एक जीवंतता सी महसूस होने लगती है। उनकी हरकतों, प्रयासों, चुहल से एक हल्केपन का एहसास होने लगता है। तबियत तनाव मुक्त हो जाती है..............!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

संसार में मानवों के इतर भी एक विशाल दुनिया है। उसमें आए दिन बदलाव भी होते रहते हैं। पर जिस पर हमारा ध्यान कम ही जाता है और कुछ का तो पता ही नहीं चल पाता कि कब क्या हो गया ! जैसे दो-तीन साल पहले तक हमारे इलाके में काफी गौरैया दिखा करती थीं पर आज बड़ी मुश्किल से नजर आती हैं ! अलबत्ता कबूतरों की तादाद बढ़ गई है। इनके साथ ही तोते भी अच्छी-खासी संख्या में हैं ! पर सबसे अहम् और अच्छी बात कि कभी लुप्तप्राय कौए फिर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने लगे हैं ! इनके अलावा कभी-कभार, इक्का-दुक्का, जाने-अनजाने अन्य पक्षियों की आवाजें भी सुनने को मिल जाती हैं। भले ही कोरोना के प्रकोप ने कहर ढाया हो पर उसके कारण ही हमारी हलचलों में कमी होने के कारण, सुधरे वातावरण के चलते ही इन परिंदों को देखने, उनके संपर्क में आने का सुख भी उपलब्ध हो पाया है। 


हमारे घर के नजदीक ही एक बिल्ली-प्रेमी घर है, जहां आठ-दस बिल्लियां पलती हैं। अब जाहिर है वे घर में कैद हो कर तो रहेंगी नहीं, सो उनका इधर-उधर अबाध विचरण होता रहता है ! उन्हीं के आतंक के कारण हमने छत पर परिंदों की खातिर चुग्गा-पानी रखना बंद कर दिया था। अपने सामने ही जो थोड़ा-बहुत हो पाता था, उनके लिए कुछ उपलब्ध करवा दिया जाता था। तभी लॉक-डाउन आ गया ! सभी अपने-अपने घरों में नजरबंद हो गए ! तभी एक दिन अचानक ध्यान गया कि आँगन में अक्सर एक मैना का जोड़ा घूमते-चुगते दिखने लगा है। उनके लिए कुछ वहीं बिखेरा जाने लगा ! कुछ दिनों बाद उनकी संख्या तीन हुई, पर कुछ ही दिनों के लिए स्थाई मेहमान दो ही रहे ! एक दिन दो कबूतर भी पधारे। बढ़ती आमद देख, दीवाल पर एक कटोरे में चुग्गा-दाना रख दिया गया, ताकि वे नजरों के सामने, बिना किसी अप्रत्याशित जानलेवा हमले से सुरक्षित रह अपनी क्षुधापूर्ति कर सकें !  



धीरे-धीरे मेहमानों की संख्या में बढ़ोत्तरी होती गई। पहले मैना का जोड़ा आया ! फिर कबूतर का ! फिर दो तोते और फिर दो कौए ! आश्चर्य इस बात का रहा कि ये सारे पक्षी जोड़े में ही आए और पाबंद इतने कि कभी-कभार को छोड़ कभी भी दूसरी प्रजाति के साथ छीना-झपटी का मौका नहीं आने दिया !  एक दूसरे में दखलंदाजी नहीं की ! जैसे जंगल में सरोवर का पानी पीने जानवर क्रम से आते हैं ठीक वैसे ही, बिना दूसरे को हैरान-परेशान किए। उनके आने से एक जीवंतता सी महसूस होने लगती है। उनकी हरकतों, प्रयासों, चुहल से एक हल्केपन का एहसास होने लगता है। तबियत तनाव मुक्त हो जाती है। 
अपनी बारी आने के इंतजार में कौवा 

इतने दिनों के इनके साथ से इनकी आदतें, इनके खाने का अंदाज, खाते समय की सतर्कता सब धीरे-धीरे समझ में आने लगी हैं। जैसे की मैना खिलंदड़ी स्वभाव की होती है ! टिक कर नहीं खाती ! खाते-खाते कभी-कभी कुछ आवाज भी करती है ! ऊपर खाते हुए कुछ गिर जाता है तो नीचे आ चुगना शुरू कर देती है ! एक बार में ज्यादा नहीं खाती। कबूतर मस्त-मौला लगता है ! संगिनी खाती है तो कभी-कभी गर्दन फुला अलग खड़ा देखता रहता है ! खाता कम है, गिराता ज्यादा है ! औरों की बनिस्पत देर तक खाता है ! शायद खुराक ज्यादा होती हो ! कौवा झटके से आ कुछ खा, कुछ दबा झट से उड़ जाता है ! बेहद चौकन्ना रहता है। मिट्ठू मियाँ की बात ही अलग है। कम आते हैं, हरी मिर्ची का लालच देने के बावजूद ! टिंटियाते भी खूब हैं। पर उनसे ही सबसे ज्यादा रौनक लगती है।  


अब जब सब कुछ नॉर्मल होने की राह पर है। तब भी मेरे इन मासूम साथियों का आना बदस्तूर जारी है। हालांकि हमारा आपस में दोस्ताना संबंध तो स्थापित नहीं हो पाया है, फिर भी अच्छा लगता है इनका आना ! इंतजार रहने लगा है इनका ! बदलते मौसम के साथ ही इनका समय भी बदल रहा है अब दिन भर में कभी भी की जगह सुबह व शाम का ही समय इन्हें अपने अनुकूल लगने लगा है। आने वाली गर्मी को देख इनके भोजन की व्यवस्था भी किसी माकूल जगह पर ही करनी पड़ेगी ! देखें कैसे क्या हो पाता है.....! 

सोमवार, 8 मार्च 2021

आधा विश्व हो तुम !!

एक ऐसे समाज को, जो खुद आबादी का आधा ही हिस्सा है, किसने हक दिया महिलाओं के लिए साल में एक दिन निश्चित करने का ? कोई पूछने वाला नहीं है कि क्यों भाई संसार की आधी आबादी के लिए ऐसा क्यों ? क्या ये कोई विलुप्तप्राय प्रजाति है  ? यदि ऐसा है तो पुरुषों के नाम क्यों नहीं कोई दिन निश्चित किया जाता ? पर सभी खुश हैं ! विडंबना यह है कि वे और भी आह्लादित हैं जिनके नाम पर ऐसा दिन मनाया जा रहा होता है ! समाज के इस महत्वपूर्ण हिस्से को इतना चौंधिया दिया गया है कि कुछेक को छोड़ वे अपने प्रति होते अन्याय, उपेक्षा को न कभी देख पाती हैं और न कभी महसूस ही कर पाती हैं........सामयिक पर पुरानी पोस्ट, कुछ फेर-बदल के साथ 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

आज आठ मार्च है, महिलाओं को समर्पित एक दिन ! उन महिलाओं को जो विश्व का आधा हिस्सा हैं ! उन्हें बराबरी का एहसास करवाने, अपने हक़ के लिए जागरूक होने का दिन। पर सोचने की बात है कि क्या संसार का यह आधा भाग इतना कमजोर है कि उस पर  किसी विलुप्त होती  नस्ल की तरह ध्यान  दिया                                                                                                                                  
जाए ! उससे भी बड़ी बात, क्या सचमुच पुरुष केंद्रित समाज महिलाओं को बराबरी का हकदार मानता है ? क्या वह दिल से चाहता है कि ऐसा हो, या सिर्फ उन्हें मुगालते में रखने का नाटक है ?  क्या यह पुरुषों की ही सोच नहीं है कि महिलाओं को लुभाने के लिए साल में एक दिन उनको समर्पित कर दिया जाए ? वैसे ऐसे समाज को, जो खुद आबादी का आधा ही हिस्सा है उसे किसने हक दिया महिलाओं के लिए साल में एक दिन निश्चित करने का ? कोई पूछने वाला नहीं है कि क्यों भाई संसार की आधी आबादी के लिए ऐसा क्यों ? क्या वे कोई विलुप्तप्राय प्रजाति है ? यदि ऐसा है तो पुरुषों के नाम क्यों नहीं कोई दिन निश्चित किया जाता ? पर सभी खुश हैं ! विडंबना है कि वे तो और भी आह्लादित हैं जिनके नाम पर ऐसा दिन मनाया जा रहा होता है और इसे मनाने में तथाकथित सभ्रांत घरानों की महिलाएं बढ-चढ कर हिस्सा लेती हैं।
आज जरूरत है, महिलाओं को अपनी शक्ति को आंकने की, अपने बल को पहचानने की, अपनी क्षमता को पूरी तौर से उपयोग में लाने की, अपने सोए हुए जमीर को जगाने की और यह सब उसे खुद ही करना है ! आसान नहीं है यह सब, पर करना तो है ही ! 
आज जरूरत है सोच बदलने की। इस तरह की मानसिकता की जड पर प्रहार करने की। सबसे बडी बात महिलाओं को खुद अपना हक हासिल करने की चाह पैदा करने की। कभी हनुमान जी को उनकी शक्तियों की याद दिलाने में जामवंत ने सहायता की थी ! पर आज कोई भी ऐसा करने वाला नहीं है ! उन्हें खुद ही प्रयास करने होंगे, खुद ही  अपनी लड़ाई लड़नी होगी, खुद को ही सक्षम-सशक्त बनाना होगा ! हाँ,   
कुछ ज़रा सी बर्फ टूटी तो है. पर गति बहुत धीमी है, ऐसे में तो वर्षों-वर्ष लग जाएंगे ! क्योंकि यह इतना आसान नहीं है ! हजारों सालों की मानसिक गुलामी की जंजीरों को तोडने के लिए अद्मय, दुर्धष संकल्प और जीवट की जरूरत है। उन प्रलोभनों को ठुकराने के हौसले की जरूरत है जो आए दिन उन्हें परोस कर अपना मतलब साधा जाता है। 

पहले तो उन्हें यह निश्चित करना होगा कि उनका लक्ष्य क्या है ! उन्हें क्या चाहिए ! सिर्फ मनचाहे कपडे पहनने और कहीं भी कुछ भी बोल सकने की छूट, ध्येय नहीं होना चाहिए है, वह भी सिर्फ बड़े शहरों में ! दूर-दराज के गांवों-कस्बों में आज भी कुछ ज्यादा नहीं बदला है । आश्चर्य होता है,  इस और  ध्यान ना देकर इस 
दिन कुछ, अपने आपको प्रबुद्ध, आधुनिक व खुद को सारी महिलाओं का प्रतिनिधि मान बैठी तथाकथित समाज सेविकाएं जो खुद किसी महिला का सरे-आम हक मारे बैठी होती हैं, मीडिया के वातानुकूलित कक्षों में कवरेज-नाम-दाम पाने के लिए, कुछ ज्यादा ही मुखर हो जाती हैं। उन्हें सिर्फ अपने  से मतलब होता है ! सोचने की बात है, क्या सिर्फ कुछ, अपने को आधुनिक, प्रगतिशील या बुद्धिजीवी होने का दिखावा करने वाली आत्मश्लाघि महिलाओं द्वारा चली आ रही परंपराओं के विरुद्ध जाने, समाज की मान्यताएं तोड़ने, पुरुषों की कुरीतियों को अपनाने भर से महिलाओं को बराबरी का दर्जा मिल जाएगा ! उन्हें उत्पीड़न से मुक्ति मिल जाएगी ! उनकी वर्जनाएं ख़त्म हो जाएंगी ! या फिर वर्षों से चले आ रहे षड्यंत्र के दलदल में और भी गहरे तक धसतीं चली जाएगीं !      

आज पुरुष केंद्रित समाज ने अपने इस महत्वपूर्ण हिस्से को इतना चौंधिया दिया है कि कुछेक को छोड़, वे अपने प्रति होते अन्याय, उपेक्षा को न कभी देख पाती हैं और न कभी महसूस ही कर पाती हैं। दोष उनका भी नहीं होता, आबादी का दूसरा हिस्सा इतना कुटिल है कि वह सब अपनी इच्छानुसार करता और करवाता है। फिर उपर से विडंबना यह कि वह एहसास भी नहीं होने देता कि तुम चाहे कितना भी चीख-चिल्ला लो, हम तुम्हें उतना ही देगें जितना हम चाहेंगे। 
सबसे अहम् जरूरत है, महिलाओं को अपनी शक्ति को आंकने की, अपने बल को पहचानने की, अपनी क्षमता को पूरी तौर से उपयोग में लाने की, अपने सोए हुए जमीर को जगाने की....और यह सब उसे खुद ही करना है ! आसान नहीं है यह सब, पर करना तो है ही.......! वैसे समय बदल रहा है ! समाज बदल रहा है ! जागरूकता आ रही है ! पर जैसा कि ऊपर कहा, रफ़्तार बहुत धीमी है, ख़ास कर मेट्रो या बड़े शहरों को छोड़ अभी भी परिवर्तन की बहुत... बहुत गुंजाइश है ! 

गुरुवार, 4 मार्च 2021

द्रोणाचार्य, एक पहलू ऐसा भी

प्रयाग के तटवर्ती प्रदेश में सुदूर तक फैले श्रृंगवेरपुर राज्य के राजा निषादराज हिरण्यधनु के पुत्र एकलव्य से जुडी घटना को कुछ लोगों ने गलत अर्थों में लिया और उस बात को बड़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत करके समाज में विभाजन की नींव डाल दी ! जबकि कुछ विद्वानों का मत है कि एकलव्य ने गुरु द्रोण को धर्मसंकट में पड़ा देख, बिना उनके कहे, खुद ही अपना अंगूठा काट कर उनको अर्पित कर दिया था ! वैसे इस घटना को भी श्री कृष्ण जी की दूरंदेशी का परिणाम माना जाता है जो आज के हरियाणा की साइबर सिटी गुरुग्राम में हजारों साल पहले घटित हुई थी....................!!

#हिन्दी_ब्लागिंग    

हमारे ग्रंथों में वर्णित कई ऐसे पात्र हैं जिनके जीवन चरित्र के बारे में अनायास कई जिज्ञासाएं उठ खड़ी होती हैं ! जैसे महाभारत के महान योद्धा, सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर, युद्धविद्या में निष्णात, अस्त्र-शस्त्र विशेषज्ञ, परशुराम शिष्य, कुरुवंश गुरु आचार्य द्रोण ! जिनको भगवान् कृष्ण भी प्रणाम करते थे ! पर इतने गुणी, सक्षम, ज्ञानी, और पराक्रमी होने के बावजूद उन्हें शुरू में अभावों का सामना करते रहना पड़ा था ! कथाओं के अनुसार उनके जीवन का पूर्वार्द्ध बहुत ही संघर्षमय, कठिन व अभावपूर्ण रहा था ! देखा जाए तो जितना कठिन उनका जीवन रहा उतना ही जटिल उनका चरित्र भी था। 

हो सकता है अर्जुन की निष्ठा, लगन तथा समर्पण के कारण गुरु का उसकी तरफ कुछ झुकाव हो पर यह बात भी पूरी तरह सही साबित नहीं होती ! यदि ऐसा होता तो क्या भरी सभा में अपने प्रिय शिष्य की पत्नी का सम्मान भंग होते चुपचाप देखते रहते ! क्या अपने प्रिय शिष्य के विरुद्ध उसी की जान के ग्राहक बन युद्ध लड़ते ! क्या अपने प्रिय शिष्य के पुत्र की हत्या का कारण बनना पसंद करते

ऐसा माना जाता है कि द्रोण का जन्म, आज के उत्तरांचल की राजधानी देहरादून, जिसका उल्लेख महाभारत में द्रोणनगरी जिसे देहराद्रोण (मिट्टी का सकोरा) भी कहा जाता रहा है, में हुआ था। इस इलाके में फैले मंदिरों और उपलब्ध मूर्तियों से भी इस बात की पुष्टि होती है। इनके पिता महर्षि भारद्वाज तथा माता अप्सरा घृतार्ची थीं। परिस्थियोंवश इनकी उत्पत्ति द्रोणी (यज्ञकलश) में हुई थी, इसलिए इनका नाम द्रोण पड़ा। इनका बचपन, लालन-पालन अपने पिता ऋषि भारद्वाज के आश्रम में ही हुआ। वहीं इन्होंने हर विद्या में निपुणता प्राप्त की। समयानुसार इनका विवाह आचार्य कृपाचार्य की बहन कृपि से सम्पन्न हुआ। 

इन सारे विवरणों को जान कर जिज्ञासा का उठना स्वाभाविक है कि एक ऐसा इंसान जो महान ऋषि भारद्वाज का पुत्र हो, आचार्य कृपाचार्य जिसके रिश्तेदार हों ! जो खुद इतना ज्ञानी, गुणी, विद्वान और पराक्रमी हो ! क्यों उसे शुरू में इतने अभाव में जीवनयापन करना पडा कि वह एक गाय तक पालने में असमर्थ था ! क्यों गरीबी के कारण उसे अपने मित्र द्वारा अपमानित होना पड़ा ! क्यों काम की तलाश में दर-दर भटकना पड़ा ! क्यों उसको अपनी योग्यता के अनुरूप यश नहीं मिल पाया ! क्यों बदनामियों ने उसका दामन थामे रखा !  

यदि गहराई से ग्रंथों की कथाओं-उपकथाओं का अध्ययन किया जाए तो एकाध जगह आचार्य द्रोण और गुरु शुक्राचार्य की आपसी मित्रता का जिक्र मिलता है। तो कहीं ऐसा तो नहीं कि असुरों के गुरु शुक्राचार्य से अंतरंगता के कारण इन्हें देवताओं का कोपभाजन बन सुख-समृद्धि से वंचित रहने पर मजबूर होना पड़ा हो और इसी कारण तिरस्कृत होने तक की नौबत आन पड़ी हो ! एक क्षीण सा कारण और भी संभव हो सकता है ! जैसा कि महाभारत में उनका जो चरित्र उभर कर आता है वह एक ऐसे इंसान का है जो सिर्फ और सिर्फ अपने परिवार की फ़िक्र करता है ! खासकर अपने बेटे की, जिसके सामने उसके लिए बाकी सारी बातें गौण हो जाती हैं। हो सकता है उनकी इसी मानसिकता के चलते हर कोई उनसे दूरी बना कर रखता हो। भीष्म पितामह को भी यह बात पता थी ! इसीलिए उन्होंने कुरु कुमारों की शिक्षा की जिम्मेदारी देते हुए उनसे वादा लिया था कि वे सिर्फ कौरववंश के राजकुमारों को ही शिक्षा देंगे। जाने अनजाने यह बात भी आगे चल कर उनकी बदनामी का एक कारण बन गई।  

गुरु द्रोणाराचार्य ने यह कभी नहीं कहा कि मैंने किसी शूद्र को शिक्षा नहीं देने का प्रण लिया है। ऐसा होता तो वे सूत पुत्र कर्ण को भी अपना शिष्य ना बनाते। कुरुवंश से जुड़ने के पहले ऐसी किसी बात का कोई कारण भी नहीं बनता ! भीष्म पितामह को वचन देने के पहले यदि एकलव्य उनसे मिला होता तो उसे अपना शिष्य बनाने में उन्हें कोई आपत्ति भी नहीं होती। क्योंकि एकलव्य कोई साधनहीन या निर्धन परिवार का सदस्य नहीं था। वह प्रयाग के तटवर्ती प्रदेश में सुदूर तक फैले श्रृंगवेरपुर राज्य के राजा  निषादराज हिरण्यधनु का पुत्र था। उस समय श्रृंगवेरपुर राज्य की शक्ति मगध, हस्तिनापुर, मथुरा, चेदि और चंदेरी आदि बड़े राज्यों के समकक्ष थी। लेकिन एकलव्य से जुडी घटना को कुछ लोगों ने गलत अर्थों में लिया और उस बात को बड़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत करके समाज में विभाजन की नींव डाल दी ! जबकि कुछ विद्वानों का मत है कि एकलव्य ने, अपने गुरु को धर्मसंकट में पड़ा देख, बिना उनके कहे, खुद ही अपना अंगूठा काट कर उनको अर्पित कर दिया था ! वैसे इस घटना को भी श्री कृष्ण जी की दूरंदेशी का परिणाम माना जाता है जो आजके हरियाणा की साइबर सिटी गुरुग्राम में हजारों साल पहले घटित हुई थी। लोकमान्यता के अनुसार इन्द्रप्रस्त का राजा बनने पर युधिष्ठिर ने यह गांव अपने गुरु द्रोणाचार्य को दे दिया था। उनके नाम पर ही इसे गुरुग्राम कहा जाने लगा, जो कालांतर में बदलकर गुड़गांव हो गया।

रही अर्जुन से अति लगाव की बात, तो हो सकता है अर्जुन की निष्ठा, लगन तथा समर्पण के कारण गुरु का उसकी तरफ कुछ झुकाव हो पर यह बात भी पूरी तरह सही साबित नहीं होती ! यदि ऐसा होता तो क्या भरी सभा में अपने प्रिय शिष्य की पत्नी का सम्मान भंग होते चुपचाप देखते रहते ! क्या अपने प्रिय शिष्य के विरुद्ध उसी की जान के ग्राहक बन युद्ध लड़ते ! क्या अपने प्रिय शिष्य के पुत्र की हत्या का कारण बनना पसंद करते ! इन सब बातों से तो यही निष्कर्ष निकलता है कि महान होने के बावजूद उनमें इंसानी कमजोरियों की बहुतायद थी। परिवार के प्रति मोह था ! पुत्र प्रेम सर्वोपरि था ! अहम की भावना गहरी थी। क्षमा भाव की कमी थी ! इन्हीं सब वजहों से उन्हें वह आदर-सम्मान-ख्याति नहीं मिल पाई जो पितामह भीष्म को मिली ! उलटे, झूठे-सच्चे लांझनों से सदा उन्हें दो-चार होते रहना पड़ा।   

बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

नोबेल की मृगमरीचिका और नेहरू

आज बहुत से लोग एक दल और उसके अनुयायियों को नेहरू विरोधी बता कटुता फैलाने की कोशिश में हैं ! उनसे भी एक सवाल है कि क्या नेहरू विरोध इन्हीं कुछ वर्षों से आरंभ हुआ है ? पहले क्या उनका विरोध कभी नहीं हुआ ? यदि वे सर्वमान्य नेता थे ! उनका हर कदम देश की भलाई के लिए था ! यदि वे सिर्फ देश और उसके नागरिकों का भला चाहते थे, तो उस समय सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, अम्बेडकर, जय प्रकाश नारायण जैसे कई-कई नेता उनसे अलग विचार क्यों रखते थे ! क्या ये लोग देश का भला नहीं चाहते थे ..............!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

आज पक्ष-विपक्ष दोनों अपने-अपने हिसाब से देश के पहले प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू का नाम ले रहे हैं। एक उन्हें सर्वगुण संपन्न नेता के रूप में पेश कर रहा है तो दूसरा देश की कई-कई विफलताओं का जिम्मेदार उन्हें मान रहा है। इस विवाद में ना पड़ते हुए, करीब दस साल पुरानी यह पोस्ट एक अलग सी सच्चाई सामने ला कर रख रही है !  

नेहरू जी को शांति दूत के रूप में खूब प्रचारित किया गया है, पर नोबेल पुरस्कार फाउंडेशन ने भारत के इस पहले प्रधान मंत्री के नाम पर ज्यादा विचार नहीं किया ! हालांकि चयन की सारी कार्यवाही गोपनीय होती है। लेकिन जब इस समिति ने 1901 से 1956 तक का पूरा ब्योरा सार्वजनिक किया तब सामने आया कि इस फाउंडेशन ने भारत के पहले प्रधान मंत्री के नाम को कभी गंभीरता से नहीं लिया। वह भी एक-दो बार नहीं, पूरे ग्यारह बार उनके नाम को खारिज किया गया।  

नेहरू जी की अगुवाई में कई बड़े संयंत्र लगे, जिन्हें वे मंदिर की संज्ञा देते थे ! पंचवर्षीय योजनाएं लागू हुईं ! लोकतत्र मजबूत हुआ ! सामाजिक सुधार के लिए भी कमोबेश काम हुआ ! पर वे भी तो इंसान थे ! भूल-चूक उनसे भी हुई होगी ! जिसे मान लेने में कोई बुराई तो नहीं ही है।   

सबसे पहले 1950 में नेहरू जी के नाम से दो प्रस्ताव नोबेल शांति पुरूस्कार के लिए भेजे गए थे। उन्हें अपनी गुटनिरपेक्ष विदेश नीति और अंहिंसा के सिद्धांतों के कारण नामांकित किया गया था। पर उस समय यह सम्मान फिलिस्तीन में मध्यस्थता करने के उपलक्ष्य में रॉल्फ बुंचे को दिया गया था। 

1951 में नेहरूजी को तीन नामांकन हासिल हुए ! पर उस बार फ्रांसीसी ट्रेड यूनियन नेता लियोन जोहाक्स को चुन लिया गया। 

1953 में उनके लिए बेल्जियम के सांसदों सहित तीन प्रस्ताव भेजे गए थे ! पर पुरूस्कार गया द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिकी सेनाओं का नेतृत्व करनेवाले जॉर्ज सी. मार्शल की झोली में।

1954 में नेहरू जी को फिर दो नामांकन प्राप्त हुए, पर इस बार गजबे हो गया, जब पुरूस्कार का हकदार किसी इंसान को नहीं बल्कि संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त कार्यालय को बना दिया गया।

अंतिम बार 1955 में फिर एक बार उनके नाम को प्रस्तावित कर भेजा गया ! पर तब यह पुरूस्कार किसी को ना देकर, इसकी सारी राशि पुरस्कार संबंधी विशेष कोष में जमा कर दी गयी थी।

आश्चर्य की बात है कि हम जिन्हें दुनिया भर में शांति की अलख जगाने वाला, पंचशील का सिद्धांत लाने वाला, भविष्यदृष्टा, देश का निर्माता और ना जाने क्या-क्या मानते आए हैं, उसे इस विश्व प्रसिद्ध फांउडेशन ने मान्यता ना दे सिरे से ही नकार दिया ! दो-तीन बार नहीं पूरे ग्यारह बार अनदेखी कर दी गई ! सवाल तो कई उठते हैं ! क्या यह आभामंडल जबरन रचा गया था ! देशवासियों की नज़र में विश्व के अग्रणी नेता के रूप में स्थापित करने के लिए मिथक गढ़े गए थे ! सर्वमान्य नेता के रूप में प्रतिष्ठित किया गया था ! 

आज बहुत से लोग एक दल और उसके अनुयायियों को नेहरू विरोधी बता कटुता फैलाने की कोशिश में हैं ! उनसे भी एक सवाल है कि क्या नेहरू विरोध इन्हीं कुछ वर्षों से आरंभ हुआ है ? पहले क्या उनका विरोध कभी नहीं हुआ ? यदि वे सर्वमान्य नेता थे ! उनका हर कदम देश की भलाई के लिए था ! यदि वे सिर्फ देश और उसके नागरिकों का भला चाहते थे तो उस समय सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, अम्बेडकर, जय प्रकाश नारायण जैसे कई-कई नेता उनसे अलग विचार क्यों रखते थे ! क्या ये लोग देश का भला नहीं चाहते थे ? 

यह सच है कि नेहरू जी की अगुवाई में कई बड़े संयंत्र लगे, जिन्हें वे मंदिर की संज्ञा देते थे ! पंचवर्षीय योजनाएं लागू हुईं ! लोकतत्र मजबूत हुआ ! सामाजिक सुधार के लिए भी कमोबेश काम हुआ ! पर वे भी तो इंसान थे ! भूल-चूक उनसे भी हुई होगी ! जिसे मान लेने में कोई बुराई तो नहीं ही है।  

वैसे बताते चलें कि बापू गांधी का नाम भी  पांच बार नोबेल के लिए प्रस्तावित किया गया था पर....... 

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

बसंत आया तो है, पर....

मेरे चेहरे पर प्रश्न सूचक जिज्ञासा देख उसने कहा, अंदर आने को नहीं कहिएगा ? 
उनींदी सी हालत, अजनबी व्यक्ति, सुनसान माहौल !! पर आगंतुक के व्यक्तित्व में कुछ ऐसा आकर्षण था कि ऊहापोह की स्थिति में भी मैंने एक तरफ हट कर उसके अंदर आने की जगह बना दी। बैठक में बैठने के उपरांत मैंने पूछा, आपका परिचय नहीं जान पाया हूँ ? वह मुस्कुराया और बोला, मैं बसंत !
बसंत ! कौन बसंत ? मुझे इस नाम का कोई परिचित याद नहीं आ रहा था ! मैंने कहा, माफ़ कीजिएगा, मैं अभी भी आपको पहचान नहीं पाया हूँ 

#हिन्दी_ब्लागिंग        

बसंत फिर आया तो है ! पर यह कैसा हो गया है, सुस्त, मलिन सा ! जर्जर सी काया ! कांतिहीन चेहरा ! मुखमण्डल पर विषाद की छाया ! पहले कैसे इसके आगमन की सूचना भर से प्रेम-प्यार, हास-परिहास, मौज-मस्ती, व्यंग्य-विनोद का वातावरण बन जाता था ! सरदी से ठिठुरी जिंदगी एक मादक अंगड़ाई ले आलस्य त्याग जागने लगती थी ! जीवन में मस्ती का रंग घुलने लगता था ! वृक्ष, पेड़-पौधे सब नए पत्तों के स्वागत की तैयारियां करने लगते थे ! सारी प्रकृति ही मस्ती में डूब प्रफुल्लित हो जाती थी। पर इस बार तो जैसे मायूसी ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही ! जीव-जंतु-पादप सभी जैसे किसी अज्ञात संकट से डरे, सहमे सदमाग्रस्त हुए से लग रहे हैं ! उन्हें डर है कि जैसे बसंत धीरे-धीरे क्षीण होता जा रहा है वैसे ही बाकी मौसम भी मुंह फेर गए तो क्या होगा, इस शस्य-श्यामला का ? ऐसा क्यों !
उसने एक गहरी सांस ली और कहने लगा, पर अब धीरे-धीरे सब कुछ जैसे बदलता जा रहा है। मनुष्य की लापरवाही, लालच और लालसा की वजह से सारी ऋतुएँ अपनी विशेषताएं तथा तारतम्य खोती जा रही हैं। मैं कब आता हूँ कब चला जाता हूँ किसी को पता ही नहीं चलता
तभी पिछले वर्ष की वह भोर फिर मेरे मष्तिष्क में कौंध जाती है ! साल गुजर गया इस बात को ! पर अभी भी जब उस पल की याद आती है तो सिहरन तो होती ही है साथ ही विश्वास भी नहीं होता कि उस दिन सचमुच कुछ वैसा भी हुआ था ! आज भी मुझे उस साल भर पहले की सुबह का एक-एक लम्हा अच्छी तरह याद है। जब पौ फटी नहीं थी और मुझे दरवाजे पर कुछ आहट सी सुनाई दी थी। उस दिन रात देर से सोने के कारण अर्द्ध-सुप्तावस्था सी हालत हो रही थी। इसीलिए सच और भ्रम का पता ही नहीं चल पा रहा था। पर कुछ देर बाद फिर लगा बाहर कोई है। इस बार उठ कर द्वार खोला तो एक गौर-वर्ण अजनबी व्यक्ति को खड़े पाया। आजकल के परिवेश से पहनावा कुछ अलग था। धानी धोती पर पीत अंगवस्त्र, कंधे तक झूलते गहरे काले बाल, कानों में कुण्डल, गले में तुलसी की माला, सौम्य-तेजस्वी चेहरा, होठों पर मोह लेने वाली मुस्कान। इसके साथ ही जो एक चीज महसूस हुई वह थी एक बेहद हल्की सुवास !
मेरे चेहरे पर प्रश्न सूचक जिज्ञासा देख उसने कहा, अंदर आने को नहीं कहिएगा ? 
उनींदी सी हालत, अजनबी व्यक्ति, सुनसान माहौल !! पर आगंतुक के व्यक्तित्व में कुछ ऐसा आकर्षण था कि ऊहापोह की स्थिति में भी मैंने एक तरफ हट कर उसके अंदर आने की जगह बना दी। बैठक में बैठने के उपरांत मैंने पूछा, आपका परिचय नहीं जान पाया हूँ ? वह मुस्कुराया और बोला, मैं बसंत !

बसंत ! कौन बसंत ? मुझे इस नाम का कोई परिचित याद नहीं आ रहा था ! मैंने कहा, माफ़ कीजिएगा, मैं अभी भी आपको पहचान नहीं पाया हूँ !
अरे भाई, वही बसंत, जिसके आगमन की ख़ुशी में आप सब पंचमी मनाते हैं !
मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था ! क्या कह रहा है सामने बैठा इंसान !! यह कैसे हो सकता है ?
घबराहट साफ़ मेरे चेहरे पर झलक आई होगी, जिसे देख वह बोला, घबड़ाइये नहीं, मैं जो कह रहा हूँ वह पूर्णतया  सत्य है।

मेरे मुंह में तो जैसे जबान ही नहीं थी। लौकिक-परालौकिक, अला-बला जैसी चीजों पर मेरा विश्वास नहीं था। पर जो सामने था उसे नकार भी नहीं पा रहा था। सच तो यह था कि मेरी रीढ़ में डर की एक सर्द लहर सी  सी उठने लगी थी। आश्चर्य यह भी था कि ज़रा सी आहट पर उठ बैठने वाली श्रीमती जी को भी कोई आभास नहीं हुआ था, मेरे उठ कर बाहर आने का। परिस्थिति से उबरने के लिए मैंने आगंतुक को कहा, ठंड है, मैं आपके लिए चाय का इंतजाम करता हूँ, सोचा था इसी बहाने श्रीमती जी को उठाऊंगा, एक से भले दो। पर अगले ने साफ़ मना कर दिया कि मैं कोई भी पदार्थ ग्रहण नहीं करूंगा। आप बैठिए। मेरे पास कोई चारा नहीं था। फिर भी कुछ सामान्य सा दिखने की कोशिश करते हुए मैंने पूछा, कैसे आना हुआ ?

बसंत के चेहरे पर स्मित हास्य था, बोला मैं तो हर साल आता हूँ। आदिकाल से ही जब-जब शीत ऋतु के मंद पडने और ग्रीष्म के आने की आहट होती है, मैं पहुँचता रहा हूँ। अपने आने का सदा प्रमाण देता रहा हूँ । आपने भी जरूर महसूस किया ही होगा, उस समय प्रकृति के सुंदर, अद्भुत बदलाव को ! सृजन ही मेरा कर्म है ! धरा को जीवंत रखना मेरा फर्ज ! जीव-जंतुओं, लता-गुल्म की सुरक्षा मेरा उद्देश्य ! 
इतना कह वह चुप हो गया। जैसे कुछ कहना चाह कर भी कह ना पा रहा हो। मैं भी चुपचाप उसका मुंह देख रहा था। उसके मेरे पास आने की वजह अभी भी अज्ञात थी। वह मेरी ओर देख रहा था। अचानक उसकी आँखों में एक वेदना सी झलकने लगी थी। एक निराशा सी तारी होने लगी थी। उसने एक गहरी सांस ली और कहने लगा, पर अब धीरे-धीरे सब कुछ जैसे बदलता जा रहा है। मनुष्य की लापरवाही, लालच और लालसा की वजह से सारी ऋतुएँ अपनी विशेषताएं तथा तारतम्य खोती जा रही हैं। मैं कब आता हूँ कब चला जाता हूँ किसी को पता ही नहीं चलता। आज मेरा आपके पास आने का यही मकसद था कि अब वक्त आ गया है, गहन चिंतन का ! लोगों को अपने पर्यावरण, अपने परिवेश, अपनी प्रकृति, अपने माहौल के प्रति जागरूक होने का ! अपनी धरोहरों को बचाने का ! जिससे आने वाली पीढ़ियां स्वस्थ रहें, सुरक्षित रहें। अवाम को अपनी गफलतों से किनारा करना ही होगा ! नहीं तो कुछ ऐसी अनहोनी ना घट जाए जिस पर बाद में पछताने का कोई लाभ ना हो ! हाथ मलते रहने के सिवा कोई चारा ना हो ! 

कमरे में पूरी तरह निस्तबधता छा गयी। विषय की गंभीरता के कारण मैं पता नहीं कहाँ खो गया ! पता नहीं ऐसे में कितना वक्त निकल गया ! तभी श्रीमती जी की आवाज सुनाई दी कि रात सोने के पहले तो अपना सामान संभाल लिया करो। कंप्यूटर अभी भी चल रहा है, कागज बिखरे पड़े हैं, फिर कुछ इधर-उधर होता है तो मेरे पर चिल्लाते हो। हड़बड़ा कर उठा तो देखा आठ बज रहे थे। सूर्य निकलने के बावजूद धुंध, धुएं, कोहरे के कारण पूरी तरह रौशनी नहीं हो पा रही थी। मैंने इधर-उधर नज़र दौड़ाई, कमरे में हम दोनों के सिवाय और कोई नहीं था। पर जो भी घटित हुआ था, वह सब मुझे अच्छी तरह याद था। मन यह मानने को कतई राजी नहीं था कि मैंने जो देखा, महसूस किया, बातें कीं, वह सब भ्रम था ! कमरे में फैली वह सुबह वाली हल्की सी सुवास मुझे अभी भी किसी की उपस्थिति महसूस जो करवा रही थी !!
पर जो भी हुआ था, जैसे भी हुआ था ! जिस तरह उस दिन जिस गंभीर समस्या की ओर ध्यान गया या दिलाया गया था ! सचेत किया गया था ! उसको हल्के में ले, उसके निवारण हेतु कुछ भी तो सकारात्मक नहीं किया था हमने ! एक सपने की तरह भूला दिया था ! गैस चैंबर में घुट-घुट कर जीते रहने के बावजूद हम सदा की  की तरह निश्चिन्त थे कि प्रकृति खुद ब खुद अपने में सुधार ले आएगी ! हम उसी प्रकृति का दम घोंटने में लगे रहे, उसी कायनात की ऐसी की तैसी कर रख दी, जिसने सिर्फ हमें छह-छह ऋतुओं की नेमत सौंपी है ! वह हमें बार-बार चेताती रही ! उसके संदेशे आते रहे ! पर हम अपने गुमान में ही जीते रहे ! फिर धीरे-धीरे ऋतुएं बदलने लगीं ! मौसम क्रूर होने लगे ! ऋतु चक्र डांवाडोल होने लगा ! पर हम कानों में तेल और आँखों पर पट्टी बांध अपनी कुटिल कारगुजारियों में मशगूल रहे ! 

नतीजतन एक अनजान, लाइलाज, विश्वव्यापी महामारी ने हमें अपने पंजों में धर दबोचा। सारी दुनिया में हाहाकार मचा दिया ! लोग बेतहाशा काल के गाल में समाने लगे ! ना कोई इलाज, ना कोई दवा ! इंसान अपने ही घरों में कैद हो कर रहने को मजबूर हो गया ! पूरी जिंदगी थम कर रह गई ! मानव के अमूल्य जीवन का एक साल पूरी तरह निष्क्रिय कर दिया ! अभी भी संकट टला नहीं है ! पर पता नहीं इंसान ने सीख ली या नहीं !  

यदि नहीं तो अब कब हम अपने दायित्वों को समझेंगे ? यदि हमारे पूर्वज भी हमारी तरह सिर्फ मैं और मेरा करते रहे होते तो क्या कभी हम स्वर्ग जैसी इस धरा पर रहने का सौभाग्य पा सकते थे ? फिर मैं सोचता हूँ कि मैंने ही क्या किया इस विषय को ले कर ! सरकार का मुंह तकने, दूसरों से पहल की अपेक्षा रखने और सिवा नुक्ताचीनी के ! किसी की ओर उंगली उठाने से पहले मैंने कोई पहल की इस ओर ? कोई जागरूकता फैलाई ? अपनी तरफ से कोई कदम उठाया इस समस्या के निवारण हेतु ? पर अब इस विपदा से सबक लेते हुए सुधरना तो होगा ही, नहीं तो अब बसंत नहीं आने वाला फिर चेताने के लिए !! 

विशिष्ट पोस्ट

दिल्ली पुलिस तुम्हें सलाम 🙏

पुलिस जिसका नाम ही काफी है ! उसका एक जवान यदि किसी मरघिल्ले को पांच सेकेंड भी घूर कर देख ले तो उसका वस्त्र गीला-पीला हो जाए ! सिर्फ एक बार स...