pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

गुरुवार, 18 अप्रैल 2019

ग़ालिब की हवेली और गली कासिम जान

ग़ालिब की हवेली के साथ जुड़े दो नाम और सामने आते हैं; पहला गली बल्लीमारान तथा दूसरा गली कासिम जान ! बल्लीमारान के बारे में तो ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी और पता चल गया कि शाही किश्तियों के खेवनहार को बल्लीमार कहते थे इसीलिए उनकी रहने की जगह बल्लीमारान के रूप में जानी जाने लगी। पर गली कासिम जान के बारे में पता नहीं चल पा रहा था कि वह कौन था जिसके नाम से इस गली का नामकरण हुआ ! नाम से भी साफ़ जाहिर नहीं हो पा रहा था कि यह पुरुष का नाम है या किसी महिला का.........!

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मिर्ज़ा असद-उल्लाह बेग ख़ां उर्फ “ग़ालिब ! अब इस नाम से कौन वाकिफ़ नहीं है ! इसलिए आज बात करते हैं, इनकी यादों से जुडी उस हवेली की जो आज भी पुरानी दिल्ली के चांदनी चौक बाज़ार की एक गली बल्लीमारान की एक उप-गली कासिम जान में खड़ी है, जहां इस महान शख्सियत का 1865 से 1869 तक का अंतिम समय गुजरा था। गली बल्लीमारान में दो सौ मीटर जाकर दायें हाथ को आती है गली कासिम जान, इसमें मुड़ते ही तीसरा या चौथा मकान है---ग़ालिब की हवेली । हालाँकि ग़ालिब यहाँ किराये पर ही रहते थे, लेकिन इस मकान का एक हिस्सा सरकार ने लेकर एक संग्राहलय बना दिया है।   



जब किसी ख़ास स्मारक इत्यादि की बात होती है तो अनायास ही उससे जुड़े स्थानों या जगहों के बारे में जानने की जिज्ञासा भी उत्पन्न हो ही जाती है। अब चाँदनी चौक जैसी मशहूर जगह को छोड़ दें तो इस इमारत से जुड़े दो नाम सामने आते हैं; पहला बल्लीमारान तथा दूसरा कासिम जान। बल्लीमारान के बारे में तो ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी और पता चल गया कि शाही किश्तियों के खेवनहार को बल्लीमार कहते थे इसीलिए उनकी रहने की जगह बल्लीमारान के रूप में जानी जाने लगी। पर कासिम जान के बारे में पता नहीं चल पा रहा था कि वह कौन था जिसके नाम से इस गली का नामकरण हुआ ! नाम से भी साफ़ जाहिर नहीं हो पा रहा था कि यह पुरुष का नाम है या किसी महिला का ! काफी खोजबीन के बाद यह जानकारी हासिल हुई कि ये जनाब 1750 के दौरान लाहौर के गवर्नर मोईन-उल-मुल्क की कचहरी के एक मुलाजिम थे, जो 1750 में दिल्ली आ कर शाह आलम द्वितीय की कचहरी में काम करने लगा। जल्दी ही उसके काम से खुश को उसे नवाब की पदवी तथा रहने को लाल किले के पास बल्लीमारान में जगह दे दी गयी। उसी के नाम से उस गली का नाम गली कासिम जान पड गया। उसने वहां एक मस्जिद का निर्माण भी करवाया जिसे ''कासिम खानी मस्जिद'' के नाम से जाना जाता है। इन्हीं कासिम जान के एक भाई आरिफ जान के लड़के इलाही बख्श जान की लड़की उमराव बेगम के साथ ग़ालिब का निकाह हुआ था। 







ग़ालिब के अंतिम दिनों की गवाह यह हवेली वर्षों तक गुमनामी में रही, लोगों ने उसे हथिया कर घर-दुकानें बना लीं। फिर गुलज़ार जी जैसे कुछ लोगों के प्रयास और सरकार की कोशिश से लोगों को हटाया गया और इसे ग़ालिब संग्रहालय का रूप दे, ग़ालिब के जन्म दिन 27 दिसंबर 2000 पर अवाम को समर्पित कर दिया गया। कोशिश यही रही कि संग्रहालय का रूप-रंग-माहौल अपने वास्तविक रूप में ही नज़र आए। हालांकि अभी हवेली का एक ही हिस्सा अवाम के लिए उपलब्ध है पर उसके रख-रखाव पर कोई कोताही नहीं बरती जाती है, दर्शक अभी भी लखौरी ईटों, बलुए पत्थर के फर्श, लकड़ी के दरवाजे-छज्जों को देख, अपने आप को उस बीते समय से जुड़ा पाता है। 



शायर से जुडी वस्तुएं, उनके हस्तलिखित पत्र, दीवान, उनके फोटो, किताबें यहां सुरक्षित रख प्रदर्शित की गयी हैं। इसी के साथ उनकी एक प्रतिकृति भी देखने को मिलती है जिसमें वे हाथ में हुक्का थामे बैठे हुए दिखते हैं। उसी के साथ ही उनके रोजमर्रा के काम आने वाले बर्तन भी प्रदर्शित हैं। दीवारों पर भी उनके विशाल चित्रों के साथ उनकी शायरी उकेरी गयी है। वातावरण पूर्णतया शांत है। सुरक्षा हेतु एक सुरक्षा कर्मी भी तैनात है जो आप अकेले हों तो आपकी फोटो लेने में भी सहायता करता है। 







कई बार जानकारी होने के बावजूद विभिन्न कारणों से हम ऐसी जगहों पर जा नहीं पाते पर कोशिश होनी चाहिए कि ऐसी धरोहरों को हम तो देखें ही आज की पीढ़ी को भी इनसे अवगत कराएं। 

मंगलवार, 9 अप्रैल 2019

चांदनी चौक का गौरी शंकर मंदिर

संगमरमर की सीढ़ियों और खूबसूरती से उकेरे गए खंभों को पार कर जैसे ही मंदिर में प्रवेश करते हैं तो सामने ही भगत स्वरुप ब्रह्मचारी जी का आसन नज़र आता है जिन्होंने अपने जीवन के पचास साल इस मंदिर की सेवा करते हुए गुजारे थे। उनकी फोटो और चरण पादुकाएं अभी भी लोगों के दर्शनों के लिए रखी गयी हैं।अंदर गर्भगृह में शिवलिंग के पीछे चांदी के छतर के नीचे  शिव-पार्वती जी की स्वर्णाभूषणों से सज्जित मूर्तियां हैं। जिनके साथ ही कार्तिकेय और गणेश जी भी स्थापित हैं। सब कुछ इतना भव्य और सुंदर है कि दर्शनार्थी विमुग्ध हो कर रह जाता है..........!

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दिल्ली का चांदनी चौक, जो देश के प्रमुख और पुराने बाजारों में से एक तो है ही, वहां की इमारतों, भवनों व पूजा स्थलों का भी अपना समृद्ध इतिहास है। ऐसा ही एक शिव मंदिर, जो गौरी-शंकर मंदिर के नाम से प्रसिद्द है, लाल किले के सामने बाजार की शुरुआत पर दिगंबर जैन लाल मंदिर और गुरुद्वारा शीशगंज के बीच जैन मंदिर से लगा हुआ, स्थित है। माना जाता है कि तकरीबन 800 साल पुराना यह मंदिर शैव सम्प्रदाय के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है।  इस मंदिर को ''कॉस्मिक पिलर'' या पूरे ब्रह्मांड का केंद्र माना जाता है। इसका निर्माण शिव  जी के परम भक्त  एक मराठा सैनिक आपा गंगाधर द्वारा करवाया गया था। कहते हैं कि एक युद्ध में उनके प्राणों पर बन आने पर उन्होंने भगवान शिव से अपने प्राणों की रक्षा की विनती की थी। प्रभू की कृपा से जब उनकी जान बच गयी तो पूर्णतया स्वस्थ होने पर उन्होंने 1761 में इस मंदिर का निर्माण करवाया। मंदिर के गर्भ गृह में रजत कलश के नीचे भूरे रंग के शिवलिंग के पीछे कुछ ऊपर चबूतरे पर स्वर्णाभूषणों से सज्जित पूरा शिव परिवार भी स्थापित है। यह देवस्थल शिवजी के अर्द्धनारीश्वर स्वरुप को समर्पित है। 



सफ़ेद संगेमरमर से निर्मित इस मंदिर की छत को पिरामिड जैसा रूप देते हुए कोणीय आकार में बनाया गया है। 1959 में सेठ जयपुरा द्वारा इसका पूर्णोद्धार करवाया गया। इसकी बाहरी परत को चमकीले सफ़ेद रंग से रंगा गया है जिससे यह दूर से ही अवलोकित होने लगता है। वर्षों पहले जब यहां बियाबान था तब पांच पीपल के वृक्षों के बीच इस स्वयंभू शिवलिंग को देखा गया था। पास ही यमुना जी बहती थीं उसी से इनका अभिषेक हुआ करता था। ऐसी धारणा चली आ रही है कि यहां जो कोई भी पारिवारिक सुख-शान्ति, स्वास्थ्य या संतान प्राप्ति के लिए प्रभू की शरण में आ सच्चे मन से प्रार्थना करता है उसकी मनोकामना गौरी शंकर वैसे ही पूरी करते हैं जैसे उन्होंने अपने भक्त आपा गंगाधर की करी थी। 


मंदिर जमीं से कुछ ऊंचाई पर बना हुआ है शायद वहाँ कोई टिला हुआ करता होगा। संगेमरमर की सीढ़ियों और नक्काशीदार खंभों को पार कर जैसे ही मंदिर में प्रवेश करते हैं तो सामने ही चांदी की छरी के नीचे रजत पात्र से लिपटे भूरे रंग के शिवलिंग के दर्शन होते हैं। उसके पीछे कुछ ऊंचाई पर चबूतरे नुमा जगह पर चांदी के छतर के नीचे शिव-पार्वती जी की स्वर्णाभूषणों से सज्जित मूर्तियां हैं। जिनके साथ ही कार्तिकेय और गणेश जी भी स्थापित हैं। सब कुछ इतना भव्य और सुंदर है कि दर्शनार्थी विमुग्ध हो कर रह जाता है। मंदिर के पीछे बड़े हॉल में ''भगत स्वरुप ब्रह्मचारी जी'' का आसन नज़र आता है, जिन्होंने अपने जीवन के पचास साल इस मंदिर की सेवा करते हुए गुजारे थे। उनकी फोटो और चरण पादुकाएं अभी भी लोगों के दर्शनों के लिए रखी हुयी हैं। उसी के पीछे कांच के बने एक कक्ष में शिव जी की आदमकद प्रतिमा रखी हुई है जिसके बाहर पीतल के बने नंदी विराजमान है। जैसा कि बताया जाता है कि स्वयंभू शिवलिंग पांच पीपल के पेड़ों के बीच मिला था तो वे पांचों पेड़ अभी भी परिसर में खड़े हैं। गौरी शंकर जी की प्रतिमाओं के अलावा प्रमुख देवी-देवताओं के पूजास्थल भी बने हुए हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि बाहर से अंदाज नहीं होता पर अंदर विशाल खुले-ख़ुले माहौल में बहुत कुछ देखने के लिए उपलब्ध है।



हालांकि दिल्ली वासियों के लिए चांदनी चौक का बाज़ार एक अपरिहार्य जरुरत है पर अधिकांश लोग इस मंदिर और इसके इतिहास के बारे में अनभिज्ञ ही हैं। तो यदि आप अभी तक दिल्ली में रहते हुए भी यहां नहीं गए हैं तो अगली बार जब भी चांदनी चौक जाना हो तो कुछ समय निकाल  भगवान गौरी शंकर के इस मंदिर में दर्शन लाभ का आनंद जरूर लें।  

शनिवार, 6 अप्रैल 2019

दिल्ली की गली बल्लीमारान, जहां बल्लीमार रहा करते थे

उस समय कश्तियाँ चप्पू के बजाय बल्लियों की सहायता से खेयी जाती थीं। आज भी बंगाल-असम जैसे इलाकों में नावों को दिशा देने के लिए बल्लियों का सहारा लिया जाता है। बल्ली को कुशलता पूर्वक उपयोग करने वाले को बल्ली मार कहा जाता था। चूँकि वे लोग शाही परिवारों और उच्च वर्ग की नाव खेते थे इसलिए उनका उस जमाने में अच्छा रसूख हुआ करता था। इसी कारण उन्हें उस जमाने के ''पॉश'' इलाके में रहने की जगह प्रदान की गयी थी। उन्हीं के काम के नाम पर उस जगह का नाम बल्ली मारान पड़ गया यानी बल्ली मारने वालों की जगह.......! 

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जैसे हमारा देश विचित्रताओं से भरा पड़ा है वैसे ही हमारे शहरों, कस्बों, जिलों, गली-खेड़ों के नाम भी विचित्र संज्ञाओं से विभूषित हैं। वहां रहने वाले तो उस नाम के आदी हो चुके होते हैं पर नवांगतुक उन्हें पहली बार सुन कर एक बार तो सोच में पड़ ही जाता है कि यह क्या नाम हुआ ! जैसे दिल्ली को ही लें ! पुरानी दिल्ली जो कभी राजसी शानो-शौकत का प्रतीक थी आज बेतरतीब बसाहट की वजह से गलियों का मकड़जाल बन कर रह गयी है। इसकी अंतहीन गलियां, गलियों के अंदर गलियां, गलियों के अंदर की गलियों से निकलती गलियां। इन गलियों के कूचे-कटरों की भूल-भुलैया में घूमते हुए उनके ऐसे-ऐसे नाम सुनने को मिलते हैं कि दिमाग चकरघिन्नी बन जाता है। सूई वालान, नाई वालान, बल्ली मारान, चूड़ीवालान, दरीबा कलां, कूंचा सेठ, गली पीपल वाली, माता गली, गली कासिमजान, जोगीवाड़ा, मालीवाड़ा, गली गुलियांन, कटरा नील, खारी बावली, गली परांठे वाली, छत्ता शाहजी आदि,  आदि, आदि ! यदि ऐसी जगहों और उनके नामों पर शोध किया जाए तो एक भारी-भरकम ग्रंथ ही बन जाएगा ! आज ऐसी ही एक जगह की चर्चा जिसका नाम सुन कर तो ऐसा लगता है जैसे कोई लठ्ठ मारने  को तैयार बैठा हो ! बल्लीमारान !

देश का सबसे मशहूर बाजार, चाँदनी चौक ! यहीं फतेहपुरी से कुछ पहले बायीं ओर एक चौड़ी सी गली पड़ती है जिसका नाम है बल्लीमारान ! आज अपने चश्मों और मोजडियों के कारण विख्यात इस इलाके का वास्ता कभी देश की मशहूर शख्सियतों के साथ रहा था। जिनमें सबसे प्रमुख तो चचा ग़ालिब हैं। जिनकी हवेली आज भी इसकी एक उप-गली कासिमजान में देश-विदेश के शेरो-शायरी की समझ रखने वाले कद्रदानों के आकर्षण का केंद्र है। इसके साथ ही अपने-अपने इतिहास को समोए-संजोए खड़ी हैं, खजांची, चुन्नामल, मिर्जा ग़ालिब, जीनत महल जैसी हस्तियों की ऐतिहासिक हवेलियां। इनके अलावा हाकिम अजमल ख़ाँ, मोहम्मद अल्ताफ हुसैन "हाली", ग़ुलज़ार साहब तथा एक तरह से मशहूर फ़िल्म पटकथा लेखक, निर्देशक ख्वाजा अहमद अब्बास का नाता भी यहां से जुड़ता है क्योंकि वे मो. अल्ताफ हुसैन जी के पोते थे। इसकी आज की हालात को देख कौन कह सकता है कि कभी यह जगह अदब का एक प्रमुख केंद्र हुआ करता था !



अब इसके नामकरण की बात ! जब सतरहवीं शताब्दी में मुग़ल सम्राट शाहजहां ने चाँदनी चौक बनवाया तो उसके बीचो-बीच लाल किले के लाहौरी गेट से लेकर फतेहपुरी मस्जिद तक एक बड़ी सी नहर का निर्माण भी करवाया। जिसका का पानी रात के समय चाँद की रौशनी से शीशे की तरह जगमगा कर एक अलग ही लोक का नजारा पेश किया करता था। उसी स्वप्न लोक का आनंद लेने के लिए शाम के वक्त शाही परिवार और अमीर-उमरा अपनी-अपनी कश्तियों में वहां सैर कर वक्त गुजारते थे। जिसके लिए देश के बेहतरीन नाविकों को यहां काम मिलता था। उस समय कश्तियाँ चप्पू के बजाय बल्लियों की सहायता से खेयी जाती थीं। आज भी बंगाल-असम जैसे इलाकों में नावों को दिशा देने के लिए बल्लियों का सहारा लिया जाता है। बल्ली को कुशलता पूर्वक उपयोग करने वाले को बल्ली मार कहा जाता था। चूँकि वे लोग शाही परिवारों और उच्च वर्ग की नाव खेते थे इसलिए उनका उस जमाने में अच्छा रसूख हुआ करता था। इसी कारण उन्हें उस जमाने के ''पॉश'' इलाके में रहने की जगह प्रदान की गयी थी। उन्हीं के काम के नाम पर उस जगह का नाम बल्ली मारान पड़ गया यानी बल्ली मारने वालों की जगह। अब ना तो कोई नहर है, ना कश्ती और नाहीं बल्लीमार वक्त की आंधी ने सब कुछ बदल कर रख दिया है आज उस तंग सी जगह में सायकिल, रिक्शा, ठेला, स्कूटर, मोटर सायकिल सब ठूंसे पड़े हैं पर अपने-अपने इत्मीनान में ! कुछ तो है यहां, इसका सम्मोहन, इसका अपनापन, इसकी आत्मीयता, इसकी ऐतिहासिकता, जो लाख अड़चनों, कमियों, मुश्किलों के बावजूद लोगों को अपने से जुदा नहीं होने देता ! इसी कारण अभी भी दिल्ली की गलियों में कूचा, कटरा जैसे जगहों के नाम जीवित हैं।   

रविवार, 31 मार्च 2019

रिलायंस और रिलायंस, नाम एक पर संस्थान अलग-अलग

रिलायंस जूट मिल ऐंड इंडस्ट्रीज में गुजरे बचपन के संस्मरण लिखते समय अक्सर यह बात दिमाग से निकल जाती थी कि आज के दिन बंगाल के बाहर इसे जानने वालों की संख्या बहुत कम है ! आज जब भी कहीं रिलायंस का नाम आता है तो सब के जेहन में धीरू भाई अंबानी द्वारा स्थापित रिलायंस इंडस्ट्रीज की छवि ही उभरती है ! पर रिलायंस जूट मिल के बारे में जानकारी ना होने के बावजूद उससे संबंधित मेरी ब्लॉग रचनाओं को मेरे स्नेही जनों से जो प्रतिसाद मिलता रहा है वह तो मेरा सौभाग्य ही है ! आज की यह पोस्ट एक ही नाम के उन दो संस्थानों की थोड़ी सी जानकारी के साथ-साथ उनके लिए भी जिनके लिए रिलायंस जूट मिल का नाम अनजाना-अनसुना और शायद हैरत प्रदान करने वाला भी हो........!    

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कभी-कभी जब दिन भर की गहमा-गहमी के बाद रात के नितांत अकेलेपन में समय के अवगुंठन को धीरे से हटा कर जब वर्षों पुरानी यादें करवट लेती हैं तो सबसे पहले रिलायंस जूट मिल में गुजरे बचपन के दिन साक्षात साकार हो मुझे खींच कर अपने बीच ले जाते हैं ! आज चार दशक से ऊपर हो जाने के बावजूद यह सिलसिला बदस्तूर जारी है, हो भी क्यों ना ! जिंदगी का बेहतरीन कालखंड जो था वह ! 

यादों के उसी स्वरुप को जब शब्दों में बांध, वाक्यों में पिरोने की कोशिश करता हूँ तो अक्सर यह बात दिमाग से निकल जाती है कि आज के दिन रिलायंस जूट मिल ऐंड इंडस्ट्रीज को बंगाल के बाहर जानने वालों की संख्या बहुत कम है ! आज जब भी कहीं रिलायंस का नाम आता है तो सब के जेहन में धीरू भाई अंबानी द्वारा स्थापित रिलायंस इंडस्ट्रीज की छवि ही उभरती है ! पर रिलायंस जूट मिल के बारे में जानकारी ना होने के बावजूद उससे संबंधित मेरी ब्लॉग रचनाओं को मेरे स्नेही जनों से जो प्रतिसाद मिलता रहा है वह तो मेरा सौभाग्य ही है ! आज की यह पोस्ट मेरे बचपन के संगी साथियों, स्नेहीजनों के साथ-साथ उन मित्रों, अनजाने अपनों के नाम जिन्होंने मेरे ब्लॉग लेखन को ढेरों खामियों के बावजूद प्रोत्साहित किया है और जिनके लिए रिलायंस जूट मिल का नाम अनजाना-अनसुना और शायद हैरत प्रदान करने वाला भी हो ! 

पहले रिलायंस जूट मिल ! जिसके नाम में समय के साथ-साथ उसकी सफलता के कारण कुछ ना कुछ नया जुड़ता रहा है ! जैसे रिलायंस जूट मिल, या फिर रिलायंस जूट ऐंड इंडस्ट्रीज लिमिटेड या फिर रिलायंस जूट मिल्स इंटरनेशनल लिमिटेड आदि ! तब देश अभिभाजित था। संसार की बेहतरीन जूट बंगाल में ही उत्पन्न होती थी। उसका भरपूर लाभ उठाने के लिए बंगाल के उत्तरी चौबीस परगना जिले के, कलकत्ता से करीब 21-22 मील (35 की.मी.) दूर, भाटपाड़ा इलाके में बीसवीं शताब्दी के पहले दशक में अंग्रेजों द्वारा स्थापित की गयी थी। सड़क मार्ग की बनिस्पत यहां रेल मार्ग से पहुंचना ज्यादा आसान रहा है। इसके लिए कोलकाता के दूसरे बड़े स्टेशन सियालदह से इधर आने वाली लोकल ट्रेनों से कांकिनाड़ा स्टेशन पर उतरना होता है, जिसके लिए बमुश्किल 50-55 मिनटों का समय लगता है जबकि कार वगैरह से करीब डेढ़ से दुगना समय लग जाता है। स्टेशन से पैदल पांच-सात मिनट का समय चाहिए होता है मिल तक पहुँचने के लिए। 

आजादी के बाद बदहाल पड़ी इस मिल को 1963 में कनोडिया परिवार द्वारा अपनी मिल्कियत में शामिल कर लिया गया। यह उनकी दूरदर्शिता, कुशल प्रबंधन, व्यापारिक कौशल और अपने स्टाफ पर पूरा भरोसा ही था जो रिलायंस जूट मिल बंगाल की अग्रणी मिलों में शुमार रही। मालिकों द्वारा प्रदत्त सहूलियतें, बिना किसी हस्तक्षेप के काम करने की पूरी छूट, परिवारों की सुख-सुविधा का पूरा ख्याल, सुख-दुःख में सदा उनके साथ होने के दिलासे के कारण सारा स्टाफ उनके प्रति समर्पित था। काम को अपना काम समझ कर काम किया जाता था। सत्तर का दशक रिलायंस का स्वर्ण काल रहा। 

अब बात दूसरी रिलायंस की। इसे धीरू भाई अंबानी और चंपक लाल दमानी ने 1960 में साथ मिल कर खड़ा किया था पर 1965 आते-आते दोनों जने अलग हो गए, और धीरू भाई ने 1966 में रिलायंस टेक्सटाइल इंडस्ट्री की नींव महाराष्ट्र में रखी, जो सिंथेटिक धागे बनाने का काम करती थी। कंपनी ने समय के साथ अपार सफलता प्राप्त की। उसका ''बिमल'' ब्रांड का कपड़ा जन-जन की पसंद बन गया। आज यह रिलायंस देश के नवरत्नों में शामिल है। देश-विदेश में ख्याति अर्जित करने वाले इस बहुमुखी और सफलतम संस्थान को आज किसी पहचान की जरुरत नहीं है। देश के बच्चे-बच्चे की जुबान पर इसका नाम है।

तो यह थी एक ही नाम के दो संस्थानों की कहानी। एक के संस्थापक राजस्थान से आए, बंगाल को अपना कर्म-क्षेत्र चुना। जूट के पौधे से धागे बना कर देश में उस क्षेत्र में अग्रणी स्थान बनाया। 
दूसरे ने गुजरात से आ महाराष्ट्र की जमीन पर, अथक मेहनत, दूरदर्शिता, व्यापार कौशल तथा अपनी लगन से अपने सपनों को साकार करते हुए देश की सीमाएं लांघ कर आसमान छू लिया। 
दोनों में समानता यही थी कि उन्होंने धागे बनाने के काम से शुरुआत की और अपने संस्थानों का नाम रिलायंस रखा ! क्योंकि उन्हें खुद पर भरोसा था। अपनी आत्म-निर्भरता पर विश्वास था।  

मंगलवार, 26 मार्च 2019

बहुत बडे दिल वाला हुआ करता था बंगाल

जब-जब देश के किसी भी प्रदेश के रहवासी को यदि रोजगार के लिए किसी दूसरे राज्य में जाने की जरुरत महसूस होती थी तो उसके जेहन में सबसे पहले कलकत्ते का ही नाम आता था और इसने भी खुली बाँहों से सबका स्वागत बिना भेद-भाव के किया ! कहते हैं बम्बई अपने मेहमान का कठिन इम्तहान ले कर तब उसे अपनाती है ! पर बंगाल तो सदा सहृदय मेजबान रहा ! वहां तो दूध के भरे गिलास में चीनी की तरह, बिना उसको छलकाए लोग आते गए और घुलते-मिलते गए, रोजगार पाते गए और वहीं के हो कर के रह गए। इसी कारण देश के किसी भी शहर के पहले कलकत्ते ने एक करोड़ की आबादी का आंकड़ा पार कर लिया था.........!

#हिन्दी_ब्लागिंग
वैसे तो हमारे देश का हर राज्य अपनी भौगोलिक स्थिति, संस्कृति, परंपराओं या प्रकृति की नेमतों की वजह से अपने-आप में खास है, पर इनमें बंगाल अपना अलग ही स्थान रखता है। चाहे गीत-संगीत हो, राजनीती हो, देश प्रेम हो, शिक्षा हो, आध्यात्म हो, शौर्य हो, ललित कला हो, वास्तु हो, खेल हो, पठन-पाठन हो, नेतृत्व हो, प्रेम हो, भाईचारा हो, खान-पान हो, उत्पादन हो, किसी भी विधा में यह पीछे नहीं रहा। ऐसे ही इस धरती का नाम ''सोनार बांग्ला'' नहीं पड़ गया था। कई-कई बार विदेशों में इसने अपने देश का नाम रौशन करवाया है। इतना ही नहीं जब-जब देश के किसी भी प्रदेश के रहवासी को यदि रोजगार के लिए किसी दूसरे राज्य में जाने की जरुरत महसूस होती थी तो उसके जेहन में सबसे पहले कलकत्ते का ही नाम आता था और इसने भी खुली बाँहों से सबका स्वागत बिना भेद-भाव के किया ! कहते हैं बम्बई अपने मेहमान का कठिन इम्तहान ले कर तब उसे अपनाती है ! पर बंगाल तो सदा सहृदय मेजबान रहा ! वहां तो दूध के भरे गिलास में चीनी की तरह, बिना उसको छलकाए लोग आते गए और घुलते-मिलते गए, रोजगार पाते गए और वहीं के हो कर के रह गए। इसी कारण देश के किसी भी शहर के पहले कलकत्ते ने एक करोड़ की आबादी का आंकड़ा पार कर लिया था। उन दिनों हर तबके,  स्तर के लोगों के लिए वहां रहना-गुजर करना आसान था।



शुरू में एक कहावत हुआ करती थी कि ''आज जो बंगाल सोचता है, वही कल पूरे देश की सोच होती है'' इसका एक कारण भी था बंगाल की शिक्षा दर, बुद्धि जीवी वर्ग, जागरूकता देश के बाकी हिस्सों पर भारी पड़ती थी। इसका एहसास वहां के वाशिंदों को था ! हालांकी गुणी जनों का आदर सत्कार करने में वे कभी पीछे नहीं रहते थे पर किसी बाहर वाले से जल्दी मिलते-जुलते भी नहीं थे। शायद अपने खोल में बने रहने की आदत के कारण ही आजादी के वर्षों बाद तक बंगाली युवा देश के दूसरे हिस्सों में रोजगार तलाशने में कतराते रहे। जो मिला है उसी में खुश रहने वाले हुआ करते थे बंगाली परिवार। ज्यादातर शारीरिक मशक्कत और व्यापार से दूरी बनाए रखने वाला युवा वर्ग ''सफ़ेद कॉलर'' या सरकारी नौकरी, एक अपना घर जिसमे छोटा सा तालाब हो, सादगी भरी वेशभूषा और अपने पसंदीदा फ़ुटबाल क्लब की जीत-हार के साथ संतुष्ट रहता था। अलबत्ता ताश के खेल ब्रिज तथा ''अड्डा-बाजी'' उसका प्रमुख शगल हुआ करता था जहां दुनिया-जहान की बातों और मसलों पर वाद-विवाद होते रहते थे। यही कारण था कि मेहनत-मजदूरी के कामों में यहां यूपी, बिहार व पंजाब के लोगों का वर्चस्व रहता आया है। मिलों-फैक्ट्रियों में कामगारों, दरवानों के अलावा कलकत्ते में चलने वाली  ''ट्राम'' में चालक और कंडक्टर ज्यादातर बिहार-यूपी के ही हुआ करते थे। परिवहन में टैक्सी के व्यवसाय में पंजाब से आई सिख बिरादरी का बोल-बाला हुआ करता था। उस समय पलम्बर का मतलब हुआ करता था ओडिसावासी ! मारवाड़ी, गुजराती तथा पंजाबी भाइयों ने यहां का व्यवसाय संभाला हुआ था। देश के अन्य भागों से आए हुए लोगों की भी यहां अच्छी-खासी तादाद थी। यहां तक की 60-70 के भयंकर उथल-पुथल वाले दिनों में भी गैर-बंगाली परिवार चिंतित तो जरूर हुए पर यहां से जाने की किसी ने नहीं सोची, यह थी उस मिट्टी की ममता !
कोलकाता मैदान 

धापा का इलाका 
बहुत बडे दिल वाला हुआ करता था बंगाल, जिसने कभी भी किसी से भेद-भाव नहीं किया। भले ही वह कोई भी भाषा-भाषी हो, किसी भी देश-प्रदेश का हो, किसी भी जाति-धर्म का हो ! जिसने भी इसको चाहा इसने उतनी ही शिद्दत से उसे अपनाया। देश तो देश, विदेशी लोगों को भी यहां उतना ही संरक्षण मिला। अंग्रेज तो खैर यहां थे ही, उनके अलावा फ्रेंच, रशियन, पारसी, यहूदी, नेपाली, एंग्लोइंडियन, आर्मेनियन, ग्रीक, लंका और बर्मा जैसे देशों के लोग भी यहां अपना जीवन यापन करते मिल जाते थे। बासठ के युद्ध के बावजूद चीनियों की तादाद यहां दूसरे प्रवासियों से ज्यादा थी। उनका मुख्य रोजगार चमड़े से बनी वस्तुएं, रेस्त्रां और दंत चिकित्सा हुआ करता था। सही कहा जाए तो उन्होंने कलकत्ता के पूर्वीय हिस्से में स्थित धापा नामक जगह को अपना गढ़ जैसा बना लिया था। वहां उन लोगों की चमड़ा फैक्ट्रियां लगी हुई थीं। चीनियों की सघन आबादी के कारण उस जगह को चायना टाउन कहा जाने लगा था, धीरे-धीरे वह जगह असामाजिक तत्वों की शरण-स्थली बनती चली गयी जिससे आम आदमी उधर जाने से कतराने भी लगा था।

समय के साथ-साथ बहुत कुछ बदलता चला गया। देश-विदेश की नई पीढ़ी बेहतर रोजगार की तलाश में समुंदर भी लांघ गयी। विदेशियों की आबादी भी धीरे-धीरे कम होती चली गयी। तरह-तरह की सरकारें और उनकी नीतियों ने भी अपना-अपना असर डाला। एक समय ऐसा भी आया कि इस प्यारे, खूबसूरत महलों के शहर को ''डाइंग सिटी'' तक कह दिया गया था। तरह-तरह के कुप्रबंधन, अदूरदर्शी नेताओं, आत्मघाती निर्णयों, केंद्र से टकराव के बावजूद बंगाल के मुकुट के इस हीरे ने अपनी असाधारण जीजीविषा के बलबूते अपनी खोई चमक को वापस प्राप्त किया ! आज फिर वह उसी दम-ख़म के साथ पुन: गर्व से सीना ताने खड़ा है। मेरा सौभाग्य रहा है कि मुझे इसी की छत्र-छाया में लिखने-पढ़ने-काम करने-जिंदगी को जानने -समझने का अवसर प्राप्त हुआ। आज भी कोई मेरा पसंदीदा शहर पूछे तो मेरा एकमात्र उत्तर होगा..सिर्फ और सिर्फ ''कोलकाता'' । 

सोमवार, 18 मार्च 2019

होली, रिलायंस की, यादें बचपन की !

शाम को पांच बजे के आस-पास लॉन में ठंडाई का कार्यक्रम भी पूरे उत्साह के साथ संपन्न होता था। उसके बाद कभी-कभी वहीं ''स्क्रीन'' लगा किसी फिल्म का भी प्रदर्शन हो जाता था। पूरा दिन कैसे छू-मंतर हो जाता था, पता ही नहीं चलता था।  उसके बाद थके-हारे कैसे बिस्तर पर पहुंचते थे, कब नींद आती थी, कब सुबह होती थी कुछ नहीं पता ! पता था तो सिर्फ यह कि होली का इंतजार उसी दिन से फिर शुरू हो जाता था............!      

#हिन्दी_ब्लागिंग      
होली आ रही है साथ ही ला रही है बीते दिनों की रंग में सराबोर बचपन की यादें। वैसे तो समय के साथ-साथ जैसे-जैसे निज़ाम बदलते गए, मिल के वाशिंदों के आचार-व्यवहार-त्यौहार आदि में भी थोड़ा-बहुत बदलाव आता चला गया, जोकि लाज़िमी भी था। पर आज जो बात बतला रहा हूँ, वह बिल्कुल शुरू के कुछ वर्षों में मनाई-खेली जाने वाली होली की है। 

उन दिनों सर, मैडम, मिसेज या अंकल-आंटी जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं के बराबर ही होता था। जो पंद्रह-बीस परिवार परिसर में रहते थे, उनकी महिला सदस्य एक-दूसरे को संबोधित करने के लिए भैन (बहन) या भैन जी तथा एक-दो अपवादों को छोड़, पुरुष सदस्यों के लिए उनका उपनाम या भाई जी का प्रयोग ही हुआ करता था। आज तो मुझे लगता था कि शायद मिल के स्टाफ का पूरा नाम तो सिर्फ कैशियर अंकल ही जानते होंगे, जिन्हें सैलरी देने के लिए पूरे नामों की जरुरत पड़ती होगी ! हाँ बच्चा पार्टी बिना भेद-भाव,जात-पात के सिर्फ नाम से पुकारी जाती थी। 

तो बात हो रही थी होली की ! वैसे तो सारा परिसर एक ही परिवार था ! पर पुरुष वर्ग की ''क्रिमी लेयर'' के पांच-सात लोग बहुत ही मित्त-भाषी, सादगी प्रिय, गंभीर और एक अनुशासित ''औरा'' में ही रहने वाले थे ! ऐसा नहीं था कि वे स्वभाव से कठोर या अहम वाले थे ! वे सब बहुत प्रेमिल थे, पर अपने पर और अपनी भावनाओं पर उनका पूरा नियंत्रण हुआ करता था। समय-समय पर उनकी जिंदादिली भी सामने आती रहती थी पर कभी-कभी, किसी पूर्णिमा पर या एकादशी पर ! ये सब इसलिए बता रहा हूँ कि जिससे एक खाका खिंच सके, उस समय का। 

मिल में होली की दस्तक हफ्ते भर पहले ही शुरू हो जाती थी, उसके स्वागत में मिल का युवा स्टाफ रात दस बजे के बाद एक किनारे बने ''बेबी क्रेश'' में चंग या ढपली के साथ राजस्थानी फाग गीतों की स्वर लहरी छेड़ उसके पदचाप की ध्वनि सब तक पहुंचा देता था। होली के दिन भांग जरूर घुटा करती थी, जिसका पूरा सामान कलकत्ते से दो दिन पहले पहुँच जाता था। भांग-ठंडाई, बिना किसी मशीन या बाहरी इंसान की सहायता के खुद ही बनाई जाती थी। यह भी एक बड़ा कार्यक्रम होता था ! 60-70 लोगों के लिए इसको बनाना कोई हंसी-खेल नहीं था। सारी सामग्री, घटकों तथा मसालों का सही अनुपात-मात्रा का पूरा ज्ञान और ध्यान रख पूरी तन्मयता और एकांत में उसका निर्माण किया जाता था। भांग बच्चों के लिए पूरी और कठोरता से निषिद्ध थी। होली के एक दिन पहले होलिका दहन की रस्म पूरे रीती-रिवाजों के साथ पूरी की जाती थी और फिर आ जाता था वह दिन जिसका इंतजार हम बच्चे साल भर से करते रहते थे। 

होली की चहल-पहल सुबह साढ़े आठ-नौ बजे शुरू हो जाती थी। महिलाओं-लड़कियों का अलग गुट होता था जो मैनेजर गेट के पास बांए हाथ के छोटे से मैदान में जुटता था। बाकी छोटे-बड़े पुरुष सामने लॉन में रंगों की धूम मचाते थे। गंगा सामने थीं, पानी इफरात था, रंगों की पूर्ती मिल से होती थी। हम अपनी हाफ पैंटों-निकरों की जेबों में तरह-तरह के रंगों को संजोए मोर्चे पर निकलने को तैयार होने लगते थे। ये दूसरी बात है कि ज्यादातर बच्चों की जेबों में कागज की पुड़ियों में रखे रंग पानी से मिलीभगत कर उन्हीं के बदन को ज्यादा रंगीन कर जाते थे। शुरुआत होती थी उन ''पांच-सात देव-पुरुषों'' से जो झक्क सफ़ेद शर्ट-पैंट में मंथर गति से चलते हुए आ कर लॉन में एक-दूसरे को बधाई दे, जरा-जरा सा गुलाल लगा खड़े हो जाते थे। फिर उनके युवा सहकर्मी उन्हें गुलाल लगा आशीर्वाद पाते थे और फिर उस एक दिन को मिली छूट का पूरा लाभ उठा वानर सेना के सेनानी, बिना अपने-पराए का भेद-भाव कर, पिल पड़ते थे अपने हथियारों समेत उन पर और जब तक उनके लिबास में चिन्दी भर भी सफेदी नज़र आती थी तब तक रंगों की बरसात जारी रहती थी। उसी बीच मिठाई का आदान-प्रदान भी बदस्तूर चलता रहता था। हमारी हसरतें पूरी होते ही वे आपस में विदा ले अपने-अपने घरों को बढ़ लेते थे।  आज वह सब सोच कर उन पर तरस और प्यार के साथ आँखें भी नम हो जाती हैं कि कैसे वे लोग चुप-चाप खड़े रह कर हमें खुश होने का भरपूर मौका दिया करते थे। तीन-चार घंटों के हुड़दंग के बाद, माओं के, बाथरूम को गंदा ना कर ध्यान से नहाने के कड़े निर्देशों का पालन करते हुए हम सब अपने-अपने जिद्दी रंगों को छुड़ाने की मशक्कत में जुट जाते थे। यह दूसरी बात है कि रंगों और हमारा स्नेह दो-तीन दिनों तक तो बना ही रहता था। 


शाम को पांच बजे के आस-पास लॉन में ठंडाई का कार्यक्रम भी पूरे उत्साह के साथ संपन्न होता था। उसके बाद कभी-कभी वहीं ''स्क्रीन'' लगा किसी फिल्म का भी प्रदर्शन हो जाता था। पूरा दिन कैसे छू-मंतर हो जाता था, पता ही नहीं चलता था।  उसके बाद थके-हारे कैसे बिस्तर पर पहुंचते थे, कब नींद आती थी, कब सुबह होती थी कुछ नहीं पता ! पता था तो सिर्फ यह कि होली का इंतजार उसी दिन से फिर शुरू हो जाता था।
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@कुछ दिनों बाद, रिलायंस के इतिहास की सबसे बड़ी दुर्घटना, जो आज भी रोंगटे खड़े कर देती है !   

शुक्रवार, 8 मार्च 2019

अरे ! अब तो जागो, आधा विश्व हो तुम !!

एक ऐसे समाज को, जो खुद आबादी का आधा ही हिस्सा है, किसने हक दिया महिलाओं के लिए साल में एक दिन निश्चित करने का ? कोई पूछने वाला नहीं है कि क्यों भाई संसार की आधी आबादी के लिए ऐसा क्यों ? क्या ये कोई विलुप्तप्राय प्रजाति है  ? यदि ऐसा है तो पुरुषों के नाम क्यों नहीं कोई दिन निश्चित किया जाता ? पर सभी खुश हैं ! विडंबना यह है कि वे और भी आह्लादित हैं जिनके नाम पर ऐसा दिन मनाया जा रहा होता है ! समाज के इस महत्वपूर्ण हिस्से को इतना चौंधिया दिया गया है कि कुछेक को छोड़ वे अपने प्रति होते अन्याय, उपेक्षा को न कभी देख पाती हैं और न कभी महसूस ही कर पाती हैं........

पुरानी पोस्ट, फिर एक बार  !

#हिन्दी_ब्लागिंग 
आज #आठ_मार्च है, #महिलाओं _को_समर्पित_एक_दिन ! उन महिलाओं को जो विश्व का आधा हिस्सा हैं ! उन्हें बराबरी का एहसास करवाने, अपने हक़ के लिए जागरूक करने का दिन। पर सोचने की बात है कि क्या                                                                                                                                     
संसार का यह आधा भाग इतना कमजोर है कि उस पर किसी विलुप्त होती नस्ल की तरह ध्यान  दिया जाए ! सबसे बड़ी बात, क्या सचमुच पुरुष केंद्रित समाज महिलाओं को बराबरी का हकदार मानता है ? क्या वह दिल से चाहता है कि ऐसा हो, या सिर्फ उन्हें मुगालते में रखने का नाटक है ?  क्या यह पुरुषों की ही सोच नहीं है कि महिलाओं को लुभाने के लिए साल में एक दिन उनको समर्पित कर दिया जाए ?  वैसे ऐसे समाज को, जो खुद आबादी का आधा ही हिस्सा है उसे किसने हक दिया महिलाओं के लिए साल में एक दिन निश्चित करने का ? कोई पूछने वाला नहीं है कि क्यों भाई संसार की आधी आबादी के लिए ऐसा क्यों ? क्या वे कोई विलुप्तप्राय प्रजाति है ? यदि ऐसा है तो पुरुषों के नाम क्यों नहीं कोई दिन निश्चित किया जाता ? पर सभी खुश हैं ! विडंबना है कि वे तो और भी आह्लादित हैं जिनके नाम पर ऐसा दिन मनाया जा रहा होता है और इसे मनाने में तथाकथित सभ्रांत घरानों की महिलाएं बढ-चढ कर हिस्सा लेती हैं।

आज जरूरत है सोच बदलने की। इस तरह की मानसिकता की जड पर प्रहार करने की। सबसे बडी बात महिलाओं को खुद अपना हक हासिल करने की चाह पैदा करने की। कभी हनुमान जी को उनकी शक्तियों की याद दिलाने में जामवंत ने सहायता की थी ! पर आज कोई भी ऐसा करने वाला नहीं है ! उन्हें खुद ही प्रयास 
करने होंगे, खुद ही अपनी लड़ाई लड़नी होगी, खुद को ही सक्षम-सशक्त बनाना होगा !  हाँ,  कुछ तो बर्फ टूटी है पर गति बहुत धीमी है, ऐसे में तो वर्षों-वर्ष लग जाएंगे ! क्योंकि यह इतना आसान नहीं है ! हजारों सालों की मानसिक गुलामी की जंजीरों को तोडने के लिए अद्मय, दुर्धष संकल्प और जीवट की जरूरत है। उन प्रलोभनों को ठुकराने के हौसले की जरूरत है जो आए दिन उन्हें परोस कर अपना मतलब साधा जाता है। 

पहले तो उन्हें यह निश्चित करना होगा कि उनका लक्ष्य क्या है ! उन्हें क्या चाहिए ! सिर्फ मनचाहे कपडे पहनने और कहीं भी कुछ भी बोल सकने की छूट, ध्येय नहीं होना चाहिए है, वह भी सिर्फ बड़े शहरों में ! दूर-
दराज के गांवों-कस्बों में आज भी कुछ ज्यादा नहीं बदला है। आश्चर्य होता है, इस और ध्यान ना देकर इस दिन वे कुछ, अपने आपको प्रबुद्ध, आधुनिक व खुद को महिलाओं का संरक्षक मान बैठी तथाकथित समाज सेविकाएं जो खुद किसी महिला का सरे-आम हक मारे बैठी होती हैं, मीडिया में कवरेज इत्यादि पाने के लिए,  आरामदेह वातानुकूलित कक्षों में कुछ ज्यादा ही मुखर हो जाती हैं।  

आज पुरुष केंद्रित समाज ने अपने इस महत्वपूर्ण हिस्से को इतना चौंधिया दिया है कि कुछेक को छोड़, वे अपने प्रति होते अन्याय, उपेक्षा को न कभी देख पाती हैं और न कभी महसूस ही कर पाती हैं। दोष उनका भी नहीं होता, आबादी का दूसरा हिस्सा इतना कुटिल है कि वह सब अपनी इच्छानुसार करता और करवाता है। फिर उपर से विडंबना यह कि वह एहसास भी नहीं होने देता कि तुम चाहे कितना भी चीख-चिल्ला लो, हम तुम्हें उतना ही देगें जितना हम चाहेंगे। जरूरत है महिलाओं को अपनी शक्ति को आंकने की, अपने बल को पहचानने की, अपनी क्षमता को पूरी तौर से उपयोग में लाने की, अपने सोए हुए जमीर को जगाने की....और यह सब उसे खुद ही करना है ! आसान नहीं है यह सब, पर करना तो पड़ेगा ही.......! 

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