सोमवार, 19 नवंबर 2018

विश्व टॉयलेट दिवस

यदि खुले में शौच जाना बंद हो जाए तो हर साल करीब सवा दो करोड़ जानें बचाई जा सकती हैं ! एक सर्वे के अनुसार सौ ग्राम इंसानी मल में करीब दो अरब हानिकारक परजीवी कीटाणु-जीवाणु पाए जाते हैं। अंदाज लगाया जा सकता है कि हम जाने-अनजाने कितना विष रोज वातावरण में घोलते जाते हैं। पहले की बात अलग थी आबादी काफी कम हुआ करती थी। लोग खेतों-जंगलों में निवृत हो आते थे तो प्रकृति संभाल लेती थी। पर अब जब जंगलात वगैरह खत्म हो रहे हैं, खेतों में रसायनों का चलन बढ़ रहा है तो उन्हें और दूषित कर हम अपराध ही तो कर रहे हैं..........! 

#हिन्दी_ब्लागिंग    
आज  विश्व टॉयलेट दिवस है। इसे प्रत्येक वर्ष आज के ही दिन 19 नवंबर को इस उद्देश्य के साथ मनाया जाता है कि लोगों को गंदगी के खिलाफ जागरूक किया जाए, उन्हें स्वच्छता का महत्व बताया जाए जिससे असमय इंसानी गंदगी से होने वाली करोड़ों जानों को असमय कालल्वित होने से बचाया जा सके ! इसी दिन 19 नवंबर 2001 को सिंगापुर में जैक सिम नाम के एक जागरूक इंसान ने 15 सदस्य देशों के साथ एक
अंतरराष्ट्रीय गैर-लाभकारी संस्था ''विश्व शौचालय संगठन'' की शुरूआत की थी। इसी संस्था ने दुनिया के कई देशों में लोगों को जागरुक करने के लिए विश्व शौचालय सम्मेलन आयोजित किए। जिससे प्रभावित हो कर बारह साल बाद संयुक्त राष्ट्र ने मान्यता दी। उन्हीं के अनुसार आज भी विश्व की तकरीबन ढाई अरब की आबादी को पर्याप्त स्वच्छता मयस्सर नहीं है ! इसके अलावा करीब एक अरब लोग खुले में निवृत होने को मजबूर हैं, जिनमें से लगभग आधे हमारे देश में ही हैं ! इस विवशता के कारण सबसे ज्यादा परेशानी महिलाओं और बालिकाओं को होती है।दुनिया में हर तीन में से एक महिला को सुरक्षित शौचालय की सुविधा उपलब्ध नहीं है। खुले में जाने से बीमारियां तो फैलती ही हैं पर्यावरण भी दूषित होता है। इसी कारण, देर से ही, सरकार द्वारा चलाए गए स्वच्छ भारत अभियान का स्वागत होना चाहिए ! पर उसके पूर्णतया सफल होने में कुछ दिक्कतें भी आ रही हैं। पहली तो सरकारी अमले की तरफ से ही है ! अपना ''टारगेट'' पूरा करने के लिए आधे-अधूरे शौचालयों का निर्माण, जो बने भी हैं उनमें पानी अनुपलब्धता, जल-मल का अनुचित प्रबंधन ! इसके साथ ही हमारे लोगों की मानसिकता भी एक अड़चन है, जिनके मुताबिक खुले में शौच जाना ज्यादा सुविधाजनक उपाय है।



यह तो बाहर-अंदर की बात हुई ! एक और बहस तकनिकी पर भी जोरों-शोरों से चल रही है और वह है कि कौन सा टायलेट या ढंग, शौच जाने के लिए बेहतर है, योरोपियन या भारतीय ! इसमें भारतीय पद्यति के पक्ष में कुछ बातें जाती हैं, जैसे उकडूँ बैठ कर निवृत होने की क्रिया प्राकृतिक मुद्रा है। इसमें तो दो राय नहीं है: प्रकृति ने भी माँ के गर्भ में जीव को उँकड़ू हो कर ही पलने दिया है। इस मुद्रा में जाघों का दवाब आँतों पर पड़ने से पेट ठीक से साफ़ होता है। इससे आँतों की क्रियाशीलता बढ़ती है। कब्ज की शिकायत नहीं रहती। पाचन ठीक से होता है और सबसे बड़ी बात आँतों के कैंसर की संभावना कम हो जाती है। कमोड से शरीर के ज्यादा हिस्से का सम्पर्क नहीं होने से यह स्वास्थ्यप्रद भी है। इसमें थोड़ी वर्जिश भी हो जाती है। गर्भवती महिलाओं के लिए भी यह लाभदायक होता है। इन बातों को तो अब योरोप के डॉक्टर भी मानने लगे हैं। हाँ एक बात इसके विरुद्ध यह जाती है कि ज्यादा उम या किसी रोग से कमजोर पुरुषों व महिलाओं को इस पर बैठ कर उठने में बहुत कष्ट होता है। ऐसे लोगों या उनके लिए जो किसी भी कारणवश सीट वाले टॉयलेट का उपयोग नहीं छोड़ना चाहते वे अपने पैरों के नीचे एक सात-आठ इंच ऊंचा स्टूल रख लें जिससे घुटने कुछ दवाब के साथ पेट से जा लगें। इससे सीट पर बैठने से होने वाली समस्याओं का कुछ हद तक निदान हो सेहोने वाली समस्याओं का कुछ हद तक निदान हो जाएगा।



एक सर्वे के अनुसार यदि खुले में शौच बंद हो जाए तो हर साल करीब सवा दो करोड़ जानें बचाई जा सकती हैं। उनके अनुसार सौ ग्राम इंसानी मल में करीब दो अरब हानिकारक परजीवी कीटाणु-जीवाणु पाए जाते हैं। अंदाज लगाया जा सकता है कि हम जाने-अनजाने कितना विष रोज वातावरण में घोलते जाते हैं। पहले की बात अलग थी आबादी का थी लोग खेतों जंगलों में निवृत हो जाते थे तो प्रकृति संभाल लेती थी। पर अब जब जंगलात वगैरह खत्म हो रहे हैं, खेतों में रसायनों का चलन बढ़ रहा है तो उन्हें और दूषित कर हम अपराध ही तो कर रहे हैं। 

इस बारे में लोगों की सोच तो बदलते-बदलते ही बदलेगी। पर अभी सभी का ध्यान ऐसे शौचालयों के निर्माण की ओर हैं जो पर्यावरण मित्र भी हों और उनमें पानी की खपत भी ना हो ! क्योंकि अभी दूर-दराज के क्षेत्रों में, जहां ना ''सीवरेज'' की सुविधा होती ही नहीं पाइपों द्वारा जल-मल को दूर भेजा जा सकता है ! गड्ढे इत्यादि बना कुछ तो हल निकलता है पर उसमें भी दसियों दिक्कतें रहती ही हैं। इसलिए शौचालय तो बन जाते हैं पर निस्तारण की समस्या खड़ी हो जाती है। सारे संसार में इस ओर कोशिशें हो रही हैं कुछ देशों ने अति आधुनिक व्यवस्था खोज भी ली है। आशा है जल्दी ही इस विश्व-व्यापी समस्या का निदान हो जाएगा। 

शुक्रवार, 16 नवंबर 2018

प्रणाम, एक प्रभावी प्रक्रिया, इसकी आदत बचपन से ही डालें

यदि बचपन से ही बड़ों के पैर छू कर उनका आशीर्वाद लेने के संस्कार बच्चों में डाले जाएं तो घरों में कभी भी अप्रिय स्थिति बनने की नौबत ही ना आए। अनुशासन बना रहे, क्रोध व अहंकार को स्थान ना मिले, आदर-सत्कार की भावना प्रबल हो जाए । यह सिर्फ कहने की नहीं आजमाने की बात है। यदि घर का नियम हो कि हर छोटे सदस्य को सुबह उठते ही सबसे पहला काम बड़ों का आशीर्वाद लेना है तो विगत रात चाहे जैसा भी भारी माहौल रहा हो, किसी कारण कटुता  फ़ैल गयी हो, कुछ मनमुटाव ही क्यों ना हो गया हो यदि घर के बच्चे  सुबह-सबेरे बड़ों के चरण स्पर्श करते हैं तो ऐसा कोई भी बुजुर्ग सदस्य नहीं होगा जो सब कुछ भूल निर्मल मन से आशीर्वाद ना दे ! बस यहीं से सब कुछ ''नार्मल'' हो जाता है और घर में शांति स्थाई हो जाती है। हमारे ग्रंथों में कहा भी गया है कि जो व्यक्ति रोज बड़े-बुजुर्गों के सम्मान में प्रणाम और चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करता है, उसकी उम्र, विद्या, यश और शक्ति बढ़ती ही जाती है ...........!       


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अपने से बड़ों का अभिवादन करने के लिए चरण छूने की परंपरा हमारे यहां सदियों से चली आ रही है। अपने से बड़े के आदर स्वरुप उनके चरण स्पर्श करना बहुत उत्तम माना गया है। शास्त्रों में भी कहा गया है कि रोज बड़ों के चरण स्पर्श करके उनसे आशीर्वाद लेने से घर में सुख-शांति तथा समृद्धि का वास होता है। विशेष
तौर पर जब आप किसी जरूरी काम से कहीं जा रहे हों या कोई नया काम शुरू कर रहे हों, कोई ख़ास दिन या त्यौहार हो तब तो जरूर ही। आज के तथाकथित विद्वान या अपने को आधुनिक मानने वाले लोग इस पर विश्वास करें न करें पर जब भी हम किसी का झुक कर चरण स्पर्श करते हैं तो हम में विनम्रता का भाव आ जाता है, हम विनीत हो जाते है, नम्र हो जाते हैं जिससे हमारे शरीर की उर्जा की नकारात्मकता श्रेष्ठ व्यक्ति में पहुंचकर नष्ट हो जाती है, तथा उनकी सकारात्मक ऊर्जा आशीर्वाद के रूप में हमें मिल जाती है। पर इसके लिए हमारे मन में अपने बड़ों के प्रति, अपने गुरुजनों के प्रति श्रद्धा जरूर का होना जरुरी होता है। चरण स्पर्श करते समय हमेशा दोनों हाथों से दोनों पैरों को छूना चाहिए। एक हाथ से पांव छूने के तरीके को शास्त्रों में गलत बताया गया है।


आज घर-बाहर जो बड़ों के प्रति अवहेलना, तिरस्कार, अपमान जैसी परस्थितियां देखने में आती हैं उसका एक कारण जाने-अनजाने की गयी उनकी उपेक्षा भी है। यदि बचपन से ही बड़ों के पैर छू कर उनका आशीर्वाद लेने के संस्कार बच्चों में डाले जाएं तो घरों में कभी भी अप्रिय स्थिति बनने की नौबत ही ना आए, अनुशासन बना रहे, क्रोध व अहंकार को स्थान ना मिले, आदर-सत्कार की भावना प्रबल हो जाए। यह सिर्फ कहने की नहीं आजमाने की बात है। यदि घर का नियम हो कि हर छोटे सदस्य को सुबह उठते ही सबसे पहला काम बड़ों का आशीर्वाद लेना है तो विगत रात चाहे जैसा भी भारी माहौल रहा हो, किसी कारण कटुता  फ़ैल गयी हो, कुछ मनमुटाव ही क्यों ना हो गया हो यदि घर के बच्चे बड़ों के चरण स्पर्श करते हैं तो ऐसा कोई भी बुजुर्ग सदस्य नहीं होगा जो सब कुछ भूल निर्मल मन से आशीर्वाद ना दे ! बस यहीं से सब कुछ ''नार्मल'' हो जाता है। ग्रंथों में कहा भी गया है कि जो व्यक्ति रोज बड़े-बुजुर्गों के सम्मान में प्रणाम और चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करता है, उसकी उम्र, विद्या, यश और शक्ति बढ़ती जाती है। 

हमारे महान ग्रंथों में भी प्रणाम की महत्ता बताई गयी है। रामायण में तो प्रभू खुद ही गुरुजनों को आगे बढ़ प्रणाम कर एक आदर्श हमारे सामने रखते हैं। यहां तक की अपने सबसे बड़े बैरी रावण के अंतिम समय में लक्ष्मण जी को उसके पास ज्ञान-अर्जन के लिए जाने को कहते हैं तो उन्हें पहले प्रणाम करने की सीख दे कर भेजते हैं।

महाभारत में जब भीष्म अगले दिन पूरे पांडवों के वध की कसम लेते हैं तो श्री कृष्ण द्रौपदी को उनके पास ले जाकर प्रणाम करवा उसे अखंड सौभाग्यवती होने के वरदान दिलवा पांडवों की रक्षा करवाते हैं। साथ ही अत्यंत दुःख के साथ कहते हैं कि यदि दोनों परिवारों की स्त्रियां अपने और एक-दूजे के वरिष्ठ व गुरुजनों को प्रणाम किया करतीं तो यह युद्ध कभी भी नहीं होता। 

एक प्रणाम से तो ऋषि मार्कण्डेय जी, जिनका अल्पायु योग था ख़त्म हो गया था। जब उनके पिता महामुनि मृकण्डु को यह बात पता चली तो उन्होंने उनका जनेऊ संस्कार कर खा कि जो भी तुम्हारे सामने पड़े उसके सामने तुम झुक कर प्रणाम कर आशीर्वाद लेना। मार्कण्डेय जी ने पिता की आज्ञा शिरोधार्य कर वैसा ही करना शुरू कर दिया। ऐसे ही एक दिन उनके सामने सप्तऋषि आ गए मार्कण्डेय जी ने झुककर सप्तऋषियों का चरण स्पर्श किया। अनजाने में सप्तऋषियों ने मार्कण्डेय जी को दीर्घायु का आशीर्वाद दे दिया। जब उन्हें पता चला कि मार्कण्डेय जी अल्पायु हैं तो वे चिंता में पड़ गये। सप्तऋषि बालक मार्कण्डेय को ब्रह्मा जी के पास ले गये। मार्कण्डेय जी ने ब्रह्मा जी का भी चरण स्पर्श किया। ब्रह्मा जी ने भी मार्कण्डेय को दीर्घायु का आशीर्वाद दिया जिससे यमराज भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाए।           

पर यदि प्रणाम करने वाले के लिए कुछ नियम हैं तो जिन्हें प्रणाम किया जा रहा हो, वह चाहे स्त्री हो या पुरुष  उनका भी फर्ज होता है कि जब भी कोई चरण स्पर्श करे वे उसे हाथ उठा कर या उसके सर पर हाथ रख कर आशीर्वाद जरूर दें।  साथ ही भगवान या अपने इष्टदेव को भी याद करना चाहिए। क्योंकि पैर का किसी को लगना अशुभ कर्म माना गया है। तो जब कोई हमारे पैर छूता है तो हमें भी इस दोष से बचने के लिए मन ही मन भगवान से क्षमा मांगनी चाहिए। जब हम भगवान को याद करते हुए किसी को सच्चे मन से आशीर्वाद देते हैं तो उसे लाभ अवश्य मिलता है। किसी के लिए अच्छा सोचने पर हमारा पुण्य भी बढ़ता है। 

मंगलवार, 13 नवंबर 2018

विज्ञापनों में सार्थक और सकारात्मक संदेश होने चाहिए

कंपनी को ऐसे विज्ञापन ही बनवाने चाहिए जिनमें यह संदेश हों कि आपकी अत्यधिक व्यस्तता के समय हम आपकी भोजन संबंधी परेशानियों को दूर करते हैं.........!

#हिन्दी_ब्लागिं
आज कंप्यूटर गेम, फ़ास्ट फूड, मोबाईल फोन की लत बच्चों और युवाओं में उस हद तक जा पहुंची है जिसके बहुत ही गंभीर परिणाम हो सकते हैं। विशेषज्ञों तथा डाक्टरों का मानना है कि समय रहते इससे छुटकारा पाना बहुत जरुरी है नहीं तो बात हाथ से निकल सकती है ! पर एक तरफ जहां लोगों में जागरूकता लाने की कोशिश की जा रही है, वहीं कुछ ऐसे लोग और कंपनियां हैं, जो इस बात को गंभीरता से नहीं ले रहे ! ऐसी ही एक कंपनी है #SWIGGY.


इसे अपने विज्ञापनों पर जरूर गौर करना कीजिए -
1) एक माँ अपने बेटे के साथ अपने घर में मोबाइल गेम खेल रही है। दोनों के हाव-भाव ऐसे हैं जैसे कोई जंग लड़ रहे हों ! खेलते-खेलते बेटा कहता है कि "माँ भूख लगी है !'' माँ स्विगी को फोन करती है और कुछ ही देर में किसी रेस्त्रां से उनके यहां खाना पहुँच जाता है।

2) एक कुछ ओवरवेट माँ टी.वी. के सामने खड़े हो बेतरतीब तरीके से उसमें दिखाई जा रही कसरत को दोहरा रही है ! इतने में उसकी बेटी आ पूछती है "माँ खाने में क्या है ?'' महिला दसियों आयटम गिना कर कहती है ''कुछ भी मंगा लो !'' वहाँ भी कुछ ही देर में स्विगी से खाना पहुंच जाता है। एक तरफ तो मोहतरमा अपनी सेहत को ले चिंतित हैं पर दूसरी ओर उनको बाहर के खाने का चस्का भी है।

3) इसी के एक विज्ञापन में तीन पीढ़ियां अपने सर में तेल लगवा रही हैं और ख़ास व्यंजन की याद आते ही स्विगी हाजिर हो जाता है। यह कुछ-कुछ युक्तिसंगत लगता है कि यदि समय कम है तो हमें याद करें। मेरे ख्याल से कंपनी को ऐसे विज्ञापन ही बनवाने चाहिए जिनमें यह संदेश हों कि आपकी अत्यधिक व्यस्तता के समय हम आपकी भोजन संबंधी परेशानियों को दूर करते हैं।

ऐसे विज्ञापनों से ऐसा भी लगता है जैसे हिदायतें सिर्फ आम जनता को देने की एक खानापूर्ति है ! उसको गंभीरता से कोई नहीं लेता और ना हीं उसे प्रभावी तौर पर लागू करवाने की किसी की कोई मंशा होती है ! जबकि देश के हर नागरिक को अपनी जिम्मेदारी का अहसास, समाज के प्रति अपना उत्तरदायित्व तथा आने वाली पीढ़ी की भी चिंता होनी चाहिए !

मंगलवार, 6 नवंबर 2018

नरकासुर वध तथा सोलह हजार बंदी युवतियों की मुक्ति

भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा को अपना सारथी बना युद्ध में शामिल कर उन्हीं की सहायता से कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरकासुर का वध कर देवताओं व संतों को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई तथा बंदी गृह से सोलह हजार युवतियों को मुक्त करवाया। युवतियां मुक्त तो हो गयीं पर सामाजिक विरोधो और मान्यताओं के चलते भौमासुर द्वारा बंधक बनकर रखी गई इन नारियों को कोई भी अपनाने को तैयार नहीं था, तब अंत में श्रीकृष्ण ने सभी को आश्रय दिया और उन सभी कन्याओं ने श्रीकृष्ण को पति रूप में स्वीकार किया। उन सभी को श्रीकृष्ण अपने साथ द्वारिकापुरी ले आए। वहां वे सभी कन्याएं स्वतंत्रता पूर्वक अपनी इच्छानुसार सम्मानपूर्वक रहने लगीं..........!

#हिन्दी_ब्लागिंग     
आज के ही दिन श्री कृष्ण जी ने अपनी पत्नी सत्यभामा की सहायता से नरकासुर का वध कर उसके बंदीगृह से सोलह हजार युवतियों को मुक्त करवाया था। भागवत पुराण के अनुसार तीनों लोकों में हाहाकार मचाने वाला
सोलह हजार युवतियों की मुक्ति 
भौमासुर भूमि माता का पुत्र था। जिस समय विष्णु जी ने वराह अवतार ले कर भूमि को समुद्र से निकाला था, उसी समय उनके और भूमि देवी के संयोग से एक पुत्र ने जन्म लिया
था। भूमि पुत्र होने के कारण वह भौम कहलाया। पर पिता एक परम देव और धरती जैसी पुण्यात्मा माता होने के बावजूद अपनी क्रूरता के कारण उसका नाम भौमासुर पड़ गया ! पर दिनोदिन उसका व्यवहार पशुओं से भी ज्यादा क्रूर, निर्मम और अधम होता चला गया उसकी इन्हीं करतूतों के कारण उसे नरकासुर कहा जाने लगा।     
नरकासुर 
कहते हैं जब रावण वध हुआ उसी दिन पृथ्वी के गर्भ से उसी स्थान पर नरकासुर का जन्म हुआ, जहाँ सीता जी का जन्म हुआ था। सोलह वर्ष की आयु तक राजा जनक ने उसे पाला; बाद में पृथ्वी उसे ले कहते हैं जब रावण वध हुआ उसी दिन पृथ्वी के गर्भ से उसी स्थान पर नरकासुर का जन्म हुआ, जहाँ सीता जी का जन्म हुआ था। सोलह वर्ष की आयु तक राजा जनक ने उसे पाला; बाद में पृथ्वी उसे ले गई और विष्णु जी ने उसे प्रागज्योतिषपुर का, गई और विष्णु जी ने उसे प्रागज्योतिषपुर का, जो आज का असम प्रदेश है, राजा बना दिया। नरकासुर ने ब्रह्मा जी की घोर तपस्या कर के वर प्राप्त कर लिया था कि उसे देव-दानव-असुर-मनुष्य कोई नहीं मार सकेगा। कुछ दिनों तक तो नरकासुर ठीक से राज्य करता रहा, किन्तु समय की लीला तथा वाणासुर के सानिद्ध्य के कारण उसमें सारे अवगुण राक्षसों के भर गए।  
युद्धरत सत्यभामा और श्रीकृष्ण 
नरकासुर ने इंद्र को हराकर उसको स्वर्ग से बाहर निकाल दिया था। उस के अत्याचार से देवतागण तथा धरती पर संत-मुनि-मानव सभी त्राहि-त्राहि कर रहे थे। वह वरुण का छत्र, अदिति के कुण्डल और देवताओं की मणि छीनकर त्रिलोक विजयी हो गया था। जिससे अहंकार से भर महाअत्याचारी बन गया था। चूँकि उसको श्राप मिला हुआ था कि उसका वध एक स्त्री द्वारा होगा, इसलिए उसका अत्याचार उनके प्रति भी बहुत बढ़ गया था। उसने अपने रनिवास में सोलह हजार एक सौ स्त्रियों को बंदी बना कर रखा हुआ था।  
नरकासुर का अंत 
पर जब हर चीज की अति हो गयी तो सुर-नर सब मिल कर श्री कृष्ण जी के पास गए और नरकासुर से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। प्रभू ने उन सब को आश्वसान दिया। चूँकि नरकासुर को स्त्री के हाथों मरने का श्राप था इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा को अपना सारथी बना युद्ध में शामिल कर उन्हीं की सहायता से कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरकासुर का वध कर देवताओं व संतों को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई तथा बंदी गृह से सोलह हजार युवतियों को मुक्त करवाया। युवतियां मुक्त तो हो गयीं पर भौमासुर के यहां इतने दिन रहने के कारण सामाजिक विरोधों और मान्यताओं के चलते इन को कोई भी अपनाने को तैयार नहीं था, तब अंत में श्रीकृष्ण ने सभी को आश्रय दिया। उन सभी कन्याओं ने श्रीकृष्ण को पति रूप में स्वीकार किया। श्री कृष्ण उन सब को अपने साथ द्वारिकापुरी ले आए। जहां वे सभी कन्याएं स्वतंत्रता पूर्वक अपनी इच्छानुसार, सम्मानपूर्वक रहने लगीं। 

जब नरकासुर के त्रास से जगत को चैन और शान्ति मिली उसी की खुशी में दूसरे दिन अर्थात कार्तिक मास की अमावस्या को लोगों ने अपने घरों में दीए जलाए । तभी से नरक चतुर्दशी तथा दीपावली का त्योहार मनाया जाने लगा।

शुक्रवार, 2 नवंबर 2018

रणथंभौर दुर्ग, उसमें स्थित भवन तथा मंदिर

इस अभेद्य दुर्ग के अंदर गणेश जी के मंदिर के अलावा एक रघुनाथ मंदिर, एक जैन मंदिर, एक माँ काली का शक्ति पीठ, बाइस खंबा छतरी के नीचे एक गुफा में एक विशाल शिव लिंग भी स्थापित है। इन सब के साथ ही यहां एक मस्जिद भी निर्मित है। परन्तु इनके साथ ही जिसकी भरमार है जो सैंकड़ों की तादाद में यहां, वहाँ, दाएं, बाएं, ऊपर, नीचे सब जगह मौजूद है, वे हैं लंगूर ! पर एक बात है वे किसी को कोई हानि नहीं पहुंचाते। शिमला के जाकू या मथुरा-वृन्दावन के शरारती वानर युथों से उनकी कोई तुलना नहीं है...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग  
रणथंभौर दुर्ग, राजस्थान के सवाई माधोपुर शहर से करीब से 12-13 कि.मी. की दुरी पर रन और थंभ नाम की पहाडियों के बीच रणथम्भौर अभ्यारण्य के बीच में स्थित यह एक अभेद्य दुर्ग है। हालांकि इसका निर्माण चौहान वंश के राजाओं द्वारा 944 ईस्वी शुरू हो गया था पर इसकी पहचान प्रमुखता से राव हम्मीर देव चौहान के साथ की जाती है। मुहम्मद गौरी से पृथ्वी राज चौहान के हार जाने के बाद उनके पुत्र गोविंदराज ने रणथम्भौर को अपनी राजधानी बनाया था। उनके अलावा विभिन्न राजाओं का यहां आधिपत्य रहा। पर इसको सबसे ज्यादा ख्याति मिली हम्मीर देव के, 1282-1301, शासन काल में। उनके 19 वर्षो का शासन इस दुर्ग का स्वर्णिम युग रहा था। उनके द्वारा लडे गए 17 युद्धों में से उन्हें 13 में विजय प्राप्त हुई थी। फिर बाद में सवाई माधो सिंह ने फिर से पास के गांव और इस इलाके का विकास किया और इस किले को और भी सुदृढ़ करवाया। इसीलिए इस पूरे इलाके का नाम उनके नाम पर सवाई माधोपुर रखा गया।



हम्मीर कुंड 









आज भी इस दुर्ग की मजबूती और बेहतर हालत को देख कर इसके स्वर्ण काल का अंदाज आसानी से लगाया जा सकता है। किले के अंदर बड़ी मात्रा में दीवारें देखने को मिलती है। यहां सात द्वार भी है जिनके नाम हैं, नवलखा पोल, हाथिया पोल, गणेश पोल, अंधेरी पोल, दिल्ली गेट, सत्पोल, सूरज पोल। इन द्वारों की विशालता-भव्यता और सुरक्षता देखते ही बनती है। 


हम्मीर महल 
छत्तीस खंबा छतरी 

दुर्ग के पश्चिमी दिशा में भी कई भवन और इमारतें अपनी उत्कृष्ट अवस्था में खड़े हैं। जिनमें प्रमुख हैं, हम्मीर पैलेस, बत्तीस खम्भा छत्री, हैमर, बडी कच्छारी,  छोटी कछारी इत्यादि। पर इन सब में जो स्थान सबसे लोकप्रिय, विश्व-प्रसिद्द, आस्था और मान्यता प्रद है, जिससे जन-जन की भावनाएं जुडी हुई हैं, वह है यहां का त्रिनेत्र गणेश या प्रथम गणेश मंदिर। इसमें गणपति अपने पूरे परिवार के साथ विराजमान हैं। इनके साथ एक कथा भी जुडी हुई है। बात तब की है जब राजा हम्मीर अल्लाउद्दीन खिलजी के साथ युद्ध रत थे। युद्ध के पहले ही किले में प्रचुर खाद्य सामग्री एकत्रित कर ली गयी थी। पर लड़ाई लंबी खिंच जाने के कारण अनाज के गोदाम खाली होने लगे। गणेश जी के महान भक्त राजा को चिंता ने घेर लिया। उसी समय एक रात उन्हें सपने में गणेश जी ने दर्शन दिए और कहा तुम्हारी सारी चिंताएं और मुसीबतें जल्द ही ख़त्म हो जाएंगीं। सुबह किले की एक दीवाल में तीन नेत्रों वाली मूर्ति चिपकी पाई गयी और सारे अन्न भंडार भी भरे-पुरे हो गए। युद्ध के समाप्त होने पर राजा हम्मीर ने वहीँ गणेश जी का मंदिर बनवा दिया। जहां गणेश चतुर्थी पर लाखों की भीड़ जुटती है। इसके साथ ही देश-विदेश से भक्तजन अपने किसी भी पुण्य कार्य को आरंभ करने के पहले श्री गणेश को पत्र लिख आमंत्रित करते हैं, जिससे उनका कार्य निर्विघ्न और सुखमय हो। इस काम के लिए डाक विभाग द्वारा एक पत्र वाहक सिर्फ मंदिर के लिए निमंत्रण पत्र ले जाने के लिए नियुक्त किया हुआ है। 


रघुनाथ मंदिर प्रवेश द्वार 


शक्ति पीठ, माँ काली मंदिर 
गणेश मंदिर 

गणेश जी के मंदिर के अलावा किले में एक रघुनाथ मंदिर, एक जैन मंदिर, एक माँ काली का शक्ति पीठ, बाइस खंबा छतरी के नीचे एक गुफा में एक विशाल शिव लिंग भी स्थापित है। इन सब के साथ ही यहां एक मस्जिद भी निर्मित है। परन्तु इनके साथ ही जिसकी भरमार है जो सैंकड़ों की तादाद में यहां, वहाँ, दाएं, बाएं, ऊपर, नीचे सब जगह मौजूद है, वे हैं लंगूर ! पर एक बात है वे किसी को कोई हानि नहीं पहुंचाते। शिमला के जाकू या मथुरा-वृन्दावन के शरारती वानर युथों से उनकी कोई तुलना नहीं है। 


जैन मंदिर 
गणेश मंदिर की ओर 


वानर परिवार 



वैसे रणथम्भौर का सबसे बड़ा आकर्षण तो यहां का वन्य अभ्यारण्य ही है। जहां बाघों के लिए सुरक्षित वातावरण उपलब्ध करवाया गया है। उनकी बढ़ती संख्या के  सुखद परिणाम भी मिले है। बाघों के अलावा जंगली सूअर, भालू, वैन भैंसे, हिरणों की कई प्रजातियों के साथ-साथ अनेक प्रकार के पक्षियों का भी यहां बसेरा है। जंगल सफारी के लिए सबसे अच्छा तथा अनुकूल मौसम ऑक्टूबर से मार्च-अप्रैल तक का होता है। वर्षा के मौसम में सफारी दो महीने के लिए बंद रहती है। यहां वायु या थल मार्ग से कहीं से भी आसानी से पहुंचा जा सकता है। रहने खाने के लिए भी बहुत सारे अच्छे और बजट वाले होटल वगैरह उपलब्ध हैं। 

मंगलवार, 30 अक्टूबर 2018

आत्महत्या का कारण बनी एक फोटो

एक दिन एक फोन इंटरव्यू पर जब कार्टर से किसी ने उस बच्ची के बारे में पूछा, तो केविन ने कहा कि मुझे नहीं मालुम, मैं रुका नहीं था, क्योंकि मुझे अपनी फ्लाइट पकड़नी थी ! इस पर इंटरव्यू लेने वाले व्यक्ति ने कहा कि मिस्टर कार्टर उस दिन वहां एक नहीं दो गिद्ध मौजूद थे, जिसमें एक के हाथ में कैमरा था ! इस कथन से कार्टर को अपनी भयंकर भूल का एहसास हुआ, वह इतना विचलित हो गया कि गहरे अवसाद में चला गया और कुछ दिनों बाद उसने आत्महत्या कर ली। ऐसा शायद इसलिए हुआ क्योंकि उसकी अंतरात्मा अभी जीवित थी। शायद वह भी आज जीवित होता यदि उसने उस बच्ची को उठा कर किसी फीडिंग सेंटर तक पहुंचा दिया होता.........!

#हिन्दी_ब्लागिंग
आज फिर अखबार में एक खबर थी कि एक सड़क दुर्घटना में घायल हुए युवक की सहायता करने की बजाए लोग उसकी तस्वीरें लेते रहे ! आए दिन ऐसी बातें सुनने को मिलती हैं ! हम ऐसे संवेदनहीन कैसे हो गए हैं ? एक आदमी मौत से जूझ रहा होता है और हम उस पल को अपने कैमरे में कैद कर रहे होते हैं ! क्यों ? सिर्फ सनसनी फैलाने के लिए ? सरकार को गलियाने के लिए ? पुलिस की लेट-लतीफी दर्शाने के लिए ? या फिर इसलिए कि अपने दोस्त-मित्रों को वे फोटो भेज कर बतला सकें कि मेरे सामने ऐसा हुआ और इस तरह अपने को ख़ास होने का अनुभव करवाने के लिए ? और यह सब एक इंसान की जान की एवज में ? फिर विडंबना यह कि कुछ ही देर बाद वही फोटो किसी बेकार-बेकाम चीज की तरह ''कूड़ेदान'' के हवाले कर दी जाती है और उसी के साथ सब कुछ भूला दिया जाता है ! लगता है जैसे होड़ सी मची हुई है ! कुछ ऐसा दिखाने को बेताब जिसे किसी ने मुझसे पहले ना देखा हो ! दूसरों से आगे होने-रहने की इसी बेताबी के चलते रोज किसी ना किसी के हताहत या दिवंगत होने की ख़बरें भी आने लगीं हैं।  
हमारी अंतरात्मा भी क्या हमें कोसने-समझाने के बदले अपनी ''सेल्फी'' लेने लग गयी है ? आज फिर बड़ी बुरी तरह याद आ रही है ''केविन कार्टर'' की ! 1990 की बात है सूडान बुरी तरह अकाल की गिरफ्त में था। 1993 की शुरुआत होते-होते उसके दक्षिणी इलाके की तक़रीबन आधी आबादी मौत के जबड़े में जकड़ी जा चुकी थी। रोज 10-15 लोगों के भूख से मरने की ख़बरें आ रहीं थीं। इससे परेशान हो, लोगों में जागरूकता बढ़ाने, अपनी गंभीर स्थिति को संसार के सामने लाने तथा अधिक से अधिक सहायता पाने की अपेक्षा से वहां की सरकार ने दुनियाभर के फोटो-पत्रकारों को अपने यहां आमंत्रित किया। जिससे वे वहां के हालात को संसार के सामने प्रमाणिक तौर पर रख सकें। इनमें साऊथ अफ्रिका का पत्रकार केविन कार्टर भी शामिल था। उसने वहां की यात्रा के दौरान भूख से पीड़ित एक नन्हीं बच्ची की तस्वीर खींची, जो बेहोशी के आलम में लगभग मृतप्राय थी ! उसी के ठीक पीछे एक गिद्ध बैठा हुआ था जो उसके मरने की बाट जोह रहा था। यह फोटो सबसे पहले The New York Times में 26 मार्च 1993 को छपी थी। इसे नाम दिया गया था, ''The vulture and the little girl''। छपते ही यह फोटो दुनिया भर में केविन को भी अपने साथ मशहूर करवा गयी थी। उसे पुलित्जर सम्मान से भी नवाजा गया था। पर कुछ महीनों बाद ही केविन कार्टर ने आत्महत्या कर ली थी ! 
केविन कार्टर 
ऐसा क्या हुआ था ? जब वह अपनी उपलब्धि पर जश्न मना रहा था तब दुनिया भर के चैनलों और नेट पर उसकी चर्चा भी हो रही थी। ऐसे ही एक दिन एक फोन इंटरव्यू पर जब उससे किसी ने उस बच्ची के बारे में पूछा कि ''फिर उस बच्चे का क्या हुआ ?'' तो केविन ने कहा कि ''मुझे नहीं मालुम, मैं रुका नहीं, क्योंकि मुझे अपनी फ्लाइट पकड़नी थी !'' इस पर इंटरव्यू लेने वाले व्यक्ति ने कहा कि ''मिस्टर कार्टर उस दिन वहां एक नहीं दो गिद्ध मौजूद थे, जिसमें एक के हाथ में कैमरा था !'' इस कथन से कार्टर को अपनी भयंकर भूल का एहसास हुआ, वह इतना विचलित हो गया कि गहरे अवसाद में चला गया और कुछ दिनों बाद उसने आत्महत्या कर ली। ऐसा शायद इसलिए हुआ क्योंकि उसकी अंतरात्मा अभी जीवित थी। शायद वह भी आज जीवित होता यदि उसने उस बच्ची को उठा कर किसी फीडिंग सेंटर तक पहुंचा दिया होता ! 

पर हम अपने आप को क्या कहें ? क्या यह जरुरी नहीं कि कुछ हासिल करने के पहले हमारी इंसानियत, हमारी मानवता, हमारी संवेदनाएं सामने आएं जो सिद्ध करें कि हम अच्छे फोटोग्राफर हों ना हों पर एक बेहतर इंसान अवश्य हैं ! 

शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2018

अभयारण्य की देख भाल करने के लिए जरुरी है, जीवट, धैर्य व साहस

सफारी के दौरान शुरू से ही सबके दिमाग में सिर्फ और सिर्फ टाइगर ही छाया हुआ था ! नहीं तो जंगल के परिवेश के एक-एक मीटर का फासला अपने आप में अजूबा समेटे रहता है। अजूबे तो मुझे वे तीन सरकारी कर्मचारी भी लगे, जो अभ्यारण्य के उस हिस्से की सुरक्षा के लिए घोर जंगल में दिन-रात रहते हुए अपना कर्तव्य निभाते हैं !उन्हीं में से सैनी जी ने बताया कि ''जानवर शांति प्रिय ही होते हैं। बेवजह कभी भी आक्रमण नहीं करते, तभी तो आपलोग खुले वाहनों में घूमते हैं, और आपको तो प्रत्यक्ष प्रमाण मिल गया है, जब वह चिड़िया निडर हो आपके हाथ पर चुग्गा चुगने आ बैठी '' 

#हिन्दी_ब्लागिंग    
कल यहीं बात की थी, अपनी जंगल सफारी की, जब यात्रा के अंत में जा कर अद्भुत रूप से वनराज के दर्शन हुए थे। सफारी में सैंकड़ों लोगों का रोज आना-जाना लगा रहता है। उन सब का मुख्य ध्येय एक ही  रहता है, जंगल के राजा के दर्शन का ! जिन्हें भाग्यवश वनराज दिख जाता है, वे इसे एक बड़ी उपलब्धि मान खुश हो जाते हैं, जिन्हें नहीं दिखता वे कुछ मायूस हो वापस चले जाते हैं। हालांकि अभ्यारण्यों में और भी दसियों तरह के जीव होते हैं, वे भी अपने आप में नायाब होते हैं, उनमें लोगों की दिलचस्पी भी होती है, पर संतुष्टि वनराज को देखने से ही मिलती है। अब; वो तो राजा है ! कब-कहां-कैसे दिखना है यह सब उसकी मर्जी के ऊपर निर्भर करता है। उसकी दुर्लभ पर गरिमामयी उपस्थिति वातावरण को बदल कर रख देती है। कुछ लोग तो हफ़्तों उसके नजर आने का इंतजार करते हैं और दिख जाने पर मंत्रमुग्ध हो, जड़ बने उसे निहारते रहते हैं। 

मार्ग में 

निडर पक्षी 

पर मान लीजिए शेर या बाघ आम जानवरों की तरह जंगल में कहीं भी, कभी भी नजर आने लग जाएं तो भी क्या लोगों में इतनी ही उत्सुकता रहेगी उनको देखने की ? मुझे नहीं लगता ! क्योंकि जो सुगम हो, सर्वत्र उपलब्ध हो उसके लिए उतनी रुचि नहीं रह जाती लोगों में ! देखा गया है कि जंगली सूअर, भैंसे, भालू जैसे खतरनाक जीवों को भी लोग एक नजर देख आगे बढ़ जाते हैं, क्योंकि उनका दिखना आम होता है। अब जैसे जंगल के कर्मचारियों, वहां जाने वाले वाहन चालकों, गाइडों या अन्य स्टाफ के लिए वनराज कोई उत्सुकता का विषय नहीं रह जाता है क्योंकी वे उसे तक़रीबन रोज ही देख लेते हैं। 


शावक 
अपनी इस यात्रा के दौरान और एक बात नोट कि तफरीह के दौरान हम मुख्य उद्देश्य को छोड़ और किसी ओर ध्यान ही नहीं देते, जैसे शुरू से ही सबके दिमाग में सिर्फ और सिर्फ टाइगर ही छाया हुआ था ! नहीं तो जंगल के परिवेश के एक-एक मीटर का फासला अपने आप में अजूबा समेटे रहता है। अजूबे तो मुझे वे तीन सरकारी कर्मचारी भी लगे, जो अभ्यारण्य के उस हिस्से की सुरक्षा के लिए घोर जंगल में रहते हुए अपना कर्तव्य निभाते हैं। सफारी के तय मार्ग के अनुसार कारवां को करीब 15-16 की.मी जंगल के अंदर उस हिस्से के जंगलात के दफ्तर तक जा वहां से वापस होना होता है। वॉश-रूम की सुविधा उपलब्ध होने के कारण भी सारे कैंटर और जीपें वहां कुछ देर रुकते हैं जिससे सैलानी कुछ तरो-ताजा हो सकें। 
जंगलात विभाग का ऑफिस 
प्राकृतिक बावड़ी 
बुद्धि राम व रामअवतार 
वाहनों के ठहरने के स्थान से दफ्तर कुछ ऊंचाई पर बना हुआ है जो शायद सुरक्षा की दृष्टि से किया गया होगा। जब तक लोग इधर-उधर टहल कर पीठ सीधी कर रहे थे उसी समय मेरा ध्यान वहां के तीन के कर्मचारियों की तरफ गया, जो निरपेक्ष भाव से हम सब को देख रहे थे। मैं उनके पास गया। परिचय का लेन-देन हुआ। समय कम था, सो किशोर सैनी और उनके दो सहायक बुद्धि राम तथा राम अवतार से उतने में जो बात हुई, उसका सार यही था कि अपनी ड्यूटी की अवधि के दौरान उन्हें उस घोर जंगल में, अपने परिवार तक से दूर रहना पड़ता है। वहां जानवरों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए बिजली तो बिजली टार्च तक रखने की मनाही है। रात होने के पहले उन्हें अपना भोजन पका लेना पड़ता है क्योंकि रात में वहां किसी भी प्रकार की रौशनी निषेध है। उनकी अपनी सुरक्षा के लिए उनके पास सिर्फ एक पांच फुट का डंडा ही होता है। सांय-सांय करता बियावान जंगल, घुप अंधकार, जहां हाथ को हाथ न सुझाई दे, चारों ओर दुर्दांत जंगली जीव, दूर-दूर तक कोई इंसान नहीं, कैसे कटती होगी इन तीनों की रातें ? कुछ अनहोनी हो जाए तो घंटों लगें सहायता आने में ! सलाम है इनके जीवट को !
घिरती शाम 
इनका कहना है कि अब इस सबकी आदत पड़ चुकी है। जंगली जानवर भी अपने लगते हैं। वैसे भी  जानवर शांति प्रिय ही होते हैं। बेवजह कभी भी आक्रमण नहीं करते। यदि कभी कोई जीव रुष्ट भी हो जाता है तो हम धैर्य से ही काम लेते हैं, इससे अब वे हमसे खतरा महसूस नहीं करते। सैनी जी ने हंसते हुए कहा, ''तभी तो आप लोग खुले वाहनों में घूमते हैं, और आपको तो प्रत्यक्ष प्रमाण मिल गया है, जब वह चिड़िया निडर हो आपके हाथ पर चुग्गा चुगने आ बैठी '' ! दफ्तर के पास ही एक प्राकृतिक बावड़ी है जिसमें बारहों महीने स्वच्छ-निर्मल पानी उपलब्ध रहता है, उसी से सबका काम चलता है। दिनके उजाले में या सफारी के वाहनों की आवाजाही से जो वन्य-जीव जंगल के गर्भ में चले जाते हैं वे भी दिन ढलने के बाद स्वछंद हो इधर आ कर अपनी प्यास बुझाते हैं। आजकल एक व्याघ्र परिवार इधर अक्सर आता है, जिसमें नर, मादा तथा दो बच्चे हैं। 
वनराज आराम के मूड में 
तभी कारवां के ''मूवने'' का समय हो गया। किसी बार्डर पर बैठे सैनिकों के समान उन तीनों से मैंने विदा ली। सारे सैलानी अपने-अपने वाहनों में जा कर फिट हो गए। आगे क्या होने वाला है ! प्रकृति क्या रंग दिखाने वाली है ! इसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी ! किसी को सपने में भी ख्याल नहीं आया होगा कि हमें विदाई देने के लिए खुद वनराज द्वार पर मौजूद रहेंगे !!! 

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