मंदार पर्वत, वही जिसे मथानी बना कर समुद्र-मंथन किया गया था।
कहां है वह ? क्या उसका अस्तित्व है ?
यदि उस मूक साधक को देखना चाहते हैं तो आपको बिहार के बांका जिले के बौंसी गांव तक जाना पड़ेगा। यह करीब सात सौ फुट ऊंची पहाड़ी भागलपुर से 30-35 मील दूर स्थित है। जहां रेल या बस किसी से भी सुविधापूर्वक जाया जा सकता है। बौंसी से इसकी दूरी करीब पांच मील की है।
जब समुद्र मंथन किया गया तो मंदार पर्वत को मथनी और उस पर वासुकी नाग को समेट कर रस्सी का काम लिया गया था। पर्वत पर अभी भी धार दार लकीरें दिखती हैं जो एक दूसरे से करीब छह फुट की दूरी पर बनी हुई हैं और ऐसा लगता है कि किसी गाड़ी के टायर के निशान हों। ये लकीरें किसी भी तरह मानव निर्मित नहीं लगतीं। जन विश्वास है कि समुद्र मंथन के दौरान वासुकी के शरीर की रगड़ से यह निशान बने हैं। मंथन के बाद जो हुआ वह अलग कहानी है। पर अभी भी पर्वत के ऊपर शंख-कुंड़ में एक विशाल शंख की आकृति स्थित है कहते हैं शिवजी ने इसी महाशंख से विष पान किया था।
पुराणों के अनुसार एक बार विष्णुजी के कान के मैल से मधु और कैटभ नाम के दो भाईयों का जन्म हुआ। पर धीरे-धीरे इनका उत्पात इतना बढ गया कि सारे देवता इनसे भय खाने लगे। हद से गुजरने के बाद आखिर इन्हें खत्म करने के लिए विष्णुजी को इनसे युद्ध करना पड़ा। इसमें भी मधु का अंत करने में विष्णुजी परेशान हो गये हजारों साल के युद्ध के बाद अंत में उन्होंने उसका सिर काट उसे मंदार पर्वत के नीचे दबा दिया। पर उसकी वीरता से प्रसन्न हो कर उसके सिर की आकृति पर्वत पर बना दी गयी। जो अब यहां आने वालों के लिए दर्शनीय स्थल बन चुकी है।
वैसे तो यहां अनगिनत सरोवर और मंदिर हैं, सबकी अपनी-अपनी कहानी भी है पर पर्वत के नीचे बने जल-कुंड़ का अपना महत्व है इसके पानी को रोगों से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है।
यहां से करीब 70-80 कि.मी. की दूरी पर वासुकीनाथ का मंदिर भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है। कभी मौका मिले तो समुद्र मंथन की इस मथानी को जरुर देखने जाएं।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
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6 टिप्पणियां:
बिहार का होकर भी इस जगह कभी नहीं गया। आपके आलेख ने प्रेरित किया है .. अब ज़रूर जाऊंगा।
बहुत ही तथ्यपरक जानकारी दी है आपने।
बहुत सुंदर जानकारी,गुगल मे देखते हे इस पर्वत को शायद चित्र मिल जाये
अच्छी जानकारी दी आपने.
बहुत ही अच्छी जानकारी मिली, परंतु ये और आश्चर्य का विषय है कि ये पर्वत समुद्र से इतनी दूर गया कैसे होगा ?
विवेक जी,
जैसा विवरण मिलता है उसके अनुसार देवता इतने बड़े काम के लिए अकेले सक्षम नहीं थे। उन्होंने दैत्यराज बाली को मंथन के बाद प्राप्त होने वाली वस्तुओं को बराबर बांटने का दिलासा देकर सहयोग के लिए तैयार किया। फिर देवासुर सहयोग से मंदार पर्वत को उठा कर समुद्र तक लाया गया।
इस काम के लिए मंदार को ही क्यों चुना गया यह शोध का विषय हो सकता है।
बहुत अच्छी जानकारी मिली ..आभार
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