शनिवार, 11 सितंबर 2010

शुक्र है पत्थर तो उछला, आसमां में सुराख हो ना हो

आजादी के पहले देश के वाशिंदों के लक्ष्य, भावनाएं, इच्छाएं करीब-करीब एक जैसे ही थे। एक ही उद्देश्य था अंग्रेजों को निकाल बाहर करना। पर विभाजन के बाद दोनों पड़ोसी फिर कभी एकमत ना हो पाए। कहते हैं कि खेल दिलों को जोड़ने का काम करते हैं। पर यहां तो खेलों से भी तनाव बढता ही दिखा है। चाहे हाकी हो या क्रिकेट, आपस के मैचों के दौरान फिजा में तलखी ही घुली रहती है। लगता है खेल नहीं युद्ध हो रहा हो। इस समय भावनाएं अपने चरम पर होती हैं। जिसमें जीतने वाला ऐसे जश्न मनाता है जैसे विश्वविजय प्राप्त कर ली हो। हारने वाला ऐसे शोकग्रस्त हो जाता है जैसे घर में गमी हो गयी हो। पर लंबे अर्से के बाद तनाव की तपती धूप में हल्के बादलों के छाने का एहसास हो रहा है। ठंड़ी ब्यार के रूप में दो ऐसी बातें सामने आईं हैं जो जले पर फाहे का काम कर रही हैं। उन्होंने वर्षों से सुप्त झील में लहरें भले ही ना उठा दी हों पर एक छोटी सी हलचल तो पैदा कर ही दी है।

पहले नम्बर पर है भारत के बेंगलुरु में जन्मे रोहन बापन्ना और पाकिस्तान के लाहौर में पैदा हुए एसाम कुरैशी जो 2007 से टेनिस के ड़ब्लस में एक दूसरे के जोड़ीदार बन कर धीरे-धीरे इस खेल में उचाईयों की ओर अग्रसर हैं। अभी-अभी अमेरिकी ओपेन में दोनों ने फायनल में जगह बना एक नया मुकाम बनाया है। दोनों युवक प्रेम और सौहाद्र की भावना से भरपूर हैं। उनकी दिली ख्वाहिश है कि दोनों देशों के बीच प्रेम का दरिया बहे। उनका पसंदिदा वाक्य है "युद्ध रोको, टेनिस खेलो"।
जाहिर है जब दोनों मैदान में होते हैं तो दोनों देशों के रहवासी उनकी जीत की प्रार्थना एक साथ करते हैं।

मैं टी.वी. बहुत ही कम देखता हूं। पर इस जानकारी के बाद कोशिश करूंगा उस "शो" को देखने की जिसके बारे में बताने जा रहा हूं। सुनने में आया है कि छोटे पर्दे पर एक अलग तरह का शो चल रहा है "छोटे उस्ताद-दो देश एक आवाज।" इसमें भारत और पाकिस्तान के बच्चे हिस्सा ले रहे हैं। पर आपस में प्रतिद्वंदिता नहीं कर रहे हैं बल्कि साथ गा रहे हैं। इसमें टीमें ऐसे बनाई गयीं हैं कि हर टीम के दो बच्चों में एक भारत का है तथा दूसरा पाकिस्तान का। दोनों मिल कर अपनी टीम को जिताने की कोशिश करते हैं ।
अब चूंकी टीम में बच्चे दोनों देशों के हैं तो अपनी पसंदिदा जोड़ी को जिताने के लिए दोनों देशों के नागरिल एकजुट हो वोट करेंगे। तो चाहे जैसे भी हो स्नेह की ड़ोर तो बंधेगी ही। यह जिसके भी दिमाग की उपज हो, बधाई का पात्र है।

इतिहास गवाह है कि देशों ने, अवाम ने तभी तरक्की की है जब संसार अमन, चैन, प्यार और भाईचारे की प्राण वायु में सांस लेता रहा है। नफरत और ईर्ष्या की कोख से तो सदा तबाही ने ही जन्म लिया है।

10 टिप्‍पणियां:

राज भाटिय़ा ने कहा…

अजी यह वो पडोसी है जिस से कभी भी प्यार या वफ़ा की उम्मीद करना बेकार है, आज तक ६३ सालो मै भी अक्ल ना आई तो कब आयेगी....

वीना ने कहा…

छोटे उस्ताद-दो मैं भी कभी-कभार देख लेती हूं। कांसेप्ट अच्छा है जिसमें जो भी टीम जीते-दोनों देश के बच्चे होंगे और वैसे भी टकराव आम जनता का नहीं वो तो सियासी खेल है...

http://veenakesur.blogspot.com/

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

ये तो आप टी.वी. का फंडा देख रहे हैं पर असल हकीकत कुछ और है ... वो राज भाटिया जी ने लिख दिया है . गणेश चतुर्थी पर्व पर हार्दिक शुभकामनाये....

P.N. Subramanian ने कहा…

हमें कहीं भी कुछ अलग सा नहीं दिख रहा है. आजकल के इस्लामिक कट्टरवादिता के चलते ऐसा कुछ भी संभव नहीं है.

cmpershad ने कहा…

हां जी, कश्मीर में बहुत से पत्थर उछाले जा रहे है ....देश में सुराख करने के लिए :)

अशोक बजाज ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति .आभार

Rahul Singh ने कहा…

इन पर नजर बनी रहे तो बहुत सारी बात आसान हो जाए, उतनी सहज जितनी आम दिलों में होती है.

Gagan Sharma, Kuchh Alag sa ने कहा…

बात टी.वी. की चतुराई या किसी से रिश्ते जोड़ने की नहीं है। बात है अमन और चैन की जिससे बेकार की बातों की चिंता से बेफिक्र हो उन्नति और तरक्की का मार्ग प्रशस्त हो सके।

Akhtar Khan Akela ने कहा…

bhn जी आपने एक पत्थर उछालने की कोशिश पर जो ख़ुशी ज़ाहिर की हे में भी आपकी इस ख़ुशी में शामिल होना चाहता हूँ बहुत खूब तहरीर हे बहुत खूब विचार हें और प्र्स्तुतिक्र्ण का तरीका बीएस गले से उतर जाने वाला हे मुबारक हो. अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

अशोक बजाज ने कहा…

ग्राम चौपाल में तकनीकी सुधार की वजह से आप नहीं पहुँच पा रहें है.असुविधा के खेद प्रकट करता हूँ .आपसे क्षमा प्रार्थी हूँ .वैसे भी आज पर्युषण पर्व का शुभारम्भ हुआ है ,इस नाते भी पिछले 365 दिनों में जाने-अनजाने में हुई किसी भूल या गलती से यदि आपकी भावना को ठेस पंहुचीं हो तो कृपा-पूर्वक क्षमा करने का कष्ट करेंगें .आभार


क्षमा वीरस्य भूषणं .

विशिष्ट पोस्ट

कोई तो कारण होगा, धर्म स्थलों में प्रवेश के प्रतिबंध का !!

अभी कुछ दिनों पहले कुछ तथाकथित आधुनिक महिलाओं ने सोशल मिडिया पर गर्व से यह  स्वीकारा था कि माह के उन  कुछ ख़ास दिनों में भी वे मंदिर जात...