pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

गुरुवार, 6 मई 2021

समय निकाल कर सोचिएगा जरूर, यह आज भी सामयिक है

कुछ नाम ऐसे हैं जो अपने बाहुबल, निर्भयता, शौर्य और देशप्रेम की खातिर इतिहास के पन्नों के मोहताज नहीं रहे !सोचने की बात है कि वेतनभोगी, स्वामिभक्त, छद्म इतिहासकार रूपी चारण जब उनकी ख्याति को इतिहास के पन्नों में, तोड़-मरोड़ कर ही सही, जगह देने के लिए मजबूर हो गए तो असल में वे देशरत्न कितने महान होंगे ! सैंकड़ों ऐसे नाम हैं जिन्हें मुगलों, अंग्रेजों, वामियों के अतिरिक्त हमारे खुद के लोगों ने नीचा दिखाने के लिए तरह-तरह के प्रपंच रचे ! आज के माहौल में एक ऐसा ही नाम फिर याद आता है, जिसके दुश्मन को नेस्तनाबूद करने के हठ के चलते उसके खुद के सरदारों ने ही जहर दे कर मार डाला था ! राणा सांगा .............!

#हिन्दी_ब्लागिंग

हमारे देश पर सदियों से बाहरी आक्रांताओं द्वारा लूट-खसोट के लिए हमले होते रहे हैं। उनके आतंक का हमारे वीर, देशभक्त रणबांकुरों ने माकूल जवाब भी दिया है ! पर विडंबना यह भी रही कि वे सब विभिन्न कारणों से कभी भी एकजुट होकर दुश्मन को चुन्नौती नहीं दे पाए ! ऐसे एक-दो नहीं हजारों योद्धा हुए हैं जिनके नाम सुन कर ही दुश्मनों के पसीने छूट जाते थे। परन्तु विभिन्न षड्यंत्रों के तहत, देसी-विदेशी आकाओं द्वारा पोषित, हमारे छद्म, तथाकथित इतिहासकारों ने अपने आकाओं के झूठे-सच्चे किस्सों की खातिर उन वीरों को गुमनामी के कोहरे के पीछे धकेल कर रख दिया। परन्तु उनके शौर्य, जज्बे, देश के प्रति आत्मोसर्ग को जनमानस की यादों से कभी नहीं हटा पाए।

फिर भी कुछ नाम ऐसे हैं जो अपने बाहुबल, निर्भयता, शौर्य और देशप्रेम की खातिर इतिहास के पन्नों के मोहताज नहीं रहे ! सोचने की बात है कि वेतनभोगी, स्वामिभक्त, इतिहासकार रूपी चारण जब उनकी ख्याति को इतिहास के पन्नों में, तोड़-मरोड़ कर ही सही, जगह देने के लिए मजबूर हो गए तो असल में वे देशरत्न कितने महान होंगे ! सैंकड़ों ऐसे नाम हैं जिन्हें मुगलों, अंग्रेजों, वामियों के अतिरिक्त हमारे खुद के लोगों ने नीचा दिखाने के लिए तरह-तरह के प्रपंच रचे ! आज के माहौल में एक ऐसा ही नाम फिर याद आता है, जिसके दुश्मन को नेस्तनाबूद करने के हठ के चलते उसके खुद के सरदारों ने ही जहर दे कर मार डाला था ! राणा सांगा ! जी हाँ ! उस जैसा राणा ना कभी हुआ और अब तो क्या ही होगा ! 

कुछ समय बाद एक आँख, एक हाथ और एक पैर ना होने के बावजूद उस अप्रतिम योद्धा ने फिर बाबर से मुकाबला करने का निश्चय किया। पर इस बार उनके  साथी सरदार इसके लिए राजी नहीं हुए। उन्हें जब लगा कि राणा बिना युद्ध किए नहीं मानेंगे तो उन सब ने षड्यंत्र कर राणा को जहर दे दिया........!

राणा संग्राम सिंह यानी राणा सांगा ! मेवाड़ की धरती जिन्हें जन्म दे कर धन्य हो गई। वे मेवाड़ के सबसे महान शासक थे। उनके राजकाल में मेवाड़ ने आशातीत सफलताएं, शक्ति, समृद्धि और ऊंचाइयां प्राप्त की थीं। उनका साम्राज्य उत्तर में सतलुज नदी से लेकर दक्षिण में नर्मदा तक और पूर्व में भरतपुर से लेकर पश्चिम में सिंधु तक फैला हुआ था। राणा सांगा पहले और अंतिम भारतीय शासक थे, जो तक़रीबन तमाम राजपूत राजाओं को अपने नेतृत्व में शामिल करने में सफल रहे थे ताकि विदेशी लुटेरों को देश के बाहर खदेड़ दिया जा सके ! उनका व्यक्तित्व, कृतित्व, शौर्य ही कुछ ऐसा था कि तमाम आपसी भेदभावों के बावजूद तमाम राजा उनके राजनितिक और सैन्य कौशल के कायल थे। उस समय उनके सामने था काबुल से आया एक आक्रांता, बाबर ! उसने भी अपने संस्मरण बाबरनामा में उन्हें उस समय का सबसे शक्तिशाली शासक बताया है। 

आखिर वह दिन भी आ ही गया ! खानवा में बाबर की सेना के सामने राणा सांगा की सेना आ डटी, जो तक़रीबन अपने विपक्षी से दुगनी थी ! पर उनके पास ना हीं अच्छे घोड़े थे और ना हीं तोपें ! जबकि बाबर की असली ताकत थी उसका तोपखाना ! जिसका कोई जवाब राणा के पास नहीं था।  पता नहीं इस ओर कोई ध्यान क्यों नहीं दिया गया था ! जबकि इसका उपयोग और शक्ति साल भर पहले ही पानीपत के मैदान में बाबर-लोधी युद्ध में सिद्ध हो चुकी थी। क्यों युद्ध में वर्षों से चले आ रहे पारंपरिक तरीके ही अपनाए गए ! क्यों नहीं दुनिया में अपनाई जा रही युद्ध नीतियों को अपनाने में रूचि दिखाई गई ! अस्त्रों-शस्त्रों के आधुनिकरण और उनमें आ रहे बदलावों पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया ! सैनिकों को देश के लिए निछावर होना जरूर सिखाया गया पर ना उन्हें अच्छे घोड़े उपलब्ध करवाए गए और ना हीं उच्च-कोटि के हथियार ! 

16 मार्च 1527 सुबह नौ बजे भयानक युद्ध शुरू हुआ जो बीस घंटों तक चला। पर वीर, साहसी, पराक्रमी व अच्छे योद्धा होने के बावजूद राजपूत बाबर के तोपखाने का सामना नहीं कर सके ! मुगलों की विजय हुई ! बुरी तरह घायल और बेहोश राणा को उनके सहयोगी उन्हें युद्धक्षेत्र से दूर सुरक्षित जगह पर ले गए ! होश आने पर वे बहुत हताश और निराश हुए। उन्होंने अपने आप को किले में बंद कर लिया। कुछ समय बाद एक आँख, एक हाथ और एक पैर ना होने के बावजूद उस अप्रतिम योद्धा ने फिर बाबर से मुकाबला करने का निश्चय किया। पर इस बार उनके  साथी सरदार इसके लिए राजी नहीं हुए। उन्हें जब लगा कि राणा बिना युद्ध किए नहीं मानेंगे तो उन सब ने षड्यंत्र कर राणा को जहर दे दिया जिसके कारण राणा का 30 जनवरी 1528 को निधन हो गया !  

हमारा इतिहास तरह-तरह के यदि, लेकिन और परंतुओं से भरा पड़ा है। दुर्भाग्य का साया ज्यादातर हम हीं पर छाया भी रहा। उस पर छद्म इतिहासकारों के षड्यंत्रों ने सच्चाइयों पर वर्षों पर्दा डाल रखा ! यदि कभी सच को सामने लाने की कोशिश हुई भी तो ऐसे ही लोगों ने तरह-तरह के बखेड़े खड़े  कर दिए ! कुछ समय निकाल कर, सोचिएगा जरूर ! इतिहास भी गवाह है कि देश को डुबोने में बाहरी तूफानों की जगह घर में जमा गंधाते पानी ने ही ज्यादा अहम् भूमिका  निभाई है ! पर हम भी जब तक पानी सर के बिल्कुल ऊपर हो सांस ही बंद नहीं करने लगता, चेतते तो हैं ही नहीं, समय गुजरते ही उस गंधाते पानी को भी भूल उसे जस का तस पड़ा रहने देते हैं, अगली मुसीबत खड़ी करने के लिए  ! 

@संदर्भ - अहा जिंदगी 
फोटो - अंतर्जाल  

शनिवार, 1 मई 2021

क्रिकेट और कोरोना

जिस तरह क्रिकेट में रन बनाने के लिए सबसे आवश्यक चुस्त शरीर और बेहतरीन बल्ला होना सबसे जरुरी है उसी तरह कोरोना से निपटने के लिए भी शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्युनिटी और डॉक्टरी प्रोटोकॉल का पालन ही सबसे जरुरी है। आज मीडिया पर हर तीसरा इंसान अपने गले में दो सौ रूपए का स्टेथोस्कोप लटकाए डॉक्टर बन कोरोना का शर्तिया इलाज बताए जा रहा है ! ऐसी सुनी-सुनाई बातों, मीडिया पर धकेले जा रहे नुस्खों या गुगलिया ज्ञान द्वारा कुछ भी आजमा लेना और उस पर ज्यादा ध्यान देना, किसी को भी हार की कगार पर ले जा सकता है.........!

#हिन्दी_ब्लगिंग 

अभी देश में क्रिकेट और कोरोना दोनों का दौर जारी है। कुछ लोग भले ही क्रिकेट को भी एक तरह की बिमारी ही मानते हों पर वैसे इसमें और कोरोना में दूर-दूर का कोई रिश्ता नहीं है ! पर कुछ ऐसी बातें हैं, जो कोरोना से बचाव में  क्रिकेट के खेल से समझी या सीखी जा सकती हैं ! 

क्रिकेट में जीतने के लिए सबसे बड़ी अहमियत रन बनाने की होती है। उन्हीं के कमी-बेशी से हार-जीत निर्धारित की जाती है। रन बनाने के लिए जो दो चीजें सबसे जरुरी होती हैं उनमें पहला है चुस्त शरीर ! जो अपनी तेज निगाहें, दिमाग और बाकी शरीर के अवयवों के ताल-मेल, त्वरित निर्णय लेने की क्षमता से खेल को अपने पक्ष में करने में अहम् भूमिका  निभाता है। दूसरा है बैट। विशेषज्ञ द्वारा अच्छी तरह तराशा गया हर मानक पर खरा उतरने वाला बेहतरीन मजबूत लकड़ी से बना बल्ला ! बस इन दोनों के अलावा और जो कुछ भी ताम-झाम होता है वह सब गौण है। फिर वह चाहे ग्लव्स हों ! पैड हों ! गार्ड हों ! हेल्मेट हो ! जूते हों या कुछ भी ! यह कोई मायने नहीं रखता कि आपने किस कंपनी के पैड, ग्लव्स या जूते पहने हैं ! उनकी लाइनिंग कैसी है ! उनकी पैडिंग नरम रबर की है या स्पंज की ! यह सब चीजें एक अतिरिक्त आत्मविश्वास जरूर देती हैं जो निश्चिन्त हो खेलने में सहायक होता है ! पर इनके बिना भी रन बनाए जा सकते हैं जो सिर्फ और सिर्फ बल्ले और शरीर के तालमेल से ही संभव है। 

जिस तरह क्रिकेट में रन बनाने के लिए सबसे आवश्यक चुस्त शरीर और बेहतरीन बल्ला होना सबसे जरुरी है उसी तरह कोरोना से निपटने के लिए भी शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्युनिटी और डॉक्टरी प्रोटोकॉल का पालन सबसे जरुरी है। इनके अलावा सुनी-सुनाई बातों, मीडिया पर धकेले जा रहे नुस्खों या गुगलिया ज्ञान द्वारा कुछ भी आजमा लेना और उस पर ज्यादा ध्यान देना, हार की कगार पर ले जा सकता है।आज मीडिया पर कोरोना से लड़ने के सैंकड़ों उपायों की बाढ़ सी आई हुई है ! हर तीसरा इंसान अपने गले में दो सौ रूपए का स्टेथोस्कोप लटकाए, डॉक्टर बन कोरोना का शर्तिया इलाज बताए जा रहा है ! आम इंसान इतना डरा और आतंकित है कि वह हर ऐसे इलाज को, बिना उसका परिणाम जाने, बिना उसकी प्रामाणिकता परखे, बिना सोचे-समझे उसे आजमाने को तत्पर हो जाता है ! जबकि ऐसे अभी तक बताए जा रहे नुस्खे, भले ही किसी भी पैथी के हों, रोग को हराने में कारगर नहीं हैं। इनसे शरीर को कुछ अतिरिक्त सुरक्षा भले ही मिल जाती हो ! रोग से लड़ने में सहायक भले ही हो जाते हों, पर रोग मुक्ति दिलाना अभी इनके बस का सिद्ध नहीं हुआ है। आज जब यह भयंकर बिमारी पूरी तरह से अभी तक बेकाबू है तो ऐसे में कुछ भी उपाय कर लेना बहुत खतरनाक साबित हो सकता है। 

इसलिए रोग से मुक्त होने के लिए सरकार और डॉक्टरों द्वारा जारी निर्देश ही एकमात्र उपाय हैं ! यदि आप कोई और भी उपाय कर रहे हैं तो करें, हो सकता है कि उससे आत्मविश्वास में वृद्धि हो पर ''प्रोटोकॉल'' का पालन भी जरूर करते रहें ! किसी भी हालत में उसे दरकिनार ना करें ! क्योंकि यही वह बल्ला है जो इस खेल में आपको जीत दिला सकता है !  

सोमवार, 26 अप्रैल 2021

ऑक्सीजन की अति भी खतरनाक हो सकती है

ऑक्सीजन यानी कि प्राण-वायुजिसके बिना कुछ पल गुजारना भारी पड़ जाता है। पर यदि इसकी बहुलता हो जाए तो खतरा हो जाता है। वैज्ञानिक पाल बर्ट ने यह चेतावनी दी थी कि शुद्ध क्सीजन में सांस लेना जानलेवा हो सकता है। ज्यादा खोज करने पर वैज्ञानिकों ने पाया कि हम ज्यादा से ज्यादा 24 घंटे तक शुद्ध आक्सीजन सहन कर सकते हैं, उसके बाद निमोनिया हो जाता है। इसके बाद क्सीजन की अधिकता से उसका मानसिक संतुलन बिगडने लगता है। उसकी यादाश्त लुप्त हो जाती है। अगर यह दवाब और बढ़ जाए तो दौरे पड़ने शुरु हो जाते हैं..................!

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इस बार कायनात शायद कुछ ज्यादा ही नाराज है ! एक छोर संभालने जाते है तो दूसरा बेकाबू हो जाता है ! किसी तरह उसका हल निकलता है तो एक तीसरी समस्या आन खड़ी हो जाती है ! उसका हल निकलता लगता है तब तक कुछ और नया सामने आ जाता है ! बड़ी मुश्किल से दवा का इंतजाम हुआ तो अब ऑक्सीजन की कमी की समस्या मुंह बाए सामने आ गयी। वैसे इनमें से अधिकाँश समस्याएँ हमारी खुद की निर्मित ही हैं। डर और घबड़ाहट के माहौल में जिसे जो सुझाई देता है उस पर अमल करने की कोशिश में कुछ भी करने को आमादा हो रहा है ! जिसमें ऑक्सीजन की उपयोगिता भी एक है !    

ऑक्सीजन मिलना यानि नयी जिंदगी मिलना। यह एक मुहावरा ही बन गया है। परंतु इसका उपयोग भी सोच-समझ कर जानकार व्यक्ति की निगरानी में ही होना चाहिए ! यह नहीं कि कोई भी, कहीं भी, कैसे भी इसका उपयोग कर लिया जाए ! वैज्ञानिकों के अनुसार ऑक्सीजन, जिसके बिना जिंदा नहीं रहा जा सकता, उसकी अधिकता प्राणियों के लिए खतरनाक भी हो सकती है। सौ साल के भी पहले वैज्ञानिक पाल बर्ट ने यह चेतावनी दी थी कि शुद्ध ऑक्सीजन में सांस लेना जानलेवा हो सकता है। ज्यादा खोज करने पर वैज्ञानिकों ने पाया कि हम ज्यादा से ज्यादा 24 घंटे तक शुद्ध ऑक्सीजन सहन कर सकते हैं, उसके बाद निमोनिया हो जाता है। यह भी पाया गया है कि मनुष्य सिर्फ़ दो घंटों तक ही दो-तीन वायुमंडलीय दवाब सहन कर सकता है। इसके बाद ऑक्सीजन की अधिकता से उसका मानसिक संतुलन बिगडने लगता है। उसकी यादाश्त लुप्त हो जाती है। अगर यह दवाब और बढ़ जाए तो दौरे पड़ने शुरु हो जाते हैं। अंत में मृत्यु भी हो सकती है।

शुद्ध ऑक्सीजन ऐसे प्राणियों के लिए भी हानिकारक होती है जो प्राकृतिक तौर पर कम ऑक्सीजन वाली परिस्थितियों में रहते हैं। इस बात का उपयोग हमारी आंतों में रहनेवाले बहुत से खतरनाक कृमियों को खत्म करने में किया जाता है। 

तो निष्कर्ष यही निकलता है कि हमें इस जटिल समस्या का, प्रभु पर अटूट भरोसा रखते हुए, बहुत सोच-समझ कर, बिना आतंकित हुए, धैर्य रखते हुए सामना करना है ! समय सदा चलायमान रहा है, यह दौर भी जरूर बीतेगा !  

बुधवार, 14 अप्रैल 2021

99.9% का खेल, कीटनाशकों का

कोरोना के पहले साबुन समेत ऐसे उत्पादों का दावा 99 प्रतिशत कीटाणुओं का सफाया करना होता था ! पर अब यह बढ़ कर 99.9 तक पहुंच गया है। इनके दावों पर विश्वास कर भी  लिया जाए तो उस बाकि बची 0.1 आबादी का क्या ! सभी जानते हैं कि बैक्टेरिया की आबादी करोड़ों-अरबों में होती है ! यदि मोटे तौर पर किसी सतह पर उनकी सिर्फ एक लाख की जमावट ही मान लें, जोकि बहुत ही कम है, तो भी इनके दावे के अनुसार वहां 100 वायरस बचे रह जाएंगे ! उनका क्या ? वे तो कुछ ही समय के बाद कहर बरपा देंगे...............!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कोरोना के प्रादुर्भाव से पूरी दुनिया  में दहशत  फ़ैल गई थी ! देश-दुनिया-समाज-इंसान  तक़रीबन हर कोई बेहाल हो इसके शिकंजे में किसी ना किसी तरह फंस मुसीबतजदा हुआ ! पहले तो न इसका कोई इलाज था ना हीं बचने का कोई सटीक उपाय ! लोगों का डर चरम पर था ! इसी भय और दवा की अनुपलब्धता ने कुछ लोगों और उद्यमों के भाग्य खोल दिए। यह महामारी उनके लिए व्यावसायिक उपलब्धि का स्वर्णिम मौका साबित हुई ! अस्पतालों, स्वास्थय केंद्रों की बात ना भी करें, तो भी सैकड़ों तरह के सेनेटाइजर, बैक्टेरिया रोधक, वायरस किलर, कीटाणुनाशक, हैंडवाश, हैण्ड रब, साबुन, डिटर्जेंट, ऐन्टीसेप्टिक तथा विभिन्न तरह के स्प्रे, लोशनों ने बाजार को पाट दिया !  बाढ़ सी आ गई ऐसे उत्पादों की। भयभीत और आशंकित लोग, बिना इनके दावों, उपयोगिता और प्रामाणिकता को जांचे, टूट पड़े इनको लेने के लिए ! 

आजकल कोरोना को दूर करने का दावा करने वाले उत्पाद खुद में पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। वैसे भी इनका दावा 99.9 का होता है। सारा खेल .1 प्रतिशत का है ! जिन्हें ये नहीं मार पाने की घोषणा सी कर चुके होते हैं, उसी की आड़ में ये लोग कानून के शिकंजे से खुद को साफ़ बचा कर ले जाते हैं 

इधर लाख हिदायतों और वैक्सीन के बावजूद, कोरोना के पलटवार ने तो जैसे उनके लिए कुबेर का खजाना ही खोल कर रख दिया। कोरोना के पहले साबुन समेत ऐसे उत्पादों का दावा 99 प्रतिशत कीटाणुओं का सफाया करना होता था ! पर अब यह बढ़ कर 99.9 तक पहुंच गया है। इनके दावों पर विश्वास कर भी  लिया जाए तो उस बाकि बची 0.1 आबादी का क्या ! सभी जानते हैं कि बैक्टेरिया की आबादी करोड़ों-अरबों में होती है ! यदि मोटे तौर पर किसी सतह पर उनकी सिर्फ एक लाख की जमावट ही मान लें, जोकि बहुत ही कम है, तो भी इनके दावे के अनुसार वहां 100 वायरस बचे रह जाएंगे ! उनका क्या ? वे तो कुछ ही समय के बाद कहर बरपा देंगे ! पर विज्ञापनों का मायाजाल ऐसा है कि इस सच्चाई पर कोई ध्यान ही नहीं देता !


यह सिद्ध हो चुका है कि बैक्टेरिया या कीटाणुओं की संख्या में बहुत जल्द वृद्धि होती है और हम यह भी देख चुके हैं कि धीरे-धीरे कीटनाशक इन पर निष्प्रभावी होते चले जाते हैं। मच्छर इसका सबसे बढ़िया उदाहरण हैं। तो अब जो वो दशमलव एक प्रतिशत बैक्टीरिया बच जाते हैं, वे कुछ समय बाद फिर सक्रिय हो जाएंगे ! धीरे-धीरे इनकी संख्या में बढ़ोतरी भी होती जाएगी जो फिर पूरे इलाके पर काबिज हो जाएगी ! तिस पर अब यह जो नई प्रजाति सामने आएगी उस पर उन कीटनाशकों का भी कोई असर नहीं होगा ! ऐसे में उनका हमला इंसानों के लिए जानलेवा बन जाएगा ! 

आजकल कोरोना या कोविड 19 को दूर करने का दावा करने वाले उत्पाद खुद में पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। कीटाणुओं को हटाने का इनका दावा 99.9% का होता है। इसमें सारा खेल .1 प्रतिशत का है ! जिन्हें ये नहीं मार पाने की घोषणा सी कर चुके होते हैं। उसी की आड़ में ये लोग कानून के शिकंजे से खुद को साफ़ बचा कर ले जाते हैं ! आज बाजारवाद सभी जगह पूरी तरह से हावी है और अघोषित रूप से उसमें सब कुछ जायज मान लिया गया है ! ऐसे में तो आम इंसान को बिना घबड़ाए, आतंकित या भयभीत हुए, अपने विवेक का उपयोग करते हुए, सोच-समझ कर ही किसी उत्पाद को खरीदना और उपयोग में लाना चाहिए ! पर होता उलटा ही है बड़ी-बड़ी कंपनियों के विज्ञापनों के झांसे में आ कर, उन्हें सच मान, उनके उत्पाद खरीद कर हम एक मनोवैज्ञानिक सुरक्षात्मक कवच सा पा जाते हैं। इससे हमारा दिमाग सकारात्मकता के संदेश देने लगता है। 

हमारे देश में तो वर्षों से घरेलू चीजों का ही उपयोग साफ़-सफाई के लिए होता रहा है ! जिसे अब बाजार और आधुनिकता की छद्म चकाचौंध में नकार सा  दिया गया है ! नहीं तो नमक और नीम जैसे सर्वसुलभ वस्तुओं में भी कीटाणुनाश की उतनी ही शक्ति है जितनी इन अति मंहगे उत्पादों में ! हो सकता है उनसे ज्यादा ही हो और साथ ही इनकी खासियत यह भी है कि ये पूरी तरह निरापद होते हैं । पर्यावरण को भी इनसे कोई नुक्सान नहीं पहुंचता। पर सबसे बड़ी बात विश्वास की है कहा जा सकता है कि जो सोचे-समझे षडयंत्रों द्वारा हटवा दिया गया है। पर अब जो है सो है ! इसलिए इन अनजानी, तीव्र असर वाली रासायनिक वस्तुओं की ख़रीदारी व उपयोग बहुत कम मात्रा में और सोच-समझ कर ही करना चाहिए। 

सोमवार, 12 अप्रैल 2021

लॉयड के एसी के गैरजिम्मेदाराना विज्ञापन में दीपिका-रणवीर

पत्नी रूपी दीपिका अपने ''बेबी पति'' को नया एसी दिखा उसके गुणों का बखान करती है ! बैक्टेरिया वगैरह की बात करते हुए उसके हाथ सेनिटाइज करती है और फिर उसका वह बाहर से आया ''बेबी पति'' अपने जूतों समेत सोफे पर पसर जाता है ! गोयाकि कीटाणु या बैक्टेरिया सिर्फ हाथों में ही रहना पसंद करते हों ! काश दीपिका जी का ध्यान नए एसी के साथ ही बाहर से आए अपने बेबी के जूतों  की तरफ भी जा पाता..............!

https://youtu.be/pi4liCB1O5s

#हिन्दी_ब्लागिंग       

आज जब कोरोना फिर बेकाबू हो कर महामारी का रूप ले रहा है तो ऐसे में सिर्फ सरकार का ही नहीं हर एक देशवासी का फर्ज बनता है कि उस के निरोध के लिए यथासंभव प्रयास किए जाएं। पर ऐसा होता दिखता नहीं ! कुछ लोग, संस्थाएं या उद्योग इसे अभी भी गंभीरता से नहीं ले रहे ! उनके व्यवहार में लापरवाही साफ़ झलकती है ! आज जब हर संभव तरीके और मीडिया के द्वारा लोगों को जागरूक किया जा रहा है, वहीं कुछ ऐसे विज्ञापन भी सामने आ रहे हैं, जिन्हें देख कर लगता है कि या तो वे इस जागरूकता अभियान को हलके में ले रहे हैं या फिर इसका मजाक सा उड़ा सिर्फ रस्म अदायगी कर रहे हैं ! 

अभी FMEG बनाने वाली एक कंपनी #लॉयड के #एयर_कंडीशनर का विज्ञापन आया है। जिसमें पति रूपी रणवीर घर में घुसते हुए कहता है, ''देखो-देखो मैं आ गया '' ! पत्नी रूपी दीपिका अपने इस ''बेबी पति'' को नया एसी दिखा उसके गुणों का बखान करती है ! बैक्टेरिया वगैरह की बात करते हुए उसके हाथ सेनिटाइज करती है और फिर उसका वह बाहर से आया ''बेबी पति'' अपने जूतों समेत सोफे पर पसर जाता है ! गोयाकि कीटाणु या बैक्टेरिया सिर्फ हाथों में ही रहना पसंद करते हों, कपड़ों-जूतों में नहीं ! काश दीपिका जी का ध्यान नए एसी के साथ ही बाहर से आए अपने बेबी के जूतों  की तरफ भी जा पाता !

यह तो सिर्फ एक बानगी है समाज के एक ऐसे तबके की जिससे जिम्मेदारी की उम्मीद की जाती है। यहां कंपनी ज़रा सी एहतियात बरतअच्छा संदेश दे सकती थी। वहीं ''फिल्मवाले पैसे के लिए कुछ भी कर सकते हैं'' वाली छवि को बदल सकते थे दीपिका और रणवीर जरा सी समझदारी दिखा ! संदेश भी अच्छा जाता, लोगों में जागरूकता बढ़ती ! क्योंकि बहुत से घरों में, बाहर या स्कूल से आए, ऐसा करते बच्चों पर ध्यान कम ही दिया जाता है ! बच्चे ही क्यों बहुत से वयस्कों का भी यही हाल है, जूते लेकर पूरे घर में मंडराते रहते हैं ! हो सकता है ऐसों को अपनी गलती का एहसास हो जाता, खासकर इन कठिन दिनों के दौरान ! इसके साथ ही इन दोनों की छवि और लोकप्रियता में भी इजाफा ही होता ! अब क्या कहा जाए ! जो है वह तो हइए है ! सभी को खुद ही अपनी हिफाजत करनी है और करनी पड़ेगी ही !

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

तीन पैरों वाला फ़ुटबाल खिलाडी

वह अपने तीनों पैरों से दौडने, कूदने, सायकिल चलाने, स्केटिंग करने के साथ-साथ बाल पर बेहतरीन ‘किक’ लगाने में पारांगत हो गया था। ऐसे ही उसके एक शो को देख एक नामी फुटबाल क्लब से उसे खेलने की पेशकश की गयी। फ्रैंक ने मौके को हाथ से नहीं जाने दिया। देखते-देखते वह सबसे लोकप्रिय खिलाडी बन गया। खेल के दौरान जब वह अपने दोनों पैरों को स्थिर कर तीसरे पैर से किक लगा, बाल को खिलाडियों के सर के उपर से दूर पहुंचा देता तो दर्शक विस्मित हो खुशी से तालियां और सीटियां बजाने लगते।  उसे अपने तीसरे पैर से किसी भी तरह की अड़चन नहीं थी। सिर्फ कपडे सिलवाते समय विशेष नाप की जरूरत पडती थी और रही जूतों की बात तो उसने उसका भी बेहतरीन उपाय खोज लिया था , वह दो जोडी जुते खरीदता और चौथे फालतू जूते को किसी ऐसे इंसान को भेंट कर देता जिसका एक ही पैर हो................!!


#हिन्दी_ब्लागिंग 

आज जब किसी इंसान की हाथ या पैर में एक छठी उंगली भी हो भले ही वह अंग क्रियाशील हो या ना हो उसे प्रकृति का अजूबा ही माना जाता है। कहीं-कहीं तो ऐसे अंग वाला भला आदमी हास्य का पात्र भी बन जाता है ! समाज में इसे एक तरह की चीज को विकलांगता के रूप में ही देखा जाता है। सालों पहले हमारे एक पहचान के  युवक को तो इसी ''कमी'' की वजह से रेलवे ने नौकरी भी दे दी थी !  हमारे फिल्म उद्योग में कई सितारे अपनी इन्हीं वजहों को सालों छिपाते रहे हैं। ऐसे में एकआदमी ! तीन पैरों वाला ! उस पर फ़ुटबाल का खिलाड़ी ! कपोल-कल्पना लगती है ! किसी किस्से-कहानी की काल्पनिक उड़ान ! सुन कर सहज ही विश्वास होना कठिन है !  



18 मई 1889, इटली में सिसली के पास, रोसोलिनि कस्बे के एक अस्पताल मे एक बच्चे का जन्म होता है। जिसको देखते ही नर्स जोरों से  लेते ही नर्स जोरों से चीख पडी ! मां घबडा कर रोने लगी ! नर्स की चीख सुन पूरे अस्पताल मे हडकंप मच गया। बात ही कुछ ऐसी थी ! उस नवजात  सवस्थ शिशु के पूर्ण विकसित तीन पैर थे ! उस समय के अंधविश्वासों के चलते उसे अपशगुनी मान लिया गया ! पर परिवार की ममता उसे किसी तरह की हानि पहुंचाने को तैयार नहीं थी। बच्चे के मां-बाप ने डाक्टरों से प्रार्थना की कि वे किसी भी तरह ऑपरेशन कर इस तीसरी टांग से बच्चे को मुक्ति दिलवा दें। पर डाक्टर विवश थे ! उन्हें लग रहा था कि ऑपरेशन से या तो बच्चे की मौत हो जाएगी या फिर वह जीवन भर के लिए लकवाग्रस्त हो जाएगा। बच्चे की इस अस्वाभाविक बात को छिपाने की हर मुमकिन कोशिश के बावजूद यह खबर सारे शहर मे फैल गई ! लोग उसे देखने के लिए उमड़ पड़े। 

समय कहां रुकता है, वह बीतता गया। उसके साथ ही फ्रैंक लेंटिनी पूरी तरह स्वस्थ रह कर बडा होता गया। बड़े आश्चर्य की बात थी कि उसे अपने इस तीसरे पैर से कभी कोई दिक्कत नहीं हुई । बस उसे इसका कुछ उपयोग समझ में नहीं आता था। वह उस पैर से शरीर को सहारा देने का काम लिया करता था। समय आने पर उसके पिता ने उसे एक स्कूल में दाखिल करवा दिया। पर वहां उसके सहपाठियों द्वारा उसका उपहास उडाने और उससे दूरी बनाए रखने के कारण फ्रैंक उदास रहने लगा। पिता ने कारण जान-समझ उसे वहां से हटवा कर एक विकलांगों के स्कूल में भर्ती करवा दिया। वहां के अन्य विकलांग बच्चों को देख उसे महसूस हुआ कि वह तो दूसरे बच्चों की तुलना में बहुत भाग्यशाली है। उसे लगने लगा कि भगवान का दिया यह जीवन बहुत खूबसूरत है। रही बात शारीरिक विकृति की तो उसको भी अपनी विशेषता बनाया जा सकता है। उसे तो अपने तीसरे पैर से किसी तरह की अड़चन ही नहीं है। सिर्फ कपडे सिलवाते समय विशेष नाप की जरूरत पडती है और रही जूतों की बात तो उसने उसका भी बेहतरीन उपाय खोज लिया। वह दो जोडी जुते खरीदता और चौथे फालतू जूते को किसी ऐसे इंसान को भेंट कर देता जिसका एक ही पैर हो।

सकारात्मक सोच से फ्रैंक का अपनी जिंदगी के प्रति दृष्टिकोण बदल गया। उसने अपने जीवन को बेहतर बनाने, उसमें कुछ करने की ठान ली। इसी सोच के कारण वह हर परीक्षा को विशेष योग्यता से पास करता गया। इतना ही नहीं उसने चार-चार भाषाओं का ज्ञान भी अर्जित किया जो उसके भविष्य में बडा काम आया। समय के साथ उसकी पढाई पूरी होते-होते उसके पास काम के प्रस्ताव भी आने शुरु हो गये थे। पर वह ज्यादातर सर्कस के क्षेत्र से थे । काफी सोच-विचार कर उसने एक नामी सर्कस में काम करना शुरु कर दिया। दैवयोग से वहां उसे काफी नाम और दाम तो मिला ही साथ ही साथ उसके मन से रही-सही हीन भावना भी खत्म हो गयी। वहां रहते हुए उसने अपने तीसरे पैर का भरपूर उपयोग करना भी सीख लिया। अब वह अपने तीनों पैरों से दौडने, कूदने, सायकिल चलाने, स्केटिंग करने के साथ-साथ बाल पर बेहतरीन ‘किक’ लगाने में पारांगत हो गया था। ऐसे ही उसके एक शो को देख एक नामी फुटबाल क्लब से उसे खेलने की पेशकश की गयी। फ्रैंक ने मौके को हाथ से नहीं जाने दिया। देखते-देखते वह सबसे लोकप्रिय खिलाडी बन गया। लोग बडे से बडे खिलाडी को नजरंदाज कर उसी पर निगाहें गडाए रहते। खेल के दौरान जब वह अपने दोनों पैरों को स्थिर कर तीसरे पैर से किक लगा बाल को खिलाडियों के सर के उपर से दूर पहुंचा देता तो दर्शक विस्मित हो खुशी से तालियां और सीटियां बजाने लगते।

फिर एक समय आया जब पैसा और शोहरत पाने के बाद फ्रैंक की इच्छा घर बसाने की हुई। उनकी जिजीविषा, जिंदगी के प्रति सकारात्मक दृष्टि, हाजिर जवाबी और सेंस ऑफ ह्यूमर से एक युवती थेरेसा मुरे काफी प्रभावित हुई। दोनों ने शादी कर ली और दोनों से चार स्वस्थ बच्चे पैदा हुए। फ्रैंक लेंटिनी का 40 साल से ज्यादा का करियर रहा।उन्होंने करीब-करीब हर बड़े सर्कस और साइड-शो के साथ काम किया। साथियों के बीच उनको काफी सम्मान मिलता था और साथी उनको 'द किंग' कहकर बुलाते थे। अपनी विकलांगता को अपनी शक्ति बनाने वाला, उत्कट जिजिविषा और प्रबल इच्छा शक्ति वाले उस इंसान का 22 सितंबर 1966 में 77 वर्ष की उम्र में निधन हो गया।

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से   

शनिवार, 3 अप्रैल 2021

आ बैल (कोरोना) हमें मार

कुछ लोगों को सही मायनों में जान की कीमत नहीं पता ! बिमारी की चपेट में आने पर पहले की बंदिशें नहीं सहीं ! नाहीं ऐसे  लोगों को अपनों को खोने के दर्द का एहसास है ! इन्हें सिर्फ अपनी मौज-मस्ती और तफरीह से मतलब है ! लेकिन यह सारा अनुभव तभी संभव है, जब तक इंसान जिंदा है, जिंदगी कायम है ! तमाम सावधानियों और दवा के भी पहले ऐसे लोगों पर लगाम कसना जरुरी है ! कहने में अच्छा नहीं लगता, शब्द भी कटु हैं, पर ऐसे लोग एक तरह से अपने परिवार के अलावा समाज और देश के भी दुश्मन कहे जा सकते हैं.......!!    

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कोरोना ! एक अभूतपूर्व तक़रीबन लाइलाज महामारी, जिससे पूरा विश्व सकते में आ गया, लाखों जाने गयीं, करोड़ों लोग चपेट में आ गए ! अनगिनत लोगों की जीविका नष्ट हो गई ! दसियों देशों की अर्थव्यवस्था भू-लुंठित हो कर रह गई ! उसीका प्रकोप फिर एक बार डराने लगा है ! ऐसा नहीं है कि इस पर काबू नहीं पाया जा सकता, पर हम कुछ लोगों की लापरवाहियां उसको उकसाने से बाज नहीं आ रहीं ! हम उसको हलके में ले अपने पर भारी पड़ने का हर मौका दे रहे हैं ! 

यह सर्वज्ञात है कि कुछ बीमारियों या दवाइयों का सेहत ठीक महसूस होने के बावजूद कोर्स पूरा करना पड़ता है ! बीच में उपचार छोड़ देने से दवा का तब तक का असर भी ख़त्म हो जाता है। वैसा ही कुछ इस कोरोना के साथ भी लागू होता है ! जानकारों के अनुसार दवा के अलावा पूरी सावधानियां तब तक बरतनी हैं जब तक कि इसका पूरा सफाया नहीं हो जाता और यहीं हम सब मात खा रहे हैं ! कुछ विवेकहीन, लापरवाह लोगों की गैरजिम्मेदाराना हरकतों के कारण पूरा देश फिर डर के साये में आ गया है। ऐसे लोग धड़ल्ले से अपनी मनमानी कर रहे हैं, जिसके कारण उन लोगों के घर में भी कोरोना का प्रकोप हो सकता है, जो सुरक्षित रहने की कोशिश में हर संभव उपाय करने में जुटे हुए हैं !

सरकार को देश के तमाम रिसोर्ट वगैरह को नोटिस जारी कर देना चाहिए कि सिर्फ जरुरी वजह के अलावा इस आपाद काल की स्थिति में, सिर्फ पर्यटन के लिए आए लोगों को ठहरने की अनुमति ही ना दें ! इसके अलावा तंत्र भी उनको जवाबदेही के लिए बुलाए 

कायनात ने कोरोना के माध्यम से हमें जो नसीहत देने की कोशिश की उसकी भयावहता से भी कुछ मनचले कोई सबक नहीं ले पा रहे ! कारण यह भी है कि सही मायनों में उन्हें जान की कीमत नहीं पता ! बिमारी की चपेट में आने पर पहले की बंदिशें नहीं सहीं ! नाहीं ऐसे  लोगों को अपनों को खोने के दर्द का एहसास है ! इन्हें सिर्फ अपनी मौज-मस्ती और तफरीह से मतलब है ! लेकिन यह सारा अनुभव तभी संभव है, जब तक इंसान जिंदा है, जिंदगी कायम है ! तमाम सावधानियों और दवा के भी पहले ऐसे लोगों पर लगाम कसना जरुरी है ! कहने में अच्छा नहीं लगता, शब्द भी कटु हैं, पर ऐसे लोग एक तरह से अपने परिवार के अलावा समाज और देश के भी दुश्मन कहे जा सकते हैं !   

यह भी सही है कि इंसान के ऐसे पचासों जरुरी काम होते हैं जिनके लिए घर से निकलना बहुत आवश्यक होता है, पर सिर्फ तफरीह के लिए खुद की और दूसरों की जान को आफत में डालना कहां की अक्लमंदी है ! पहले लॉक डाउन के समय भी बहुत से लोगों को घर से बाहर सड़कों और माहौल का ''जायजा'' लेते देखा गया था ! अब तो लापरवाही और भी बढ़ गई है ! ऐसा लगता है कि जैसे घूमने-फिरने, खरीदारी या पुण्यार्जन का मौका फिर कभी हाथ आएगा ही नहीं ! प्रकोप के दौरान आईं छुट्टियों को विवेकहीन लोग सैर-सपाटे के काम में लाने लग जाते हैं ! मेरे ख्याल से तो सरकार को देश के तमाम रिसोर्ट वगैरह को नोटिस जारी कर देना चाहिए कि सिर्फ जरुरी वजह के अलावा इस आपाद काल की स्थिति में, सिर्फ पर्यटन के लिए आए लोगों को ठहरने की अनुमति ही ना दें ! इसके अलावा तंत्र भी उनको जवाबदेही के लिए बुलाए ! क्योंकि हम ताड़ना की भाषा ही जल्दी समझते हैं। 

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