बुधवार, 14 अप्रैल 2021

99.9% का खेल, कीटनाशकों का

कोरोना के पहले साबुन समेत ऐसे उत्पादों का दावा 99 प्रतिशत कीटाणुओं का सफाया करना होता था ! पर अब यह बढ़ कर 99.9 तक पहुंच गया है। इनके दावों पर विश्वास कर भी  लिया जाए तो उस बाकि बची 0.1 आबादी का क्या ! सभी जानते हैं कि बैक्टेरिया की आबादी करोड़ों-अरबों में होती है ! यदि मोटे तौर पर किसी सतह पर उनकी सिर्फ एक लाख की जमावट ही मान लें, जोकि बहुत ही कम है, तो भी इनके दावे के अनुसार वहां 100 वायरस बचे रह जाएंगे ! उनका क्या ? वे तो कुछ ही समय के बाद कहर बरपा देंगे...............!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कोरोना के प्रादुर्भाव से पूरी दुनिया  में दहशत  फ़ैल गई थी ! देश-दुनिया-समाज-इंसान  तक़रीबन हर कोई बेहाल हो इसके शिकंजे में किसी ना किसी तरह फंस मुसीबतजदा हुआ ! पहले तो न इसका कोई इलाज था ना हीं बचने का कोई सटीक उपाय ! लोगों का डर चरम पर था ! इसी भय और दवा की अनुपलब्धता ने कुछ लोगों और उद्यमों के भाग्य खोल दिए। यह महामारी उनके लिए व्यावसायिक उपलब्धि का स्वर्णिम मौका साबित हुई ! अस्पतालों, स्वास्थय केंद्रों की बात ना भी करें, तो भी सैकड़ों तरह के सेनेटाइजर, बैक्टेरिया रोधक, वायरस किलर, कीटाणुनाशक, हैंडवाश, हैण्ड रब, साबुन, डिटर्जेंट, ऐन्टीसेप्टिक तथा विभिन्न तरह के स्प्रे, लोशनों ने बाजार को पाट दिया !  बाढ़ सी आ गई ऐसे उत्पादों की। भयभीत और आशंकित लोग, बिना इनके दावों, उपयोगिता और प्रामाणिकता को जांचे, टूट पड़े इनको लेने के लिए ! 

आजकल कोरोना को दूर करने का दावा करने वाले उत्पाद खुद में पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। वैसे भी इनका दावा 99.9 का होता है। सारा खेल .1 प्रतिशत का है ! जिन्हें ये नहीं मार पाने की घोषणा सी कर चुके होते हैं, उसी की आड़ में ये लोग कानून के शिकंजे से खुद को साफ़ बचा कर ले जाते हैं 

इधर लाख हिदायतों और वैक्सीन के बावजूद, कोरोना के पलटवार ने तो जैसे उनके लिए कुबेर का खजाना ही खोल कर रख दिया। कोरोना के पहले साबुन समेत ऐसे उत्पादों का दावा 99 प्रतिशत कीटाणुओं का सफाया करना होता था ! पर अब यह बढ़ कर 99.9 तक पहुंच गया है। इनके दावों पर विश्वास कर भी  लिया जाए तो उस बाकि बची 0.1 आबादी का क्या ! सभी जानते हैं कि बैक्टेरिया की आबादी करोड़ों-अरबों में होती है ! यदि मोटे तौर पर किसी सतह पर उनकी सिर्फ एक लाख की जमावट ही मान लें, जोकि बहुत ही कम है, तो भी इनके दावे के अनुसार वहां 100 वायरस बचे रह जाएंगे ! उनका क्या ? वे तो कुछ ही समय के बाद कहर बरपा देंगे ! पर विज्ञापनों का मायाजाल ऐसा है कि इस सच्चाई पर कोई ध्यान ही नहीं देता !


यह सिद्ध हो चुका है कि बैक्टेरिया या कीटाणुओं की संख्या में बहुत जल्द वृद्धि होती है और हम यह भी देख चुके हैं कि धीरे-धीरे कीटनाशक इन पर निष्प्रभावी होते चले जाते हैं। मच्छर इसका सबसे बढ़िया उदाहरण हैं। तो अब जो वो दशमलव एक प्रतिशत बैक्टीरिया बच जाते हैं, वे कुछ समय बाद फिर सक्रिय हो जाएंगे ! धीरे-धीरे इनकी संख्या में बढ़ोतरी भी होती जाएगी जो फिर पूरे इलाके पर काबिज हो जाएगी ! तिस पर अब यह जो नई प्रजाति सामने आएगी उस पर उन कीटनाशकों का भी कोई असर नहीं होगा ! ऐसे में उनका हमला इंसानों के लिए जानलेवा बन जाएगा ! 

आजकल कोरोना या कोविड 19 को दूर करने का दावा करने वाले उत्पाद खुद में पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। कीटाणुओं को हटाने का इनका दावा 99.9% का होता है। इसमें सारा खेल .1 प्रतिशत का है ! जिन्हें ये नहीं मार पाने की घोषणा सी कर चुके होते हैं। उसी की आड़ में ये लोग कानून के शिकंजे से खुद को साफ़ बचा कर ले जाते हैं ! आज बाजारवाद सभी जगह पूरी तरह से हावी है और अघोषित रूप से उसमें सब कुछ जायज मान लिया गया है ! ऐसे में तो आम इंसान को बिना घबड़ाए, आतंकित या भयभीत हुए, अपने विवेक का उपयोग करते हुए, सोच-समझ कर ही किसी उत्पाद को खरीदना और उपयोग में लाना चाहिए ! पर होता उलटा ही है बड़ी-बड़ी कंपनियों के विज्ञापनों के झांसे में आ कर, उन्हें सच मान, उनके उत्पाद खरीद कर हम एक मनोवैज्ञानिक सुरक्षात्मक कवच सा पा जाते हैं। इससे हमारा दिमाग सकारात्मकता के संदेश देने लगता है। 

हमारे देश में तो वर्षों से घरेलू चीजों का ही उपयोग साफ़-सफाई के लिए होता रहा है ! जिसे अब बाजार और आधुनिकता की छद्म चकाचौंध में नकार सा  दिया गया है ! नहीं तो नमक और नीम जैसे सर्वसुलभ वस्तुओं में भी कीटाणुनाश की उतनी ही शक्ति है जितनी इन अति मंहगे उत्पादों में ! हो सकता है उनसे ज्यादा ही हो और साथ ही इनकी खासियत यह भी है कि ये पूरी तरह निरापद होते हैं । पर्यावरण को भी इनसे कोई नुक्सान नहीं पहुंचता। पर सबसे बड़ी बात विश्वास की है कहा जा सकता है कि जो सोचे-समझे षडयंत्रों द्वारा हटवा दिया गया है। पर अब जो है सो है ! इसलिए इन अनजानी, तीव्र असर वाली रासायनिक वस्तुओं की ख़रीदारी व उपयोग बहुत कम मात्रा में और सोच-समझ कर ही करना चाहिए। 

6 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

सामयिक और उपयोगी आलेख।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

बहुत-बहुत आभार, शास्त्री जी

Kadam Sharma ने कहा…

Samajhdar log bhi jhanse me Aa jaate hain

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

कदम जी
यही तो विडंबना है

Sudha Devrani ने कहा…

सही कहा आपने घरेलू उत्पादों को छोड़कर हम इन मँहगे कैमिकल युक्त सैनिटाइजर खरीद रहे हैं जबकि इनसे कई लोगों को त्वचा संबंधी बीमारियाँ भी हो रही हैं ....
समसामयिक बहुत सुन्दर सार्थक आलेख।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

सुधा जी
वही तो! बिना सोचे समझे, जाने सुने अंधी दौड में शामिल हैं

विशिष्ट पोस्ट

एक था बुधिया, द मैराथन रनर

अब वह मैराथन दौडना तो दूर, अपने साथियों के बराबर भी नहीं दौड पाता। उसने नेशनल लेवल तो क्या कोई राज्य स्तरीय अथवा जिला स्तरीय प्रतियोगिता भी ...