सोमवार, 28 अक्टूबर 2024

कक्ख दी वी लोड़ पै जांदी ऐ यानी पड़ सकती है तिनके की भी जरूरत कभी

अल्लादीन के जिन्न को भले ही वापस बोतल में भेजना  बहुत दुष्कर हो, पर बिखरे हुए घरेलू सामान को समेटना उससे भी विकट  समस्या होती है ! ऊपर से सामान  की मालकिन को अपनी हर चीज बेहद जरूरी लगती है, भले ही वर्षों से उसका उपयोग न हुआ हो ! पर उनके अनुसार क्या पता कब किस चीज की जरूरत पड़ जाए ! फिर बाजार दौड़ो ! इसके साथ ही पंजाबी का वह मुहावरा सुनाने से भी नहीं चूकतीं कि "कक्ख दी बी लोड़ पै जांदी ऐ ", अब उनके इस "कक्ख" के चक्कर में मैं तो चकरघिन्नी बन कर रह जाता हूँ...........!           

 #हिन्दी_ब्लागिंग

अभी हफ्ता भर पहले पड़ोस में एक गर्ग दंपति रहने आए हैं ! पता चला कि डिब्रूगढ़ से सेवा निवृत्ति के पश्चात यहां आना हुआ है ! किसी नई जगह सामान को टिकाना-जमाना बहुत ही श्रमसाध्य कार्य होता है ! अभी शायद उन्हें घरेलू सहायक भी नहीं मिला था ! दोनों पति-पत्नी के व्यवस्था में जुटे रहने के बावजूद, आते-जाते दिखता रहता था कि इतने दिनों के बाद भी उनका कुछ सामान अभी भी आंगन में वैसे ही बिना खुले, पैक पड़ा हुआ है ! एक-दो बार पड़ोसी धर्म के नाते अपने सहयोग की पेशकश की थी पर उन्होंने आभार मानते हुए, बड़ी शिष्टता से मना कर दिया था ! वैसे भी बिलकुल अनजान लोगों के निजी कामों में दखल देने और लेने में संकोच भी होता ही है ! 
गर्ग परिवार की अवस्था को देख मुझे अपने वो दिन याद आ गए जब वर्षों बाद हमारा दिल्ली लौटना हुआ था ! ढिबरी टाइट हो गई थी, सामान को ठिकाने लगाते-लगाते। दोस्त-मित्रों का जब फोन आता, मेरी खोज-खबर-जानकारियों के लिए और जब उन्हें थकान से हुई अपनी पस्त हालत के बारे में बताता तो वे हंसने लगते कि अरे आप कहां थकते हो ! तो उनसे कहना पड़ता कि भाई शरीर की एक सीमा होती है । अब पहले जैसा तो रहा नहीं ! पर एक बात तो मन को तब गुदगुदा ही जाती थी, जब कोई कहता था कि सर आपको देख कर लगता नहीं कि आप साठ पार कर चुके हो, तो यह बताने पर कि भइए साठ नहीं पैंसठ गुजरे भी एक अरसा हो गया है तो अगले का चेहरा देखने पर मजा तो आता ही था ! ये अलग बात है कि इन बातों को सुनने के चस्के को बरकरार रखने के लिए रोज तकरीबन घंटा भर पसीना बहाना पड़ता था, जो आज भी जारी है ! 

चलिए दोस्त-मित्र तो बाहर के हैं, दूर हैं, पर अपने बच्चे भी अभी तक अपने पापा को बाहुबली ही समझते हैं। कुछ भी हो, पापा हैं ना ! पर अपनी हद मुझे  तो मालुम है ! सो उन दिनों बच्चों के सहयोग के बावजूद कैसे धीरे-धीरे आराम से काम निपटाया था वह भी याद है ! क्योंकि बड़े शहरों में तुरंत कोई घरेलू सहायक तो मिल नहीं जाता और मिल भी जाता है तो दस तरह की सावधानियां बरतनी पड़ती हैं ! सो अपने हाथ ही जगन्नाथ बनाने पड़े थे ! 

देखा जाए तो घर के अंदर सिमटे, व्यवस्थित असबाब के आकार-प्रकार-आयतन का अंदाज नहीं लगता पर जब वह बाहर आकर अंगड़ाइयां लेना शुरू करता है, तो अच्छी भली जगह भी कम पड़ती दिखती है। अल्लादीन के जिन्न को भले ही वापस बोतल में भेजना बहुत दुष्कर हो, पर बिखरे हुए घरेलू सामान को समेटना उससे भी विकट समस्या होती है ! वैसे भी चालीस साल की गृहस्थी में जरूरी के साथ गैरजरूरी वस्तुओं का जुटते चले जाना कोई बड़ी बात नहीं है। पर उठा-पटक के मौके पर लगता है कि जिंदगी में मजाक-मजाक में ही सही, कुछ ज्यादा ही मोह-माया इकठ्ठी कर ली ! ऊपर से सामान की मालकिन को हर चीज बेहद जरूरी लगती है, भले ही सालों से उसका उपयोग न हो रहा हो ! पर उनके अनुसार क्या पता कब किस चीज की जरूरत पड जाए ! फिर पंजाबी का वह मुहावरा सुनाने से भी नहीं चूकतीं कि "कक्ख दी बी लोड पै जांदी ए".  अब उनके इस "कक्ख" के चक्कर में मैं तो चकरघिन्नी बन कर रह जाता हूँ। 

पर सर पर पड़ी को निपटाना भी पड़ता है ! वैसे उन दिनों मैं अकेला ही नहीं था, श्रीमती जी ने भी अपनी हद से ज्यादा ही साथ दिया था ! थकान से दोनों ही लस्त-पस्त हुए थे ! वही हालत आज मैं गर्ग परिवार की देख रहा हूँ ! यह भी जिंदगी के नाटक का एक दृश्य, एक अंक ही तो है !

शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2024

दो उँगलियों द्वारा बना V चिन्ह, कहां से आया यह

  • ये अंग्रेज-वंग्रेज या कहिए पूरा पश्चिम ही हमारे सामने किसी बात पर भी कहां टिकते हैं ! इस चिन्ह की ईजाद तो हमने पहली शताब्दी ईसा पूर्व ही कर दी थी ! जब इस अंग्रेजी भाषा का उदय भी नहीं हुआ था ! याद कीजिए कालिदास और विद्योत्तमा का मौन शास्त्रार्थ ! जब जगत में पहली बार कालिदास जी की इन दो उंगलियों की मुद्रा ने विजय ही नहीं दो प्रतिद्वंदियों का आपस में विवाह तक करवा दिया था ! पर हमने कभी इस बात का प्रचार नहीं किया ! खुश होने दिया चर्चिल को...................!    

  • #हिन्दी_ब्लागिंग 
  • आजकल एक चलन सा ही बन गया है, जिसे देखो, कोई भी मौका हो, अपने हाथ की, तर्जनी और मध्यमा दो उंगलियां उठाए, पोज़ बना फोटो खिंचवाने में लगा हुआ है ! फिर चाहे मौका जीत की खुशी का हो, चाहे वह कहीं आ-जा रहा हो, चाहे किसी शादी-ब्याह की सामूहिक फोटो हो, चाहे कोई व्यापारिक, शैक्षणिक या राजनैतिक समारोह हो या फिर कैमरे से सेल्फ़ी ही क्यों न ली जा रही हो, बिना इस चिन्ह का अर्थ समझे दो उंगलियां उठाए लोग मिल जाएंगे कहीं भी ! इधर कुछ ही वर्षों में इस चिन्ह का हर जगह दिखना-दिखाना आम होता चला गया है। 

  • हमारे यहां तो हाथ की उंगलियों से योग की विभिन्न मुद्राएं प्राचीन काल से चलन में हैं ! पर यह अंग्रेजी वर्णमाला के V अक्षर को victory यानी जीत से जोड़ने वाली मुद्रा कहां से आई ? कहते हैं कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल वह पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने 1943 में इस V चिन्ह का प्रयोग व्यापक रूप से तब किया गया था जब मित्र राष्ट्रों ने द्वितीय विश्व युद्ध में जीत हासिल की थी। इसे अक्सर "विजय" के संकेत के रूप में समझा और लिया जाता है। 

  • चर्चिल 
  • पर ऐसा भी माना जाता है कि 1943 से भी बहुत पहले इस तरह के V साइन का इस्तेमाल 1415 ई. में एगिनकोर्ट की लड़ाई में अंग्रेजी धनुषधारियों द्वारा, पराजित फ्रांसीसी सेना का मजाक उड़ाने के लिए किया गया था। तीर-धनुष के द्वारा दुश्मन पर घातक प्रहार करने के लिए अंग्रेज धनुषधारी इन्हीं दो उंगलियों को काम में लाते थे। उपहास स्वरूप इन्हीं दो उंगलियों को फ्रांसीसी सेना को दिखा, यह जताते थे कि तुम्हें हराने के लिए तो बस इन दो उंगलियों की ही जरूरत है।   

  • सकारात्मक मुद्रा 

    नकारात्मक मुद्रा 
  • वैसे V चिन्ह का सकारात्मक अर्थ इस बात पर निर्भर करता है कि हाथ किस तरह से रखा गया है यानी उसकी स्थिति क्या है। यदि हाथ की हथेली सामने की तरफ हो तब तो वह सकारात्मक संदेश देता है। पर यदि हथेली सामने वाले के विपरीत हो यानी अंदर की तरफ हो तो इसे कई देशों में यथा ऑस्ट्रेलिया, आयरलैंड, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका, यूनाइटेड किंगडम इत्यादि में अपमानजनक इशारा माना जाता है। इसलिए किसी भी चीज को अपनाने के पहले उसकी पूरी जानकारी होनी आवश्यक होती है। 

  • विद्योत्तमा तथा कालिदास का शास्त्रार्थ 
  • चलते-चलते एक बात यहां कहना जरुरी है कि ये अंग्रेज-वंग्रेज या कहिए पूरा पश्चिम ही हमारे सामने किसी बात पर भी कहां टिकते हैं ! इस चिन्ह की ईजाद तो हमने पहली शताब्दी ईसा पूर्व ही कर दी थी ! जब इस अंग्रेजी भाषा का उदय भी नहीं हुआ था ! याद कीजिए कालिदास और विद्योत्तमा का मौन शास्त्रार्थ ! जब जगत में पहली बार कालिदास जी की इन दो उंगलियों की मुद्रा ने विजय ही नहीं दो प्रतिद्वंदियों का आपस में विवाह तक करवा दिया था ! पर हमने कभी इस बात का प्रचार नहीं किया ! खुश होने दिया चर्चिल को.......!
  • @संदर्भ तथा सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 🙏 

मंगलवार, 15 अक्टूबर 2024

उल्टा पानी, जहां पानी ढलान से ऊंचाई की ओर बहता है

दुनिया भर में हर जगह पानी अपनी फितरत के अनुसार ऊपर से नीचे की ओर गिरता या बहता है। पर अपने देश के छत्तीसगढ़ राज्य के एक मुख्यालय अंबिकापुर के एक जिले सरगुजा के एक कस्बे मैनपाट के पास जंगलों में स्थित एक छोटे से गांव बिसरपानी के नजदीक बहने वाली एक छोटी सी जलधारा में बहता हुआ पानी, सारी कायनात और विज्ञान के सभी नियम-कानून-जानकारियों को धत्ता बता, गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत के विपरीत, नीचे से ऊपर की ओर चलता है यानी ढलान से ऊंचाई की ओर बहता है...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

प्रकृति सदा अपने बंधे-बंधाए नियमों के अनुसार ही चलती है। उसके सिद्धांतों में कभी फेर-बदल नहीं होता। इसी लिए लाखों-करोड़ों साल से यह विश्व टिका हुआ है। पर कभी-कभी इसी धरा पर कुछ ऐसे अजूबों से भी हमारा सामना हो जाता है, जिन्हें देख अपने अज्ञानवश हमें लगता है कि वे ना कायनात से मेल खाते हैं ना हीं विज्ञान सम्मत हैं ! ऐसा ही एक अजूबा है, छत्तीसगढ़ के मैनपाट इलाके में स्थित एक जलधारा, जिसका पानी प्रकृति और विज्ञान की मान्यताओं और अपने स्वभाव के विपरीत नीचे से ऊपर की ओर बहता है यानी ढलान से ऊंचाई की तरफ चलता है ! इसी अनोखे और अचंभित कर देने वाले चमत्कार के कारण उस जगह का नाम उल्टा पानी पड़ गया है !    

  

उल्टा पानी, जलधारा 

दुनिया भर में हर जगह पानी अपनी फितरत के अनुसार ऊपर से नीचे की ओर गिरता या बहता है। पर अपने देश के छत्तीसगढ़ राज्य के एक मुख्यालय अंबिकापुर के एक जिले सरगुजा के एक कस्बे मैनपाट के पास जंगलों में स्थित एक छोटे से गांव बिसरपानी के नजदीक बहने वाली एक छोटी सी जलधारा में बहता हुआ पानी सारी कायनात और विज्ञान के सभी नियम-कानून-जानकारियों को धत्ता बता, गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत के विपरीत, नीचे से ऊपर की ओर चलता है यानी ढलान से ऊंचाई की ओर बहता है और इसका कारण अभी तक वैज्ञानिक भी समझ नहीं पाए हैं ! 

नीचे से ऊपर बहता पानी 

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से तकरीबन पौने चार सौ कि.मी और मुख्यालय अंबिकापुर से लगभग 55 कि.मी. की दूरी पर विंध्य पर्वतश्रेणी में समुद्र तट से 3781' की ऊंचाई पर स्थित है मैनपाट नाम का कस्बा। जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता तथा मौसम की वजह से छत्तीसगढ़ का शिमला कहलाता है। इसी से करीब 8-9 कि.मी. की दूरी पर बसे हुए एक छोटे से गांव बिसरपानी के पास ही है वह जलधारा, जो उल्टा पानी के नाम से प्रसिद्ध है। 


सरकारी प्रमाण 

वैज्ञानिक इसे कुछ और ना मान आँखों का धोखा (Eye Illusion) निरूपित करते हैं। उनके अनुसार सिर्फ ऐसा महसूस होता है कि पानी नीचे से ऊपर जा रहा है, जबकि ऐसा है नहीं ! पर वे यह नहीं बता पाते कि जब उसी पानी में कागज की नाव छोड़ी जाती है तो वह नीचे आने की बजाय ऊपर की ओर क्यों जाने लगती है ! वैसे भी यहां पानी में हाथ डालने पर उसके बहाव की दिशा का अंदाज भी लग जाता है ! 

टाइगर जलप्रपात 

उल्टा पानी की तरह ही यहां एक और अजूबा भी है, जहां न्यूट्रल गियर में डली गाड़ियां धीरे-धीरे ऊपर खिसकने लगती हैं ! जो यहां किसी चुंबकीय क्षेत्र के होने का आभास भी देती हैं ! इसी कारण ऐसी संभावना भी बनती है कि हो सकता है कि इस क्षेत्र का चुंबकीय आकर्षण इतना ज्यादा हो जो इस जगह के गुरुत्वाकर्षण पर भी बहुत भारी पड़ता हो और उसी की वजह से पानी जैसा तरल भी ऊंचाई की ओर बढ़ने लग जाता हो ! जो भी हो इन बातों का जवाब ढूंढना वैज्ञानिकों के लिए एक चुन्नौती तो है ही। 

तिब्बती पैगोडा 

रिहन्द और मांड नदियों का यह उद्गम स्थल कभी अपने अजूबों के कारण भूतिया कहलाता था। पर पर्यटन विभाग के अथक और अनवरत प्रयासों के फलस्वरूप अब मैनपाट में साल भर पर्यटकों का तांता लगा रहता है, जबकि अभी भी यह पूरी तरह पर्यटन की दृष्टि से विकसित नहीं हुआ है ! एक समय 1962 में चीन से आए तिब्बती शरणार्थियों को भी यहीं बसाया गया था। आज उल्टा पानी के अलावा टाइगर प्वाइंट, मेहता प्वाइंट, दलदली, फिश प्वाइंट जैसी जगहों के साथ-साथ यहां के तिब्बती मंदिर, तिब्बती बाजार और तिब्बती खानपान भी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र हैं। हो सके तो ऐसी जगहों पर भी जरूर जाना चाहिए। 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

सोमवार, 7 अक्टूबर 2024

शून्य की खोज के पहले भी गणना तो होती ही थी

संख्या प्रणालियां शून्य के आविष्कार के बहुत पहले से अस्तित्व में थीं ! जैसे कि रोमन प्रणाली में दस को ''X'' और सौ की संख्या को ''C'' से दर्शाया जाता रहा है। ब्राह्मी लिपि में भी दस, सौ, हजार जैसी संख्याओं के लिए विशेष चिन्ह हुआ करते थे, हालांकि इनसे गणना करना कुछ कठिन होता था पर बिना शून्य के भी सारी संख्याएं आसानी से लिखी जाती रही थीं ! परंतु ''शून्य'' के आ जाने से छोटी-बड़ी हर तरह की संख्याओं की गणना करना आसान हो गया..............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कुछ लोग देसी घी को हजम नहीं कर पाते ! वे बहकावे या प्रलोभन में आकर तरह-तरह के विदेशी कारखानों से नि:सृत चिकनाई को सेहतवर्द्धक मान, अपने उत्पाद को हीन सिद्ध करने पर तुले रहते हैं ! यहीं के रहने-खाने वाले, यहीं की हवा-पानी-मिट्टी में पलने-बढ़ने वाले, जिनका यहां के बिना और कहीं ठिकाना भी नहीं है, वे अपने ही देश की संस्कृति, संस्कार, आस्था, मान्यताओं का मजाक उड़ाने से बाज नहीं आते ! बार-बार सिद्ध होने के बावजूद उन्हें अपने ग्रंथ, अपना इतिहास, अपने महापुरुष, अपनी मान्यताएं दोयम दर्जे की मालूम होती हैं ! बिना गहन अध्ययन, बिना उचित जानकारी, आधी-अधूरी, सुनी-सुनाई बातों को लपक, ऐसी अधजल गगरियां जहां-तहां छलकती रहती हैं !  

इन्हें इस बात का गर्व महसूस नहीं होता कि भारत ने विश्व को एक नायाब विधा सौंपी है ! इनको इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि अंकों के मामले में संपूर्ण जगत भारत का ऋणी है ! इन्हें ज्ञान ही नहीं है कि 2500-3000 पुराने हमारे ग्रंथों में गणित में की गई खोजों का विस्तृत विवरण है ! उस समय दशमलव प्रणाली तथा रेखागणित के साथ-साथ अंकगणित के नियम भी विकसित हो चुके थे ! 

महान खगोलशास्त्री और गणितज्ञ आर्यभट्ट
किसी भी देश और जाति की आत्मा होती है उसकी संस्कृति, उसका ज्ञान, उसका समृद्ध इतिहास जिस पर उसको गर्व होता है ! कोई भी आक्रांता पहले उसी को खत्म या नष्ट करने की कोशिश करता है ! हमारे साथ भी यही हुआ ! हजार साल की पराधीनता की अवधि में हमारे इतिहास को हमारी संस्कृति को, हमारे संस्कारों को बदलने की कोशिश होती रही ! सफलता भी मिली उन लोगों को, क्योंकि रीढ़विहीन लोग हर युग में हर देश में पाए ही जाते हैं ! इन लोलुपों को वही समझाया गया जो उनके आका चाहते थे ! इनको दिया जाने वाला ज्ञान इनके आकाओं द्वारा निर्मित और वहीं तक सिमित था, जहां तक उनकी इच्छा थी ! देश पर हुकूमत के लिए यह जरुरी था नहीं तो देश और बाकी देशवासियों को काबू करने के लिए फौज कहां से आती ! 

दासता तो खत्म हो गई पर कुछ लोगों की मानसिक गुलामी अभी भी बरकरार है ! ऐसे ही लोगों का एक प्रिय विषय ''शून्य यानी जीरो'' है ! ये यह प्रचार नहीं करते कि शून्य, जो सिर्फ कहने भर को शून्य है पर इसकी क्षमता अपार है, जो एमें इनके कुतर्क आज के सोशल मीड़िया पर छाए रहते हैं ! ये वही लोग हैं जो आजादी के बाद से ही अपने पूरे मनोयोग से हमारी संस्कृति, हमारे इतिहास को तोड़-मरोड़ कर विकृत कर वर्तमान और आने वाली पीढ़ी क को दस, हजार, लाख, करोड़, अरब-खरब कुछ भी बना सकता है, इसे हमने दुनिया को दिया ! उलटे  इसके बारे को गुमराह करने में जी-जान से जुटे हुए हैं ! मजाक उड़ाने की तर्ज पर इनका तर्क होता है कि जब आर्यभट्ट ने करीब 1500 साल पहले ही शून्य का आविष्कार कर गणित में इसे पहली बार प्रस्तुत किया और इसे गणितीय समीकरणों और संख्याओं में शामिल किया, तो पौराणिक युग में रावण के दस सिरों और महाभारत में सौ कौरवों की गिनती कैसे कर ली गई ? ऐसे अधकचरे विद्वानों के लिए देवदत्त पटनायक जी ने, जो पौराणिक कथाओं के लेखक और जाने-माने विश्लेषक हैं, इस बात का विस्तार से वर्णन किया है।     

उनके अनुसार संख्या प्रणालियां शून्य के आविष्कार के बहुत पहले से अस्तित्व में थीं ! जैसे कि रोमन प्रणाली में दस को ''X'' और सौ की संख्या को ''C'' से दर्शाया जाता रहा है। ब्राह्मी लिपि में भी दस, सौ, हजार जैसी संख्याओं के लिए विशेष चिन्ह हुआ करते थे, हालांकि इनसे गणना करना कुछ कठिन होता था पर बिना शून्य के भी सारी संख्याएं आसानी से लिखी जाती रही थीं ! परंतु ''शून्य'' के आ जाने से छोटी-बड़ी हर तरह की संख्याओं की गणना करना आसान हो गया।  

हमारे यहां से इसे अरब व्यापारी यूरोप ले गए। शुरू में हर नई चीज की तरह वहां इसका विरोध भी हुआ, क्योंकि उनका तथ्य ज्ञान और आख्यान ईसाई धर्म से प्रभावित था, जिसमें शून्य या अनंत जैसी धारणाओं का कोई स्थान नहीं था। पर धीरे-धीरे यह प्रणाली अपनी विशिष्टताओं की वजह से वहां भी लोकप्रिय हो गई। 

विडंबना यह है कि विपरीत विचार धारा, अलग सोच, अलग निष्ठा के बावजूद, अपनी खासियतों के बल पर जो विधा विदेशों में भी स्वीकार्य हो गई, उसी का अपने यहां के पश्चिमी सभ्यता में रचे-पगे, मूढ़ मति, लोग मजाक उड़ाने से गुरेज नहीं करते ! भले ही इससे उनकी बुद्धिमत्ता का स्तर जग जाहिर हो जाता हो ! पर गुलामी की इस मानसिकता की जकड़ से आजाद होने की किसी भी तरह की चेष्टा या इच्छा फिलहाल ऐसे लोगों में अभी तक तो नहीं ही दिखती.......!    

@आभार - देवदत्त जी, अंतर्जाल                         

शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2024

''कुछ अलग सा'', ब्लॉग से पुस्तकाकार

शिकायत नहीं है पर शिकवा है उन बचपन के दोस्तों से, अपने पारिवारिक सदस्यों से, लम्बी दोस्ती का दम भरने वालों से, रचनाओं को अपने प्रकाशन में स्थान देने वालों से, कि बधाइयां, शुभकामनाएं, मंगलकामनाएं तो ढेर की ढेर भेजीं पर किसी को भी पुस्तक लेने का ख्याल नहीं आया ! इस पर मैंने खुद को समझाया भी कि भाई, तुम प्रेमचंद, शरद जोशी या जय शंकर प्रसाद नहीं हो ! नाहीं किसी ने तुम्हें लिखने को कहा था ! तो खेद किस बात का ? पर यह जो मन है ना, वह मानता नहीं है ! अपनों से बड़ी आशाएं लगाए रहता है, तरह-तरह के झटके लगने के बावजूद भ्रम पाले रहता है ......!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

धन्यवाद ज्ञापन :-

चौदह-पंद्रह साल के ब्लॉग लेखन से जाहिर है काफी कुछ अच्छा-बुरा एकत्रित होना ही था ! अंदर-बाहर से सलाहें भी दगने लगीं थीं कि ब्लॉगों को पुस्तक का रूप दे दिया जाए ! इसमें सब से अग्रणी थी बिटिया सांशू ! नागपुर से जब भी फोन पर बात होती, उसका पहला प्रश्न होता, ताऊजी बुक का क्या हुआ ?
पर अपने मन में भी यह आशंका रहती ही थी कि तकनिकी में कभी कुछ ऐंड-बैंड हो गया, तो सब हवा-हवाई ही ना हो जाए ! पर झिझक का क्या करें जो आशंकित करती रहती थी कि पता नहीं कोई पढ़ेगा भी की नहीं ! पर भले ही अपना दही खट्टा ही हो, कढ़ी तो बनाई जा ही सकती है, सो एक दिन स्वांतः सुखाय खातिर चढ़ ही गए झाड़ पर !
ब्लॉगों का पुस्तकाकार आ गया ! आश्चर्य चकित भी कर गया पहला लॉट ख़त्म हो कर ! जिसमे सबसे ज्यादा योगदान रहा छोटी भगिनी रेवा जी का, जिन्होंने यहां-वहां, जाने कहां-कहां, विदेश तक को भी नहीं बक्शा ! उधर अभय-चेतन के मित्र ! जिस संस्था से जुड़ा हूँ उसके द्वारा बने मेरे नए सखा ! ब्लॉग को पढ़ने वाले दोस्त, सभी ने पुस्तक ले कर प्रोत्साहित ही नहीं किया बल्कि पुस्तक की एक-एक रचना का उल्लेख कर अपनी प्रतिक्रियाएं भी व्यक्त कीं ! कइयों ने अपने जानने वालों को इसे भेंट स्वरूप प्रदान किया !
पर हर चीज का एक दूसरा पहलू भी होता है, जिसके बारे में कहना नहीं चाहता था ! पर कहीं ना कहीं बात कचोटती तो है ही ! शिकायत नहीं है पर शिकवा है उन बचपन के दोस्तों से, अपने पारिवारिक सदस्यों से, लम्बी दोस्ती का दम भरने वालों से, रचनाओं को अपने प्रकाशन में स्थान देने वालों से, कि बधाइयां, शुभकामनाएं, मंगलकामनाएं तो ढेर की ढेर भेजीं पर पुस्तक लेने का विचार नहीं बन पाया ! मैंने खुद को समझाया कि भाई तुम प्रेमचंद, शरद जोशी या जय शंकर प्रसाद नहीं हो ! नाहीं किसी ने तुम्हें लिखने को कहा था ! तो खेद किस बात का ! पर यह जो मन है ना, वह मानता नहीं है ! अपनों से बड़ी आशाएं लगाए रहता है, तरह-तरह के झटके लगने के बावजूद भ्रम पाले रहता है ......!
बीती ताहि बिसार कर, शब्दांकुर प्रकाशन, उसके संचालक काली शंकर जी का बहुत-बहुत आभार जिनके मार्गदर्शन, निर्देशन और प्रयासों के कारण यह पुस्तक अपने इस स्वरूप को पा कर ''अमेजन'' पर भी उपलब्ध हो सकी ! उन सभी स्नेही-जनों, हितैषियों, संबंधियों, मित्रों, मित्रों के मित्रों का बहुत-बहुत धन्यवाद, जिन्होंने पुस्तक के माध्यम से मेरी हौसला आफजाई की ! जैसी भी हैं, रचनाओं को सम्मान दे मेरा मान रखा ! अपनी रचनाओं को लेकर ना कभी, ना अभी, मैंने कोई मुगालता नहीं पाला है, यह जो प्यार मिल रहा है यह सबके स्नेह का ही परिणाम है, यह कायम रहे, यही प्रभु से कामना है !
एक बार फिर सभी का हार्दिक आभार
🙏🙏

रविवार, 29 सितंबर 2024

''साहिब'' से छेड़छाड़, कुटिल साजिश अंग्रेजों की

साहिब से साहब, साहब से साहेब ! बात सिर्फ एक शब्द की मात्रा की हेरा-फेरी की नहीं है बल्कि उसमे लाए गए फर्क को आम आदमी को समझाने की है ! साहिब के सामने हर नागरिक श्रद्धा से सिर झुकाता है ! साहब के सामने मजबूरी में सर झुकाना पड़ता है। जबकि साहेब के सामने सर झुकाना नहीं पड़ता बल्कि उनके साथ सर उठाकर खड़े रहने का हक मिलता है ! कमाल की बात तो यह है कि खुद को साहब कहलवाने का शौक रखने वाले तो हवा हुए पर जिनके नाम के साथ साहेब जुड़ा, वे सदा के लिए अमर हो गए, फिर चाहे वे नाना साहेब पेशवा हों ! बाला साहेब देवरस हों ! बाला साहेब ठाकरे हों, बाबा साहेब आंबेडकर हों या फिर दादा साहेब फाल्के हों...............!

#हिन्दी_ब्लागिंग  

कभी-कभी पूरी जानकारी ना होने से कुछ शब्द भ्रमित कर जाते हैं ! वैसा ही एक शब्द है, साहब ! जो अंग्रजों द्वारा खुद को आम जनता से अलग दिखलवाने की लालसा के कारण एक निर्धारित, सोची समझी, श्रेष्ठि और मजदूर वर्ग में भेद-भाव और सम्मान पाने की साजिश के तहत गढ़ा गया ! उस समय यह अंग्रेजों के लिए ही प्रयोग किया जाता था ! जिससे शासक और शासित, मजदूर और मालिक में भेद किया जा सके ! पर समय के साथ-साथ यह भारतीय उच्चाधिकारियों के साथ भी जुड़ता चला गया ! धीरे-धीरे इसका प्रयोग इतना व्यापक और लोकप्रिय हो गया कि अंग्रेजों के जाने के बाद भी भारतीय उच्चाधिकारियों, रसूखदारों, आत्मश्लाघि लोगों ने अपनी अहम-तुष्टि के लिए इसे अपने साथ जोड़े रखा !  

अब पूरी जानकारी के अभाव में यह सवाल मन में उठना स्वाभाविक ही था कि जो शब्द सामाजिक अलगाव के लिए उपयोग किया जाता रहा हो ! ऊँच-नीच का भेदभाव दर्शाता हो, उसे हमारे सम्मानित, सामाजिक समरसता के लिए माने जाने वाले, देवतुल्य सिख गुरुओं तथा उनके स्मारकों के साथ कैसे जोड़ दिया गया ! देश के लिए अपनी जान तक की परवाह ना करने वाले, देशहित के लिए जीवन समर्पण करने वालों के साथ कैसे जोड़ दिया गया ! 

विभिन्न स्रोतों में उपलब्ध विवरणों से जो जानकारियों मिलीं, वे साफ करती हैं कि मूल शब्द ''साहिब'' अरबी भाषा का है। जिसका अर्थ है, ईश्वर के समकक्ष या भगवान के साथी। इसीलिए इसे देवतुल्य गुरुओं के साथ जोड़ा गया है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी एक-दो जगह इस शब्द को श्री राम जी के लिए उपयोग किया है। अन्य धर्मों के धर्म-ग्रंथों में भी इस शब्द का जिक्र पाया जाता है !

यह भी अंग्रेजों की कुटिलता की एक बानगी है कि उन्होंने साहिब जिसका अर्थ होता है भगवान के साथी, उसका सरकारीकरण कर उसे साहब कर दिया जिसका अर्थ होता है सरकार के प्रतिनिधि ! जिसने बाद में मुखसुख के कारण ''साब'' का रूप अख्तियार कर लिया। लोगों के जेहन में बैठे इस शब्द को शायद इसीलिए चुना गया होगा ताकि लोगों को अपनी औकात और उनकी बात आसानी से नमाझ में आ जाए ! 

अब रही इसी से मिलते-जुलते तीसरे शब्द ''साहेब'' की ! यह शब्द उन स्वाभिमानी देश प्रेमियों द्वारा रचा गया जो अंग्रेजों की मानसिकता को समझते थे। उनकी चाल का जवाब उन्हीं शैली में देने के लिए इसे हथियार बनाया गया ! साहब के खिलाफ साहेब की रचना हुई ! जहां साहब का अर्थ सरकार का साथी मायने रखता था वहीं साहेब शब्द खुद को आम सर्वहारा जनता का साथी या प्रतिनिधि बताता है। कमाल की बात तो यह रही कि खुद को साहब कहलवाने का शौक रखने वाले तो हवा हुए पर जिनके नाम के साथ साहेब जुड़ा, वे सदा के लिए अमर हो गए, फिर चाहे वे नाना साहेब पेशवा हों ! बाला साहेब देवरस हों ! बाला साहेब ठाकरे हों, बाबा साहेब आंबेडकर हों या फिर दादा साहेब फाल्के हों ! सभी को नमन !

साहिब से साहब, साहब से साहेब ! बात सिर्फ एक शब्द की मात्रा की हेरा-फेरी की नहीं है बल्कि उसमें रची गई साजिश की है ! उस साजिश को नाकाम करने की है ! उसमे लाए गए फर्क को आम आदमी को समझाने की है ! साहिब के सामने हर नागरिक श्रद्धा से सिर झुकाता है ! साहब के सामने मजबूरी में सर झुकाना पड़ता है। जबकि साहेब के सामने सर झुकाना नहीं पड़ता बल्कि उनके साथ सर उठाकर खड़े रहने का हक मिलता है।  

@श्री देवव्रत त्रिपाठी जी, श्री कीरत सिंह जी तथा अंतर्जाल का हार्दिक आभार 

बुधवार, 28 अगस्त 2024

जब क्लास ले ली सब्जी वाली अम्मा ने ! किस्सा-ए-रायपुर

अभी कुछ दिनों पहले ही एक खान-पान के एक संस्मरण को ब्लॉग पर उतारा था, अब उसी से संबंधित एक और वाकए ने ऊपरी माला ऐसा हथियाया है कि खाली करने को ही तैयार नहीं है ! हालांकि लगभग एक ही जैसे विषय पर दो रचनाएं किसी को ऊबा भी सकती हैं, पर मेरी मजबूरी है कि उसको मूर्त रूप नहीं दिया तो पता नहीं कब तक ऐसे ही दिमाग में चिपका रहेगा ! तो आज स्वांत: सुखाय के साथ-साथ रायपुर के आत्मीय जनों की खातिर ही सही........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कभी-कभी यादों के झरोखों से अपना अतीत दिखने लग जाता है और फिर वह दिमाग में उतर जम कर बैठ जाता है ! अभी कुछ दिनों पहले ही एक खान-पान के एक संस्मरण को ब्लॉग पर उतारा था, अब उसी से संबंधित एक और वाकए ने ऊपरी माला ऐसा हथियाया है कि खाली करने को ही तैयार नहीं है ! हालांकि लगभग एक ही जैसे विषय पर दो रचनाएं किसी को ऊबा भी सकती हैं, पर मेरी मजबूरी है कि उसको मूर्त रूप नहीं दिया तो पता नहीं कब तक ऐसे ही दिमाग में चिपका रहेगा ! तो आज स्वांत: सुखाय के साथ-साथ रायपुर के आत्मीय जनों की खातिर ही सही !    

बात तब की है जब ग्रहों के षड्यंत्र के चलते अस्सी के दशक में हमारा सारा परिवार, तब के मध्य प्रदेश के रायपुर शहर में जा बसा था ! मेरी बुआ जी का सालों से वहां स्थाई निवास था ! देश के विभिन्न शहरों में बसे हमारे परिवारों में से दो उस समय एक जगह हुए थे ! एक नवंबर 2000 में उसी रायपुर को छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी बना दिया गया ! उन दिनों रायपुर एक सुस्त, कस्बाई शहर हुआ करता था ! दुकानें, बाजार दोपहर को बंद हो जाते थे और फिर शाम को चार बजे के आस-पास खुला करते थे ! बड़े शहरों की तरह भीड़-भड़क्का, आपा-धापी कुछ नहीं ! अपनी मंथर गति से चलता हुआ एक शांत, उनींदा सा, तालाबों का नगर ! पर राजधानी बनने के बाद पूरी तरह से इसका कायापलट हो चुका है ! चंडीगढ़, भुनेश्वर की तरह पूरी तरह व्यवस्थित नया रायपुर देश के कई शहरों के लिए मॉडल सिद्ध हो सकता है ! कई मायनों में तो दिल्ली तक को भी मात दे रहा है यह शहर !

उस समय मालवीय रोड़ मुख्य बाजार हुआ करता था ! छोटी-बड़ी जरुरत की वस्तुएं वहां उपलब्ध रहती थीं। उसी को केंद्र बना बाकी के छोटे-छोटे बाजार, दफ्तर, डाकघर, कुछ सिनेमा घर, बैंक, वगैरह उसके आस-पास ही स्थित थे ! वही इलाका सिटी कहलाता था ! वहां के आराम तलब लोगों की मनोदशा यह थी कि यदि कोई भला आदमी अपना काम निपटा, सिर्फ दो-एक किमी दूर अपने घर वापस आ जाता था और कहीं बाई चांस, कभी-कभार, भूले-भटके, शहर संबंधित किसी चीज की जरुरत पड़ जाती थी तो जाने उस पर आफत आन पड़ती थी ! अरे ! फिर सिटी जाना पड़ेगा...!'' दिल्ली-कलकत्ता से हम जैसे वहां पहुंचे लोगों को, जिनका पहले रोज करीब पचास से ऊपर का सफर हो जाता था, यह सुन बड़ा अजीब सा महसूस किया करते थे ! 

तो बात हो रही थी हमारे विस्थापन की ! हमारा ठिकाना बना था, न्यू शांति नगर ! तो एक बार ठंड के दिनों में ऐसे ही विभिन्न खाद्य पदार्थों की रायपुर में उपलब्धि पर चर्चा में मकई का आटा भी आ फंसा ! उन दिनों किराने की सबसे नामी दूकान घनश्याम प्रोविजन स्टोर हुआ करती थी, जो मोती बाग के पास चौराहे पर, मालवीय रोड़ से फर्लांग भर दूर स्थित थी। बताया गया कि और कहीं मिले ना मिले वहाँ जरूर मिल जाएगा!मैंने अपना स्कूटर उठाया और पहुँच गए घनश्याम किराना भंडार ! दस मिनट भी तो नहीं लगते थे ! 

वह विलक्षण वस्तु वहाँ तो ना मिली, पर एक नई जानकारी का इजाफा जरूर हुआ ! घनश्याम जी ने कहा कि सर आज तो यह मेरे पास नहीं है, पर अगली बार जब आप आओगे तो यह आटा यहां जरूर मिलेगा ! मैंने जिज्ञासावश पूछ कि ऐसा क्यों ? उन्होंने कहा कि अभी तक इसकी डिमांड नहीं आई थी। अब आपने चाहा है तो मैं जरूर रखूँगा क्योंकि मेरा उसूल है कि ग्राहक कभी भी बिना सामान लिए वापस नहीं जाना चाहिए ! तभी मुझे समझ आया कि सिंधी समाज व्यापार में इतना आगे क्यों है ! उन्होंने ही मुझे बताया कि बांसटाल में कृष्णा आटा चक्की पर यह आपको मिल जाएगा, पर अगली बार आप मुझसे ही लें ! प्रसंगवश बता दूँ कि दो-तीन साल में ही उनकी दूकान से मौसम पर चार से पांच बोरी मक्के का आटा बिकना शुरू हो गया था ! हम जब भी मिलते थे तो इस बात का जिक्र वे वहाँ उपस्थित सभी लोगों से किया करते थे कि शर्मा जी के कारण ये चीज मैंने रखनी शुरू की है ! इसीलिए मुझे तनिक गुमान सा है कि रायपुर में इस व्यंजन को लोकप्रिय बनाने में मेरा भी कुछ योगदान तो जरूर है !  

मकई के आटे के साथ वहाँ सरसों के साग की उपलब्धि की बात भी कर ली जाए ! तो लगे हाथ बता दूँ कि छत्तीसगढ़ में इस तरह के पत्तेदार साग को भाजी कहते हैं, जैसे पालक भाजी, मेथी भाजी, चना भाजी इत्यादि ! वहाँ के सबसे बड़े सब्जी बाजार, जिसे शास्त्री मार्किट (अंग्रजी भाषा के शब्द छत्तीसगढ़ी में बिलकुल दूध में पानी की तरह घुल-मिल गए हैं) में भी यह ''महोदया'' कभी-कभार ही मिलती थीं ! पर शंकर नगर के पास टाटीबंध के इलाके में सुबह लगने वाले बाजार में, जहां छोटे खेतिहर अपना उत्पाद खुद ही ले कर आते थे, इनकी उपलब्धि बनी रहती थी ! 

सरसों के पत्ते 
तो एक दिन अपने सहोदर के साथ पहुँच गए टाटीबंध ! तरह-तरह की हरी भाजियों को सजाए एक सब्जी विक्रेता महिला से पूछा कि सरसों भाजी है ? तो उसने छोटी बच्चियों की चोटियों की तरह की पांच गुच्छियां हमें पकड़ा दीं ! हमने कहा, अम्मा ! हमें दो किलो चाहिए ! यह सुनते ही उस महिला ने मुंह बाए, आश्चर्यचकित हो हमें ऐसे देखा जैसे हम किसी दूसरे ग्रह से उतरे हों ! छत्तीसगढ़ी भाषा में हमारी क्लास लग गई -

कितना चाहिए ?''

दो किलो !

........इतना क्या करोगे ?''                 

खाएंगे''

इत्ता सारा ?''

तब तक माजरा हमें समझ में आ गया था, सो बात खत्म करने के लिए कह दिया कि -

अम्मा ! भोज है, बहुत सारे लोग आएँगे''  

सब्जी वाली अम्मा को पता नहीं हमारी बात पर कितना यकीन हुआ पर उन्होंने उस छोटी सी बजरिया में अपने साथियों को फरमान भेज दिया ! जिसके पास जितनी सरसों भाजी थी, सब लेकर हमारे इर्द-गिर्द जमा हो गए ! पर सब मिला कर भी दो किलो नहीं बन पाया था ! कुछ विक्रेता, बहती गंगा देख, अपनी रकम-रकम की भाजियां हम पर थोपने का अवसर तलाशने लगे थे ! पर साग बिकने से ज्यादा उन सबको, उसे लेने वाले अजूबों को देखने की उत्सुकता थी ! हम एक तरह से तमाशाइयों से घिर गए थे, इसीलिए बिना मोल-भाव किए, साग की जितनी कीमत मांगी गई, दे कर, हम तुरंत वहाँ से निकल लिए ! 

आज के समय, जब देश-दुनिया की हर चीज हर जगह पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है, तो वह घटना कुछ अजीब सी लगती है ! कभी तो आश्चर्य भी होता है कि क्या सचमुच वैसा हुआ था ! पर जब भी वो वाकया याद आता है बरबस हंसी फूट पड़ती है !

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