pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

सोमवार, 22 मार्च 2021

ओ री गौरैया ! बिन तेरे आंगन सूना

आज जरुरत है अपने आस-पास के पर्यावरण के साथ-साथ उसमें रहने-पलने वाले छोटे-छोटे जीवों का भी ख्याल-ध्यान रखने की ! इसके लिए सरकारों का मुंह ना जोहते हुए हर नागरिक को यथाशक्ति, यथासंभव खुद ही कुछ ना कुछ प्रयास करने होंगे ! कहीं ऐसा ना हो कि किसी दिन नीले से धूसर होता जा रहा नभ, नभचर विहीन भी हो कर रह जाए.........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

याद कर देखिए ! कितने दिन हो गए आपको सुबह-सुबह गौरैया का मधुर कलरव सुने ! कितना वक्त बीत गया उसे घर के आँगन, बाल्कनी, छत या किसी मुंडेर पर कुछ चुगते, फुदकते देखे ! अंतिम बार कब उसके चहकने से सकारात्मकता का आभास हुआ था ! कब उनको घर में मंडराते देख सकून सा मिला था ! कब घर की छत के किसी कोने में बने घरौंदे से गिरे उसके नवजात को उठा कर वापस घोंसले में रखने पर एक अनुपम अनुभूति हुई थी ! कब संध्या समय उनके झुंड को बिजली के खंभों की तारों पर कतारबद्ध पंचायत करते देखा था ! नहीं बता पाएंगे ! क्योंकि यह छोटा सा घरेलू जीव धीरे-धीरे, हमारी ही बेरुखी, संवेदनहीनता और अप्राकृतिक रहन-सहन के कारण हमसे दूर होने पर मजबूर होता जा रहा है !  




परसों, 20 मार्च, विश्व गौरैया दिवस था ! ऐसे ही और संरक्षित दिनों की तरह ही इस दिन भी बाकि सब कुछ हुआ, सिर्फ इस नन्हीं सी जान की फ़िक्र के अलावा ! पक्षी प्रेमियों के अतिरिक्त और लोगों को तो शायद ही इस दिवस के बारे में पता भी हो ! मानव-मित्र यह घरेलु पक्षी इंसानी रिहाइशों के आस-पास ही रहना पसंद करता है। सुनसान-निर्जन घरों में यह अपना बसेरा नहीं बनाता। परंतु हमारी बदलती जीवन शैली, घटती हरियाली, घरों की बढ़ती ऊंचाइयों ने इसे हमसे दूर कर दिया है। ज्ञातव्य है कि इस नन्हें परिंदे की उड़ने की क्षमता सिर्फ 20 मीटर की ऊंचाई तक ही सिमित है, जो शहरों के आकाश छूते आधुनिक आवासीय निर्माणों के लिए पूरी तरह अपर्याप्त है ! गांवों-कस्बों में तो यह अब भी दिख जाती है पर महानगरों में तो यह प्राय: लुप्तप्राय ही है !


इसकी घटती तादाद का एक मुख्य कारण कीटनाशकों का बढ़ता प्रयोग भी है ! जिससे पतले-छोटे कीट, जो इसका और इसके बच्चों का मुख्य आहार है, इसे नहीं मिल पाते ! इसको अक्सर धूल में लोटते भी देखा जाता है, जिससे यह धूल-स्नान कर अपने पंखों को साफ़-सुथरा, कीटाणु विहीन बनाए रखती है ! पर बढ़ते कंक्रीटीकरण से इसके ऐसा ना कर पाने की वजह से इसके रोगग्रस्त हो जाने का ख़तरा भी बढ़ गया है। शहरों में इसे रहने के साथ-साथ खाने के लिए भी जूझना पड़ता है क्योंकि मिटटी के अभाव में उसमें पैदा होने वाले कीड़े वगैरह इसे नहीं मिल पाते। यही कारण है कि अब यह शहरों से दूर होती जा रही है। अभी कुछ ही साल पहले दिल्ली में हमारे आवास पर इसकी अच्छी खासी संख्या हुआ करती थी, पर अब तो भूले-भटके भी नजर नहीं आती !



सिर्फ छोटे कीट और बीजों पर निर्भर रहने वाली यह औसत पांच-छह इंच की 30-35 ग्राम वजन की छोटी सी भूरे से रंग की चिड़िया, जिसमें खुद को परिस्थियों के अनुकूल ढल जाने की क्षमता होने के बावजूद, उसकी तादाद भारत में ही नहीं इटली, फ़्रांस, जर्मनी, इग्लैंड जैसे बड़े और विकसित यूरोपीय देशों में भी लगातार कम होती जा रही है। नीदरलैंड में तो इसे पहले ही दुर्लभ प्रजाति की श्रेणी में रख दिया गया है। देखा जाए तो इसको बचाने के अभी तक के सारे प्रयास विफल ही रहे हैं ! केवल 20 मार्च को इसे याद भर कर लेने या राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली का राजकीय पक्षी होने से ही इसका कोई भला नहीं होने वाला !



आज जरुरत है अपने आस-पास के पर्यावरण के साथ-साथ उसमें रहने-पलने वाले छोटे-छोटे जीवों का भी ख्याल-ध्यान रखने की ! यदि हम शेर-बाघ-गिद्ध-कौवे की चिंता करते हैं तो हमें गौरैया जैसे छोटे जीवों का भी ध्यान रखना होगा ! इसके लिए सरकारों का मुंह ना जोहते हुए हर नागरिक को यथाशक्ति, यथासंभव खुद ही कुछ ना कुछ प्रयास करने होंगे ! कहीं ऐसा ना हो कि किसी दिन नीले से धूसर होता जा रहा नभ, नभचर विहीन भी हो कर रह जाए !  

@ चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

शनिवार, 20 मार्च 2021

कोटद्वार के सिद्धबली हनुमान

हनुमान जी यहां आने वाले आने वाले अपने सारे भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। इसीलिए यहां हर धर्म के लोग अपनी इच्छापूर्ति के लिए दूर-दूर से आते रहते हैं। मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु मंदिर परिसर में भंडारा आयोजित कर प्रभु को अपना आभार व्यक्त करते हैं। लोगों की श्रद्धा का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां  होने वाले विशेष भंडारों की बुकिंग फिलहाल 2025 तक के लिए बुक हो चुकी है..........!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

सिद्धबली हनुमान जी का मंदिर, उत्तराखंड के कोटद्वार नगर के दर्शनीय स्थलों में  एक प्रमुख देव स्थान है। जो मुख्य नगर से करीब तीन किमी की दूरी पर खोह नदी के किनारे,नजीबाबाद-बुआखाल राष्ट्रीय राजमार्ग पर  लगभग 135 फुट की ऊंचाई पर एक पहाड़ी टीले पर स्थित है। इस ऊंचाई से चारों ओर का नैसर्गिक दृश्य निहारना अपने आप में एक अलौकिक अनुभव प्रदान करता है। ऐसी दृढ मान्यता है कि हनुमान जी यहां आने वाले आने वाले अपने सारे भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। इसीलिए यहां हर धर्म के लोग अपनी इच्छापूर्ति के लिए दूर-दूर से आते रहते हैं। मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु मंदिर परिसर में भंडारा आयोजित कर प्रभु को अपना आभार व्यक्त करते हैं। लोगों की श्रद्धा का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां  होने वाले विशेष भंडारों की बुकिंग फिलहाल 2025 तक के लिए बुक हो चुकी है। 





सड़क से लगे प्रवेश द्वार से 158 सीढ़ियां चढ़ कर मुख्य मंदिर तक पहुंचा जाता हैं। वहां  सफ़ेद संगमरमर की बेहद आकर्षक प्रतिमा स्थापित है। पूरा परिसर बेहद साफ़-सुथरा और मनभावन है।  मंदिर  से कुछ ही नीचे शिव जी और शनिदेव विराजमान हैं। मंदिर से  तक़रीबन आधी दूर पहले भक्तों द्वारा भंडारा करने की सुन्दर व्यवस्था है। ऊपर प्रकृति के साए में मंदिर का वातावरण इतना मनोहर-शांत व मनमोहक है कि वहां से वापस लौटने की इच्छा ही नहीं होती। बहुत कम जगहों पर ऐसा अहसास होता है। 




नाथ परंपरा की धारणाओं के अनुसार गुरु गोरखनाथ एवं उनके शिष्यों ने यहां लम्बे समय तक तपस्या की, जो की बाद में ‘सिद्ध’ नाम से प्रसिद्द हुए। जानकारों के अनुसार 14वीं शताब्दी में प्रख्यात संत सिधवा ने भी इसी जगह आ कर साधना की थी, जिन्हें सिद्ध के रूप  में पूजा जाता है। मंदिर की  स्थापना के बारे  में यह बताया जाता है कि इस स्थान पर तप साधना करने के बाद सिद्ध बाबा को हनुमान जी की  सिद्धि प्राप्त हुई थी।  उसके  उपरांत सिद्ध बाबा ने  यहां बजरंगबली की एक  विशाल मूर्ति का   निर्माण करवाया था, तबसे इस जगह का नाम सिद्धबली पड़ गया। 

 

सिद्ध बाबा की समाधी और शिव मंदिर  


इस बारे में एक और भी कहानी प्रचलित है, जिसके अनुसार अंग्रेजों के समय एक मुस्लिम अधिकारी अपने घोड़े पर सवार जब यहां पहुंचे तो भावशून्य हो गए ! उसी अवस्था में उन्हें भान हुआ कि सिद्ध बाबा की समाधि पर हनुमान जी के मंदिर की स्थापना की जाए ! सजग होने पर उन्होंने स्थानीय लोगों से इस बात की चर्चा की और फिर इस मंदिर का निर्माण हुआ। जिसे धीरे-धीरे भक्तों और श्रद्धालुओं की आस्था ने यह भव्य स्वरुप प्रदान करवाया। 



हनुमानजी हमारे सर्वप्रिय पांच देवताओं में से एक हैं। तत्काल प्रसन्न होने और अभय प्रदायी होने के कारण ये अबालवृद्ध सभी में अत्यंत लोकप्रिय हैं। संसार भर में इनके भक्त इनका स्मरण कर सुख-शांति पाते हैं।इनके मंदिर विश्व भर में स्थापित हैं, जहां एक से बढ़ कर एक प्रतिमाएं स्थापित हैं। पर कुछ कम जाना जाने वाले इस सिद्धबली की मूर्ति भी अद्भुत है। मौका मिले तो दर्शन करने जरूर आना चाहिए।   

मंगलवार, 16 मार्च 2021

एक दर्शनीय स्थल, कोटद्वार

दर्शनीय स्थानों में सबसे महत्वपूर्ण कण्व ऋषि का आश्रम है जो पहाड़ की तलहटी में, शहर से करीब 35 किमी की दूरी पर स्थित है। यही वह जगह है जहां शकुंतला-दुष्यंत के यशस्वी पुत्र भरत का जन्म और शैशव काल बीता था। जिनके नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा। सुनसान-बियाबान में यह शांत जगह सकून प्रदायी तो है पर भीतर ही भीतर कुछ विवाद समेटे, बहुत ही ज्यादा देखरेख की मांग भी करती है.............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

जीवन में कभी-कभी कुछ ऐसा घट जाता है, जिसकी पहले दूर-दूर तक संभावना होती नहीं लगती। शायद इस लिए भी इसे अनिश्चित कहा गया है। कुछ ऐसा ही हुआ जब विभिन्न परिस्थितियों के चलते उत्तराखंड के एक शांत से शहर कोटद्वार जाने का मौका हासिल हो गया। यह उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे गढ़वाल मंडल के पौड़ी जिले का खोह नदी के तट पर बसा, प्रमुख नगर है। इतिहास में इसका उल्लेख 'खोहद्वार' के रूप में उपलब्ध है। इसे गढ़वाल का प्रवेशद्वार भी कहा जाता है। यहां करीब 150000 लोगों की बसाहट है। 



झंडा चौक, कोटद्वार 

देश भर से रेल द्वारा जुड़े, कोटद्वार की भौगोलिक स्थिति कुछ ऐसी है कि यहां से कुछ धार्मिक व पर्यटन के विश्वप्रसिद्ध स्थल बहुत नजदीक पड़ते हैं। जैसे हरिद्वार और ऋषिकेश यहां से लगभग 70 से 90 किमी की दूरी पर पश्चिम की ओर, कॉर्बेट नेशनल पार्क करीब 150 किमी दूर पूर्व की ओर, तक़रीबन 40 किमी उत्तर-पूर्व में लैंसडाउन, जहां प्राकृतिक गोद में गढ़वाल राइफल्स का रेजिमेंटल सेंटर है तथा करीब 85 किमी पूर्व में रामगंगा नदी पर बना दर्शनीय कालागढ़ बाँध स्थित है। वहीं बद्रीनाथ और केदारनाथ धाम के लिये भी सीधी बस और टैक्सी सेवा उपलब्ध है। उतनी ही आसानी से पौड़ी, श्रीनगर, रुद्रप्रयाग भी जाया जा सकता है। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून यहां से करीब सवा सौ किमी है। जबकि देश की राजधानी दिल्ली की दूरी तकरीबन सवा दो सौ किमी  पड़ती है।  

दुष्यंत-शकुंतला विवाह स्थली 


दर्शनीय स्थानों में सबसे महत्वपूर्ण कण्व ऋषि का आश्रम है जो पहाड़ की तलहटी में, शहर से करीब 13-14 किमी की दूरी पर स्थित है। यही वह जगह है जहां शकुंतला-दुष्यंत के यशस्वी पुत्र भरत का जन्म और शैशव काल बीता था। जिनके नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा। सुनसान-बियाबान में यह शांत जगह सकून प्रदायी तो है पर भीतर ही भीतर कुछ विवाद समेटे, बहुत ही ज्यादा देखरेख की मांग भी करती है। 

                                

सिद्धबली हनुमान जी 
नगर के पास ही स्थित हनुमान जी का सिद्धबली मंदिर भी एक प्रख्यात आस्था स्थली है। जहां श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है।


अन्य प्रमुख दर्शनीय स्थलों में दुर्गा देवी मंदिर जो कोटद्वार से लगभग 9 किलोमीटर दूर खोह नदी के तट पर तथा शक्ति पीठ, सुखरी देवी मंदिर दर्शनीय स्थान हैं।

उधर पहाड़ की एक चोटी चर्कान्य शिखर के रूप में जानी जाती है इसी स्थान पर महर्षि चरक ने निघुंट नामक ग्रन्थ की रचना की थी। जिसमें हिमालय की गोद में छुपी दैवीय, अनमोल औषधीय जड़ी-बूटी तथा पौधों के बारे में बहुमूल्य जानकारियां संग्रहित की गई थीं। अब जहां अंग्रेज रहे हों और वहां  चर्च ना हो, ऐसा तो हो ही नहीं सकता; उसी प्रथा के अनुसार यहां भी एक सुंदर दर्शनीय सेंत जोसेफ चर्च बना हुआ है। जो शिल्प कला का बेहतरीन नमूना है। 

हमारा देश ऐसी असंख्य जगहों से भरा पड़ा है जो अपने आप  में हर दृष्टि से समृद्ध, मनोभावन, ऐतिहासिक और धार्मिक जानकारियों का खजाना समेटे हैं ! जरुरत है तो सिर्फ अन्वेषण की !!

गुरुवार, 11 मार्च 2021

लॉक-डाउन के मेरे मासूम साथी

आश्चर्य इस बात का रहा कि ये सारे पक्षी जोड़े में ही आते हैं और पाबंद इतने कि कभी-कभार छोड़, किसी ने भी कभी भी दूसरी प्रजाति के साथ छीना-झपटी का मौका नहीं आने दिया ! एक दूसरे में दखलंदाजी नहीं की ! जैसे जंगल में सरोवर का पानी पीने जानवर क्रम से आते हैं ठीक वैसे ही, बिना दूसरे को हैरान-परेशान किए। उनके आने से एक जीवंतता सी महसूस होने लगती है। उनकी हरकतों, प्रयासों, चुहल से एक हल्केपन का एहसास होने लगता है। तबियत तनाव मुक्त हो जाती है..............!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

संसार में मानवों के इतर भी एक विशाल दुनिया है। उसमें आए दिन बदलाव भी होते रहते हैं। पर जिस पर हमारा ध्यान कम ही जाता है और कुछ का तो पता ही नहीं चल पाता कि कब क्या हो गया ! जैसे दो-तीन साल पहले तक हमारे इलाके में काफी गौरैया दिखा करती थीं पर आज बड़ी मुश्किल से नजर आती हैं ! अलबत्ता कबूतरों की तादाद बढ़ गई है। इनके साथ ही तोते भी अच्छी-खासी संख्या में हैं ! पर सबसे अहम् और अच्छी बात कि कभी लुप्तप्राय कौए फिर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने लगे हैं ! इनके अलावा कभी-कभार, इक्का-दुक्का, जाने-अनजाने अन्य पक्षियों की आवाजें भी सुनने को मिल जाती हैं। भले ही कोरोना के प्रकोप ने कहर ढाया हो पर उसके कारण ही हमारी हलचलों में कमी होने के कारण, सुधरे वातावरण के चलते ही इन परिंदों को देखने, उनके संपर्क में आने का सुख भी उपलब्ध हो पाया है। 


हमारे घर के नजदीक ही एक बिल्ली-प्रेमी घर है, जहां आठ-दस बिल्लियां पलती हैं। अब जाहिर है वे घर में कैद हो कर तो रहेंगी नहीं, सो उनका इधर-उधर अबाध विचरण होता रहता है ! उन्हीं के आतंक के कारण हमने छत पर परिंदों की खातिर चुग्गा-पानी रखना बंद कर दिया था। अपने सामने ही जो थोड़ा-बहुत हो पाता था, उनके लिए कुछ उपलब्ध करवा दिया जाता था। तभी लॉक-डाउन आ गया ! सभी अपने-अपने घरों में नजरबंद हो गए ! तभी एक दिन अचानक ध्यान गया कि आँगन में अक्सर एक मैना का जोड़ा घूमते-चुगते दिखने लगा है। उनके लिए कुछ वहीं बिखेरा जाने लगा ! कुछ दिनों बाद उनकी संख्या तीन हुई, पर कुछ ही दिनों के लिए स्थाई मेहमान दो ही रहे ! एक दिन दो कबूतर भी पधारे। बढ़ती आमद देख, दीवाल पर एक कटोरे में चुग्गा-दाना रख दिया गया, ताकि वे नजरों के सामने, बिना किसी अप्रत्याशित जानलेवा हमले से सुरक्षित रह अपनी क्षुधापूर्ति कर सकें !  



धीरे-धीरे मेहमानों की संख्या में बढ़ोत्तरी होती गई। पहले मैना का जोड़ा आया ! फिर कबूतर का ! फिर दो तोते और फिर दो कौए ! आश्चर्य इस बात का रहा कि ये सारे पक्षी जोड़े में ही आए और पाबंद इतने कि कभी-कभार को छोड़ कभी भी दूसरी प्रजाति के साथ छीना-झपटी का मौका नहीं आने दिया !  एक दूसरे में दखलंदाजी नहीं की ! जैसे जंगल में सरोवर का पानी पीने जानवर क्रम से आते हैं ठीक वैसे ही, बिना दूसरे को हैरान-परेशान किए। उनके आने से एक जीवंतता सी महसूस होने लगती है। उनकी हरकतों, प्रयासों, चुहल से एक हल्केपन का एहसास होने लगता है। तबियत तनाव मुक्त हो जाती है। 
अपनी बारी आने के इंतजार में कौवा 

इतने दिनों के इनके साथ से इनकी आदतें, इनके खाने का अंदाज, खाते समय की सतर्कता सब धीरे-धीरे समझ में आने लगी हैं। जैसे की मैना खिलंदड़ी स्वभाव की होती है ! टिक कर नहीं खाती ! खाते-खाते कभी-कभी कुछ आवाज भी करती है ! ऊपर खाते हुए कुछ गिर जाता है तो नीचे आ चुगना शुरू कर देती है ! एक बार में ज्यादा नहीं खाती। कबूतर मस्त-मौला लगता है ! संगिनी खाती है तो कभी-कभी गर्दन फुला अलग खड़ा देखता रहता है ! खाता कम है, गिराता ज्यादा है ! औरों की बनिस्पत देर तक खाता है ! शायद खुराक ज्यादा होती हो ! कौवा झटके से आ कुछ खा, कुछ दबा झट से उड़ जाता है ! बेहद चौकन्ना रहता है। मिट्ठू मियाँ की बात ही अलग है। कम आते हैं, हरी मिर्ची का लालच देने के बावजूद ! टिंटियाते भी खूब हैं। पर उनसे ही सबसे ज्यादा रौनक लगती है।  


अब जब सब कुछ नॉर्मल होने की राह पर है। तब भी मेरे इन मासूम साथियों का आना बदस्तूर जारी है। हालांकि हमारा आपस में दोस्ताना संबंध तो स्थापित नहीं हो पाया है, फिर भी अच्छा लगता है इनका आना ! इंतजार रहने लगा है इनका ! बदलते मौसम के साथ ही इनका समय भी बदल रहा है अब दिन भर में कभी भी की जगह सुबह व शाम का ही समय इन्हें अपने अनुकूल लगने लगा है। आने वाली गर्मी को देख इनके भोजन की व्यवस्था भी किसी माकूल जगह पर ही करनी पड़ेगी ! देखें कैसे क्या हो पाता है.....! 

सोमवार, 8 मार्च 2021

आधा विश्व हो तुम !!

एक ऐसे समाज को, जो खुद आबादी का आधा ही हिस्सा है, किसने हक दिया महिलाओं के लिए साल में एक दिन निश्चित करने का ? कोई पूछने वाला नहीं है कि क्यों भाई संसार की आधी आबादी के लिए ऐसा क्यों ? क्या ये कोई विलुप्तप्राय प्रजाति है  ? यदि ऐसा है तो पुरुषों के नाम क्यों नहीं कोई दिन निश्चित किया जाता ? पर सभी खुश हैं ! विडंबना यह है कि वे और भी आह्लादित हैं जिनके नाम पर ऐसा दिन मनाया जा रहा होता है ! समाज के इस महत्वपूर्ण हिस्से को इतना चौंधिया दिया गया है कि कुछेक को छोड़ वे अपने प्रति होते अन्याय, उपेक्षा को न कभी देख पाती हैं और न कभी महसूस ही कर पाती हैं........सामयिक पर पुरानी पोस्ट, कुछ फेर-बदल के साथ 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

आज आठ मार्च है, महिलाओं को समर्पित एक दिन ! उन महिलाओं को जो विश्व का आधा हिस्सा हैं ! उन्हें बराबरी का एहसास करवाने, अपने हक़ के लिए जागरूक होने का दिन। पर सोचने की बात है कि क्या संसार का यह आधा भाग इतना कमजोर है कि उस पर  किसी विलुप्त होती  नस्ल की तरह ध्यान  दिया                                                                                                                                  
जाए ! उससे भी बड़ी बात, क्या सचमुच पुरुष केंद्रित समाज महिलाओं को बराबरी का हकदार मानता है ? क्या वह दिल से चाहता है कि ऐसा हो, या सिर्फ उन्हें मुगालते में रखने का नाटक है ?  क्या यह पुरुषों की ही सोच नहीं है कि महिलाओं को लुभाने के लिए साल में एक दिन उनको समर्पित कर दिया जाए ? वैसे ऐसे समाज को, जो खुद आबादी का आधा ही हिस्सा है उसे किसने हक दिया महिलाओं के लिए साल में एक दिन निश्चित करने का ? कोई पूछने वाला नहीं है कि क्यों भाई संसार की आधी आबादी के लिए ऐसा क्यों ? क्या वे कोई विलुप्तप्राय प्रजाति है ? यदि ऐसा है तो पुरुषों के नाम क्यों नहीं कोई दिन निश्चित किया जाता ? पर सभी खुश हैं ! विडंबना है कि वे तो और भी आह्लादित हैं जिनके नाम पर ऐसा दिन मनाया जा रहा होता है और इसे मनाने में तथाकथित सभ्रांत घरानों की महिलाएं बढ-चढ कर हिस्सा लेती हैं।
आज जरूरत है, महिलाओं को अपनी शक्ति को आंकने की, अपने बल को पहचानने की, अपनी क्षमता को पूरी तौर से उपयोग में लाने की, अपने सोए हुए जमीर को जगाने की और यह सब उसे खुद ही करना है ! आसान नहीं है यह सब, पर करना तो है ही ! 
आज जरूरत है सोच बदलने की। इस तरह की मानसिकता की जड पर प्रहार करने की। सबसे बडी बात महिलाओं को खुद अपना हक हासिल करने की चाह पैदा करने की। कभी हनुमान जी को उनकी शक्तियों की याद दिलाने में जामवंत ने सहायता की थी ! पर आज कोई भी ऐसा करने वाला नहीं है ! उन्हें खुद ही प्रयास करने होंगे, खुद ही  अपनी लड़ाई लड़नी होगी, खुद को ही सक्षम-सशक्त बनाना होगा ! हाँ,   
कुछ ज़रा सी बर्फ टूटी तो है. पर गति बहुत धीमी है, ऐसे में तो वर्षों-वर्ष लग जाएंगे ! क्योंकि यह इतना आसान नहीं है ! हजारों सालों की मानसिक गुलामी की जंजीरों को तोडने के लिए अद्मय, दुर्धष संकल्प और जीवट की जरूरत है। उन प्रलोभनों को ठुकराने के हौसले की जरूरत है जो आए दिन उन्हें परोस कर अपना मतलब साधा जाता है। 

पहले तो उन्हें यह निश्चित करना होगा कि उनका लक्ष्य क्या है ! उन्हें क्या चाहिए ! सिर्फ मनचाहे कपडे पहनने और कहीं भी कुछ भी बोल सकने की छूट, ध्येय नहीं होना चाहिए है, वह भी सिर्फ बड़े शहरों में ! दूर-दराज के गांवों-कस्बों में आज भी कुछ ज्यादा नहीं बदला है । आश्चर्य होता है,  इस और  ध्यान ना देकर इस 
दिन कुछ, अपने आपको प्रबुद्ध, आधुनिक व खुद को सारी महिलाओं का प्रतिनिधि मान बैठी तथाकथित समाज सेविकाएं जो खुद किसी महिला का सरे-आम हक मारे बैठी होती हैं, मीडिया के वातानुकूलित कक्षों में कवरेज-नाम-दाम पाने के लिए, कुछ ज्यादा ही मुखर हो जाती हैं। उन्हें सिर्फ अपने  से मतलब होता है ! सोचने की बात है, क्या सिर्फ कुछ, अपने को आधुनिक, प्रगतिशील या बुद्धिजीवी होने का दिखावा करने वाली आत्मश्लाघि महिलाओं द्वारा चली आ रही परंपराओं के विरुद्ध जाने, समाज की मान्यताएं तोड़ने, पुरुषों की कुरीतियों को अपनाने भर से महिलाओं को बराबरी का दर्जा मिल जाएगा ! उन्हें उत्पीड़न से मुक्ति मिल जाएगी ! उनकी वर्जनाएं ख़त्म हो जाएंगी ! या फिर वर्षों से चले आ रहे षड्यंत्र के दलदल में और भी गहरे तक धसतीं चली जाएगीं !      

आज पुरुष केंद्रित समाज ने अपने इस महत्वपूर्ण हिस्से को इतना चौंधिया दिया है कि कुछेक को छोड़, वे अपने प्रति होते अन्याय, उपेक्षा को न कभी देख पाती हैं और न कभी महसूस ही कर पाती हैं। दोष उनका भी नहीं होता, आबादी का दूसरा हिस्सा इतना कुटिल है कि वह सब अपनी इच्छानुसार करता और करवाता है। फिर उपर से विडंबना यह कि वह एहसास भी नहीं होने देता कि तुम चाहे कितना भी चीख-चिल्ला लो, हम तुम्हें उतना ही देगें जितना हम चाहेंगे। 
सबसे अहम् जरूरत है, महिलाओं को अपनी शक्ति को आंकने की, अपने बल को पहचानने की, अपनी क्षमता को पूरी तौर से उपयोग में लाने की, अपने सोए हुए जमीर को जगाने की....और यह सब उसे खुद ही करना है ! आसान नहीं है यह सब, पर करना तो है ही.......! वैसे समय बदल रहा है ! समाज बदल रहा है ! जागरूकता आ रही है ! पर जैसा कि ऊपर कहा, रफ़्तार बहुत धीमी है, ख़ास कर मेट्रो या बड़े शहरों को छोड़ अभी भी परिवर्तन की बहुत... बहुत गुंजाइश है ! 

गुरुवार, 4 मार्च 2021

द्रोणाचार्य, एक पहलू ऐसा भी

प्रयाग के तटवर्ती प्रदेश में सुदूर तक फैले श्रृंगवेरपुर राज्य के राजा निषादराज हिरण्यधनु के पुत्र एकलव्य से जुडी घटना को कुछ लोगों ने गलत अर्थों में लिया और उस बात को बड़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत करके समाज में विभाजन की नींव डाल दी ! जबकि कुछ विद्वानों का मत है कि एकलव्य ने गुरु द्रोण को धर्मसंकट में पड़ा देख, बिना उनके कहे, खुद ही अपना अंगूठा काट कर उनको अर्पित कर दिया था ! वैसे इस घटना को भी श्री कृष्ण जी की दूरंदेशी का परिणाम माना जाता है जो आज के हरियाणा की साइबर सिटी गुरुग्राम में हजारों साल पहले घटित हुई थी....................!!

#हिन्दी_ब्लागिंग    

हमारे ग्रंथों में वर्णित कई ऐसे पात्र हैं जिनके जीवन चरित्र के बारे में अनायास कई जिज्ञासाएं उठ खड़ी होती हैं ! जैसे महाभारत के महान योद्धा, सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर, युद्धविद्या में निष्णात, अस्त्र-शस्त्र विशेषज्ञ, परशुराम शिष्य, कुरुवंश गुरु आचार्य द्रोण ! जिनको भगवान् कृष्ण भी प्रणाम करते थे ! पर इतने गुणी, सक्षम, ज्ञानी, और पराक्रमी होने के बावजूद उन्हें शुरू में अभावों का सामना करते रहना पड़ा था ! कथाओं के अनुसार उनके जीवन का पूर्वार्द्ध बहुत ही संघर्षमय, कठिन व अभावपूर्ण रहा था ! देखा जाए तो जितना कठिन उनका जीवन रहा उतना ही जटिल उनका चरित्र भी था। 

हो सकता है अर्जुन की निष्ठा, लगन तथा समर्पण के कारण गुरु का उसकी तरफ कुछ झुकाव हो पर यह बात भी पूरी तरह सही साबित नहीं होती ! यदि ऐसा होता तो क्या भरी सभा में अपने प्रिय शिष्य की पत्नी का सम्मान भंग होते चुपचाप देखते रहते ! क्या अपने प्रिय शिष्य के विरुद्ध उसी की जान के ग्राहक बन युद्ध लड़ते ! क्या अपने प्रिय शिष्य के पुत्र की हत्या का कारण बनना पसंद करते

ऐसा माना जाता है कि द्रोण का जन्म, आज के उत्तरांचल की राजधानी देहरादून, जिसका उल्लेख महाभारत में द्रोणनगरी जिसे देहराद्रोण (मिट्टी का सकोरा) भी कहा जाता रहा है, में हुआ था। इस इलाके में फैले मंदिरों और उपलब्ध मूर्तियों से भी इस बात की पुष्टि होती है। इनके पिता महर्षि भारद्वाज तथा माता अप्सरा घृतार्ची थीं। परिस्थियोंवश इनकी उत्पत्ति द्रोणी (यज्ञकलश) में हुई थी, इसलिए इनका नाम द्रोण पड़ा। इनका बचपन, लालन-पालन अपने पिता ऋषि भारद्वाज के आश्रम में ही हुआ। वहीं इन्होंने हर विद्या में निपुणता प्राप्त की। समयानुसार इनका विवाह आचार्य कृपाचार्य की बहन कृपि से सम्पन्न हुआ। 

इन सारे विवरणों को जान कर जिज्ञासा का उठना स्वाभाविक है कि एक ऐसा इंसान जो महान ऋषि भारद्वाज का पुत्र हो, आचार्य कृपाचार्य जिसके रिश्तेदार हों ! जो खुद इतना ज्ञानी, गुणी, विद्वान और पराक्रमी हो ! क्यों उसे शुरू में इतने अभाव में जीवनयापन करना पडा कि वह एक गाय तक पालने में असमर्थ था ! क्यों गरीबी के कारण उसे अपने मित्र द्वारा अपमानित होना पड़ा ! क्यों काम की तलाश में दर-दर भटकना पड़ा ! क्यों उसको अपनी योग्यता के अनुरूप यश नहीं मिल पाया ! क्यों बदनामियों ने उसका दामन थामे रखा !  

यदि गहराई से ग्रंथों की कथाओं-उपकथाओं का अध्ययन किया जाए तो एकाध जगह आचार्य द्रोण और गुरु शुक्राचार्य की आपसी मित्रता का जिक्र मिलता है। तो कहीं ऐसा तो नहीं कि असुरों के गुरु शुक्राचार्य से अंतरंगता के कारण इन्हें देवताओं का कोपभाजन बन सुख-समृद्धि से वंचित रहने पर मजबूर होना पड़ा हो और इसी कारण तिरस्कृत होने तक की नौबत आन पड़ी हो ! एक क्षीण सा कारण और भी संभव हो सकता है ! जैसा कि महाभारत में उनका जो चरित्र उभर कर आता है वह एक ऐसे इंसान का है जो सिर्फ और सिर्फ अपने परिवार की फ़िक्र करता है ! खासकर अपने बेटे की, जिसके सामने उसके लिए बाकी सारी बातें गौण हो जाती हैं। हो सकता है उनकी इसी मानसिकता के चलते हर कोई उनसे दूरी बना कर रखता हो। भीष्म पितामह को भी यह बात पता थी ! इसीलिए उन्होंने कुरु कुमारों की शिक्षा की जिम्मेदारी देते हुए उनसे वादा लिया था कि वे सिर्फ कौरववंश के राजकुमारों को ही शिक्षा देंगे। जाने अनजाने यह बात भी आगे चल कर उनकी बदनामी का एक कारण बन गई।  

गुरु द्रोणाराचार्य ने यह कभी नहीं कहा कि मैंने किसी शूद्र को शिक्षा नहीं देने का प्रण लिया है। ऐसा होता तो वे सूत पुत्र कर्ण को भी अपना शिष्य ना बनाते। कुरुवंश से जुड़ने के पहले ऐसी किसी बात का कोई कारण भी नहीं बनता ! भीष्म पितामह को वचन देने के पहले यदि एकलव्य उनसे मिला होता तो उसे अपना शिष्य बनाने में उन्हें कोई आपत्ति भी नहीं होती। क्योंकि एकलव्य कोई साधनहीन या निर्धन परिवार का सदस्य नहीं था। वह प्रयाग के तटवर्ती प्रदेश में सुदूर तक फैले श्रृंगवेरपुर राज्य के राजा  निषादराज हिरण्यधनु का पुत्र था। उस समय श्रृंगवेरपुर राज्य की शक्ति मगध, हस्तिनापुर, मथुरा, चेदि और चंदेरी आदि बड़े राज्यों के समकक्ष थी। लेकिन एकलव्य से जुडी घटना को कुछ लोगों ने गलत अर्थों में लिया और उस बात को बड़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत करके समाज में विभाजन की नींव डाल दी ! जबकि कुछ विद्वानों का मत है कि एकलव्य ने, अपने गुरु को धर्मसंकट में पड़ा देख, बिना उनके कहे, खुद ही अपना अंगूठा काट कर उनको अर्पित कर दिया था ! वैसे इस घटना को भी श्री कृष्ण जी की दूरंदेशी का परिणाम माना जाता है जो आजके हरियाणा की साइबर सिटी गुरुग्राम में हजारों साल पहले घटित हुई थी। लोकमान्यता के अनुसार इन्द्रप्रस्त का राजा बनने पर युधिष्ठिर ने यह गांव अपने गुरु द्रोणाचार्य को दे दिया था। उनके नाम पर ही इसे गुरुग्राम कहा जाने लगा, जो कालांतर में बदलकर गुड़गांव हो गया।

रही अर्जुन से अति लगाव की बात, तो हो सकता है अर्जुन की निष्ठा, लगन तथा समर्पण के कारण गुरु का उसकी तरफ कुछ झुकाव हो पर यह बात भी पूरी तरह सही साबित नहीं होती ! यदि ऐसा होता तो क्या भरी सभा में अपने प्रिय शिष्य की पत्नी का सम्मान भंग होते चुपचाप देखते रहते ! क्या अपने प्रिय शिष्य के विरुद्ध उसी की जान के ग्राहक बन युद्ध लड़ते ! क्या अपने प्रिय शिष्य के पुत्र की हत्या का कारण बनना पसंद करते ! इन सब बातों से तो यही निष्कर्ष निकलता है कि महान होने के बावजूद उनमें इंसानी कमजोरियों की बहुतायद थी। परिवार के प्रति मोह था ! पुत्र प्रेम सर्वोपरि था ! अहम की भावना गहरी थी। क्षमा भाव की कमी थी ! इन्हीं सब वजहों से उन्हें वह आदर-सम्मान-ख्याति नहीं मिल पाई जो पितामह भीष्म को मिली ! उलटे, झूठे-सच्चे लांझनों से सदा उन्हें दो-चार होते रहना पड़ा।   

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