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सोमवार, 22 मार्च 2021

ओ री गौरैया ! बिन तेरे आंगन सूना

आज जरुरत है अपने आस-पास के पर्यावरण के साथ-साथ उसमें रहने-पलने वाले छोटे-छोटे जीवों का भी ख्याल-ध्यान रखने की ! इसके लिए सरकारों का मुंह ना जोहते हुए हर नागरिक को यथाशक्ति, यथासंभव खुद ही कुछ ना कुछ प्रयास करने होंगे ! कहीं ऐसा ना हो कि किसी दिन नीले से धूसर होता जा रहा नभ, नभचर विहीन भी हो कर रह जाए.........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

याद कर देखिए ! कितने दिन हो गए आपको सुबह-सुबह गौरैया का मधुर कलरव सुने ! कितना वक्त बीत गया उसे घर के आँगन, बाल्कनी, छत या किसी मुंडेर पर कुछ चुगते, फुदकते देखे ! अंतिम बार कब उसके चहकने से सकारात्मकता का आभास हुआ था ! कब उनको घर में मंडराते देख सकून सा मिला था ! कब घर की छत के किसी कोने में बने घरौंदे से गिरे उसके नवजात को उठा कर वापस घोंसले में रखने पर एक अनुपम अनुभूति हुई थी ! कब संध्या समय उनके झुंड को बिजली के खंभों की तारों पर कतारबद्ध पंचायत करते देखा था ! नहीं बता पाएंगे ! क्योंकि यह छोटा सा घरेलू जीव धीरे-धीरे, हमारी ही बेरुखी, संवेदनहीनता और अप्राकृतिक रहन-सहन के कारण हमसे दूर होने पर मजबूर होता जा रहा है !  




परसों, 20 मार्च, विश्व गौरैया दिवस था ! ऐसे ही और संरक्षित दिनों की तरह ही इस दिन भी बाकि सब कुछ हुआ, सिर्फ इस नन्हीं सी जान की फ़िक्र के अलावा ! पक्षी प्रेमियों के अतिरिक्त और लोगों को तो शायद ही इस दिवस के बारे में पता भी हो ! मानव-मित्र यह घरेलु पक्षी इंसानी रिहाइशों के आस-पास ही रहना पसंद करता है। सुनसान-निर्जन घरों में यह अपना बसेरा नहीं बनाता। परंतु हमारी बदलती जीवन शैली, घटती हरियाली, घरों की बढ़ती ऊंचाइयों ने इसे हमसे दूर कर दिया है। ज्ञातव्य है कि इस नन्हें परिंदे की उड़ने की क्षमता सिर्फ 20 मीटर की ऊंचाई तक ही सिमित है, जो शहरों के आकाश छूते आधुनिक आवासीय निर्माणों के लिए पूरी तरह अपर्याप्त है ! गांवों-कस्बों में तो यह अब भी दिख जाती है पर महानगरों में तो यह प्राय: लुप्तप्राय ही है !


इसकी घटती तादाद का एक मुख्य कारण कीटनाशकों का बढ़ता प्रयोग भी है ! जिससे पतले-छोटे कीट, जो इसका और इसके बच्चों का मुख्य आहार है, इसे नहीं मिल पाते ! इसको अक्सर धूल में लोटते भी देखा जाता है, जिससे यह धूल-स्नान कर अपने पंखों को साफ़-सुथरा, कीटाणु विहीन बनाए रखती है ! पर बढ़ते कंक्रीटीकरण से इसके ऐसा ना कर पाने की वजह से इसके रोगग्रस्त हो जाने का ख़तरा भी बढ़ गया है। शहरों में इसे रहने के साथ-साथ खाने के लिए भी जूझना पड़ता है क्योंकि मिटटी के अभाव में उसमें पैदा होने वाले कीड़े वगैरह इसे नहीं मिल पाते। यही कारण है कि अब यह शहरों से दूर होती जा रही है। अभी कुछ ही साल पहले दिल्ली में हमारे आवास पर इसकी अच्छी खासी संख्या हुआ करती थी, पर अब तो भूले-भटके भी नजर नहीं आती !



सिर्फ छोटे कीट और बीजों पर निर्भर रहने वाली यह औसत पांच-छह इंच की 30-35 ग्राम वजन की छोटी सी भूरे से रंग की चिड़िया, जिसमें खुद को परिस्थियों के अनुकूल ढल जाने की क्षमता होने के बावजूद, उसकी तादाद भारत में ही नहीं इटली, फ़्रांस, जर्मनी, इग्लैंड जैसे बड़े और विकसित यूरोपीय देशों में भी लगातार कम होती जा रही है। नीदरलैंड में तो इसे पहले ही दुर्लभ प्रजाति की श्रेणी में रख दिया गया है। देखा जाए तो इसको बचाने के अभी तक के सारे प्रयास विफल ही रहे हैं ! केवल 20 मार्च को इसे याद भर कर लेने या राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली का राजकीय पक्षी होने से ही इसका कोई भला नहीं होने वाला !



आज जरुरत है अपने आस-पास के पर्यावरण के साथ-साथ उसमें रहने-पलने वाले छोटे-छोटे जीवों का भी ख्याल-ध्यान रखने की ! यदि हम शेर-बाघ-गिद्ध-कौवे की चिंता करते हैं तो हमें गौरैया जैसे छोटे जीवों का भी ध्यान रखना होगा ! इसके लिए सरकारों का मुंह ना जोहते हुए हर नागरिक को यथाशक्ति, यथासंभव खुद ही कुछ ना कुछ प्रयास करने होंगे ! कहीं ऐसा ना हो कि किसी दिन नीले से धूसर होता जा रहा नभ, नभचर विहीन भी हो कर रह जाए !  

@ चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

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