pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

सोमवार, 17 अगस्त 2020

दशरथ जी के संतान योग पर भारी, रावण की अभिसंधि

पर ऐसा क्यूँ हुआ कि अयोध्यापति संतान का मुख देखने को तरस गए ! जबकि विष्णु जी ने उनका पुत्र बनने का वचन दिया था ! तीन-तीन रानियां थीं ! पूरा परिवार यौवनावस्था में था ! पहले एक संतान हो भी चुकी थी ! हर सुख-सुविधा मुहैय्या थी ! उस युग में ज्ञान-विज्ञान अपने चरमोत्कर्ष पर था, जैसाकि उन दिनों की कथा कहानियों से निष्कर्ष निकलता है ! तिस पर उन्हें पुत्र वियोग का श्राप भी मिला हुआ था, जो तभी फलीभूत होता जब उनके संतान होती ! फिर ऐसा कौन सा कारण था जो अयोध्या को उसका उत्तराधिकारी नहीं मिल पा रहा था ...........!

#हिन्दी _ब्लागिंग 

कई बार कुछ ऐसा पढ़ने को मिल जाता है जो सालों-साल से चली आ रही कथा-कहानियों की किसी घटना या विवरण को एक अलग नजरिया प्रदान कर देता है ! अब जैसे रामायण को ही लें इस महाग्रंथ को कई भाषाओं में विभिन्न विद्वानों द्वारा भिन्न-भिन्न रूप में लिखा गया है। रचयिता की जैसी भावना रही, उसने उसी के अनुरूप अपने ग्रंथ में चरित्रों की व्याख्या भी की। कभी-कभी तो ये उप कथाएं अत्यंत रोचक और सटीक भी लगती हैं। अभी रामजी की बहन शांता देवी के बारे में खोज करने पर एक और रोचक विवरण पढ़ने में आया, उसी को साझा कर रहा हूँ।

राम भगिनी देवी शांता 
सभी राम कथाओं में यह वर्णित है कि राजा दशरथ को कोई संतान नहीं थी इसलिए उन्हें पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाना पड़ा था। पर जैसी अन्य कथाओं से जानकारी मिलती है, उससे यह पता चलता है कि उनके कन्या रूपी एक संतान पहले थी, जिसका नाम शांता था। उसे उन्होंने कौशल्याजी की बहन वर्षिणीजी को, जो अंगराज रोमपद को ब्याही गयी थीं तथा कई वर्षों तक निःसंतान रहने के कारण सदा चिंतित, दुःखी व अस्वस्थ रहने लगीं थीं, गोद दे दिया था। उस समय ऐसा करते हुए कोई कारण भी नहीं था जो दशरथ जी को जरा सा भी आभास होने देता कि भविष्य में उनको संतान प्राप्ति के लिए बेहद चिंतित होना पडेगा।

राजा दशरथ 
फिर ऐसा क्यूँ हुआ कि अयोध्यापति संतान का मुख देखने को तरस गए ! जबकि विष्णु जी ने उनका पुत्र बनने का वचन दिया था ! तीन-तीन रानियां थीं ! पूरा परिवार यौवनावस्था में था ! पहले एक संतान हो भी चुकी थी ! हर सुख-सुविधा मुहैय्या थी ! उस पर उस युग में ज्ञान-विज्ञान अपने चरमोत्कर्ष पर था, जैसाकि उन दिनों की कथा कहानियों से निष्कर्ष निकलता है ! तिस पर उन्हें पुत्र वियोग का श्राप भी मिला हुआ था, जो तभी फलीभूत होता जब उनके संतान होती ! फिर ऐसा कौन सा कारण था जो अयोध्या को उसका उत्तराधिकारी नहीं मिल पा रहा था ! इसका जवाब दक्षिण की एक राम कथा देती है।

रावण 
जब रावण ने ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त किया, जिसके अनुसार उसकी मृत्यु का कारण सिर्फ कोई मानव हो सकता था, तो उसने उस मानव के बारे में जानने की ठानी ! वह परम ज्ञानी, त्रिकालदर्शी, ज्योतिष शास्त्री तथा प्रकांड पंडित तो था ही, उसने ज्ञात कर लिया कि उसकी मृत्यु कौशल्या पुत्र के हाथों होगी। इसलिए उसने अपनी मृत्यु को टालने के लिए, जिस दिन सारे लोग दशरथ-कैकेई के ब्याह में व्यस्त थे, मौका पा कर उसने कौशल्या जी का हरण कर उन्हें मंजूषा में बंद कर दूर एक सुनसान द्वीप पर कड़े पहरे के अंतर्गत ले जा कर रख दिया। इस घटना की सूचना नारद जी द्वारा मिलने पर दशरथ जी सेना सहित वहां पहुंचे पर घनघोर युद्ध के पश्चात  तकरीबन हार चुके दशरथ जी को जटायु जी की सहायता ने बचा लिया। इसके बाद दशरथ और जटायु अभिन्न मित्र बन गए। उधर श्रीराम के जन्म से पहले ही अपनी मौत को टालने का रावण का प्रयास विफल रहा ! परन्तु उसने ग्रहों-नक्षत्रों को वश में कर कुछ ऐसी अभिसंधि की, जिससे दशरथ को पुत्र प्राप्ति हो ही ना सके। यही कारण था कि वर्षों-वर्ष अयोध्या के राजपरिवार में किसी बच्चे की किलकारी नहीं गूँज पाई ! 

श्रृंगी दंपत्ति 
संतान-दुःख, बढती उम्र और चिंता के कारण राजा का मन हर चीज से उचाट हो गया ! राज-पाट से विमुख हो गए ! तब गुरु वशिष्ठ के सुझाव पर श्रृंगी ऋषि को आमंत्रित किया गया, जिन्होंने निस्वार्थ भाव से अपने जीवन भर की घोर तपस्या से अर्जित सारे पुण्यों को होम कर दशरथ जी के लिए, कठिनतम माना जाने वाला पुत्रकामेष्ठि यज्ञ सम्पन्न करवा अयोध्या के साथ देश-दुनिया की विपदा भी हर ली। इस यज्ञ के प्रभाव और उसके दैवीय प्रसाद के फलस्वरूप ही रावण-पाश से मुक्ति संभव हो सकी और श्री राम और उनके तीन भाइयों का जन्म निर्विघ्न हो पाया और फिर कालांतर में रावण का वध हुआ।

प्रसाद के साथ अग्निदेव, देवी शांता भी प्रतिलक्षित हैं 
यहां एक जिज्ञासा का उठना स्वाभाविक है कि जब पुत्रकामेष्ठि यज्ञ से संतान प्राप्ति संभव थी तो उसे पहले ही क्यों नहीं करवा लिया गया। तो इसके बारे में जो जानकारी उपलब्ध है उसके अनुसार महीनों तक चलने वाले इस बेहद कठिन विधि-विधान वाले यज्ञ को पूर्ण करवाना हर किसी के लिए संभव नहीं था ! यदि ऐसा होता तो गुरु वशिष्ठ या गुरु विश्वामित्र इसे पहले ही करवा चुके होते। इसके लिए ऐसे ऋषि की आवश्यकता थी, जो दिव्य, ज्ञानी, परोपकारी, प्रकांड पंडित, सौम्य, पर-हितकारी और वेदमंत्रों का उद्भट ज्ञाता हो ! जिसका अपनी इन्द्रियों व भावनाओं पर पूरा नियंत्रण हो ! इसके साथ ही अपने जीवन भर के पुण्यों की आहुति, बिना किसी हिचक, सोच या पछतावे के, यज्ञ में होम कर सके ! क्योंकि उन्हीं पुण्यों के तेज और प्रताप से दैवी प्रसाद का निर्माण संभव था। इसीलिए वशिष्ठ जी ने श्रृंगी ऋषि के नाम का अनुमोदन किया था। जो राजा दशरथ के जमाता भी थे और वर्षों, अपनी एक घोर तपस्या को पूर्ण कर उन्हीं दिनों अपने आश्रम लौटे थे। राजा दशरथ के अनुरोध और अपनी पत्नी शांता देवी की सलाह पर त्रिकालदर्शी और ज्ञानी श्रृंगी ऋषि ने जब अपनी दिव्य दृष्टि से यह भी जाना कि उस यज्ञ से प्राप्त संतान के रूप में खुद विष्णु जी, राम रूप में पृथ्वी पर अवतरित होंगें तो वे उस अभूतपूर्व घटना का माध्यम तथा साक्षी बनने को राजी हो गए। इस कार्य हेतु उनकी एक ही शर्त थी कि इस महायज्ञ में उनकी पत्नी भी सहभागी होंगी। दशरथ जी ने उनकी बात मान ली। इस तरह ऋषि दंपत्ति के पुण्य-प्रताप से यज्ञ की पूर्णाहुति हो सकी और खुद अग्नि देव चांदी के पात्र से ढके सोने के कलश में दैवीय प्रसाद को ले प्रकट हुए और उसे राजा दशरथ को सौंप दिया। इस महायज्ञ के पश्चात श्रृंगी ऋषि फिर अपने पुण्यों को अर्जित करने हेतु जंगल में जा घोर तपस्या में लीन हो गए। उनके परिवार की जिम्मेदारी राजा दशरथ ने संभाली।      

हमारे ऋषि-मुनियों ने जो भी नियम-कायदे बनाए और उन्हें तरह-तरह की कथा-कहानियों के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाने की कोशिश की उसका एक ही उद्देश्य था कि लोग सरल, सहज, अहम् रहित, धर्मपरायण रह समाज कल्याण हेतु जीवन यापन करें। जीव-जंतुओं का हित हो ! देश-प्रदेश में सुख-समृद्धि-ऐश्वर्य का वास रहे। मानव संस्कृति फले-फूले। उन्हीं महान आत्माओं का प्रताप है कि तरह-तरह के बलशाली, विशाल प्रणियों के अस्तित्व के लुप्त हो जाने के बावजूद मानव इस धरा पर विद्यमान है और निरंतर प्रगति भी कर रहा है।

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

गुरुवार, 13 अगस्त 2020

श्री रामजी की बहन देवी शांता

श्रीराम जिनका नाम बच्चा-बच्चा जानता है। उनके भाईयों के साथ-साथ उनकी पत्नियों के बारे में सारी जानकारी उपलब्ध है। उनके परिवार की तो बात छोड़िए, उनके संगी साथियों, यहां तक की उनके दुश्मनों के परिवार वालों के नाम तक लोगों की जुबान पर हैं। उन्हीं श्रीराम की एक सगी बहन भी थी। उनके बारे में अब जा कर लोग कुछ-कुछ जानने लगे हैं ! यह जानकारी अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि इसी बीच उनकी एक और बहन ''कुकबी जी'' का नाम भी सामने आ गया है ! नाम के सिवा उनके बारे में और कोई जानकारी फिलहाल उपलब्ध नहीं हो पा रही है। फिलहाल शांता जी के बारे में जो जानकारी मिलती है उसी को साझा किया है ...........!


#हिन्दी_ब्लागिंग    

अंग देश नरेश रोमपद तथा उनकी पत्नी वर्षिणी को प्रभु-कृपा से दुनिया की हर नियामत उपलब्ध थी। पर बढ़ती उम्र के साथ नि:संतान होने का दुख दोनों को सालता रहता था। यही एक कारण था जो अंदर ही अंदर दोनों को खाए जाता था। एक बार मन बहलाने के लिए दोनों अयोध्या महाराज दशरथ के यहां पधारे। रानी वर्षिणी महारानी कौशल्या की छोटी बहन भी थीं। वहीं उन्होंने सुंदर, सुशील, वेद, कला तथा शिल्प में पारंगत दशरथ पुत्री शांता को देखा ! दोनों उस पर मोहित हो गए और हंसी-हंसी में ही राजा दशरथ से उसको गोद लेने की इच्छा जाहिर कर दी। दशरथ भी मान गए। बाद में अपने वचन की रक्षार्थ उन्होंने कन्या राजा रोमपद को सौंप दी तथा साथ ही दिलासा भी दिया कि संतान प्रेम उन्हें विचलित न कर दे, इसलिए उसे कभी भी अयोध्या नहीं बुलाएंगे । इस तरह शांता अंगदेश की राजकुमारी बन गईं। बड़ी होने पर उनका विवाह शृंग ऋषि से हुआ जो महर्षि विभाण्डक और अप्सरा उर्वशी के पुत्र थे। 

इधर अयोध्या में राजा दशरथ अपना कोई उत्तराधिकारी ना होने के कारण चिंताग्रस्त रहने लगे थे। उनकी बढती उम्र और गिरते स्वास्थ्य को देखते हुए गुरु वशिष्ठ ने उन्हें पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाने की सलाह दी। राजा को क्या एतराज हो सकता था ! उन्होंने अपनी स्वीकारोक्ति दे दी। पर इस विशेष यज्ञ की यह ख़ास बात थी कि इसे पूर्ण करवाने वाले पुरोहित के सारे पुण्य यज्ञ की ज्वाला में भस्म हो जाते थे। इसलिए ऋषि-महर्षि इस यज्ञ को करने से बचते थे। ऐसे में वशिष्ठ जी ने दशरथ को शृंग ऋषि का नाम सुझाया जो उनके जमाता भी थे। दशरथ ने, अपने शांता को अयोध्या ना बुलाने के संकल्प को याद रख, ससम्मान सिर्फ शृंग ऋषि को प्रस्ताव भेज दिया ! ऋषि पुण्यात्मा, सरल ह्रदय और स्नेहिल व्यक्ति थे। उनमें अथाह आध्यात्मिक क्षमता थी। वे अपने परिवार ख़ासकर शांता से बहुत नेह रखते थे। उसी के कहने और मनाने पर ही वे इस यज्ञ को करवाने के लिए तैयार भी हुए थे।इसलिए अकेले अयोध्या जाने की बात उन्हें ठीक नहीं लगी और उन्होंने यज्ञ करवाने से इंकार कर दिया। फिर बाद में दशरथ ने उनकी बात मानी और यज्ञ पूरा हुआ। अयोध्या से करीब चालीस की मी दूर, जहां शृंग ऋषि का आश्रम भी है, वह जगह आज भी मौजूद है। यज्ञ के पश्चात शृंग ऋषि फिर जंगलों में, अपने खोए हुए पुण्यों को प्राप्त करने, घोर तपस्या हेतु प्रस्थान कर गए।  तुलसी रामायण में शांता जी का जिक्र ना होने के कारण अधिकांश लोगों को उनके बारे में कोई ज्यादा जानकारी नहीं है। पर देश में उनके दो-तीन मंदिर जरूर पाए जाते हैं।

***********************************************************************************************************

शांता देवी का उल्लेख अपने यहां तो जगह-जगह मिलता ही है, लाओस और मलेशिया की कथाओं में भी उसका विवरण मिलता है। पर आश्चर्य इस बात का है कि रामायण या अन्य राम कथाओं में उसका उल्लेख नहीं है ?  पता नहीं क्यूं, असमान उम्र तथा जाति में ब्याह दी गयी कन्या का अपने समाज तथा देश के लिये चुपचाप किए गए त्याग का कहीं विस्तृत उल्लेख किया गया ? क्या सिर्फ दूसरे कुल में गोद दे दिये जाने की वजह  से ?

********************************************************************************************************** 

पहला मंदिर : शृंग ऋषि तथा शांता जी का  एक मंदिर  हिमाचल प्रदेश  के कुल्लू जिले  से  करीब  पचास की.मी. दूर  बंजार उपमंडल की चैहणी कोठी  के ''बागा'' नामक स्थान में  एक छोटी सी पहाड़ी पर सुरम्य परिवेश में बना हुआ है  ! जहां पर शांता और उनके पति ऋषि श्रंगी की एक साथ पूजा की जाती है। दृढ  मान्यता के अनुसार  यहां पर जो भी व्यक्ति उन दोनों की पूजा करता है उसे प्रभु श्रीराम का आशीर्वाद जरूर  प्राप्त  होता है।  इस  मंदिर में भगवान श्रीराम से जुड़े सभी उत्सव जैसे राम जन्मोत्सव, दशहरा आदि भी बड़ी ही धूम-धाम से मनाए जाते हैं। 
 


दूसरा मंदिर : कर्नाटक के कदुर जिले में तुंगभद्रा नदी के किनारे शृंगेरी में स्थित है।  जिसका नाम शृंगगिरि पर्वत के नाम पर पड़ा है। यहीं के ''किग्गा'' नमक स्थान पर श्रृंगी ऋषि और देवी शांता के मंदिर हैं। श्रृंगेरी को यह नाम ऋषि श्रृंगी से प्राप्त हुआ है। श्रृंगेरी प्राचीन काल से बसा हुआ है। यहीं उनका जन्म हुआ था। अत: केरल और तमिलनाडु के कई क्षेत्रों में उनकी और श्री राम जी की बहन शांता की बहुत मान्यता है। ऐसे ही छत्तीसगढ़ सहित कुछ और इलाकों में भी ये मान्यता है कि भगवान राम के जन्म से पहले दशरथ और कौशल्या जी की एक संतान और भी थी, जिसका नाम शांता था। यहां का नजदीकी रेलवे स्टेशन विरूर है जो यहां से करीब साठ की.मी. की दूरी पर है। 

ऐसी ही एक तीसरी जगह है, अयोध्या से लगभग चालिस किलोमीटर दूर विकासखंड मया अंतर्गत स्थित पौराणिक स्थल श्रृंगी ऋषि आश्रम, जहां राजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए गुरु वशिष्ठ की सलाह पर श्रृंगी ऋषि से पुतेष्ठि यज्ञ करवाया था। यहां कार्तिक पूर्णिमा के दिन श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ता है, जो  यहां आकर श्रृंगी ऋषि के विग्रह के सम्मुख अपनी विपदा हरने की प्रार्थना करते हैं। साथ ही बगल में स्थित मां शांता देवी की गुफा में भी वे मत्था टेंकना नहीं भूलते। सरयू नदी की गोद में बसे इस पौराणिक स्थल पर साधु संतों की मंडली भी इस मौके पर उपस्थित होती है। 

देवी शांता के बारे में तुलसी दास जी के मानस में कोई उल्लेख्य नहीं मिलता लेकिन दक्षिण के पुराणों में स्पष्ट रूप से शांता के चरित्र का वर्णन किया गया है | युद्धोपरांत माँ कौशल्या के बताने पर जब चारों भाई अपनी बहन शांता से मिलते हैं तो वे अपने भाइयों से अपने त्याग का फल मांगते हुए उन्हें सदैव साथ रहने का वचन लेती हैं | भाई अपनी बहन के त्याग को व्यर्थ नहीं जाने देते और जीवन भर एक दुसरे की परछाई बनकर रहते हैं |   

सोमवार, 10 अगस्त 2020

समयानुसार अहम्, कुंठा व पूर्वाग्रहों को तिलाजंलि दे देनी चाहिए

आडवाणी जी की अनुपस्थिति में दुबले होते लोगों को पहले स्वतंत्रता दिवस के झंडोतोलन पर आजादी के पुरोधा गांधी जी की याद क्यों नहीं आती। जो उस दिन भी कलकत्ते में बैठे आंसू बहा रहे थे !  तब तो उनकी उम्र भी आज के अडवानी जी से काफी कम थी और ना ही कोई अडचन थी ! जबकि देश की आजादी, बाबरी से आजादी से कहीं बड़ा मायने रखती  थी ! किसी को यह समझ क्यों नहीं आता कि गलत समय में सही बात भी कहर ढा सकती है ! आज जब जनता की नब्ज परखने की जरुरत है ! समय के आकलन की आवश्यकता है ! आत्ममंथन की सख्त अपरिहार्यता है ! प्रजा की भावनाओं को समझने का प्रयोजन है ! असंयमित बयानों पर लगाम कसने की जरुरत है तब भी तथाकथित विज्ञ प्रवक्ता (तियाँ) यह ना समझते हुए कि उनके प्रलाप से पार्टी धंसती जा रही है, लगे रहते है विषवमन पर ! इन कुछ सालों में हुआ पराभव भी उन्हें चेता नहीं पा सक रहा ................................! 

#हिन्दी_ब्लागिंग   

जब से राम मंदिर के भूमिपूजन के उत्सव पर आमंत्रित हुए लोगों की सूचि आम हुई तभी से सोशल मीडिया पर हर चौथी पोस्ट आडवाणी जी की अनुपस्थिति को लेकर अफ़सोस करती दिखने लगी। ऐसा नहीं है कि यह सब उनकी अनुपस्थिति की वजह से दुखी हों, या उनके प्रति इनके दिलों में बहुत सम्मान हो ! यह सब दिल की भड़ास निकालने का कोई भी और कैसा भी मौका खोजने वाले कुतर्की लोग हैं। इनके कुतर्क उनकी उम्र और फैली हुई बिमारी का हवाला भी शांत नहीं कर सकता ! क्योंकि शतरंज की बिसात पर हर दांव में मात पा कर इनके आका तो अब किंकर्तव्यविमूढ़ हो कर रह गए हैं उन्हें तो भरी दुपहरिया में भी अब कोई राह नहीं सूझ रही तो उन्होंने अपने प्यादों को खुली छूट तो दे दी है, पर छूट पाने वाले सिर्फ बगलें झाँक कर रह जा पा रहे हैं। चिल्ला-चिल्ला कर अपनी बात को आगे करने की नाकाम कोशिश भर कर किसी तरह शाम की डांट  से बचने की जुगत भर भिड़ा पा रहे हैं। अभी हाल ही में इनकी एक बड़बोली ''प्रवक्ति'' को एक चैनल पर नायक से खलनायक बना अयोध्या के लोगों ने ऐसा लताड़ा कि अब वह राम या अयोध्या पर बोलने से पहले दस बार सोचेगी।   

एक मान्यता है कि दुनिया में ऐसा कुछ नहीं है जो महाभारत में नहीं है, उसी तरह स्वतंत्र भारत के इतिहास में ऐसा कुछ नहीं है जो अधेड़ावस्था को पहुँच चुकी पार्टी में ना हो ! इनसे कोई पूछे कि जब येन-केन-प्रकारेण पहले स्वतंत्रता दिवस पर झंडे की डोर थामी गई थी तो आजादी के पुरोधा गांधी जी कलकत्ते में क्यों बैठे हुए थे। क्यों नहीं उनको दिल्ली लाने की जरुरत महसूस हुई। जबकि बाबरी मुक्ति से तो उनका देश मुक्ति का अभियान तो कोई तुलना ही नहीं रखता। वैसे भी आडवाणी जी का पाकिस्तान जा कर जिन्ना की प्रशंसा करना कई सवाल खड़े कर जाता है। 

आज ढाई-तीन लोग ऐसे भी हैं राजीव जी का नाम राम मंदिर से जोड़ भ्रम पैदा करने की तिकड़म में लगे हुए हैं जब कि पूरी बात बताने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे कि उस समय ताला कोर्ट के निर्देश पर मजबूरन खोलना पड़ा था जबकि सरकारी वकील से यह कहलवाया जा रहा था कि ताला खोलने से स्थितियां बिगड़ सकती हैं ! जज के आदेश पर ताला तो खुला पर जज महोदय का तबादला दूसरे प्रदेश में कर दिया गया था ! इस आदेश और उस आदेश में भी जमीन आसमान का फर्क है ! तब सरकार मंदिर खोलना नहीं चाहती थी, कोर्ट ने खुलवाया और अभी सरकार खोलना चाहती थी, परिस्थियाँ विपरीत थीं तब कोर्ट ने खुलवाया !

पर आज सब ऐसा राममय हो गया है, स्थिति ऐसी बन गई है, अवाम के गुस्से का डर ऐसा तारी हो गया है कि राम को काल्पनिक कहने वाले, उनकी जन्म स्थली पर सवाल उठाने वाले, राम सेतु का विध्वंस करने का षड़यत्र रचने वाले, ग्रंथों का मजाक उड़ाने वाले, धर्म को अफीम कहने वाले लोग भी अपने घरों में पूजा का आयोजन कर जनता को अपने धार्मिक होने का संदेश देने में जुट गए हैं या यूं कहें कि अपने राहू ग्रसित भविष्य का आभास पा मजबूरन जुटना पड़ रहा है ! पर साथ ही वोट के लिए बाहर आ तरह-तरह के प्रपंच और बोल बच्चन रचने से भी बाज नहीं आ रहे हैं ! पता नहीं इनकी दो नावों की सवारी का क्या हश्र होगा ! सबसे बड़ी बात यह है कि ये नीम हकीम अवाम की नब्ज नहीं समझ पा रहे हैं ! अब नहीं समझ पा रहे, तो खामियाजा तो भुगतना ही पडेगा !!

अधेड़ावस्था के पार जा चुकी अति अनुभवी पार्टी के लंबरदारों को यह क्यों नहीं समझ में आता कि गलत समय में सही बात भी कहर ढा सकती है ! फिर यहां तो बातें ही ऊल-जलूल की जा रही हैं। अपना इतिहास भूल, लंका विजय के समय आप रावण का गुणगान करोगे ! देश की आवश्यकता पूर्ती पर आप सवाल खड़े करोगे ! जिससे तनातनी चल रही हो उसी के घर जा कर गलबहियां डालोगे ! सिर्फ विरोध के लिए विरोध करोगे ! सच को झूठ साबित करने से बाज नहीं आओगे ! अपने घर के सदस्यों के विरोध पर दूसरों को दोष दोगे और फिर कहोगे कि जनता को बरगलाया गया है ! आज जब जनता की नब्ज परखने की जरुरत है ! समय के आकलन की आवश्यकता है ! आत्ममंथन की सख्त अपरिहार्यता है ! अवाम की भावनाओं को समझने का प्रयोजन है ! असंयमित बयानों पर लगाम कसने की जरुरत है तब भी तथाकथित समर्पित, विज्ञ प्रवक्ता (तियाँ) यह ना समझते हुए कि उनके प्रलाप से पार्टी धंसती जा रही है, लगे रहते है विषवमन पर ! इन कुछ सालों में हुआ पराभव भी उन्हें चेता नहीं पा सक रहा ! क्या इसे ही विनाश काले, विपरीत बुद्धि कहते हैं ! सोचने की बात है !!

गुरुवार, 6 अगस्त 2020

मैं और मेरे चश्मे

चश्मा लगने के साथ ही शुरू हो गयी उनकी बेहाली की कहानी भी ! उनका टूटना थमता ही ना था। एक बार चश्मा दिलाने मेरे वेद चाचाजी मुझे कलकत्ते के बहूबाजार, जो चश्मों का गढ़ होता था, ले गए और ऐसे ही मुझसे पूछ लिया कि कौन सा फ्रेम अच्छा लगता है ! तो मैंने जिस ओर इशारा किया उसे देख वे हस पड़े और बोले ''धुत्त पगला'' ! और फिर उन्होंने मेरे इतिहास और चश्मे के भविष्य की परवाह ना कर मुझे एक अच्छा-खासा फ्रेम दिलवा दिया। दूकान से बाहर आ उन्होंने मुझसे पूछा की मैंने वह फ्रेम क्यों चुना था ? मैंने बताया कि मुझे लगा कि वह कानों को अच्छी तरह पकडेगा, जिससे झटके से गिरेगा नहीं, इसलिए ! बाद में गांधीजी वाले उस फ्रेम की बात सोच अक्सर हंसी आ जाती रही...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
मेरा और चश्मे का संबंध बहुत ही पुराना है। बालपन में ही इसने मेरे कानों का सहारा ले मेरी नाक पर कब्जा जमा लिया था। शुरुआत में तो हमारी आपस में काफी तनातनी रही ! तूफानी धमाचौकड़ी वाला मिजाज होने के कारण कोई भी चश्मा नाक पर ज्यादा देर कब्जा जमाए नहीं रख पाता था ! एक-दो पखवाड़े में एक चश्में का शहीद होना निश्चित था। शाम के समय खेलने-कूदने जाओ और जब तक मुझे कुछ समझ आए, तब तक ये भू-लुंठित हो जाते थे ! घर पहुंचते ही ''आदर-सत्कार'' जैसे मेरा इंतजार ही कर रहा होता था। ये टूटना इतना आम हो गया था कि हर बार घर से निकलते समय माँ की हिदायत होती थी कि ''चश्मा मत तुड़वा कर आना !'' मैं कोई जान बूझ कर थोड़े ही तोड़ता था......टूट जाता था !

मेरा बचपन करीब चार साल तक पंजाब में अपने दादा-दादी जी के साथ ही बीता था। सुना है कि उन्हीं दिनों मेरी आँखों में कोई बड़ा इंफेक्शन हो गया था ! उन दिनों चिकित्सा व्यवस्था इतनी व्यापक और उत्कृष्ट नहीं थी ! खैर जैसा भी था रोग पर काबू पा लिया गया। पर उसका दुष्परिणाम नजरंदाज हो गया या उसका पता ही नहीं चल पाया होगा ! फिर मेरा ''ट्रांस्फर'' कलकत्ता हो गया। उन दिनों पढ़ाई और स्कूलों की इतनी मारा-मारी नहीं थी। स्कूल भी कम और दूर-दूर हुआ करते थे। तब हम बंगाल के कोन्नगर में रहा करते थे। जब बाबूजी के कार्यस्थल से पांच-छह बच्चों का जत्था स्कूल जाने लायक हो गया तो हम सब एक-एक रिक्से में दो-दो जने लद रिसरा विद्यापीठ में जाने लगे। जो घर नौ-दस किलोमीटर दूर था। मेरा स्कूल में दाखिला चौथी कक्षा में हुआ था। उसके पहले की पढ़ाई घर पर ही हुई थी। इसलिए आँखों की खामी सामने नहीं आ पाई। 

रोज रात को सोने के पहले बाबूजी तरह-तरह से मुझे कुछ न कुछ सिखाया करते थे। उसमें एक कैलेण्डर की भी अहम भूमिका होती थी जो बेड के सिरहाने टंगा होता था। एक दिन उन्होंने मुझसे कैलेण्डर से संबंधित कुछ पूछा, तो मैं उठ कर उसके नजदीक जा देखने लगा ! इस पर उन्होंने इतना पास जा कर देखने का कारण पूछा तो मैंने बताया कि मुझे दूर से अक्षर साफ़ नजर नहीं आते ! बाबूजी को शंका हुई, आँखों का परिक्षण हुआ और उन्हें कमजोर पाया गया। जब मुझसे पूछा गया तो मैंने कहा कि मुझे लगता था कि सबको ऐसा ही दिखता होगा ! 
चश्मा तो लग गया साथ ही शुरू हो गयी उनकी बेहाली की कहानी भी ! उनका टूटना थमता ही ना था। ऐसे ही एक हादसे के बाद, एक बार चश्मा दिलाने मेरे वेद चाचाजी मुझे कलकत्ते के बहूबाजार, जो चश्मों का गढ़ होता था, ले गए और दूकान के शोकेस में सजे चश्मों को देख यूँही मुझसे पूछ लिया कि कौन सा फ्रेम अच्छा लगता है ! तो मैंने जिस ओर इशारा किया उसे देख वे हस पड़े और बोले ''धुत्त पगला'' ! और फिर उन्होंने मेरे इतिहास और चश्मे के भविष्य की परवाह ना कर मुझे एक अच्छा-खासा फ्रेम दिलवा दिया। दूकान से बाहर आ उन्होंने मुझसे पूछा की मैंने वह फ्रेम क्यों चुना था ? मैंने बताया कि मुझे लगा कि वह कानों को अच्छी तरह पकडेगा, जिससे झटके से गिरेगा नहीं, इसलिए ! बाद में गांधीजी वाले उस फ्रेम की बात सोच अक्सर हंसी आ जाती रही। 

आज चश्मा बहुत आम बात हो गई है। हर छोटे से छोटे बच्चे को भी लगा दिखता है। पर उन दिनों चश्मा लगना, कौतुहल और कमजोरी की निशानी माना जाता था। बड़े शहरों में तो उतना नहीं, पर छोटे शहरों-कस्बों में इसे पहनने वाला और वह भी बच्चा, अजूबा ही बन जाता था। मुझे भी इसके कारण कई बार बड़ी विचित्र स्थितियों का सामना करना पड़ा है। 

पंजाब तब सेहत का गढ़ माना जाता था। माँ के साथ एक-दो साल के अंतराल में जब भी वहां का चक्कर लगता तो ननिहाल में मेरा घर से निकलना दूभर हो जाता था। पहले दिन मुझ चश्माधारी को देख, आस-पड़ोस के बच्चे पता नहीं क्या मुनादी फिराते थे कि दूसरे दिन पता नहीं कहां कहां से ढेर सारे बच्चे हमारे घर के पास ऐसे इकठ्ठा हो जाते जैसे सर्कस में किसी नए जानवर को देखने आए हों ! मुझे देखते ही खुसुर-पुसुर शुरू हो जाती ''ओए ! निक्के जए मुण्डे नू ऐनक लग्गी ऐ !'' हंसी-ठिठोली-फब्तियां कसी जातीं ! मैं रुंआसा हो अंदर जाता तो मामा लोग आ कर उन्हें खदेड़ते।  बच्चे तो बच्चे, वहां बड़े भी मेरे चश्मे को लेकर माँ से ऐसे बात करते जैसे मुझे कोई बिमारी लग गई हो। 

आजआज ज़माना कितना बदल गया है ! चश्मे कहां से कहां पहुँच गए हैं ! व्यक्तित्व और सम्पन्नता की निशानी बन गए हैं ! विज्ञान ने इनमें तरह-तरह की विशेषताएं जोड़ दी हैं। गुणवत्ता ऊँचे दर्जे की हो गई है। अब ये टूटते नहीं, वैसे ही बदलने पड़ते हैं। ये जिंदगी का एक अभिन्न अंग ही बन गए हैं। बुद्धीजीवी होने का प्रमाण बन गए हैं। पर कहां भूलते है वह पुराने दिन ! वह टूटे चश्में, वह गांधी जी का फ्रेम, वह बच्चों की ठिठोली, ढीली निक्कर और भारी चश्मे को संभालने की कवायद, चश्मे के साथ आ जुडी उपमाऐं ! नहीं भूलती और ना भूलेंगी ताउम्र !! 

शनिवार, 1 अगस्त 2020

ये दर्द कब हद से गुजरेगा, कब दवा बनेगा

विडंबना हर बार की तरह यही है कि इस अभूतपूर्व संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाला, इस बार भी वही मध्यम वर्ग है, जो सदैव सारे देश को पालता, उसकी जरूरतें पूरी करता, हारी-बिमारी-मुसीबत में हर बार, हर तरह से उसके काम तो आता है. पर जिसकी कहीं, कभी कोई सुनवाई नहीं होती ! उसे बस निचोड़ा जाता है, सिर्फ निचोड़ा..........................!!






#हिन्दी_ब्लागिंग 

मार्च 19 गुरुवार, अवाम को सम्बोधित करते हुए मोदी जी ने आने वाले 22 मार्च के रविवार को, प्रयोग के तौर पर आजमाए जाने वाले जनता कर्फ्यू में सहयोग करने को कहा ! आसन्न संकट की गंभीरता से अनजान लोगों ने इसे तफरीह के तौर पर ले बड़ी सहजता से सफल बना दिया। नब्ज समझते ही एक दिन बाद मंगलवार को उन्होंने फिर देश को संबोधित कर कोरोना वायरस के अभूतपूर्व संकट, उसकी कोई दवा न होने और सिर्फ संकल्प और संयम से खुद की सुरक्षा ही एकमात्र इलाज होने की बात बता, उसी मध्य रात्रि से यानी 24 मार्च से 21 दिनों के लॉकडाउन की घोषणा कर दी।









देश में ऐसे अवकाश का अनुभव लोगों को पहली बार हुआ था। बिना भविष्य की चिंता करे लोगों ने इसे हल्के तौर पर लिया ! कालोनियों, मोहल्लों, गलियों में अपने-अपने घरों की बालकनियों, छतों, खिड़कियों से लोगों ने एक-दूसरे के साथ संवाद और मनोरंजन के लिए तरह-तरह के उपाय ढूँढ निकाले ! रोज शाम को रौनक लगने लगी। इसी बीच दूसरे लॉकडाउन की घोषणा हो गई ! इंसान की फितरत है कि वह जबरदस्ती बंध के नहीं रह सकता। उसे खुलापन व आजादी चाहिए होती है। इस लंबी घर-बंदी से लोग अब ऊबने लगे ! शुरूआती उत्साह ठंडा पड़ने लगा ! जैसे-जैसे निष्क्रिय दिन-हफ्ते-महीने बढ़ते गए, वैसे-वैसे लोगों में बेचैनी, ऊब, हताशा, निराशा घर करने लगी। कई तो डिप्रेशन के शिकार भी हो गए !



   




  


 

बात सिर्फ निष्क्रियता से उपजी ऊब की नहीं थी ! धीरे-धीरे इस ''बंद'' का भयावह व डरावना रूप सामने आने लगा ! ठप्प व्यवसाय, नौकरी से छंटनी ! कुछ अपवादों को छोड़, हर तरफ से आमदनी की आवक अवरुद्ध होते ही अधिकांश घरों में चिंता का सन्नाटा पसरने लगा ! जमा-पूंजी हाथ की रेत के जैसे तेजी से फिसलती जा रही थी ! वैसे भी आज के हालात में मध्यम वर्ग की बचत होती ही कितनी है ! उसे रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने में दांतों पसीना आने लगा ! ऊँची दर के ब्याज पर या फिर जेवर गिरवी रख पैसे का जुगाड़ करने की नौबत आ चुकी थी ! फिर इस मुसीबत के ख़त्म होने का कोई निश्चित समय भी तो नहीं था कि इतने सप्ताह या महीनों के बाद इससे राहत मिल जाएगी ! कितना भी कोई आशावादी था इस संकट ने उसे बुरी तरह तोड़ कर रख दिया ! ऊपर से देख भले ही अंदाज ना लगता हो, पर अंदर ही अंदर हर इंसान चिंता-भय-आशंका से ग्रसित हो जल बिन मछली की तरह तड़प रहा है।

   


 



 





 

 

अब तक मार चौतरफा हो चुकी है ! बुरी तरह घिरे आम इंसान को बाहर बिमारी और भीतर बेरोजगारी पीसे जा रही है ! बिमारी तो एक तरफ उस पर होने वाले खर्च से वह और भी ज्यादा भयभीत व आतंकित है ! घर से ना निकलने पर उसके सामने भुखमरी का संकट मुंह बाए आ खड़ा हुआ है ! पर घर से निकलते ही कोई रोजगार मिल जाएगा, इसकी भी कहां कोई गारंटी है ! विडंबना हर बार की तरह यही है कि इस अभूतपूर्व संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाला, इस बार भी वही मध्यम वर्ग है, जो सदैव सारे देश को पालता, उसकी जरूरतें पूरी करता, हारी-बिमारी-मुसीबत में हर बार, हर तरह से उसके काम तो आता है. पर जिसकी कहीं, कभी कोई सुनवाई नहीं होती ! उसे बस निचोड़ा जाता है, सिर्फ निचोड़ा !!  




 


   




कहते हैं ना कि दर्द यदि हद से गुजर जाए तो फिर कोई दवा काम नहीं करती, दर्द खुद ही दवा बन जाता है। इसलिए यह बात तो साफ़ है कि इस बहादुर वर्ग को भी डर तभी तक सताएगा जब तक इसकी जेब और रसोई साथ देगी। जिस दिन दोनों रीत गए फिर इसे किसी हारी-बिमारी-कोरोना का डर नहीं रहेगा, चिंता रहेगी तो अपने परिवार की ! क्योंकि है तो वो एक पारिवारिक प्राणी ही !




 

 


गुरुवार, 30 जुलाई 2020

तब मैं भी उतने में बेचता हूँ

शीत युग की आहट से आशंकित गांव के सरपंच ने पूरे गांव की सुरक्षा के लिए फर्रुखाबाद का जरदोजी रफ़ल (शॉल) लेने की सोची। एक विश्वसनीय दूकान से 1670/- की दर से उसने अपनी जरुरत के हिसाब से खरीदी कर ली, जिसमें अतिरिक्त कलाकारी, कीटों से सुरक्षा तथा घर-पहुंच सेवा जैसी कई सुविधाएं भी सम्मिलित थीं..............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
एक समय कहीं एक सुखी, समृद्ध व खुशहाल गांव हुआ करता था। पर वक्त की मार और अपनों की रार ने उसे बदहाली के रास्ते पर धकेल दिया। फिर समय ने करवट ली ! लोगों में जागरूकता आई ! अपने पैरों पर खड़े होने की ठानी गई ! परिवेश सुधरने लगा ही था कि प्राकृतिक व ईर्ष्यालु और द्वेषी पड़ोसियों जनित संकट सर पर आ खड़े हुए ! ऐसी घडी में भी कुछ बार-बार मुंहकी खाए, समाज से नकार दिए गए कुंठित लोग, अपनी धरती और अपने लोगों की सहायता करने की बजाए अपनी नाजायज हरकतों से बाज नहीं आ रहे थे। उन्हीं की एक आत्मघाती हरकत की बानगी !

''शीत युग'' की आहट से आशंकित गांव के सरपंच ने पूरे गांव की सुरक्षा के लिए फर्रुखाबाद का जरदोजी रफ़ल (शॉल) लेने की सोची। एक विश्वसनीय दूकान से 1670/- की दर से उसने अपनी जरुरत के हिसाब से खरीदी कर ली, जिसमें अतिरिक्त कलाकारी, कीटों से सुरक्षा तथा घर-पहुंच सेवा जैसी कई सुविधाएं भी सम्मिलित थीं। पर वर्षों से उसके एक दिग्भ्रमित विरोधी को, अपनी आदतानुसार इस सौदे में भी ठगाई और मूर्खता की बू आने लगी ! उसने हो-हल्ला मचाया कि रफ़ल की कीमत सिर्फ 526/- होनी चाहिए थी। सरपंच गड़बड़ कर रहा है ! अपनी बात सिद्ध करने वह उस दुकानदार के पास गया और पूछा कि कुछ दिनों पहले तुम्हारे बगल वाला विक्रेता इसे 526/- में बेच रहा था तुम तिगुनी कीमत ले रहे हो ! विक्रेता ने पलट कर पूछा, तो आपने उसी समय उससे क्यों नहीं ले लिया था ? वह बोला, उस समय उसके पास माल नहीं था ! दुकानदार ने हस कर कहा, ''सर जी ! जब मेरे पास भी माल नहीं होता तो मैं भी 526/- में ही बेचता हूँ !'' बार-बार लज्जित होने और हास्य का पात्र बनने के बावजूद ऐसे लोग अपनी कुंठा और पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं हो पाते ! द्वेषवश, अपने मान-सम्मान की चिंता छोड़ दूसरे को बदनाम करने के लिए कोई नया शगूफा तलाशने लगते हैं।  काश, ये अपनी बुद्धि, कौशल और अनुभवों को जनहित के लिए उपयोग में ला अपने गुम होते नाम, सम्मान और स्थान को फिर से पाने में अपने समय का सदुपयोग कर पाते !!  

सोमवार, 27 जुलाई 2020

शिव जी और उनका बाघम्बर

भगवान शिव का रूप-स्वरूप जितना आकर्षक है उतना ही रहस्यमय और विचित्र भी है। वे चाहे किसी भी रूप में रहें कुछ चीजें वे सदा धारण किए रहते हैं; जैसे, जटा, भस्म, चंद्र, सर्पमाल, डमरू, त्रिशूल, रुद्राक्ष, तथा  बाघम्बर ! उनका कुछ भी अकारण नहीं है। इन सब वस्तुओं की अपनी-अपनी खासियत और महत्व है। इनमें से बाघम्बर को छोड़ सभी की विशेषताएं तकरीबन सर्वज्ञात हैं ! पर यह व्याघ्रचर्म किसका है और कैसे प्राप्त हुआ यह कुछ अल्पज्ञात है, पर इसका उल्लेख पौराणिक कथाओं में उपलब्ध है..........!  

#हिन्दी_ब्लागिंग 
सावन, भोलेनाथ का प्रिय समय ! इसी समय आकाश से अमृत और कैलाश से कृपा बरसती है ! देश-परिवेश, चहूँ ओर भक्ति से सराबोर हरियाली, खुशहाली, उल्लास का वातावरण ! प्रभु की कृपा पर जन-मानस भाव-विभोर हो उनकी वंदना-पूजा-अर्चना कर अपनी कृतज्ञता प्रदान करता है। सारा देश शिवमय हो उठता है ! उन्हीं की गाथा, उन्हीं की पूजा, उन्हीं का महिमा गान, उन्हीं की स्तुति ! भोले इतने कि ज़रा सी भक्ति पर खुश हो सबको कृतार्थ कर दें ! वरदान देते समय सुर-असुर-मानव-अमानव का भेद नहीं करते ! वे सभी देवी-देवताओं से हट कर हैं। उनका सौम्य और रौद्र, दोनों रूप सुप्रसिद्ध और पूजनीय हैं। ग्रंथों में उनका विस्तार पूर्वक वर्णन उपलब्ध है। 
भगवान शिव का रूप-स्वरूप जितना आकर्षक है उतना ही रहस्यमय और विचित्र भी है। वे चाहे किसी भी रूप में रहें, कुछ चीजें वे सदा धारण किए रहते हैं; जैसे, जटा, भस्म, चंद्र, सर्पमाल, डमरू, त्रिशूल, रुद्राक्ष, तथा बाघम्बर ! उनका कुछ भी अकारण नहीं है। इन सब वस्तुओं की अपनी-अपनी खासियत और महत्व है। इनमें से बाघम्बर को छोड़ सभी की विशेषताएं तकरीबन सर्वज्ञात हैं ! पर यह व्याघ्रचर्म किसका है और कैसे प्राप्त हुआ यह कुछ अल्पज्ञात है पर इसका उल्लेख पौराणिक कथाओं में उपलब्ध है। 

अति प्राचीन समय में जब अभी पृथ्वी के विकास का काम प्रगति पर था, तब शिव जी निरक्षण के लिए अक्सर भ्रमण पर निकला करते थे। वे ठहरे फक्कड़, भोले, तपस्वी, निर्लिप्त, निरपेक्ष ! तो वे दिगंबरावस्था में ही घूमते रहते थे। उनका वसन तो शुभ्र आकाश था। ऐसे ही में एक बार वे दारूकावन जा पहुंचे। जहां कुछ कर्म-कांडी लोग अपने परिवारों सहित वास करते थे। उनकी कर्त्वयपरायण पत्नियां उनकी दिनचर्या और उनके कर्मकांडों को पूरा करने में पूरी तरह समर्पित थीं। एक दिन उन स्त्रियों ने जंगल में ध्यानरत शिव जी को देख लिया ! उनके मोहक, बलिष्ठ, तेजोमय, दिव्य रूप को देख वे सब मोहग्रस्त हो गईं। आठों पहर वे शिव जी का ही ध्यान करने लगीं। उनके पास जाने और उन्हें देखने के लोभ में घर-द्वार सब भूल गईं। शिव जी इन सब बातों से पूरी तरह अनभिज्ञ थे ! वैसे भी उन्हें इन सब से कोई लेना-देना नहीं था। उधर जब घर के पुरुषों को अपनी स्त्रियों में आए बदलाव का कारण जंगल में निवस्त्र घूमते युवक के रूप में मिला तो वे सब आपे से बाहर हो गए। बिना सोचे-विचारे और जाने  कि वह युवक कौन है, क्रोध में मतिभ्रष्ट हो, उसे मारने के लिए उन्होंने जंगल की पगडंडी में एक गहरा गड्ढा खोद डाला और अपनी मंत्र शक्ति से एक विकराल शेर को उत्पन्न कर उसमें छोड़ दिया। पर शिव जी को उस शेर को मारने में पल भर का भी समय नहीं लगा। मरते हुए शेर ने, जो पूर्व जन्म में यक्ष था, शिव जी से सदा उनके पास रहने की याचना की ! शिव जी ठहरे औघड़ दानी ! उन्होंने उसे शिवलोक भेज उसके चर्म को अपना वसन बना लिया। तभी से वह व्याघ्रचर्म, बाघम्बर बन वसन और आसन के रूप में शिव जी द्वारा अपना लिया गया। 

इस घटना के बाद दारुका वनवासियों को शिव जी की असलियत का पता चला। उन सब ने उनकी शरण में जा अपनी गलतियों की क्षमा मांगी। भोले भंडारी ने सब को क्षमा कर भय मुक्त किया और अगली योनि में श्रेष्ठ मुनि-कुल में जन्म लेने का आशीर्वाद दे कैलाश की ओर प्रस्थान किया।   

विशिष्ट पोस्ट

किले का दरवाजा अंदर से ही खुलता है

वैसे तो सच की फितरत है कि वह सामने आता जरूर है ! चाहे जैसे भी हो ! इसके लिए उसकी सहायता करते हैं कुछ ऐसे लोग जो इतिहास की असलियत जग-जाहिर कर...