pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

बुधवार, 12 मई 2010

कभी न कभी आप के साथ भी ऐसा जरूर हुआ होगा

कभी-कभी कुछ अजीब सी स्थिति बन जाती है हमारी। उस समय तो कोफ्त ही होती है। पर ऐसा क्यों होता है कि :-

* जब आप घर में अकेले हों और नहा रहे हों तभी फ़ोन की घंटी बजती है।

* जब आपके दोनों हाथ तेल आदि से सने हों तभी आपके नाक में जोर की खुजली होती है।

* जब भी कोई छोटी चीज आपके हाथ से गिरती है तो वहाँ तक लुढ़क जाती है जहाँ से उसे उठाना कठिन होता है।

* जब भी आप गर्म चाय या काफ़ी पीने लगते हैं तो कोई ऐसा काम आ जाता है जिसे आप चाय के ठंडा होने केपहले पूरा नहीं कर पाते।

* जब आप देर से आने पर टायर पंचर का बहाना बनाते हैं तो दूसरे दिन सचमुच टायर पंचर हो जाता है।

* जब आप यह सोच कर कतार बदलते हैं कि यह कतार जल्दी आगे बढेगी तो जो कतार आपने छोडी होती हैवही जल्दी बढ़ने लगती है।

मर्फी के "ला" को छोडिये। यह बताईये ऐसा होता है क्या ? :-)

सोमवार, 10 मई 2010

धृतराष्ट्र हर युग में होते हैं।

कुछ दिनों पहले एक सामने घट रहे वाकये का जिक्र किया था "आज का धृतराष्ट्र जो खुद ही बैल को उकसा रहा है" के नाम से। जिसमें पुत्र मोह में पड़ा एक बाप अपने 32साला लड़के की इस बात को, कि उसका पहली पत्नि से तलाक हो चुका है और एक बच्चा भी है, छिपा कर फिर उसकी शादी करने जा रहा था। वह इंसान अपने लड़के के भविष्य(?) के लिए इतना अंधा हो चुका था कि उसे उस लड़की का जरा भी ख्याल नहीं आ रहा था, जिसे वह धोखे से अपनी बहू बना घर लाने जा रहा था। बहुत से लोगों ने बहुत तरह से उसे समझाने की कोशिश की। उसे समझाया कि लड़की वालों को सब साफ-साफ बता कर ही बात आगे बढाना नहीं तो शादी के बाद मुसीबत में फंस जाओगे। हर ऊंच-नीच समझाई कि यह कोई व्यसायिक गठबंधन नहीं होने जा रहा या यह रिश्ता दोस्ती-मैत्री का नहीं है कि पसंद नहीं आया या पटी नहीं आपस में तो अलग-अलग रास्ता अख्तियार कर लिया जाएगा। पर उसने किसी की बात पर भी ध्यान नहीं दिया। उसे यहां तक कहा गया कि यदि तुम्हारी बेटी के साथ कोई ऐसा करता तो तुम पर क्या बीतती? इसका कोई जवाब नहीं था उसके पास, उसे ऐसी नसीहत देने वाले अपने दुश्मन लग रहे थे। उसकी बस एक ही रट थी कि शादी हो जाएगी फिर सब ठीक हो जाएगा, क्या ठीक हो जाएगा इसका उसे भी पता नहीं था।

अगला 10-12 लोगों को ले सगाई कर आया तथा इसी आने वाली अक्षय तृतिया पर शादी का होना तय हो गया।
पर कहीं ना कहीं कोई न्याय व्यवस्था है शायद। लड़की के कर्म अच्छे थे या उसके परिवार ने कुछ पुण्य कार्य किया होगा, उनको भनक लग गयी लड़के के इतिहास की। पूछ-ताछ हुई, सच सामने आ गया और उन्होंने साफ मना कर दिया इस रिश्ते से।

अब ये कहता फिर रहा है, भगवान मेरे साथ था, कहीं शादी के बाद पता चलता तो मेरे को मार ही दिए होते।

वैसे पीछे अभी भी नहीं हटा है पर अब ऐसी लड़की खोज रहा है जो परित्यक्ता हो या तलाक शुदा।

रविवार, 9 मई 2010

आप ब्लॉग किस मुद्रा या माहौल में लिखते हैं ?

बड़े-बड़े लेखकों की बड़ी-बड़ी सनकें। कोई सो कर लिखता था तो कोई खड़े हो कर। कोई सोने से पहले तो कोई जागने के बाद। कोई शराब पी कर तो कोई चाय। किसी को शोर-शराबा पसंद था तो किसी को संगीत, कोई अपने पालतू के बिना कुछ सोच भी नहीं सकता था तो किसी को किसी की भी उपस्थिति नागवार गुजरती थी। इसे सनक कहिए या उनका विश्वास कि यदि ऐसा नहीं होगा तो कुछ लिखा ही नहीं जाएगा और लिखा भी गया तो वह वैसा नहीं होगा। और फिर "मूड़", जिसके बिना लेखक अधुरा होता है। इसको बनाने के लिए भी लेखकों को कितनी कसरतें करनी पड़ती थीं। सो हरि कथा की भांति इनका संसार भी तरह-तरह के अजूबों से भरा पड़ा है। यही कहा जा सकता है कि, "लेखक अनन्त लेखक कथा अनन्ता।"

अब ताल्स्ताय की बात करें तो वे सुबह सबेरे ही लिखते थे। उनके अनुसार सुबह-सुबह उनका मन रूपी आलोचक हर लेख पर नजर रखता था जो कि रात को संभव नहीं हो पाता था।

एमिल जोला बिना थके लिखने की सोच भी नहीं सकते थे। इसके लिए वे घूमने निकल जाते थे और इसी दौरान रास्ते में पड़ने वाले लैम्प पोस्ट गिनते रहते थे, गिनती गलत होने पर दोबारा गिनना शुरु करते थे। इस काम में जब बेहद थक जाते थे तो लौट कर लिखना शुरु करते थे।

फ्रांसीसी उपन्यासकार बालजाक रात के सन्नाटे में अपना लेखन कार्य पूरा किया करते थे। लिखते समय उनके कमरे में सिर्फ उनके नौकर को जाने की ईजाजत थी जो थोड़ी-थोड़ी देर में उनके लिए काफी बना कर लाता रहता था।

अलेक्जेंड़र ड़यूमा का विश्वास था कि अच्छा उपन्यास नीले रंग के कागज पर, कविता पीले रंग के कागज पर तथा बाकी की रचनाएं गुलाबी रंग के कागज पर ही लिखी जानी चाहियें।

विक्टर ह्यूगो खड़े हो कर ही लिख पाते थे। इसके लिए उन्होंने अपने कंधे की ऊंचाई के बराबर मेज बनवा रखी थी। लिखते-लिखते वे लिखे हुए कागज जमीन पर बिखराते रहते थे।

मार्क ट्वेन पेट के बल लेट कर लिखते थे , बैठ कर लिखने पर उन्हें आलस्य घेर लेता था।

हमारे शरत बाबू आराम कुर्सी पर अधलेटी अवस्था में अपनी रचनाओं को मूर्त रूप दिया करते थे।

प्रेमचंद जैसे खुद सीधे साधे थे वैसे ही उनका लिखने को लेकर कोई खास सनक भी नहीं थी। वे किसी भी समय, किसी भी जगह, किसी भी हालत में लिख लेते थे। उनके अनुसार लिखने के लिए साफ अनलिखा कागज तथा बिना रुके चलने वाली कलम का होना ही जरूरी होता है।

शुक्रवार, 7 मई 2010

गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर अभी जिंदा हैं, दैनिक भास्कर के अनुसार।

छोड़ो यार सब चलता है, क्या जरा सी बात का बतंगड़ बनाना, गल्तियां हो जाती हैं, जैसी नजर से देखें तो यह कोई बड़ी बात नहीं है। पर यदि एक इतने बड़े अखबार को, जो अपने क्षेत्र में अग्रणी होने का दम भरता हो, मद्दे नजर रख देखें तो यह "ब्लंड़र" है।

आज शुक्रवार 7 तारीख के दैनिक भास्कर के पेज 8 पर अभिव्यक्ति शिर्षक के अंतर्गत स्व। श्री रवींद्रनाथ टैगोर का एक लेख छापा गया है जिसमें लेखक के परिचय में लिखा गया है :-

"लेखक नोबेल विजेता, भारतीय कवि, लेखक और चित्रकार हैं।"

भास्कर अपने जन्म से ही हमारे घर का सदस्य बन गया था। सारे परिवार को इसकी आदत पड़ गयी है। बहुतेरी बार तरह-तरह की स्कीमें ले कर और भी अखबारों ने दस्तकें दीं पर अपनी अच्छाईयों- बुराईयों, तिकड़मों, घोर व्यवसायिकता के रहते भी यह परिवार का अंग बना रहा है। पर कभी-कभी बहुत कोफ्त होती है जब लगता है कि इसे चलाने वालों का नजरिया सिर्फ लाभ और लाभ का है, लगता ही नहीं कि गल्तियों को सुधारने की कोशिश की जा रही है। वाक्यों में गल्तियां, व्याकरण में गल्तियां, कालम का कहीं भी आधी अधूरी बात कह खत्म हो जाना ( इसी अंक के खेल पृष्ठ में अंग्रेजों ने लांघी…...... देख लें), जबर्दस्ती ठूंसे गये अंग्रेजी शब्द चिड़चिड़ाहट तो पैदा कर देते हैं पर जैसे घर के बच्चे की उद्ड़ंता को नजरंदाज कर दिया जाता है वैसे ही आगे ठीक हो जाएगा सोच चुप बैठे रहते हैं।

पर रोज-रोज यदि ऐसा ही चलता रहा तो कभी ना कभी तो इसका खामियाजा भुगतना ही पड़ेगा।

गुरुवार, 6 मई 2010

आखें, आप इन्हें पंद्रह मिनट दें ये आपका उम्र भर साथ देंगी.

किताबें, कंप्यूटर, लैपटाप, सेलफोन, धूल-मिट्टी, तनाव और भी ना जाने क्या-क्या, यह सब धीरे-धीरे हमारी आंखों के दुश्मन बनते जा रहे हैं। पहले जरा से साफ पानी के छीटों से ही ये अपने आप को दुरुस्त रख लेती थीं। पर लगातार इनकी अनदेखी अब इन पर भारी पड़ने लगी है। काम में मशगूल हो, "जंक फूड़" खा, विपरीत परिस्थितियों में देर तक काम कर लोग अंधत्व को न्यौता देने लग गये हैं। लगातार कंप्यूटर आदि पर काम करने से आंखों के गोलकों पर भारी दवाब पड़ता है जिससे छोटी-छोटी नाजुक शिरायें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं इससे खून का दौरा बाधित हो नुक्सान पहुंचाता है और मजे की बात यह कि इतना सब घट रहा होता है पर पता नहीं चलता। डाक्टरों का कहना है कि लोग काम में ड़ूब कर पलकें झपकाना ही भूल जाते हैं जो की आंखों की बिमारी का एक बड़ा कारण है। उनकी सलाह है कि रोज कम से कम 15 मिनट का आंखों का व्यायाम और थोड़ी सी देख-भाल कर इन्हें स्वस्थ रखा जा सकता है।

देख-भाल :- कंप्यूटर पर काम करते समय 15-20 मिनटों के बाद कुछ देर के लिए विश्राम जरूर लें। शुगर की बिमारी हो तो बकायदाजा चेक-अप करवाना जरूरी है। इस बिमारी का आंखों से "ईंट कुत्ते" का बैर है।
आंखों की नियमित जांच करवाते रहना चाहिये।

व्यायाम :- रोज 15 मिनट का आंखों का व्यायाम काफी है इन्हें सुरक्षित रखने के लिए।एक बड़ी सी घड़ी की कल्पना करें। फिर आंखें बंद कर उसके हर अंक पर नजर ड़ालें, तीन सेकेंड़ रुकें फिर घड़ी के मध्य में आ जाएं। इस तरह सारा चक्कर पूरा कर आंखों पर बिना जरा सा भी दवाब ड़ाले हथेलियां रख पांच बार घड़ी की दिशा में और पांच बार विपरीत दिशा में आंखें घुमाएं। फिर हाथ हटा जल्दी-जल्दी बीस बार पलकें झपकाएं।

हाथ में एक पेंसिल ले बांह पूरी खोल लें, सांस खीचें पेंसिल पर नज़र जमा उसे धीरे-धीरे अपनी ओर ला नाक से छुआएं, सांस छोड़ते हुए फिर पेंसिल को दूर ले जाएं। ऐसा पांच बार करें।

आंखों के गढ्ढों के ऊपर सावधानी से उंगलियों से दवाब डालें, पांच सेकेंड रूकें फिर दवाब हटा लें ऐसा पांच मिनट तक करें।

जब भी बाहर से आएं या घर पर भी हों तो साफ पानी से दिन में चार-पांच बार आंखों पर छीटें मारें। ठंड़े पानी की पट्टी रखने से भी बहुत आराम मिलता है।

बुधवार, 5 मई 2010

ये महिलाएं हैं या कीड़े-मकोड़े

अब तो लगता है कि उल्टे-सीधे विज्ञापनों में बेतुके, अतिश्योक्तिपरक व अभद्रता लांघने वाले विषयों की आदत पड़ गयी है सबको। क्योंकि कहीं से भी विरोध का स्वर उठता या सुनाई नहीं देता। इसी से शह पा कर विज्ञापन देने और बनाने वालों में होड़ सी लग गयी है अश्लीलता परोसने की। और यह भी तब जब इस क्षेत्र को संभालने वाली सत्ता की बागडोर एक महिला के हाथ में है।

एक बानगी पेश है :-

1, क्रिकेट का मैदान, एक खिलाड़ी के कैच लेने की भंगिमा के अंतिम क्षणों में अजीबो गरीब कपड़े पहने महिलाओं का झुंड उसे घेर कर गिरा देता है। फिर………………।
ऐसा क्यूँ ? क्योंकि उसने एक खास किस्म की खुशबू लगा रखी थी।

2, फिर एक क्रिकेट का मैदान, बल्लेबाज, क्षेत्र-रक्षक, अंपायर सब तैयार। बालर बाल फेंकने के लिए दौड़ना शुरू करता है और दौड़ता ही चला जाता है मैदान की दूसरी ओर। क्योंकि उसके पीछे महिलाओं का हुजुम पड़ा हुआ था आधे-अधूरे वस्त्रों में। ।
कारण उसने भी एक खास कंपनी की सुगंध लगा रखी थी।

3, एक घर, शादी का माहौल है। मेहमान आए हुए हैं। उन्हीं में एक युवक एक खास परफ्यूम लगा एक शादी-शुदा महिला के पास से गुजरता है और वह “भद्र” महिला अपना “आपा” खो बैठती है।

4, एक युवक ऐसी ही कोई जादुई सुगंध लगा अपने कमरे की खिड़की खोलता है। उसकी सुगंध से सामने के घर में आई नवविवाहिता अपनी शर्म-लाज खो बैठती है।

ये तो कुछ ही उदाहरण हैं जो अपरिपक्व मष्तिष्कों को भटकाने की पुरजोर कोशिश में लगै हैं। क्या जताते हैं ये कि महिलाओं और उन कीड़े मकोड़ों में कोई फर्क नहीं है जो एक खास समय अपने साथी को आकर्षित करने के लिए एक खास गंध छोड़ते हैं।
अरे वे तो फिर भी संयमी होते हैं। उनका दिन-काल सब निश्चित होता है। पर यह विज्ञापनी महिलाएं क्या उनसे भी गयी बीती हैं? क्यों नहीं इस तरह की अश्लीलता पर अंकुश लगता। उन सब संस्थाओं के आँख कान क्यों बंद रहते हैं इन सब बेहूदा विषयों पर, जो महिला हितों की बातें करते दूसरों की नाक में दम किए रहते हैं, उनका ध्यान किस मजबूरी में इस ओर नहीं जाता ?

रविवार, 2 मई 2010

स्वामी विवेकानंदजी की प्रत्युत्पन्नमति

स्वामी विवेकानंद हिंदू धर्म को लेकर फैली भ्रातिंयों और भारतीय संस्कृति के प्रचार के लिए योरोप यात्रा पर थे। वहां उन्हें बहुत बार विषम परिस्थितियों से दो-चार होना पड़ता था। खासकर अंग्रेज उन्हें अपमानित करने के मौके खोजते रहते थे।

एक बार उन्हें एक गिरजा घर में भाषण देने के लिए बुलाया गया। जब वे वहां गये तो एक सिरफिरे अंग्रेज ने, कुटिल मुस्कान के साथ, ईसा मसीह के चित्र के नीचे रखे बहुत सारे धर्म ग्रंथों की ओर इशारा कर कहा, ए स्वामी देखो तुम्हारी गीता का क्या स्थान है।स्वामी विवेकानंद ने उस तरफ देखा, वहां सबसे उपर बाइबिल फिर उसके बाद और बहुत से धर्मग्रंथों के बाद सबसे नीचे "गीता" को रखा गया था। यह देखते ही बड़े सहज भाव से स्वामीजी ने तुरंत कहा, "गुड़ फाउंड़ेशन"।

यह सुनते ही उस अंग्रेज की बोलती बंद हो गयी।

विशिष्ट पोस्ट

राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत, फर्क क्या है

इन दोनों देशभक्ति से ओत-प्रोत संगीत रचनाओं में एक समानता यह है कि इनकी रचना बंगाल में, वहां की दो महान विभूतियों के द्वारा की गई है ! हमारा ...